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September , 2010
Thursday
वास्तविकता आर्श्चर्य पैदा करती है कि 'संयुक्त राष्ट्रसंघ' जिसे प्रारम्भिक दौर में संयुक्त राष्ट्र या लीग ...
दुनिया का राजनीतिक चौधरी और ग्लोबल विलेज के महाजन की भूमिका निभाने वाले संयुक्त राज्य ...
कषि तथा सहकारी राज्यमंत्री करीना बेगम ने पर्सर् प्रमुख जिला अधिकारी -सिडिओ) के गाल पर ...
आउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे ...
चलचित्र प्राविधिक संघ द्वारा आयोजित 'फिल्म अवार्ड' कार्यक्रम में 'म तिमी बिना मरिहाल्छु' फिल्म ...
सर्र्खियों में है दलाई लामा । चीन की वजह से ही हो रहा है ...
हनजी के राज में महिलाओं पर होते अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली उत्तर प्रदेश कांग्रेस ...
चार और संचार जगत, पत्रिका और पत्रकार जगत, इन दोनों को मिलाकर इन दोनों जगहों पर ...
डा. दयानन्द वज्राचार्य, डा. खुमनारायण पौडेल और डा.र्इशान गौतम कृत पुस्तक "नेपालमा विज्ञान तथा प्रविधि" के मुताबिक ...
भारत-नेपाल के बीच का सम्बन्ध बहुत पुराना है जिसका गवाह हमारा इतिहास है दोनों देशों ...
लीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण ...
मगवान श्रीकृष्ण ने सोलह हजार से भी ज्यादा लडकियों से शादी रचा कर भावी युवकों ...
उपनिवेश वाद वह शासन है जिसका संचालन विजेता राष्ट्र विजित राष्ट्र की जनता पर करते ...
अफ़ग़ानिस्तान में जिरगा ने राष्ट्रपति हामिद करज़ई के तालेबान से शांति समझौते के प्रयासों का ...
महाभारत में वैसे तो कई पात्र हैलेकिन उसमें एक पात्र ऐसा था जिसने पुत्र मोह के ...
साधारण किरदारों की विशेष कहानी करण जौहर ने अपने संरक्षित और सफल घेरे से बाहर निकलने ...
वह हौवा है या भगवान जो भी है अब उसके सामने चुनौती वह खुद ही ...
महीने तक पद पर काम करने से महरुम नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानन्द झा फिर ...
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और इसके आका भारत से कितने मोर्चों पर एक साथ युद्ध कर ...
पहला अवसर है कि जब नेपाल के पहले राष्ट्रपति रामवरण यादव की पहली भारत ...
मानव समुदाय दो प्रकार का होता है- प्रथम सभ्य समाज, दूसरा असभ्य मानव समााज । ...
कृतिक संपदा से भरपूर भारत का तमिलनाडु राज्य अपने जादर्इ सौर्न्दर्य से सैलानियों को मुग्ध करने ...
सिनेमा को एक कमाउ उद्योग के रूप में लिया जाता है । सिनेमा की ...
टुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर ...
वहुत लम्बे समय के बाद नेपाल में संविधान सभा का चुनाव कराया गया है । ...
माउन्ट एवरेस्ट का उत्तरी भू-भाग चीन का है और यह मान्यता चीन सरकार की है ...
बिहार ने विकास दर का जादुर्इ अंकडा छू लिया । किसी को यकीन नहीं । ...
चीन विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश ...
हाँ चाह वहाँ राह' की कहावत को र्सार्थकता देते हुए बांके की कुछ महिलाओं ने ...
जीवन के अनेक रंग होते हैं लेकिन यह अपने आप में भी एक गाढा रंग ...
काठमाडौ, चैत्र ७ - काँग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइरालाको शनिबार दिउँसो देहवासन भएको छ । ...
कनाडा का वेन्क्युवर टोरेन्टो एवं मोनट्रेल के बाद तीसरा सबसे बडा शहर है । वेन्क्युवर ...
भारतीय फिल्म निर्माता प्रकाश झा की कहानी किसी भी फिल्म से कम नहीं है । ...
नुख्ता के हेरफेर से खुदा जुदा हो गया । अतः नुख्त निकालने, लगाने और प्रयोग ...

Archive for the ‘संपादकीय’ Category

सम्पादक की कलम से..

Posted by Himalini On July - 13 - 2010 2 COMMENTS

ramesनेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में संविधानसभा कीलम्बी आयु के लिए की जाने वाली निष्कर्षवहीन बैठक कीबातें सुनते-सुनते नेपाली जनता ऊब चुकी थी । ऐसीस्थिति में चारों ओर चर्चा एक ही थी कि सहमति नहीं हर्इतो ंविधानसभा का क्या होगा – सभी लोग अपने-अपनेटी.वी. से चिपके हुए तीन बडे दलों के द्वारा किए जानेवालेनिर्ण्र्ाकी प्रतीक्षा में थे । तीन दलों की आपसी तकरारऔर अदूरदर्शी राजनीतिक विचार धारा के ऊहापोह मेंसंविधानसभा के द्वारा बनाए जाना लिखित संविधान बननातो दूर स्वयं संविधानसभा दलों की खींचतान में मृत प्राय हो गई थी । अचानकज्येष्ठ १४ गते की मध्यरात्रि में सभासदों को याद आई कि यदि कामधेनु रूपी
संविधानसभा पुनर्जीवित नहीं हर्इ तो सभी सभासदों की जीविका कैसे चलेगी -अवाञ्छित धनराशि कहाँ से मिलेगी – सभासदों की इसी स्वार्थपूरक दूरदर्शी सोच केआधार पर कांग्रेस, एमाले एवं माओवादी पार्टियों के द्वारा हस्ताक्षरित तीन सूत्रीयमौखिक सहमति को राष्ट्रीय सहमति के आधार के रूप में लादी गई समीकरण कोज्येष्ठ १४ की मध्यरात्रि में लागू कर संविधानसभा को पुनर्जीवित तो करा दिया गयापर सहमति, तत्काल ही संकट ग्रस्त दिखाई देने लगी । बहुमतीय अंकगणित केखेल में अपनी साख खो चुकी मधेशवादी दलों के साथ अन्य छोटी-छोटी पार्टियाँसमावेशी राजनीति की प्रतिमर्ूर्ति बन कर रह गई । तीन दलों के द्वारा की गई तीनसूत्रीय सहमति मधेशवादी दलों को समुचित सम्बोधन नहीं कर सकी । फलतः
मधेशवादी दलों का आक्रोशपर्ूण्ा असंतोष र्सार्वजनिक होने लगा ।शंका-उपशंका के बीच संविधानसभा की कार्यावधि १ वर्षके लिए बढा देने से
नेपाल में र्सवत्र आसन्न संकट की स्थिति से नेपाली जनता थोडे समय के लिए हीसही चैन की साँस लेने लगी किन्तु संविधानसभा की कार्यावधि १ वर्षअधिक बढानेकी संवैधानिक स्वीकृति मिलने के कुछ ही घंटे बाद पुनः तीनो बडे दलों में तकरारहोने लगी, जो भावी संविधान निर्माण के लिए शुभ संकेत नहीं है । नेपाली जनता तोजानती है कि वर्तमान संविधानसभासदों की भेडिया धसान सदस्य संख्या अग्रिम १वर्षकी कालावधि में भी नयाँ संविधान बनाने वाली नहीं है । संविधानसभा, सदस्यों केलिए चाँदी है । इन सदस्यों या नेताओं को पता है कि हम संविधान बनाएँ या न बनाएँहमें हमारी जनता कुछ कहने या करने वाली नहीं है । कारण नेपाली जनता गौतमबुद्ध के अहिंसावादी उपदेशां े का अक्षरशः पालन करती आ रही है और भविष्य में भीकरती रहेगी । सभासदों और नेताओं का यह विचार शत-प्रतिशत सही है । नेताओं-सभासदों का विचार अनुभव पर आधारित है । अतः हे नेताओं-सभासदों † एक वर्षतक पुनः बिना संविधान बनाए, खाओ, पियो मौज करो ।

