प्रचण्डजी की नेतृत्व की सरकार ने जब उट की टेढी पीठ की तरह करवट भी टेढी ले ली थी, उसी वक्त से नेपाल की राजनीति और शान्ति यात्रा मं फिसलन भी टेढी मेढी ही शुरू हो गयी थी । अलबत्ता इस फिसलन की जड तो माओवादी की उसी करवट में ही हम स्पष्ट देख सकते हैं, फिर भी प्रचण्ड की सरकार गिरने के बाद उत्पन्न अनिश्चितता शान्ति के लिए ही घातक घन्टी के रूप मं ले कर अन्य दलों को फिर सम्झौतामुखी रास्ता अख्तियार करके राष्ट्र के हित मं माओवादी को फिर से पकडकर किसी भी तरह दिल्ली समझौतावाली उसी रास्ते पर ले आना चाहिए था । पर चुनाव की हार की वजह से तिलमिलाए हुए नेताओं ने इस बाढ को रोक कर क्षति नियन्त्रण करने के बदले बाढ मं सत्ता की मछली पकडने के सुनहरे अवसर के रूप मं इसे लिया और प्रजातान्त्रिक सिद्धान्त के विपरीत एक के बाद एक गलती होता गया और साथ मं सब से बडी जनमतवाली दल माओवादी को कोने करने में दूसरे और तीसरे बडे दलों ने कोई कसर नही छोडी ।
दिन रात दूसरों के ऊपर रणनीति और मोर्चाबन्दी की बात कह-कह के नही थकनेवाला माओवादी खुद को ही चारों तरफ से रणनीतिक मोर्चाबन्दी के अन्दर पाकर अपनी ही अन्तरद्वन्द और बौखलाहट में कभी खुद को, कभी दोस्तों को, और कभी दीवार को नखछेदन करता गया, और अन्त में खुद ही अपने पन्जों से, घायल और अकेला पडता गया । माओवादी के इस अकेलेपन और बौखलाहट की वजह से, चुनाव से भागनेवाले और चुनाव में पराजित नेताओं और खुद माधव नेपालजी को बहुत लाभ मिल गया था और अभी भी मिल रहा है । और अपने अजीज चौकडियों के साथ इनकी भी दिन दुगूनी और रात चौगुनी, खूब चांदी बन रही है ।
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विश्व का सब से बडा प्रजातन्त्रवाला भारत को भी हमारे सत्ताखोर नेताओं ने पा“व पकडकर या हाथ जोडकर इस अप्रजातान्त्रिक सत्ता छीनाझपटी के गन्दें खेल में दिल्ली समझौता के नाम पर घसीट के ले आने में सफल हो गये । अब यह खेल बहुत आगे बढ चुका है, कभी भी खेल में दर्शकगण के तरफ से पत्थरे, और बोतलें इस खेल को खतरनाक अन्जाम की ओर ले जा कर, इसे एक भयानक हादसा मंे परिवर्तन करने की लालसा लिए हुए बैठे हैं, इस परिवर्तन से नाखुश शक्तियां, और भारत को इस महाजंजाल में फंसा कर इस आग को सीमा के उस पार तक फैलाने की एजेन्डा लिए हुए इस क्षेत्र की शान्ति और प्रगति को छीन कर आग की लपेट में ले जाने के लिए आतुर पर-पीडक आतंककारी शक्तियां ।
हालांकि माधवबाबू की यह सरकार माओवादी के लाख ना चाहने पर भी आगे भागता जा रहा है, अलबत्ता देश पीछे छुट गया है या नही देख पा रहे हैं, ना तो सज्जन नेताओं मं से एक माने हुए माधवबाबू स्वयं, ना तो नेपाली जनताओं के सबसे अजीज कुटम्ब भारतीय जनताओं के प्रतिनिधि दिल्ली या इस सरकार के कोई भी शुभचिन्तक । पर यह सरकार के अकेले भागने से और माओवादी के अकेलेपन से देश को राहत मिलेगा, क्या – क्षेत्र की शान्ति बरकरार होगी, क्या – हल के बिना आगे बढÞ रहा यह मसला से उत्पन्न असमंजसता अच्छा करेगा, क्या –
अन्तिम घडी में गिरिजाबाबू को भी, यह महसूस हो गया था कि जो हो रहा है, यह ठीक नही हो रहा है । बदले की भावना से, माओवादी को पाठ पढाने के चक्कर में देश और शान्ति को ही घनचक्कर में डाल कर गलती करने की पीडापर्ूण्ा अनुभूति से वो भी विक्षिप्त मनस्थिति मंे पहुंच चुके थे । और इसी वजह से कुछ हप्तों से उनका शुरू किया हुआ इस मुल्क को पर्ुनर्जलीय उपचार करके पुनर्जीवित करने की उनकी कोशिश अब रूक गयी है, प्रारब्ध की इस कठोर निर्ण्र्ाासे ।
