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September , 2010
Wednesday
हम छोटे थे, शहर गली में गलियारें या किसी नुक्कड पर या हो सकता ...
विराटनगर/औद्योगिक नगरी विराटनगर में गत महीना मेची-कोशी पर्यटन वर्ष२०११ विभिन्न कार्यक्रम के साथ हर्षोल्लासपर्ूण्ा वातावरण ...
राजनीति’ में राजनीतिज्ञ बनी हैं। उनका ‍जो लुक है, उसे देखकर कहा जा रहा है ...
पाकिस्तान के बारे में आज सबसे बडा सच यह है कि "बोया बीज बबूल का तो आम ...
महीने तक पद पर काम करने से महरुम नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानन्द झा फिर ...
चीन विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश ...
भारत विरोध कब तक खों लोगों के बीच मंच सजा हुआ और उस पर आसीन ...
नेपाल में अन्तर्रर्रीय गिरोह के बढते शिकंजे एव व्यापारिक निवेश के चलते इन गिरोहों के ...
भारत सरकार के सहयोग से पर्वांचल के मोरंग स्थित नेमूवा में नवनिर्मित मनमोहन स्मृति पोलिटेक्निक का ...
''जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'' कैसी महान, पवित्र और अनन्य भावनाओं से भरा है भगवान राम ...
बच्चे के फेवरेट रंग सिर्फ उसकी पसंद या नापसंद नहीं होते, ये उसकी पर्सनैलिटी के ...
मान्यवर, युगों से सुप्रसिद्ध इस आध्यात्मिक प्रागैतिहासिक नगरी जनकपुरधाम में सम्पर्ण् मधेशवादी, मधेश प्रेमी नेपाली ...
अनिल झा सभासद, सदभावना पार्टी राज्य पर्नसंरचना एवं बाँड-फाँड समिति द्वारा राज्यों का मसौदा संविधान सभा ...
जनकपुरधाम-नेपाल का धार्मिक-सँास्कृतिक नगर आजकल विविध कारणों से चर्चा का केन्द्र बनता रहता है । ...
में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है ...
2066-04-09 साल में सर्वोच्च अदालत ने एक धमाकेदार फैसला सुना दिया - जिसके चलते सुलझती शांति ...
अफ़ग़ानिस्तान में जिरगा ने राष्ट्रपति हामिद करज़ई के तालेबान से शांति समझौते के प्रयासों का ...
जनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की ...
अमेरिका की तरफ से की गयी पहल और मंर्बई हमले के करीब १४ महीने बाद ...
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री शत्रुघ्न प्रसाद ...
काभ्रे जिला का पनौती-१२ वर्षपर लगा मकर मेला में स्नान-पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति ...
आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी की आखिरकार विदाई हो ही गयी. बीसीसीआई ने मोदी को आईपीएल ...
नेपाल की राजनीति आज कठिनतम दौर से गुजर रही है । नवसंविधान के निर्माण की ...
पाल की भावी शासकीय संरचना कैसी और किस प्रकार की हो - सभी भाषा-भाषी, जात-जाति ...
माउन्ट एवरेस्ट का उत्तरी भू-भाग चीन का है और यह मान्यता चीन सरकार की है ...
गांव है । गांव में मुखिया है । गांव में दुखिया है । गांव में ...
मधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया ...
पतिदिन राजनीतिक दलों की बैठक, धमकी, आग्रह और आन्दोलन से फिर नेपाली जनता परेशान हो रही ...
भारत एवं नेपाल में अध्यात्म का परचम लहराने वाले रामघाट अयोध्या -भारत) के महान संत ...
काठमांडू- राजधानी के त्रिपुरेश्वर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर हाँल में २४ दिसंबर को 'प्रस्तावित वीरगंज ...
येष्ठ १४ की मध्य रात्रि को महत्वपर्तीन दलों ने जो तीन सूत्रीय समझौताकिया, उसे नेपाली ...
स्कृत नेपाल की ही नहीं अपितु सम्पर्ूण्ा विश्व की क्रान्तिचेता संास्कृतिक भाषा है । विश्व ...
वियाना यूरोपीय देश अस्टि्रया की राजधानी है । यह राजधानी नगर अत्यंत रमणीय है । ...
नेपाल में सफेद कारोबार की आड में काला धंधा करने वाले बदनाम लोगों की जान ...

Archive for the ‘नेपाल’ Category

दिग्भ्रमित संविधान सभा::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On July - 13 - 2010 ADD COMMENTS

kumarयेष्ठ १४ की मध्य रात्रि को महत्वपर्तीन दलों ने जो तीन सूत्रीय समझौताकिया, उसे नेपाली राजनीति की अन्ध-यात्रामें शब्दों को साधना के रूप में लिया जासकता है- ‘शब्द-शब्द भयो उजियारो ।’ लेकिनशब्दा क इस तथाकथित उजाल की उम र महजकछु घण्ट ही रही क्यांक दसू रे दिन ही समझातै के सम्बन्ध में परस्पर विरोधाभासी बयान आनेलगे । इस समझौते के बावजूद राजनैतिकदलों के बीच परस्पर विश्वास का जोवातावरण पहले था, लगभग वैसा ही वातावरणबाद में भी है । वस्तुत यह समझौता न तोसमस्या के समाधान की दिशा म कार्इर् महत्वपण्र्कदम है और न ही संविधान निर्माण के लिएतीन दलों की ठोस राजनीतिक प्रतिबद्धता हीइसमें व्यक्त हो पायी है । सही अर्थ में पिछलेकुछ दिनों में नेपाली राजनीति में महत्वपर्ूण्ादला के नते त् व वगर् म व्यक्तित्व का जा टकरावउभरकर सामने आया है, दूसरे के महत्व कोन स्वीकारन की जा पव्रृत्ति उभरी ह, उसम सेदेश को तत्काल निकालकर अगले एक वर्षकेलिए छ ः सौ एक सभासदों को योग और भोगका अवसर प्रदान कराना ही इस समझौते कामहत्वपरूण् उद्देश्य था । कुत्सित मन के स्वामीहोकर भी अगर हम ‘रामनामी चादर’ से तनको लपेटते हैं तो जाने-अनजाने राम-नाम तोमुँह से निकल ही जाता है । संविधान निर्माणजैसी बातें इनके लिए लगभग ऐसी ही है ।तीन बडे दलों के बीच हुए त्रि सूत्रीयसमझौता से संविधान सभा की आयु बढी,यह एक अच्छी बात हर्इ । सभासदों को एकसाल का काम बढा, यह भी अच्छा हुआ । नईसरकार के गठन की और पुरानी सरकार केपतन की संभावनाएँ बढीं, यह भी अच्छा हुआ ।बहुदलीय से सहमतीय राजनीति की ओर बढनेकी बात कही गई, इसे भी अच्छा कहा जासकता है । लेकिन सवाल है कि जिस सहमतीयराजनीति को आज सब से अधिक दुहाई दी जारही है, अंतरिम संविधान वाली इस तरलअवस्था में इस सहमति सें क्या लोकतंत्र कीसाधना की जा सकती है – सहमतीय राजनीतिका एक छोटा सा नमूना तो देश में १४ ज्येष्ठकी रात में देखा गया । सहमति की जमीन परबैठे लगभग सारे सभासदों ने आनन-फाननम अपनी विद्यायी शक्ति का पय्र ागे करत े हएुसंविधान सभा की उम्र एक साल के लिए बढाली । हम जानते हैं कि अंतरिम संविधान मेंनये चुनाव की कोई निश्चित कालावधि नहींदी गई है । ऐसे में अगर अगले एक साल
दिग्भ्रमित संविधान सभा

अनिश्चितता के भंवर में नेपाल::प्रो.डा. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

nain mishraराजनेताओ की अकर्मण्यता, असक्षमता, अदूरदर्शिता, सत्तालोलुपता, भ्रष्टाचार में लिप्तता आदि कारणों से देश एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में फंसा हैं । मृत राज संस्था हिन्दू धर्म को वैशाखी बनाकर पुनर्जीवित होने के प्रयास में है । एमाले सत्ता छोडÞना नही चाह रही तो नेपाली कांग्रेस अपनी पार्टर्ीीी इन्तजार में है । स्वभावत ः मधेशी दल सत्ताधारी दलों के पिछलग्गु बनने की बाट जोह रहे है । किस को चिन्ता है- देश की जनता की, संविधान की, शांति की या फिर सुरक्षा की । लूट लाओ और बाँट खाओ के खेल में लगे हैं सभी । एक महिषासुर -राजा) का बध हुआ और उसके रक्त बूंद से ६०१ -सांसदों) महिषासुरो का जन्म हुआ जो पिछले दो वषोर्ं से जनता का खून पी रहे हैं और अभी भी तृप्ति नही मिली है । निर्लज्जता यह कि जनादेश के विरुद्ध और संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग कर संविधान सभा की अवधि बढाने लिए आतुर है । क्यो चाहिए ऐसी प्रजातांत्रिक या फिर साम्यवादी व्यवस्था जिसमें जनता के १०० करोड रुपए डÞकारने के बाद भी दो वर्षो में संविधान नही बना पाता हो । क्या औचित्य है ऐसी प्रजातांत्रिक व्यवस्थ्ाा का जिसमें कल का मण्डले किसी दबंग राजनेता का चुनावी खर्च वहन कर राजदूत बन जाता है और पाँच दशकों के प्रजातंत्रवादी जो तीस वर्षो के पंचायती थपेडÞों को झेल चुका है । दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जाता है । और वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता हैं । किसे हजम होगा ऐसा प्रजातंत्र जिसमें खून -रक्त) नून -नमक) से भी सस्ता हो जाए ।
शान्ति की माला जपने वाले नेपाली राजनीतिक दलों की असहमति के कारण देश में फिर अशांति और आतंक के माहौल के कारण जनता त्रस्त है । अभी तक जनता को विश्वास था कि जेठ १४ गते तक उसे नयाँ संविधान मिल जाएगा और उनके दुःख के बादल धीरे धीरे छंटने लगेंगे । लेकिन हुआ ठीक इसके विपरीत । जैसे-जैसे समय नजदीक आता गया, संविधान बनने की आशा क्षीण होती गई और अब तो तय है कि निर्धारित समय पर संविधान नही आ सकेगा और ऐसी स्थिति में बाबुराम भट्टर्राई कहते हैं कि जिसकी लाठी उसकी भैंस ।
०६४ चैत २८ गते संविधान सभा के चुनाव में जो भी अपसंस्कृति तथा उद्दण्डता देखने को मिला । उसे यही समझकर नेपाली जनता ने अनदेखी कर दी कि अब शांति स्थापना के दिन दूर नहीं जिस में लोकतांत्रिक गणतंत्र का विकास होगा, आतंक, हिंसा तथा अराजकता का अंत होगा तथा देश समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर होगा । भयक्रान्त मनस्थिति में भी जनता ने चुनाव और उसके परिणाम को शिरोधार्य किया । नेताओं ने भी विगत दो वर्षों तक जनता को यही आश्वासन देते रहे कि समय पर संविधान का निर्माण होना तय हैं । अभी हाल तक उनका यही कहना था कि जल्दी हमलोग सहमति बनाएंगे और संविधान निर्मित होगा । लेकिन अन्त-अन्त तक संविधान निर्माण से संबंधित मुख्य मामलों जैसा कि शासन प्रणाली का स्वरूप, संघीय संरचना, माओवादी लडंाकूओं के समायोजन, विस्थापितों का पुनर्स्थापना, आदि पर सहमति नही बना सके और परिणामतः संविधान भी नही बन सका । अब स्थिति यहाँ तक आ पहुँची हैं कि प्रचण्ड, अपने कार्यकर्ताओं को अंतिम लडर्Þाई के लिए आहृवान कर रहे हैं और दूसरी तरफ सरकार माओवादियों के चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को गैर कानूनी करार देते हुए उस पर रोक लगाने की घोषणा कर चुकी हैं । अभी की स्थिति में तीन संभावनाएं दिखाई देती हैं । पहली सबसे अच्छी संभावना तो यह हो सकती हैं कि अभी भी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बन जाए और मजबूरी में ही सही संविधान सभा की अवधि को ६ महीने के लिए बढÞाकर संविधान निर्माण का कार्य संपन्न कर लिए जाए । दूसरी सबसे खराब संभावना यह हो सकती हैं कि माओवादी हिंसक आन्दोलन का रास्ता अख्तियार करे जिसे सरकार के द्वारा प्रतिकार किया जाए, जिससें देश में रक्तपात शुरू हो जाए । इन दोनों के बीच में तीसरी संभावना यह दिखाई देती हैं कि माओवादी सिर्फइसी तरह का दबाव बनाते रहें, हिंसक गतिविधि नही करें और अन्य दलों के साथ सिर्फउनका वाक्युद्ध चलता रहे जैसे पिछले कुछ दिनों से चल रहा हैं । राजनीतिक दलों को सहमति का रास्ता अपनाने के लिए उन्हें मानवअधिकार के प्रति पर्ूण्ा निष्ठावान होकर, लोकतांत्रिक प्रणाली को अंगीकार कर जनता के मन से भ्रम और त्रास को समाप्त कर हथियार की राजनीति का पर्ूण्ा रूप से परित्याग करना होगा । लेकिन विगत दो वर्षों में तीन बडे दलांे के शर्ीष्ास्थ नेतृत्व ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और सिर्फसत्ता हथियाने और सरकार में बने रहने का खेल खेलते रहे । परिणमात ः आज देश द्वन्द्व के इस मोड पर आकर खडा हैं ।
देश के तीन बडÞे दलों में अभी नेपाली कांग्रेस ही ऐसा दल है जिसके कुछ शर्ीष्ा नेताओ के मन में सत्ता की आकांक्षा होते हुए भी यह सत्ता प्राप्ति के लिए आतुर नहीं हैं । अन्यथा माओवादी किसी भी तरह सत्ता प्राप्त करना चाह रही है और एमाले सत्ता छोड्ना नहीं चाह रही हैं । संविधान के अभाव में अराजकता बढÞना तय हैं । समय की मांग हैं कि सभी दलों के युवा वर्गों को पुरानी सोच और पुराने नेतृत्व को किनारा करके आगे आना चाहिए । नहीं तो इतिहास उन्हें भी माफ नही करेगा । यह कतई बर्दाशत नही होगा कि कोई भी पार्टर्ीीपने बलिदान के इतिहास की दुहाई देकर जो मन में आए, वही करे । नेपाली जनता के पास लोकतांत्रिक प्रणाली के अलावा दूसरा कोई विकल्प नही हैं । लेकिन प्रश्न हैं इस प्रणाली के सफलतापर्ूवक संचालन की जोर् इमानदारिता के बिना संभव नहीं हैं । देश की स्वाधीनता और स्वाभिमान की बात करने वालों को पहले खुद ही दासता की जंजीर से मुक्त होने की आवश्यकता हैं । दासों के वश में नहीं है कि वे देश की स्वाधीनता की रक्षा कर सके । असफल राजनेताओं से यह आशा करना बेमानी है कि वे देश को समृद्ध बनाएंगे, शांति की स्थापना करेंगे तथा जनता के अधिकारों की सुरक्षा करेंगे सिर्फएक-दूसरे पर तोहमत लगाने से कुछ नही होने वाला । आवश्यकता है सभी को अपने गिरेवान में झांक कर देखने की ।
आज तक नेतागण जनता को समय में संविधान देने की झूठी दिलासा देते रहे । अब एक गुट का कहना है कि समय में संविधान का निर्माण संभव नहीं है जबकि दूसरे गुट की जिद है कि जब तक हमारे हाथ में सत्ता नहीं आएगी, तब तक संविधान बनने नही देंगे । इन दोनों ही गुटों के अक्षमता, असफलता, महत्वाकांक्षा तथा लोभ के कारण आज देश भारी विपति में फंसा हुआ हैं । जब तक नए सोच और्रर् इमानदार व्यक्तियों के हाथ में संविधान निर्माण की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाती तब तक इस देश में संविधान बनना संभव नहीं हैं । दो वर्षों की अवधि में संविधान लिखना अन्तरिम संविधान का उद्देश्य तथा संविधान सभा का अपरिवर्तनीय दायित्व है । इसके कुछ संवैधानिक सिद्धान्त हैं । संविधान देश के र्सार्वभौम सत्ता का संरक्षण तथा नागरिक के आधारभूत अधिकार का संरक्षण करता हैं । संवैधानिक मान्यता है कि इस सर्ंदर्भ में संविधान सभा का जनता की कोई भी प्रतिनिधि सभा, संघ या संस्था समझौता नहीं कर सकती । इसी प्रकार जनप्रतिनिधियों को जनादेश के द्वारा जो समय दिया गया है उसका अक्षरश ः पालन होना चाहिए । यही संवैधानिक सिद्धान्त है । अन्तरिम संविधान के धारा ६४ में संविधान सभा की पहले बैठक के दिन से दो वषोर्ं की अवधि में संविधान लिखे जाने का प्रावधान है । यह बाध्यत्मक तथा अपरिवर्तनीय प्रावधान है तथा यही सामान्य नियम है । संविधान में अपवाद के नियम भी होते है । दो वर्षों की अवधि में अगर्रर् इमानदारीपर्ूवक संविधान सभा के द्वारा संविधान लेखन का काम किया जाता और अगर तब भी संविधान निर्मित नहीं हो पाता तब ऐसी परिस्थिति में नियम में अपवाद की खोजी की जा सकती थी । समयावधि बढाने के विषय में विचार किया जा सकता था । इस परिस्थिति में अपवाद खोजा जा सकता था । नेपाल के संविधान सभा के क्रियालापों का अगर विश्लेषण किया जाए तो जो घटना क्रम विगत में हुआ या हो रहा है यह संविधान नही लिखे जाने के उद्देश्य को इंगित करता है । इतना ही नही यहाँ संविधान सभा तथा द्वन्द्व को एक उद्योग के रूप में स्थापित करने का प्रयास चल रहा है । १४ जेठ के बात समानान्तर सरकार और संविधान बनाने की बात कही जा रही है ।
सरकार में जाने के बाद भी संविधान नही लिखना तथा सत्ता कब्जा करने की योजना घटनाक्रम से परिलक्षित होता है । संविधान संशोधन के द्वारा समयावधि बढाने की बाद भी संविधान लिखने कि लिए नहीं बल्कि द्वन्द्व को स्थापित करने के लिए की जा रही है । करोडों रुपए खर्च करने के बाद भी देश को द्वन्द्व में धकेल दिया गया है । अभी भी अगर समझदारी जागृत नही हर्ुइ तो यह द्वन्द्व आगामी २० वर्षों तक कायम रहेगा । पुनः आंदोलन के बाद द्वन्द्व को उद्योग के रूप में स्थापित करने के लिए संकटकाल की पर्ूव तैयारी है । आंदोलन के नाम में देश को समाप्त करने की साजिश चल रही है । अभी भले ही यह अतिशयोक्ति लगती हो लेकिन भविष्य इस बात की पुष्टि करेगा ।
प्रारम्भिक दिनों में नियत समय पर समिति के सभापति की नियुक्ति नही की गई । इसके पश्चात ६ महीनों तक संसद को अवरुद्ध किया गया । पुनः नागरिक सर्वोच्चता के नाम पर अगले ६ महीनों तक संविधान सभा और अभी पुनः सम्पर्ूण्ा ध्यान सत्ता परिवर्तन तथा सरकार के नेतृत्व परिवर्तन पर केन्द्रित है । संविधान निर्माण तथा सरकार के बीच किसी प्रकार का अन्तर सम्बन्ध नहीं हैं । प्रशासनिक सहयोग के अतिरिक्त सरकार संविधान निर्माण के सर्ंदर्भ में एजेन्डा प्रस्तुत करना, निर्देशन देना जैसा कोई भी काम नहीं कर सकता है । इस प्रकार न्योजित रूप में एक के बाद एक अवरोध उत्पन्न कर संविधान सभा मे अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया गया । तर्सथ राजनीतिक दल तथा उसके नेतागण वा सरकार के द्वारा जान बूझ कर संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान नही करने के कारण आज ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई हैं । अगर आगामी जेठ १४ गते तक संविधान सभा के द्वारा संविधान नहीं लिखा गया, जिसकी प्रबल संभावना है तो इस की वैधता समाप्त हो जाएगी । ऐसी स्थिति में संविधान में संशोधन भी संभव नहीं है । अन्तरिम संविधान के धारा १४८ के अनुसार संविधान सभा को व्यवस्थापिका की हैसियत से दो तिहाई बहुमत द्वारा संविधान के किसी भी धारा उपधारा के संशोधन का प्रावधान है । इसी प्रावधान के पक्ष में अभी कुछ ही दिनों पहले सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला भी आया है । इस आदेश में भी संविधान के अनुसार संघात्मक से एकात्मक तथा राजतंत्र की वापसी के अतिरिक्त संविधान मंे किसी भी प्रकार का संशोधन किया जा सकता है । लेकिन फिर भी इसका यह अर्थ कतई नही निकाला जाना चाहिए कि संविधान में मनमानीपर्ूवक कोई भी संशोधन किया जा सकता है । प्रश्न है कि क्या धारा १४८ में फिर सर्वोच्च के निर्ण्र्ााको आधार बना कर ऐसा संशोधन किया जा सकता है । जिससे देश का अस्तित्व ही संकट में पडÞ जाए । अगर संशोधन के द्वारा संविधान सभा की समयावधि बढÞाने की बात है तो यह ६ महीना ही क्यों, ६ वर्षका ६० वषोर्ं तक के लिए भी बढर्Þाई जा सकती है । संशोधन का प्रावधान जो भी हो संविधान के मर्म को समझ कर उसका सम्मान करने की आवश्यकता है । राष्ट्र के र्सार्वभौमसत्ता तथा अखण्डÞता का संरक्षण तथा नागरिकों के द्वारा दिया गया निर्धारित समय सीमा के जनादेश को संशोधित नही किया जा सकता है ।
अभी तक ग्यारह के आकलन से- तो यह स्पष्ट हो गया है कि जेठ १४ गते तक संविधान जारी नहीं हो सकेगा । अभी तक अवधारणा पत्र हैं जिसके विषय में व्यापक मतभेद हैं अभी तक संविधान के मूलभूत स्वरूप के विषय में भी सहमति नही बन पाई है, जैसे कि शासन का स्वरूप कैसा होगा – संघीय संरचना का स्वरूप क्या होगा – इन्हीं कारणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जेठ १४ गते तक संविधान का बनना असंभव है । दूसरी महत्वपर्ूण्ा बात यह है कि अब अगर आज के दिन में दलों के बीच इन विषयों पर सहमति बन जाती है तब भी संविधान का बनना संभव नहीं है । कुछ लोगों की मान्यता है कि दलों के बीच सहमति की स्थिति में एक सप्ताह के अन्दर संविधान जारी किया जा सकता है । विशेषज्ञों को संविधान बनाना होता, तो यह संभव था । लेकिन हमें यह नही भूलना चाहिए कि हमने संविधान निर्माण में जनसहभागिता का वादा किया हुआ है । सुझाव संकलन के समय में जनता की शिकायत की भी उनके सुझावों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाता है । उसी समय जनता से वादा किया गया था कि संविधान की प्रस्तावित प्रतिलिपि लेकर हम आपके बीच पुनः आएंगे और संविधान की पर्ूण्ाता और अपर्ूण्ाता के विषय में पुन आपकी राय लेकर ही आगे बढेंगे । अतः किसी बंद कमरे में बैठ कर संविधान बनाना उचित नहीं है और जनता के बीच जाने का समय भी नहीं है ।

र्सार्क की र्सार्थकता

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

हिमालिनी डेस्क

pm_thinle_795922623अन्तरक्षेत्रीय सर्म्पर्क अभिवृद्धि औरु जलवायु परिवर्तन की चुनौती का संयुक्त रूप से सामना करने के सम्बंध में अलग-अलग दो घोषणा पत्र जारी कर १६वाँ र्सार्क शिखर सम्मेलन भूटान की राजधानी थिम्पु में सम्पन्न हो गया ।
सम्मेलन में र्सार्क क्षेत्र, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के नेपाल, भारत, बंगलादेश, श्रीलंका, भूटान, मालदीव तथा अफगानिस्तान के राष्ट्र सरकार प्रमुखों ने भाग लिया ।
जलवायु परिवर्तन सम्बंधी उक्त घोषणा पत्र में आर्थिक वृद्धि के लिए उच्च कार्बन के प्रतिनिर्भरता घटाने तथा गरीबी उन्मूलन तथा जलवायु परिवर्तन के जोखिम का प्रतिरोध करने के क्षमता का प्रतिवर्द्धन करने पर जोर दिया गया ।
आगामी पाँच वर्षके भीतर सदस्य राष्ट्रों में वृक्षारोपण अभियान के तहत एक करोडÞ से ज्यादा पेडÞ रोपने की भी घोषणा की गयी । ३७ बिन्दुओं वाली रजत जयन्ती घोषणा पत्र के अर्न्तर्गत आगामी १० वर्ष’२०१०-२०२०’ को अन्तरक्षेत्रीय सर्म्पर्क दशक के रूप में मनाने का निश्चित किया गया । र्सार्क सदस्य राष्ट्रों के बीच हवाई, सामुद्रिक, और स्थलगत सर्म्पर्क अभिवृद्धि पर भी जोर दिया गया ।
सम्मेलन के समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए मेजबान भूटान के प्रधानमंत्री जिम्मे वाई थिन्ले ने घोषणापत्र के मुख्य सार- ‘शान्त, समृद्ध और खुशी दक्षिण एशिया बताया । घोषणपत्र में सम्मेलन ने १६वाँ र्सार्क का नारा ‘हरियाली और खुशी र्सार्क’ दिया गया ।
६९ पृष्ठ लम्बे इस घोषणा पत्र में इस वर्षके अन्त में तथा अगले वर्षके शुरूआत में काठमांडू में पर्यटन, पर्वतश्रंृखला, संरक्षण और गरीबी निवारण सम्बन्धी अलग-अलग मंत्री परिषदस्तरीय बैठक आयोजना करने का निर्ण्र्ााकिया गया । उसी प्रकार भारत के दिल्ली में आगामी सितम्बर में दक्षिण एशियाली विश्वविद्यालय संचालन करने का भी घोषणा पत्र में उल्लेख है ।
शिखर सम्मेलन में ३० करोड अमेरिकी डाँलर पूँजी के र्सार्क विकास कोष मुख्यालय थिम्पु में रखा गया है । भारत ने कोष को १० करोड डाँलर प्रदान किया । र्सार्क संगठन विश्व के कुल क्षेत्रफल के ३.२१ प्रतिशत भाग और विश्व के कुल जनसंख्या का करीब २० प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है । इस संगठन में इस क्षेत्र, के सात गरीब राष्ट्र है । १९८५ में ढाका में र्सार्क संगठन अस्तित्व में आया । इस संगठन में द्विपक्षीय विषय न उठाने का निर्ण्र्ााके साथ शुरू हुआ यह संगठन बहुपक्षीय संगठन भी नहीं बन पाया । यद्यपि र्सार्क का केन्द्र भारत है फिर भी भारत अपने र्सार्क सहयोगी देशों के साथ समुचित सहुलियत का उयोग नहीं कर पाया ।
९७ तथा ८० बिन्दुओं के घोषणा पत्र जारी करने, हाथ मिलाते, चाय पीते, फोटो खिचवाते अब तक र्सार्क शिखर सम्मेलन सम्पन्न होते रहे है । ८ दिसम्बर १९८५ में नेपाल, भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, बंगलादेश, मालदीव तथा भूटान के तत्कालिन नेताओं ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक, विकास के लिए एक संयुक्त सहयोगोत्मक नीति तय करने के उद्देश्य से एक घोषणा पत्र जारी किया ।
बैठक के पश्चात जारी घोषणा पत्र में अशक्त नागरिकों के लिए विशेष व्यवस्था, पिछडÞे वर्ग के लिए खास कार्यक्रम, निःशुल्क व्यापार-व्यवस्था, जैविक विविधता संरक्षण का संयुक्त प्रयास, प्रविधि हस्तांतरण, स्त्रोत आदान-प्रदान आदि सम्बंधी अनेक विषयों पर सहमति व्यक्त की गयी ।
उसके पश्चात भी वाणिज्य उद्योग, चिकित्सा, कृषि, सूचना-संचार, मानव विकास, आतंकवाद, गरीबी निवारण, खाद्य सुरक्षा भण्डार आदि से सम्बन्धित अनेक बहुपक्षीय विषयों पर सहमति विभिन्न र्सार्क सम्मेलनों में की जाती रही । उसे लागू करने की प्रतिबद्धता भी जाहिर की जाती रही लेकिन कार्यवाही मात्र कागज पर ही सीमित रहा ।
१६ वाँ शिखर सम्मेलन में भी दो घोषणा पत्र जारी किया गया । अब तक एक ही घोषणा पत्र जारी होता रहा है । यद्यपि यह वर्षर्सार्क का २५ वाँ वर्षयानि रजत वर्षहै । इस शिखर सम्मेलन में विश्व में व्याप्त जलवायु असंतुलन के प्रभाव एवं क्षेत्रीय विषयों पर गहरी चिंता जतलायी गयी और संकट समाधान करने में सामूहिक पहल की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गयी लेकिन यह शिखर सम्मेलन भी पिछले ५ शिखर सम्मेलनों की तरह ही केवल आपसी मोलजोल का ही टेबूल बन कर रह जायेगा या परिणाममुखी रहेगा, समय बतालयेगा । लेकिन २५ वर्षमें १६ शिखर बैठक इस र्सार्क संगठन की सबसे बडÞी उपलब्धि कही जा सकती है ।

कम्यूनिस्ट मायाजाल::अरुण ठकुरी

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

arun thakuriसुनने, बोलने और सबसे ज्यादा समझने में झंझट पैदा करनेवाले शब्दों का बार-बार प्रयोग करना वामपंथी राजनीति की विशेषता है शायद बाध्यता भी । बीसवी शताब्दी में उत्पन्न शीतयुद्ध की अवस्था में अन्तर्रर्ाा्रीय ध्रुवीकरण के एक पक्ष का नेतृत्व करनेवाली सोवियत सत्ता द्वारा किए जाने वाला प्रचार में साम्राज्यवाद, विस्तारवाद, र्सवहारा वर्ग का शासन, दलाल, पंूजीपति-नौकरशाह का विरोध, अग्रगमन, प्रतिगमन इत्यादि-इत्यादि । शायद सोवियत सत्ता शीतयुद्धकालीन अवस्था को सम्बोधन करना चाहती होगी, आदि इत्यादि शब्दों के माध्यम से । लेकिन ये सारी बातें तब ज्यादा मजेदार लगने लगती है जब मानव संसाधन विकास सूचकांक में सब से पिछली कतार में खडÞे नेपाल के कम्यूनिस्ट अमेरिकी साम्राज्यवाद को राजनीतिक मुद्दा बनाते है । और इन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद के क्षेत्रीय क्लोन के रूप में भारतीय विस्तारवाद का भी अविष्कार कर लिया है ।
विगत साठ वर्षो से भारत के लोकतांत्रिक प्रणाली को अपने राजनीतिक लक्ष्य तक पंहुचने में अवरोध मानने वाले नेपाल के वामपंथी राजनीतिक दलों द्वारा भारत को विस्तारवादी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने की बाध्यता है । क्योंकि जब तक नेपाल और भारत की सीमा बन्द नही हो जाती तब तक नेपाल प्रजातंत्र की आवाज को दबाया नही जा सकता । नेपाल के वामपंथी दल की हार्दिक इच्छा हो सकती है की भारत कि सीमा बन्द हो जाय और चीन की सीमा खुल जाय जिससे वामपथियों के राजनीतिक उद्देश्यों को हवा मिलें । भारतीय व्यवस्था अथवा भारत में स्थापित लोकतांत्रिक प्रणाली को भारतीय विस्तारवाद के रूप में प्रस्तुत करने का नेपाल के वामपंथियों का प्रयास समझ में तो आता है लेकिन कम्यूनिस्ट शब्दकोष के जिन शब्दों की पुनरावृति हो रही है यदि किसी दिन भारत के कम्यूनिस्ट भी भारतीय विस्तारवाद के नारे लगायें तो इसमे कोई आर्श्चर्य नही होना चाहिए । वैसे भी भारत और अमेरिका के बीच परमाणु डील का भारत के वामपंथियो ने कडÞा विरोध किया था क्योंकि इन्हंे डर है कि कही ये चीन को घेरने का षड्यन्त्र हो । कम्यूनिस्टों की राष्ट्रीयता और निष्ठा पर इससे बडÞा प्रश्न चिन्ह क्या हो सकता है कि लाखों हेक्टेयर जमीन पर चीनियाँ कब्जे के बावजूद भारत के वामपंथी चीन के साथ खडÞे हो जाते हैं ।
यह अलग बात है कि किसी भी इन्सान और कम्यूनिस्ट के बीच का अन्तर तुरन्त समझ लेना चाहिए । क्योंकि न तो कोई इन्सान कम्युनिस्ट हो सकता हैं, आरै न कोई कम्युनिस्ट इन्सान । ये जब-जब और जहाँ घुसे कुछ समय के लिए गिरगिट की तरह रंग फेर लेते जरुर है लेकिन न तो इन पर विश्वास ही किया जा सकता है न इस काबिल होते है, ऐसे बात के सैकडÞोें उदाहरण हैं, विक्रम संवत् २०६३ का मधेश आंदोलन जितना प्राकृतिक और पवित्र था उससे ज्यादा उक्त आन्दोलन का नेतृत्व था उपेन्द्र पंथवासी और अपवित्र था उपेन्द्र पंथ ने, बात लोकतंत्र की लेकिन इसके मुद्दे मधेश और मधेश की आकांक्षा से ज्यादा कम्यूनिस्ट चरित्र और स्कूलिंग से प्रभावित थे ।
भारत के माओवादी किस बिन्दु में पहुंच कर आत्मनिर्ण्र्के अधिकार की वकलात करेंगे यह तो आनेवाला समय बताएगा, लेकिन वे ऐसा अवश्य करेंगे इस बात के बीच नेपाल के माओवादी और ‘उपेन्द्र पंथियों नेबीज बो दिया है । लेकिन जिन-जिन मुद्दों को भारतीय माओवादी आज उठा रहे है आम नेपाली दृष्टिकोण को हिसाब से वे बासी है लेकिन इस बासीपन के बावजूद भारत का माओवादी व्रि्रोह यदि इन मुद्दों को उठा रहा है तो निश्चय ही यह कम्यूनिस्ट दर्शन के सीमा विहीनता के सिद्धान्त से प्रभावित है ।
गौर तलब है कि अप्रैल २००५ और उस के लिए किए गए सारे गृहकार्य असफल हो गए है । नेपाली परिदृश्य में इस बात को साफ-साफ देखा जा सकता है कि ‘बारह सूत्रीय समझौता’ अब बेमानी हो चुका है, जिस बात कि घोषणा स्वयं माओवादी नेतृत्व द्वारा बार-बार की गई है । नेपाल का राजनीतिक मनोविज्ञान वार-पार की लडर्Þाई की तरफ अग्रसर है सीधी बात है कि इस लडर्Þाई की व्यूहरचना स्वयं माओवादियों द्वारा की गई है । बडÞा आर्श्चर्य होता है कि किसी हथियार बन्द व्रि्रोही समूह को राज्य के समानान्तर शक्ति की मान्यता देने का क्या तुक था – वह भी उस अवस्था मंे जहाँ माओवादी अपने राजनीतिक लक्ष्य के बारे में स्पष्ट थे और उनकी राजनीतिक सांगठनिक हैसियत बढÞने के आधार खडे किए जा चुके थे ।
बारह सूत्रीय सम्झौता के पीछे भारतीय पक्ष के तत्कालीन रणनीतिकारों को किन-किन चीजों ने प्रभावित किया होगा यह जानना कठिन है शायद भारत की तत्कालिन सरकर को र्समर्थन कर रहे वामपंथी दलों का प्रभाव इस में महत्वपर्ूण्ा उत्प्रेरक का काम करता हैं । नेपाल के व्रि्रोहरत माओवादियों को नेपाली राज्यसत्ता के लिए उदाहरण निर्माण किया जा सकने की भारतीय हृदयता को नेपाल के माओवादियों ने तो खरिज कर ही दिया साथ-ही-साथ भारत में बढÞती माओवादी हिंसा और सांगठनिक प्रभाव इस बात के प्रमाण है कि इक्कीसवीं शताब्दी में राजनीतिक आवरण के अन्दर छिपी माओवादी रणनीति आतंकवादी सम्पर्ूण्ा परिभाषाएँ पूरा करती है । यदि आतंकवाद के विरुद्ध लडÞने के बारे में अन्तर्रर्ाा्रीय सहमति बन चुकी है तो सिर्फदो ही विकल्प विश्व के पास बचता है पहला, या तो सर इस आतंकवाद के सर को कुचलकर जडÞ से ही मिटा दिया जाय, या विश्व परिवेश को इस किस्म के आतंकवाद के सामने आत्मर्समर्पण कर देना चाहिए । बीच का कोई रास्ता बिल्कुल नहीं है ।
कम्यूनिस्ट आतंकवाद किसी निश्चित समाज या भूगोल की समस्या नहीं है । अन्तर्रर्ाा्रीय परिदृश्य में वे सभी जमीने इस आतंकवाद के लिए उर्वर है जहाँ गरीबी है, अशिक्षा और समाजिक विभेद है, हाँलाकि इन सभी चीजों को समाप्त करने के लिए कम्यूनिस्ट घुसकर कहे कि- लडÞों क्योंकि तुम्हारे पास गंवाने के लिए कुछ नही है लेकिन जीतने के बाद सारी दुनियाँ तुम्हारी है तो किसी का भी दिमाग खराब हो सकता है । नेपाल में संघीयता नही थी, गणतंत्र नही था धर्मनिरपेक्षता भी नही थी और संविधान सभा निर्वाचन भी नही हुआ था नेपाल के माओवादियो ने यही मुद्दंे उठाए थे लेकिन भारत में तो ये सभी चीजें थी फिर क्यों भारत के माओवादी नरसंहार कर रहे हैं – न हारने वाला चुनाव लडÞने वाले नेपाल के माओवादी जीतने के बाद भी सत्ता कब्जा करना चाहता है जबकि दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करके अपनी आस्था दर्शन और योजना के मुताबिक संविधान बदलने का अवसर इनके सामने खडÞा है शायद भारत का संविधान भी ऐसी ही सुविधा प्रदान करता है लेकिन जनता की सब से ज्यादा दुहाई देने वाले माओवादी इस तरह का कोई भी रास्ता या अवसर प्रयोग करना नही चाहते क्योंकि ‘पावर कम्स थ्रु द व्यारल आफ गन’ अर्थात सत्ता बन्दूक की नाल से निकलती है कि मान्यता से ओत-प्रोत कम्यूनिस्ट वह सभी उपाय करते है जिससे उन्हें रणनीतिक लाभ हो, चाहे वह निर्वाचन ही सही । लेकिन बात अक्टूबर क्रान्ति की आती है तो कम्यूनिस्ट चरित्र पर कब तक विश्वास किया जा सकता है -
कम्यूनिस्ट सत्ता का र्सवहारा ने काफी अनुभव कर लिया है चाहे वह सोवियत सत्ता हो या चीन, उत्तर कोरिया, क्युबा या ऐसे और देश । कम्यूनिस्ट सत्ता ने आम जनता का जो कत्लेआम किया वह कम्यूनिस्ट शासन मान्यता के माथे पर लगा हुआ कलंक का टीका है । फौज, जासूस और रेड आर्मी के संगठन पर आश्रति चीन की प्रगति कुछ देर के लिए प्रभावित कर सकती है लेकिन इस प्रगति के पीछे कितने इन्सानों की सिसकियां दफन है इस बात का कौन अंदाज लगा सकता है – यदि सोने के पिजडÞे में पंरिंदा अपने को खुश महसूस करता हो तो ठीक है लेकिन कम्यूनिस्ट सत्ता तो सोने का पिंजडÞा भी नही बनाती है । दिखाने के लिए पिजडÞा चमकदार जरुर हो सकता है । दिखने और दिखाने के कम्यूनिज्म पागलपन के पीछे यदि वर्तमान विश्व विक्षिप्त होकर भाग रहा है तो स्वस्थ लोगों कि क्या जिम्मेवारी है यह आज का अहम् प्रश्न बनकर उभरा है ।