सहमति अपरिहार्य

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

Editor‘अति र्सवत्र वर्जयेत्’ इस सिद्धान्त के आधार पर नेपाल की सडक क्रान्ति से नेपाली जनता ऊब चुकी है । बन्द, हडताल के कारण रोग, भूख, शोक और अशिक्षा से आक्रान्त हो किर्ंकर्तव्य विमूढ हो चुकी है । आए दिन बन्द, हडÞताल शब्द सुनते-सुनते जनता यह सोचने को बाध्य हो गई है कि नेपाल बन्द क्यों, किसलिए और कितने दिन – क्या माओवादी नेतृत्व बालुवाटार के डेढ लाख मूल्य वाले पलंग पर न सो पाने के लिए बन्द अथवा प्रधानमंत्री की चकाचांैध करने वाली बहुमूल्य गाडी पर बैठकर काठमांडूबासी -सुकिला मुकिला) जनता की नगरी में सैर करने की महत्वाकांक्षा के लिए बन्द – क्या सडÞक आन्दोलन के नाम पर निरीह अशिक्षित एवं प्रताडित जनता को दिवास्वप्न दिखाने के लिए बन्द – किसी भी चीज की हद होती है । बन्द हडताल की श्रृंखला की कडÞी के रूप में मई दिवस के अवसर पर गाँव-गाँव से पशुओं के समान लोगों को गाडिÞयों में कोंच-कोंच कर लाए अशिक्षित जनों की भीड को यदि जनआन्दोलन-३ की संज्ञा दी जाती है तो जनआन्दोलन की परिभाषा समझ में आना कठिन है । सत्ता प्राप्ति के लिए गिद्ध-दृष्टि से जनआन्दोलन समय-समय पर करते रहना कहाँ तक न्यायोचित है –
संविधानसभा निर्वाचन पश्चात सबसे बडी पार्टी रूप में स्थापित माओवादी जनता में एक विशेष प्रकार की आकांक्षा पूरी होने की भावना बलवती हर्इ थी, पर नौ महीने तक एमाओवादी पार्टी सत्तासीन रहते हुए भी नेपाली जनता किसी विशेष प्रकार के परिवर्तन की अनुभूति नहीं कर पायी । हाँ संविधान सभा निर्वाचन के वाद समय-समय पर पार्टर् प्रमुख की हैसियत से पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने जो-जो निर्ण्र्लिया है, चाहे वह सेनापति प्रकरण हो, पशुपतिनाथ मंदिर में भट्ट पुजारी परिवर्तन प्रकरण हो, राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन प्रकरण हो, नागरिक सर्वोच्चता स्थापित करने के प्रकरण के साथ-साथ ‘कठपुतली’ सरकार हटाने के लिए किया गया अनिश्चितकालीन आम हडÞताल -१-६ मई तक) सब असफलता के द्योतक हैं । उक्त सभी प्रकरण में मिली असफलताओं के बाद माओवादी अध्यक्ष तथा पार्टर् अन्य नेताओं के द्वारा भारत की ओर इशारा करके गाली देना आमबात हो गई थी, इससे माओवादियों का हताशा का परिचय मिलता है । इसका ज्वलन्त प्रमाण तब देखने को मिलता है जब सम्पर्ूण्ा देश में सभ्य नागरिक समाज द्वारा आन्दोलन वापस लेने के लिए दबाबमूलक शान्ति सभा का आयोजन जगह-जगह पर होने लगा, तब देश के कई जिलों में तो वाईसीएल द्वारा डर, त्रास वा आतंक दिखाकर शांति सभा स्थगित करा दिया गया पर राजधानी काठमांडू में शांति सभा विभिन्न व्यवधानों के बावजूद वसन्तपुर में सम्पन्न हर्इ, जिसमें स्वतस्फर्ूत जनसागर उमड पडा जिसे देखकर माओवादी पार्टी न्दोलन तो वापस लिया, पर इसके एवज में अध्यक्ष प्रचण्ड ने काठमांडू की शांति सभा में उपस्थित जनसागर को ‘सुकिला-मुकिला’ कह कर गाली दी और बाद में क्षमा भी माँगी । त्रास दिखाया तो उनकी ही पार्टी नेता शांति सभा में उमडÞी भीड को ‘भिजिलान्ते’ -घूसपैठिया) की संज्ञा दिया, जो संविधान निर्माण एवं शांति प्रक्रिया को अनदेखा करनेवाले माओवादी नेताओं की छटपटाहट का प्रतीक है ।
देखा जाय तो समय-समय में जनआन्दोलन के नाम पर दुःखी गरीब और लाचार जनता को ही ढाल बना कर माओवादी ने ही दुःख दिया है । संविधान निर्माण और शांति प्रक्रिया के नाम पर सडÞक आन्दोलन कर आम नेपाली पर र्सवसत्तावाद लादने की बात कहना संसदवादी दलों का निराधार तर्क नहीं है । र्सवसत्तावाद थोपने की आन्तरिक भावना, एकतंत्रीय शासन जबर्दस्ती स्थापित करने की महत्वाकांक्षा आदि को छोडÞकर यदि एमाओवादी पार्टीीहमति और सहकार्य करते हुए आगे बढे तो निश्चय ही नेपाल और नेपाली जनता की भलाई हो सकती है, अन्यथा नेपाल विभिन्न राष्ट्र की कूटनैतिक क्रीडास्थली बनकर रह जाएगी इसमे कोई शंका नहीं ।

