Mon. Sep 24th, 2018

क्या नेपाल और भारत के रिश्तों का स्वरूप बदल रहा है ?- श्वेता दिप्ति

नेपाल भारत के संबंध में आए तनाव की बात है तो इसकी एक वजह मधेश आन्दोलन तो जरुर थी । मधेश के पक्ष में भारत का खड़ा होना यहाँ के खास समुदाय और राज्य दोनों को ही गँवारा नहीं हुआ । पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में आंतरिक उठा पटक की वजह से दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट दिखी


“नेपाल ओर भारत सिर्फ पड़ोसी देश नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों का पुराना नाता है ।” हर बार यह कह कर हम अपने बीच के रिश्तों को परिभाषित करते आए हैं । सच भी है कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से दोनों देश एक दूसरे के करीबी हैं । पर क्या वजह है कि हमें यह बात बार–बार यह बात दुहरानी पड़ती है ? यानि कहीं ना कहीं कुछ ऐसा है, जो दो देशों के रिश्तों का परिभाषित करने के लिए समय समय पर विवश करता है । नेपाल से भारत का रिश्ता रोटी और बेटी का है यह उक्ति हम जनता और नेता दोनों से सुनते आए हैं, पर यह भी सच्चाई है कि परिवेश बदलता है और साथ ही परिभाषा भी । अगर सर्वेक्षण कराया जाय तो स्पष्ट परिणाम दिखेगा कि अब दोनों देशों के बीच वैवाहिक रिश्ते पहले की अपेक्षा काफी कम हो गए हैं और हालात जो सामने हंै, उनसे यह भी जाहिर होता है कि कुछ वर्षों में वैवाहिक रिश्तों पर पाबन्दियाँ लग जाएँगी । हालाँकि वैवाहिक रिश्ते सामाजिक स्तर पर जुड़े होते हैं इसमें राज्य और राजनीति का दखल कम होता है । पर जब बात दो देशों के बीच वैवाहिक रिश्तों की हो, तो राज्य और राज्य द्वारा बनाई गई नीतियाँ भी इसमें शामिल हो जाती हैं । वर्तमान में राज्य द्वारा निर्धारित भाषा और नागरिकता सम्बन्धी जो नीति है, वही इस रिश्ते को कमजोर कर रही है । इस कटु सत्य को अब स्वीकार करना होगा । लुभाने वाला नारा बेटी और रोटी का सम्बन्ध का अब स्वरुप बदल रहा है । बिहार और उत्तरप्रदेश की बेटियाँ ब्याहकर यहाँ आती रही हैं और तराई की बेटियाँ सीमा पार ब्याही जाती रही हैं । आज शिक्षा के मामले में सभी जागरुक हो चुके हंै, और यही सबसे बडा कारण होगा वैवाहिक रिश्ते के आधार को खत्म करने का क्योंकि, आज भी हिन्दी को मान्यता देने के मूड में राज्य नहीं है और बिहार तथा उत्तरप्रदेश में शैक्षिक भाषा का माध्यम हिन्दी ही रही है । ऐसे में सीमापार के बेटियों की शिक्षा का सफर यहाँ आकर रुक जाता है । यह हालात अब न तो अभिभावक को स्वीकार होगा और न ही बेटियों को । इसलिए राज्य की यही नीति रही तो यह रिश्ता अभी कमजोर हुआ है कल यह पूरी तरह समाप्त होगा इसमें कोई दो मत नहीं है । इस मसले पर दोनों देशों को सोचना होगा ताकि यहाँ दोनों देशों की बेटियों को परेशानियों से नहीं गुजरना पड़े । मधेश आन्दोलन में एक मुद्दा नागरिकता का था, जो समस्या आज भी अपनी जगह बरकरार है । पर मधेशी नेता इस मसले को बहुत पहले पीछे छोड़कर आगे निकल चुके हैं । अब तो सत्ता का स्वाद एक बार फिर से लेने की तैयारी में लगे हुए हैं, परिवारवाद का मोह अब भी सर चढकर बोल रहा है, ऐसे में शहादत और मसले कहीं राख के ढेर में बची खुची चिनगारी के साथ दम तोड़ने की अवस्था में हैं ।
