सम्पादक की कलम से..
नेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में संविधानसभा कीलम्बी आयु के लिए की जाने वाली निष्कर्षवहीन बैठक कीबातें सुनते-सुनते नेपाली जनता ऊब चुकी थी । ऐसीस्थिति में चारों ओर चर्चा एक ही थी कि सहमति नहीं हर्इतो ंविधानसभा का क्या होगा – सभी लोग अपने-अपनेटी.वी. से चिपके हुए तीन बडे दलों के द्वारा किए जानेवालेनिर्ण्र्ाकी प्रतीक्षा में थे । तीन दलों की आपसी तकरारऔर अदूरदर्शी राजनीतिक विचार धारा के ऊहापोह मेंसंविधानसभा के द्वारा बनाए जाना लिखित संविधान बननातो दूर स्वयं संविधानसभा दलों की खींचतान में मृत प्राय हो गई थी । अचानकज्येष्ठ १४ गते की मध्यरात्रि में सभासदों को याद आई कि यदि कामधेनु रूपी
संविधानसभा पुनर्जीवित नहीं हर्इ तो सभी सभासदों की जीविका कैसे चलेगी -अवाञ्छित धनराशि कहाँ से मिलेगी – सभासदों की इसी स्वार्थपूरक दूरदर्शी सोच केआधार पर कांग्रेस, एमाले एवं माओवादी पार्टियों के द्वारा हस्ताक्षरित तीन सूत्रीयमौखिक सहमति को राष्ट्रीय सहमति के आधार के रूप में लादी गई समीकरण कोज्येष्ठ १४ की मध्यरात्रि में लागू कर संविधानसभा को पुनर्जीवित तो करा दिया गयापर सहमति, तत्काल ही संकट ग्रस्त दिखाई देने लगी । बहुमतीय अंकगणित केखेल में अपनी साख खो चुकी मधेशवादी दलों के साथ अन्य छोटी-छोटी पार्टियाँसमावेशी राजनीति की प्रतिमर्ूर्ति बन कर रह गई । तीन दलों के द्वारा की गई तीनसूत्रीय सहमति मधेशवादी दलों को समुचित सम्बोधन नहीं कर सकी । फलतः
मधेशवादी दलों का आक्रोशपर्ूण्ा असंतोष र्सार्वजनिक होने लगा ।शंका-उपशंका के बीच संविधानसभा की कार्यावधि १ वर्षके लिए बढा देने से
नेपाल में र्सवत्र आसन्न संकट की स्थिति से नेपाली जनता थोडे समय के लिए हीसही चैन की साँस लेने लगी किन्तु संविधानसभा की कार्यावधि १ वर्षअधिक बढानेकी संवैधानिक स्वीकृति मिलने के कुछ ही घंटे बाद पुनः तीनो बडे दलों में तकरारहोने लगी, जो भावी संविधान निर्माण के लिए शुभ संकेत नहीं है । नेपाली जनता तोजानती है कि वर्तमान संविधानसभासदों की भेडिया धसान सदस्य संख्या अग्रिम १वर्षकी कालावधि में भी नयाँ संविधान बनाने वाली नहीं है । संविधानसभा, सदस्यों केलिए चाँदी है । इन सदस्यों या नेताओं को पता है कि हम संविधान बनाएँ या न बनाएँहमें हमारी जनता कुछ कहने या करने वाली नहीं है । कारण नेपाली जनता गौतमबुद्ध के अहिंसावादी उपदेशां े का अक्षरशः पालन करती आ रही है और भविष्य में भीकरती रहेगी । सभासदों और नेताओं का यह विचार शत-प्रतिशत सही है । नेताओं-सभासदों का विचार अनुभव पर आधारित है । अतः हे नेताओं-सभासदों † एक वर्षतक पुनः बिना संविधान बनाए, खाओ, पियो मौज करो ।
































‘अति र्सवत्र वर्जयेत्’ इस सिद्धान्त के आधार पर नेपाल की सडक क्रान्ति से नेपाली जनता ऊब चुकी है । बन्द, हडताल के कारण रोग, भूख, शोक और अशिक्षा से आक्रान्त हो किर्ंकर्तव्य विमूढ हो चुकी है । आए दिन बन्द, हडÞताल शब्द सुनते-सुनते जनता यह सोचने को बाध्य हो गई है कि नेपाल बन्द क्यों, किसलिए और कितने दिन – क्या माओवादी नेतृत्व बालुवाटार के डेढ लाख मूल्य वाले पलंग पर न सो पाने के लिए बन्द अथवा प्रधानमंत्री की चकाचांैध करने वाली बहुमूल्य गाडी पर बैठकर काठमांडूबासी -सुकिला मुकिला) जनता की नगरी में सैर करने की महत्वाकांक्षा के लिए बन्द – क्या सडÞक आन्दोलन के नाम पर निरीह अशिक्षित एवं प्रताडित जनता को दिवास्वप्न दिखाने के लिए बन्द – किसी भी चीज की हद होती है । बन्द हडताल की श्रृंखला की कडÞी के रूप में मई दिवस के अवसर पर गाँव-गाँव से पशुओं के समान लोगों को गाडिÞयों में कोंच-कोंच कर लाए अशिक्षित जनों की भीड को यदि जनआन्दोलन-३ की संज्ञा दी जाती है तो जनआन्दोलन की परिभाषा समझ में आना कठिन है । सत्ता प्राप्ति के लिए गिद्ध-दृष्टि से जनआन्दोलन समय-समय पर करते रहना कहाँ तक न्यायोचित है –
जनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों से उपदेशित हो विश्व को शान्ति का मार्ग दिखाने वाला देश नेपाल आज स्वयं चतर्र्दिक समस्याओं से आक्रान्त होकर अशान्त, अभाव-ग्रस्त एवं हिंसावादी जैसा हो गया है । यहाँ की जनता अन्याय, अभाव, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और आतंक का शिकार हो छटपटा रही है । अदूरदर्शी राजनीति, क्षेत्रवाद, जातीय समीकरण और आतंकवाद आदि ने नेपाल की राष्ट्रीय एकता की भावना में दरार पैदा कर दिया है । आम जनता सब प्रकार से त्राहिमाम कर रही है । आज के सर्ंदर्भ में नेपाल में सरकार एवं कानून नाम की कोई चीज नहीं है । ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा’ जैसी कहावत अक्षरशः फलीभूत हो रही है । इसी कारण नेपाल में विधिशून्य दण्डहीनता का साम्राज्यं हो चुका है । फलतः आतंकी और आतंकवाद की जडें मजबूत हो गई हैं और सुरसा राक्षसी की भाँति मुँह फैलाए वह व्यापारी, कर्मचारी, पत्रकार तथा र्सवसाधारण को एक-एक करके निगलते जा रहा है । उमा सिंह, संचारकर्मी जमीम शाह एवं अरुण सिंघानिया आदि । आंतकवाद नेपाली जनता की नियति बन गई है ।

नेपाल और भारत के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और आद्या शक्ति माँ जानकी के वैवाहिक सम्बन्ध से स्थापित है । उसी समय से इन दोनों देशों के बीच अटूट रुप से उक्त सम्बन्ध अद्यावधि प्रगाढÞ होता आ रहा है । इस सम्बन्ध को प्रगाढ करने का काम केवल नेपाल और भारत के सीमान्त प्रदेशों में रहने वाली तर्राई वासी जनता ही नहीं अपितु इन दोनों देशों के राजा-महाराजा भी वैवाहिक सम्बन्ध परम्परा की कडी को मजबूत करते आ रहे हैं । इन दोनों देशों के बीच मात्र यही सम्बन्ध नहीं है । दोनों के बीच भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, भाषिक, सामरिक और आर्थिक सम्बन्ध भी अटूट हैं । इन्हीं सब कारणों से नेपाल-भारत के बीच बेटी-रोटी का रिश्ता है । जिसे तोड पाना किसी भी प्रतिवेदन के वश की बात नहीं है । फिर भी नेपाल में पंचायत काल से आज तक शासन करते आ रहे पर्वतीय मूल के अदूरदर्शी राजनेता लोग अपने संकरीण् विचारों के आधार पर इसे तोडने की कोशिश करते आ रहे हैं । उसी कोशिश को शख्त और अधिक बाधक बनाने के लिए संसद में संविधान सभा की मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धान्त समिति के द्वारा जो प्रतिवेदन लाया जा रहा है वह निश्चय ही मधेशी जनता को अधिकारहीन बनाने के साथ-साथ तर्राईवासियों का सम्बन्ध भारत के साथ अच्छा न रहे इसके लिए सोची समझी कूटनीति है । क्योंकि भारत के साथ तर्राईवासियों का सदियों पुराना सांस्कृतिक सम्बन्ध प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित होगा । ऐसा होने से भारत के प्रति तर्राईवासियों के मन में व्याप्त भावनात्मक निकटता खण्डित होगी । दोनों देशों के बीच विद्यमान सुसम्बन्ध स्थापित नहीं रह पाएगा, यह उक्ति पर्ण्तः चरितार्थ होगी कि, न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । लेकिन गोर्खाली शासकों को समझना होगा कि तर्राई की जनता भी २१ वीं सदी की जनता है । वहं की जनता भी जागरुक हो गई है और अधिकार प्राप्त करने की शक्ति को समझने लगी है ऐसी स्थिति में खस् शासकों द्वारा लाये गए नागरिकता प्रतिवेदन को भविष्य में पारित कराने की कोशिश की गयी तो परिणाम त्रासदीपर्ण् हो सकते हैं जिसके लिए मुख्य रुप से राज करते आ रहे खस् शासक ही जिम्मेबार समझे जाएंगे ।
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना स्वाभाविक ही नहीं मानवीय अपेक्षा भी होती है । इसी गतिशीलता के क्रम में बारह वर्षों से निकलती आ रही हिमालिनी पत्रिका का स्वरुप साहित्यिक से राजनीतिक तक आ चुका है । नेपाल से निकलने वाली पत्रिकाओं में से यह हिमालिनी अपने लक्ष्य एवं अपनी पूणता की ओर बढ रही है ऐसा आकलन पाठकों का है । समय की प्रवाह की तरह व्यक्ति का आना जाना तो लगा ही रहता है परन्तु जिस लक्ष्य को केन्द्रित कर हम चले हैं उस राह में आने वाली तमाम बाधाओं को पार करते हुए हमें अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचना है । ऐसे में हम सुधि पाठकों से उत्तरोत्तर सहयोग की अपेक्षा रखते हैं ।