राजनीतिक क्षितिज में रिक्तता

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

Editorनेपाली राजनीति में लगभग साढे छह दशक तक कोईराला अविश्रान्त कर्म योद्धा बनकर नेपाल की राजनीति को गतिमान बनाते रहे । उनके क्रियाशील राजनीतिक जीवन सामान्य नहीं था । उनकी राजनीतिक जीवन यात्रा विभिन्न उतार-चढाव से युक्त होने के साथ-साथ अनेक साहसपर्ण् एवं रोमाञ्चक घटनाओं से पर्ण्थी । नेपाली राजनीति के महानायक गिरिजा प्रसाद कोईराला र्सवगुणसम्पन्न महामानव थे, ऐसा कहना अतिरंजित होगा, किन्तु नेपाल के कुछ वर्षों के राजनीतिक परिदृश्य में जी.पी. कोईराला अन्य नेताओं की तुलना में कुछ अवश्य थे, जिस कारण उनका स्वाभाविक देहावसान सभी के लिए चर्चा का विषय बन गया और राजनीतिक क्षितिज रिक्तता का बोध करने लगा । चारो ओर कहा जाने लगा कि अब क्या होगा – समग्र परिवर्तन प्रक्रिया के खिलाफ चरम उग्रवादियों की शुगबुगाहट शिर उठाने लगी । इस से स्पष्ट होता है कि कोईराला की उपस्थिति वर्तमान राजनीतिक पर्रि्रेक्ष्य में कितनी अपरिहार्य थी ।
नेपाल के वर्तमान राजनीति के महानायक गिरिजाप्रसाद की मृत्यु से राष्ट्र ने राजनीतिक क्षितिज का महारथी, और शिखर पुरुष को खो दिया है । जिसे प्रत्येक शांतिप्रिय नेपाली को आत्मिक पीडा हर्इ है । कारण नेपाल के लोकतांत्रिक यात्रा के वे जीवन्त दस्तावेज थे । वे एक ऐसे राजनेता या व्यक्तित्व बन गए थे जिसका प्रभाव देशवासी पर ही नही अन्तर्रर्रीय स्तर पर भी पडÞता था । वे अपने आप में एक संस्था थे । नेपाल देश को वर्तमान मुकाम तक पहुँचाने तथा शांति प्रक्रिया को तात्विक निष्कर्षतक पहुँचाने के लिए कोईराला अपने जीवन की अंतिम साँस तक सक्रिय रहे ।
साढे छ दशक के लम्बे समय तक राजनीतिक सक्रियता दिखाने बाले स्व. जी.पी. कोईराला -२००७ साल से लेकर २०६६ चैत्र ७ गते तक) राजनीतिक जीवन और लोकतांत्रिक मुद्दे में कभी भी सम्झौता न करने वाले नेता के रूप में अपने आपको उपस्थापित करने में सफल रहे । वे अपनी इसी विशेषता के आधार पर जो काम शुरु करते थे उसको पूरा करके ही छोडते थे । उनकी इसी प्रकार की दृढ निश्चयी भावना का ज्वलन्त उदाहरण माओवादियों को मूल धार में लाने के प्रसंग को लिया जा सकता है । जब रोल्पा के होलेरी मे आतंकवादी माओवादी विरुद्ध सेना परिचालन करने की सिलसिले में जब वे असफल रहे और इसी प्रसंग के क्रम में जब प्रधानमंत्री पद का परित्याग करना पडा, तत्पश्चात ही उन्हें लगने लगा कि माओवादी को मूल धार में समावेश न कराकर नेपाल और नेपाली जनता पर आयी समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है और ऐसा न करने से नेपाली भूमि अपनी ही सन्तति की रक्त से रक्त-रंजित हो जाएगी । देश विखण्डन की ओर फँसता जाएगा । इसी सोच के कारण वे माओवादी को बहुदलीय शांतिपर्ूण्ा राजनीति में लाने का प्रण किया और अन्ततोगत्वा वे माओवादियों को राष्ट्रीय राजनीतिक मूल प्रवाह में सरीक कराया । यह कार्य गिरिजा कोईराला के जीवन का सबसे सफलतम प्रयास था । फलस्वरूप गिरिजाप्रसाद को नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने बाले व्यक्ति की श्रेणी में खडा करने का प्रयास भी किया जाने लगा था । जूट मिल आन्दोलन, राजतन्त्र की समाप्ति के लिए हुए आन्दोलन का नेतृत्व करने का विचार भी उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता और उच्च दृढÞ संकल्प को ही दर्शाता है ।
गिरिजा प्रसाद कोईराला लोकतंत्र प्रति निष्ठावान संर्घष्ाशील और दृढ संकल्पित व्यक्ति अवश्य थे, इस में किसी को दो मत नहीं, पर कोइराला का मानवीय जीवन कमजोरियों से अलग था ऐसा कहना अल्पज्ञता होगी । उनकी मानवीय त्रूटियाँ अनेक प्रसंगों में देखी जा सकती है । वे हमेशा केन्द्रीकृत कार्यशैली के पक्षपाती थे, परिणामतः वे ने.कां. पार्टर् भीतर लोकतान्त्रिक दृष्टि से कमजोर बनते गए । एक समय ऐसा भी आया कि जब अधिकांश सहयोगी उनसे अलग थलग हो गए । और ने.कांं. पार्टर् भागों में विभक्त हो गई । वे पार्टर्फूट से नहीं बचा पाए । संविधानसभा में इसी कार्य शैली के कारण ने.कां. पार्टर्ीीो प्रथम स्थान में रहती थी वही दूसरे स्थान में सिमट गई । उनका आर्थिक घोटालो में फँसना पार्टर् आन्तरिक लोकतांत्रिक अभ्यास को प्रोत्साहन न करना, विभिन्न समय में पुत्री मोह में फँसकर धृतराष्ट्र बनना आदि बातें उनकी मानवीय कमजोरियों को उजागर करती हंै ।
कोइराला की अगुवाई में नेपाल में गणतन्त्र तो आगया, पर गणतांत्रिक नेपाल का मुख्य प्रतिफल संविधान निर्माण और शांति प्रक्रिया का अभियान का इति श्री होना वे नही देख पाए । उनके देहावसान से गणतन्त्र को संस्थागत करने तथा संविधान निर्माण की प्रक्रिया चुनौतीपर्ण् हो गई है ।
कोईराला की मृत्यु के बाद धर्म निरपेक्षता का सबाल भी शिर उठाने लगा है । भूतपर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र की सक्रियता भी बढÞ गई है । अधिकांश जनता नेपाल को हिन्दूराष्ट्र रहने देने के बजाय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने वाले प्रसंग को अनुचित और अदूरदर्शी मान रही है । जनता कह रही है कि धर्मनिरपेक्षता कभी भी जनता की माँग नहीं थी । धर्मनिरपेक्षता स्व. गिरिजा प्र कोईराला, कामरेड प्रचण्ड तथा माधव नेपाल तीनों नेता विदेशी ताकत के तहत झुककर अदूरदर्शी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हम पर थोप दिया हैं, थोपी हर्इ धर्मनिर्पेक्षता को हटाना अपरिहार्य है । इसे न हटाना अल्पसंख्यक की भावना को बहुसंख्यक जनता की भावना पर थोपी गई सोची समझी विदेशी राजनीति है । अतः धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर जनमत संग्रह होना चाहिए ऐसी धारणा ८० प्रतिशत जनता की है । आम जनता का कहना है कि हमें निरंकुश राजा नहीं चाहिए पर हमें हिन्दू राष्ट्र चाहिए । हिन्दू राष्ट्र होने पर किसको हानि थी । हाँ  एक वर्ग को आपत्ति थी, वह वर्ग है क्रिश्चियनीटी का प्रचार-प्रसार करने वाला वर्ग । इस वर्ग के द्वारा गरीब, लाचार, नेपाली को धर्मान्तरण किया जा रहा है । इस कार्य को आगे बढÞाने का काम नेपाल में क्रियाशील करीब १५ प्रतिशत गैरसरकारी संघ-संस्था -आई.एन.जी.ओ) कर रही है । जो विशेष चिन्ता का विषय है ।
संविधान निर्माण और शांति प्रक्रिया को निष्कर्षमें पहुँचाने के लिए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय सहमति कायम हों और एक राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठित हों जिसमें सभी दलों को शामिल किया जाय । इस विषय पर व्यापक चर्चा चल रही है ।