काफी जदेजहद के बाद देश ने संघीयता को स्वीकार किया, जिसके विरोध में एक पक्ष आज भी काम कर रहा है । विरोध की मानसिकता का िपरिणाम हम दो नम्बर प्रदेश में देख रहे हैं । एक अनदेखा पहलू आज वहाँ काम कर रहा है और आलम यह है कि राष्ट्रवाद की लहर के बाद आज दो नम्बर प्रदेश भी उसी राह पर आगे बढ चुका है । जहाँ इस लहर ने पहले देश को दो समुदायों में बाँट दिया था और आज मधेश को भी उसी राह पर भेजकर जातिवाद, भाषाप्रेम, राजधानी मुद्दा को लेकर आपस में ही आमने सामने खड़ा कर दिया गया है । वर्तमान परिस्थितियाँ बता रही हैं कि यह संचालित हैं । जिस वक्त विकास की बातें होनी चाहिए थी, उस वक्त विभिन्न विवादों को जन्म देकर उसका आनन्द लिया जा रहा है । पर निराशा की अवस्था नहीं है, क्योंकि चंद सिक्कों की खनखनाहट न तो सभी को मोहित नहीं कर सकती है और न ही इसका असर लम्बे समय तक टिक सकता है । आलम जरुर बदलेगा यह उम्मीद भी की ही जा सकती है ।
खैर, मधेश से हटकर अगर देश की बातें करें तो देश बेसव्री से अपने नए प्रधानमंत्री की प्रतीक्षा कर रहा है और इन सबके बीच नजरें चाहे अनचाहे पड़ोसी मित्र पर जाती ही हैं । जहाँ की हर बातों को, हर पहल को शक की निगाहों से देखने का चलन ही बन गया है । भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का पिछले दिनों का नेपाल आगमन काफी सनसनीपूर्ण घटना माना गया हालाँकि इस यात्रा के पश्चात कोई सनसनीपूर्ण बातें सामने नहीं आईं । अपने दो दिवसीय दौरे में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी, प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और एमाले अध्यक्ष केपी ओली और सीपीएन माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचंड से मुलाकात की । प्रचंड से मुलाकात के बाद स्वराज ने कहा कि हम राजनीतिक स्थिरता और विकास की दिशा में नेपाल का पूरा सहयोग करेंगे । जबकि प्रचंड ने कहा कि हमने हालिया चुनावों के बाद की स्थिति और नई सरकार के गठन के मसलों पर चर्चा की और कहा कि हम राजनीतिक स्थिरता और विकास चाहते हैं । इसके लिए हमें अपने पड़ोसियों के सहयोग की जरूरत है । यानि यह माना जाय कि भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज का नेपाल आगमन सिर्फ आगामी बनने वाली सरकार को यह आगाह कराना था कि भारत नेपाल में बनने वाली नई सरकार के साथ सौहाद्रपूर्ण वातावरण में काम करने के लिए इच्छुक है । भारतीय विदेशमंत्री ने यही कहा भी पर उनके आगमन ने राजनीतिक हलकों में ही नहीं राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी अच्छी खासी हलचल मचा दी थी । इस आगमन का कोई खास परिणाम सामने तो नहीं दिख रहा पर भावी परिवर्तन के उपर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि एमाले का चीनी मोह ही भारत के लिए चिंता का विषय है । इसलिए बदलते माहोल में भारतीय विदेशमंत्री स्वराज का नेपाल आगमन एक सकारात्मक परिदृशय की ओर इंगित करता है । विगत में जो तीखापन दोनों देशों के रिश्तों के बीच आया उसे दूर करने की सही और ईमानदार कोशिश दोनों देशों को करनी होगी । भले ही नेपाल यह जताने की कोशिश करे कि उसने विकल्प तलाश लिया है पर यह अपने आपको मृगमरीचिका में भटकाने के जैसा ही होगा । क्योंकि विकास की राह पर आगे बढने के लिए नेपाल को अपने दोनों पड़ोसियों की आवश्यकता है इसलिए नेपाल के हक में एकतरफा नीति कभी भी सही नहीं हो सकती ।