तो अब गेंद कहां है – बच्चे भी जानते हैं कि, जब अपने घर में मां बाप ताऊ, ताई दादा, दादी सब झगड रहे हैं तो, किस की सद्भाव की जरूरत पडेगी, इस मसले को घर के अन्दर में ही सुलझाने के लिए – अर्थात गेंद अब हमारे दुःख और सुख के साझेदार पडोसी के आंगन में पहुंच चुकी है, क्योंकि गेंद की स्र्टार्ट भी दिल्ली समझौता के वक्त से ही उसी पडोसी की आंगन से ही हर्ुइ थी । और हम खुद ये मसला को हल करतेे, अगर गिरजाबाबू जिन्दा होते । पर अब कुटुम्ब की सद्भाव के बिना ये संभव नही, क्योंकि संकरे पुल के बीच में आमने सामने दलबल के साथ दोनों पक्ष सीना ताने एक-दूसरे को वापस जाने को कह कर ‘नहीं तो’ ‘नहीं तो’ की चेतावनी की रट लगा रहें है । हमारी संविधान, शान्ति, सुरक्षा, बाजार व्यवस्थापन और अमन चैन उनके सर के टोकरी पर बन्द पडी है, किसी भी वक्त नीचे उमडÞता हुआ दरिया की लहर पर गिरने के लिए तैयार ।
यूं तो लगता है माधवजी को ऐसी फेविकोल से सरकार में चिपका दिया गया है कि वहां से उनको किसी भी तरह की केमिकल लगाकर भी माओवादी उतार नही सकता । पर भय यह है की चिपकी हर्ुइ यह सरकार के साथ साथ कही नेपाल की राजनीति भी गलत जगह पर तो नही चिपक जाएगा – दशक की दहशत और अस्तव्यस्ता के बाद दलों के साथ भारत की भी पहलता पर पटरी पर डाली गयी इस रक्तरंजित देश अगर पटरी पर से फिर बाहर उतर गई तो अब अन्दरुनी या बाहरी कोई भी शक्ति क्या फिर संभाल सकेगा – और अब जो नुकसान होने वाला है उस की भरपाई हो ही नहीं सकती ।
हालांकी इस परिस्थिति से नेपाल को सुरक्षित करने के लिए लोग गिरिजाबाबू और भारत के ऊपर ही टकटकी बंाधकर देख रहे थे, पर गिरिजाबाबू के जाने के बाद वह आधार भी टूट गया । इसी पृष्टभूमि में भारत की समाधानपर्ूण्ा तथा समन्वयकारी, निष्पक्ष तथा सन्तुलित और प्रजातान्त्रिक कुटुम्बवाली पडोसी की भूमिका की जरूरत और भी बढ गयी है । यूं तो अपने पक्ष में ना हो तो इसे हम हस्तक्षेप और अपने पक्ष में हो तो इसे सद्भाव का नाम देते हैं । अलबत्ता दिल्ली समझौता के साथ ही शुरू हुआ इस शान्ति यात्रा के नींव पर माओवादी, कांग्रेस, एमाले और अन्य दलों के साथ-साथ भारत ने भर्ीर् इटें और चुनें डाले थे । तो जब तक यह शान्ति इमारत नही बन जाती, अन्दरूनी मामले पर हस्तक्षेप कहा जाने पर भी जब-जब आपदा पड जाती है तो इसके दोष भी भारत ही के माथे पर मढÞा जाता है, और सहयोग की आकांक्षा भी भारत से ही किया जाता है । यही आज का नेपाल का सत्य है ।
नेपाली जनता के भले और खुशहाली तथा शान्ति के लिए भारत की तरफ से लिया हुआ या ले जाने वाले हर कदम में किसी नेता या दल की हित से ज्यादा इस मुल्क की जनता की हित के लिए परिलक्षित करने के लिए अनन्य पडोसी भारत को विशेष चौकन्ना होना चाहिए, क्योंकि माओवादी नेतृत्व की सरकार गिरने के लम्हें से जब परिस्थिति बिगडÞती गई, लोगों को लगने लगा की इस बार भारत व्यक्ति विशेष या दल विशेष का साथ दे रहा है, या लात दे रहा है । और दोनों स्थिति इस माहौल को अशान्ति के तरफ ले जाएगा और अन्ततः नेपाल हिंसा और विनाशकारी गृहयुद्ध में प्रवेश करेगा । और उस वक्त चाह कर भी क्या कोई भी ताकत विनाश को रोक पाएगा -
यह सवाल जितना आसान सा लगता है, उतना ही खतरनाक है इसका उत्तर । और सशस्त्र द्वन्द्वकाल में ३२ महीने तक लगातार नारायणी अन्चल से सुदूर महाकाली तक अपने ही भाई-बहनों के खून से भींगते हुए और भींगाते हुए, लाशों की अम्बार से अपने और दूसरे की भेद करने में अर्समर्थ यह पर्ूव सैनिक अर्थात ‘मै’ इसका उत्तर बखूबी समझता हू“ । इसलिए मैं दावे के साथ डंके के चोट पर चिल्ला-चिल्ल्ााकर कह रहा हू“, इस रास्ते पर विनाश है, यहां सिर्फ मौत है, पर नेताओं के नहीं आम गरीब और सहाराविहीन नेपाली भाई-बहनों का, महिलाओं का, दलितों का, किसानों का, मजदूरों का । हम भगवान पशुपतिनाथ से सिर्फ यही मा“ग सकते हैं, हे प्रभु हमें हमारे नेताओं से बचाओ । और खुद ही ‘तथास्तु’ कहने से ज्यादा कर ही क्या सकते है –