लोकतांत्रिक जंग की तैयारी ::योगेन्द्रप्रसाद साह

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

yogendra Prasad shah२००३ साल से ही लोकतंत्र और राजसंस्था में जंग की शुरूआत हर्इ थी । लेकिन लोकतंत्र के लिए संर्घष्ारत पार्टीेपाली कांग्रेस ने पहले सरकार यानी राणा सरकार को अवरोध मानकर उसी का सफाया २००७ साल में कर दिया । यद्यपि २००३ साल में गठित नेपाली कांग्रेस पार्टी इरादा राजा को संवैधानिक मात्र बनाने से था । सबको मालूम है शेर पिंजडा से निकलकर दहाडÞने लगा । लोकतंत्रात्रिक सत्ता की बागडोर आगे कर २००४ साल में और निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार पूष १ गते २०१७ साल में अपहरित हो गई । २००८ साल से सीधे राजसंस्था से प्रजातंत्रवादी भीड गए । २००८ में दूसरी क्रांति की शुरूआत हर्ुइ थी और २०४७ साल में संवैधानिक राज के साथ एक बार फिर लोकतंत्र की स्थापना हर्ुइ । फिर भी राजसंस्था के साथ अघोषित जंग जारी रहा । राजा संवैधानिक राजतंत्र से छुटकारा पाकर हुकुमी शासन के लिए संर्घष्ा में रहे और नेतागण कर्ुर्सियाँ पाकर भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए । इसीका फायदा उठाकर माओवादी संगठन का जन्म हुआ । यही पर आकार राजसंस्था से चुक हो गई खुद ही लोकतंत्रवादी शक्ति भ्रष्ट आचरण के कारण कमजोर हो ही रहा था तब कम्युनिस्टों के साथ सहकार्य करना राजनीतिक ज्ञान में कमी को दर्शाता है । राजा के साथ कार्यगत एकता का बयान एक लेख मार्फ बाबुराम भट्टर्राई ने ही दिया है । असल में जंग राजसंस्था और प्रजातंत्रवादी के बीच ही चलता रहा ।
इस जंग में राजसंस्था का विजय पाताका काफी वर्षों तक फहराता रहा । सफलता मिल जाने पर राजा महेन्द्र शासकीय शैली में भटकाव शुरू हो गया । तर्राई के जंगलों का विनाश करके पहाडियों को बसाया जाने लगा । पहली बार नेपाली पहाडियों में मुफ्त धन प्राप्त करने की होडबाजी इसी मनोविज्ञान से शुरू हुआ । एक का अधिकार छीनकर दूसरे को देने की परम्परा से अराजक मनोवृति का विकास होता रहा । इसी मनोवृति के कारण कम्युनिस्टों की जमात में वृहत् फैलाव आया । मुफ्त का धन प्राप्त करने की होडबाजी से भ्रष्टाचार ने विकराल रूप धारण कर लिया । सारा देश चरित्रहीन बनता रहा । इसी बीच अमेरिकी खेल ने भूमि सुधार के नाम पर निठल्लों कि फौज खडी कराने में सफलता पाई । खाद्यान में आत्म निर्भर नेपाल अकालग्रस्त होने लगा । दोहरे स्वामित्व से आपसी द्वन्द्व बढा । राजा को अमेरिकी खेमा ने समझा दिया कि ‘फूट डालो-राज करो ।’ खेल-खेल में खेल की मर्यादा घटती चली गई । आज का सत्ता का खेल इसी मनोविज्ञान से प्रभावित चल रहा है । कम्यूनिस्ट भी अमेरिकी भूमि सुधार को समझ नही पायें और अपना संागठनिक फैलाव देख कर फूले नही समाये । अतः मार्क्सवाद का सब से विकृत रूप नेपाल में ही देखने को मिलता है ।
इन त्रिकोणीय खेल में राजा, प्रजातंत्रवादी और कम्यूनिस्ट इस कदर हावी रहे कि जनता हतप्रद स्थिति में विचार शून्य होती चली गई । राजा से निराश जनता कभी प्रजातंत्रवादी को और लुढकती कभी प्रजातंत्रवादी से निराश जनता राजा की ओर लुढकती और दोनों ओर से निराश जनता कम्युनिस्ट की ओर लुढकती रही है । किन्तु जनता को राहत कही से नही मिल रही है । अब जनता कह रही है- ‘जायं तो जायं कहाँ -’
जनआंदोलन-२ में जनता ने निर्ण्र्ाादिया । विशुद्ध लोकतंत्र स्थापित हो और संविधान निर्माण उन्हीं के प्रतिनिधि करेंगे । हठी गिरिजाप्रसाद कोईराला को यही गँवारा नहीं था । अपनी ही गलतियों से राजसंस्था समाप्त हो गयी । अब जनता की आशा प्रजातंत्रवादियों और माओवादियों से थी । मृत संसद पुनर्जीवित करे एक बार फिर सत्ता की बागडोर हठी गिरिजाप्रसाद कोईराला के हाथों में चली गई । अब यथास्थितिवादियों के मान्यजन गिरिजाबाबू बन गए और प्रगतिशील होने का नाटक का जिम्मा या टेन्डर कहें माओवादियों के जिम्मे आ गया । राजसंस्था रहा नहीं, नेतागण भयरहित बन गए । राष्ट्रीय सेना, प्रशासन, न्यायालय, पुलिस सब कुछ अब नेताओं के खेमों के र्इदगिर्द भटकने लगा या उन्हें प्रभाव क्षेत्र में लाने की कवायत होती रही । नागरिक सर्वोच्चता को सडÞक पर खोजने में संविधान सभा को महीनों अवरुद्ध रखा गया । जैसे नागरिक सर्वोच्चता पाकेट से सडÞक पर कही गिर गया हो । इस खोज में र्व्यर्थ का एक साल खत्म हुआ । कुछ दिन भारतीय विस्तारवाद के भय में बीत गया । सत्ता की खोज में भटकते हुए गिरिजाप्रसाद राष्ट्रपति की कर्ुर्सर्ीीक नहीं पहुँच सके । उन्होंने सोचा था कि शक्ति प्राप्त करके अपने ही वंशावली से प्रधानमंत्री के विरासत पर पुत्री सुजाता को असीन करा दिया जाय । इसी चक्कर में संविधान सभा का कार्यकाल भी बीता और खुद स्वर्गीय भी हो गए । राजा मठ-मंदिरों में पर्ुनवापसी की आशा संजोए भगवान को पुकार रहे हैं । इनके सभी लिस्ट में जनसंभावना का कदर का हिसाब दर्ज ही नही है । जनता फुटबाल है । देखे विजय-श्री का माला कौन पहन पाता है -
मार्क्स व्यापार कम्यूनिस्ट कर रहे है, प्रताजंत्र का व्यापार कांग्रेसियों के लिए फायदेमन्द साबित हो ही चुका है । पीडित जनता जो अभी फुटबाल के रूप में प्रत्युक्त है- कही राजा के गोलकी में न घुस जाय ।

मधेशवादी नेता के नाम::रामशरण झा

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

मान्यवर,
युगों से सुप्रसिद्ध इस आध्यात्मिक प्रागैतिहासिक नगरी जनकपुरधाम में सम्पर्ण् मधेशवादी, मधेश प्रेमी नेपाली जनता के मर्म को समझने एवं सुलझाने हेतु आए प्रखर नेता का हार्दिक अभिनन्दन करते हुए इस क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिक हषिर्त हो रहे हैं । राष्ट्रीय प्रजातान्त्रिक आन्दोलनां में इस क्षेत्र के वीर जुझारू लोग हमेशा से लगे रहे हैं और समय आने पर आन्तरिक उपनिवेशवादियों, तानाशाहों से लडते हुए कई बार शहीद भी हुए । संघीय लोकतान्त्रिक प्रणाली चाहने वाले दीवानों में शहीद रघुनाथ ठाकुर, दर्गानन्द झा, रमेश महतो, आशेश्वर यादव, कुशेश्वर यादव आदि
के नाम नवोदित होने वाले समग्र मधेश एक स्वायत्त प्रदेश की स्मारिका में स्वर्ण्क्षरो में अंकित होने योग्य है, वे इसी भूमि के बलिदानी सपूत थे । कालचक्र के दर्भाग्यपर् खेल में हमारा मधेश और खासकर विश्व के र्सवश्रेष्ठ ज्ञानी राजा जनक की यह राजधानी पिछले तीन शताब्दियों से शोषण, उत्पीडÞन का शिकार होती रही है । मधेश की समतल उर्वरा भूमि के लिए न कोई कृषि नीति है न सिंचाई की न्यूनतम सुविधा, मधेशियों के लिए न तो कोई संघ लोकसेवा, न संघीय सैन्य सुरक्षा सेवा आयोग । चारों तरफ बेरोजगारी, दर्रि्रता, और अशिक्षा का बोलबाला नजर आता है । ऐसे में कोई अति उद्यमशील तेजस्वी मधेशी तब तक ऊंचे पदों तक नही पहुँच सकते जब तक वो खसवादियों का गुलाम या पिछलग्गु होकर पुनः मधेश का ही शोषण करते हुए उनका पृष्ठपोषक न बन जाए । ऐसा प्रतीत होता है कि मधेश रूपी हरे-भरे वृक्ष को किसी दुष्ट परजीवी लता ने आच्छादित किया हुए है और उस पेड की हरियाली एवं वृद्धि को कुंठित किए रखा है । मधेश का र्सवाग शोषण करने वाले इस मरकट अमर बेल को उजाडÞ फेकने, मधेशी उलझन पर्ण्ा प्रदूषित मानसिकता को सुलझाने के लिए यह सभा आपका स्वागत करती है । समग्र मधेश एक स्वायत्त प्रदेश की क्रान्तिकारी अवधारणा को बरगलाने के लिए भाषिक, क्षेत्रीय एवं साम्प्रदायिकता के विष बीज बोए जा रहे हैं, इन्हीं खसवादियों, आन्तरिक उपनिवेशवादियों के आधारहीन अदृश्य हस्तक्षेप के द्वारा । और हमलोग कहने लगते है कि पृथक भोजपुर राज्य हो, मिथिला प्रदेश हो, थारु राज्य हो एवम् अन्य जातिगत नामांे वाले राज्य हो इत्यादि । और समग्र मधेश की अवधारण में लगी हर्इ सब से संक्रामक बीमारी भी यही है । किसी भी भाषा का रूप तीन कोस में बदलता रहता है, और एक ही जात का रिवाज दस कोस में थोडÞा अलग । परन्तु मूल तो वही रहता है । होली, दीपावली, छठ, सरस्वती पूजा, दर्ुगापूजा, जीमूत वाहन की पूजा, व्रतबन्ध, विवाह एवम् अन्य संस्कार पूरब मेची से पश्चिम महाकाली तक के बाइसो मधेशी जिलों में एक ही तरह से मनाए जाते है, जमीन की समतलता भी एक सी है और आध्यात्मिकता के मूलमन्त्र को भी हम सभी समान आदर देते है तो हम सब लोग मधेशी हैं, यह स्वयंसिद्ध है । संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की भी यही मान्यता है । तो ऐसी एकीकृत अवधारणा वाले मधेशी नेपाल के अन्दर एक अलग प्रान्त, -आत्मनिर्ण्ाायक स्वायत्त प्रदेश) के हकदार है । हमारा हक हमें मिला हुआ है, इसके लिए हम किसी के रहमोकरम का मोहताज नहीं । जरूरत है ः
‘खुदी को कर बुलन्द इतना, कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है ‘
जरूरत है कि कोचिला, विराट, सल्हेस, मिथिला, सिमरौनगढÞ, भोजपुर, अवध एवं थारु प्रान्तो से एक ही स्वर में ‘आत्म निर्ण्र्ाा स्वायत्त मधेश प्रदेश’ की घोषणा हो । हम सारे लोगों की एकता के सामने दुष्कृत खसवादी लोग खाँसी तक नही कर सकेंगे । ऐसी आशा और विश्वास लिए हुए यह पूरा जनसमुदाय आपकी वन्दना करती है । हम एक ही वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ है । समय आने पर सब डालो मंे फलफूल लगेगे ही परन्तु सबसे पहले इस पूरे पेडÞ पर फैले हुए सदियों के परजीवी बेल को उजाडÞना ही पडÞेगा, इस खुंखार जानवर को कुएँ में गिराना ही पडÞेगा ऐसा संकल्प लेते हुए यह सभा आपको देखना चाहती हैं । नेपाल की उन्नति के लिए जरूरी है हिमाली क्षेत्र की उन्नति, पहाडों के जलाधारो का समुचित संरक्षित विकास तथा जरूरी है मधेश की उन्नति, और सबसे जरूरी हैं एक समावेशी, समतामूलक विश्वमान्य संघीय प्रजातान्त्रिक अवधारणा की । आज अमेरिका, सबसे विकसित है तो इसलिए की उसके सभी राज्य समुन्नत है । अगर नेपाल के पहाडी, प्रान्तों को नैनिताल, दार्जिलिग और देहरादून बनने की चाहत है तो मधेश की समतल भूमि को भी पंजाब और हरियाणा जैसा उत्पादक क्षेत्र बनने की आवश्यकता है । इसके लिए सारे प्राकृतिक संसाधन उपस्थित है परन्तु उनका सही उपयोग नही हो रहा । कोशी हाई डैम, पंचेश्वर डैम, सुनकोशी कमला डाइभरसन एवं अनेको पारस्परिक लाभ ९ःगतगब दिभलभाष्त कअजझभ० की योनजाओं का विस्तृत र्सर्वेक्षण हो चुका । म्।ए।च्। बन चुका पर कार्यान्वयन करने के बदले उन्हें ठंढे बस्ते में रखा हुआ है । क्योंकि इससे मधेश समुन्नत होगा, नेपाल धनी होगा । कभी-कभी छोटी विकास की योजनाए सूचित भी होते है तो शतरंज के घोडÞे के चाल की तरह कि मधेशियों के बीच विकास को लेकर ही विवाद उत्पन्न हो जाए और ओ
-खसवादी) ठहाके लगाकर हँसते रहे कि मधेशियों को विकास नही चाहिए । केन्द्र में इन्हीं -खसवादियों के वर्चस्ववाला) कोई ऐसा प्रकोष्ट है जहा से मधेश के विकास, मधेश की एकता के विरुद्ध इस तरह के तानेबाने बुने जाते हैं कि मधेशी लोग हितोपदेश के कबूतरों की तरह फँसे रहे और बहेलिए परपीडÞकों की खुशी लूटते रहे । महामहिम आज ऐसी जरूरत है हम सारे मधेशी एकजूट होकर, एक ही बार उस खतरनाक जाल को लेते हुए उडÞ जाएँ ऐसा प्रण लेने और प्रेरणा देने के लिए यह सभा आपका दिल से अभिनन्दन करता है । “जय मधेश”

आतंकवाद प्रथम अथवा अन्तिम विकल्प ::फतेह बहादुर सिंह

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

phateh bhadur singhइतिहास में राजनैतिक उद्देश्य की परिपर्र्ति के लिए युद्ध को प्रथम अथवा अंतिम विकल्प के रूप में जाना जाता है । पौराणिक गाथाओं में विजय प्राप्त करने हेतु देवता तथा दानव आक्रमण तथा युद्ध करते थे । राम-रावण युद्ध में, युद्ध अन्तिम विकल्प था । क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने रावण के भाई विभीषण के माध्यम से युद्ध टालने का अथक प्रयास किया था । महाभारत युद्ध अन्तिम विकल्प ही था क्योंकि भगवान कृष्ण ने स्वयं कौरवों तथा पांडवो के बीच समझौता कराने का प्रयास किया था, जो सफल न हो सका ।
प्राचीन समय के युद्ध में युद्धरत पक्ष कुछ नैतिक नियमों का पालन करते थे तथा युद्ध धर्म युद्ध के रूप में जाना जाता था । परन्तु विदेशी लुटेरा आक्रमणकारियों ने युद्ध के नैतिक मूल्य एवं मान्यताओं का पालन बन्द कर दिया । इस प्रकार से अनैतिक तथा अमानवीय छापामार युद्ध का प्रचलन प्रारम्भ हुआ, जिसने कालांतर में आतंकवाद का रूप ग्रहण कर लिया ।
आतंकवाद ऐसा घिनौना वीभत्स हिंसात्मक क्रियाकलाप है जिस में किसी भी मर्यादा तथा नैतिक मूल्य एवं मान्यता का पालन नही किया जाता है । आतंकवादी नृशंस हत्या देख कर मृत्यु की रुह भी काँप जाती है । आतंकवादी हत्यारे बाल, वृद्ध, महिला, अपांग तथा असहाय पर भी दया तथा संवेदनाशीलता की अनुभूति करना नही सीखे होते हैं । धोखे से तथा पीछे से प्रहार कर हत्या करना इनकी नैतिकता का मानदंड होता हैं । अस्पताल, वृद्धाश्रम, बाल शिशु केन्द्र आतंकवादी के विस्फोट के निशाने पर होते हैं । सुरक्षाकर्मियो को किन्ही नैतिक मूल्य एवं मान्यताआंे का पालना करना होता है । पुनश्च सुुरक्षाकर्मी आतंकवादी की तरह निर्दयी तथा अनैतिक नही होते हैं । सुरक्षाकर्मी का कार्य सुरक्षात्मक होता है । जबकि आतंकवादी का काम आक्रमणकारी होता है । इसलिए सुरक्षाकर्मियों को आतंकवादियों पर विजय प्राप्त कर सकना कठिन होता है । अपनी हिंसक गतिविधि से आतंकवादी आम जनता का मौन र्समर्थन प्राप्त लिए होते हैं । केवल संचारकर्मी आतंकवादी का पर्दाफाश करने में सक्रिय होते है । जिसका प्रतिफल उन्हें मर कर देना पडÞता है ।
क्या आतंकवाद भी अपरिहार्यता का कोई औचित्य हैं – बिलकुल नही । केवल मार्क्सवादी दर्शन ही आतंकवाद को विकल्पहीन मानता है । चाहे, उपनिवेशवाद से राष्ट्र की स्वतंत्रता का प्रश्न हो, अथवा र्सवहारा की मुक्ति का प्रश्न हो, आंकवाद का सहारा लेना अमानवीय तथा मानवता विरुद्ध घोर अपराध है । क्योंकि आतंकवादी व्रि्रोह का विकल्प मानव समाज को विरासत के रूप में प्राप्त है । देवासुर संग्राम में देवता को तथा दैत्यों ने विनाशक युद्ध के विकल्प में सहमति एवं सहकार्य की भावना से समुद्र मंथन कर अमृत तथा विष प्राप्त किया था । भगवान शंकर ने विष पान करके देवताओं को अमरत्व प्रदान किया था । महात्मा गांधी ने नाथुराम गोड्से के बुलेट का विषपान करके विश्व शांति अहिंसा का संदेश दिया था, जिससे आतंकवाद को औचित्यहीन बनाया जा सकें ।
शांति अहिंसा के विकल्पहीन अस्त्रशस्त्र से महात्मा गांधी ने विश्व के र्सवशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को उपनिवेशवाद से भारत को मुक्त कर स्वतंत्रता प्रदान करके मजबूत किया था । महात्मा गांधी का राजनैतिक अस्त्र था शांतिपर्ूण्ा असहयोग आन्दोलन तथा बाँयकाट सविनय अवज्ञा आंदोलन से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की जडÞे हिला दिया था तथा एशिया एवं अप्रिmका के उपनिवेशों को स्वतंत्र करने को बाध्य कर दिया था । विश्व ने मार्क्सवादी हिंसा के स्थान पर लोकतांत्रिक शांति, अहिंसा तथा त्याग एवं बलिदान का मार्ग चुना था । इसी गांधीवादी दर्शन के अस्त्र का प्रयोग कर मार्टिन लूथर किंग जुनियर ने संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेतों अर्थात नीग्रो समुदाय को त्याग एवं बलिदान से नागरिक अधिकार दिलाया था । आतंकवाद का औचित्य आधारहीन प्रमाणित हुआ था ।
महात्मा गांधी के शांति अहिंसा के अस्त्र द्वारा दक्षिण अप्रिmका की गोरी सरकार भेदभावपर्ूण्ा कानून को वापस लेने को बाध्य हर्ुइ थी । महात्मा गांधी के शांति एवं अहिंसा के नीति पर चलकर दक्षिण अप्रिmका एवं रोडेशिया की सरकारों भी रंगभेद की नीति को बदला तथा अप|mीका महादेश में लोकतंत्र की लहर आयी थी । भारत में बाबू जयप्रकाश नारायण है, गांधीवादी नीति से ही देश की समस्या का समाधान हो सका था तथा गांधीवादी नीति से ही व्रि्रोही लाल डंडा को लोकतंत्र के मार्ग पर वापस लाया जा सका था ।
नेपाल में भी १८ दिन के अहिंसक आंदोलन द्वारा राजतंत्र को समाप्त किया जा सका था । अहिंसा जनआंदोलन कितना सबल तथा सक्षम होता है । तब आतंकवादी छापामार युद्ध का क्या औचित्य । अहिंसक आन्दोलन में जनता त्याग तथा बलिदन कर पर््रदर्शन करती है । तब आतंकवाद का क्या औचित्य ।
आतंकवाद कट्टरवादी मानसिकता तथा संस्कृति की उपज है । जहाँ लोकतंत्र तथा उदारवाद का प्रभाव होता है वहाँ आतंकवाद पनप ही नही सकता है । आयरलैंडÞ का लिक समुदाय, अरब तथा एशिया का जेहादी समुदाय, उग्रवाम के कट्टरवादी प्रवृति के कारण वे आतंकवाद के प्रति समर्पित तथा प्रतिबद्ध हैं । मार्क्सवादी कट्टरवाद को लोकतंत्र जीत नही सका । उत्तर कोरिया तथा चीन का मार्क्सवादी कट्टरवादी सम्पर्ूण्ा एशिया के लोकतंत्र को खा जायगा । भारत के लोकतन्त्र को माओवादी कट्टरवाद निगल जायगा । दक्षिण पंथी तालिवानी कट्टरवाद पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के लोकतंत्र को समाप्त कर देगा । यह कट्टरवादी आतंकवाद इरान, पाकिस्तान तथा उत्तर कोरिया के अणु शक्ति का प्रयोग विश्व के विनाश के लिए अवश्य करेगा तथा विश्व सभ्यता एवं संस्कृति का र्सवनाश हो जायगा ।
यदि लोकतंत्र को बचाकर विश्व सभ्यता एवं संस्कृति को रक्षा करना है तब आतंकवाद को उसी प्रकार समाप्त करना होगा जैसा भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर वरदान प्राप्त दैत्य को अपने ही शिर पर हाथ रखकर नाचने को कहा था ।

आमहड्ताल और वर्तमान सरकार :: दिनेश यादव

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

dinesh photoहमारे जीवन में एक गुरू का होना बहुत जरूरी है, गुरु भी ऐसा हो, जो हमारे प्रभाव में आए बिना हमें सही रास्ता दिखलाता रहे । रावण के जीवन में ऐसा कोई गुरु नही था, जो थे, सब चाटुकार थे, सो उसका परिणाम कैसा हुआ, सभी जानते हैं । रावण के पथभ्रष्ट होने के अनेक कारणों में एक महत्वपर्ण्ा कारण था उसके पास शस्त्र तो थे पर गुरू नही था । आज हमारे सत्ताधारी दलों के नेतृत्वकर्ताआंे से लेकर सत्ता की कमान संभालने वाले हो या प्रतिपक्ष सभी अपने चाटुकारों से घिरे हुए है । इसलिए तो नेपाल र्सार्वभौमसत्ता सम्पन्न होकर भी अघोषित रूप से अमुक मुल्क के ‘बाहुबली प्रभाव’ में हैं । गाव के स्कूल में पहली बार पढा और सुना, धोती-कर्ता वाले मास्टर से विश्व के कौन सा देश है, जो कभी गुलाम नही बना – उत्तर था नेपाल । बहुत गर्व हुआ था, तब । परन्तु आज रावण-चरित्र वाले हमारे नेता के कारण मुल्क ‘अघोषित गुलामी’ की ओर बढÞ रहा हैं ।
जनआन्दोलन २ के सफलता के बाद नेपाल को नया“ संविधान देने की बात नेता द्वारा कहे गये दो वर्षसे ज्यादा हो गया है । जम्बो संविधान सभा सदस्य के साथ राज्य के सम्पति लूट्ने में नेतागण अग्रपंक्ति में रहे । परन्तु नया“ संविधान वह निर्धारित समय में न देकर नेपाल को गम्भीर संवैधानिक संकट में फंसाने का दुष्प्रयास वे कर रहें हैं । विपरीत परिस्थिति में अलौकिक शक्ति के कृपापात्र बनकर सत्ता के नेतृत्व में पहु“चे प्रधानमन्त्री माधव कुमार नेपाल ने अपने कार्यकाल के एक वर्षमें न कोई प्रतिभा, वीरता और न ही कोई ज्ञान में बढोतरी कर पाये हैं । हा“, उनका घमण्ड, और अविवेकीपन मे ंजरुर बढोतरी हुआ है । उधर प्रतिपक्ष के नेता तथा माओवादी के सुप्रीमो पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ भी अपनी भूमिका में चूक रहे हैं । बन्द/आम हडÞताल जैसे कष्टकर आन्दोलन का उद्घोष कर स्थिति जन-जन के विरुद्ध में पहु“चाया । वह भी नेपाल को इन्द्रप्रस्थ -र्स्वर्ग) नही खण्डप्रस्थ -तहस-नहस) बनाने के लिए ही क्रियाशील रहे, सत्ता प्राप्ति के लिए । नेपाल के दोनांे नायक अपने-अपने कर्तव्यों से कोसांे दूर हैं । जनादेश के खिलाफ बने वर्तमान सरकारी मोर्चा र्सार्वभौम नेपाली जनताओं की भावनाओं को कुचलकर आगे बढ रही है । आन्दोलनकारी शक्ति चाहे माओवादी हो या फिर मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल ही, दोनांे को इस मोर्चा ने ‘एकल बानर’ सी स्थिति में पहु“चा दिया हैं । पराजितों के झुण्ड वाले वर्तमान मन्त्रिमण्डल मंे एक विजेता रिजवान अन्सारी को यह नेतृत्व बलि का बकरा बनाकर शूली पर चढÞा चुका हैं । इस तरह नेपाल में अघोषित रूप में अप्राकृतिक गठबन्धन और सरकार है , जो ‘उल्टे चोर कोतवाल को डा“टे’ वाली स्थिति से गुजर रहा है ।
दो-दो जगहों से जनता के द्वारा बहिष्कृत माधव नेपाल प्रधानमन्त्री बनने के बाद उनकी बोली ही नही ‘बा“डी लेंग्वेज’ में भी परिवर्तन हो गया हैं । संविधान निर्माण प्रक्रिया अवरुद्ध है परन्तु वह कर्ुर्सर्ीीे हटने का नाम नही ले रहे हैं । छह दिनांे तक इस मुल्क को आमहडÞताल जैसी कठोर आन्दोलन का सामना करना पडÞा, देश ठप्प रहा, जम्बो मन्त्रीमण्डल के सदस्यगण चूहे-बिल्ली के खेल में लगे रहे । प्रधानमंत्री नेपाल खुद भी बालुवाटार स्थित अपने सरकारी निवास मंे नजरबन्द की स्थिति में थे, सरकारी मुख्यालय सिंहदरबार भी प्रभावहीन बना, राजधानी काठमाण्डू के सडÞक माओवादी के कब्जा में था । मन्त्रीगण भन्सार छुट कर डÞकारे गये लाखों मूल्य के वातानुकूलित वाहनों को छोडÞ पुलिस के द्वारा प्रयोग किए जाने वाला टाटा मोबाइल गाडÞी में चढÞकर रात को तीन बजे अपने-अपने मन्त्रालय में जाने को विवश हुए । ऐसी लाचार स्थिति के बावजूद प्रधानमंत्री और मन्त्री गण अपने-अपने कर्ुर्सर्ीीें चिपके रहे । प्रधानमन्त्री नेपाल और उनके मन्त्रीगण कह रहे है ः संवैधानिक प्रक्रिया से ही सत्ता छोडा जायेगा । अर्थात् ३०१ की गणित पूरा करने के बाद ही त्यागपत्र होगा । सत्ताधारियों को इसी रट में रहने के कारण मुल्क को अग्रगमन नही मिल रहा हैं ।
उधर, नेपाल का सब से बडंा दल माओवादी भी अपने अडÞान से टसमस नही हो रहा । वह दोहराता आ रहा है कि नेपाल नेतृत्व के सरकार के बर्खास्तगी की बाद ही मुल्क को अग्रगमन दिया जायेगा, सभी समस्याओं का हल निकाला जायेगा । इससे स्थिति विस्फोटक और मुठभेड जैसी बनी है । खास कर के पिछले सप्ताह तो नेपाल ठप्प ही रहा । माओवादी आम हडÞताल के कारण मुल्क को अरबांे रुपये का घाटा हुआ है, अर्थतन्त्र मंे भारी नुकसानी हर्ुइ । इस नुकसानी और घाटा से त्राण पाने के लिए सरकार ने कोई कदम नही उर्ठाई है । आगे नहीं बढÞा । आमहडÞताल से देश स्तब्ध था, सरकार कुम्भकर्ण्र्ााी निन्द्रा में सोयी पडÞी थी । आन्दोलनकारी शक्ति माओवादी सडÞक से उसको जगाने के प्रयास में । राजधानी काठमाण्डू के सडÞक लगभग लाल सेना के कब्जे में एक सप्ताह तक रहा, समस्या के अग्रगमन की संभावना तब भी नही निकली, आज भी स्थिति में कोई र्फक नही दिखाई दे रहा हैं ।
माओवादी ने सरकारी सुरक्षा निकायों
-जनपद प्रहरी, सशस्त्र प्रहरी और नेपाली सेना) को संकुचित और निश्चित घेराबन्दी में सीमित रहने को बाध्य कर दिया , अपने आन्दोलन के दौरान । अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासित और संयमित तरीका से आन्दोलन के मोर्चा में लगे रहने का निर्देशन माओवादी नेता देते रहे । सडक में ना“चगान, भाषणबाजी और लाल मार्च होता रहा, सबकुछ शान्तिपर्ूण्ा ही चला । आन्दोलनकारी के इस तरह के शान्तिपर्ूण्ा गतिविधि से माधव नेपाल के नेतृत्व में रहे सरकार और उसके मंत्रियों पर नैतिक दबाव पडा, मुल्क को अग्रगमन देने के लिए । तब वह अनेक षडयन्त्र रचा, आन्दोलनकारियांे को चिढाने के लिए विभिन्न प्रपंच भी । यह काम अतीत में राजमहलों के षडयन्त्र की याद दिलाता हैं, जब राजा अपने संभावित उत्तराधिकारियों के या परिवार के लोगों के खिलाफ जासूसी करता था, ऐसी परिस्थितियों मे ही बाहरी आक्रमणकारी कामयाब रहें । इधर राजा अपनों के खिलाफ के जंग मंे लगे रहे, उधर देश गुलाम होता गया । नेपाल में बढÞ रहा बाह्य हस्तक्षेप का प्रमुख कारण नेताओं के बीच जारी कर्ुर्सर्ीीौर सत्ता का ही खेल तो हैं । शान्ति और संविधान के नाम पर जनता ने बहुत सारे त्याग किये है अब वह और त्याग करना नही चाहती ।
इसलिए तो राजधानी के बसन्तपुर में शान्ति सभा का आयोजन हुआ, रैली न निकालने की बात हर्ुइ थी । स्थिति भयावह बनते देख आन्दोलनकारी माओवादी नेतृत्व एक कदम पीछे हटने का निर्ण्र्ाालिया । अत्यन्त ही सूझबूझ से लिया गया इस निर्ण्र्ाासे माओवादी पार्टर्ीीएक जिम्मेवार’ दल है, पुष्टि हर्ुइ हैं । सरकार जब अपने दायित्व और जिम्मेवारी से विमु्ख होने की घडÞी में होती है तो देश मे शान्ति और अमनचैन कायम करने के लिए आन्दोलनकारियों को भी कभी कभार जनता जनार्दन के पक्ष मंे निर्ण्र्ाालेना होता है । उसका भी जनता के प्रति कुछ जिम्मेदारी बनती हैं, माओवादी ने अपनी जिम्मेवारी निभाया है । सत्ताधारियों को इसे माओवादी की पराजय के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, यदि ऐसा हुआ तो उनके लिए बहुत बडÞी भूल होगी । क्योंकि माओवादियों ने नेपाल के चप्पे-चप्पे में अपने संगठन को बहुत ही मजबूत बनाया हैं । मजदूर दिवस में उसने जो मानवसागर राजधानी में उतारा, अन्य दलों के लिए चुनौती ही नही पाठ भी हैं । सत्ताधारियांे के लिए तो यह सबक लेने के लिए सब से अच्छा अवसर रहा । फिर हफ्ता भर सडÞक पर दालमोट और चूरा खाकर आन्दोलन मंे डटे रहना, कार्यकर्ताओं में परिवर्तन की असीम इच्छा को प्रतिबिम्बित करता है ।
माधव नेपाल को खलनायक बनाने की होडÞबाजी चल रही है, यहा“ । सत्ताधारी कांग्रेस से लेकर नेपाल के अपना ही पार्टर्ीीी उन्हें खलनायक बनाने में जुटा हुआ है । मीडिया भी जाने/अन्जाने में इस अभियान में लगा हैं । इसलिए तो देश को सही अग्रगमन देने के लिए उसके अहम भूमिका गौण होता जा रहा हैं । जेठ १४ र्-मई २८) के बाद नेपाल असंवैधानिक रास्ते में जा रहा हैं , इससे मुक्ति के लिए सभी को एकजूट होकर आगे बढÞना होगा । ऐरीक प|mा“म के ‘मार्केटिंग कैरेक्टर’ -बाजारू चरित्र) को छोडÞ सभी को नेपाल राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्धता के साथ आना होगा । सत्ता में जाकर नवधनाढ्यो की सूची में अपने को शामिल करने के लिए वह ज्यादा उद्यत रहा है । जेठ १४ के बाद की अनिश्चितता के साथ मुल्क को यहा“ के नेता नया“ संविधान देगा या नही यह अन्देशा और संशय भी नेपाली जनता के मानस पटल मंे छाया है । आन्दोलन के नाम पर सिर्फआन्दोलन करने के लिए कोई भी मुल्क नही बना है और न बनेगा । आन्दोलन के बाद विभिन्न नामों से प्रतिकार होता है । जैसे माओवादी आमहडÞताल के दौरान हुआ । वीरगञ्ज में हिन्दूवादी के नाम पर रकम ऐंठकर मुस्लिमों ने माओवादी नेता एवं कार्यकर्ताओं पर आक्रमण किया । राजधानी से सटे सतुंगल कश्वे में आन्दोलन के विरुद्ध में जनता के नाम पर सत्ताधारियों के लठैतों को उपयोग किया गया । और भिडन्त की स्थिति सृजित हर्ुइ, यह किसी से छुपा नहीं है । मुल्क गतिहीन बना है, मधेशवादी दल चीर निन्द्रा मंे है, उससे न कोई प्रतिक्रिया आती है न कोई वक्तव्य । जैसे लग रहा कि नेपाल उसका देश ही नहीं है । मधेशवादी दल मधेश और मधेशियों को बहुत धोखा दिया है, अब यह बर्दाश्त नहीं करेगी जनता । इसलिए उसे सही समय में सही निर्ण्र्ााकर देश को सही अग्रगमन देने के लिए अहम भूमिका निर्वाह करना ही होगा । विषम परिस्थिति मंे देश के लिए, जनता के लिए नही बोलने वाले नेताओं को माफी नहीं मिला है, इसकी पुष्टि इतिहास के कालखण्ड ने बहुत पहले ही कर चुका है ।