आतंक के साये में नेपाल

Posted by Himalini On March - 20 - 2010 ADD COMMENTS

sampadaजनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों से उपदेशित हो विश्व को शान्ति का मार्ग दिखाने वाला देश नेपाल आज स्वयं चतर्र्दिक समस्याओं से आक्रान्त होकर अशान्त, अभाव-ग्रस्त एवं हिंसावादी जैसा हो गया है । यहाँ की जनता अन्याय, अभाव, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और आतंक का शिकार हो छटपटा रही है । अदूरदर्शी राजनीति, क्षेत्रवाद, जातीय समीकरण और आतंकवाद आदि ने नेपाल की राष्ट्रीय एकता की भावना में दरार पैदा कर दिया है । आम जनता सब प्रकार से त्राहिमाम कर रही है । आज के सर्ंदर्भ में नेपाल में सरकार एवं कानून नाम की कोई चीज नहीं है । ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा’ जैसी कहावत अक्षरशः फलीभूत हो रही है । इसी कारण नेपाल में विधिशून्य दण्डहीनता का साम्राज्यं हो चुका है । फलतः आतंकी और आतंकवाद की जडें मजबूत हो गई हैं और सुरसा राक्षसी की भाँति मुँह फैलाए वह व्यापारी, कर्मचारी, पत्रकार तथा र्सवसाधारण को एक-एक करके निगलते जा रहा है । उमा सिंह, संचारकर्मी जमीम शाह एवं अरुण सिंघानिया आदि । आंतकवाद नेपाली जनता की नियति बन गई है ।
आतंक का अर्थ- डर, भय एवं पीडा तथा वाद यानी सिद्धान्त अर्थार्त आतंकवाद के माध्यम से जनमानस के मन में भय-पीडा जन्य जहर अन्तरात्मा में भरने का सिद्धान्त । आतंकवाद का विष पूरे विश्व में फैला हुआ है -श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इराक, भारत, अमेरिका और इंग्लैण्ड आदि देश आतंकवादी त्रासदी का दुःख झेलते आ रहे हैं । भला नेपाल कैसे इस छूत रोग से अछूता रह सकता है । पशुपतिनाथ और गौतम बुद्ध के शन्तिपर्ण् देश में आतंकी कालकूट को फैलाने का काम कमोवेश राजा एवं समय-समय पर गठित सब सरकारों ने किया हैं । पैरामीटर भले ही सभी सरकारों का अलग-अलग हो पर विष वमन करने का काम सबने किया है । कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इस कार्य को आगे बढाने में वर्तमान सरकार भी किसी से पीछे नहीं रही है । सत्तासीन सरकार की अक्षमता ने व्यापक भ्रष्टाचारिता और दण्डहीनता की सीमा को और व्यापक बना दिया है । ऐसी स्थिति में कौन, कहाँ, कब और कैसे विधिशून्य दण्डहीनता का शिकार होगा – इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा – कारण सत्तासीन लाचार सरकार सम्वेदना और श्रद्धाञ्जली अर्पण करने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है – जनकपुर टूडे के अध्यक्ष एवं संचारकर्मी अरुण सिंघानिया के साथ लाल गुलाल से होली खेलने के बदले गोली मारकर होली खेली गयी और अपराधी अपने मनसूबे को साकार करने में सफल रहे । संचारकर्मी सिंघानिया की हत्या से सारा जनकपुर स्तब्ध है । यह हत्या अकेली सिंघानिया की हत्या नहीं है सम्पर्ण् संचार जगत की हत्या है । हत्या अपहरण, लूटमार जैसे अपराध के आगे सरकार की विवशता क्यों है – जनता को आधारभूत सुरक्षा कौन देगा – सरकार कुम्भकर्णर् न्रि्रा में क्यो सोई है – सुरक्षा से सम्बन्धित एजेंसियां भी तेल डालकर सोई रही तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाले दिनों में और भी भयंकर खौफनाक आतंकी आक्रमणों का शिकार होना पडेगा और इसके साये में नेपाली भूमि देशी विदेशी कुख्यात ड्रग्स ग्रूप और नकली नोटों के कारोबार करने वाले गिरोहों का अड्डा बनकर रह जाएगी । नेपाल-भारत के बीच खुली सीमा, संक्रमण की दौर से गुजरने वाली सरकार की अकर्मण्यता, सुरक्षा एजेंसिंयों की लापरवाही तथा साधन सम्पन्न गुप्तचर संस्था के अभाव के कारण सारे नेपाल में कुख्यात सरगनाओं, नकली नोट के कारोबारियों और ड्रगिस्टों का साम्राज्य है ऐसा कहना असंगत न होगा । जिसके दुष्परिणामों का शिकार नेपाली जनता हो रही है । नेपाली भूमि में जो देशी-विदेशी लोग आतंकी खेल खेल रहे हैं, इससे किसी का भी अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा । नेपाली भूमि पर पाकिस्तान से प्रेरित हो जितने भी आतंकी ग्रूप आतंक मचाकर आतंकवाद को धीरे-धीरे पूरी दुनिया पर हावी बना रहे हैं, यही सच है । अतः हमें और हमारी सरकार को कूटनैतिक स्तर पर विदेशी आतंकियों एवं आपराधिक गुटों के गतिविधिओं को सफाया करने की भूमिका का र्निवहन मुस्तैदी से करना चाहिए । इसी में नेपाल और नेपाली जनता की भलाई है । तभी नीचे लिखे इस सूक्ति के मर्म को लोग अपने अपने जीवन में स्थान दे पाएंगे
‘-र्सर्वे भवन्तु सुखिनः र्सर्वे सन्तु निरामया ।
र्सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत् ।’

“संयंत्र उपयोगी है”

Posted by admin On March - 14 - 2010 ADD COMMENTS

forum
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री शत्रुघ्न प्रसाद सिंह उच्च स्तरीय राजनीतिक संयंत्र के गठन के संबंध में कहते हैं कि आज देश जटिल परिस्थिति से गुजर रहा है सभी दल आपस मंे लडÞ रहे हैं । विशेष कर माओवादी व्रिmया कलापों के कारण देश की ऐसी स्थिति होती जा रही है । इस स्थिति का अन्त करने हेतु संयन्त्र का गठन जरुरी था । आगे शत्रुघ्न प्र. सिंह का कहना था कि इस संयन्त्र में मधेशवादी दलों को शामिल न करने से शंका उत्पन्न हो रही है कि शायद यह संयन्त्र मधेशियों के अधिकार एवं उनकी माँगो को दबाने के लिए ही गठित किया गया है । यह एक षडयंत्र है । साथ हीं उनका यह भी कहना था कि मधेशियों को दबाने का प्रयास किया गया या उनके हक-अधिकारों के प्राप्ति के मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न की गयी तो उसका परिणाम उचित नहीं होगा ।

