गुरिंदर चढ्डा की अंग्रेजी फिल्म इट्स ए वंडरफुल ऑफ्टरलाइफ में शबाना आजमी ने मां का चैलेंजिंग रोल किया है। हिंदी में यह फिल्म हाय मैं मर जावां टाइटिल से रिलीज हो रही है। बातचीत शबाना आजमी से..
इट्स ए वंडरफुल ऑफ्टरलाइफ किस तरह की फिल्म है?
ब्रिटेन में एक वेल नोन जॉनर है इलिंग कॉमेडी। इलिंग कॉमेडी में बेसिकली कॉमेडी होती है, लेकिन उसमें हॉरर का एलीमेंट भी होता है। इस तरह की फिल्म हिंदुस्तान में नहीं देखी गई है। यहां के दर्शक के लिए यह नया जॉनर है, इसीलिए लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि इसे किस तरह की फिल्म कहें? अगर आप अपने दिमाग में डाल लें कि यह फिल्म ब्रांड गुरिदंर चढ्डा है, तो सब कुछ साफ हो जाता है। उन्होंने अपने शौहर के साथ यह फिल्म लिखी है। यह एक ऐसी मोटी मां की कहानी है, जिसकी बहुत मोटी बेटी है। मेरे कैरेक्टर का नाम मिसेज सेठी है। तीस साल की होने वाली बेटी की वह शादी करना चाहती है। रूबी के मोटे होने के कारण जब उसे बार-बार रिजेक्ट किया जाता है, तो मिसेज सेठी सख्त कदम उठाती हैं। मां बेटी के लिए किस हद तक जा सकती है? यही इसकी कहानी है।
फिल्म को स्वीकारने की वजह?
मिसेज सेठी जैसा कैरेक्टर मैंने कभी प्ले नहीं किया था। मुझे समझ में नहीं आया कि यह रोल कैसे करूं? मैंने गुरिंदर से कहा कि आपकी उंगली पकड़ लूंगी। आप जहां ले जाएंगी, मैं चली जाऊंगी, क्योंकि मैं इस जॉनर से वाकिफ नहीं हूं। उन्होंने कहा कि आप चिंता मत करो। मैंने स्क्रिप्ट में पढ़ा था कि मिसेज सेठी के तीन पेट हैं। सबसे पहले मैंने इस कैरेक्टर के लिए अपना पच्चीस पौंड वजन बढ़ाया। मिसेज सेठी को लगता नहीं कि उनकी बेटी मोटी है। वह कहती है कि खाते-पीते घर की है। इस तरह की मां है। इसमें मजाक होने के बावजूद एक रोमांटिक एंगल भी है। इसमें मां और बेटी का बहुत खूबसूरत और रियल रिश्ता है। कह सकते हैं कि यह फिल्म मां-बेटी की प्रेम कहानी है। फिल्म अंग्रेजी में है।
अभी और कौन सी फिल्में आप कर रही हैं? इधर आपकी उम्र के कलाकारों के लिए काम आ रहा है। कुछ साल पहले ऐसा नहीं था?
हिंदुस्तानी सिनेमा का यह बेहतरीन दौर है। यहां हर तरह की फिल्में बन रही हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि हर उम्र के लोगों के लिए फिल्में बन रही हैं। अगर लोग देखें, तो पिछले पांच साल में मुझे जो रोल मिले हैं, वे बेहतरीन रोल हैं।
मॉर्निग रागा, गॉडमदर, तहजीब, दस कहानियां, लॉयन ऑफ पंजाब, सॉरी भाई सब अलग किस्म की फिल्में हैं। लोगों को लगता था कि मैं बहुत गंभीर किस्म की फिल्में करती हूं, लेकिन पिछले कुछ सालों में मैंने हल्की-फुल्की फिल्में भी की हैं।
इंडस्ट्री आप लोगों की जरूरत समझ रही है या ऐसा मार्केट बन गया है?
मुझे लग रहा है कि मार्केट बन गया है। बहुत ज्यादा युवा डायरेक्टर आए हैं, जिनका सोचने का ढंग अलग है। वे जिस जिंदगी को जानते हैं, उस जिंदगी की बात करते हैं। मैं यह नहीं कह रही कि मेन स्ट्रीम में बहुत चेंज आ गया, लेकिन जो आया है, उसका हम खुशी से स्वागत करते हैं।
गुरिंदर के साथ काम करने का अनुभव?
मैंने कई महिला फिल्मकारों के साथ काम किया है। दीपा मेहता, सई परांजपे, अपर्णा सेन, कल्पना लाजमी, विजया मेहता, गुरिंदर चढ्डा आदि। मैंने महसूस किया है कि महिला निर्देशकों का ध्यान डिटेल पर ज्यादा होता है। औरत बाई नेचर डिटेल पर जाती है। मेरे खयाल से कामयाब डायरेक्टर वह है, जिसके अंदर आधा मर्द और आधी औरत हो। मैं अर्द्धनारीश्वर के कॉन्सेप्ट में यकीन करती हूं। महिला होने के नाते औरत डायरेक्टर के साथ कंफर्ट ज्यादा रहता है। गुरिंदर सेट पर हल्का-फुल्का माहौल रखती थीं।