शूटर अपराधियों की लाट“री::आनन्द राय

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

Anand rai  Blackcopyनेपाल में सफेद कारोबार की आड में काला धंधा करने वाले बदनाम लोगों की जान के लाले पडे, तो सटीक निशाना साधने वालों की कीमत बढÞ गयी । दिलचस्प यह है कि शूटरों की बोली लग रही है और सुपारी की जगह बाकायदा उनकी पगार तय की जा रही है। इस बदलाव से नेपाल में शरण लेने वाले भारत के भगोडे अपराधियों की लाटरी लग गयी है । नेपाल में हाल-फिलहाल दागी पृष्ठभूमि के कई नामचीन मारे गये । माजिद मनिहार, परवेज टाण्डा, जमीम शाह, अरूण सिंघानियां जैसे लोगों की हत्या के बाद नेपाल की काली दुनिया में खौफ पैदा हो गया । सबने अपने लिए सुरक्षाकर्मियों की तलाश शुरू कर दी । सुरक्षा के लिए प्राथमिकता में भारतीय भगोडेÞ हैं । वजह यह है कि नेपाल में हाल फिलहाल जितने लोग मारे गये उनकी हत्या के पीछे भारतीय अपराधियों का ही नाम आया । इसके पीछे तर्क है कि सुरक्षा में भारतीय अपराधी रहेंगे तो न केवल वे सामने वाले दुश्मन की पहचान कर सकेंगे बल्कि जवाब भी देने में सक्षम होंगे । शूटरों का लाभ यह कि मोटी पगार के साथ नेपाल में पनाह मिलेगी और समय पर अपने मुल्क में वापसी भी हो सकेगी । दो पुलिसकर्मियों की हत्या करके भागे हुए नीरज के बारे में एसटीएफ का अनुमान है कि वह इसी सुविधा के चलते नेपाल चला गया है । बताते हैं कि १९९५ में वर्चस्व की लडर्ई में मारे गये ब्लाक प्रमुख सुरेन्द्र सिंह के अपराधी बेटे सुधीर सिंह ने नेपाल में अपने पिता के हत्यारे कुख्यात माफिया परवेज टाण्डा की हत्या में सक्रिय भूमिका निभायी । इसके बाद वहां उसका प्रभाव बढ गया । उसकी संस्तुति पर अपराधियों को नेपाल में काम मिलने लगा है । कभी मिर्जा के समानांतर वाहन चोरी के एक धंधेबाज की जान पर बन आयी तो उसने भी फरवरी माह में पर्र्वी उत्तर प्रदेश के दो शूटरों को अपने यहां पगार पर रख लिया । वे किसी भी तरह पैसे जुटाकर अपने शरणदाता को देते थे । इस धंधे को यूनुस अंसारी और उसके पिता ने शुरू किया । बताते हैं कि उसके यहां पनाह लेने वाले सिकंदर उर्फताउर्रहमान, मुन्ना बजरंगी जैसा ने तो सुरक्षित ठहरने के बदले में लाखों-लाखों रुपये अदा किये । छोटे लोगों के यहां पनाह लेने वाले छुटभैये अपराधी तो अब तक किसी तरह अपना खर्चा जुटाते थे । अब दागी लोगों की सुरक्षा के बदले पगार पाने से उनकी भी दुकान चल निकली ।

गाली नायक, ताली नायक “महानायक”::राजेन्द्र थापा

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

RajendraThapaनेपाल में सब से ज्यादा गाली किस को मिला – गिरिजाबाबू को । सब से ज्यादा ताली किस को मिला – गिरिजाबाबू को । सब से ज्यादा कार्टर्किस का – गिरिजाबाबू का । रंगमंच पर सबसे ज्यादा केरीकेचर किसका – गिरिजाबाबू का । संचार माध्यम और चाय की दुकान पर सबसे ज्यादा आलोचना और चर्चा किस की – गिरिजाबाबू की ।  राष्ट्रीय स्तर का ज्यादातर घटनाएं, दर्घटनाएं, काण्ड, सफलता, असफलता इत्यादि में प्रत्यक्षः और अप्रत्यक्षः किस का नाम जोडा गया है – जबाब वही अर्थात हमारे गिरिजाप्रसादजी की ।
राजनीति के हक में भी उनके बारे में ऐसे ही सवाल उठाया जा सकता है । परिवारवाद राजीनीति की हद किस ने पार की -  सत्ता के लिए कुछ भी करनेवाला कौन – र्सवमान्य लौहमानव गणेशमान को रूला कर पार्टीडने के लिए विवश किसने बनाया – किसुनजी को राजनैतिक अवसान किस की अन्तर्घर्की वजह से हुआ – एक झटके में राजा और हिन्दू धर्म को किस ने क्षितिज के उस पार गायब किया -  अर्थात नाम एक काम अनेक यानि की वही  र्सवशक्तिमान गिरिजाप्रसाद । मरे हुए के बारे में बुरी बात नही किया जाता, पर गिरिजाबाबू में अवगुण की खानी थी, उनकेे के लिए  किसुनजी अर्थात उनके संगी कृष्णप्रसाद भट्टर्राई ने ऐसी टिप्पणी की है, गिरिजाबाबू के सारे अवगुण उनके संग ही आर्यघाट में जल कर विलीन हो चुके हैं ।
इसी सिलसिले में ऐसे बहुत नकारात्मक सवाल भी इसी तरह पूछे जा सकते है । अपनी बहुमत की सदन किसने उडाया – अपनी ही दल के नेता शेरबहादुर की सरकार किसने
गिर्राई – पार्टीीोडने का षडयन्त्र किसका था – बडे दल एमाले की सरकार गिरा के राजीनिति में अस्थिरता का प्रवेश किसने कराया – सदन को अंकगणितिय मण्डली के रूप में किसने परिणित कराया और हर पार्टीडने में किस का हाथ रहा – जबाब की जरूरत नही ।
माओवादी के संबन्ध में जनयुद्ध के प्रारंभ, विकास, उत्कर्षा तथा विर्सजन तक हर पहलु पर उन्हीं का ही नाम जोडा जाता है । सशस्त्र द्वन्द को गंभीरतापर्ूवक न लेकर सत्ता राजनीति में ज्यादा लीन होने के कारण ही इतना जल्दी सशस्त्र व्रि्रोही शक्ति विकसित होने का आरोप के साथ-साथ, फिर वही माओवादी संग गला जोड के उसको यहां तक ले आने में भी नाम तो उन्हीं का लिया जा रहा है । और जनता भी देश की अशान्ति की जिम्मेदार और शान्ति के संवाहक भी वही एक व्यक्ति को ही मान रही हैं । ये अजीबोगरीब चमत्कार भी गिरिजाबाबू के अलावा और कर भी तो नही कोई सकता ।
राजसंस्था द्वारा सबसे अधिक लांछित इन्हीं गिरिजाप्रसाद ने ही ४६ साल और दरबार हत्याकाण्डÞ में भी राजसंस्था की सुरक्षित अवतरण कराया, अलबत्ता राजा की समाप्ति भी इन्हीं की हाथों से हर्ुइ । और राजगद्दी छीने हुए राजाआंे को गेंद बनाने की प्रचलन के विपरीत, इन्हीं के बदौलत पर्ूवमहाराज अभी भी वही राजसी शानो-शौकत के साथ नागार्जुन दरबार में विराजमान हैं । राजमाता को भी मिला दरबार मंे ही अपने पुराने महल में ही आलीशान जीवन व्यतीत का अवसर ।
१७ साल से ४६ तक कांग्रेस के हाथांे हुए हाइज्याकिंग या ओखलढुंगा काण्ड जैसे हर उग्र या सशस्त्र गतिविधि में भी नाम इन्हीं का लिया जाता है । आन्दोलन, व्रि्रोह, क्रान्ति, विपक्षी सरकार गिराना, अपनी ही सरकार को  गिराना से लेकर हर किस्म के गिराने, पे+mकने, जलाने और बुझाने या उलझाने और सुलझाने मंे भी वही एक आदमी यानि की गिरिजाबाबू ।
फिर भी घूमाफिरा कर उनके हर कर्मो के पीछे उनका  निजी स्वार्थ और सत्ताशक्ति लोलूपता की ही चर्चा चलती है । सत्ता से विमुख होने के कारण ही हर्ुइ दिल्ली समझौता, या त्रिपक्षीय समझौता या अन्तरिम संविधान कही भी तो गणतन्त्र की बू तक नही थी । जिस संस्था ने उनको बार-बार लात मारा, उसी राजसंस्था बचाने के लिए सेरेमोनियल किंग, अर्नामेन्टल किंग और बेबी किंग तक की अवधारणा लाने वाले यही गिरिजाप्रसाद ने  राष्ट्रपति केे पद साथ गणतन्त्र की मोल-मलाई कर क्रान्ति से भी हटाना नामुमकिन राजसंस्था को एक चुटकी में राष्ट्रपति पद के साथ अदला-बदली करने का आरोप भी है ।
पर गणतन्त्र की चेक कैश करने के बाद इनको राष्ट्रपति बनाने की वचन से जब माओवादी मुकर गए, इन्होंने अपनी मनपसन्द आदमी को राष्ट्रपति हीं नही बनाया, अत्याधिक बहुमतवाले वाम गठबंधन में तोडÞफोडÞ के साथ मधेशी दलों की लग्नगांंठ को भी
कर्ुर्सर्ीीकी एक छोटी-सी अन्तरद्वन्दात्मक नस्तर चला कर निर्ण्ाायक शक्ति से परे ढकेल दिया । इतना ही नहीं, प्रथम दल के हाथों से सारे बडÞे पद छीन के अन्य दलों में इन्होंने बांट दिया ।
बिना चुनाव में भाग लिए, स्वतः खुद को प्रधानमन्त्री में स्थापित करने की लक्ष्य से प्रजातान्त्रिक मर्यादा के विपरीत मनोनीत भी प्रधानमन्त्री बन सकने की धारा इन्होंने समावेश किए थे । उसी का नतीजा है माधवकुमार नेपाल और आज की समस्या का कारक तत्व । और साथ ही खुद को स्थायी प्रधानमन्त्री में टिके रहने के उद्देश्य से दो-तिहाई मत से ही प्रधानमन्त्री को हटा सकने की व्यवस्था की । और जब चुनाव में माओवादी की अप्रत्याशित जीत के बाद नये सदन के निर्माण होते ही नये सदन से ही सरकार बनने की प्रजातान्त्रिक पद्धति के विपरीत, उन्होंने विजेता माओवादी को दो-तिहाई दिखा के, सरकार बनाने की चुनौती दे कर, सरकार में करीब चार महीने तक चिपके रहे । माओवादी को गद्दी देने से पहले करीब उन्होंने दो-तिहाई की जगह बहुमत अर्थात ५१ प्रतिशत की धारा रख कर, माओवादी की सरकार बनने से पहले ही गिराने की व्यवस्था की । उसी के वजह से माओवादी की सरकार टूट गई, और ५१ प्रतिशत की उपयोग करके हारे हुए माधवकुमार और तीसरे दल को सरकार का नेतृत्व दे दिया ।
पहले दल के जगह पर प्रजातांन्त्रिक हिसाब सेे दूसरा दल के नेतृत्व में सरकार बनना था, पर किसी भी तरह वाम एकता को तोडÞना और मधेशी शक्ति को ट्रम्प कार्ड बनने से रोकना था, और साथ ही माओवादी के आक्रमण की वजह से आगामी सरकार की आयु ज्यादा न होने की अनुमान भी थी, और यही रणनीति के तहत उन्होंने बनाई थी, माधव की सरकार सिर्फ कुछ अवधि के लिए । और उनके सोच के मुताबिक ही तुरन्त अस्थिरता शुरू हर्ुइ थी, पर उनके स्वास्थ्य की कमजोरी के कारण वह विकल्प नही दे सके और बन गई देश की यह हालत । यही है सत्ता, सदन और सडÞक की संर्घष्ा की दर्दनाक कहानी ।
पर, गिरिजाप्रसाद की दर्जनों नकारात्मक फेहरिस्ते, कांटे की एक तरफ, और देश तथा जनता के ऊपर उनके किए हुए, एक या दो कामों के  तौल दूसरा पलडा पर रखते ही गिरिजाबाबू का पलडÞा भारी हो जाता है । यही है चमत्कार गिरिजाप्रसाद का ।
आज आम आदमी त्रसित है, परिवर्तन से लायी हर्ुइ अन्धकार की वजह से । और वह मरे हुए गिरिजाप्रसाद को खोज रहे है, इस सुरंग की अंधेरे से बाहर निकल जाने के लिए, क्योंकि इन जिन्दा नेताओं पर अब किसी को भी रती भर भी विश्वास ना रहा । और जब जिन्दों के बारात छोडÞकर लाश पर आशा जा कर टिकने की नौबत आती है तब गिरिजाबाबू के तौल कितना भारी है जनमन में, समझना कोई मुश्किल नही ।
याद रहे, एक युग में एक  ही गिरिजाप्रसाद का जन्म होता है, और बहुत सारे खामिया होने के बावजूद भी वह शख्स एक इतिहास को पकडÞ के  पिंजरे में बन्द कर देता है, और नया इतिहास रच कर कहता है, “मै जो कहता हूं वो करता हूं, और जो नही करता, वो मै नही कहता हूं ।
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सुलगता जनकपुर

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

daजनकपुरधाम-नेपाल का धार्मिक-सँास्कृतिक नगर आजकल विविध कारणों से चर्चा का केन्द्र बनता रहता है । वह भी विवादित क्षेत्र के रूप में ।पिछले वर्षपत्रकार एवं रेडियोकर्मी उमा सिंह की हत्या से समूचा जनकपुर हिल उठा था ।वही इस वर्षहोली के दिन ही संचार उधर्मी अरुण सिंघानिया की जघन्यपर् हत्या ने न केवल जनकपुर को ही वरन् सम्पर् देश को स्तभ्भ कर दिया ।
जनकपुरधाम जहाँ माता जानकी और भगवान राम जी परिणय सूत्र में बँधें थे यह केवल दो व्यक्तिों के बीच का बन्धन नहीं था ब्लकि यह तो दो देशों ,दो संस्कृतियों तथा दो राजवंशों का मिलन था जिसकी परम्परा आज भी निभती आ रही है ।इसी परम्परा को निभाने आये थे वे दो युवक-युवती भारत से इस पवित्र नगरी में । भारत के बिहार राज्य के मधुबनी जिला के लहेरियागंज की एक मुस्लिम युवती और एक हिन्दू युवक ।ये लोग अपने परिवार एवं समुदाय के डर से भाग कर इस आशा से जनकपुर पहुँचं कि जनकपुरधाम उनके अरमानों को मंजिल तक पहुँचायेगी ।मन में अपार उमंग लिये ये पहुँचें जानकी मंदिर के विवाह मंडप में ,जहाँ माता जानकी तथा भगवान राम जी का विवाह हुआ था । उसी मंडप में इन दोनों ने अपनी विवाह की रस्में पूरी की । उसके पश्चात रात बिताने के लिए ये दोनों पास के एक लाँज में चले गये । कुछ समय पश्चात विशेष सुरक्षा नीति के तहत तहकीकात करने आए रेलवे पुलिस चौकी के पुलिस निरीक्षक बाबू राम झा ने इन दोनों को धर दबोचा ।उनदोनों को पुलिस स्टेशन ले आया और युवक को हवालात में बंद कर दिया तथा युवती को यह कह कर अपने क्वार्टर ले गया कि तुम वही चलकर रात बिताओ सुबह देखा जाएगा ।वहाँ ले जा कर लडकी के साथ रात में दो बार अपना मुँह काला किया ।
सुबह डरा-धमकाकर लडकी को युवक के साथ भेज दिया ।डरी सहमी लडकी अपने पति के साथ बिहारी लाँज में पहुँचीं ।वहाँ उसने र्सइ द्धारा बलात्कार की जानकारी दी ।लडकी की स्थिति देखकर आस-पास के स्थानीय लोग और कुछ पत्रकार इकठ्ठा हो गये । पत्रकार ने जब इस घटना की सही जानकारी पुलिस प्रमुख से जानने स्टेशन पुलिस चौकी पहुँचे तो वहां उन्हें झटक दिया गया और इस मामले से दूर रहने को कहा गया ।फलतस् ये लोग कुछ स्थानीय लोगों के साथ मिल कर पुलिस चौकी में पर््रदशन करने पहुँचे । पर््रदर्शन में विभिन्न दलों के स्थानीय कार्यकर्त्तर् भी सहभागिता थी । ठीक उसी समय धनुषा के प्रहरी उपनिरीक्षक श्याम खडका पहुँचे और पर््रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज का आदेश दे दिया । जिससे उत्तेजित र्सवसाधारण की ओर से पुलिस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया । इसके पश्चात तो पुलिस-स्टेशन युद्ध स्थल बन गया । पुलिस की लाठी प्रहार से आठ साल के बच्चें क्या अस्सी साल के बुढा भी नहीं बच पाया । संचारकर्मी और पत्रकार भी नहीं बच पायें उसी दिन धनुषा के सभासद् और सरकार के भौतिक योजना तथा निर्माण राज्य मंत्री संजय साह एक कार्यक्रम में सहभागी होने धनुषा आये थे घटना की जानकारी पाते ही वे वस्तु-स्थिति की जानकारी लेने स्टेशन पुलिस चौकी पहुँचंे । उन्हें भी पुलिसिया दर्ुर्व्यवहार का सामना करना पडा । साथ ही उन्हें इस घटना को तुल न देने की भी हिदायत दी गई ,लेकिन राज्य मंत्री संजय साह वापस जाने के बजाय अपने सहयोगियों के साथ वहीं धरना पर यह कह कर बैठ गये कि जबतक घटना की सही जानकारी नहींं उपलब्ध कर्राई जाएगी और दोषियों को सजा नहीं दी जाएगी तब तक वे धरना पर बैठें रहेगें । उनके साथ मातृका नेतृत्व के माओवादी की ओर से साधु यादव, फोरम लोकतांत्रिक के ओर से जिला अध्यक्ष उमाशंकर अरगंरिया, व्यापारी पवन झा धरना पर बैठें रहे । धरना पर बैठने के आधा घंटा पश्चात सी.डी.ओ. आ धमकें और उनलोगों को धरना पर से उठने को कहा, न मानने पर प्रहरी निरीक्षक आभूषण तिम्सिना ने धरना पर बैठे नेताओं और व्यापारियों की जमकर पिर्टाई कर दी । यहाँ तक राज्य मंत्री तक को भी नहीं छोडÞा गया । उनके ऊपर भी बंदूक तान कर धरना पर से उठने को कहा गया । राज्य मंत्री और धरना पर बैठे लोगों के साथ दर्ुर्व्यवहार की जानकारी जब धनुषा की जनता को मिली तो वे आक्रोशित हो उठें उसके पश्चात् जनता ने पुलिस चौकी में आगजनी करने का भी प्रयास किया । गृह मंत्री के आश्वासन के पश्चात ही राज्य मंत्री धरना पर से उठें । श्ानिवार के दिन पर््रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच भिडन्त हर्इ जिसमें दर्जनों राउंडÞ गोलियों का बछौर किया गया ,साथ ही रबर की गोली और आँसू गैस भी छोडा गया । चैती छठ के श्रद्धालुओं को भी नहीं छोडÞा पुलिस ने । इस दौरान पत्रकारों को खोज-खोज कर पिर्टाई की गई जिनमें से तीन पत्रकार बुरी तरह से घायल हुए ।उन्हें उपचार हेतु काठमांडू ले जाया गया । दो सौ पचास से ज्यादा र्सवसाधारण जनता भी घायल हर्ुइ । जनकपुर की जनता अपने सभासद् के साथ दर्ुर्व्यवहार, एक युवती के साथ बलात्कार तथा दोषी पुलिस को संरक्षण देने के कारण काफी आक्रोशित हो उठी । इस घटना से चार दिनों तक जनकपुर तनावग्रस्त रहा । बंद का भी आयोजन भी किया जो कि अभर्ूतपर्ूव रहा ।
शनिवार के दिन र्सवदलीय और र्सवपक्षीय बैठक में गृह मंत्री के इस्तीफा, प्रमुख जिला अधिकारी वेदबहादुर कार्की के निलम्ब्ान प्रहरी उपनिरीक्षक आभूषण तिम्सिना तथा बलात्कार के आरोपी प्रहरी नायब निरीक्षक बाबू राम झा को बर्खास्त करने की माँग की गई ।
इसी बीच र्सवदलीय जनपरिचालन समिति ने बैठक कर निर्ण्र्ााकिया कि हिन्दूओं के पर्व रामनवमी तथा एस. एल. सी परीक्षा के कारण पच्चीस गते तक आन्दोलन स्थगित रखा गया ।
एक अपुष्ट खबर के अनुसार बलात्कार के शिकार युवती-युवक को राजधानी में लाकर उनपर दबाव डाला जा रहा है बयान बदलने के लिये । अब देखना यह है कि इस मामले में दोषियों को सजा मिल पाती है या अन्य मामलांे की तरह इसे भी दबा दिया जायेगा ।
खखख

अस्थिर राजनीति न सरकार !::लक्ष्मी नारायण चौधरी

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

laxmi narayan chauमाउन्ट एवरेस्ट का उत्तरी भू-भाग चीन का है और यह मान्यता चीन सरकार की है । इस मानसिकता को निरन्तरता देने के लिए मौसम सूचना केन्द्र की स्थापना और तिब्बत के गतिविधि पर ध्यान रखने हेतु चीन ने संयन्त्र स्थापित किया और इसकी जानकारी नेपाल सरकार को भी देना जरुरी नहीं समझा जो उसके विस्तारवाद का प्रतीक है । परन्तु इस विस्तारवादी कदम का न तो सरकारी स्तर पर विरोध हुआ और न नेपाल का कोई राजनीतिक दल या कोई राष्ट्रवादी, स्वाधीनता प्रेमी नेपाली नेता ने ही विरोध करने का साहस किया । अभी जो दल चीनी सरकार प्रजातन्त्र का पोषक हैं, कहते नहीं थकते वह क्यों भूल गए कि सन् १९६२ में प्रजातन्त्र का दमन करने के सहयोग के उपलक्ष्य में राजा महेन्द्र ने चीन को एवरेस्ट का उत्तरी भू-भाग उपहार स्वरूप दिया था तो उसका विरोध कोई नहीं करता परन्तु बिना तथ्य और पुष्टि के बी.पी. ने गण्डकी और मातृका ने कर्ण्ााली भारत को बेंच दिया बोलकर र्सवत्र चर्चा और विरोध करनेवाले ‘टिष्टा से काङ्गडा तक नेपाल की बातें करनेवाले तिब्बत का भोटे तक नेपाली सीमा और केरुङ्ग-कुन्ती थापाथली’ जैसे असमान संधि का पुनरावलोकन की मांग क्यों नहीं करते । चीनी सीमा पर कही-कही जैसे मानसरोवर पर नेपाली जनता के साथ चीनी सैनिक द्वारा किए गए दर्ुर्व्यवहार और हाथा पाई की घटना नेपाली नेताओं की नजर में स्वतन्त्रता और स्वाभिमान के उपर प्रहार न होते हुए प्रेम जैसा प्रेरित होता है । यहाँ तक कि हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी भी चीन-नेपाल सम्बन्ध को समस्या रहित कहते नही थकते । अतिक्रमण का पराकाष्ठा देखिए दोलखा का लामाबगर स्थित उत्तरी सीमा स्तम्भ नं. ५७ के पास चीन-नेपाली सीमा विवाद देखा गया था तो उस जगह से सीमा स्तम्भ ही गायब हो गया अर्थात् ‘न रहेगी बाँस न बजेगी बाँसुरी’ दूसरी तरफ भारत-चीन सर्ंदर्भ में जाने-अनजाने, धार्मिक-सांस्कृतिक, आपसी-प्रेम की तरह वहाँ के स्थानीय जनता के कारण कहीं(कहीं सीमा विवाद देखा गया, परन्तु इसमें भारतीय पृष्ठभूमि, अतिक्रमण का उद्देश्य या राजनीति स्वार्थ की पुष्टि नहीं मिलती है । जैसे पाकिस्तान में राजनीति करने के लिए भारतीय को गाली देना ही पडÞता है, कहीं यही सभ्यता तो हमारे नेपाली नेताओं में उत्पन्न तो नहीं हो रही है – ऐसा मधुर परापर्ूव काल चला आ रहा संबन्ध जिसकी नींव गौतम बुद्ध और सीता माता ने रखा था, उस पर क्यों घृणित राजनीति की जा रही है । हर राजनीति गतिरोध के समाधान के लिए भारत की मध्यस्थता खोजनेवाले कभी-कभी आन्तरिक राजनीतिक समस्या की वजह से भारत में आश्रय लेनेवाले भी जनता के समक्ष दोहरी प्रवृत्ति दिखाते हुए लाच्छन, साम्प्रदायिकता भडÞकाऊ भाषण करना कौन सी प्रवृत्ति का सूचक हैं – ऐसा नहीं है तो, जिस देश के साथ ‘रोटी और बेटी’ का सम्बन्ध है तो क्यों दक्षिणी भू-भाग मंे १ फीट भूमि ऊपर, ऋत्विक रोशन, माधुरी दीक्षित जैसे सिर्फएक कलाकार की टिप्पणी जिसका न तो कोई अर्थ है नहीं कोई पुष्टि के कारण संपर्ूण्ा देश में हाय, तौबा, तोडÞ-फोडÞ, हिंसा और आगजनी करनेवाले, अपने आपको वीर गोरखाली कहलाने वाले राष्ट्रवादी मिडिया, राजनीतिज्ञ और नागरिक समाज इतने बडेÞ चीनिया षडÞयन्त्र और विस्तारवादी कदम का विरोध क्यों नहीं करते हैं । एक तरफ चीनिया राजदूतावास को आन्दोलन रहित घोषित करती है तो दूसरी ओर भारतीय दूतावास का घेराव होता है । इस पर सरकार ही नहीं बल्कि मधेशी दल भी मौन रहते हैं । ये सब प्रकरण दोनों देशों के संबन्ध में खटास ला सकता है जो कि अभी के संक्रमणकालीन स्थिति में दर्ुघटना का कारण हो सकता है । एक बार फिर से पृथ्वीनारायण शाह का भारत-नेपाल-चीन संबन्ध सर्ंदर्भ में दिया गया दिव्य उपदेश को आत्मसात करना होगा जिससे भारत-नेपाल संबन्ध और मजबूत होगा । सीमा विवाद पडÞोसी देश में देखा जाता है परन्तु, उस विवाद को सुलझाने के लिए रोडÞ पर आन्दोलन करना, सांप्रदायिकता फैलाने एवं भडÞकाऊ भाषण करने के बजाय राजनीतिक दायरे मे रहते हुए भारत-चीन दोनों देशों के साथ आपसी समझदारी के साथ पहल करना होगा । अन्ततः अभी हम सभी नेपाली जनता को संविधान की आवश्यकता है जिससे, दण्डÞहीनता एवं अराजकता का अंत करते हुए देश में शांन्ति और उन्नति की स्थापना होगी और देश का भविष्य उज्ज्वल होगा । खखख