संयन्त्र षडयंत्र है -

Posted by admin On March - 14 - 2010 ADD COMMENTS

-वीणा सिन्हा
उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र की कार्यप्रणाली, उद्देश्य एवं आचार-सीमाओं का निर्धारण होने के बावजूद उसको लेकर राजनीतिक गलियारे में शंका-उपशंकाओं का जो दौर गठन के साथ ही चल पड滐 था 窺ने का नाम नहीं ले रहा । वैसे जब पुस २ गते को महाराजगंज स्थित कोईराला निवास में कंाग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोईराला, एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल तथा एकीकृत माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल प्रचण्डरुने मिलकर उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र का गठन किया तभी से यह संयंत्र विवाद का विषय बना हुआ है । इस संयंत्र की वैधानिकता, प्रभावकारिता एवं उपयोगिता पर विभिन्न दलों द्वारा प्रश्न उठाये जाने लगें । यहाँ तक कि प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल भी इस संयन्त्र को लेकर काफी सशंकित थे । उन्हें तथा उनके सहयोगियों को यह संयन्त्र प्रचण्ड द्वारा सत्ता प्राप्ति के लिए एक बहुत बडा षडयंत्र दिखलाई पड रहा था । उनलोगो को अशंका थी कि इसके माध्यम से एक सामानान्तर सरकार का गठन कर वर्त्तमान सरकार के ऊपर अंकुश लगाने का प्रचण्ड एवं खनाल की चाल है । इसी वजह से प्रधानमंत्री को भी इस संयन्त्र में शामिल करने के लिए दबाव डालने का एक तरह से अभियान चल पडÞा । वैसे संयन्त्र के संयोजक गिरिजा प्रसाद कोईराला को इस संयन्त्र में प्रधानमंत्री को शामिल कराने में कोई आपति नहीं थी लेकिन प्रचण्ड के तीव्र विरोध के कारण आरम्भ में यह संभव नहीं हो सका । परन्तु सत्तारूढ दलांे द्वारा लगातार बयानबाजियों तथा संयन्त्र के प्रति शंका उपशंका जाहिर करने के कारण अततः प्रचण्ड को इस मामले में झुकना पडÞा तथा प्रधानमंत्री को शामिल करने हेतु निर्णयपर सहमत होना पडा ।
prachandagiriza
नेपाल इस समय एक गंभीर एवं जटिल राजनीतिक संक्रंमण प्रक्रिया से गुजर रहा है । संविधान निर्माण प्रक्रिया शिथिल पडÞी हर्ुइ है । दलों के बीच बढती जा रही अविश्वास, असमझदारी तथा वैमनश्यता अपने चरम शिखर पर पहुँचता जा रहा है । स्पष्ट है दलों द्वारा “अपनी डफली अपना राग” अलापने से न तो देश में शांति प्रक्रिया को उसके तार्किक लक्ष्य तक पहुँचाया जा सकता है और न ही जनता द्वारा दी गयी संविधान निर्माण की ऐतिहासिक जिम्मेदारी ही पर्ूण्ा हो सकेगी । व्यवस्थापिका संसद के बडÞंे दल शायद यह भूल गये हंै कि जनता ने उन्हें स्पष्ट बहुमत प्रदान करके संविधान लिखने हेतु नहीं भेजा है । अतः उन्हें यह समझना होगा कि आपसी सहमति, तथा आपसी तालमेल के बिना संविधान निर्माण जैसी जटिल एवं दुरूह कार्य संभव ही नहीं है । आज देश में सबसे ज्यादा जरूरत दलों के बीच विश्वास एवं सहमति तथा आपसी समझदारी की है । जब संविधान सभा का चुनाव में जीत कर ये दल संसद में पहुँचे थे तो आज की तुलन्ाा में स्थिति काफी भिन्न थी । दलों के बीच इतनी कटुता एवं अविश्वास के भाव नहीं थे तभी तो वे आसानी से बिना रक्त के एक बूंद बहाये सदियों से चले आ रहें राजतंत्र को गणतंत्र में बदल कर विश्व को चकित कर दिया । अगर यहीं समझदारी विश्वास और सहमति का वातावरण आगें भी कायम रखने में हमारे राजनेता सफल रहते तो और जनता द्वारा दी गयी संविधान-निर्माण की अहम जिम्मेदारी आसानी से निर्वाह कर अपना नाम स्वर्ण्ााक्षरों में अंकित करवा देते । लेकिन इसे देश का दर्ुभाग्य ही कहा जा सकता हैं कि इन दलों द्वारा आये दिन जो अभिव्यक्तियँा दी जाती रही है वह किसी भी दृष्टि से न तो जनहित में कहा जा सकता है और न ही देश हित में । उनका एक मात्र उद्देश्य सत्ता प्राप्ति का हथकंडा कहना गलत नही होगा । ऐसी स्थिति अगर आगे भी जारी रही तो, संविधान निर्माण का सपना, दिवास्वप्न बनकर रह जायेगा ।
अतः यह जरुी है कि उच्चस्तरीय राजनीतिक संयन्त्र सबसे पहले देश में सहमति का शासन एवं सहमति के राजनीति की स्थापना करने में सहयोग दंे । ताकि देश की गति को सही दिशा मिल सके और अवरु देश की विकास की गाड溱 सही दिशा में अपने गन्तब्य की ओर चल सकें ताकि संविधान निर्माण का पवित्र लक्ष्य प्राप्त हो सकें ।
आज जो हालात बने हुए है उसमें अगर किसी तरह संविधान-निर्माण हो भी गया, लेकिन अगर उसमंे सभी छोटें-बडेरु दलों को विश्वास में लेकर सहभगिता के दलों द्वारा “अपनी डफली अपना राग” अलापने से न तो देश में शांति प्रक्रिया को उसके तार्किक लक्ष्य तक पहुँचाया जा सकता है और न ही जनता द्वारा दी गयी संविधान निर्माण की ऐतिहासिक जिम्मेदारी ही पर्ूण्ा हो सकेगी ।
साथ सहकार्य नहीं होगा तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अपने निर्माण के दूसरे दिन उससे असंतुष्ट किसी दल के सदस्यों द्वारा उसे भद्रकाली या मंडेला में अग्नि की भेंट चढा दी जायें ।
राजनीतिक सूत्रों का कहना हैं कि इस संयन्त्र के गठन के माध्यम सेे दहाल कोईराला के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाना चाहते हंै या कोईराला अपने स्वार्थ का बन्दूक दहाल के कंधे पर रख कर अपनी इच्छापर्ूर्ति करना चाहते हंै यह कहा नहीं जा सकता । हाल मंे प्रचण्ड 嶢रा गिरजा प्रसाद कोईराला को सरकार का नेतृत्व करने का आग्रह तथा कांग्रेस संसदीय दल के बैठक में विचार-विमर्श के दौरान सरकार प्रति असंतुटि सदस्यों 嶢रा व्यक्त किया जाना एवं उपप्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री सुजाता कोईराला 嶢रा अपने बयान में सरकार परिर्वतन का संकेत देना यह स्पष्ट दर्शाता है कि संयन्त्र किसी षडंयन्त्र के तहत गठित हुआ है, और इससे इन्कार नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार संयन्त्र के एक और सदस्य खनाल के प्रति यह शंका व्यक्त की जा रही है कि खनाल अपनी पार्टर्ीीे भीतर काफी आक्रांत है और इस संयन्त्र के माध्यम से अपनी ही पार्टर्ीीे अन्दर के विपक्षियों का ठिकाना लगाकर अनुकूल परिस्थिति सृजन कर प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा करना चाहते हैं ।
इन्हीं आशंकाआंे एवं अटकलबाजियों के बीच उच्च स्तरीय राजनीतिक संयंत्र का गठन भी हो गया और माघ ८ गते को नेपाली काँग्रेस के सभापति एवं संयन्त्र के संयोजक गिरिजा प्रसाद कोईराला तथा दोनांे सदस्यांे प्रचण्ड एवं खनाल के बीच हुए बैठक में संयन्त्र के उद्देश्य, कार्यविधि तथा आचार संहिता पारित हर्ुइ ।
