Sat. Sep 22nd, 2018

जनता की चाहतः ‘लुटेरा सांसद्’ मुक्त समाज

इतिहास देखते हैं तो पता चलता है कि जनता के वोट से निर्वाचित हमारे अधिकांश जनप्रतिनिधि अपने शपथपत्र के ठीक विपरित क्रियाकलाप करते आ रहे हैं ।

मैं.. देश और जनता के प्रति पूर्ण वफादार रह कर सत्य निष्ठापूर्वक प्रतिज्ञा करते हुए सांसद पद का शपथ लेता हूं, नेपाल के सार्वभौम सत्ता और राजकीय सत्ता नेपाली जनता में निहित रख कर नेपाल के संविधान प्रति मैं पूर्ण वफादर रहूंगा, प्रचलित कानून के अधीन रहकर देश और जनता के पक्ष में निर्भयतापूर्वक, बिना पक्षपात, बिना पूर्वाग्रह, खराब भावनाओं से प्रेरित न होकर, पदीय गोपनीयता कायम रख कर ईमानदारी के साथ अपनी भूमिका निर्वाह करता रहूंगा ।
गत फाल्गुन २० गते प्रतिनिधिसभा और राष्ट्रीयसभा (संघीय संसद्) में प्रतिनिधित्व करनेवाले सम्पूर्ण सदस्यों ने ऊपर उल्लेखित भावार्थ में अपने पद तथा गोपनीयता की शपथ ली है । इससे पहले ही विभिन्न ७ प्रदेशों के प्रदेश सांसदों ने भी उल्लेखित शब्द तथा भावार्थ अनुसार शपथ लिया है । जनता के वोट से निर्वाचित हमारे जनप्रतिनिधि इस तरह शपथ तो लेते हैं, लेकिन क्या वे अपने शपथपत्र में उल्लेखित शब्द और भाव के प्रति ईमानदार होते हैं ? या सिर्फ दिखावे के लिए ही इस तरह के आदर्शवादी शब्द और भाव के साथ शपथ ग्रहण करते हैं ? अब इसके बारे में चर्चा होनी चाहिए । क्योंकि इतिहास देखते हैं तो पता चलता है कि जनता के वोट से निर्वाचित हमारे अधिकांश जनप्रतिनिधि अपने शपथपत्र के ठीक विपरित क्रियाकलाप करते आ रहे हैं ।
राज्य के शासन–संयन्त्र में हो अथवा समाज में व्याप्त अराजकता, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, गुण्डागर्दी के पीछे प्रमुख हाथ ऐसे ही जनप्रतिनिधि कहलानेवाले नेताओं के संरक्षण में होता आ रहा है । अगर राजनीति करनेवाले नेता अपने पदों की गरिमा और ईमान के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं तो सामाजिक तथा प्रशासनिक अपराध में गुणात्मक गिरावट आ सकता है । लेकिन हमारे जनप्रतिनिधियों जनता की अपेक्षा के विपरित काम करते हैं जिसके कारण आज राजनीति के प्रति लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है । अर्थात् हमारे जनप्रतिनिधि कहते कुछ, और करते कुछ और ही । इसीलिए उनसे अपेक्षा है कि – उन्होंने जिस शपथ ग्रहण–पत्र में हस्ताक्षर किया है, और उसमें जो भाव है, वह व्यवहार में भी देखने को मिल सके ! बस जनता इतना ही चाहती है ।
खैर ! राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमारे संघीय संसद् विश्व जगत के लिए ही एक नमूना है, जहां नेपाल और नेपाली समाज का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है । हमारी विशेषता है कि यहां विभिन्न जातजाति, भाषाभाषी और धर्म– संस्कृति अवलम्बन करनेवाली जनता आपस में मिलजुल कर रहते हैं । संविधानसभा द्वारा निर्मित संघीय गणतन्त्रात्मक संविधान जारी होने के बाद गठित प्रथम प्रतिनिधिसभा बैठक (फाल्गुन २० गते) में सहभागी होनेवाले जनप्रतिनिधि अपने–अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक पहचान के साथ उपस्थित हुए थे । जो नेपाल की विविधता को दर्शाती है । दूसरी बात, सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए ही नहीं, विश्व राजनीति के लिए भी नेपाल का संघीय संसद् एक नमूना है, जहां इस तरह की विविधता के साथ–साथ सबसे ज्यादा समावेशी और समानुपातिक जनप्रतिनिधि चयन होते हैं । शासन–सत्ता में हर भाषा, संस्कृति, और धर्म का प्रतिनिधित्व होना प्रजातान्त्रिक अभ्यास और समावेशी–समानुपातिक प्रतिनिधित्व में विश्वास करनेवालों के लिए एक सुन्दर दृश्य और सुखद अनुभूति भी है । ऐसे गरिमामय संघीय संसद में प्रतिनिधित्व करनेवाले सांसदों का अपमान होना ठीक नहीं । लेकिन जनप्रतिनिधियों में से ही कुछ सांसद ऐसे निकलते हैं, जिसके चलते समग्र जनप्रतिनिधियों को गाली करने के लिए लोग विवश होते हैं । अब ऐसी अवस्था न आए, इसके लिए नव निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को सजग रहने की जरूरत है ।