धर्मनिरपेक्षता पर बवाल:: दिनेश यादव

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

dinesh photoनेपाल में नया“ संविधान जारी होने का निर्धारित तिथि जितनी नजदीक आती जा रही है, उतनी ही राजनीतिक अनिश्चिता और अस्थिरता बढने का अन्देशा लोगों में बढ रहा हैं । यहा“ के राजनीतिक “ इन अन्देशाओं को पहचानने को तैयार नही दिख रहीं हैं । वह कभी राजनीतिक संयन्त्र मं अटक जाते हैं तो कभी ‘संक्षिप्त संविधान’ जारी करने की बात कर के जन-जन में सिर्फभ्रम पैदा कर रहे हं । नेपाल के लोकतान्त्रिक आन्दोलन के शिखर पुरुष एवं पर्व प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोईराला के निधन से तो समस्या और गहराने की संभावना बढÞ गई है । संविधान निर्माण प्रक्रिया दिन प्रति दिन जटिल होती जा रही है । नियत समय में संविधान बनेगा या नहीं, देश मं जारी शान्ति प्रक्रिया र्सार्थक गति लेगा या नहीं, इस तरह के अनेक सवाल लोगों के मानसपटल पर खडे हो गए हैं । क्योंकि नया“ संविधान को अन्तिम रूप देने के लिए संविधानसभा में विवादित मुद्दांे पर वृहत विचार-विमर्श अभी तक नहीं हो पाई है । वैसे ही विभिन्न आन्दोलनरत पक्ष से विगत में किये गये समझौताओं में से एक भी बिन्दु को संविधान में शामिल करने पर आज के तिथि तक कोई बात नहीं हो पाई है । उधर मधेश के ढेÞर सारे मूलभूत् मुद्दा, दलित, अल्पसंख्यकों की मा“ग बारुद के गोला की तरह दिखाई दे रहा है, उसे संबोधन करने की जरूरत अभी तक सरकार महसूस नहीं कर पायी हैं । तीन प्रमुख दल -कांग्रेस, एमाले और माओवादी) अपने-अपने राजनीतिक ब“टबारे में तल्लीन है, मदहोश हैं । सत्ता से बाहर रहे कुछ राजनीतिक दल सहित विभिन्न धार्मिक और जातीय संघ/संगठन आन्दोलन के मूड बना रहे हैं । कहा जाय तो उनमंे से कुछ ने तो आन्दोलन शुरू भी कर चुके हैं । कभी नाम भी नहीं सुना समूह ‘भीष्म एकता परिषद्’ के द्वारा मार्च २२ को पश्चिम नेपाल बन्द किया गया, जो सफल भी हुआ । हिन्दू राष्ट्र के पक्ष में वकालत करने वाला उस संगठन को अभी भी ‘भूमिगत’ ही कहा गया है । परन्तु यहा“ के ‘बडा समूह’ का अप्रत्यक्ष संरक्षण और र्समर्थन के कारण उसे यह सफलता मिली हैं ।
कुछ सप्ताह इधर नेपाल में धार्मिक चहल पहल बढा हैं । राजावादिओं की भी सक्रियता बढी है । पर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र शाह भी धार्मिक स्थल के भ्रमण के नाम पर नागरिकों के साथ घनिष्टता बढÞाने के कोशिश में हैं । पशुपति क्षेत्र के बनकाली में आयोजित नौ दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान हो या फिर रामनवमी के अवसर पर जनकपुर के मठ मन्दिर में जा कर पूजा करने की बात हो, पर्व राजा की उपस्थिति और उनसे मिलने वाले लोगांे के प्रकृति का विश्लेषण किया जाय तो नेपाल में वितन्डा मचने की संभावना को नकारा नही जा सकता हैं । कुछ ‘अतिवादियो’ द्वारा धर्म के नाम पर विभिन्न व्यक्तियां को एकाकार कर नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की अभियान शुरू किया गया है, जिसे नेपाल में गडबडी फैलाने के लिए प्रथम चरण के तैयारी कहा जा सकता है । इसी क्रम में हिन्दू राज्य के मा“ग करने वालों का एक जमात सारेआम दिखाई देने लगा है ।
खासकर के अपने को राजावादी कहना पसन्द करने वाला राष्ट्रीय प्रजातन्त्र -राप्रपाने) के मुखिया कमल थापा तो हिन्दू राष्ट्र के मा“ग को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाकर आगे बढ ही रहे हैं । इस अभियान में नेपाली कांग्रेस के प्रभावशाली नेता एंव नेपाल सरकार के पर्व गृहमन्त्री खुमबहादुर खडÞका भी जुट गए हैं । उन्होंने पशुपति क्षेत्र में कालीबाबा के उपस्थिति मे आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में पर्व राजा ज्ञानेन्द्र के साथ हिन्दू राष्ट्र के ‘पर्ुनस्थापना’ के विषय मंे गम्भीर विचार-विमर्श किया है । नेपाल के मीडिया ने इसे खूब जोर शोर-शोर से उछाला भी हैं । खडÞका द्वारा ‘नेपाल को हिन्दू राज्य ही होना चाहिए और पर्ूव राजा एक आम नागरिक बनने के कारण उनसे मिलना कोई आर्श्चर्य की बात किसी को नहीं माननी चाहिए’ कहा जाना अर्थपर्ूण्ा हैं । उनके इस आशय को प्रबुद्ध एवं बुद्धिजीवी पाठक को समझाने की जरूरत भी पडेगी, ऐसा नही लगता ।
इसी प्रकार नेपाली कांग्रेस के ही ‘दिग्गज’ नेता एव पर्ूव सांसद शंकर पोखरेल भी हिन्दू राष्ट्र के अभियान मंे जुट चुके हैं । उनके ही संयोजकत्व में ‘राष्ट्रिय धार्मिक जागरण अभियान -राधाजाअ)’ नामक धार्मिक संगठन का गठन हाल ही में किया गया है । यह संस्था नेपाल में धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर फिर से हिन्दू राष्ट्र कायम कराने के मुहिम छेड चुका हैं । इस संगठन में यहा“ के प्रमुख तीन दलों के नेता/ कार्यकर्ताओं से लेकर मधेशवादी दलों के कुछ सांसद भी सक्रिय है । तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर् सभासद् विमल केडिया इस संगठन का महासचिव बने हैं । इसी पार्टर्ीीे हृदयेश त्रिपाठी को ‘जनसर्म्पर्क’ अभियन्ता के रूप में अप्रत्यक्ष सहयोग लिया जा रहा हैं । मीडिया रिपोर्ट अनुसार राधाजाअ ने नेपाल के नये संविधान जारी होने से पहले और जेठ के प्रथम सप्ताह में राजधानी काठमांण्डू में पचास हजार से ज्यादा लोगो को उतारने का ऐलान कर चुका हैं । इसके लिए तैयारी भी शुरू हो चुकी हैं । इस तैयारी मंे पर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र के सुपुत्र पारस का प्रत्यक्ष संलग्नता है -जनदिशा दैनिक, २०१० मार्च १७) । अभियान के सदस्यों मं शिक्षण अस्पताल महाराजगंज मंे कार्यरत रेडियोलोजिस्ट डा.उमेश खनाल, बल्खु मंे आश्रम संचालन कर रहे शम्बुद्धदेवजी महाराज, नेपाल जनता पार्टर् सचिव खेम आचार्य और हिन्दू राष्ट्र संरक्षक संघ के अध्यक्ष रमेश क“डेल भी हैं । बताया जा रहा हैं कि इस अभियान के आर्थिक संकलनकर्ता में पर्ूव गृहमन्त्री तथा राजा के शासनकाल में बार-बार मन्त्री बने कमल थापा हैं । अभियान के एक सदस्य के मुताबिक हिन्दू राष्ट्र के पुनर्स्थापना के हमारे मुहिम में उपराष्ट्रपति परमानन्द झा, वर्तमान सरकार के उपप्रधानमंत्री एवं भौतिक योजनामन्त्री विजयकुमार गच्छेदार, रक्षामन्त्री विद्या भण्डारी और एमाले के प्रभावशाली नेता केपी शर्मा ओली का भी सहयोग प्राप्त हैं । रामनवमी के अवसर पर मार्च २४ को राजधानी में एक धार्मिक संगठन के द्वारा आयोजित कार्यक्रम मंे गच्छेदार ने स्पष्ट शब्दांे में कहा कि नेपाल में हिन्दू राष्ट्र के स्थापना अपरिहार्य है, इसके लिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति सहित सभी को लग जाना चाहिए -इमेज एफएम, आठ बजे रात के समाचार बुलेटिन, २४ मार्च, २०१०) । उनके इस आशय के वक्तव्य से यही पुष्टि होती है की वह हिन्दू राष्ट्र स्थापना के लिए सक्रियता के साथ लग चुके हंै । सूत्र के मुताबिक उपप्रधानमन्त्री गच्छेदार को कुछ सप्ताह पहले भारत के प्रभावशाली हिन्दूवादी नेता ने बुलाकर इसी मुद्दें पर आगे बढÞने का निर्देशन दिया हैं । उधर, उपराष्ट्रपति झा के द्वारा तर्ीथाटन के बहाने भारत जाने का उद्देश्य भी हिन्दू राष्ट्र के लिए धार्मिक र्समर्थन जुटाने का ही था । वह तो मीडिया में भी खुलकर कह चुके है कि नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्र होना चाहिए ।
राजधानी सहित देश के विभिन्न स्थानों में धार्मिक प्रवचन और कार्यक्रमों की एक श्रृंखला सी चल पडी हैं । अधिकांश में नेपाल को हिन्दू अधिराज्य घोषणा करने के लिए सभी से सहयोग की अपील किया जा रहा हैं । इनमंे से सबसे चर्चित है चन्द्रास्वामी महाराज और पशुपति क्षेत्र में यज्ञ सम्पन्न किया कालीबाबा । पशुपति क्षेत्र में यज्ञ संचालन के समय पर्ूवराजा ज्ञानेन्द्र और पर्ूव गृहमन्त्री खुमबहादुरका भेंट एक संयोग तक सीमित नही था, अभियान के तहत ही यह मिलन हुआ । कालीबाबा काठमाण्डू में ही थे, तभी डिल्लीबजार के एक होटल में हिन्दूवादीयों का गोप्य बैठक और प्रशिक्षण हुआ । इसमें नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषणा करने के लिए कोई कसर बा“की न रखने की कसम खाई गई है । उस बैठक और प्रशिक्षण में नेपाल के सतारुढ दल सहित कुछ मधेशवादी दलों के वरिष्ठ नेता, पुलिस, सेना, पत्रकार, चिकित्सक, वकिल की भी उपस्थिति रहने की बात एक सहभागी ने बताया । उनके मुताबिक संविधान जारी होने की अन्तिम तिथि जेठ १४ र्-मई २८) से पहले नेपाल में सैकडों युवाओं के संलग्नता में सैन्य प्रशिक्षण चला कर ‘सशस्त्र आन्दोलन’ में जाने की बात भी कही गई है ।
नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए आन्दोलन की तैयारी जोर-शोर से चल ही रहा है, इसी बीच धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाए जाने से व्यक्तिगत पीडा होने की बात कहकर भारतीय जनतापार्टर्ीीभाजपा) के प्रभावशाली नेता एवं पर्ूव अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने आन्दोलन में जान भर दी है । उन्हांेने नेपाल को हिन्दू राष्ट्र फिर से घोषणा करने के लिए अपनी ओर से सभी प्रकार के सहयोग करने की बात भी कही हैं । कांग्रेस सभापति और पर्ूवप्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोईराला को श्रद्धाञ्जली देने के लिए राजधानी आए । सिंह ने मार्च २२ को आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, ‘नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में हम हर सम्भव सहयोग करने को तैयार है, पूरे भाजपा भी तैयार हैं ।’ उन्हांेने हिन्दू राष्ट्र के प्रति अपना दलिल पेश करते हुए आगे कहा ः दुनिया“ में कितने राष्ट्र धर्मसापेक्ष है, इसके बारे में किसी ने भी अ“गुली नही उठाया, जो हिन्दूत्व में विश्वास करते है, वह सबसे ज्यादा धर्मसापेक्ष होते है, नेपाल हिन्दू राष्ट्र हैं और हिन्दू शब्द से किसी को चिढÞ नहीं होनी चाहिए । र्सार्क क्षेत्र के ही पाकिस्तान और बंगलादेश एवं युरोपियन यूनियन के मुल्क सब धर्मसापेक्ष होने की उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने कहा कि उन मुल्कों को धर्मनिरपेक्ष बनाने की बात कोई नहीं करता परन्तु नेपाल को धर्मनिरपेक्ष बनाने की बात क्यों हो रही है इसे नेपाल और यहा“ के नागरिकों को समझना होगा ।’ भाजपा के पर्ूव अध्यक्ष सिंह ने ‘नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में विश्व बैंक के राजनीति करने वाले के आलावा किसी को आपत्ति नही होगी’ कहकर यहा“ इस अभियान में लगे लोगांे के हौसला बुलन्द किया । कुछ माह से नेपाल को हिन्दू राष्ट्र फिर से बनाने के लिए राजधानी सहित देश के अनेक हिस्सों में पर््रदर्शन और रैलिया तो निकाली ही जा रही थी, अब यह सशक्त रूप मंे आगे बढÞ सकता हैं । वैसे तो संसद में नेपाल को धर्मनिरपेक्ष घोषणा करने के बाद से ही यह गतिविधि चल रही हैं । बीबीसी के चार्ल्स हेविल्याण्ड के एक रिपोर्ट को माना जाय तो नया“ संविधान न बनने तक आधिकारिक रूप में नेपाल विश्व के एक मात्र ‘हिन्दू अधिराज्य’ ही है । उन्होंने अपने उस रिपोर्ट में शिव सेना नेपाल के अध्यक्ष अरुण सुवेदी के ‘नेपाल हिन्दू अधिराज्य नही रहेगा तो नेपाल भी नही रहेगा’ वक्तव्यों को भी उल्लेख किया हैं । सुवेदी के कथन से लगता यही हैं कि नेपाल में पवित्र धार्मिक युद्ध -होली वार) छेडने की संभावना है । इस से अन्दाज यही लगाया जा सकता है कि अगले दो माह नेपाल के लिए विस्फोटक बनेगा, हिंसा की संभावना भी उतना ही है ।
नेपाल के आधिकारिक तथ्यांक के मुताबिक ८० प्रतिशत नेपाली हिन्दू हैं । इसमंे से अधिकांश परम्परागत रूप में राजा को विष्णु के अवतार मानते है । परन्तु बहु-जातीय इस मुल्क मंे कुछ अल्पसंख्यक और अधिकांश पार्टर्ीीम्बें अर्सर्ेेे धर्मनिरपेक्षता की बात करता आ रहा था, उसी अनुरूप नेेपाल को धर्मनिरपेक्ष बनाया गया । सन् २००६ मई १८ तारीख को नेपाल को हिन्दू अधिराज्य के स्थान पर धर्मनिरपेक्ष देश घोषणा किया गया । बौद्ध, क्रिश्चियन, मुस्लिम, सिख और जैन धर्माबलम्बी भी नेपाल मंे कुछ संख्या मंे है, उन्होंने धर्मनिरपेक्षता का स्वागत किया । धर्मनिरपेक्षता के घोषणा से निजी भवनों में चर्च स्थापना कर अपने धर्म के प्रचार-प्रसार में लगे क्रिश्चियन समुदाय अर्थात कैथोलिक सबसे ज्यादा खुश हुए । उधर बहुसंख्यक हिन्दूओं ने नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषणा से अपने को आघात पहु“चने की बात बार-बार करते आ रहे हैं । वे कह रहे हैं कि विश्व में ढÞेर सारे मुल्क में इस्लाम और क्रिश्चियनीटी है, नेपाल में हिन्दू के रूप मंे धर्मसापेक्ष होने में क्या हर्ज है, वैसे यहा“ सभी के अधिकारों का सम्मान तो परापर्ूव काल से ही किया जा रहा हैं । यहा“ के सभी धर्मावलम्बी मिलजुल कर रहते हैं । छिटपुट घटना को छोड दें तो यहा“ अन्य मुल्क की तरह धार्मिक दंगा भी तो कभी नहीं हुआ । फिर क्यांे धर्मनिरपेक्ष बनाया गया – यहा“ के हिन्दूवादियों के बात को मानें तो धर्मनिरपेक्ष मुल्क बनाकर नेपाल को कमजोर करने की साजिश किया गया हैं । वे कहते है ः संयुक्त राज्य अमेरिका भी धर्म निरपेक्ष मुल्क न होकर एक ‘क्रिश्चियन नेंशन’ है, ऐसे देश विश्व में ढेर सारे है, परन्तु विश्व के एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल को धर्मनिरपेक्ष बनाकर वर्षोंं से जारी धार्मिक सहिष्णुता पर ग्रहण लगाने की बात है । हिन्दू धर्म के प्रति आस्था रखने वालों का दावा हैं कि यदि यहा“ जनमत संग्रह कराया जाय तो नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषणा करने वाले ८० प्रतिशत से ज्यादा लोग होगें । परन्तु यहा“ के सरकार बहुसंख्यक जनता के भावना के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता की बात करती हैं ।
अन्त में, मई मंे बनने वाला नया“ संविधान में फिर से नेपाल को हिन्दू राष्ट्र घोषणा किया जाय इसके लिए हिन्दू समूह सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं । यह दबाव मन्द गति में आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है । संविधान सभा के ६०१ में राप्रपाने का चार सभासद् सहित अन्य भी इस आन्दोलन में अगले दिनों अपने को समाहित कर सकते हंै । हाल ही में नेपाल के सिंहदरबार को घेर कर राप्रपाने ने दिखा दिया कि ‘हम भी शक्तिशाली है’, हमारे र्समर्थन बिना यहा“ संविधान बनने की गुन्जाईश नहीं है । नेपाल के दर्ुगम जिला ओखलढुंगा में जन्मे कालीदास बाबा जिसका आश्रम भारत के हरिद्वार में है, वहा“ के कुम्भ मेला में राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव भी सहभागी होकर आए हैं । उधर सन् २००६ में धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में मतदान करने वाले कुछ राजनीतिक नेता और उच्च ओहदे में बसे लोगों के द्वारा हिन्दू राष्ट्र के लिए आयोजित पूजा में जाना संदेह के घेरे में लाता है । तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीतमलोपा) के नेता तथा पर्ूव मन्त्री हृयदेश त्रिपाठी भी उस पूजा में शामिल हुए । उस समय मिडिया में दिए प्रतिक्रिया से यही लगता है कि वह भी हिन्दू राष्ट्र के पक्ष में ही हैं । एक्युमेनिकल न्यूज इन्टरनेसनल ‘इएनसी’ के २०१० मार्च १४ के रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है । त्रिपाठी ने कहा है कि नौ दिनों तक काठमाण्डू के पशुपति क्षेत्र में आयोजित पूजा में अत्यधिक संख्या में लोगांे की उपस्थिति से जनता हिन्दू राज्य के पक्ष में ही होने का संदेश सरकार को दे रही है । परन्तु उन्होंने राजपरिवार और धर्म के बीच कोई सम्बन्ध नही होने की बात भी कही है । ऊपर उल्लेख किए गये तथ्य से यही लग रहा है कि नेपाल को फिर से बन्द, हडताल और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरना होगा । उससे संक्रमणकालीन अवधि बढने की संभावना भी है । राजनीतिक पार्टियां और उसके नेता इसके लिए सचेत बने और देश में शान्ति और अमन चैन कायम करने के प्रयास में जुटें, सभी की भलाई उसी में है । खखख

रामदेवमय काठमांडू

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

ramdebटुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर । जिसमें बाबा ने न केवल आम जनता को ही आकषिर्त किया ब्लकि उनके सात दिवसीय नेपाल-निवास के दौरान क्या राष्ट्रपति, क्या उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, सभामुख से लेकर विपक्षी प्रमुख प्रचण्ड, उपेन्द्र यादव, सहित सभी प्रमुख राजनीतिक नेता, उद्योगकर्मी, व्यापारी हाथ जोडें खडे दिखें ।
यह बाबा का चमत्कारिक व्यक्तित्व का कमाल था कि बाबा के योग का जादू सबके सर पे चढ कर बोला । पूरा काठमांडू रामदेवमय हो उठा था । रामदेव ने योग की महत्ता बतलाते हुए कहा कि ‘योग जीवन दर्शन है, यह आत्म अनुशासन और जीवन पद्धति है । बाबा ने नेताओं को लक्षित करते हुए कहा कि ‘अपने शरीर को काबू में न रखने वाले व्यक्ति परिवार, समाज, संगठन और देश को किस प्रकार नियंन्त्रण में रख सकेगा ।’
बाबा रामदेव के योग दर्शन ने नेपालियों के मनमस्तिष्क में सकारात्मक सोच उत्पन्न करने में जरूर सफल रहा हैं । योग के आकर्षा का एक प्रमुख कारण नेपाली जनता मे बढÞते रोगों के कारण भी योग के माध्यम से इसके निराकरण के राह ढूँढते नजर आयें । संविधान-निर्माण तथा शांति प्रक्रिया का पर्ूण्ा न कर पाने वाले नेतागण अपनी हताशा तथा निराशा को भी योग के माध्यम से बाबा के शरणागत होकर समाधान निकालने के प्रयास में जुटे दिखे । शायद बाबा के आशर्वाद एवं दिखाये रास्ते का पहल कर ही देश में शांति एवं सुव्यवस्था कायम हो सकें ।
लमजुंग, धनगढी, चितवन तथा दाङ में बाबा रामदेव का योग शिविर खुल गया हैं । वही मण्डिखाटार में १६ रोपनी में पतंजलि योग पीठ की शाखा खोली गयी हैं ।
प्रधानमंत्री ने धुलीखेल में ४० रोपनी में एक योग शिविर केन्द्र का उद्घाटन किया, आचार्य बाल कृष्ण के घर स्याङजा में राष्ट्रपति ने योग केन्द्र का उद्घाटन किया । इस प्रकार अब लगता हैं कि पूरा नेपाल योग केन्द्र में परिवर्तित हो गया ।
आचार्य बालकृष्ण ने जानकारी दी कि विश्व में पाये जाने वाले ६७ प्रतिशत जडीबुटी नेपाल में ही पाए जाते हैं और उसका सही उपयोग किये जाने हेतु उसके संग्रह एवं औषधीय उपयोग किये जाने पर भी जोर दिया तथा यह भी जानकारी दी कि एन.आर.एन. उपेन्द्र महतो ने इस कार्य में पर्ूण्ा सहयोग एवं र्समर्थन देने का आश्वासन भी दिया है ।
यद्यपि रामदेव नेपाल में योग सिखाने पहुँचे थे लेकिन यहाँ वे पर्ूण्ातया राजनीतिक रंग में ही रंगे दिखें । उनका सम्मान भी किसी राजनयिक से कम नहीं था । माधव नेपाल से लेकर प्रचण्ड यहाँ तक भूटानी सरकार प्रमुख भी बाबा भेंट करते दिखें । यह बडा आर्श्चर्य की बात हैं योग व राजनीति का मिलन । जो कि बाबा ने बडे ही चतुर्राई से किया ।
बाबा जनकपुर धाम भी पहुँचे राम जानकी मंदिर में पूजार्-अर्चना करने । नेपाल से वापस जाते समय बाबा ने नेपाल को सीता माता के घर होने के कारण इसे अपना मामा का घर बताया और सदा ही नेपाल से प्रेम एवं सद्भाव रखने की भी बात की । साथ ही समाचार पत्रों द्वारा खिंचाई किये जाने के विषय पर बाबा ने कहा कि मैं बहुत कुछ मीठे कडवे अनुभव लिए वापस जा रहा हूँ ।

हमें हमारे नेताओं से बचाओ:: राजेन्द्र थापा

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

RajendraThapaप्रचण्डजी की नेतृत्व की सरकार ने जब उट की टेढी पीठ की तरह करवट भी टेढी ले ली थी, उसी वक्त से नेपाल की राजनीति और शान्ति यात्रा मं फिसलन भी टेढी मेढी ही शुरू हो गयी थी । अलबत्ता इस फिसलन की जड तो माओवादी की उसी करवट में ही हम स्पष्ट देख सकते हैं, फिर भी प्रचण्ड की सरकार गिरने के बाद उत्पन्न अनिश्चितता शान्ति के लिए ही घातक घन्टी के रूप मं ले कर अन्य दलों को फिर सम्झौतामुखी रास्ता अख्तियार करके राष्ट्र के हित मं माओवादी को फिर से पकडकर किसी भी तरह दिल्ली समझौतावाली उसी रास्ते पर ले आना चाहिए था । पर चुनाव की हार की वजह से तिलमिलाए हुए नेताओं ने इस बाढ को रोक कर क्षति नियन्त्रण करने के बदले बाढ मं सत्ता की मछली पकडने के सुनहरे अवसर के रूप मं इसे लिया और प्रजातान्त्रिक सिद्धान्त के विपरीत एक के बाद एक गलती होता गया और साथ मं सब से बडी जनमतवाली दल माओवादी को कोने करने में दूसरे और तीसरे बडे दलों ने कोई कसर नही छोडी ।
दिन रात दूसरों के ऊपर रणनीति और मोर्चाबन्दी की बात कह-कह के नही थकनेवाला माओवादी खुद को ही चारों तरफ से रणनीतिक मोर्चाबन्दी के अन्दर पाकर अपनी ही अन्तरद्वन्द और बौखलाहट में कभी खुद को, कभी दोस्तों को, और कभी दीवार को नखछेदन करता गया, और अन्त में खुद ही अपने पन्जों से, घायल और अकेला पडता गया । माओवादी के इस अकेलेपन और बौखलाहट की वजह से, चुनाव से भागनेवाले और चुनाव में पराजित नेताओं और खुद माधव नेपालजी को बहुत लाभ मिल गया था और अभी भी मिल रहा है । और अपने अजीज चौकडियों के साथ इनकी भी दिन दुगूनी और रात चौगुनी, खूब चांदी बन रही है ।
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विश्व का सब से बडा प्रजातन्त्रवाला भारत को भी हमारे सत्ताखोर नेताओं ने पा“व पकडकर या हाथ जोडकर इस अप्रजातान्त्रिक सत्ता छीनाझपटी के गन्दें खेल में दिल्ली समझौता के नाम पर घसीट के ले आने में सफल हो गये । अब यह खेल बहुत आगे बढ चुका है, कभी भी खेल में दर्शकगण के तरफ से पत्थरे, और बोतलें इस खेल को खतरनाक अन्जाम की ओर ले जा कर, इसे एक भयानक हादसा मंे परिवर्तन करने की लालसा लिए हुए बैठे हैं, इस परिवर्तन से नाखुश शक्तियां, और भारत को इस महाजंजाल में फंसा कर इस आग को सीमा के उस पार तक फैलाने की एजेन्डा लिए हुए इस क्षेत्र की शान्ति और प्रगति को छीन कर आग की लपेट में ले जाने के लिए आतुर पर-पीडक आतंककारी शक्तियां ।
हालांकि माधवबाबू की यह सरकार माओवादी के लाख ना चाहने पर भी आगे भागता जा रहा है, अलबत्ता देश पीछे छुट गया है या नही देख पा रहे हैं, ना तो सज्जन नेताओं मं से एक माने हुए माधवबाबू स्वयं, ना तो नेपाली जनताओं के सबसे अजीज कुटम्ब भारतीय जनताओं के प्रतिनिधि दिल्ली या इस सरकार के कोई भी शुभचिन्तक । पर यह सरकार के अकेले भागने से और माओवादी के अकेलेपन से देश को राहत मिलेगा, क्या – क्षेत्र की शान्ति बरकरार होगी, क्या – हल के बिना आगे बढÞ रहा यह मसला से उत्पन्न असमंजसता अच्छा करेगा, क्या –
अन्तिम घडी में गिरिजाबाबू को भी, यह महसूस हो गया था कि जो हो रहा है, यह ठीक नही हो रहा है । बदले की भावना से, माओवादी को पाठ पढाने के चक्कर में देश और शान्ति को ही घनचक्कर में डाल कर गलती करने की पीडापर्ूण्ा अनुभूति से वो भी विक्षिप्त मनस्थिति मंे पहुंच चुके थे । और इसी वजह से कुछ हप्तों से उनका शुरू किया हुआ इस मुल्क को पर्ुनर्जलीय उपचार करके पुनर्जीवित करने की उनकी कोशिश अब रूक गयी है, प्रारब्ध की इस कठोर निर्ण्र्ाासे ।
तो अब गेंद कहां है – बच्चे भी जानते हैं कि, जब अपने घर में मां बाप ताऊ, ताई दादा, दादी सब झगड रहे हैं तो, किस की सद्भाव की जरूरत पडेगी, इस मसले को घर के अन्दर में ही सुलझाने के लिए – अर्थात गेंद अब हमारे दुःख और सुख के साझेदार पडोसी के आंगन में पहुंच चुकी है, क्योंकि गेंद की स्र्टार्ट भी दिल्ली समझौता के वक्त से ही उसी पडोसी की आंगन से ही हर्ुइ थी । और हम खुद ये मसला को हल करतेे, अगर गिरजाबाबू जिन्दा होते । पर अब कुटुम्ब की सद्भाव के बिना ये संभव नही, क्योंकि संकरे पुल के बीच में आमने सामने दलबल के साथ दोनों पक्ष सीना ताने एक-दूसरे को वापस जाने को कह कर ‘नहीं तो’ ‘नहीं तो’ की चेतावनी की रट लगा रहें है । हमारी संविधान, शान्ति, सुरक्षा, बाजार व्यवस्थापन और अमन चैन उनके सर के टोकरी पर बन्द पडी है, किसी भी वक्त नीचे उमडÞता हुआ दरिया की लहर पर गिरने के लिए तैयार ।
यूं तो लगता है माधवजी को ऐसी फेविकोल से सरकार में चिपका दिया गया है कि वहां से उनको किसी भी तरह की केमिकल लगाकर भी माओवादी उतार नही सकता । पर भय यह है की चिपकी हर्ुइ यह सरकार के साथ साथ कही नेपाल की राजनीति भी गलत जगह पर तो नही चिपक जाएगा – दशक की दहशत और अस्तव्यस्ता के बाद दलों के साथ भारत की भी पहलता पर पटरी पर डाली गयी इस रक्तरंजित देश अगर पटरी पर से फिर बाहर उतर गई तो अब अन्दरुनी या बाहरी कोई भी शक्ति क्या फिर संभाल सकेगा – और अब जो नुकसान होने वाला है उस की भरपाई हो ही नहीं सकती ।
हालांकी इस परिस्थिति से नेपाल को सुरक्षित करने के लिए लोग गिरिजाबाबू और भारत के ऊपर ही टकटकी बंाधकर देख रहे थे, पर गिरिजाबाबू के जाने के बाद वह आधार भी टूट गया । इसी पृष्टभूमि में भारत की समाधानपर्ूण्ा तथा समन्वयकारी, निष्पक्ष तथा सन्तुलित और प्रजातान्त्रिक कुटुम्बवाली पडोसी की भूमिका की जरूरत और भी बढ गयी है । यूं तो अपने पक्ष में ना हो तो इसे हम हस्तक्षेप और अपने पक्ष में हो तो इसे सद्भाव का नाम देते हैं । अलबत्ता दिल्ली समझौता के साथ ही शुरू हुआ इस शान्ति यात्रा के नींव पर माओवादी, कांग्रेस, एमाले और अन्य दलों के साथ-साथ भारत ने भर्ीर् इटें और चुनें डाले थे । तो जब तक यह शान्ति इमारत नही बन जाती, अन्दरूनी मामले पर हस्तक्षेप कहा जाने पर भी जब-जब आपदा पड जाती है तो इसके दोष भी भारत ही के माथे पर मढÞा जाता है, और सहयोग की आकांक्षा भी भारत से ही किया जाता है । यही आज का नेपाल का सत्य है ।
नेपाली जनता के भले और खुशहाली तथा शान्ति के लिए भारत की तरफ से लिया हुआ या ले जाने वाले हर कदम में किसी नेता या दल की हित से ज्यादा इस मुल्क की जनता की हित के लिए परिलक्षित करने के लिए अनन्य पडोसी भारत को विशेष चौकन्ना होना चाहिए, क्योंकि माओवादी नेतृत्व की सरकार गिरने के लम्हें से जब परिस्थिति बिगडÞती गई, लोगों को लगने लगा की इस बार भारत व्यक्ति विशेष या दल विशेष का साथ दे रहा है, या लात दे रहा है । और दोनों स्थिति इस माहौल को अशान्ति के तरफ ले जाएगा और अन्ततः नेपाल हिंसा और विनाशकारी गृहयुद्ध में प्रवेश करेगा । और उस वक्त चाह कर भी क्या कोई भी ताकत विनाश को रोक पाएगा -
यह सवाल जितना आसान सा लगता है, उतना ही खतरनाक है इसका उत्तर । और सशस्त्र द्वन्द्वकाल में ३२ महीने तक लगातार नारायणी अन्चल से सुदूर महाकाली तक अपने ही भाई-बहनों के खून से भींगते हुए और भींगाते हुए, लाशों की अम्बार से अपने और दूसरे की भेद करने में अर्समर्थ यह पर्ूव सैनिक अर्थात ‘मै’ इसका उत्तर बखूबी समझता हू“ । इसलिए मैं दावे के साथ डंके के चोट पर चिल्ला-चिल्ल्ााकर कह रहा हू“, इस रास्ते पर विनाश है, यहां सिर्फ मौत है, पर नेताओं के नहीं आम गरीब और सहाराविहीन नेपाली भाई-बहनों का, महिलाओं का, दलितों का, किसानों का, मजदूरों का । हम भगवान पशुपतिनाथ से सिर्फ यही मा“ग सकते हैं, हे प्रभु हमें हमारे नेताओं से बचाओ । और खुद ही ‘तथास्तु’ कहने से ज्यादा कर ही क्या सकते है –

भारत नेपाल संबंधों की प्रगाढता पर जोर

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

विराटनगर
भारत-नेपाल दो देश । सीमाएं अलग-परतंु दिलों के बीच नहीं है कोई हद । दोनों के बीच भावनात्मक व अटूट संबंध । सीमा पार आतंकी गतिविधियां, सीमा विवाद व राजनैतिक कारणों से बढÞ रही वैमनस्यता को पाटने की जरूरत समझते हुए सामाजिक पहल शुरू हो गई है । गुरुवार को विराटनगर के एक होटल नमस्कार में दोनों देशों के दर्जनों बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदांे, अधिवक्ताओं, उद्योगपतियों व मीडियाकर्मियों ने आपसी संवाद के जरिये इस दिशा में सकारात्मक पहल की पुर-जोर वकालत की । कार्यक्रम के संयोजक दिनेश श्रेष्ठ ने विषय वस्तु की महत्ता समझाते हुए दोनों देशों के बीच आपसी मैत्री संबंध को प्रगाढ बनाने की जरूरत पर बल दिया । राष्ट्रीय barunmalaमहिला आयोग नेपाल की सदस्या अमुदा श्रेष्ठ व भारतीयों की ओर से प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ समाजसेविका व सहयोगिनी की अध्यक्ष रेणु वर्मा ने भारत-नेपाल मैत्री संबंध को प्रगाढ बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी की और सशक्त करने की जरूरत पर बल दिया । उन्होंने दोनों देशों के मातृशक्ति का सम्मेलन आयोजित करने की बात कही ताकि आपसी पारिवारिक संबंध मजबूत हो । नेपाल के पर्ूव मंत्री राधा प्रसाद घिमिरे, एलाइयंस फार सोशल डायलाग के कार्यकारी निर्देशक हरि शर्मा, पत्रकार, मोहन भंडारी, पिताम्बर दहाल, प्रवीण चौधरी व भारतीय क्षेत्र के शिक्षाविद् डा. एन एल दास व फारबिसगंज नगर परिषद् के वाइस चेयरमैन राज कुमार अग्रवाल, अधिवक्ता सुनील कुमार वर्मा व पत्रकार पंकज रंजित ने भारत नेपाल के बीच सामाजिक, सांस्कृतिक, वैचारिक व आध्यात्मिक संबंध को प्रगाढ करने की जरूरत बताई । उन्होंने कहा कि जाति धर्म व भाषा की कोई परिसीमा नही होती । विचारों के आदान-प्रदान से संबंध मजबूत होते है । इस मौके पर उद्योगपति ज्ञानचंद दुगड, पत्रकार यज्ञ शर्मा, रौशन जहोन, परशुराम कयाल, संजय यादव, सेवा संस्थान के संजय सिंह, सुबोध प्याकुरेल, मधेशी जनअधिकार फोरम के संजय सिंह सहित दर्जनों विविध क्षेत्र की हस्तियां मौजूद थी । इस मौके पर भारत-नेपाल सीमा पर गर्ल्स ट्रैफिकिंग, आपराधिक वारदात, नशीली दवाओं पर प्रतिबंध लगाने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी चर्चा की गई ।

योग्य उत्तराधिकारी की तलाश::प्रो. डाँ. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

nain mishraनेपाली राजनीति के महानायक गिरिजाप्रसाद कोईराला की मृत्यु के परिणाम स्वरूप राष्ट्र ने एक अनुभवी अभिभावक को खो दिया है, ऐसा पूरा देश महसूस कर रहा है, न सिर्फउनके र्समर्थक बल्कि उनके विरोधी भी । स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थिति में न सिर्फनेपाली कांग्रेस बल्कि राजनीतिक संयंत्र और देश में भी इस सोच का उभरना स्वाभाविक है कि गिरिजा सभापति थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी उँचाई इतनी बढ गई थी कि उन्होंने एक राजनेता का व्यक्तित्व अंगीकार कर लिया था, न सिर्फदेश में बल्कि अन्तर्रर्रीय स्तर पर भी । वे अपने आप में एक संस्था थे । समसामयिक नेपाली राजनीति में उनके महत्वपर् योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है । यही कारण हैं कि उनकी मृत्यु से देश में एक राजनीतिक रिक्तता उत्पन्न हो गई है । अभी देश में सामान्य अवस्था नहीं है तथा राज्य पर्ुनर्संरचना संक्रमण काल से गजुर रहा है, ऐसे में कोईराला जैसे र्सवस्वीकार्य समन्वयकारी नेता को खोना, निश्चय ही दर्भाग्यपर्ण् है । उनके नेतृत्व में प्रारम्भ हर्ुइ शांति प्रक्रिया अभी तक अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाई है । नए संविधानका निर्माण होना बाकी है तथा राज्य की सभी संरचनाओं का संचालन अन्तरिम विधि के द्वारा किया जा रहा है । कोईराला की अनुपस्थिति में राजनीतिक अराजकता की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता । क्या देश में कोई दूसरा शक्ति है जो उनका स्थान ग्रहण कर सके – लोगों के जेहन में इस बात का उभरना ही यह दर्शाता है कि नेपाली राजनीति में कोईराला का कितना महत्व था । उनके पास छह दशकों की राजनीतिक निरन्तरता, प्रतिबद्धता तथा अनुभव था । उन्होंने जीवन के अंतिम क्षणों तक विश्राम नहीं किया । मृत्यु के समय भी वे  तथा उच्चस्तरीय राजनीतिक संयन्त्र के प्रमुख की भूमिका निभा रहे थे ।
कांग्रेस  कोईराला के उत्तराधिकारी को लेकर विवाद शुरू हो गया था । नेतात्रय सुशील कोईराला, रामचन्द्र पौडेल तथा शेरबहादुर देउवा के बीच प्रतिस्पर्धा हो रही थी । देउवा का कहना है कि गिरिजा बाबू ने उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी माना था, लेकिन सुशील कोईराला यह मानने के लिए यह कह कर तैयार नहीं थे कि प्रजातांत्रिक दल में कोई किसी का उत्तराधिकारी नहीं होता है । बी.पी. के निधन के पश्चात गणेशमान, भट्टर्राई, गिरिजाप्रसाद के सामूहिक नेतृत्व को बहुत दिनों तक स्वीकारा गया । हालाँकि बाद में इनके बीच भी सत्ता में आने के प्रश्न पर विवाद उत्पन्न हुआ था । पिछले कुछ दिनों मंे पार्टर्ीीे भीतर कोईराला की स्थिति कमजोर होने के बावजूद कोई भी नेता उन्हें चुनौती देने का दुःसाहस नहीं कर सका । इन विवादों से संविधान निर्माण प्रक्रिया तथा राष्ट्रीय राजनीति भी अछूती नहीं रह सकती । देउवा र्समर्थकों का मानना है कि वरिष्ठता के क्रम में देउवा सुशील कोईराला से ऊपर हैं क्योंकि पार्टर्कता के समय उन्हें गिरिजा प्रसाद कोईराला के बाद दूसरे वरिष्ठ नेता का दर्जा प्रदान किया गया था । अन्ततः कांग्रेस केन्द्रीय सदस्यों की बैठक में शेरबहादुर देउवा को कृष्ण प्रसाद भट्टर्राई के बाद वरिष्ठ नेता मान लिया गया है ।
लगभग सात दशकों के लंबे राजनीतिक जीवन के उतर्रार्द्ध मं कोईराला के द्वारा दो महत्वपर्ूण्ा कामों को अंजाम दिया गया । उनका पहला कार्य था हिंसात्मक मार्ग का परित्याग करा माओवादियों को राष्ट्रीय राजनीति की मूल धारा में प्रवेश कराना तथा दूसरे उन्होंने राजतन्त्र की समाप्ति के लिए आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया । इसके अतिरिक्त कोईराला सरकार के द्वारा ही संविधान सभा का निर्वाचन संपन्न कराया गया । आज उनका मूल्यांकन इन्ही कामों के आधार पर किया जा रहा है तथा नेपाली राजनीति में एक रिक्तता का बोध हो रहा है । उन्हीं के नेतृत्व में शुरू हर्ुइ शांति प्रक्रिया तार्किक निष्कर्षतक पहुँचना बाकी है । उनकी अनुपस्थिति में गणतंत्र को संस्थागत बनाने तथा संविधान निर्माण की प्रक्रिया भी चुनौतीपर् हो गई है । इन सभी जिम्मेवारियों को पूरा करने के लिए दलों के बीच सहमति के बदले असहमति बढ रही है, जो निश्चय ही चिन्ता का विषय है । पिछले दो दशकों से कोईराला नेपाली राजनीति के केन्द्र बिन्दु रहे हैं । किसी भी दूसरे नेता का व्यक्तित्व उनके सामने छोटा दिखता है । वर्तमान समय में कोईराला की राजनीति सहमति, सहकार्य तथा एकता पर मूल रूप में आधारित थी । शांति तथा संविधान निर्माण की दृष्टि से उनके इन राजनीतिक सूत्रों का विकल्प नहीं दिखाई देता है । कोई भी एक दल अकेले लोकतांत्रिक समाधान देने में असक्षम है । साथही किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल को अनदेखा करके राजनीतिक स्थायित्व की स्थापना नहीं की जा सकती है । कोईराला को इन सभी बातों का भान था और शायद इसीलिए उन्होंने उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्र का निर्माण किया था । यह सहकार्य की राजनीति पर मूल रूप से आधारित थी जो अब नेतृत्वविहीन हो गई है । कोईराला की मृत्यु के पश्चात संचार माध्यमों में उनके योगदान की चर्चा हो रही है । यहाँ तक की उनके जीवन काल के कटु आलोचक भी उनकी प्रशंसा करते नही थक रहे है । माओवादियो ने भी खुलकर उन्हें सम्मान दिया है । माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ने उन्हें अभिभावक की संज्ञा प्रदान की है । दहाल जी का कहना है कि अपने जीवन के अंतिम काल मे कोईराला ने उन्हें ही शांति प्रक्रिया की अगुवाई करने की जिम्मेवारी सौंपी थी । कुछ लोगों का मानना है कि दहाल इसका अर्थ सरकार को नेतृत्व प्रदान करना मान रहे हैं । नेपाल में सभी राजनीतिक परिवर्तनों को नेतृत्व प्रदान करने वाला यह दल अभी दूसरे स्थान पर आ गया है । देश में साम्यवादियों का प्रभाव बढÞ रहा हैं । विभाजित होते हुए भी मधेशी दलों के अस्तित्व को भी नकारा नही जा सकता है । टूटने के बाद एकजूट हर्ुइ कांग्रेस अभी भी गुटबाजी से ऊपर नही उठ सकी है । जनआन्दोलन के पश्चात २०४८, २०५१ तथा २०५६ का संसदीय निर्वाचन तथा २०६४ के संविधानसभा निर्वाचन में कांग्रेस को जो मत प्राप्त हुए उनमें बहुत ही उतार चढाव देखने को मिलता है । कोईराला की अनुपस्थति में यह दल कैसे अपने अस्तित्व को कायम रख सकेगी यह एक अहम सवाल है । स्वाभाविक रूप में सुशील कोईराला, शेरबहादुर देउवा तथा रामचन्द्र पौडेल के कँधांे पर यह जिम्मेवारी आ पडÞी है कि वे अपनी आपसी सूझ-बूझ से कांग्रेस को सफल नेतृत्व प्रदान करें, तथा नेपाली कांग्रेस अपनी लोकतांत्रिक छवि को कायम रखने में सफल हो सकेगी ।
आनेवाली कांग्रेस नेतृत्व के सामने दूसरी महत्वपर्ूण्ा चुनौती यह है कि गिरिजा प्रसाद कोईराला की तरह इस पार्टर्ीीें किसी दूसरे नेता का अन्तर्रर्ाा्रीय व्यक्तित्व नहीं है । अन्तर्रर्ाा्रीय समुदाय की सोच इस प्रकार की है कि कांग्रेस पार्टर्ीीभी भी लोकतांत्रिक पद्धति तथा शांतिपर्ूण्ा राजनीति जैसे प्रमुख विषयों पर समझौता नहीं कर सकती है । कांग्रेस पार्टर्ीीी नहीं बल्कि अन्य दलों में भी किसी नेता को गिरिजा बाबू की तरह अन्तर्रर्ाा्रीय अस्तित्व प्राप्त नहीं है । इस तरह हम देख रहे है कि लंबा राजनीतिक इतिहास रखने वाला कांग्रेस देश की तरह ही संक्रमणकाल से गुजर रहा है । कोईराला के निधन के पश्चात निश्चय ही यह जिम्मेवारी दूसरी पंक्ति के नेताओं पर पडी है । ०३९ साल में बी.पी. के द्वारा अपनी अन्तिम अवस्था में कांग्रेस नेतृत्व की जिम्मेवारी तीन नेतओं को सांैपने के बाद नेतात्रय अवधारणा विकसित हुआ था । कोईराला के शव वाहन में तीन नेताओं की उपस्थिति से कुछ इसी प्रकार का संकेत दिया । वर्तमान परिस्थिति मंे उसे सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त को अंगीकार करने हुए गुटबन्दी को समाप्त करना होगा । पार्टर्ीीो विभाजन से बचाने तथा एकता की सूत्र में बाँधने की लिए दूसरी पंक्ति के तीनों ही नेताओं को आपस में समन्वय तथा समझदारी कायम रखनी होगी ।
माधवकुमार नेपाल की सरकार को बनाने तथा टिकाने में भी गिरिजा प्रसाद की प्रमुख भूमिका थी । कोईराला की अनुपस्थिति का सरकार पर नकारात्मक प्रभाव पडÞने की सम्भावना  से इन्कार नहीं किया जा सकता है । वर्तमान सरकार और माओवादी दल के बीच विद्यमान कटुता कोईराला के कारण ही मुखर नही हो पाई थी अब यह कटुता कौन सा रूख लेगा यह कहना कठिन है । दूसरी ओर एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने राजनीतिक संयन्त्र के माध्यम से कोईराला के साथ जो शक्ति समीकरण स्थापित किए थे, वह भी समाप्त होना तय है । माओवादी दल को भी कोईराला की कमी खटके बिना नहीं रह सकती । कोईराला के कारण ही माओवादी दल कांग्रेस, एमाले, नेपाली सेना तथा अन्य राष्ट्रीय शक्तियों के साथ सन्तुलन स्थापित करने में सफल हुआ था । कोईराला की अनुपस्थिति में माओवादी दल तथा अन्य राष्ट्रीय शक्तिओं के बीच असमझदारी बढÞने का खतरा भी उत्पन्न हो गया है । इसके अतिरिक्त कोईराला के कारण ही अन्तर्रर्ाा्रीय समुदाय मुख्य रूप में विश्वास करके माओवादियों को एक वैधानिक शक्ति के रूप में स्वीकार किया था । कोईराला के अभाव में अन्तर्रर्ाा्रीय दृष्टिकोण माओवादियों के संबन्ध में ताज्जुब नहीं कि परिवर्तित हो जाए । कोईराला का अन्तर्रर्ाा्रीय समुदाय में इतना ऊँचा व्यक्तित्व था कि वे पूरे देश का नेतृत्व करने थे ऐसी अन्तर्रर्ाा्रीय छवि वाला कोई भी दूसरा नेता नहीं दिखाई पडता है जो उनकी जगह ले सके । कोईराला की तरह विदेशी नेताओं के साथ किसी दूसरे नेता का व्यक्तिगत संबन्ध भी विकसित नहीं हो पाया है । बहुत-सारे विदेशी मेहमान कूटनीतिक मर्यादाओं की अनदेखी  करके भी कोईराला से उनके निवास पर जाकर मिलते रहे हैं, भले वह पद पर हो या नही । यह बहुत बडंी बात है । कोईराला के बाद क्या कोई नेता इस ऊँचाई तक पहुँच पाएगा – इतना जरूर है कि अस्वस्थता के कारण पिछले कुछ दिनों से संविधान निर्माण प्रक्रिया तथा शान्ति प्रक्रिया के संस्थापक कोईराला की भूमिका उतनी महत्वपर्ूण्ा नहीं रह गई थी । इसी कारण राष्ट्रीय कार्यसूची पर भी संकट उत्पन्न हो गया था । लेकिन इतना जरुर है कि कोईराला के कारण ही वामपंथी तथा दक्षिणपंथी अतिवाद नियंत्रित था । उनके कारण देश में कई बार राजनीतिक दर्ुघटनाएँ टली हैं । उनमें क्षमता थी कि वे विभिन्न विरोधी विचारधारा वाले नेताओं को भी एक स्थान में ला सकते थे और लाते थे तथा जरूरत पडने पर उन्हें निर्देशित भी करते थे । क्या अब किसी नेता में इतनी कुबत है कि उनका स्थान ग्रहण कर सके । वर्तमान में ऐसा राष्ट्रीय अभिभावक दिखाई नही देता है । इस कारण अगर विभन्नि राजनीतिक दलों तथा नेताओं के बीच असमझदारी बढती है और वे संविधान निर्माण तथा शांति प्रक्रिया की अनदेखी कर सत्ता के खेल में उलझते हैं तो निश्चय ही यह देश के लिए दर्ुभाग्य होगा ।
गिरिजा कोईराला का निधन उस समय हुआ है जब देश में अनेकों विकराल समस्याएँ मुँह बाँए खडी हैं । समय सीमा के अन्दर संविधान निर्माण तथा शांति प्रक्रिया को लेकर लोगों के मन मंे आशंका उत्पन्न होने लगी है । राजनीतिक दलों के बीच कटुता बढ रही है । सरकार तथा माओवादी दल के बीच भी मतभेद कायम ही है । माओवादियों ने व्रि्रोह तक की धमकी दे डाली है । राष्ट्रपति शासन की चर्चा भी हो रही है । सेनापति का कहना है कि सेना समायोजन से राष्ट्र विखण्डीकरण का खतरा है । परराष्ट्र संबन्ध असंतुलित है । संयुक्त राष्ट्रसंघ के साथ सरकार अनावश्यक द्वन्द्व चल रहा है । मानव अधिकार के सम्बन्ध मंे शक्तिशाली राष्ट्रों विशेष रूप से अमेरिका और इग्लैंण्ड के सुझावों की अनदेखी की जा रही हैं । इस प्रकार के राष्ट्रीय और अन्तर्रर्ाा्रीय समस्याओं के बीच गिरिजा प्रसाद का उत्तराधिकारी कौन होगा, एक जटिल समस्या है । और तो और बहुत दिनों से सपना संजोए उचित अवसर के इन्तजार में अब तक चुप भूतपर्ूव राजा ज्ञानेन्द्र ने भी गिरिजा बाबू की मौत के बाद अपना शिर उठाना शुरू कर दिया है । राम नवमी के अवसर पर जनकपुर भ्रमण तथा उनके द्वारा एभी न्यूज को दिया गया साक्षात्कार उनकी मंशा को उजागर करता है । ज्ञानेन्द्र के अनुसार अभी तक राजसंस्था समाप्त नहीं हर्ुइ है और नेपाल में राजसंस्था रहेगी आ नहीं, इसका निर्ण्र्ाादेश की जनता करेगी । अन्त में, एक बार फिर इन सभी परिस्थितियों का विश्लेषण करने के पश्चात मन में सिर्फएक ही प्रश्न उभर कर सामने आता है कि, ‘गिरिजा के बाद कौन -  खखख

राष्ट्रिय सरकार अपरिहार्य क्यों ::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

binaजेठ १४ गते संविधान जारी करने का निर्धारित तिथि जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही हैं । देश में संदेह के बादल गहराने लगे है अब स्पष्ट होने लगा है कि संविधान निश्चित तिथि को जारी नहीं हो सकेगा, वैसे संविधान -निर्माण की जिम्मेवारी अपने कंधे पर उठाने वाले तीन प्रमुख दलों के  नेतागण तालठांक कर जेठ १४ गते को ही संविधान जारी करने का दावा कर रहें है- लेकिन उनके दावों पर किसी को शायद ही भरोसा हो । एक ओर जहाँ बडे दलों के नेता समय पर संविधान-निर्माण की बात कर रहें है वहीं प्रधानमंत्री अपनी सरकार बचाने के अभियान में जूटे हुए हैं । इसके साथ ही राष्ट्रीय सरकार भी माँग एवं आवश्यकता जोर-शोर से उठ रही है । नेता तथा राजनीतिक विश्लेषक सहकार्य एवं सहमति की राजनीतिक आवश्यक हैं का अपनी पुराने राग अलापते रहें है लेकिन अभी तक सहमति, सहकार्य किसी भी क्षेत्र में दिखी नहीं हैं । स्व. गिरिजाप्रसाद कोईराला सहमति, सहकार्य शांति एवं संविधान-निर्माण के लिए आवश्यक हैं, कहते-कहते र्स्वर्ग सिधार गयें । उन्हें श्रद्धांजलि देते समय सभी पक्ष-विपक्ष के नेताओं ने उनकी इस मान्यता के प्रति अपनी सहमति तो व्यक्त की लेकिन सैद्धांतिक रूप से ही व्यवहार में नहीं । वरना गिरिजा बाबू के १३ वीं अभी खत्म हुआ नहीं कि पक्ष-विपक्ष के दल, अपने पुराने खेल में जुट गये । जहाँ प्रधानमन्त्री अपने सहयोगी एवं र्समर्थक दलों से मिलकर अपनी सरकार की नवीनीकरण करने में जुटं हुए हैं वहीं माओवादी अगामी संविधानसभा के बैठक में अविश्वास प्रस्ताव लाने के अभियान में जुटे हुए हैं । यह बडे आर्श्चर्य की बात हैं संविधान निर्माण और जारी करने के बजाय सरकार निर्माण एवं तोडने की मुहिम चल रही हैं । माधवकुमार नेपाल की सरकार को अक्षम एवं अयोग्य घोषित किया जा रहा हैं । इस खेल में न केवल उनके कट्टर विरोधी माओवादी या मधेशी जनाधिकार फोरम नेपाल शामिल हैं ब्लकि उनके स्वयं के दल-एमाले  प्रमुख नेतागण भी शामिल है । यहाँ तक कि नेपाल सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री तथा सरकार के प्रवक्ता शंकर पोखरेल ने कुछ दिन पर्व यह संकेत दिया कि ‘सरकार परिवर्तित हो सकती है । एमाले के अन्दर किरण गुरुङ के नेतृत्व मे हस्ताक्षर अभियान भी शुरू हो गई, एमाले के संसदीय दल के बैठक मे रविन्द्र अधिकारी,
रिजवान अन्सारी, राधा ज्ञवाली, गोपाल ठाकुर आदि ने भी नेतृत्व परिवर्तन की माँग तीव्र रूप से उर्ठाई है, माधव नेपाल नेतृत्ववाली सरकार परिवर्तन के लिए । वैसे अध्यक्ष झलनाथ खनाल इस से इन्कार कर रहे है । माधव नेपाल भी अपने सहयोगी दलों के नेताओं के साथ विचार-विमर्श में अपनी बेचारगी यह कह कर व्यक्त कर रहें हैं कि अगर मैं सहमति सहकार्य एवं शांति के मार्ग में बाधक बनता हूँ तो मै अपने पद से हटने के लिए तैयार हूँ । कांग्रेस के अंदर भी सरकार परिवर्तन की माँग तीव्र हो गई है, सभासद कृष्णकुमार बुढाथोकी और कुमार र्राई का कहना है कि माधव नेपाल सरकार को ढोने से पार्टर् लोकप्रियता घट रही है, छवि बिगडÞ रही है । अतः सहमति के साथ राष्ट्रीय सरकार का गठन जरूरी है । वह भी कांग्रेस के नेतृत्व मं होनी चाहिए ।
दस महीना पर्व गठित माधवकुमार नेपाल की सरकार माओवादियों द्वारा उत्तेजना में सरकार छोडÞने के कारण उपजी परिस्थिति के फलस्वरूप आस्तित्व में आयी । यह समय की भी आवश्यकता थी । वैसे इस सरकार से जनता की कोई बहुत बडी अपेक्षा नहीं थी लेकिन इतनी भी कम नहीं थी कि वह देश में शांति-सुव्यवस्था स्थापित न कर सकें और संविधान-निर्माण के कार्य को लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएगी । देश में शांति और सुव्यवस्था किसी भी सरकार की अनिवार्य दायित्व होता है उसके साथ ही माधव कुमार नेपाल ने जब सरकार का गठन किया तो उन्हें भी स्पष्ट पता था कि उनकी सरकार के कार्यसूची की प्राथमिकता शांति समझौता तथा संविधान निर्माण के लक्ष्य को मंजिल तक पहुँचाना है । लेकिन दस महीना सरकार के मुखिया पद पर असीन माधव कुमार नेपाल को उनके सहकर्मी मंत्रीगण उनको लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया हैं । वैसे असहाय विवश प्रधानमन्त्री करें भी तो क्या करें – उनकी स्थिति तो ३२ दातों के बीच जीभ वाली हो गयी हैं । “एक को मनाते हैं तो दूजा रुठ जाता हैं ।” नहीं तो अपनी ही सरकार के विदेश मंत्री सुजाता कोईराला या रक्षामंत्री विद्या भण्डारी हो या उपप्रधानमन्त्री विजय गच्छेदार, करीना बेगम हो या चन्दा चौधरी के अमर्यादित कार्य एवं बयानों को वे आत्मसात करते । यह तो स्पष्ट हे गया हैं कि वे २२ दलीय समझौतावादी सरकार को ढÞो रहे हैं । यह उनकी विवशता देश में राजनीतिक स्थिरता कायम रखने के प्रयास के रूप मे ली जा सकती है । वैसे सरकार की सभी मोर्चों पर असफलता केवल माधव नेपाल की व्यक्तिगत असफलता नहीं २२ दलीय गठबंधन का “सामूहिक असफलता” मानी जायेगी ।
यही कारण है, माओवादी सरकार के कब्र पर गठित माधव नेपाल की सरकार अपनी विश्वासनीयता खोती जा रही हैं परिणामस्वरूप प्रतिक्रिया वादी शक्तियाँ पुनः अपना सर उठाने लगी है । जनआन्दोलन के माध्यम से प्राप्त धर्मनिरपेक्षता, संघीयता तथा गणतन्त्र को संस्थागत करने हेतु आपसी सहयोग एवं विश्वास का वातावरण अत्यन्त ही जरूरी है । लेकिन सब से महत्वपर्ूण्ा बात यह हैं कि माधव नेपाल की सरकार का विकल्प क्या हैं – संविधानसभा के चुनाव के पश्चात् देश के सबसे बडेÞं दल के रूप में उभरे माओवादी ने अपने सहयोगियों को लेकर सरकार तो बनायी, लेकिन जब तक सत्ता के केन्द्र में रहें यह राग अलापते रहें कि अपने सरकार के सहकर्मियों के अंडÞगा की नीति के कारण कोई कार्य नहीं कर पा रहे हैं और समय-समय पर अपना पुरानी धमकी तथा व्रि्रोही स्वर को ही उँचा करने का कार्य करते रहें । उन्हें इस बात का अभिमान हो गया था कि उनके र्समर्थन के बिना नेपाल में सरकार एक दिन भी नहीं टिक पायेगी, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनके आतंकी शासन से देश विदेशों में भी नेपाल की छवि धूमिल हो रही हैं यही कारण हैै कि जब सेनापति प्रकरण को अपनी मान-मर्यादा के झुठंे अहंकार से जोडकर आनन-फानन में बिना दूरगामी परिणाम सोचें सत्ता छोडÞ दी, तब जाकर होश आया कि क्या कर बैंठें – जिस सत्ता प्राप्ति के लिए दस वर्षों तक जंगलवास किया, हजारों लोगों के खून से होली खेली उसी सत्ता को आँव न देखा ताव ठुकरा दियें, तब से लेकर आज तक पुनः सत्ता प्राप्ति के लिए हर-संभव प्रयास कर-कर के थक गये लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी ।
इस सत्ता प्राप्ति के लिए व्रि्रोह की धमकी तो कभी विदेशी संप्रभु से वार्ता, तो कभी अविश्वास प्रस्ताव, तो कभी उच्च स्तरीय संयंत्र को माध्यम बनाने का प्रयास किया जाता रहा । माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड को कुछ समय से लग रहा था कि गिरिजा बाबू के आशिर्वाद से वे सत्ता के शिखर पर चढÞ सकते हैं अतः वे उन्हें अपना अभिभावक और सबसे बडा शुभचिंतक मानने लगे थे । जब गिरिजाबाबू का देहवसान हो गया तो अपनी पहली प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रचण्ड ने कहाँ कि गिरिजाबाबू ने मुझसे अपनी अंतिम भंट में कहाँ था कि ‘यह आप की जिम्मेदारी हैं कि आप सभी को साथ लेकर सहमति एवं सहकार्य के साथ आगे बढें ।
प्रचण्ड की इन वक्तव्यों का आशय कुछ भी हो सकता हैं । वैसे यह भी कहा जा सकता हैं कि कांग्रेस के अन्य नेताओं एवं र्समर्थनकों का विश्वास जीतना है । प्रचण्ड को स्पष्ट पता है कि उनके बडÞबोलेपन के कारण देश-विदेश में उनकी छवि अच्छी नही है । अतः बाबुराम भट्टर्राई के नेतृत्व मंे राष्ट्रीय सरकार के निर्माण के प्रश्न पर लचिलापन दिखलाने लगे है । इस मुहिम में अपने र्समर्थक दलांे तथा कांग्रेस एमाले पार्टर्ीीे भीतर चल रहा सरकार परिवर्तन के मुहिम पर बडी बारीकी से नजर रखे हुए हंै । सहमति एवं सहकार्य शांति प्रक्रिया और संविधान निर्माण को लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए क्या केवल सरकार गिराने या पुनः सत्ता-प्राप्ति जरूरी है – अगर देश में गणतंत्र एवं लोकतंत्र की जडे को स्थायित्व प्रदान करना है तो इसके लिए वर्तमान सरकार को गिराने की क्या आवश्यकता है इसी सरकार को अपना पर्ूण्ा सहयोग एवं र्समर्थन देकर अपनी ऐतिहासिक जिम्मेवारी का निर्वाह कर नेपाल के इतिहास में स्वर्ण्र्क्षरों में अपना नाम लिखवा सकते हैं । साथ ही, प्रधानमंत्री माधव नेपाल को भी समय-परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तत्काल कदम उठाना चाहिए । सरकार नेतृत्व करने मात्र से तो शांति प्रक्रिया को और न ही संविधान निर्माण-प्रक्रिया को पर्ाता मिल पायेगी । प्रधानमंत्री को अपने पहल पर सभी पिछली कमी-कमजोरियों को दूर कर सभी दलों को विश्वास के दायरे मंे लाकर सभी के सहमति से दृढ चरित्र वाले राष्ट्रीय सरकार गठन कर देश को बहुत बडÞे संकट के अंधेरे से उजाले में लाने के कार्य को पर्ूण्ाता प्रदान करना होगा । खखख

“अहा, मेरा देश !”::वेदना उपाध्याय

Posted by Himalini On March - 23 - 2010 Comments Off

अपना देश, वतन, अपनी मातृभूमि किसके लिये पावन और पवित्र नही होती – हरेक प्राणी को अपनी जन्मभूमि से स्नेह होता है । ये स्नेह भी कुछ ऐसा होता है -जब तक अपने प्रिय के साथ रहो तब तक उसकी महत्ता का बोध होते हुए भी उसकी महता का बोध नही होता परन्तु जब प्रिय से जुदाई की घडी होती है तब उसकी महता बढ-चढकर मन-मस्तिष्क जीवन और शरीर के रोम-रोम को महसूस होती है तब कहीं ऐसा लगता है कि जैसे जीवन प्राणहीन शरीर हो, वस्तुओं की सजावट के लिये दुकानों में रखे गये स्टेचुओं जैसा हो । मातृभूमि में जब-तक रहते है उसकी महता का बोध होते हुए भी बोध नहीं होता और उसकी स्थिति भी घर की मर्ुर्गी दाल बराबर की होती है । लेकिन मातृभूमि की महता उन सभी नागरिकजनों के मन-मस्तिष्क, हदय को अवश्य अनुभूत होगी जिसने किसी भी कारण से ही सही अपनी मातृभूमि को छोडा हो………..। आज देश को छोडने के अपने-अपने कारण है । कोई उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिये अपनी मातृभूमि से अलग-थलग होता है तो कोई धनार्जन के लिये, नौकरी-चाकरी के लिये । जब तक छोडा नही होता उसे, कदम रखा नही होता विरानी भूमि में, विरानी भू खीचती है चुम्बक की तरह । उसका आकर्षा् -किसी भी कारण से हो) चुम्बक बन जाता है और हमारा कोमल कान्त, पवित्र, आदर्श मन जो कभी स्थूल हो नहीं सकता लोहा बन जाता है, चुम्बक बन जाता है और विरले आकर्षा रूपी चुम्बक की ओर खिंचा चला जाता है, तब लगता है जैसे वहाँ र्स्वर्ग है -तथाकथित एक आनन्दानुभूति की धारणा), वहाँ जीवन है, पर जब अपने पवित्र अपनत्व को छोडकर पर्राई धूल पर पैर टेकते हैं, पर्राई वायु का स्पन्दन स्पर्शित होता है पराये जल से जीवन मिलता है, पराया अन्नक्षुधाग्नि को बुझाने हेतु शरीर के अन्दर प्रविष्ट होता है तब अहसास होता है क्या खोया क्या पाया…………—
कहने को तो हमारे पर्ूवजों ने विचार दिया है……..”अयम् निजः परोवेती गणना लघुचेतसाम, उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम” उचित है सारी पृथ्वी, सारा ब्रहा्राण्ड हमारा है । सारी धरा, सारा जल, पूरा र्सर्य, सारी चाँदनी, सारा ताप सब हमारा है, पर एक बहुत बडा पर ! क्या हमारे लिये इतना उदार हो पाना सम्भव है आखिर हम तो एक साधारण इन्सान है कोई महान ऋषि-मुनि या देवता नहीं । हम कहाँ अपनी भावनाओं का इतना विकास कर पाये हैं कि हमारे लिये सब एक हो जाएं कहाँ हमारी भावनाएं कबीर की तरह विस्तृत, निश्छल हो पायी हैं जो हम भी कह पाये…..कबीरा खडा बजार में, मागें सब की खैर, ना काहू से दोस्ती ना कहू से बैर ।
हम तो अभी तक गीता के दर्शन को ही पढते आ रहे हैं जहाँ स्वयं कृष्ण ने एक ही परिवार के सदस्यों के बीच युद्ध करवा दिया और कूटनीतिज्ञ कृष्ण दोनों पक्षों के हितैषी बने रहे और बने-बने एक बाँह पकडकर उवाड लिया दूसरे को हलाहल मृत्यु की ओर कर दिया । ओह हम तो बिषय से गये, विषय गीता नहीं, विषय कबीर नहीं, विषय तो स्वदेश है जिसके बारे में कविजनों की मीठी वाणी में हृदय को आनन्द की अनुभूति से भर देने वाले कितने ही उद्गार निकले हैं……… जिसको न निज भाषा तथा निज देश का अभिमान है वो नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है, ठीक लिखा ।
हमारे विद्वान कवि ने, निज भाषा, निज देश का अभिमान न होने पर मनुष्य मृततुल्य है हमें भी कुछ ऐसा ही लगा था तब-जब साढे तीन साल के विदेश की धरती से स्वदेश की धरती पर उतरने का मौका मिल रहा था । लग रहा था कि ओह कैसा अहसास होगा स्वदेश की हवा के र्स्पर्श का, स्वदेश की मिट्टी को र्स्पर्श करने का …..। म्ाातृभूमि तो सभी के लिये वही होती है । पढा था जब “विवेकानन्द” अपनी पश्चिम के देशों की चार वर्षकी यात्रा समाप्त कर आए थे तो जहाज से उतरकर सबसे पहले उन्होंने अपने देश की पवित्र रज -धूल) को अपने मस्तक से लगाया था । हमें भी लगा था कहीं अर्न्तर्मन में कि हम भी अपने वतन की माटी को अपने मस्तक पर लगाएंगे मगर जब हम विमान स्थल पर उतरे तो विमान स्थल की माटी का र्स्पर्श कराने की हमें जरुरत ही नही पडी, विमान स्थल की धूल स्वतः उडकर हम सब के मस्तक पर तो क्या पूरे तन-बदन को भर गयी और धूल और धूँआ से रहित विदेश की भूमि में रहने की आदत के कारण ही शायद अपने वतन की धूल हजम नही हो रही थी जो सीधे ही श्वास के साथ मुँह के अन्दर समा रही थी, मस्तक पर लगाने की तो कल्पना ही क्या हमने तो मानो सीधे ही उसका भोजन किया….। अपने देश की सुरभित, शीतल बयार का सुखद आनन्द लेने के लिये जब प्रातः घर से बाहर निकले तो प्रातः कालीन मन्द-मन्द समीर के झोंके के साथ एक विचित्र सी महक ने प्रवेश किया नथुनों में । बरबस ही आँखें इधर-उधर कुछ तलाशने लगी । पतली सी र्टार्च की रोशनी में कुछ खास नजर नहीं आया । सदी से सुरक्षा के लिये कोट की जेब में घुसे हाथ कब, कैसे क्यों बाहर आकर नाक पर खोल की तरह चढ गये पता ही न चला । साथ-साथ चल रहे पतिदेव ने मेरे कुछ भी पूछे बिना ही बताया……म्युनिस्पैलिटी वालों ने हडताल कर रखी है इसलिये कोई एक-डेढÞ हफ्ते से न तो किसी भी सडक की सफाई हर्ुइ है और न ही जगह-जगह इकÝा कुडा ही उठाया गया है, पिछले दो-तीन दिन पहले वषर्ा होने के कारण कुडा सडांस हो गया है उसी की बदबू फैली हर्ुइ है । वाह स्वदेश की महक जैसी भी हो तो स्वदेशी ही होती है । इसे न तो खरीदनी है और ना ही उसके लिये कोई टैक्स देना है । दिन का खाना खाने के बाद थोडी फुरसत थी तो मन किया कि विज्ञान के अद्रुत साधन का प्रयोग कर लिया जाय अब जब सुविधा मिली है तो उसका उपभोग क्यों न किया जाय ! क्यों न घर बैठे-बिठाये विदेश में रह रहे मित्रो-परिचितों का हाल-चाल पूछा जाय । सो जब कम्प्युटर देवता को खोलने लगी तो पता चला कि बटन देवता को जीवन देने वाली उर्जाश्ाक्तिधारिणी बिजली देवी रुष्ट है । मैने माँ से पूछा- “माँ, क्या हुआ, बिजली नहीं है कब आएगी – जवाब में माँ बोली -”बेटा अभी ११ बजे बत्ती गयी है अब शाम को ५-६ बजे ही आएगी ।” बडा मजा आया यह जानकर कि हमारे जैसे विकास की और अग्रसर राष्ट्र में बिजली भी नौकरी पर जाती है । उनका भी आफिस र्टाईम होता है केवल आफिस र्टाईम ही नहीं कभी-कभी तो ओवर र्टाईम भी होता है चलो अच्छी बात है बिजली देवी के आफिस जाने के कारण ही हमारे देश के फिजुलखर्ची के आदी नागरिकजनों को कुछ मितव्ययता का सबक सीखाने को मिल रहा है सच ही तो कहते थे हमारे बुजर्ुग, जो भी होता है अच्छे के लिये ही होता है हरेक बुर्राई में भी कोई न कोई अच्र्छाई छिपी होती है सो मेरा पागल मन इन सब चीजों के पीछे छिपी अच्र्छाई को ढूँढने लगा कि मेरी एक प्रिया सखी को मेरे स्वदेश आने की बात का पता चला सो मुझसे मिलनेे के लिये मेरे घर आयी । फिर क्या था बातचीत का सिल्ासिला चल पडा । बात ही बात में उसने बताया कि पिछले कोई छह महीने से उसके घर के नल में पानी नही आया है । घर में और जो पूरक व्यवस्था है उसी से काम चल रहा है । पडोसियों की अपार अनुकम्पा से पीने का थोडा बहुत पानी मिल जाता है और उसी से काम चल रहा है । पहले सोचा, पानी न आने से क्या लाभ होगा – इसके पीछे क्या अच्र्छाई छिपी होगी – एकाएक जवाब दिमाग के दरवाजे पर दस्तक देने लगा । इसके भी फायदे हैं जब पानी की समस्या होगी तो खाना घर में लिमिट बनेगा, बर्तन कम साफ करने पडेगे, बर्तन साफ करने का साबुन र्सर्फबचेंगा, समय की बचत होगी । नहाने के साबुन शैम्पू की बचत होगी, पहले जिन कपडों को गंन्दे मानकर छोडा जाएगा और दूसरे पहने जाएंगे कुछ दिनों के पश्चात उन्हीं गंन्दे कपडों को साफ-शुद्ध मानकर पहना जाएगा । वास्तव में जो हो रहा है अच्छे के लिये ही हो रहा है, समाज को जाने अनजाने मितव्ययिता का पाठ सिखा रहे है ।
इतनी सारी दशा-दर्ुदशा के पश्चात भी कुछ बचा था मन को उल्लसित बनाने के लिये कि शहर में बढ रही गाडी दर्ुघटनाओं की कथाएं……. कही किसी गाडी ने चार लोगों को ऐसी पटकनी मारी कि वे बेचारे धराशायी हो गये, कही किसी पर ऐसी दया दिखाई कि उसके पेट की सारी अतडियां बाहर आ गयी । कही किसी को किसी कारण से ऐसा गुस्सा आ गया कि गोलियाँ चल गयी । दो पक्षों की तनातनी में कब कौन गरीब, निरीह, दुखियारा आ जाये और अपनी जान गँवा बैठे कोई नहीं जानता । घर से निकला व्यक्ति घर के अन्दर ठीक-ठाक वापस आएगा कि नहीं केवल पशुपतिनाथ ही जानते हैं ।
ज्ाो भी हो देश तो अपना ही है । अच्छा हो बुरा हो, छोडा तो नही जा सकता । आज नही तो कल रहना तो यही है फिर चाहें मुँह में धूल भरे या अनाज के दाने ……… !
हम तो देश प्रेमी हैं उसे नकार नहीं सकते । बचपन में पढी-सुनी गयी चीजों को झुठला भी तो नहीं सकते । कवि रामनरेश त्रिपाठी के शब्द अनुसार…….
“विषुबत रेखावासी जो जीता है नित हाँफ-हाँफकर, रखता है अनुराग अलौकिक वो भी अपनी मातृभूमि पर ध्रुबवासी जो हिम में -तम में जीता है नित काँप-काँपकर, वो भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर ।”

विराटनगर सीमा पर फूल का आदान-प्रदान::-वरुणमाला मिश्रा

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

विगत दिनां भारत-नेपाल के जोगवनी सीमा पर दोनों देशों के सैकड नागरिक एक दूसरे को फूल भेटकर आपसी भाईचारे व पुरानी बेटी-रोटी के सम्बंधो की याद को ताजा कर दिया । कार्यक्रम का आयोजन भारतीय क्षेत्र से हिन्दूस्तान दैनिक के पत्रकार वरुण मिश्रा तथा नेपाल क्षेत्र से पिताम्बर दहाल ने किया । भारत-नेपाल की सीमा के नोमेन्स लैण्ड क्षेत्र में आयोजित उक्त रक्तदान कार्यक्रम में नेपाल संविधान सभा के सभासद मोती दुग्गड तथा अररिया के पर्व सांसद सुकदेव पासवान भी शामिल हुए । कार्यक्रम में बोलते हुए सभासद श्री दुग्गड ने कहा कि नेपाल-भारत के बीच के संबंध को जिसे कोई ताकत तोडÞनही सकती । भारत-नेपाल के बीच दूरी पैदा करने की कोशिश कभी पूरा नहीं होगा । उन्होंने कहा वर्तमान समय वाकयुद्ध करने का नही बल्कि देश को र्सवमान्य संविधान देकर राजनीति स्थिरता शांति-सुरक्षा की स्थिति में सुधार और आर्थिक प्रगति हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए ।
इस मौके पर चार बार सांसद रह चुके श्री पासवान ने कहा कि भारत नेपाल के बीच तनाव पैदा करने वालांे की मंशा को भारत-नेपाल सीमावर्त्तर्ीीलाके के लोग भलीभांति समझते है । यहाँ के शांतिप्रिय वाशिदें दोनां देशां के किसी भी दूरी को पाटने में सक्षम है । कार्यक्रम का शुरुआत दोनों देशों से पहुँचे जनप्रतिनिधियों ने गुल्ादस्ता आदान-प्रदान तथा गले में माला पहनाकर की । इस मौके पर मौजूद दोनों देशांे के नागरिक एक दूसरे को फूल दे गले लगाये, और सदभाव कायम रखने की बात कही । कार्यक्रम में नेपाली राष्ट्रीय गीत तथा भारतीय राष्ट्रीय गीत से सीमा गूँजमान रहा । कार्यक्रम संचालन हेतु दोनों देश की सीमा पर पुलिस प्रशासन सक्रिय रहे तथा कार्यक्रम शांतिपर्ूण्ा आपसी भाईचारे के साथ सम्पन्न हुआ ।