संयन्त्र के उद्देश्ये मंे शांति प्रक्रिया को अंतिम निष्र्कष में पहुँचाने एवं निश्चित समय-सीमा के अन्दर संविधान-निर्माण करने और इस क्रम में उत्पन्न होने वाली जटिलताओं, बाधाओं तथा वर्त्तमान राजनीतिक गतिरोध को दूर करने हेतु साझा प्रयत्न करने का भी निर्ण्र्ााकिया गया ।
इसी प्रकार संयन्त्र की कार्य विधि में वर्त्तमान राजनीतिक गतिरोध का अन्त कर दलों के बीच सहमति कायम करने, शांति-प्रक्रिया तथा संविधान निर्माण के साथ-साथ आवश्यक विषयांे के लिए अलग-अलग उपसमितियांे का गठन, लापाता लोगों की स्थिति छानबीन कर र्सार्वजनिक करने, कब्जा किये गये लोगों के घर-जमीन को वापस कराने के लिए भी उपसमिति का गठन करने का निर्णर्य किया गया ।
प्रधानमंत्री को संयन्त्र के बैठक में आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल करने का निर्ण्र्ााभी किया गया और इसके साथ ही इस संयन्त्र में अन्य दलांे की सहभागिता सुनिश्चित कराने का निर्ण्र्ााअगली संयन्त्र की बैठक में कराने का निश्चय भी किया गया ।
संयन्त्र ने अपनी आचार संहिता भी पारित किया । आचार-संहिता के अर्न्तर्गत यह निर्ण्र्ााकिया गया है कि सभी दल एक-दूसरे के प्रति मार्यादित एवं संयमित व्यवहार करने पार्टर्ीीकार्यकत्ताओं 嶢रा किसी के ऊपर भौतिक आक्रमण न करने तथा इस प्रकार के गतिविधियों पर पर्ूण्ा磬 से नियंत्रण करने का प्रत्यन किया जायेगा । देर से ही सही बडं滘 दलों केे शर्ीष्ा नेताओं को यह बात समझ में तो आ गई कि देश में आज सबसे ज्यादा आवश्यकता जिस चीज की है वह हैं राष्ट俠य सहमति की और इसके लिए जरुी हैं कि एक-दूसरे पर विश्वास करना ।
बैठक में यह भी निर्ण्र्ााकिया गया कि सप्ताह में एक बार इस संयन्त्र की बैठक आयोजित की जायेगी ।
इस बैठक के पश्चात् संयंत्र के सदस्य एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल का कहना था कि 熯ब सहमति की राजनीति की शु盧ात तीन दल के माध्यम से हर्ुइ है, इसका दूरगामी तथा महत्वपर्ूण्ा प्रभाव पडे煪ा ।रु
बैठक में शामिल माओवादी उपाध्यक्ष नारायणकाजी श्रेष्ठ का कहना था कि अब देश मुठभेडÞ से सहमति के रास्ते की ओर चल पडÞा है ।
जबकि कांग्रेस प्रवक्ता अर्जुन केसी ने आशा व्यक्त की कि “संयन्त्र के प्रति जो अविश्वास की भावना थी अब उसका समाधान हो गया है ।”
संयन्त्र के प्रमुख सदस्य प्रचण्ड का कहना था कि उच्चस्तरीय राजनीतिक संयन्त्र देश में शांति प्रक्रिया तथा संविधान निर्माण की दिशा में गतिरोध दूर करने के लिए एक सकरात्मक पहल है । अब शांति प्रक्रिया तथा संविधान निर्माण में दिखने वाले काले बादल हट गये हैं ।
प्रचण्ड का दावा तत्काल एक शुभ संकेत के 磬 में नेपाली राजनीति में माना जा सकता है । इस बैठक के पश्चात् एकीकृत माओवादी 嶢रा अनिश्चितकालीन नेपाल बन्द वापस लेना तथा प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल को संयन्त्र मंे शामिल किया जाना इस उच्चस्तरीय राजनीतिक संयन्त्र की पहली उपलब्धि मानी जा सकती है ।
अब यह आशा की जा रही है कि इस्ा संयन्त्र में अन्य दलों को भी शामिल कर, देश में विद्यमान राजनीतिक गतिरोध का अन्त कर सहमति एवं विश्वास के वातावरण में शान्ति प्रक्रिया तथा संविधान र्निर्माण के कार्य की पूर्ण्ााहूति हो सकेगी । साथ ही
राजनीतिक संयन्त्र के औचित्य एवं उपयोगिता का भी सही मूल्यांकन हो सकेगा । इसके साथ ही एक नये नेपाल का सपना भी साकार हो सकेेगा ।
नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल को इस संयन्त्र में अन्य दलों के शर्ीष्ा नेताओं को भी शामिल करना चाहिए ताकि इस संयन्त्र के प्रति उनमें कोई सन्देह की भावना न रहे ।
उपप्रधनमंत्री सुजाता कोईराला के अनुसार उच्च स्तरीय संयन्त्र में प्रधानमंत्री के साथ उपप्रधानमंत्री को भी शामिल करना उचित होगा नहीं तो यह संयन्त्र प्रभावशाली नहीं हो पायेगा ।
तर्राई लोकतांत्रिक पार्टी प्रवक्ता र्सर्वेश्वर शुक्ल का कहना है कि संयन्त्र के छाता के अर्न्तर्गत इकट्ठे दलों का हृदय परिवर्त्तन हो जायेगा और गतिरोध का अन्त हो जायेगा उस पर उन्हें सन्देह है ।
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री बनें शत्रुधन प्रसाद सिंह उच्च स्तरीय राजनीतिक संयंत्र के गठन के संबध में कहते हैं कि आज देश जटिल परिस्थिति से गुजर रहा हैं सभी दल आपस मंे लडरहें हैं । विशेष कर माओवादी व्रिmया कलापों के कारण देश की ऐसी स्थिति होती जा रही है । इस स्थिति का अन्त करने हेतु संयन्त्र का गठन जरुरी था । आगे शत्रुधन प्र. सिंह का कहना था कि इस संयन्त्र में मधेशवादी दलों को शामिल न करने से शंका-उपशंका उत्पन्न हो रही हैं कि शायद यह संयन्त्र मधेशियों के अधिकार एवं उनकी माँगो को दबाने के लिए ही गठित किया गया है । यह एक षडयंत्र है । साथ हीं उनका यह भी कहना था कि मधेशियों को दबाने का प्रयास किया गया या उनके हक अधिकारों के प्राप्ति के मार्ग में कोई भी बाधा उत्पन्न किया गया तो उसका परिणाम उचित नहीं होगा ।
मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के सह अध्यक्ष तथा सभासद जयप्रकाश गुप्ता का संयन्त्र के गठन के सम्बध में कहना है कि आज देश संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है ऐसी स्थिति में राजनीतिक सहमति अत्यन्त जरुरी है । उनका यह भी कहना है कि देश की सभी समस्याओं का निराकरण सरकारी-औपचारिक निकायों से होना सम्भव नहीं हैं । इसके लिए इस प्रकार के षडंय्त्रों का गठन जरुरी है । जे. पी. गुप्ता का संयन्त्र के सफलता के सम्बंध में कहना है कि संयंत्र तब ही सफल हो सकता हैं जबकि उसके द्वारा संवैधानिक सभा के व्यवस्थाओं की उपेक्षा नही किया जाय । वह संविधान सभा के सहयोगी की भूमिका निर्वाह करें । संयन्त्र की उपयोगिता के संबध में जे. पी. गुप्ता ने कहा है कि आज की परिस्थिति में उसकी उपयोगिता है लेकिन अगर यह संयन्त्र दलों के बीच राजनीतिक समझदारी के साथ कार्य करेगी, तभी यह सफल हो सकेंगी ।
मधेशवादी दलों के शामिल न करने के संबध में जे. पी. गुप्ता का कहना था कि आपसी समझदारी की कमी पहाडवादी दलों में हैं । यह संयन्त्र उनके बीच सम्झादारी कायम करें, मधेशवादी दलों का उसमें शामिल होना जरुरी नहीं हैं । अगर मधेश के अधिकारों का इस संयन्त्र के माध्यम से हनन करने का प्रयास किया जायेगा तो उस समय मधेशवादी दल इस पर विचार करेगें ।

