तीन देवियां कब तक मूर्ति मानव बन कर रहेंगी ? बिम्मी शर्मा

तीन देवियां कब तक मूर्ति मानव बन कर रहेंगी ? कब उतरेगी अपने सिंहासन से और देश के नागरिकों का मन जितेंगी । यह मिट्टी या पत्थर की पिंड़ तो नहीं है, तो दिखाए अपनी क्षमता और जौहर ।


डायन के अधंविश्वास में वृद्ध और असहाय महिला को घर और गांव से निकाला जा रहा है । पर ये तीनों देवियां टुकुर–टुकुर सब देखती हैं पर बोलती या करती कुछ नहीं


तीसरी ने विद्युत प्राधिकरण के लोडसेडिंग को बढ़ानेवाले तीनों संचालकों को अदालत से जमानत में रिहा करवा दिया । है ना यह तीनों देवियां कमाल की ?nepali-women-in-top-position
बिम्मी शर्मा, 
हमारे देश में तीन देवियां विराजमान हैं महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की तर्ज पर राष्ट्रपति, सभामुख और प्रधान न्यायाधीश तीनों ही महिला अर्थात् तीन देवियां है । पर यह तीनों देवियां लेती और खाती सब कुछ हैं, पर देती किसी को कुछ नहीं । देश की आधी आबादी इन तीन देवियों को देख–देख कर निहाल हैं कि हम उस पद पर नहीं पहुंच सके तो क्या हुआ, हमारी ही एक स्वरूप तो वहां पर विराजमान है न ? यही क्या कम है ? हमें इसी बात पर गर्व और संतोष है ।
पर इन तीन देवियाें के कार्यकाल में समाज की अन्य देवियाें के हित रक्षा के लिए क्या–क्या निर्णय लिए गए इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता । इन तीन देवियों के रहते हुए भी महिलाओं की अस्मिता लूटी जा रही हंै । डायन के अधंविश्वास में वृद्ध और असहाय महिला को घर और गांव से निकाला जा रहा है । पर ये तीनों देवियां टुकुर–टुकुर सब देखती हैं पर बोलती या करती कुछ नहीं । यह बस सजने, संवरने के लिए उस पद पर पहुंची है । एक ने तो उसी पद के प्रभाव से अपनी बेटी की शादी भी करवाईदूसरी सरकारी हवाई जहाज ले कर अपने पूरे परिवार और रिश्तेदांरो के साथ विदेश भ्रमण कर आई और तीसरी ने विद्युत प्राधिकरण के लोडसेडिंग को बढ़ानेवाले तीनों संचालकों को अदालत से जमानत में रिहा करवा दिया । है ना यह तीनों देवियां कमाल की ?
देवी महाकाली तो अपने भक्त पर कोई भी कष्ट आने पर दुष्टों और दैत्यों का संहार करती थीं । माता लक्ष्मी अपने गरीब भक्तों पर धन की वर्षा करती थी और माता सरस्वती अपने सभी भक्तों को ज्ञान और विवेक का आशिर्वाद देती थीं । पर हमारे देश की यह जीवित और सत्तासीन तीनों देवियां न दुष्टों का संहार करती हैं, न धन, दौलत की वर्षा करती हैं न किसी को ज्ञान और सद्बुद्धि ही प्रदान करती है । बस यह सत्ता का दुरूपयोग कर अपना काम निकालना और खुश रहना जानती है । देश की बांकी महिलाएं जाएं भांड़ में इन्हें क्या ? यह तो बस नाम की देवियां हैं जो किसी काम की नहीं ।
किसी भी महिला का सर्वोच्च सत्ता पर पहुंचने का मतलब है– उस देश की साधारण महिलाओं के हक में कानून बनना और उन पर होता आ रहा भेदभाव और हिंसा खत्म होना या कम होना । पर इस देश की तो बात ही निराली है क्योंकि यह तीन देवियां अपनी योग्यता और कौशल से ज्यादा दलगत झुकाव के कारण उस सर्वोच्च पद पर पहुंची हैं । यदि ऐसा न होता तो सभामुख के पद पर आसीन व्यक्ति को अच्छी तरह बोलना क्यों नहीं आता ? पद की मर्यादा क्या होती है, इन्हें क्यों नहीं पता है ?
