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September , 2010
Thursday
राजधानी काठमांडू के अन्नपूर्ण होटल में भारत -नेपाल मैत्री समाज द्वारा नेपाल भारत सम्बन्ध वर्त्तमान ...
राजनेताओ की अकर्मण्यता, असक्षमता, अदूरदर्शिता, सत्तालोलुपता, भ्रष्टाचार में लिप्तता आदि कारणों से देश एक बार ...
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना ...
ईन फ्लू की तरह हैपेर्टाईटिस-बी का भी भारी आतंक अनेक वर्षो तक फैलाकर अरबों रूपया ...
नेपाली राजनीतिज्ञ भले ही संविधान निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण में विफल हो रहे हों, लेकिन ...
मजदूर दिवस के अवसर पर नेपाली फिल्म के मशहूर अभिनेत्री रेखा थापा विराटनगर में मजदूरों ...
नेपालगन्ज/'पाहुना का स्वागत सत्कार, नेपाली का संस्कार, अब पाली आर्थिक क्रान्ति का' मूल नारा के ...
डियन डिफेंस रिव्यू के संपादकीय में व्यक्त की गई भारत पर चीनी हमले की आशंका से किसी ...
महाभारत में वैसे तो कई पात्र हैलेकिन उसमें एक पात्र ऐसा था जिसने पुत्र मोह के ...
सामान्यतः लोग इंटरनेट को जानकारी लेने, लोगों से जुडे और चैटिंग करने के लिए ही ...
शान्ति क्षेत्र नेपाल जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ, वहाँ हर कोई द्वन्द एवं सेना ...
जनकपुरधाम-नेपाल का धार्मिक-सँास्कृतिक नगर आजकल विविध कारणों से चर्चा का केन्द्र बनता रहता है । ...
जीवन के अनेक रंग होते हैं लेकिन यह अपने आप में भी एक गाढा रंग ...
स्कृत नेपाल की ही नहीं अपितु सम्पर्ूण्ा विश्व की क्रान्तिचेता संास्कृतिक भाषा है । विश्व ...
नेपाल में अन्तर्रर्रीय गिरोह के बढते शिकंजे एव व्यापारिक निवेश के चलते इन गिरोहों के ...
जनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों ...
रोज बालकनी में खडा होकर एक बच्चे को देखता हूं स्कूल जाते हुए अच्छी साफ यूनिफार्ँम पहने अजब ...
जनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की ...
माउण्ट एवरेस्टको नेपाल में सगरमाथा कहा जाता है । माउण्ट एवरेस्ट नेपाल का है यह विश्वव्यापी रुप ...
कृतिक संपदा से भरपूर भारत का तमिलनाडु राज्य अपने जादर्इ सौर्न्दर्य से सैलानियों को मुग्ध करने ...
एक नजदीकी मित्र ने बहुत दूर से फोन किया, एक नई पत्रिका का विमोचन ...
लीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण ...
जेठ १४ गते संविधान जारी करने का निर्धारित तिथि जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही हैं ...
चितवन, जेष्ठ २१ - माओवादीले भरतपुरस्थित वीपी कोइराला क्यान्सर अस्पतालका कार्यकारी निर्देशक डा. भक्तमान श्रेष्ठ ...
निया भर में मोस्ट वान्टेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिन्दा है यह खुलासा एफ.बी.आई. द्वारा ...
किसी भी राज्य में रहनेवाले व्यक्ति की हैसियत तथा उसके राज्य के साथ का सम्बन्ध ...
उपनिवेश वाद वह शासन है जिसका संचालन विजेता राष्ट्र विजित राष्ट्र की जनता पर करते ...
गोरखालैण्ड आन्दोलन पश्चिम बंगाल में लगातार तेज होता जा रहा है । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ...
बच्चे के फेवरेट रंग सिर्फ उसकी पसंद या नापसंद नहीं होते, ये उसकी पर्सनैलिटी के ...
अमेरिका की तरफ से की गयी पहल और मंर्बई हमले के करीब १४ महीने बाद ...
ल ही में भारत आये अपनी व्यक्तिगत यात्रा लेकिन विभिन्न राजनीतिक नेताओं से मिले मधेशी जनाधिकार फोरम ...
नेपाल में सफेद कारोबार की आड में काला धंधा करने वाले बदनाम लोगों की जान ...
भारतीय फिल्म निर्माता प्रकाश झा की कहानी किसी भी फिल्म से कम नहीं है । ...
र्तिक धवल त्रयोदसी से ही मिथिला विभूति महाकवि विद्यापति ठाकुर के संस्मरण में 'विद्यापति त्यौहार' पर नेपाल-भारत ...