गुटबाजियों की पकड::दिनेश यादव

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

तर्रार्इर्र्मधेश से जुडे मुद्दं सत्ताधारी मधेशवादी दलों के लक्ष्य से बहुत दूर होता नजर आ रहा है । इसीलिए तो मधेशीयों के साथ भेदभाव की रणनीति अभी भी राज्य और उसके पृष्ठपोषकों के द्वारा जारी है, अपनाई जा रही है । मधेश के सभी ज्वलन्त मुद्दो को एक-एक कर के कुचला जा रहा है । उदाहरण के लिए, विगत में मधेशवादी तीन दल -मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, तर्राई-मधेश लोक तांत्रिक पार्टर्ीीौर सदभावना पार्टर्ीीसहित मोर्चा के साथ हुए ‘मधेश स्वायत्त प्रदेश’ सहित के आठ बूंदे सहमति का यहाँ अन्त्येष्टि की तैयारी चल रही है । मधेशियों के बीच विभाजन की मोटी लकीर खींची जा रही है । भाषा, धर्म, संस्कृति और भूगोल के नाम पर इसे यू कहा जायें की मधेश और मधेशियों के ऊपर ‘जघन्य’ राजनीतिक हरकतें, पहले की तरह दुहराया जा रहा है , परन्तु सत्ताधारी मधेशी नेता मौन है, चुप्पी साधे हुए है और अपाहिज समान बन कर बैठे हुए है । सत्ता से बाहर रहे मधेशवादी दलांे की भी भूमिका इससे बिल्कूल अलग नहीं है । इससे तो यह साबित होता है कि तर्रार्इर्र्मधेश के राजनीतिक पार्टियों और उसके नेता, कार्यकर्ता के दिलो-दिमाग से गुलामी स्वीकारने की बात अभी भी खत्म नहीं हर्इ है । वह अब भी औपनिवेशिक मानसिकता के शिंकजे से पूरी तरह उन्मुक्त नहीं हो पा रहे है ।
विगत में शुरु हुआ बिना मुआवजा के मधेशियों के भूमि हडÞपने की प्रस्तावित सरकारी नीति, तर्राई-मधेश केन्द्रीत विशेष सुरक्षा योजना, उपराष्ट्रपति के हिन्दी भाषा सपथ प्रकरण, बहुमत के आधार पर समग्र मधेश का बँटवारा और बिना प्रमाण के भ्रष्टाचारी का बिल्ला लगा कर मंत्रालय से एक मधेशी मन्त्री को पदमुक्त करने के सभी कार्यो में षडयंत्र की गन्ध है । यह सभी वर्षो से सत्ता और उसके सामीप्य में रह रहे लोगों के सामूहिक षडयंत्र के तहत हो रहा है, और होगा । इन षडÞयंत्रों के प्रमुख योजनाकार नेपाली कांग्रेस और एमाले है । जो मधेश और मधेशियों के कभी भी अधिकार सम्पन्न बनाना नहीं चाहते है । कुछ संचारकर्मी भी वैसे लोगों का साथ दे रहे है । पिछले दिनों रामचन्द्र कुशवाहा उसी षडयंत्र के शिकार हुए । उन्हें शिक्षा मंत्री पद से हटाकर र्सर्वेश्वर प्र. शुक्ला को नया शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया है । नेपाली में एक मुहावरा है -’सानालाई ऐन र ठूलालाई चैन’ अर्थात कानून बडे लोगों के लिए नहीं, कमजोर लोगों के लिए होता है । समग्र मधेशियों के लिए यह एक बहुत बडे दर्भाग्य की बात है । विश्व के किसी भी देश में बिना न्यायिक छानबीन किये किसी को भ्रष्टाचारी तक नहीं कहा जा सकता, परंतु यहाँ लेखा-समिति के रिर्पोट के आधार पर भ्रष्टाचारी घोषित कर पदच्यूत भी कर दिया गया ।
जानकार सूत्रों के आधार पर कहा जा सकता है कि तमलोपा -जिसका जन्म भी विवादस्पद ही हैं कि किस मकसद को लेकर हुआ) सरकार में शामिल हो या न हो, मंत्रीपद वितरण, मंत्री की वापसी आदि सभी प्रमुख निर्ण्र् एक अदृश्य ‘प्रभु’ के हाथांे संचालित हो रहा हैं । जबकि कुछ लोगों का कहना है कि गुटबाजी में माहिर पार्टर्ीीे कुछ वरिष्ठ नेता मनमानी कर पार्टर्ीीे भीतराघात करने में जुटे हुए है । पार्टर्ीीmारवार्ड कम्युनिटी मर्सर्ेेबैकवार्ड कम्युनिटी और डेमोक्रेटिक लीडर मर्सर्ेेकम्यूनिष्ट लीडÞर का आखाडÞा बनता जा रहा है । उससे पार्टर्ीीें दिनों-दिन दुष्परिणाम के शिकार हो रहे है पार्टर्ीीे सक्रिय कुर्छर् इमानदार कर्मठ, संर्घष्ाशील और प्रतिभावान युवा सभासद नेता एवं कार्यर्कर्त्तर्ाा
‘कुशवाहा प्रकरण’ का खेल उसी दिन से खेला जा रहा था जिस दिन मंत्रीमन्डल में राज कुमार शर्मा और जितेन्द्र सोनल जैसे कर्मठ युवा नेताओं को दरकिनार कर रामचन्द्र कुशवाहा को मंत्री बनाया गया । लेकिन शिक्षा विभाग के विभिन्न विवादों के वजह से रामचन्द्र कुशवाहा सही ढंग से अपने मंत्रालय के कार्यो को अन्जाम नहीं दे पा रहे थे । ‘राहत शिक्षा दरबन्दी’ कार्यक्रम में रामचन्द्र को बुरी तरह उनके अपनों ने ही फँसाया परन्तु उन्हें सफाई देने या अपना पक्ष रखने का मौका दिये बिना ही उनके व्यक्तिगत प्रतिद्वन्दियों नेे उन्हें पदच्युत कराने में सफल रहे । र्सार्वजनिक जीवन में आर्दश और्रर् इमानदारी पर भाषण करना एक बात है लेकिन अपनी निजी जिन्दगी में इस पर अमल करना बिल्कूल अलग बात है । कथनी और करनी का यह र्फक इतनी गहर्राई तक हमारी संस्कृति और सोच में घुसा पैठा है, इस पर बहस तक करना समय को जाया करना है । लेकिन यह कडÞवी सच्चाई है और इसकी वजह से मधेश के राज नेताओं पर अगुँली भी उठती रहती है । समाज के नैतिक मूल्य पानी की तरह ऊपर से नीचे बहते है । इन्सान की स्वभाविक वृति होती है कि वह खुद से ऊपर वाले लोगों को देखकर अपने सामाजिक मूल्य तय करता है । ऐसे में सत्ता में बैठे लोग अपने आप आम नागरिकों के लिए सर्न्दर्भ बिन्दु बन जाते है । तमलोपा के कार्यकताओं से नेताओं तक की स्थिति अभी ऐसी ही है ।
उधर मधेश और मधेशियों के विरुद्ध खस नेपाली भाषियों का सामूहिक षडÞयंत्र चल रहा है । मधेशियों को कमजोर और भ्रष्ट्र प्रमाणित करने का प्रयास चल रहा है । इसको पहचानने की ताकत मधेशवादी पार्टर्ीीौर उसके नेताओं में नहीं है । मधेशवादी जब भी सत्ता में गया है, मधेश और वहाँ के रहने वालो के लिए कुछ भी नहीं कर पाया हैं । नेतागण जानबूझ कर अथवा इच्छाशक्ति के अभाव में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे है ।

नेपाली उपनिवेशवाद पहाडी राष्ट्रवाद की उपज::फतेह बहादुर सिंह

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

उपनिवेश वाद वह शासन है जिसका संचालन विजेता राष्ट्र विजित राष्ट्र की जनता पर करते है तथा उसे दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है । परन्तु विडम्बना की बात यह है कि पहाडी राष्ट्रवाद ने मधेशी जनता को केवल विदेशी नागरिक माना तथा उन्हें नेपाल की नागरिकता से वंचित रखा । जय कृष्ण गोईत के अनुसार स्वयं पहाडी राष्ट्रवाद ने मधेशी जनता को नेपाली नागरिक न मानकर यह प्रमाणित कर दिया है कि शाह वंशी गोर्खाली सेनाओं ने मधेश पर आक्रमण कर सम्पर्ण्र्र्राई में नेपाली उपनिवेश कायम किया था । अतः गोईत के अनुसार गोर्खाली उपनिवेश वाद से मधेश को संप्रभुता सम्पन्न होकर उपनिवेश की स्थिति से मुक्त होना चाहिए । नेपाल के विभिन्न समुदायों को जिनकी अपनी स्वतंत्र भाषा, संस्कृति तथा परम्पराएं हैं आत्म निर्ण्र्के अधिकार को देकर संघीय गणराज्य बनाना उचित होगा । परन्तु पहाडी राष्ट्रवाद ऐसा करने देने को तैयार भी नही है तथा विभिन्न राष्ट्रीय समुदायों की जनता को नेपाल का नागरिक मानने को भी तैयार नही है ।
पहाडी देश होने के कारण नेपाल में जातीय, भाषिक तथा सांस्कृतिक विविधता होना स्वाभाविक है । अतः पृथ्वी नारायण शाह को नेपाल का एकीकरण करने की आवश्यकता नहीं थी क्योकि तब विभिन्न जात-जातियों का स्वतंत्र अस्तित्व कायम रहता तथा सांस्कृतिक एकता को बढावा दिया जा सकता था । भारत में गृह मंत्री सरदार पटेल द्वारा ५६२ देशी रियासतों को भारत संघ में मिलाना अपरिहार्य था, क्यांेकि भारत दो हजार वर्षतक विदेशियों का गुलाम रहा था परन्तु नेपाल ने इतिहास में कभी भी गुलामी देखी नहीं थी । नेपाल के राज्य वैदिक कालीन राज्यांे मगध, कोशल या विदेह जैसे स्वतंत्र रह सकते थे । परन्तु यदि नेपाल का एकीकरण करना ही था तब शाह वंश के राजाओं को पहाडी राष्ट्रवाद के स्थान पर नेपाली जनता का राष्ट्रवाद बढाना चाहिए था । परन्तु ऐसा न होकर गोर्खाली राष्ट्रवाद शासक वर्ग का सीमित एवं संकुचित पहाडÞी राष्ट्रवाद ही बनकर रहा ।
पहाडी राष्ट्रवाद आम पहाडी जनता का राष्ट्रवाद न होकर सवर्ण्र्तियों तथा जमीन्दारां एवं सामन्तों का राष्ट्रवाद रहा जिस में नेवार, गुरुङ, मगर, एवं समुदायों का शोषण तथा भेदभाव होता रहा । आम नेपाली जनता को उनके नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया । विशेषकर पहाडी राष्ट्रवाद का शिकार मधेश की भारतीय मूल की जनता होती रही । राष्ट्रवाद ने उन सभी व्ास्तुओं से घृणा करना सिखाया जिसका संबंध भारत से था । इसीलिए पहाडी राष्ट्रवाद मधेशी जनता से घृणा भारत से घृणा का पर्याय बन गई । इसीलिए राजा महेन्द्र तथा राजा वीरेन्द्र के शासन काल में नेपाल तथा भारत के संबंध में गर्माहट का अभाव रहा तथा चीन से नेपाल की निकटता ने नेपाल में साम्यवाद को बढावा दिया तथा प्रजातंत्र को कमजोर किया । पंचायत काल में नेपाल के शासन तंत्र में कम्युनिष्टों का वर्चस्व रहा, जिससे राजीव गांधी के कार्यकाल में नेपाल भारत के संबंध में खटास आई तथा बी.पी. कोईराला के मेल-मिलाप की नीति अर्न्तर्गत आंदोलनरत नेपाली कांग्रेस कार्यकर्ता विदेशी भूमि का परित्याग कर नेपाल वापस आए । इस पहाडी राष्ट्रवाद ने थारु त्ाथा मधेशी जनता को अपना दास मात्र समझा तथा उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित रखा । राणा शासन कुलीन तंत्र होने के कारण कुलीन तंत्र पंचायत काल में भी हावी रहा । राजा महेन्द्र ने कुछ क्रांतिकारी कदम उठाया परन्तु उन्हें कम्युनिष्टों का र्समर्थन प्राप्त नहीं हो सका । यद्यपि भारत विरोधी नीति ने नेपाल को चीन तथा साम्यवाद के निकट ला दिया ।
पहाडी राष्ट्रवाद के कारण ही नेवार, लिम्बू, खम्बू तथा मधेशी एवं थारु संघीय गणराज्य के पक्षधर है । अतः पहाडी राष्ट्रवाद नेपाल राष्ट के संभावित विखंडन के प्रति सशंकित है । यदि पहाडी राष्ट्रवाद ने नेपाल के विभिन्न जात-जातियां तथा नागरिक अधिकार प्रदान कर उनके साथ सह अस्तित्व की भावना का विकास किया होता तब नेपाल की एकता का सुदृढीकरण होता तथा विखंडन की आशंका ही नहीं होती । पहाडी राष्ट्रवाद में एक ही भाषा, एक ही धर्म तथा एक ही संस्कृति को सर्वोच्चता प्रदान की गई तथा अन्य भाषाओं, वेश- भूषा तथा संस्कृतियों को दबाया गया तथा निरुत्साहित किया गया । जिससे विभिन्न जात-जातियों के लोग पराधीनता की भावना का अनुभव करने को बाध्य हुए । पंचायत काल में पहाडी राष्ट्रवाद चर्रमात्कर्षपर था तथा सभी राष्ट्र सेवको को राष्ट्रीय वर्दी धारण करने तथा नेपाली भाषा में वार्तालाप करने का आदेश था । इससे आम जनता मंे पंचायती व्यवस्था के विरुद्ध व्रि्रोह की भावना उत्पन्न हरुइ जिससे संसदीय प्रजातंत्र की पर्नर्बहाली हर्इ तथा अधिनायकवाद एवं कट्टरवाद समाप्त हुआ । जनता ने स्वतंत्रता की अनुभूति की, क्यांकि बहुदलीय व्यवस्था में उन्हें यह अनुुभव हुआ कि उनकी जातीय तथा सांस्कृतिक विविधता को मान्यता मिली है । सभाओं में राजनैतिक दलों के नेतागण हिन्दी, नेवारी, मैथिली तथा भोजपुरी भाषाओं में र्सार्वजनिक भााषण करने लगे तथा गिरजा प्रसाद कोईराला की सरकार ने नागरिकता विधेयक को संसद में दो तिहाई बहुमत से पारित कराकर आम जनता को यह सोचने को बाध्य कर दिया कि पहाडी राष्ट्रवाद नेपाली राष्ट्रवाद में परिणत हो गया है । परन्तु राजा वीरेन्द्रद्वारा नागरिकता विधेयक पर हस्तक्षेप न करने के कारण नेपाली जनता यह सोचने को बाध्य हो गई कि पहाडी राष्ट्रवाद के कट्टरवाद में कमी की अनुभूति उनका भ्रम था ।
राजा ज्ञानेन्द्र ने पहाडी राष्ट्रवाद को र्सवाच्च शिखर पर इस प्रकार पहुँचाया कि पहाडी राष्ट्रवाद मधेशी जनता का शत्रु बन गया । राजा ज्ञानेन्द्र का खुले रूप में नेपालगंज तथा तर्राई से घृणा ने मधेशी जनता को जन आंदोलन में सक्रिय सहभागी होने की प्रेरणा दी । राजा के लिए किसी विशेष प्रदेश तथा वहां की जनता से घृणा जनता की सहनशीलता के बाहर की बात है । प्रजातांत्रिक सरकार को अपदस्थ करना संवैधानिक राजा के अधिकार क्षेत्र में नहीं था । इसलिए सम्पर्ूण्ा राष्ट्र राजा ज्ञानेन्द्र के पहाडी राष्ट्रवाद के विरुद्ध खडा हो गया तथा राजसंस्था को सदा र्सवदा के लिए समाप्त कर दिया ।
परन्तु पहाडी राष्ट्रवाद अब भी जीवित है तथा नेपाल को संघीय गणंतत्र में परिवर्तित करने का विरोध कर रहा है । मधेशी जनता पहाडी राष्ट्रवाद से सदा संर्घष् करती रहेगी तब तक जब तक की पहाडी राष्ट्रवाद नेपाली राष्ट्रवाद में रूपान्तरित नहीं होता है ।

कैन्सर ग्रसित नेपाल::योगेन्द्र प्रसाद साह

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पाकिस्तान के नामी क्रिकेटर इमरान खान की मां कैन्सर की बीमारी से मरी थी । कैन्सर की हृदयविदारक पीडा का अनुभव रोगी के अलावे उसके घर वालों को भी अच्छी तरह होता है । महंगा इलाज खर्च और घर के अन्य स्वस्थ लोगों की परेशानी प्रत्यक्ष अनुभव किया । इस पीडा से द्रवित हो कर उन्होंने स्वर्गीय मां के नाम पर अपनी क्रिकेट जिन्दगी की सारी कमाई से एक कैन्सर अस्पताल खोला । नेपाल में सुनियोजित भ्रष्टाचार कैन्सर की पीडा जैसी उत्पीडन देने लगी है । बहुउपयोगी योजनाओं से अगर कमीशन हाथ न लगे तब उस योजना के खिलाफ ही शोर मचा कर स्थगित रखा जाता है । बडी परियोजना शुरु होते ही कमीशन के लिए इस देश में अनेक प्रविधि का अविष्कार किया जाता है । परियोजना अवधि में अनेक अवरोध सृजना करके अनेक किस्म से कमीशन प्राप्त करने का खेल खेला जाता है । लागत इस्टिमंट से कमीशन प्राप्त करने का खेल किया जाता है । इस प्रकार निर्माणाधीन परियोजना काफी महंगी साबित होती है । मध्य मरस्यांगदी विद्युत परियोजना इसका ज्वलंत उदाहरण है । १२ अरब रुपयों के बदले २८ अरब रुपयो का खर्च नेपाल को उजाडने का मिशाल छोड गया । कमीशन नही मिलने से अरबांे रुपयो की निर्माण सामग्री की बर्बादी की कहानी अलग है । कीमती मशीनरी और लोहे का १० का पाइप के नष्ट होने की कहानी आए दिन टीवी चैनलों पर दिखाए जाते हैं । अधूरी योजनाओं से देश अटा पडा है । बडे कलकारखानों में जंग लग रहे हैं । वीरगंज का सरकारी चीनी मिल, बुटवल का धागा-कारखाना, कृषि औजार कारखाना इत्यादि अनेक उदाहरण हमारे सामने है । भ्रष्टाचार से उत्पन्न समस्याएँ कैन्सर रोग की तरह पीडादायक साबित हो चुकी है । भ्रष्टाचार हमारी राष्ट्रीय संस्कृति बन चुकी है । जिस राजनीतिक पार्टर् नारा जितना उतेजक है -उसकी आमदनी उतनी ही अधिक है । साम्यवादियों का विलासी जीवन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से अधिक देखी गई है । न कोई इस देश में साम्यवादी है न प्रजातंत्रवादी है । इस देश में सिर्फतस्कर, अपराधी, कमीशनखोर और भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है । इन क्रिया-कलापों की वजह से पूरे देश की जनता कैन्सर रोग जैसी पीडा अनुभव कर रही है, छटपटा रही है । बच्चे आये दिन रेत कर मारे जा रहे है । गोलियों से भूने जा रहे हैं । हाल ही में काठमांडू के गोछाटार में रत्नलामा नामक साम्यवादी साधारण झगडे के कारण सन्तोष कार्की नामक १० वषर्य बालक को दिन में गोली मार कर मौत की नींद सुला चुका है । इस प्रकार की घटना घट रही है । जनता हतप्रभ है, निराश है,क्रन्दन कर रही है, विवश है, इन्साफ की आशा मर चुकी है । संयुत्त राष्ट्र संघ चीख चीख कर दण्डहीनता को समाप्त करने का आग्रह कर रहा है । किन्तु सत्ता के खेल में हिंसा, अपराध को जायज माना जा रहा है । सबसे बडी विडम्बना यह है कि इस अनैतिक कर्म को प्रयोग में लाने वालों में प्रजातंत्रवादी समूह भी है । चाहे १६ प्रजातंत्र वादी समूह राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय हो ।
जनता पूरी तरह अभी शोषण और लूट की शिकार है । नेताओं की एक सभा में ५० लाख रुपयो का खर्च है । पुराने सामन्त इन नेताओं से बहुत अधिक शालीन थे । जंगल, जमीन और जल को बचा कर रखा था । लोग कहा करते थे अगर ऐसा नहीं होता तो ब्रिटिश सरकार गोर्खा पल्टन नहीं बनाती । खाद्यान्न नेपाल से बाहर जाता था । भूमि सुधार करके सामन्त शाही खत्म हो गई, किन्तु पंचायत की नादिर शाही ने पहाडी उच्च जाति को क्रूर सामन्त के रूप में परिणत कर दिया । यही प्रक्रिया नेताशाही में तीव्र रूप में जारी है । किसी भू-सामन्त के पास कार नहीं है, किन्तु नेताशाही में पहाडी उच्च वर्ग के लिए इसी साल के बीते तीन महीनों में ७ अरब रुपयो के सवारी साधनां का आयात हुआ है । इनमें नौकरशाहां और नेताशाही के सदस्यों की खरीददारी शत प्रतिशत है । लूट-प्रक्रिया अभी विजयाभियान के रूप में राजनीतिक वृत में संचालित है । गरीबी तो नेपाल में थी ही, अब मध्यम वर्गीय लाखों परिवारों से धन छीनकर उन्हें गरीब बनाया जा रहा है । देश में एक प्रकार से कुहराम मच गया है । गाँव श्मशान भूमि में बदल रहा है । भ्रष्टाचार कैन्सर की तरह देश की जनता की जिन्दगी तबाह कर रही है । कैन्सर की तरह जनता का दुःख लाइलाज है ।
जिस प्रकार से कैन्सर का रोगी पीडÞा से छटपटाता है और बीमारी से मुक्ति का उपाय नहीं मिलता उसी प्रकार से नेपाली जनता छटपटा रही है । मुक्ति का उपाय नहीं सूझ रहा है । मजाक तो यह है कि साम्यवादी ही पाँच तारा होटलों में खाना खा रहे हैं और बिजली विभाग और मेलम्ची की करोडो रुपयो की गाडियां में मुफ्त की सैर कर रहे हैं । क्या इमरान खान यहाँ पैदा नहीं होगा जो इस कैन्सर रोग -भ्रष्टाचार) के लिए अस्पताल खोल सके – कैन्सर रोग के वायरस -भ्रष्टाचार) से नेतृत्व पंक्ति को क्या निष्क्रिय नहीं किया जा सकता है – अभी इसका आविष्कार कोसो दूर दीख रहा है ।
अब तक नेता अपनी कर्र्सर्लिये बन्द कराते रहे हैं । अब जनता को एक बार भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ नेपाल बन्द घोषणा कर विरोध कार्यक्रम अवश्य शुरु करना चाहिए । क्या जनता अपनी ताकत का पर््रदर्शन कर सकेगी – अगर देर होगी तो अन्धेर भी होता ही रहेगा ।

“अनिष्ट का निमन्त्रण”::लक्ष्मी नारायण चौधरी

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

शान्ति क्षेत्र नेपाल जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ, वहाँ हर कोई द्वन्द एवं सेना की बाते कर रहा है । जैसा कि माओवादी सेना, थारू सेना और अब तो मधेशवादी दल भी मधेशी सेना का । सब सत्ता की रोटी जनता के विश्वास की आँच पर सेंक रहे हैं । सच ही कहा है जैसा बीज होगा वैसा ही फसल होगा । दूसरी ओर “मधेश तर्राई फोरम” का उदय इस विषम परिवेश मे हुआ, फिर भी अहिंसा की लडर्ई लड रहा है । घर-घर जाकर जनता को अपने अधिकार और स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए प्रेरित कर रहा है । जिस कार्य हेतु जनता ने बलिदान दिया और अपनी मांग को सम्बोधित करने के लिए प्रतिनिधि को संविधान सभा में भेजा वे लोग इन सबकी खिल्ली उडाते हुए और मानमर्दन करते हुए सत्ता की डफली बजा रहे हैं । एक दूसरे का पैर खींच रहे हैं और देश के भविष्य और जनभावना से खिलवाड कर रहे हैं । यहाँ तक कि जिस देश से “रोटी और बेटी” का नाता है अर्थात धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दायरे में रहते हुए सुलझाना चाहिए न कि अतिरंजित नारा से । माओवादी के उत्तेजित विरोध के कारण भारतीय जनता में भी नेपाल विरोधी भावना उत्पन्न होने लगी है । सरकार से भी ज्यादा अगर भारतीय जनता चिढ गई तो नेपाल-भारत सम्बन्ध में ज्यादा खटास और क्षति होने की संभावना बढ जाती है । जिस सम्बन्ध की नींव राजा जनक ने सीता और राजा विराट ने उत्तरा से रखा था, उस पर दलीय स्वार्थ की किल ठोकना कितना उचित है – भारत को अभी चिढाने का उद्देश्य कही संविधान सभा से ध्यान भंग करना तो नहीं — नेपाल की राजनीति मे भारत का विरोध करने वाले खुद कुछेक भारतीय एजेन्सी के स्वार्थ अनुरूप परिचालित होते हं । अभी के संक्रमणकालीन स्थिति में भारतीय विस्तारवाद का विरोध करना, राष्ट्रीय स्वाधीनता की खोखली बात करना एक नौंटंकी की तरह प्रतीत हो रहा है ।
हम नेपाली जनता राजा पृथ्वी नारायण शाह के “दिव्य उपदेश” को भूल गए हैं जो उन्हांने “भारत-नेपाल-चीन” सर्ंदर्भ मे दिया था । आज उसी सोच की जरूरत है । अतः राज्य पर्ुनर्संरचना, आर्थिक रूपान्तरण और राष्ट्रनिमार्ण्र योजना बनाने के लिए एक बार फिर नेपाली जनता को जागना होगा और सक्रिय सहभागिता दिखाते हुए राजनीतिक दलों को संविधान और जनता के प्रति जिम्मेवारी का बोध कराना होगा । ताकि निर्धारित समय में जनादेश अनुरूप संविधान का निर्माण हो सके ।

संविधान सभा और मधेश::अमर यादव

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

वहुत लम्बे समय के बाद नेपाल में संविधान सभा का चुनाव कराया गया है । अन्तरिम संविधान २०६३ को किस्ताबन्दी के आधार पर संशोधन करते हुए नया संविधान बनाने की राह पर नेपाल आगे बढा है, परन्तु मधेश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चित्रण के बिना क्या यह देश आगे बढ पायेगा । पूरी दुनिया जहाँ परिवर्तन की राह पर है वही मधेश को नये संविधान के जरिए भी फिर से धोखा मिलना तय है । सवाल मधेश की आजादी का है आज आन्तरिक और बाह्य दोनां रूप मं मधेश को आजाद कराने की बात है । खस विस्तारवाद के जरिए मधेश की भूमि पर कर वसूली करते हुए मधेश को नेपाल अधिनस्त कर लिया गया । मधेश में आज परतन्त्र मधेश की आवाजें उठ रही हं और एक दिन यह स्वतन्त्र भी होगा । खस उपनिवेशिकरण से मधेश को मुक्त कराना होगा ।
खस शासकां की निगाहे मधेश की जमीन और जंगलो पर है, जिसे वो अपने विस्तारवाद ) की नीति के तहत रातां-रात दखल करते जा रहे हं । महेन्द्रपथ की नीति से लेकर प्रचण्डपथ तक चार दशक के अन्तराल में मधेशियों को मुख्य रूप से गुलाम बनाया गया । नये संविधान के जरिए फिर से खस विस्तारवाद को मधेश पर लादा जा रहा है जो हमे मंजूर नहीं । एक तरफ एकात्मक राज्य की बातें उठायी जा रही हं तो दूसरी तरफ संघीय और तीसरी तरफ स्वतन्त्र मधेश राष्ट्र की ।
इन बाता और मधेश के सशस्त्र संर्घषारत संगठनों को नये संविधान के निर्माण कार्य राज्य और सविधानसभा नजर अन्दाज कर आगे बढ रही है जो देश को फिर से गुहयुद्ध में ले जाएगा । संसद पुनः स्थापना के बाद भी जिस खस सेना की वापसी बैरक में होनी चाहिए थी जो नही हुआ । आज भी खस पहाडी सेना मधेश में ही है और स्थायी बैरक का निर्माण कराया जा रहा है । सशस्त्र प्रहरी बल का भी स्थायी बैरक बनाया जा रहा है, माओवादी लडाकू का प्रमुख सात शिविर मे से मधेश मे ही छह शिविर है ।
यह संकेत साफ तौर पर है कि मधेश मे सैनिकीकरण बढाया जा रहा है, एक तरफ राज्य के जरिए आंतक को बढावा देकर मधेश को कुरुक्षेत्र मे रूपान्तरण कराया जा रहा है । मधेश से क्यों नही सैनिके को वापस बुलाया गयी । माओवादी लडाकू में भी खस पहाडी सेना ही है । पहले से नेपाली सेना के नाम पर करीब एक लाख पहाडी सेना है तो दूसरी तरफ माओवादी के लडाकु को नेपाल सेना समकक्ष की मान्यता देकर खस-पहाडी सेना की संख्या बर्ढाई जा रही है । मधेश मे पहाडी सेना की भारी संख्या में उपस्थिति खतरनाक इरादों की ओर संकेत है ओर भारत की सीमा खुली होते हुए भी वहाँ की सरकार और मधेशवादी दल खामोश है ।
दूसरी तरफ खस भाषा का विस्तार कर अन्य भाषाआं का अन्ता भाषिक औपनिवेशीकरण की खतरानक साजिश है । नया संविधान खस और हिन्दी दोने मे प्रकाशन हो, नई शिक्षा नीति मे सरकार हिन्दी को लागू कर सरकारी कामकाज की भाषा खस, तथा हिन्दी ही हो, इसकी आवाजे उठ रही है । हिन्दी और खस दोनों ही देवनागरी लिपि है । हिन्दी मधेशियों की प्रमुख मातृभाषा है जिसकी आबादी राज्य की आबादी का आधा भाग है । संविधान सभा अन्तिम पडाव पर है, राज्य का पर्ुनसंरचना नही किया गया है ।
जिला के नये सीमांकन के बिना ही मधेश के तथाकथित प्रदेश का खाका ड्राफ्ट किया गया है । भीतरी मधेश ) के भूभाग को पहाडी प्रदेश मंे सीमांकन करते हुए एक मधेश के निर्माण का समय यही है । यदि ऐसा नहीं हुआ तो मधेश के सीमांकन के लिए अन्तर्रर्ट्रय मध्यस्था और जनमत संग्रह की जरूरत होगी । क्या राज्य इसके लिए तैयार होगा – मधेश पर भाषिक और सांस्कृतिक दमन भी जोर पर है । मधेश कीे जमीन पर मधेशियों का अग्राधिकार क्या सरकार और संविधान सभा देगी – जहँा पहाडी समुदाय मधेश मं जमीन खरीद नही सकंगे – ये मुद्दे संविधान सभा में समाविष्ट होते दिखाई नही पडी रहे हैं। इसका विकल्प क्या है – संविधान सभा के बाद देश का ब“टवारा निश्चित है । मधेशी भूमि मेंे पहाडी सेना सहित पहाडिÞयों की वापसी, मधेश का सीमांकन और मधेशी की प्रमुख भाषा हिन्दी एवं उनकी अपनी संस्कृति की रक्षा ही उनका प्रमुख मुद्दा होगा । मधेशियों को इसके लिए तैयार होना होगा, यही एक रास्ता उसका अस्तित्व की रक्षा करेगा । क्या हम तैयार हैं – नहीं है तो क्या हमारी आवाम हमंे राजनीति करने देगी – संविधान सभा और मधेश इसी जमीन की तलाश पर खडÞी है । क्या यह भी फिलिस्तीन, तिब्बत और पर्र्वी तिमोर की राह पर है -

एक कदम आगे और तीन कदम पीछे “हिन्दी आन्दोलन”