जहाँ तक नेपाल भारत के संबंध में आए तनाव की बात है तो इसकी एक वजह मधेश आन्दोलन तो जरुर थी । मधेश के पक्ष में भारत का खड़ा होना यहाँ के खास समुदाय और राज्य दोनों को ही गँवारा नहीं हुआ । पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में आंतरिक उठा पटक की वजह से दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट दिखी । पर यह राजनीति है, जहाँ रिश्तों का बनना और बिगड़ना लगा रहता है, इसलिए नेपाल और भारत दोनों देशों को एक साथ पहल करनी चाहिए, जिसके स्पष्ट संकेत भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने विदेशमंत्री स्वराज को भेजकर दिया है अब बारी नेपाल की है कि वह पुर्वाग्रह से निकल कर देश हित में सही निर्णय ले । दोनों देशों को एक दूसरे की आवश्यकता है । यह सच है कि, पनबिजली, सड़क जोड़ना, व्यापार के मामलों में दोनों देश एक दूसरे के सहयोग के बिना आगे नहीं बढ़ सकते हैं और इसके लिए आवश्यक है कि नेपाल में भारत को लेकर अविश्वास का जो माहोल है उसे दूर किया जाना चाहिए । सैन्य शक्ति के विस्तार या विकास को लेकर नेपाल को यह शिकायत है कि वे जो हथियार खरीदते हैं, उन्हें इसके लिए भारत को पूछना पड़ता है क्योंकि यहज्ञढछण् की संधि में लिखा हुआ है । इसके साथ ही उसमें लिखा है कि अगर किसी तीसरे राज्य से कोई खतरा होता है तो दोनों देश आपस में सलाह करेंगे । पर आज कहीं ना कहीं ये सारी बातें हजम नहीं हो रही हैं क्योंकि परिदृश्य बदल रहा है । इसलिए इन संधियों के पुनव्र्याख्या का समय आ चुका है, जिस पर दोनों देशों को तत्काल ही पहल करनी चाहिए । समुद्र की ओर से भारत को चीन या पाकिस्तान से खतरा होता है तो उससे नेपाल पर कोई असर नहीं पड़ता है परन्तु सीमावर्ती क्षेत्र से यह खतरा हमेशा बना हुआ है और अगर कोई अनपेक्षित हालात पैदा होती है तो इसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं नेपाल पर भी पड़ेगा क्योंकि आग या बाढ़ से सिर्फ पड़ोसी का घर नहीं जलता या बहता है दुष्परिणाम दोनों को ही भुगतना पड़ता है । इसलिए यथाशीघ्र इस संधि पर दोनों पक्षों को गंभीरतापूर्वक चर्चा करने की जरूरत है । सभी जानते हैं कि नेपाल भारत के लिए इसलिए महत्तवपूर्ण है क्योंकि भारत के लिए भारत की सुरक्षा महत्वपूर्ण है । इसलिए भारत यह चाहेगा कि नेपाल कोई ऐसा काम न करे, जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा हो क्योंकि इन दोनों देशों के बीच खुली सीमा है, जिसकी वजह से सुरक्षा को लेकर भारत की चिंता स्वाभाविक है । विश्व जानता है कि भारत पाकिस्तान और चीन इन दोनों देशों को लेकर सतर्क रहना चाहता है । पर पाकिस्तान नेपाल की खुली सीमा का व्यवहार बहुत आराम से कर सकता है और इसके कई बार उदाहरण भी देखने को मिल चुके हैं । नेपाल से चीन की नजदीकी भी भारत के लिए चिन्ता का विषय है क्योंकि चीन के विस्तारवादी विश्व शक्ति बनने की नीति से सभी वाकिफ हैं । ऐसे में नेपाल और भारत को एकबार पुनः सभी संधियों और नीतियों पर विचार करना होगा । रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए जिस विश्वास की जरुरत है उसे पैदा करना होगा और एक स्वस्थ सोच के साथ आगे बढना होगा, तभी सदियों के इस रिश्ते को दिल से महसूस किया जा सकता है और निभाया जा सकता है ।

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