Archive for the ‘कड़वा सच’ Category

साहित्यिक समारोह::मुकुन्द आचार्य

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

mukunda acharyaएक नजदीकी मित्र ने बहुत दूर से फोन किया, एक नई पत्रिका का विमोचन समारोह है कृपया आप भी पधारे ।
मैने पूछा , और कौन-कौन पधार रहे है उस विमोचन समारोह में -
उधर से मित्र ने क्या कहा, मै ना तो ठीक से कुछ सुन सका और ना कुछ समझ सका , हालाँकि मोबाईल नामक यंत्र को श्रवण-कान) पर मैने यथाशक्ति जोर से चिपकाया था कोई फेविकाल नही लगाया था ।
आप फरमाएंगे, अजी ओल्ड चैप जीव आपने सुना ही नहीं , तो समझोगे क्या खाक ।
बिल्कुल सही फरमाया जनाव आपने । नेपाल टेलिकम ने अपने प्यारे ग्राहको को बहुत सारी सुविधाएँ दी हैं । उनमें से एक है -मोवाईल में लम्बी चौडÞी बापत कर सकते है मगर आपके पले पडेगा सिर्फदो- चार शब्द । उतने में आपको संतोष करना होगा टेलिकम को पता है, आजकल के ग्राहक बहुत स्मार्ट होते है दो -चार शब्द सुन कर ही बाकी सारी बातें अनुमान से समझ सकते हंै ग्राहक की समझदारी बढÞी है या नेपाल टेलिकम की, इसका फैसला सभी मोबाईलधारी मित्रंों पर छोडता हूँ ।
बहुत दिन हो गए थे किसी समारोह में कविता सुनाकर लोगों को बोर नही कर पाया था । सोचा अच्छा मौका है । घंटों दिमाग को कागज कलम पर रगडÞने से एक जिन्न पैदा हुआ ।
उस जिन्न ने कहा, मेरे आका । मेरे लिए क्या हुक्म है –
मैने कहा कल परसों में एक साहित्यिक समारोह में कविता वाचन करना चाहता हूँ । तुम जरा माहौल बढिÞया बना देना और क्या । लोग कविता सुनकर ताली पीटे अपना सिर नही ।
जिन्न ने कहा, आका मेरे । मैं सिर्फश्रोता वर्ग में माहौल बनाऊँगा । मंच का माहौल तो समारोह के आयोजक ही संभालेगेे न …….।
मैने हथियार डाल दिए और कहा ठीक है । तुम श्रोताओं को ठीक से संभाले रखना, मैं थोडÞे समय मैं ज्यादा से ज्यादा श्रोतागण को बोर करने कार् इमानदार प्रयास करुँगा । मंच के लोग तो वैसे भी दूसरे की कुछ भी सुनना नही चाहते । उनका खुद का राग और खुद की डफली होती है । लोग सुने, ना सुने-ठंेगे से ।
लम्बे इन्तजार के बाद ,जब पचास प्रतिशत श्रोता किसी न किसी बहाने से नौ-दो-ग्यारह हो चुके थे एक युवक मंच पर प्रकट हुआ । वेश -भूषा चाल -ढाÞल, आनी – बानी से वह साहित्यसेवी कम किसी पार्टर्ीीा कार्यकर्ता ज्यादा लगता था । उसने माइक से आकाशवाणी की ,आपलोग सिर्फएक घंटा और धर्ैय धारण करें । हमारे प्रमुख अतिथि माननीय मंत्री जी दो कार्यक्रमों का उद्घाटन करके सीधे यही पधार रहे हैं मुझे पूरा विश्वास है जो वास्तविक साहित्य प्रेमी होंगे वे दो तीन घंटे की प्रतीक्षा हंसते-हंसते झेल लेंगे ।
तब तक प्रायः सभी राजनैतिक दल के नुमाइन्दे मंच में अपनी कर्ुर्सर्ीीर चिपक चुके थे । बचे – खुचे श्रोतागण उपस्थित लडÞकियों को ‘इम्प्रेस’ करने के लिए जोर – जोर से बोल और हँस रहे थे । मिला -जुलाकर माहौल खुशनुमा ही था ।
खैर, मंत्री जी पधारे । दीप प्रज्ज्वलित किए और राजनैतिक दल के खिलाडिÞयों ने ताली की गडÞगडÞाहट से सभाकक्ष को गुंजायमान किया । दुबली – पतली पत्रिका प्रकाशक की आर्थिक दर्ुबलता को उजागर कर रही थी । ताली की गडÞगडÞाहट से कुछ सोए हुए श्रोता जग पडंेÞ, और लाल – लाल आँखों से नींद उडÞनेवालों को ढूँढने लगे । नींद उडÞानेवाला कोई मंत्री है । इतना जानते ही वे खुद ताली पीटने लगे ।
साहित्यिक मंच का पूरा राजनीतिकरण हो चुका था मंच में किसी कोने में दुबक कर एक – दो साहित्यकार शरमा कर बैठे हुए थे ।
नेतागण ने मंच का सदुपयोग करते हुए विपक्षी दलवालों को सभ्य भाषा में असभ्य गालियाँ दी । मेरी बारी आई मैने नई पत्रिका को अपनी नई कविता में शुभकामना प्रदान की । मैं तालियाँ चाहता था चाय की प्यालियँा बजने लगी । लोग कविता सुनना छोडकर चाय पर टूट पडंे उस समय मुझे बोध हुआ, कविता तो चाय की प्याली से बहुत सस्ती है । कोई भी कवि कही कभी अपनी कविता सुना देगा मगर चाय पिलाने वाला जल्दी कोई मिलता नहीं । हाय रे जमाना । जी हुआ, चाय की प्याली मंे डुब कर वही शहीद हो जाउFm । कुछ सुकन्याएँ चाय बिस्किट से सुसज्जित ट्रे लेकर इधर -उधर भटक रही थी । और श्रोताओं की निगाहें उनकी ओर भटक और मटक रही थीं ।
एक सज्जन ने मुझसे कहा पत्रिका विमोचन में नेतालोगों का क्या काम । देश में साहित्यकारों की कमी तो नहीं है । मंच में सारे के सारे दलबाजी और नारावाजी करनेवालों का हुजुम जमा कर दिया गया ।
मैंने उन्हें समझाने का असफल प्रयास किया, मंत्री जी पत्रिका का उद्घाटन करेंगे तो पत्रिका का स्वस्थ और दर्ीघजीवी होने की संभावना बढÞ जाती है ।
सज्जन बोले, आपने बिल्कुल ठीक कहा । मै भी कितना नालायक हँू । इतनी छोटी और मोटी बात भी मेरे दिमाग में पहले क्यों नही आई । इतना कहकर अपनी नालायकी दूर करने के लिए वे चाय और बिस्किट पर निर्दयतापर्ूवक टूट पडेंÞ ।

