यात्रा मुक्तिनाथ की

Muktinath_Temple
प्रकाशप्रसाद उपाध्याय
नियात्रा जीवन को ताजगी, स्फूर्ति और आनंद से भरने का एक ऐसा माध्यम है, जिसमें नियात्री को विभिन्न स्थलों की यात्रा करने, वहाँ के जनजीवन, उनके रहनसहन, रीतिरिवाज और संस्कृति से परिचित होने और धार्मिक स्थलों को देखते हुए आनंद उठाने का अवसर प्राप्त होता है । यही कारण है कि विदेशों से सैकड़ो सैलानी दूसरे देशों की यात्रा में निकलते रहते हैं । यात्रा स्थल का मौसम सुहाना और प्राकृतिक सुंदरता से भरा हो तो यात्रा का सुख और आनंद ही कुछ और होता है । मुझे भी अपनी सेवाकाल में और सेवानिवृत्ति के बाद जितने भी नगरों, वहाँ के दर्शनीय और ऐतिहासिक स्थलों को देखने, वहाँ की प्राकृतिक छटा और जनजीवन से परिचित होने का अवसर मिला, उससे पर्यटन के प्रति रुचि बढ़ती ही गई और सैरसपाटे से दिल आज तक नही भरा । कुछ समय पहले जब मैं पोखरा की यात्रा में था तो वहाँ कुछ नियात्रियों को अपनी मुक्तिनाथ यात्रा की चर्चा करते हुए पाया । मुझे भी अपनी मुक्तिनाथ यात्रा की स्मृति ताजी हो उठी । मुक्तिनाथ मुस्तांग जिले में अवस्थित एक प्रसिद्घ और दर्शनीय पावन स्थल है जहाँ, प्रकृति और अध्यात्म का सुंदर तालमेल मन को मोह लेता है । नेपाल के सात प्रमुख तीर्थ स्थलों में मुक्तिनाथ भी एक है । कालीगण्डकी नदी के पावन जल से प्रच्छालित, नीलगिरी और धौलागिरी के हिमाच्छादित श्रृँखलाओं से सुशोभित, हरी–भरी पहाडि़यों से सुसज्जित और तेज गति से बहती नदियों की जलधारा की ध्वनि से गूँजता मुक्तिनाथ क्षेत्र को यदि भगवान विष्णु और आदिदेव महादेव का निवास स्थल के रूप में दर्शनीय और पूजनीय माना जाता है तो इसे अतिशयोक्ति के रूप में नही देखा जाना चाहिए ।
ऐसे पावन स्थल के संबंध में जानकारी पाने पर मैं भी एक दिन तत्पर हो उठा अपने भाईयों के साथ इस पावन क्षेत्र की यात्रा में जाने के लिए । काठमांडू से पश्चिम नेपाल की ओर जाने वाले पर्यटकों के लिए पोखरा एक ऐसा केन्द्र है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है । उस पर पोखरा की नैसर्गिक सुंदरता भी पर्यटकों को बारबार आने को आकर्षित करती है । अतः हम लोग काठमांडू से पोखरा के लिए प्रस्थान हुए मुक्तिनाथ यात्रा के लिए ।
पोखरा काठमांडू से हवाई मार्ग से जुड़ा होने पर भी हम लोग २००कि.मी. की यात्रा करते हुए सड़क मार्ग से वहाँ पहुँचे । रात पोखरा में बिताई । दूसरे दिन प्रातःवहाँ के विन्ध्यवासिनी माता के मंदिर में सिर नवाते हुए हम लोग आगे बढ़े बांगलुंग के लिए । राह में भी कई प्रसिद्घ मठ–मंदिर मिले, जहाँ के देवी–देवताओं का दर्शन करने के अवसरों ने हम लोगों को आह्लादित किया । बांगलुंग का प्रसिद्घ नगर बेनी बजार पहुँचने पर लगभग १२ बजे थे । हम लोग नाश्ता करते हुए चले थे, अतः खाने की जल्दी किसी को नही थी । और यह भी सोच थी कि अँधेरा होने से पहले ही जोमसोम पहुँचा जाय । अतः वहाँ से आगे की यात्रा के लिए हम लोगों ने एक जीप ली जोमसोम तक के लिए । क्योंकि आगे की यात्रा के लिए जीप की यात्रा ही उपयुक्त और सुरक्षित थी । जोमसोम को मुक्तिनाथ का प्रवेशद्वार माना जाता है । पोखरा से जोेमसोम के लिए हवाई सेवा भी उपलब्ध है । पर हम लोगों ने प्राकृतिक नजारा देखने के उद्येश्य से सड़क मार्ग की यात्रा को ही प्रथमिकता दी । बेनी बाजार से चलने पर जब भूख महसूस होने लगी तब हम लोग गलेश्वर नामक स्थान पर रुक गए । उस स्थान का नाम वहाँ पर स्थित गलेश्वर महादेव के मंदिर के नाम पर पड़ा है । भोजनगृह में खाने का ऑर्डर देकर हम लोग गलेश्वर महादेव के मंदिर में गए भगवान का दर्शन करने ।
पोखरा से जोमसोम की दूरी सिर्फ ८३ कि.मी. है पर गलेश्वर से आगे जोमसोम तक के मार्ग के दोनों ओर का प्राकृतिक दृश्य जितना मनमोहक है राह उतनी ही खतरनाक भी लगी । बायीं ओर चट्टानी पर्वत तो दायीं ओर काली गण्डकी नदी की जलधारा । चट्टान स्खलन के कारण पर्वत से गिरे बड़े–बड़े शिलाखण्डों को काली गण्डकी में अटके हुए देखकर इस सोच से दिल काँप उठता था कि कहीं कोई शिलाखण्ड फिसलकर गाड़ी पर गिरी तो स्थिति क्या होगी ? उबड़खावड़ सड़क पर चल रही जीप की गति ऐसी थी कि जोमसोम पहुँचने में हम लोगों को लगभग ४ घंटे लगे । हाँ, बीच में एक रमणीय स्थल पर हम लोग चाय पीने के लिए रुक गए थे, इसलिए कि चायपान के साथ–साथ समीप ही दिखाई पड़ता और संध्याकालीन सूर्य की लाल किरणों से चमकता हिमपर्वत की सुंदरता को कुछ देर निहार सकें ।
अब तो सड़क की स्थिति सुधार ली गई है पर सुरक्षित यात्रा के लिए वसंत और शरद काल ही उपयुक्त रहता है । वर्षा काल में सड़क भूस्सखलन के कारण कब, कितने देर के लिए अवरुद्घ हो जाय निश्चित नही रहता । इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण वर्षा के बाद ठंढ भी बढ़ जाती है । फिसलन का भय अलग । हम लोगों को जोमसोम पहुँचने पर रात हो चुकी थी । वहाँ एक थकाली होटल में पहुँचे , खाना–पीना वहीं हुआ । भूख के कारण या भोजन स्वादिष्ट होने के कारण मजे से खाए । वैसे भी थकालियों के द्वारा बनाया गया खाना अत्यंत स्वादिष्ट होता है । अतः थकाली भोजन स्वादिष्ट भोजनों मे प्रसिद्व है ।
सुबह मुक्तिनाथ जाने के लिए जब नहा–धोकर बाहर बरामदे में धूप सेकते हुए चाय की प्रतीक्षा कर रहे थे एकाएक प्रातःकालीन सूर्य की किरणों से चमकता हिमपर्वत दिखाई पड़ा । हिमालय पहाड़ को इतने निकट से चमचमाते हुए देखने के अवसर से विस्मित हो उठा । चाय पीने के बाद हम लोग काली गण्डकी नदी के पुल से गुजरते हुए बस स्टॉप तक पहुँचे, जहाँ यात्रियों की भीड़ जमा थी । उन यात्रियों में कुछ दक्षिण भारत और महाराष्ट्र राज्य के सैलानी भी थे । हमें देखकर वह हिंदी मे बातें करने लगे । बस से हमें मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुँचना था । मुक्ति क्षेत्र आने से पहले एक मिनी तीर्थस्थल कागबेनी आया, जहाँ हिंदू धर्मावलम्बी अपने पितृओं का तर्पण किया करते है । दो गण्डकी नदियों का मिलन विंदू होने के कारण इसे पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है । यहाँ से गुजरते हुए हम मुक्तिनाथ क्षेत्र के अंदर प्रवेश कर गए और बस से उतरे । पर बस स्टॉप से मंदिर तक की दूरी इतनी अधिक और चट्टानी थी कि बड़े–बुढ़े लोगों को वहाँ पहुँचने के लिए मोटर साइकिल का सहारा लेना पड़ रहा था । हम लोग तो चलते हुए मंदिर तक पहुँच गए ।