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

महीने तक पद पर काम करने से महरुम नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानन्द झा फिर से अपने ओहदे पर बहाल हो गए हैं । दूबारा पद पर बहाल होने के लिए उन्हें भारी किम्मत भी चुकानी पडी । इस बार वे अपने इच्छा के अनुसार न तो धोती-कर्ता पहनकर और न ही अपनी जुबान हिन्दी में ही शपथ ले सकें । इस बार उन्होंने नेपाल के राष्ट्रीय पहनावा दाउरा, सुरुवाल और टोपी को पहना तथा देश की सरकारी भाषा नेपाली गोर्खाली में शपथ लिया । बाद में अपनी स्थानीय भाषा मैथिली में भी उन्होंने शपथ ली । इस बार उनका शपथ ग्रहण उतना अधिक विवादों से घिरा नही रहा परन्तु पर्ण्तः विवाद मुक्त भी नही रहा । विवादों से दूर इस मायने मं कि नेपाल के बहुसंख्यक नेपाली भाषा-भाषी लोग चाहते थे कि वे देश के उपराष्ट्रपति हैं लिहाजा उन्हें किसी नए परम्परा को जन्म देने के बजाय चुपचाप राष्ट्रीय पहनावा एवं देश की सरकारी जुबान में ही शपथ लेनी चाहिए जो कि उन्होंने किया भी । और विवाद इस कारण से कि पहली बार वे धोती-कर्ता पहनकर तथा हिन्दी मे शपथ लिए थे तब पूरा मधेश ने उनका इशतरबाल किया था, रातांरात वे मधेशियों के मसीहा बन गए थे । परन्तु इस बार के शपथ में वे पुरानी बातें नदारद थी लिहाजा मधेशियो को गहरा धक्का लगा और कहने वाले उन्हें दूसरे वेदानन्द झा भी कह रहे हैं ।
कौन थे वेदानन्द झा – वेदानन्द झा पर्र्वी मधेश के सिरहा जिले के थे । नेपाल में मधेशियों की समस्याओं को लेकर पहली बार उन्होंने ही एक पार्टी थी तर्राई कांग्रेस । तर्राई कांगे्रस ने मधेश की समस्या को काफी प्रभावकारी तरीके से उठाया था । सन् १९५८ के आम निर्वाचन में उनकी पार्टर्ीीी खाता तक नहीं खुली । नेपाली कांग्रेस ने उनके खिलाफ एक गैर मधेशी प्रत्याशी खडा कर उन्हें पटखनी दिला दी वह भी उनके गृह जिले में । वेदानन्द झा चार जगहों से चुनाव लडे थे परन्तु चारों स्थान पर उन्हें मुहं की खानी पडी थी । परजय ने उन्को इतना अधिक दुःखी बनाया कि उन्होंने बाद में मधेशी का नाम लेना ही छोडÞ दिया । सन् १९६० में जब तात्कालीन नरेश महेन्द्र ने देश की सम्पर्ण् सत्ता अपने हाथों में ले ली, तब झा ने भी उनका र्समर्थन किया और पुरस्कार के एवज में उन्हें देश के गृहमन्त्री बनने का अवसर मिला । बाद में भारत के लिए वे राजदूत भी बनाए गए । मधेशवाद को उन्होंने तिलान्जँली ही दे दी । वेदानन्द झा पर उँगली उठाने वालों के लिए रौतहट, ब्रम्हपुरी के एक शिक्षक राम एकबाल सिंह का करार जबाव भी था कि आखिर झा को ऐसा करने के लिए मजबूर किसने किया – वेदानन्द झा के बारे मे बस इतना ही कहा जा सकता है कि जिस जंग का आगाज उन्होंने किया था उसे अन्जाम तक पहुँचाए बिना खुद ही थक कर विचलित हो गए । नेपाल के वर्तमान उपराष्ट्रपति झा विधिवत्त निर्वाचित होकर उपराष्ट्रपति बने । एक वर्षसे अधिक समय तक उपराष्ट्रपति के पद पर उन्होंने काम भी किया । नेपाली भाषा-भाषी पत्रकार, वकिल, साम्प्रदायिक सोच के कुछ न्यायमर्ूर्ति एवं सर्वोच्च अदालत के पर्ूव प्रधान न्यायाधीश के पर्ूवाग्रही सोच -बकौल श्री झा) के कारण उन्हें पौष महीने तक कार्यालय में जाने से रोका गया । उन्हें पक्ष मंे न तो किसी मधेशवादी दल ने खुलकर र्समर्थन किया और नहीं सरकार पर दबाव बनाने का काम ही हुआ । सरकार में सहभागी मधेशवादी दल भी नहीं चाहते थे कि उपराष्ट्रपति झा बहुत हद तक जनता की सहानुभूति बटोरे । मधेशवदी दल के नेता होने का जो लाइसंेन्स उन्हें प्राप्त है उसे नवीकरण कराने में भारी कीमत चुकानी पडÞती । मधेशवादी दल सरकार से हटना भी नहीं चाहते थे और मधेशवादी एवं हिन्दी प्रेमी कहलाने का तगमा भी खोना नहीं चाहते थे । शुरु में तो उपराष्ट्रपति झा ने सर्वोच्च अदालत के आदेश को ठेंगा देखा दिया तथा सरकार में शामिल मधेशवादी दल के नेताओं की मान मनब्वल के बावजूद नेपाली भाषा में शपथ लेने के लिए आमादा नहीं हुए परतु इस साल की र्सर्दी ने उन्हें पूरी तरह से ठण्डा भी दिया और धोती कर्ुता को अलविदा भी कहा । हाँ साक्षी के रूप में मैथिली भाषा में भी शपथ जरुर लिया यह दिखलाने के लिए कि वे अब भी अपने पथ पर अडिग हैं । लेकिन लोग कैसे माने नेपाल में हिन्दी किसकी भाषा है – नेपाल में हिन्दी किसी की भी भाषा नहीं है । क्योंकि किसी की यह मातृभाषा नहीं । परन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चहिए कि नेपाल में राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त नेपाली -गोर्खाली) भाषा भी पहाडÞी मूल के ब्राहम्ाण और क्षेत्रीय के अलावा किसी की भी मातृभाषा नहीं है । और इन दो जाति की संख्या महज तीस फीसदी के करीब है । तो क्या ६० फीसदी वालों के साथ यह अन्याय नहीं है – जिस तरह नेपाली महज कुछ ही लोगों की मातृभाषा हैं अन्य भाषा-भाषी और ब्राहमण और क्षेत्रीय आपस में बातचीत के लिए नेपाली भाषा का सहारा लेते है नेपाली को सर्म्पर्क भाषा मानते है उसी तरह हर एक मधेशी के लिए सर्म्पर्क की भाषा हिन्दी है । नेपाली और हिन्दी नेपाल में ऐसी भाषाऐं है जिन्हें व्यापक रूप से सम्ाझी और बोली जाती हैं । ९० प्रतिशत से अधिक पहाडÞी लोग -गैर मधेशी) नेपाली भाषी लोग भी हिन्दी बोल सकते हैं, बोलते हैं, समझते हैं, लिखते हैं । इनकी बायोडाटा की फेहरिस्त देखिए सबके सब खुद को हिन्दी का भी जानकार मानते है । मधेश में अनपढÞ लोग नेपाली नहीं जानते तो वे आपसे हिन्दी में बोलकर अपनी बात कहना पसन्द करते है । गैर नेपाली भाषी भी मधेशियों के साथ हिन्दी में बाते करना ही पसन्द करते हैं । हिन्दी नेपाल में सर्म्पर्क भाषा के रूप में खुद को स्थापित कर चुका है । कला संस्कृति एवं साहित्य का इसमें अहम रोल है । हिन्दी की लडर्Þाई नेपाल में हिन्दी भाषा के लिए विगत दशक से लडÞी जा रही है । तर्राई कांग्रेस ही नही नेपाली कांग्रेस के दिग्गज नेता महेन्द्र नारायण निधि, रामनारायण मिश्र भद्रकाली मिश्र से लेकर काशी प्रसाद श्रीवास्तव तक इसकी मान्यता के लिए संर्घष् किए । नेपाल में लोकतन्त्र की हत्या के बाद पहला और र्सवाधिक बज्रपात हिन्दी पर ही हुआ और नेपाली से हिन्दी भाषा को बेदखल करने का सरकारी षडÞयन्त्र होता रहा । सन् १९९० के नवंम्बर के आखिरी सप्ताह में राजधानी के टुडीखेल में हिन्दी में पार्टी पहली बार जब भाषण देना शुरु किया तो स्थानीय लोगों ने रोडे-पत्थर वषर्ए । पार्टी एक नेता देवेन्द्र मिश्र की नाक पर गहरी चोटें आयी । अन्य नेता भी बच नहीं सके थे । इसी प्रकार नेताओ की नवल परासी, भैरहवा, वीरगन्ज आदि जगहों में विरोध का सामना करना पडा ।
सन् १९९१ के निर्वाचन में पार्टी कुछ सफलता भी मिली और संसद में हिन्दी भाषा को इसने मान्यता भी दिलवायी । ऊपरी सदन में इसके एक सदस्य रामेश्वर राय यादव ने करीब एक महीना के मशक्कत के बाद हिन्दी को स्थाप्ित कराने में सफलता पाई । सन् २००२ के मई के प्रथम सप्ताह में काठमाण्डू में आयोजित चार दलों की सभा में हिन्दी में भाषण देने के कारण दूसरे कार्यवाहक अध्यक्ष बद्री प्रसाद मण्डल को काफी विरोध झेलना पडा और अन्ततः वे अपना भाषण जल्दी बाजी में खत्म कर बैठ गए । जबकि उस मंच पर र्सर्ूय बहादुर थापा, गिरिजा प्रसाद कोईराला और माधव कुमार नेपाल भी विराजमान थे । जब नेकपा एमाले का महाधिवेशन हुआ बुटवल में, तब भी नेपाल सरकार के वाणिज्य एवं नागरिक आपर्ूर्ति मन्त्री एवं सद्भावना पार्टी अध्यक्ष राजेंद्र महतो को हिन्दी में बोलने पर भारी विरोध का सामना करना पडा । उस समय भी मंच पर सभी दल के आला नेता मौजूद थे और देश गणतन्त्र घोषित हो चुका था परंतु किसी ने एक न सुनी और उन्हें नेपाली में बोलने पर मजबूर किया गया ।
नेपाल के संविधान सभा के अभी उपस्थित करीब ९० सभासद किसी न किसी रूप में खुद को मधेशवादी मान्ते है । परन्तु हिन्दी के लिए लडर्ई आधे मन से लडी जा रही है । औपचारिकता में सीमित इस लडर्ई को या तो गम्भीरता से लडी जाए या फिर छोड ही दिया जाय । विगत दो-तीन वर्षों से विकसित घटना क्रम को देख कर यह कहाँ जा सकता है कि नेपाल में हिन्दीं के लिए जो लडर्ई जारी है उसमें गम्भीरता नहीं है । लगता है कि लोग अपने लिए नहीं किसी और के लिए लड रहे हैं । नेपाल के शासक जाति के लोग भी मधेशियों के इस उहा-पोह की अवस्था को नंगा कर रहे हैं और इल्जाम लगा रहे हं कि मधेशवादी दल हिन्दी की लडर्ई की आवश्यकता के लिए नही शौक के लिए लड रहे हं । इनकी आवश्यकता है तो पूरी शिरकत से लडी जाए नहीं तो नहीं । नेपाल में गजेन्द्र नारायण सिंह, रामजनम तिवारी और प्र्रो. कृष्ण चन्द्र मिश्र के दिवंगत हो जाने के बाद हिन्दी का आन्दोलन एक कदम आगे और तीन कदम पीछे होता दीख रहा है । नेपाल में हिन्दी भाषा के आन्दोलन के कमजोर होने या शिथिल होने से र्सवाधिक क्षति मैथिली, भोजपूरी अवधी और ऊर्दू सरिखे भाषाओं को होगी, जो सदैव एक दूसरे के अभिन्न रहे हैं ।

अनिश्चितताओं में फांसा देश::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On March - 21 - 2010 ADD COMMENTS

में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है । यह जितना होता है उतना ही होता है । लेकिन अर्द्धसत्य यह ऐसी चीज है जिसे हम अपने हित के अनुरूप घटा-बढा कर प्रस्तुत कर सकते हैं और करते भी हैं । दर्भाग्यवश्य नेपाली राजनीति आज इसी अर्द्धसत्य नामक कला का शिकार है । संचार माध्यमों में जब यह खबर प्रमुखता से उठती है कि मौजूदा सरकार गिरने के कगार पर है तो सम्बद्ध और असम्बद्ध पक्ष अपनी जय और पराजय को न्याय या अन्यायपर्ण् सिद्ध करने के लिए तर्को की तलवार उठा कर तैयार हो जाते हैं लेकिन तब ही यह खबर जंगल की आग की तरह फैलती है कि इस सरकार को नेपाली राजनीति के भीष्म पितामह का अभयदान मिला है तो न केवल राजनीति बल्कि पूरा देश ही आशा निराशा के घने कोहरे में घिर जाता है । दूसरे शब्दों में आमलोग अर्द्धसत्य का ही साक्षी बनते हैं और दोषारोपण होता है संचार माध्यमों की विश्वसनीयता पर । वैसे भी आमलोग जिन प्रवृत्तियों के प्रति नकारात्मक भाव रखते हैं, राजनीति के वही शस्त्रास्त्र हैं । इसलिए गिला शिकवा की कोई जगह नहीं । प्रचण्ड से कोईराला तक सभी एक ही मर्ज की बेअसर दवाएँ हैं ।
कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोईराला ने मौजूदा प्रधानमंत्री श्री माधव कुमार नेपाल को अपने निवास में बुलाकर इस बात के लिए आश्वस्त किया कि उच्चस्तरीय राजनैतिक सन्यत्र द्वारा वर्तमान सरकार को नहीं गिराया जाएगा और इसी सरकार के द्वारा नया संविधान जारी किया जाएगा । उन्होंने कहा कि शान्ति प्रक्रिया को निष्कर्षतक पहुँचाने और नया संविधान के लेखन का नेतृत्व इसी सरकार द्वारा होगा और इस विषय पर कोई दुविधा न रखने की सलाह दी । वस्तुतः अब तक के क्रियाकलापों में उच्चस्तरीय राजनैतिक संयन्त्र उच्चस्तरीय असन्तुष्ट राजनीतिज्ञों की अतृप्त आत्माओं की कुलाँचे भरने की ऐसी जगह है जहाँ सबके सुर-ताल एक से होते हैं । यहाँ सरकार की असफलता, उसकी प्रभावकारिता पर उच्चस्तरीय टिप्प्णियाँ होती है और सहमति के बिन्दु तक पहुँचते पहुँचते राष्ट्रीय सहमति की सरकार की बात सामने आती है । स्वाभाविक तौर पर माधव नेपाल का सिंहासन डोलने लगता है, हाशिये पर बैठे लोग ताल ठोंकने लगते हैं । सत्ता का स्वाद चख रहे लोगों के माथे पर पसीने छलकने लगते हैं । लेकिन इतना तो जरुर है कि अगर कांगे्रस सभापति यह आश्वासन खुले मन से दिया है तो यह उन्ाका बुजर्र्गी भरा कदम है क्योंकि मुख्य लक्ष्य फिलहाल देश की स्थिरता और संविधान का निर्माण है ।
निश्चित ही इस अभयदान से श्री नेपाल ने राहत की साँस ली होगी क्योंकि अपवित्र गठबंधनों के लिए कुख्यात नेपाली राजनीति में अल्पमत की सरकार चलाना ‘लोहे के चने चबाना’ जैसा कार्य है और पार्टर् बाहर ही नहीं भीतर भी उन्हें अपने समकक्षी या थोडे कनिष्ठ नेताओ की महत्वाकांक्षा से टकराना पडता है और उन्ाकी चुनौतियाँ झेलनी पडÞती है । वैसे भी सरकार का नेतृत्व सँभालने के बाद ही इस सरकार को राजनीतिक वृत्त में एक कमजोर सरकार के रूप में आकलन किया जा रहा था और जन्म के साथ इसकी आयु की अटकलें अभिव्यक्त होने लगी थी । कुछ कद्दावर नेता ने वर्त्तमान सरकार के मुखिया के साथ अपना स्तर न मिलने की बात करके उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास किया और मिलने की इच्छा लेकर दरवाजे पर पधारे बिन बुलाए मेहमान की तरह उन्हें बैरंग वापस कर दिया । इन मान-अपमानों के बीच श्री नेपाल की सरकार ने न केवल नौ महीने की अवधि पूरी की वरन् देश के सबसे लम्बे कम्युनिष्ट प्रधानमंत्री बनने की राह में हैं । इसलिए कहा जा सकता है कि जितनी उनसे अपेक्षा थी उतना उन्होंने दिया । आज विकास, व्यवस्था, शांति और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर निश्चय ही सरकार को घेरा जा सकता है लेकिन यह अन्तरिम और अल्पमत की सरकार है । इसलिए इन से बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं की जा सकती । आमलोग कष्ट में अगर है भी तो कुछ दिन और सही लेकिन देश को नया संविधान मिलना चाहिए और यह सरकार का अकेला दायित्व नहीं है ।
इस सरकार के साथ सबसे बडÞी विडम्बना यह घटित हर्ुइ कि संसद की सबसे बडÞी पार्टर्ीी्रारम्भ से ही इसकी सत्ता कबूल करने के लिए तैयार नहीं है और संसद से सडÞक तक उसने विभिन्न रूपों में अपना विरोध पर््रदर्शन किया है और यह प्रक्रिया बदस्तूर जारी है । इधर एक ओर श्री नेपाल को घर में बुलाकर उन्हें अभयदान दिया जा रहा था दूसरी ओर नेकपा एकीकृत सुप्रीमो गोरखा के आरुघाट में १३ गते फाल्गुन को बैठने वाले उच्चस्तरीय संयंत्र की बैठक में माओवादी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार बनाने का प्रस्ताव ले जाने की बात कही और शांति प्रक्रिया तथा संविधान निर्माण के लिए माओवादी के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार बनाने की आवश्यकता जतलायी । संसद का सबसे बडÞा दल होने के कारण उनकी इस महत्वाकांक्षा और माँग को बेवहजह नही कही जा सकता, लेकिन संसद में बहुमत का आँकडÞा उनके पक्ष में नहीं है । इसलिए उनका यह आग्रह दुराग्रह की सीमा में पहुँच गया है । बार-बार चोटे खाने के बावजूद वे जब इस मुद्दें को उच्चस्तरीय संयत्र में ले जाने की बात करते हैं तो इस बात की संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि इसमें उनसे सहानुभूति रखने वाले लोग है जो इनके आँसुओं के सहारे अपने लक्ष्य को साधने की महत्वाकांक्षा रखते है सत्तारुढÞ एमाले के प्रमुख नेताओं का एक समूह ऐसा भी है जो राजनीतिक गतिरोध के अन्त के लिए सरकार परिवर्तन का विकल्प भी खुला रखा है । निश्चित ही ऐसे नेताओं के मनोविज्ञान के तार उच्चस्तरीय संयंत्र से जुडÞे है और इसका प्रतिनिधित्व एमाले अध्यक्ष झलनाथा खनाल कर रहे है । मौजूदा राजनैतिक गतिरोध के समापन के लिए उनके आदर्श और धुमावदार वक्तव्यों का सीधा अर्थ आमलोग वर्तमान सरकार का नेतृत्व परिवर्तन की उनकी आकांक्षा के रूप में लगाते हैं । वस्तुतः खनाल भी उसी नेतृत्व परम्परा का विकास हैं जिसमें अपने ही दल की सरकार को गिराकर स्वयं को सता के शर्ीष्ा पर पहुँचाने की घटनाएँ इतिहास में हर्ुइ है । अपना मुँह बिगडÞा हो तो खाना बेस्वाद लगता ही है और अपनी मति फिर गई हो तो अपने भी बेगाने लगते है । रामायण का विभीषण और महाभारत का युयुत्सु इसी मनोभाव के शिकार रहे हैं । सवाल है कि जिस सहमति का तोता रटंत करते करते राजनीतिक के धुरंधरों की जुबान नहीं थकती, अगर कोई पक्ष सहमति में न जाने के लिए दृढÞ प्रतिज्ञ हो तो उसे कैसे सहमत किया जा सकता है – अगर उनकी शर्तो को मानकर सहमति की जमीन तत्काल तलाशी जाती है कि अन्य पक्ष असन्तुष्टों की कतार में खडÞा होकर विरोध और व्रि्रोह की आँधी नहीं खडÞा करेगा – इसलिए हमें मानना चाहिए कि सहमत उन्हें ही किया जा सकता जो सहमत होना चाहते हैं ।
इन सबके बावजूद अगर कांग्रेस सभापति द्वारा श्री नेपाल को जो अभयदान मिला है इसे एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है लेकिन उनकी इस सकारात्मकता के पीछे भी निहितार्थ हैं । वस्तुतः नेपाली राजनीति के वे महानायक है और इसकी नब्ज को भलीभाँति पहचानते हैं । वि.सं. २०४६ के बाद नेपाली राजनीति श्री कोईराला की अँगुली के इशारों पर चली है । यही कारण है कि वे बार बार सत्ता के शर्ीष्ा पर पहुँचे हैं । लेकिन संविधान सभा के बाद सबकुछ उनके अनुकूल नहीं हुआ । माओवादियों के विरोध के कारण राष्ट्रपति के चुनाव में अपनी अपराजेयता की गारंटी न देख ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा’ और देश के पहले राष्ट्रपति का गौरव रामवरणजी ले गए । संविधान सभा की सबसे बडÞी पार्टर्ीी बनने के कारण प्रधानमंत्री का पद प्रचण्ड के हिस्से में गया । इन घटनाक्रमों को कारण एक तरह से वे राजनैतिक रूप से हाशिये पर गए और उन्हें इस बिन्दु पर पहुँचाने में नेकपा माओवादी सुप्रीमो की भूमिका प्रबल रही । इसके बाबजूद पार्टर्ीीे अन्दर उन्ाकी दबंगता और स्वीकार्यता पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं था । लेकिन हाल के घटनाक्रमों में जब से सुजाता प्रकरण को उनके द्वारा महत्व मिला है पार्टर्ीीे भीतर ही उनके विरुद्ध आवाजें बुलन्द होने लगी है और पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ कनिष्ठ नेता भी उन्ाके कदमों पर प्रतिकूल टिप्पणियाँ करते नजर आते हैं । उनके द्वारा प्रस्तावित और स्थापित संयत्र षडयन्त्र का अखाडÞा नजर आते हैं । और इसकी गतिविधियों को संदेहास्पद रूप में मूल्यांकन किया जाता है । इसलिए कांग्रेस सभापति शायद समझ चुके हैं कि संयंत्र में सरकार के विरुद्ध किसी भी टिप्पणी और मौजूदा सरकार की कीमत पर किसी भी प्रकार का समझौता पार्टर्ीीें र्सवमान्य नहीं होगा और इसका नकारात्मक असर पार्टर्ीीी संगठनात्मक एकता पर पडÞेगी ।
नेपाल की राजनीति में चाहे अनचाहे भारतीय कूटनीति की भी महत्वपर्ूण्ा भूमिका रहती रही है । भारत प्रत्यक्ष रूप से कहे या न कहे लेकिन माना जाता है कि मौजूदा सरकार को उसका कूटनैतिक र्समर्थन प्राप्त है । भारत भ्रमण कर वापस लौटे उपेन्द्र यादव से लेकर झलनाथ खनाल तक के वक्तव्य इस बात का र्समर्थन करते नजर आते हैं । निश्चय ही नेपाल की अन्दरुनी राजनीति में भारत की सबसे बडÞी आस्था का केन्द्र कोईराला रहे हैं । यही कारण है कि राष्ट्राध्यक्ष के रूप में प्रथम भारत यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने स्वयं उनकी आगवानी की थी और उन्होंने एशिया के महान नेताओं से एक कहा था । लेकिन अपने बाद के राजनैतिक जीवन में अपनी विरासत के संरक्षक तैयार करने के क्रम में उन्होंने पुत्री को जो प्राथमिकता दी और पुत्री ने अनेक बिन्दुओं पर अपने वक्तव्यों में जो अपरिपक्वता का परिचय दिया उससे भारत की नजर में उनका राजनैतिक कद किसी न किसी रूप में घटा है । भारत के घुर विरोधी के रूप में प्रस्तुत प्रचण्ड को किसी भी प्रकार का राजनैतिक लाभ मिलने वाले कदम भारतीय कूटनीति को ग्राहय नहीं है । इसलिए अपने इस अभयदान के द्वारा उन्होंने पार्टर्ीीौर पडÞोसी दोनों को साधने का प्रयास किया है ।
महत्वाकांक्षाओं पर लगाम जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है और राजनीति भी इससे पृथक नहीं । बेलगाम महत्वाकांक्षाएँ हमें मंजिल तक नहीं पहुँचाती । इतना बडÞा आन्दोलन से लेकर संविधान सभा का निर्वाचन तक का परिणाम आज अनिश्चिताओं के भँवर में फँसा हैं तो उसका एक मात्र कारण नेताओं और दलों की बेलगाम महत्वाकांक्षाएँ हैं । देश के छोटंे-बडंÞे सभी दल और नेता आज इस रोग के शिकार है और अधिक उलझाने वाले हैं । निश्चय ही मौजूदा सरकार की शर्त्त पर राजनैतिक गतिरोध के अन्त का कोई भी समाधान ढूूँढने का प्रयास सकारात्मक इसलिए नहीं माना जा सकता कि इससे नेकपा माओवादी को तो संतृष्ट किया जा सकता है लेकिन सरकार में शामिल दोनों बडÞे दल नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले की अन्दरुनी राजनीति में एक भूचाल की स्थिति लाएगी । जिसे सम्भालने की क्षमता न तो कांग्रेस सभापति में है और न ही एमाले अध्यक्ष की । क्योंकि दोनों ही दलोंं में नेतृत्व की ऐसी पंक्ति तैयार है जो किसी भी कीमत पर इस सरकार का बदलाव नहीं चाहते और इस सरकार के नेतृत्व में ही सारी समस्या का समाधान तलाशते नजर आते हैं ।
आज नेकपा सुप्रोमो सरकार में सहभागिता दे रहे दलों कांग्रेस और अपनी पार्टर्ीीो प्रकारान्तर से कृष्ण होने की बात कहते हैं और समस्या के समाधान के लिए कृष्ण की आवश्यकता बतलाते है । गौरतलब है कि इतिहास सदा विजेता की दृष्टि से लिखा जाता रहा है । अगर महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की पराजय हर्ुइ होती तो इतिहास कौरवों की गाथाएँ गाता और कृष्ण किसी अन्य रूप में हमारे सामने होते । आज भयावह अनिश्चितताओं के अंधकार में देश फँसा हुआ है और संविधान निर्माण तथा मूल्यों की राजनीति द्वारा ही इसे प्रकाश के साम्राज्य तक ले जाया जा सकता है । गौरतलब है कि कृष्ण भी महाभारत में सारथी थे, गीतागायक थे, योद्धा नहीं । नेतृत्व तो किसी और का था । इसलिए कहा जा सकता है कि समाधान के लिए बहरहाल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, नीति परिवर्तन की आवश्यकता है । इस बात को चाहे कोईारला हो, चाहे दाहाल या खनाल जितनी जल्दी समझ ले, देश का कल्याण उसी में संभव है ।

प्रस्तावित संघीय संरचना समस्या या समाधान::प्रो. डाँ. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On March - 21 - 2010 ADD COMMENTS

nain mishra०६,२०६६ के दिन राज्य पर्नर्संरचना तथा राज्य शक्ति विभाजन समिति की अन्तिम बैठक बुलाई गई थी, जो अनेक दृष्टिकोणों से महत्वपर्ण् थी । इस बैठक में समिति के सभापति लोकेन्द्र बिस्ट मगर के द्वारा विशेष क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्र तथा स्वायत्त क्षेत्र के रूप में २३ जातियों की सूची प्रस्तुत की गई जिसे माओवादी सांसदों के द्वारा र्समर्थन किया गया, जबकि कांग्रेस, एमाले तथा अन्य मधेशी दलों के सांसदों का मत था कि इस बात का निर्धारण प्रदेशों के निर्माण के पश्चात किया जाना चाहिए । इसके पश्चात सभापति के द्वारा संघीय शासन व्यवस्था के स्वरूप के सम्बन्ध में ६ तथा १४ प्रदेशों का दो स्वरूप प्रस्तुत किया गया, जिस सम्बन्ध में सदस्यों की राय ली गई । पर सांसदों ने इस पर अपनी संक्षिप्त राय व्यक्त की । सदभावना के अनिल झा की राय कि संघीय संरचना के दो ही नहीं बल्कि सभी स्वरूपों को सभा में प्रस्तुत किया जाना चाहिए और अगर ऐसा नहीं किया गया तो उन्होंने आन्दोलन की धमकी तक दे डाली । एमाले की सांसद सीता कुमारी ने चितवन को नारायणी प्रदेश से हटा कर मधेश प्रदेश में शामिल किए जाने का पुरजोर विरोध किया । उन्होंने भी धमकी भरे स्वरों में कहा कि ऐसा होने से चितवन में आग लग जाएगी । जबकि दूसरी ओर फोरम के सह अध्यक्ष जय प्रकाश प्रसाद गुप्ता का मानना था कि चितवन को मधेश में रहना अनिवार्य है । उनका तर्क था कि मधेश में अवस्थित चितवन को. अगर मधेश से अलग किया गया तो यह मधेश विरुद्ध के युद्ध की शुरुआत होगी । सभासदों के इन तेवरों और मतभेदों को देखते हुए यह सोचने पर बाध्य होना पडता है कि क्या प्रस्तावित संघीय संरचना वर्तमान समस्या के समाधान के रूप में उभर कर सामने आएगी या फिर यह अपने आप में एक समस्या बन कर उठ खडी होगी ! इस प्रकार प्रस्तावित संघीय संरचना शान्ति और समृद्धि की तरफ नहीं बल्कि अन्त्हीनता, अराजकता तथा द्वन्द्व की सृजना करने को उद्यत दिखाई देता है ।
इसी उहापोह के बीच सभापति के द्वारा १४ प्रदेश वाला प्रस्ताव निर्ण्र्के लिए प्रस्तुत किया गया । जिसे माओवादी तथा एमाले के २३ सभासदों का र्समर्थन मिला । मतदान से पर्ूव अवश्य ही एमाले की स्थिति दुविधापर्ूण्ा थी लेकिन अन्तिम समय में जातीय अग्राधिकार सहित के प्रदेश को उसने अपना र्समर्थन प्रदान कर दिया । जबकि अभी भी कांग्रेस तथा मधेशी दलों की मान्यता थी कि दोनों ही प्रारूप सभा में प्रस्तुत होना चाहिए । इसके पश्चात जडान, शर्ेपा, मिथिला, भोजपुर, कोच, मधेश तथा लुम्बिनी, अवध, थारुवान आदि के परिवर्तित स्वरूप को बहुमत से अनुमोदन कर दिया गया । इसी प्रकार विशेष क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्र तथा स्वायत्त क्षेत्र अर्न्तगत शामिल २३ जातियों की सूची तथा जातीय राजनीतिक विषयों को भी र्समर्थन प्राप्त हो गया । परन्तु ताज्जुब नहीं कि प्रदेशों में इस प्रकार किया गया हेरफेर अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दे । कुछ जानकारों के अनुसार बहुत सारे क्षेत्रों में खसों की बाहुल्यता से इन्कार नहीं किया जा सकता । जडÞान क्षेत्र के नामाकरण करने पर भी विवाद है । एमाले सभासद मंगल सिद्धि मानन्धर के अनुसार शीत प्रदेश होने के कारण इसका नाम जडÞान रखा गया है । जबकि सभासद चन्द्रदेव जोशी का मानना है कि जडÞान तिब्बत की ओर अवस्थित है और मानसरोवर के दक्षिण भाग में जडान जाति का निवास होने के कारण इस क्षेत्र का नाम जडÞान रखा गया है । एक सदस्य को एक ही समिति में मतदान करने का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक समिति में मतदान कर चुके बुद्धरत्न मानन्धर द्वारा इस समिति में भी मतदान करना निश्चय ही असंवैधानिक है । जातीय राजनीतिक अग्राधिकार का प्रस्ताव उन्हीं

के मत के कारण पारित हो सका । समिति में संघीय संरचना की रूपरेखा जैसे भी पास करा लिया गया हो, इसमें अंतिम निर्ण्र्ाालेने का अधिकार तो सभा की पर्ूण्ा बैठक को ही है । इसके पश्चात संविधान सभा के दो तिहाई बहुमत से भी इसका अनुमोदन आवश्यक है ।
समिति के निर्ण्र्ााें को चुनौती देते हुए मधेशी जनअधिकार फोरम अपने पृथक विचारों के कारण तर्राई में आन्दोलन की घोषणा कर चुका है । संघीय संरचना जैसी महत्वपर्ूण्ा और संवेदनशील विषय पर गंभीरता से निर्ण्र्ाालेने की आवश्यकता है । मधेश आन्दोलन में संघीय संरचना के मांग के परिणाम स्वरूप अन्तरिम संविधान २०६३ में संशोधन के द्वारा समावेशी, लोकतांत्रिक संघीय शासन प्रणाली वाली व्यवस्था को शामिल किया गया तथा इसे व्यवहारिक रूप प्रदान करने के लिए राज्य पर्ुनसंरचना आयोग की संवैधानिक व्यवस्था के रूप में निर्मित करने की बात कही गयी थी । लेकिन न तो पुष्पकमल दाहाल और न ही माधव कुमार नेपाल की सरकार द्वारा इस आयोग का गठन किया गया । संविधान की धारा १३८, उपधारा २ में उल्लेखित है कि राज्य की पर्ुनसंरचना करने के लिए एक उच्चस्तरीय आयोग का गठन किया जाएगा । निश्चय ही यह संवैधानिक प्रावधान की अवहेलना है । उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्र ने भी अपने ८ माघ की बैठक में राज्य पर्ुनसंरचना आयोग के गठन पर बल दिया है । इसके अतिरिक्त नागरिकों की आसमान छूती आकांक्षाएँ, जिम्मेदार व्यक्तियों के द्वारा की गई हल्की टिप्पणियाँ, राष्ट्र पर होने वाले दूरगामी प्रभावों की अनदेखी तथा बिना गृहकार्य के ही मनमौजी रूप में राज्यों का निर्माण आदि ने संघीयता को और भी जटिल बना दिया है । प्रारम्भ में सभी बीमारियों का इलाज संविधान सभा बताया गया, लेकिन आज की परिस्थिति में संविधान सभा बौना दिखाई देता है । राज्य के अहम मुद्दों की अनदेखी घातक सिद्ध हो सकती है । आवश्यकता है मधेशी, दलित, जनजाति तथा महिला उत्थान के लिए ठोस नीति निर्माण की । सीमांकन का आधार, प्रशासनिक स्तर, आकार, आयतन, प्रदेश की संख्या तथा नामाकरण, में सभी विषय आपस में एक दूसरे से जुडÞे हुए हैं । इन विषयों में प्रदेश के आकार और आयतन तथा उनकी सीमा पर ध्यान नहीं दिया गया है जबकि संख्या और नामकरण जैसे विषयों को ज्यादा ही उछाला गया है, जबकि संख्या और नामकरण की तुलना में सीमांकन का आधार और सिद्धान्त तथा अधिकार क्षेत्र ज्यादा महत्वपर्ूण्ा विषय है । संघीय संरचना की जटिलता को कम करने के लिए प्रदेश सीमांकन के आधार और सिद्धान्त तथा अधिकार क्षेत्र के विषय में स्पष्टता होना जरुरी है । वर्तमान अन्तरिम संविधान में वणिर्त प्रावधान का भी यही मर्म है कि राष्ट्र की समृद्धि तथा समावेशी विकासोन्मुख संघीय संरचना का निर्माण होना चाहिए । राज्य पर्ुनसंरचना के लिए वर्तमान समिति ने दो बातों को आधार माना है-पहचान तथा सामर्थ । पहचान के अर्ंतगत जाति या समुदाय, भाषा, संस्कृति आदि विषय शामिल हैं जबकि सामर्थ के अर्ंतगत स्थलगत निरन्तरता, प्राकृतिक स्रोत-साधनों की उपलब्धता, विद्यमान पर्ूवाधार की स्थिति, आर्थिक अन्तर सम्बन्ध तथा प्रशासनिक सुगमता आदि विषय आते है । जनसंख्या की दृष्टि से प्रदेशों के बीच में भारी विषमता विद्यमान है । सबसे बडÞे प्रदेश की जनसंख्या लगभग ६७ लाख है तो सबसे छोटे प्रदेश की मात्र ५० हजार । इसके अतिरिक्त पहाडÞी प्रदेशों की तुलना में तर्राई या मधेश प्रदेशों की जनसंख्या बहुत अधिक दर्शाई गई है । इन वास्तविकताओं के कारण विषमता घटने की बजाय और बढेगी । क्षेत्रफल की दृष्टि से भी विषमता कायम है । सबसे छोटा प्रदेश नेवा प्रदेश की क्षेत्रफल १८ वर्ग कि.मी. है । जबकि सबसे बडÞा प्रदेश कर्ण्ााली प्रदेश का क्षेत्रफल लगभग १२१ वर्ग कि.मी. है ।
र् वर्तमान प्रदेशों की दूसरी कमी यह है कि जातिगत आधार पर निर्मित प्रदेशों में सम्बन्धित जातियो की संख्या कम है । उदाहरणार्थ ७९ प्रतिशत शर्ेपा, शर्ेपा प्रदेश से बाहर हैं । इसी प्रकार ५२ प्रतिशत र्राई किराँत प्रदेश से बाहर हैं और ५० प्रतिशत नेवार नेवा प्रदेश से बाहर हैं । इस प्रकार की स्थिति में जातीय विशेषाधिकार प्रदान करने की बात बेमानी है । इसके अतिरिक्त यह भी महत्वपर्ूण्ा बात है कि किसी प्रदेश के अन्दर किस प्रकार बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित की जाए । जनता की सहभागिता को कैसे सुनिश्चित किया जाए तथा भाषा की जटिलता को कैसे सुलझाया जाए । प्रदेशों में विषय प्रकृति होने की स्थिति में इनके बीच प्रतिस्पर्धात्मक विकास कठिन हो जाएगा । इसकी क्या गारंटी है कि विपन्न और छोटे प्रदेशों को संपन्न तथ बडÞे प्रदेशों से सहयोग और सहायता प्राप्त होगी । फिर ऐसी संघीयता का क्या लाभ – हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रदेश का भौगोलिक आकार सबसे महत्वपर्ूण्ा होता है । प्रदेश की आर्थिक-सामाजिक स्थिति का सीधा सम्बन्ध उसके आकार से होता है । सेवा तथा सुविधाओं का मुख्य केन्द्र राजधानी ही होती है । हास्यास्पद लगता है कि प्रस्तावित संघीय संरचना में बहुत सारे प्रदेश के लोगों को अपनी राजधानी पहुँचने के लिए अन्य प्रदेशों की राजधानी से होकर गुजरना होगा । उदारहण के लिए धादिग वासियों को अपनी राजधानी चौतारा पहुँचने के लिए काठमांडू होकर गुजरना होगा । ऐसे अन्य और कई उदाहरण दिए जा सकते हैं । संघीयता की अवधारण के प्रमुख र्समर्थक मधेशी दल भी प्रस्तावित संघीय संरचना से संतुष्ट नहीं है । मधेशी मोर्चा की इच्छा के विपरीत दो विस्तारित प्रदेश की कल्पना की गई है । संघीयता राज्य शक्ति के तहत विभाजन से सम्बन्धित होता है तथा राज्य इसके अभिन्न अंग होते है । राज्यों के विभाजन में राजनीतिक तत्वों के अतिरिक्त क्षेत्रीय, जातीय, सांस्कृतिक आदि तत्वों का भी संघीय व्यवस्था के अर्ंतगत उनका उत्पीडÞन समाप्त हो जाएगा, जो कठिन दिखता है । प्रादेशिक विभाजन तथा सीमांकन में इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी समुदायों की पहचान कायम रहे । अल्पसंख्यकों तथा पिछडÞे वर्गो में विशेष रूप से पहचान का संकट होता है । मात्र भौगोलिक रूप में क्षेत्रों के सीमांकन से क्षेत्रीय तथा जातीय विभेद को नहीं मिटाया जा सकता है । सबसे महत्वपर्ूण्ा बात यह है कि एक निश्चित सीमा के अन्दर निवास करने वाले नागरिकों को किस प्रकार अपनत्व की अनुभूति कर्राई जाती है तथा किस तरह सामूहिक रूप में समृद्धि की ओर अग्रसर किया जाता है । तब ही संघीयता की र्सार्थकता मानी जा सकती है । उपरोक्त वणिर्त व्यवधानों तथा कमियों के कारण जनता का विश्वास उठता जा रहा है । संघीय संरचना के प्रश्न पर भी प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच समझदारी के बदले वाकयुद्ध जारी है । संघीयता हमारे लिए नयाँ विषय है । संघीयता जैसे प्रमुख विषय जिसका जनता और देश पर दूरगामी प्रभाव पडÞेगा । बिना अध्ययन, अनुसंधान के अन्तरिम संविधान में समावेश कर दिया गया है । इस बात पर विचार नहीं किया गया कि वास्तव में संघीयता देश की जनता की समस्या और आवश्यकता अनुरूप है या नहीं । इस विषय में कभी भी कोई ठोस या विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता नहीं समझी गई । राजनीतिक आक्रोश में किया गया निर्ण्र्ााकभी भी टिकाऊ नहीं हो सकता । यह मान कर, कि सभी रोगों का इलाज एक मात्र संघीयता है, इसे जैसे-तैसे लागू करना घातक होगा । इससे समस्या सुलझने के बजाए और उलझेगा ही ।