सम्पादक की कलम से …

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

DSC01982_r1_c1नेपाल और भारत के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और आद्या शक्ति माँ जानकी के वैवाहिक सम्बन्ध से स्थापित है । उसी समय से इन दोनों देशों के बीच अटूट रुप से उक्त सम्बन्ध अद्यावधि प्रगाढÞ होता आ रहा है । इस सम्बन्ध को प्रगाढ करने का काम केवल नेपाल और भारत के सीमान्त प्रदेशों में रहने वाली तर्राई वासी जनता ही नहीं अपितु इन दोनों देशों के राजा-महाराजा भी वैवाहिक सम्बन्ध परम्परा की कडी को मजबूत करते आ रहे हैं । इन दोनों देशों के बीच मात्र यही सम्बन्ध नहीं है । दोनों के बीच भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, भाषिक, सामरिक और आर्थिक सम्बन्ध भी अटूट हैं । इन्हीं सब कारणों से नेपाल-भारत के बीच बेटी-रोटी का रिश्ता है । जिसे तोड पाना किसी भी प्रतिवेदन के वश की बात नहीं है । फिर भी नेपाल में पंचायत काल से आज तक शासन करते आ रहे पर्वतीय मूल के अदूरदर्शी राजनेता लोग अपने संकरीण् विचारों के आधार पर इसे तोडने की कोशिश करते आ रहे हैं । उसी कोशिश को शख्त और अधिक बाधक बनाने के लिए संसद में संविधान सभा की मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धान्त समिति के द्वारा जो प्रतिवेदन लाया जा रहा है वह निश्चय ही मधेशी जनता को अधिकारहीन बनाने के साथ-साथ तर्राईवासियों का सम्बन्ध भारत के साथ अच्छा न रहे इसके लिए सोची समझी कूटनीति है । क्योंकि भारत के साथ तर्राईवासियों का सदियों पुराना सांस्कृतिक सम्बन्ध प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित होगा । ऐसा होने से भारत के प्रति तर्राईवासियों के मन में व्याप्त भावनात्मक निकटता खण्डित होगी । दोनों देशों के बीच विद्यमान सुसम्बन्ध स्थापित नहीं रह पाएगा, यह उक्ति पर्ण्तः चरितार्थ होगी कि, न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । लेकिन गोर्खाली शासकों को समझना होगा कि तर्राई की जनता भी २१ वीं सदी की जनता है । वहं की जनता भी जागरुक हो गई है और अधिकार प्राप्त करने की शक्ति को समझने लगी है ऐसी स्थिति में खस् शासकों द्वारा लाये गए नागरिकता प्रतिवेदन को भविष्य में पारित कराने की कोशिश की गयी तो परिणाम त्रासदीपर्ण् हो सकते हैं जिसके लिए मुख्य रुप से राज करते आ रहे खस् शासक ही जिम्मेबार समझे जाएंगे ।

कोई भी देश, समाज या रिश्ता तभी जीवित रहेगा, जब हमारी धरती सुरक्षित रहेगी । किन्तु पर्यावरण की सुरक्षा एवं जलवायु परिवर्तन से हो रहे दुष्परिणामों की चिंता न करते हुए अमीर एवं विकासशील देश साफ तौर पर दो भागों में बंट गए । और उनके औद्योगिक कारोबारी उद्देश्य अहम् बन गए ऐसी स्थिति में न हमारी धरती बचेगी और धरती के नहीं बचने पर देश, समाज, रिश्तों के बचने की कल्पना कैसे की जा सकती है । हाल ही में जलवायु परिवर्त्तन पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में सम्पन्न महासम्मेलन में जुटे १९२ देशों की बहस किसी गंभीर मसले पर न होकर अपने क्षुद्र राजनीति की झलक पेश करती है । महासम्मेलन में ग्रीन हाऊस गैंसों के उर्त्र्सजन में कटौती तथा जलवायु परिवर्त्तन से उत्पन्न होनेवाले खतरों से निपटने के लिए एक कारगर रणनीति बनने एवं उसपर र्सार्थक सामूहिक कार्यान्वयन होने की पूरी उम्मीद थी, परन्तु दर्ुभाग्वश ऐसा नहीं हो सका । इस ज्वलन्त मुद्दे पर नेपाल सरकार भी कम चिन्तित नहीं है, इसी चिन्ता को दुनिया के सामने लाने के लिए नेपाल सरकार ने सर्वोच्च सगरमाथा के आधार शिविर -काला पत्थर) पर पहुँचकर मन्त्रिपरिषद की ऐतिहासिक बैठक की । इस बैठक के माध्यम से नेपाल ने कोपेनहेगेन में होने वाले जलवायु परिवर्त्तन सम्बन्धी सम्मेलन का ध्यान अपनी ओर खींचा । साथ ही इस कालापत्थर बैठक ने विश्व का ध्यानाकर्षा किया है कि बडे-बडे औद्योगिक देशों के द्वारा किये जा रहे हरित गृह गैंस उर्त्र्सजन से होने वाले जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाली क्षेत्र भी दुष्प्रभावित हो रहा है । अतः यह नेपाल जैसे प्रभावित और निर्धन देश के प्रति भी औद्यागिक बडे देशों को जिम्मेवार बनने का संकेत देता है । प्रधानमंत्री माधवकुमार नेपाल ने विश्व स्तरीय कोपेनहेगेन सम्मेलन में हरित गृह गैस कटौती का जो महत्वाकांक्षा प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, अगर सम्मेलन सफल होता और माधवकुमार नेपाल द्वारा सुझाए गए प्रस्ताव को अमली जामा पहनाया गया होता तो जलवायु परिवर्त्तन के खतरों को कापी हद तक कम किया जा सकता था । प्रधानमंत्री अपने इस उद्देश्य को विश्व समुदाय के समक्ष रखने मे सफल रहे कि नेपाल जैसे छोटे देश को भी जलवायु परिवर्त्तन के दुष्परिणामस्वरुप उत्पन्न होने वाले भावी खतरों की विशेष चिन्ता है । खैर बहुचर्चित कोपेनहेगेन सम्मेलन तो सफल नहीं रहा, इसका मतलब यह नहीं कि विश्व के हम सभी नागरिक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें ।