मुक्तिनाथ मंदिर का स्वरूप अत्यंत आकर्षक है । पैगोड़ा शैली में बनाया गया यह मंदिर १४फीट ऊँचा और ८फीट चौड़ा है । मुक्तिनाथ बाबा के दर्शन के लिए मंदिर में प्रवेश करने से पहले वहाँ के १०८सोतों में नहाने की परंपरा है । चुँकि हम लोग नहाकर ही निकले थे अतः सिर्फ सिर भिगोकर गए । पानी इतना ठंडा होता है कि सिर को तौलिए से लपेटकर भिगोना पड़ता है । जल का सीधा संपर्क सिर के लिए हानिकारक प्रमाणित हो सकता है ।
मंदिर के अंदर भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और गरुड़ विराजमान हैं । मंदिर के अंदर भीड़ अधिक न होने के कारण भगवान की स्तुति आराम से कर पाए । यह देखकर आश्चर्य भी लगा कि वहाँ एक महिला पुजारी तैनात थीं, जो शायद बौद्घ धर्मावलम्बी थीं ।
वहाँ इनरुवा से आया एक परिवार लाख बत्ती जलाने में लीन था । मंदिरों में लाख बत्ती जलाना और उसमें सहभागी हो पाना नेपाली समाज मे एक पुण्य कार्य माना जाता है । अतः हम लोग भी इस अवसर को देवैच्छा मानकर उसमें सरीक हो गए । बाद में पता चला कि उस परिवार का एक मुखिया उँची इलाके की एक बीमारी, जिसे स्थानीय भाषा में लेक लगना कहते हैं, से पीडि़त होने के कारण इस अनुष्ठान में सरीक नही हो पाए । बाद में उन्हें स्थानीय चिकित्सालय में उपचार हेतु ले जाया गया ।
मुक्तिनाथ को बौद्घ लोग आर्यावलोकितेश्वर के रूप में पूजते हैं । अतः मुक्तिनाथ भगवान के प्रति हिंदू, बौद्घ और जैन संप्रदाय के लोगों में असीम भक्तिभाव है । वहाँ से निकलकर हम लोग निकट ही अवस्थित ज्वाला माई के दर्शन के लिए एक मंंदिर में गए, जहाँ कुछ बौद्घ भिक्षुजन अपने ग्रंथों का पाठ कर रहे थे । नीचे पानी की कलकल ध्वनि और पत्थरों और मिट्टी के बीच से ज्वाला निकल रही थी । इस चमत्कारिक दृश्य और शक्ति से प्रभावित होकर हम लोग बाहर निकले । बाबा मुक्तिनाथ और ज्वाला माई का दर्शन पाकर आत्मिक संतोष प्राप्त हुआ । दूर उत्तर की दिशा में धूप की किरणों से चमकता धौलागिरि पर्वत की हिमश्रृंखलाएँ वातावरण को सुखमय बना रही थी । मंदिर के बाहर कुछ छोटे व्यापारी अपनी दुकान फैलाए बैठे थे और उनकी सामग्रियों में काली गण्डकी से निकाले गए शालिग्राम पत्थर प्रमुख थे, जिन्हें हिन्दूजन बड़े उत्साह से खरीद रहे थे । हम लोगों ने भी कुछ शालिग्राम खरीदी और बाहर आकर फिर थकाली भोजनालय में जाकर थकाली भोजन का स्वाद प्राप्त किया । चूकि यह पर्यटकीय स्थल है अतः यहाँ रहने और खाने की भी अच्छी व्यवस्था है । यदि घर लौटने की जल्दी न हो तो यहाँ मौसम, स्वच्छ हवा और प्रकृतिक सुंदरता का आनंद उठाने की दृष्टि से २–४दिन ठहरा जा सकता है और इससे आगे के स्थलों को भी देखा जा सकता है ।
हम लोगोंं को तो काठमांडू लौटने की जल्दी थी, अतः हम लोग भोजन ग्रहण करने के बाद निकल पड़े और रात बेनी बजार मेंं बिताते हुए दूसरे दिन पोखरा की सुंदरता को निहारते हुए काठमांडू लौट आए ।

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