संसद में विरोध

Posted by admin On March - 14 - 2010 ADD COMMENTS

अनिल झा सभासद, सदभावना पार्टी
राज्य पर्नसंरचना एवं बाँड-फाँड समिति द्वारा राज्यों का मसौदा संविधान सभा के सभामुख को सौपे जाने का विरोध करने के सम्बंध में सद्भावना पार्टी सभासद अनिल झा का कहना है कि हमारी पार्टीसे सहमत नहीं है और उसका विरोध करती है ।
madheshi
अनिल झा का कहना हैं कि सडक आन्दोलन के बजाय हमलोग संसदीय परम्परा के अर्न्तर्गत इसका विरोध करेंगें । हमें मधेश का वर्त्तमान बंटवारा मान्य नहीं है । उसके साथ ही झा का कहना है कि आज मधेश का हक अधिकार संविधान में लिखवाने में हमें अत्यन्त ही कठिनाई का सामना करना पड रहा है क्योंकि जनता ने हमें बहुमत नहीं दिया, जिसके वजह से चाह कर भी हमलोग कुछ भी कर पाने में अर्समर्थ हैं ।
अनिल झा ने विश्वास व्यक्त किया कि जिस प्रकार उपसमिति के प्रस्ताव में मधेशी अधिकार शीष्क के अर्न्तर्गत प्रस्ताव शामिल करवाने में हम लोग सफल रहें हैं उसी प्रकार “समग्र मधेश एक प्रदेश” प्राप्ति का प्रयास सफल होगा । उनका यह भी कहना था कि ऐसा न होने पर हमलोग भी सडक पर जनता के साथ मिलकर आन्दोलन करेंगें ।

मिथिला-भोजपुरा-मधेश प्रदेश की रचना की गयी है । यह बहुत ही विरोधाभासपर्ण् मधेशियों के पहचान को समाप्त करने के नीयत से लाया गया अराजनैतिक स्रोत है । मधेश के हक में राज्य पुनसंरचना का मँडल बिल्कुल हीं पर्वाग्रह से ओत-प्रोत हो कर लाया गया है । थ篛ट-अवध-लुम्बिनी इस प्रदेश के निर्माण का आधार है जातिय, भाषिक और क्षेत्रीय । तीन आधार को मिला कर खिचड प्रदेश बनाया गया है । ये तीनो को मिलाने की लौकिकरुसोच कैसे आयी
विजय कुमार यादव सिरहा से मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के सभासद हैं, उनका कहना है कि राज्य पुनसंचरना का जो प्रारुप सभामुख के समक्ष पेश किया है वह उचित नहीं है । हमारी पार्टीका घोर विरोध करती है । मधेश का बँटवारा हमें मंजूर नहीं है । वार्त्ता द्वारा इस समस्या का समाधान नहीं होगा तो सडक के माध्यम से आन्दोलन के जरिये हम समग्र मधेश एक प्रदेश प्राप्त करेंगे ।
विजय कुमार यादव का कहना था कि जाति, कौम के नाम पर देश को छोटे-छोटे संघों में बाँटना उचित नहीं है । आर्थिक रुप से सम्पन्नता भी राज्य निर्धारण करने का आधार होना चाहिए । तभी सही ढँग से राज्यों का गठन हो सकेगा और राज्य भी सफल हो सकेंगें ।
उपसमिति के संघीयता के मसौदे का विरोध सभी मधेशवादी दल अपने-अपने ढंग से कर रहे है । अगर ये दल हमारी पार्टीके साथ मिलकर कार्य करें तो और भी बेहतर होगा वरना हम अकेले आन्दोलन करेंगे । हमें जनता का पूर्ण सहयोग एवं र्समर्थन मिल रहा है ।

यह एक अनुसन्धान का विषय बन सकता है । गैर राजनीतिक व्यक्तियों से ही इस प्रकार के निर्णयकी अपेक्षा की जा सकती है ।
इसी प्रकार मधेश के भूगोल के भीतर मिथिला, भोजपुरी, अवधी भाषिक और थारू जातीय समुदाय के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और क्षेत्रगत निरन्तरता भी हैं । इस परिदृश्य मंे मधेश या तर्राई या थरूहट को एक इकाई मानकर जातीय और भाषिक आधार पर संघियता के खाता में आना चाहिए था । परन्तु ऐसा न कर मधेशी जनता को दिग्भ्रमित करने का काम किया गया है । मधेश को दो प्रदेश में विभाजित किया गया है । इससे मधेशवादी दलों मंे जो असन्तुष्टि देखी जा रही है वह नेपाल का नया संविधान जारी होने के बाद भी न हटेगी और न मिटेगी ।
एक मधेश एक प्रदेश या एक तर्राई एक थ篛ट प्रदेश को नि燜साहित करने के लिए लाया गया यह मँडल मधेश के जातीय, भाषिक और सांस्कृतिक जैसे विविधताओ का संबोधन करने में चुक गया है । मधेश विभाजन का यह मँडल मधेश मे फिर से आ“धी लाने के लिए एक आधार बन सकता है । परन्तु फिलहाल यह पहली बार प्रस्ताव किया गया है । इस पर पर्नविचार की संभावना अभी भी की जा सकती है । परन्तु यहा“ के प्रमुख राजनीतिक दलों को मधेशियों की भावनाओं को समझते हुऐ आगे बढना चाहिए ।
देखिए, प्रदेश के नक्शांकन का आधार ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से होनी चाहिए, न की राजनीतिक पर्ूवाग्रह के उद्देश्यों से । सभी का मानना है कि लम्बे समय से नेपाल में जारी एकात्मक व्यवस्था ने यहा“ के सामाजिक सन्तुलन को बिगाडा है, परन्तु उसमें मरहम लगाने की बात जब आती है तो यहा“ के प्रमुख तीन दल एक होकर मधेश और मधेशियों के खिलाफ मोर्चाबन्दी कर बैठते हैं । अतः मधेशियों के अलग पहचान को जीवित बनाए रखना राज्य संचालक पक्ष का दायित्व हीं नहीं बल्कि अहम् जिम्मेदारी भी है ।

मधेश का बटंवारा

Posted by admin On March - 12 - 2010 ADD COMMENTS

पाल की भावी शासकीय संरचना कैसी और किस प्रकार की हो – सभी भाषा-भाषी, जात-जाति और समुदायों को अधिक से अधिक अधिकार से कैसे सुनिश्चित किया जाय – इसी तरह के अनेक सवालों के समाधान के लिए संविधान सभा की राज्य पर्ुनसंरचना एवं बा“डफा“ड समिति फिलहाल कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखाई दे रही है । यहा“ सबसे गम्भीर, संवेदनशील और जटिल मुद्दों में से एक है, राज्य पर्ुनसंरचना का विषय । समिति ने हाल ही में बहुमत के आधार पर राज्य का नया ढा“चा र्सार्वजनिक किया है । इस पर व्यापक विरोध हो रहा है । संविधान सभा की बैठक में भी कुछ मधेशी सभासदों ने अपना विभिन्न मत रखते हुए कड滐 विरोध जताया है । परन्तु समिति में वे अल्पमत में होने के कारण विरोध के सिवाय कुछ नहीं कर पा रहे है । खास कर के सत्ता विरोधी मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के सभासदों ने राज्य के प्रस्तावित नूतन ढा“चा का जमकर विरोध किया है । सत्तासीन मधेशवादी दलों की ओर से विरोध की आवाज बुलन्द 磬 से बाहर नहीं आ पा रही है । जनता उसके प्रतिक्रियाओं की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही है ।
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राज्य का ढा“चा र्सार्वजनिक होते हीं पक्ष और विपक्ष मे एक बहस सी छिडरुगयी है । थंक टैकंरुसे लेकर लिटकल फिगररुतक सभी इस बहस में शामिल हो गये हैं । परन्तु सत्ताधारी मधेशवादी दल इस पर चुप्पी साधे हुए है । संविधान सभा के सभासदों के बीच भी इस विषय को लेकर खुब जोर शोर से नोंक-झोंक चल रहा है, विशेष कर के मधेशी सभासदों की ओर से । राज्य पर्ुनसंरचना के लिए बनाए गये समिति के कामकाज को सरल बनाने हेतु उप-समिति बनाई गई है, उसी समिति का प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ है । समिति में पेश किये गये सुझावों और प्रस्तावों मंे सभासद पक्ष और विपक्ष दो खेमों में बँट गये । समिति के भीतर गठन की गयी उपसमिति ने १४ और ६ प्रदेश के दो माँडल का प्रस्ताव किया था । उसमें से राज्य पर्ुनसंरचना एवं बा“डफा“ड समिति ने १४ प्रदेशों के माँडल को बहुमत से पारित किया । समिति में जनवरी २० -माघ ६) को हुए मतदानमं उपसमिति से प्रस्तावित १४ प्रदेशों के नक्शा मंे परिमार्जन सहित एक ही प्रस्ताव को आगे बढÞाने के पक्ष में बहुमत प्राप्त हुआ । इस प्रस्ताव के पक्ष में नेपाल की प्रमुख दो वामपन्थी शक्तियाँ माओवादी और एमाले एक साथ खडÞी दिखी । जबकि इन दोनो दलों में से एक सत्ता में और दूसरा विपक्ष में है । अलग-अलग दिशाओं में होकर भी इस प्रस्ताव में दोनो चमत्कारिक 磬 से एकाकार हुए । यह एकाकार मधेशवादी दलों के क मधेश प्रदेशरुजैसे मांगों को कमजोर करने के लिए हुआ है । मधेश को दो खण्ड में बँाटा गया है । इस मामले में नेपाली कांग्रेस और मधेशवादी दलों के सभासदों ने उपसमिति के १४ और ६ प्रदेश दोनों को वैकल्पिक प्रस्ताव के 磬 में पर्ूण्ा बैठक में ले जाने के लिए मतदान किया था । मधेशवादी दल के सभासद परिमार्जन के साथ बैठक में लाने की बात कर रहे थे । कांग्रेस इस प्रस्ताव को हूबहू बैठक में लाने की जिद्द में था । सरकार के प्रवक्ता सूचना एवं संचारमन्त्री शंकर पोखरेल तटस्थ रहे । परन्तु जब १४ प्रदेशों को बनाने के पक्ष में बहुमत जुटा तो वह परिमार्जन किया जाय या नहीं विषय को निष्कर्षमंे पहुचाने के लिए हुए मतदान में वे अपने पार्टर्ीीमाले के सभासदों के साथ खडÞे हुए । इस प्रकार मधेशियों के एक मधेश प्रदेश की भावनाओं को यहा“ फिर एक बार वामपंथियों ने रौंदा है, कुचला है ।
वैसे परिमार्जन सहित १४ प्रदेशों के पक्ष में समिति के २३ सदस्यों ने मतदान किया । उपसिमित द्वारा

प्रस्ताव किये गये इन प्रदेशों में परिमार्जित कर दक्षिण में दो प्रदेश घटाने और उत्तर में दो बढाने के प्रस्ताव को समिति ने स्वीकृति प्रदान किया । इस प्रकार पहले प्रस्तावित किये गये थरूहट और लुम्बिनी को जोडÞकर ‘थारूवान-अवध-लुम्बिनीरुएवं मधेश और विराट को जोड煲र मथिला-भोजपुरा-मधेशरुनाम के साथ प्रदेशों के ढा“चा को बहुमत से पारित किया गया । इस प्रस्ताव के विपक्ष में मधेशवादी दल के सभासद हैं । वह चितवन को तर्राई轠धेश के भूभाग में जोड滊े की माँग पर अड滘 हैं । वर्षो से तर्राई轠धेश का भूभाग रहे चितवन को उस क्षेत्र से अलग करने की बातों को कतई स्वीकार नहीं की जायेगी यह कहकर वह कड滐 आपति जता रहे हंै ।
मधेशवादी चाहते है कि तर्राई के भूभाग को पहाडÞ के प्रदेश से भी कुछ हद तक जोडÞा जाना चाहिए । इसी प्रकार पर्ूव झापा से कञ्चनपुर तक एक ही प्रदेश की मधेशवादी दलों की चाहत को भी संबोधन करने का प्रयास समितियो को करना चाहिए, अल्पमत और बहुमत के आधार पर समितियों ने अपना निर्ण्र्ाालादने का दुष्प्रयास किया तो संभवतः र्सवमान्य संविधान नही बनेगा ।

मधेश के बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह ‘एक मधेश’ को खण्ड-खण्ड विभाजित कर कमजोर बनाने की साजिश है । नामाकरण में भी विभिन्न शब्दों को जोड煲र मधेश शब्द के स्वतन्त्र अस्तित्व को समाप्त करने का भी दुष्प्रयास हुआ है । विश्लेषकों का मानना है कि बहुमत से पारित प्रस्ताव और नक्शांे से मधेश के विरु एकल युद्ध छेड滊े की बात-सी है । संविधान सभा मंे अन्य विषयों को निर्ण्ाायक तह में पारित न कर और सीमा निर्धारण पर ही ज्यादा जोर देने का मकसद् क्या हो सकता है – मकसद् जो भी हो , परन्तु एक बात साफ है कि इससे विवाद और गहराएगा । प्रस्तावित प्रदेशों में से दो प्रदेशो का आधार जातीय ही हैं । फिर वहंा मधेश को एक जाति के आधार में क्यांे स्वीकार नहीं किया गया – संविधान सभा के सूत्रों के अनुसार संविधान निर्माण के अन्तिम एक महीना पहले प्रदेश की सीमा, संख्या और नामाकरण निर्धारण करने की बात थी, पहले ही इसकी घोषणा की गयी है । विज्ञसमूहओं के विचार-विमर्श से नक्शांकन का र्सवमान्य निकास ढुंढने के लिए आयोग बनाकर निष्कर्षमंे पहु“चने की बात थी, फिर अचानक ऐसा क्यों हुआ – हो सकता है इसमें माओवादी सभासदों का दबाव रहा हो । वह तो सरकार को अस्थिर बनाने में दिन रात एक किये हुए है, परन्तु एमाले ने भी उसी के पक्ष में आकर स्थिति को जटिल बनाने का प्रयास किया है । इससे नेपाल में जटिलता बढने की प्रबल संभावना है ।

प्रचण्ड के दिशाहीन शब्द वाण

Posted by admin On March - 12 - 2010 ADD COMMENTS

नुख्ता के हेरफेर से खुदा जुदा हो गया । अतः नुख्त निकालने, लगाने और प्रयोग में सावधानी बरतने के लिए ही यह कहावत मुगलकालीन सभ्यता से चलन में आ रहा है । नुख्ता का प्रयोग सही हुआ तब खुदा से साक्षात्कार होगा यानि सद्मार्ग मंे चलने की प्रेरणा मिलेगी, र्स्वर्ग सुख भी मिलेगा और समाज सुखी सम्पन्न होगा । नुख्ता के हेर फेर में उच्छृंंखल मनोदशा का अगर प्रयोग होगा तब न खुदा मिलेंगे न जुदाई में किसी का साथ मिलेगा न जन्नत मिलेगी न जहान में सम्मान । नुख्ता वह प्रस्थान बिन्दु है जहाँ से सही प्रयोग पाकर र्सार्थक सांख्यिकी क्रमबद्धता की रफ्तार शुरू होती है । सही नुख्Þते का प्रयोग हमें सही मंजिल तक पहुँचता है और गलत नुख्Þते का प्रयोग दिशाहीन विचरण की ओर ले जाकर अनन्त आकाश में भटकने के लिए छोडÞ देता है । नेपाली नेताओं के विचारो में क्षुद्रता, अमानवीय स्वार्थ और चंचल मन के उद्वेग के कारण हीं नुख्तों के प्रयोग में मन-मौजीपन देखा जा रहा है । नेताओं की इसी मनोदशा के कारण पूरा नेपाल राँची के पागलखाना अस्पताल में 磬ान्तरित हो चुका है । वान मेन चौक के युवा-नरसंहार ने विश्व को लोकतंत्र की मजबूती का सन्देश दिया है वहीं नयाँ बानेश्वर चौक पर प्रचण्ड की सभा ने नवयुवकों और बच्चांे को र्सार्वजनिक यातायात को अवरु करके चीखने चिल्लाने, असभ्य भाषा की प्रयोग विधि सिखाने और देश में अराजक लोकतंत्र की ओर बढ滊े का सन्देश दिया है ।
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रोगग्रस्त होने के लिए अनेक कारण होते हैं । किस कारण से रोग लगा इसको जाने बिना रोग निवारण नहीं हो सकता है । दो विशाल भूखंडों वाले पडोसी देशांे के बीच नेपाल का भूगोल तिब्बत और भारत का स्वर्ण्र्ााुकुट है । इतिहास ने इसी पृष्ठभूमि में इस देश को स्वणिर्म चमक वाला सम्मान भी प्रदान किया है । वैदेही नगर, कपिलवस्तु, बाल्मीकिनगर और ‘सगरमाथा’ हिमालय की चोटी इसी नेपाल मे है । सीता, बुद्ध, बाल्मीकि ऋषि और कैलाश पर विराजमान शिव जी का निवास और विचरण स्थान नेपाल का हिमालय क्षेत्र ही है । भारतीय उप-महा墱प में, विदेशी विधर्मियो के हिंसक हमले और ऋषि चिन्तन में व्यस्त वैदिक संस्कृति से उपजी शांति ने पराजय की कथा की व्यथा के 磬 में 磬ान्तरित करके, असभ्य संजाल को सदियांे तक बनाये रखा । इसी लघुताभास में नेपाल अब भी छट्पटा रहा है । अनेक आत्मचिन्तन और कठिन तप के बाद भी हम -जनता) और नेतृत्व पंक्ति ऐतिहासिक लघुताभास और कुसंस्कारांे के जीन के आगे नत-मस्तक होकर अनियंत्रित दिशा की ओर बढ滊े लगते हैं । प्रचण्ड का वाक्-उन्माद इसी मनोरोग को दिखाता है । धर्म परिवर्तन के शिकार भारतीय उप-महा墱प की मुस्लिम जमात की स्थिति और भी दुःखदायी अवस्था में है । दोेहरे संस्कारों में जीने को बाध्य पाकिस्तानी मुसलमान और उनकी नेतृत्व पंक्ति का वाक् उन्माद गृहयुद्ध में रूपान्तरित हो चुका है । दक्षिण एशिया की राजनीतिक वृत्त में र्सार्क देशों की आपसी समझदारी, मनमुटाव और छलकपट के दाव पेच के अध्ययन बिना आम जनता के हित के लिए ठोस कार्यक्रम को अस्तित्व में लाना कठिन साबित होगा ।
अतः नेपाल के सर्न्दर्भ में प्रचण्ड के दिशाहीन शब्द वाणांे की बौछार कोई खास अर्थ अथवा महत्व नहीं रखता है । लेकिन भारत सरकार को सोच समdmकर नेपाल केे प्रति कदम उठाने की आवश्यकता है । भारतीय नेताआंे की भूल और साहसहीनता से पाकिस्तान बना था और बाद में कश्मीर का प्रश्न उल्ाझा था । नेपाली नेतृत्व की भूल से नेपाल का र्सवनाश तो हो ही रहा है । इसका ठिकरा भारत के सिर पर फोड滊े की भी होडबाजी चल रही है । ६० वषर्ं के नफरत पर्ूण्ा वाक्-युद्धों से तहस-नहस पाकिस्तानी आवाम अब देश के बँटवारे को भूल मानने लगी है । अब वे लोग पाकिस्तान के विनाश की जिम्मेवारी स्वंय ले रहे हँै । किन्तु नेपाल के र्सवनाश का ठिकरा भारत के सिर पर फोडरुकर कोई जिन्ना बन रहा है तो कोई लियाकत अली खान । जनता ने जन-आन्दोलन-२ के जरिये अपने प्राणांे की आहूति देकर नया नेपाल गढÞने का संकल्प विभिन्न दलांे को दे रखा है । वहीं दल वाले संविधान सभा की गरिमा गिराने, उसके कार्यवाहियों को लगातार स्थगित रखने और नये-नये शब्दों का आविष्कार करके हंगामा खड滐 करने में संकोच नहीं मान रहे हैं । जो दल संविधान बनाने का शोर मचा रहा है वही संविधान सभा के समितियों में अनावश्यक व्यवधान डालकर लोकसम्मत प्रतिवेदन तैयार नहीं होने दे रहा है । माओवादी दल अभियोग लगाता हैै कि यथास्थितिवादी जमात की अगुवाई करने वाले दल संविधान निर्माण नहीं होने देना चाह रहे हैं । कांग्रेस और एमाले पार्टियाँ कह रही है कि माओवादियों ने ५ महीने तक संविधान-सभा की बैठक स्थगित करके स्पष्ट कर दिया कि लोकतांत्रिक संविधान बनाने में उनकी 磧च नहीं है किन्तु जनता का निष्कर्षयह है कि संक्रमण काल में अरबांे 磬यांे का भ्रष्टाचार हो रहा है । इस व्यापार को जारी रखने के लिए ारतीय विस्तारवाद ब्द गढ煲र जोर-जोर से उछाला जा रहा है । यह भी सत्य है कि सभी दलों के पास पार्टर्ीी नहीं गिरोह है । यह गिरोह जनता की गाढÞी कमाई लूट कर खा रही है । जनता सच्चाई समझ रही है । नेताआंे की बन्दूकें अब जनता की ओर तन गई है । चीन तो नेपाल की बिगडÞी हालत और भारत की परेशानी से खुश है । पाकिस्तान को हथियारांे की सप्लाई बढÞाकर चीन जिस प्रकार से भारत की परेशानी बढÞाने में सहयोग करता रहा है वैसे हीं नेपाल-भारत मैत्री सन्धि की हवा निकाल कर चीन किसी जंगबहादुर को पैदा कर हथियार सप्लाई का केन्द्र नेपाल को बनाना चाह रहा है । पर्ूव जेनरल तलक मसूद ने पि.टी.वी. के पत्रकार से हाल में कहा था कि भारत से मिलकर ही हम इस हिस्से में अमन दे सकते हंै । भारत प्रगति के रास्ते में है हमे सम्बन्ध सुधार कर आगे बढ滊े में ही भलाई है । प्रचण्ड पर्ूव प्रधानमंत्री की हैसियत रखते हैं । उन्हें कुटनीतिक सीमा का ज्ञान अवश्य है । नागरिक र्सवाेच्चता और सेना-प्रमुख प्रकरण बासी पडरुजाने पर अब रुवाधीनतारुशब्द को प्रहार का विषय बनाकर उछालना शुरुकिया गया है । निर्भीक और प्रबुद्ध मिडिया की तीखी प्रतिक्रिया इस प्रकार है-
माओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दहालको बोलीमा लगाम छैन ।……….खुला राजनीतिक जीवनको तीन वर्षा दहालले र्सार्वजनिक समारोहमा गरेका गाली गलौज आक्रोश र अनुमानित अभिव्यक्तिको लामो श्रृंखला छ । रु-सम्पादकीय, कंातिपुर दैनिक जनवरी ।
इसी जनवरी के कांतिपुर दैनिक में वयोवृद्ध साम्यवादी नेता मोहन व्रि्रम सिंह का एक लेख छपा है, जो इस प्रकार है- 熥्रचण्डको अराजक व्यक्तिवाद वा तिनको संगठनमा देखा परेको व्यक्ति पूजा वास्तवमा मार्क्सवाद लेनिनवादी चिन्तन भन्दा बाहिरको कुरा हो ।
माघ २ गते को भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा से बत्तीसपुतली स्थित 嶢रिका होटल में माओवादी अध्यक्ष एवं पर्ूव प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने वार्त्तर्ाारके पत्रकारों को कहा-भारतसंग न मिल्ने भनेका छैनौ, जे समस्या छन् छलफलबाट समाधान भए राम्रो हुन्छ । उन्होंने आगे कहा -ान्दोलन प्रचारात्मक मात्र भएको प्रष्ट पार्र्छौ ।रु
इस प्रकार से ७ गते नया बानेश्वर चौक पर भारतीय सेना प्रमुख दीपक कपूर को ललकारने से लेकर सीमा निरीक्षण के आन्दोलन तक का खंडन हो गया है । भारतीय सरकार द्वारा अपने सेनापति के वक्तव्य को भारत की नीति नहीं होने का ऐलान और वक्तव्य को तोडÞ-मरोडरुकर छापने का बयान आने के बावजूद कुटनीतिक मर्यादा विपरीत भारतीय सेनापति दीपक कपूर को ५ गते माघ के त्रिभुवन विमान स्थल के बाहर काला झंडा दिखाना क्या चीनी उकसाहट का नतीजा माना जाय -
पाकिस्तानी नेतृत्व पंक्ति अब अमेरिकी उकसाहट से प्रभावित नहीं होकर भारत से सम्बन्ध सुधारने के प्रयास में जुटी हर्ुइ है । किन्तु यहाँ चीनी उकसाहट जारी है । लगता है नेपाल अब द्वन्द्व्र और नया बिध्वंस का अखाडÞा बनने जा रहा है । इन हरकतांे से न नेपाली जनता को कोई फायदा होगा न भारतीय जनता कोे । लोकतंत्रवादी नेता भी सचेत नजर नहीं आ रहे हैं । दोनांे देशो को दिशाहीन शब्द वाणांे पर ध्यान नहीं देकर नया संविधान निर्माण को पर्ूण्ा जनतांत्रिक विधि विधान से परिपर्ूण्ा करके देश में जल्द ही चुनाव सम्पन्न कराके लोकतांत्रिक सरकार गठन करने की मांग आज की आवश्यकता है । लोकतंत्र गन्दे कचडेंÞ को साफ करके नया समृद्ध नेपाल की सफलता जन-आकंाक्षाओं की पर्ूर्ति अवश्य करेगा । भारतीय लोकतन्त्र की सफलता की दुहाई पाकिस्तानी राजनेता भी अब धड滆ले से देने लगे हैं । नेपाल सरकार को पाकिस्तान की राजनीति से शिक्षा लेनी चाहिए । सम्पर्ूण्ा नेपाली जनता को एकजूट होकर भारत-नेपाल की दोस्ती पर अपनी मुहर लगाने की जरुत आ पड溱 है । क्या नागरिक समाज इसकी अगुवाई कर सकेगा – इन्तजार में प्रबुद्ध वर्ग भी है ।

प्रचण्ड के निशाने पर भारत

Posted by admin On March - 12 - 2010 ADD COMMENTS

गंणतंत्र दिवस के मौके पर भारत सरकार तथा भारत की जनता को बधाई दी । प्रेम लश्करी ने अपने स्वागत भाषण में नेपाल-भारत के सदियों पुराने सम्बंध की याद दिलाई और यह सम्बंध आगे भी कायम रहेगा, ऐसी आशा व्यक्त की ।
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कार्यक्रम में बोलते हुए एमाले नेता भरत मोहन अधिकारी ने दोनों देशों के बीच सम्बंध को और भी सुदृढ बनाने तथा आर्थिक एवं सामाजिक सम्बंध को और आगे बढÞाने की आवश्यकता बतलाई । उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार की असमझदारी उत्पन्न होने पर उसे सडÞक पर न लाकर कुटनीतिक स्तर पर सुलझाने का प्रयास करना चाहिए ।
इस अवसर पर नेपाली काँग्रेस के महामंत्री विमलेन्द्र निधि ने कहा कि भारत के साथ हमारे देश का ऐतिहास्ािक, प्राकृतिक, भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्बंध सदियों पुराना है औैर यह सम्बध हमेशा रहेगा । उन्होंने कहा कि नेपाल में चीन को बढÞावा देने की आवश्यकता नहीं है । उनका कहना था कि नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में भारत ने अहम् भूमिका निभाई है । वैसे तो भारत नेपाल को प्रत्येक क्षेत्र में सहयोग देता रहा है लेकिन अभी हमारा देश जिस संक्रमण काल से गुजर रहा हैं उससे उबारने के लिए देश में चल रही शांति प्रक्रिया को तार्किक निष्र्कष पर पहुँचाने तथा लोकतंत्र के सुदृढÞीकरण एवं नया संविधान निर्माण के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में भारतीय सहयोग की परम आवश्यकता है ।
तर्राई मधेश लाकतंात्रिक पार्टर्ीीे अध्यक्ष महन्थ ठाकुर ने भारत-नेपाल सम्बंधांे को सागर की तरह गहरा और सगरमाथा की तरह उँचा बतलाया और इस सम्बध को और भी मजबूती प्रदान करने की आवश्यकता पर जोर दिया । उनका कहना था कि भारत-नेपाल की जनता को प्रत्येक परिस्थिति में सहयोग एवं र्समर्थन देता रहा है । उन्होने विश्वास व्यक्त किया कि यह सहयोग आगे भी जारी रहेगा । अध्यक्ष ठाकुर का कहना था कि देश अभी 嘪रुकी स्थिति में है । मधेश सदियों से चली आ रही उपनिवेशवाद से मुक्ति चाहता है । देश में शांति स्थापति करने तथा नया संविधान-निर्माण में भारत यथासंभव सहयोग कर एक नये नेपाल के निर्माण के सपने को साकार करने में अपनी महत्वपर्ूण्ा भूमिका का निर्वाह करेगा ।
राष्ट俠य प्रजातांत्रिक पार्टर्ीीे अध्यक्ष पशुपति शमशेर राणा ने भारत को अब तक की प्रगति एवं विकास के लिए बधाई दी तथा नेपाल-भारत के बहुआयामी सम्बंधों की चर्चा करते हुए दोनांे देशों के आपसी विवादित विषयों को संवाद के माध्यम से दूर करने का सुझाव दिया ।
कार्यक्रम की समाप्ति पर नेपाल-भारत मैत्री समाज के पदाधिकारियों 嶢रा विशिष्ट महानुभावों को पे्रम स्वरुप उपहार प्रदान किया गया । कार्यव|mम के अन्त में गोकुल प्रसाद पोखरेल ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए नेपाल-भारत मैत्री को मजबूत बनाने पर बल दिया ।
जूदा समय में नेपाली राजनीति मंे र्सवाधिक सशक्त एवं सांगठनिक आधार वाली पार्टर्ीीकीकृत नेकपा माओवादी के सर्वोच्च नेता नेपाल के सर्न्दर्भ में भारतीय नीतियों के प्रति अत्यन्त आव|mामक मुद्रा में हंै और सीमा-विवाद से लेकर अतीत में भारत के साथ हुए 嶡क्ष्िाीय सन्धि-समझौते तथा नेपाल की अन्द瞟ी राजनीति में तथाकथित भारतीय हस्तक्षेप उनके निशाने पर है । इस सर्न्दर्भ में उन्होंने क्या-क्या कहा और कितनी आक्रामक अभिव्यक्तियाँ दीं, यह बात जग जाहिर है । लेकिन उन बातों को उतना महत्व नहीं दिया जा सकता । महत्वपर्ूण्ा है उनकी विरोधी संवेदना और तेवर । संभवतः नेपाल के इतिहास में प्रचण्ड पहली पंक्ति के प्रथम राजनीतिकर्मी हैं जिन्होंने भारत के विरोध में खुलकर बोलने का साहस किया । यद्यपि इस साहस के पीछे नेकपा सुप्रीमो के अपने निहितार्थ हो सकते हंै, राजनैतिक 磬 से लोकसंग्रह का अपना दृष्टिकोण हो सकता है तथापि इस बात से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि नेपाल में ऐसी जन चेतना का एक वर्ग भी है जो नेपाल के सर्न्दर्भ में भारतीय नीति की पुनर्व्याख्या चाहती है और प्रचण्ड आज इस चेतना का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं ।
नेपाल आज राजनैतिक रूप से झुटपुटे अँधेरे में चलता हुआ देश है, जहाँ अंधकार का अवसाद और आशा की किरण दोनों दिखलाई दे रही है । देश की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक शक्तियाँ सत्ता की साधना में इस तरह लिप्त हंै कि देश अपने मुद्दे से दिग्भ्रमित नजर आता है । यह सच है कि देश में अन्तरिम संविधान का अस्तित्व है और विगत सविधान-सभा के सफल निर्वाचन के बाद देश नवयुग के नवीन और पर्ूण्ा संविधान की अपेक्षा कर रहा है । लेकिन वर्तमान समय में देश के जीवन तथा समाज के हर क्षेत्र में अराजकता संभवतः नेपाल के इतिहास में प्रचण्ड पहली पंक्ति के प्रथम राजनीतिकर्मी हैं जिन्होंने भारत के विरोध में खुलकर बोलने का साहस किया । यद्यपि इस साहस के पीछे नेकपा सुप्रीमो के अपने निहितार्थ हो सकते हंै की स्थिति देखी जा रही है और नये संविधान की दृष्टि से अब तक की यात्रा बहुत अधिक सकारात्मक दिखलाई नहीं देती । सत्ता में सहभागी और विपक्ष में बैठे दल एक दूसरे को नीचा दिखाने और विफल करने की मानसिकता में इस हद तक ऊँचे उठे हैं कि संविधान निर्माण के मुख्य लक्ष्य पर संशय के बादल मँडराने लगे हैं । यह सच है कि उच्च स्तरीय राजनैतिक संयन्त्र के गठन के बाद लोगों में एक सकारात्मक संदेश तो गया है लेकिन विभिन्न पार्टियों के नेताओं के जो विरोधी बयान र्सार्वजनिक हुए हैं उससे उसकी सफलताओं पर संदेह की धूंध चढÞती दिखलाई देती है । ऐसे में नेपाल की राजनीति आज संक्रमणकालीन अवस्था से गुजर रही है और देश में अनिश्चितता तथा अस्थिरता का आलम है । इसलिए वैश्विक स्तर पर राजनीति करने वाली शक्तियों-महाशtmियों के आकर्षा का केन्द्र नेपाल बन गया है और हमारे दोनों पडÞोसी भी यहाँ अधिक सक्रिय दिखलाई देते हैं ।

दिशाहीन होती नेपाली राजनीति::पिताम्बर दाहाल

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

देश की राजनीति दिशाहीन होती जा रही है । संविधान निर्माण प्रक्रिया दिशाहीन राजनीति की वजह से अबरुद्ध हो गयी है । हमारे नेतागण शान्ति प्रक्रिया को निर्ण्यक बिन्दु पर पहुचानें का भाषण देते हैं, लेकिन उन्हीं नेताओं के जिद के कारण पूरा राष्ट्र अशांत होते जा रहा है जब देश की राजनीति गतिशील नहीं हो तो राष्ट्र कमजोर होता है । आज हमारा देश इतिहास में सब से कमजोर अवस्था से गुजर रहा है । हमारी राष्ट्रियता कमजोर हो रही है । हमारी सभ्य संस्कृति निर्रथक होती जा रही है । हमारा अपनापन खोता जा रहा हैं । हमारी अपनी पहचान लुप्त की संभावना दिखाई दे रही है ।

हमारें यहाँ संवैधानिक व्यवस्था अपनाने का अनोखा सिस्टम स्थापित हो रहा है । बाहुबल के माध्यम से अपनी चाहत को प्राप्त करने की दिशा में लोग लग गए हैं । सडक दर्घटना में अगर किसी की मौत हो जाती है तो आगजनी तोडफोड और चक्का जाम करना तो सामान्य बात हो गयी है । दर्घटना में मरे व्यक्त