सम्पादक की कलम से…….

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 5 COMMENTS

DSC01982_r1_c1गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना स्वाभाविक ही नहीं मानवीय अपेक्षा भी होती है । इसी गतिशीलता के क्रम में बारह वर्षों से निकलती आ रही हिमालिनी पत्रिका का स्वरुप साहित्यिक से राजनीतिक तक आ चुका है । नेपाल से निकलने वाली पत्रिकाओं में से यह हिमालिनी अपने लक्ष्य एवं अपनी पूणता की ओर बढ रही है ऐसा आकलन पाठकों का है । समय की प्रवाह की तरह व्यक्ति का आना जाना तो लगा ही रहता है परन्तु जिस लक्ष्य को केन्द्रित कर हम चले हैं उस राह में आने वाली तमाम बाधाओं को पार करते हुए हमें अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचना है । ऐसे में हम सुधि पाठकों से उत्तरोत्तर सहयोग की अपेक्षा रखते हैं ।
दुनिया भर में सुख-शांति, समृद्धि और पर्वतीय सुषमा के लिए जग-प्रसिद्ध पहाड का देश नेपाल वर्तमान में चतुदिक समस्याओं और उलझनों में उलझकर रह गया है । राजसत्ता की समाप्ति के उपरान्त गणतन्त्र को स्थापित हुए करीब दो वर्षहो गए परन्तु नेपाल में गणतन्त्र की अवधारणा अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है । अगर इसे यूँ कहा जाय कि नेपाल में अभी गणतन्त्र की चिरप्रतीक्षित नई पौध उगी ही नहीं है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
परिवर्तन के संकेत के रुप में ही नेपाल के राजनैतिक इतिहास में नेपाली कांग्रेस पाटी के महासमिति की बैठक को लिया जा सकता है । नेपाली राजनीति के इतिहास में नेपाली कांग्रेस सबसे पुरानी पाटी है जो समय-समय पर अनेक बार नेपाल में सरकार का नेतृत्व किया है । अभी भी वर्तमान सत्ता समीकरण में सहभागी है । नेपाल में नेपाली कांग्रेस पाटी हमेशा से व्यक्तिवादी नेताओं से चलने वाली पाटी है । इसलिए उनकी इच्छानुसार बैठक बुलायी जाती है । विगत कुछ वर्षों में तो नेपाली कांग्रेस पाटी एक व्यक्ति कर् इर्दगिद घूमने लगी । परिणाम स्वरुप ने.कां. पाटी बनाम कोइराला और कोइराला बनाम ने.कां पाटी समझी जाने लगी । इसकी पुष्टि ने कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा महासमिति बैठक न बुलाने के पक्ष से होती है । उन्होंने पाटी को महासमिति बैठक न बुलाने को निर्देश भी दिया । पर समयचक्र ऐसा घूमा कि उनके मना करने पर भी महासमिति की बैठक बुलाई गई । इस बैठक को बुलाने से अन्ततोगत्वा यह जगजाहिर हो गया है कि गिरिजा बाबू की पाटी पर पकडÞ ढीली पडÞती जा रही है । या यों कहें कि पाटी में वे कमजोर पडÞ गये हैं, गलत नहीं होगा । अब लगता है कि ने.कां पाटी की कमान युवाओं के हाथ में जानी चाहिए तभी ने.कां. पाटी की स्थिति सुधरेगी ।
समयचक्र के परिणाम स्वरुप ही आज तर्राई में मधेशी पार्टियो का उदय हुआ है ऐसा कहना कोई गलत नही होगा । मधेश आन्दोलन के पश्चात् ही मधेशी जनता अपना हक और अधिकार लेने के लिए अग्रसर हर्ुइ, जो मधेशियों के लिए शुभ संकेत है । इस प्रसग में मुझे हिन्दी के कवि दिनकर की यह पंक्ति याद आती है जिसमें व्यक्ति को अधिकार लेने के लिए कहा गया है – “अधिकार खोकर बैठ रहना यह महादुष्कर्म है, न्यायार्थ अपने बान्धवों को दण्ड देना धर्म है ।”
मधेशी जनता जो अपने अधिकार लेने के लिए आगे तो बढ है पर दुःख की बात तो यह है कि मधेशी जनता अपना नेतृत्व जिन-जिन पाटी के नेताओं को दी वे नेता लोग सत्ता स्वार्थ के कारण तर्राई आन्दोलन की आवाज को दरकिनार कर सत्ता के र्इदगिर्द घूम रहे हैं, वह बहुत बडी चिन्ता का विषय है । मधेशी पार्टिया और इनके स्वनामधन्य नेतागण समय रहते सचेत नहीं हुए और मधेशी जनआन्दोलन के लक्ष्य को आत्मसात नहीं किए तो वह दिन दूर नहीं जब जनता दुत्कार कर खाली हाथ उन्हें लौटा देगी तब नेताओं को हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं मिलेगा । अतः आवश्यकता है सभी पार्टियो और नेताओं को आपसी मतभेद भुलाकर मधेश जन-आकांक्षाओं एवं लक्ष्यों के प्रति एकजूट होकर सकारात्मक भूमिका का निर्वाह करें । मधेशी नेता लोग और मधेशी पार्टियाँ कुछ ऐसे रचनात्मक कार्य करें और भविष्य में तर्राई के हित में र्सार्थक कार्य करते रहें जिससे मधेशी जनता विश्वस्त हो सकें कि उनकी संवेदनाओं से खिलवाÞ नहीं हो रही है, तथा उनके लक्ष्यों को अनदेखा नहीं किया जा रहा है । राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता परस्पर बरकरार रहे ऐसा आभास होना चाहिए ।
समसामयिक विषयों पर आधारित आलेख प्रस्तुत अंक में दिया गया है जिसको पढÞकर पाठक वर्ग र्सार्थक प्रतिक्रिया एवं रचनात्मक सुझाव प्रेषित करेंगे जिसकी हमें प्रतीक्षा रहेगी । इसी आशा एवं विश्वास के साथ हिमालिनी का यह अंक आपके हाथों में…

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