नेपाल के सन्दर्भ में यह पाँचवा जनप्रनिधिमूलक संस्था है । इससे पहले वि.सं. २०१५, ०४८, ०५१ और ०५६ में जनता ने अपना प्रतिनिधि चयन किया था, उन लोगों की साझा संस्था को प्रतिनिधिसभा कहा जाता है । विगत में जितने प्रतिनिधिसभा थे, वहां समावेशी और समानुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं था, आज है । वि.सं. २०६४ और ०७० में भी जनप्रतिनिधि तो चयन हुए थे, लेकिन उन लोगों की साझा संस्था को प्रतिनिधिसभा नहीं, संविधानसभा कहा गया । क्योंकि उस वक्त निर्वाचित होनेवालों को शासन–सत्ता का प्रतिनिधि नहीं, संविधान निर्माता के रूप में ज्यादा परिभाषित किया गया ।
वि.सं. ०६४ के बाद हम लोगों ने समावेशी–समानुपातिक सिद्धान्त को अवलम्बन कर चुनाव किया है । इस सिद्धान्त को राज्य संयन्त्र में अपनाने के लिए अर्थात् नया राज्य व्यवस्था स्थापना के लिए बहुत लोगों को शहीद होना पड़ा । आज उसके ही परिणामस्वरूप हमारे संघीय संसद् में विविधता देखने को मिल रहा है । जिसके प्रति नागरिकों के लिए सम्मानभाव होना जरुरी है, न कि घृणा । इसीलिए नव निर्वाचित जनप्रतिनिधि की जनभावना अनुसार अपना इमान कायम रखना चाहिए ।
यहां स्मरणीय एक बात तो यह भी है कि विगत से जो जनप्रतिनिधि हमारे सामने हैं, उन में से अधिकांश तो पुराने चेहरे ही नजर आते हैं जिसकी वजह से यह सोच सामने आती है कि लोग तो वही हैं, शासन व्यवस्था और कानुन नयां होने से कुछ नहीं होता, उसको नेतृत्व करनेवाले लोग तो पुराने ही हैं । नागरिकों में राजनीति और नेताओं के प्रति इस तरह का जो अविश्वास है, उसको गलत साबित कर हम लोग देश और जनता के प्रति प्रतिबद्ध है और राजनीति में हमारे व्यक्तिगत स्वार्थ कुछ भी नहीं है, इस तरह का विश्वास दिलाना नये जनप्रतिनिधियों को आसन नहीं है ।
क्योंकि राजनीतिक संक्रमणकाल के नाम में हो अथवा अन्य कोई बहाने, राजनीति में आवद्ध अधिकांश नेता–कार्यकर्ताओं के कारण ही हमारे राजनीतिक–सामाजिक सम्बन्ध तथा आर्थिक विरासत में नकारात्मक असर पड़ा है । नेता और मन्त्री होने का मतलब राजनीतिक कार्यकर्ता को नौकरी दिलाना, भ्रष्टाचारी और तस्करों से वसूली करना, कूटनीतिक पासपोर्ट दलालों के हाथ बेचना नहीं है । इसीतरह सत्ता को ही सबकुछ समझकर सांसदों को भेड़– बकरी की तरह खरीद–बिक्री करना, व्यक्तिगत तथा पारिवारिक स्वार्थ को लेकर दूतावासों के दरबाजे खटखटाना और राष्ट्रीय हित विपरित के सम्झौता के लिए भी तैयार होना देश और जनता के लिए गद्दारी है । लेकिन विगत में ऐसी कई घटना देखने को मिली, जिससे जनता मुक्ति चाहती है । अर्थात् जनता चाहती है कि अब हमारी राजनीति और समाज ‘लूटेरा सांसदों’ से मुक्त हो, वे लोग जो कहते हैं, वही करे । इसीलिए राजनीति के प्रति निराश युवाओं को भरोसा दिलाना है तो अब इस तरह की हरकत बन्द होनी चाहिए । अर्थात् अपने शपथ ग्रहण–पत्र पर ईमानदारी दिखानी चाहिए । आम जनता में नये जनप्रतिनिधियों से यही अपेक्षा रही है । तब ही हम लोग आर्थिक समृद्धि की राह पर आगे बढ़ सकते हैं, नहीं तो आर्थिक समृद्धि का नारा सिर्फ नेताओं के भाषण में सिमट कर रह जाएगा ।

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