देश के हर कोने और नौकरी पर आरक्षण का सांप फन फैला कर बैठा हुआ है । दल और नेताओं ने इस विषैले सांप को दूध पिला कर पाल रखा है । जिसका फायदा अयोग्य व्यक्तियों को मिल रहा है । जिसमें महिला भी शामिल हैं । महिला की राजनीति ही क्यों हर क्षेत्र में आगे आना अच्छी बात है पर अपनी क्षमता के बल पर । पर इस देश में तो आरक्षण के कोटे से धकेल–धकेल कर अक्षम व्यक्ति को भी उस पद पर पहुंचा देती है जहां आम जनमानस के मन में उस व्यक्ति के प्रति तनिक भी श्रद्धा नहीं उमड़ती है । पर ऊपर पहुंचने की चाह ने महिलाओं के प्रति लोगों की निष्ठा और सम्मान में कमी आई है । इन तीन मूर्तियों का देश के सर्वोच्च पद पर होने से निचले तबके की महिलाओं को क्या हासिल हुआ है ? जब तक यह मिट्टी का माधो बनी रहेगी देश की महिलाओं को न्याय नहीं मिलेगा ।
देश का बौद्धिक वर्ग इस बात पर गर्व करता है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर महिला आसीन है । सारे विश्व में ऐसा दुर्लभ संयोग मिलना मुश्किल है । हां, यह तो है पर इन महिलाओं ने महिलाओं के पक्ष में कितने फैसले लिए और उनके साथ न्याय किया । पद पर पहुंचना ही बड़ी बात नहीं हैं । पद की गरिमा को बनाए रख कर देश की महिलाओं का जीवन स्तर और न्याय पर पहुंच सहज और जल्दी होना चाहिए । पर यह तीन देवियां भी पुरुषों के हाथों की गोटियां ही बन कर रह गई है । देश कड़ाही है, जनता के आंसू और खून पकवान के रूप में पक रहा है और इन तीन देवियों को कड़ाही में चलाने वाला कलछुल या चमचा बना कर इनके दल और नेता इन देवियों को खूब घुमा रहे हैं ।
इस देश में सबसे ज्यादा लोग आस और भरोसे के साथ न्याय के क्षेत्र को देखते हैं । पर यह न्याय का क्षेत्र भी महिलाओं के लिए बड़ी टेढ़ी खीर है । किसी महिला के साथ रेप या कोई हादसा हो तो न्यायालय से न्याय की आशा करना उसके जीते जी असंभव जैसा ही है । देश का कानून रेंग कर धीरे धीरे चलता है । पीडि़त को न्याय मिले उसकी आवाज की उचित सुनवाई हो चाहे वह मर्द हो या औरत, पर लाखों वर्षों से न्यायालय में अटके हुए हैं । पीडि़तों को न्याय नहीं मिलता और पीड़क बाहर सर उठा कर शान से घूमता है । भले ही पीडि़त तब तक ऊपर पहुंच जाए । क्या न्याय की देवी प्रधानन्यायाधीश को इस सब पर सुधार नहीं करना चाहिए । क्या सरकारी गाड़ी के काले शीशे के पार की काली दुनिया और काले लोग उन्हें नहीं दिखते हैं ? तो न्याय में देरी क्यों ?
और देश के सर्वोच्च पर राष्ट्रपति काबिज हैं । उन्हे किसी प्रभावशाली मृत नेता की पत्नी होने के चलते यह गरिमामय पद अगर नहीं मिला है तो आम जनमानस की सोच को बदल कर दिखाएं । खाली अध्यादेश पारित करना या नेता और दल को आदेश देना ही उनका काम नहीं है । वह दिखाए की वह एक सबल, निडर, स्वाभिमानी और योग्य महिला हैं । वह राष्ट्रपति बाद में और पहले महिला हैं, जिन्हें देश की कमजोर महिलाओं का दुख तकलीफ देता है । वह संवेदनशील है अपने आधे आसमान के प्रति जिस पर पूरी उड़ान भरने के लिए पंक्षी की तरह महिलाएं अपना पंख फड़फड़ा रही है । तो यह तीन देवियां कब तक मूर्ति मानव बन कर रहेंगी ? कब उतरेगी अपने सिंहासन से और देश के नागरिकों का मन जितेंगी । यह मिट्टी या पत्थर की पिंड़ तो नहीं है, तो दिखाए अपनी क्षमता और जौहर । (व्यंग)

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