गोविन्दा देश बचा लो !::मुकुन्द आचार्य

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

gobindaबडी मुश्किल से ‘एप्पाटमेंन्ट’ मिला था, भगवान कृष्ण से मिलने का । उन्हें आजकल के पत्रकारों से वही पुरानी शिकायत थी- सब पत्रकार भगवान कृष्ण को केवल ‘रोमान्टिक हीरो’ मानते हैं, उनकी भागवत्ताकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता ! पीत पत्रकारिता की हद हो गई !
खैर, बहुत सफाई देकर मुझे मिलने का मौका मिला था । बिना समय गँवाए मिस्टर श्रीकृष्णचन्द्र से मिलने मैं वृन्दावन पहुँचा । पहुँते ही मैने पूछा, समूचा नेपाल अभी शोक में डूबा हुआ है, और आप यहाँ गोप बालकों के साथ माखन मिश्री खाकर ‘पिकनिक’ मना रहे हैं । गिरिजा बाबू की मौत से नेपाल में जो शांति प्रयास चल रहा है, उसे गहरा धक्का लगा है । आपको इसकी कोई फिकर नहीं है ! – ताज्जुब है, आप कैसे भगवान हैं !
माखन का एक गोला मुंह में डालते हुए कृष्ण बोले, हे बालक ! तुम जिस देश की बात कर रहे हो, क्या वहाँ के नेता देश के विषय में सच्चे दिल से चिन्तित हैं – सच सच बताना ! मैंने हाथ जोड लिए, प्रभो ! गिरिजा बाबू की अन्तिम यात्रा में जो जनसागर लहराया था उसे देखते हुए मैं दावे के साथ कह सकता हूँ– सिर्फनेतागण ही नही सारे के सारे नेपाली अब गिरिजा बाबू के बताए हुए रास्ते में चलने को तैयार हैं ! टी.वी. में देखते हुए तो ऐसा ही लगता था ! अन्दर की बात तो आप ही जानते होंगे -आप अन्तर्यामी जो ठहरे !
एक गाय की पीठ सहलाते हुए कृष्णजी बोले( हे वृद्ध बालक ! तुम कितने भोले हो ! टी.वी. में जितने प्रचार आते है, उनमें अक्सर कोई सत्यता नहीं होती । सत्यता होती तो इस दुनिया के बारे में मुझे चिन्तित क्यों होना पड्ता – आराम से गौ चराता और वंशी बजाता ! न उधो का लेना न माधो का देना !
बिना माँगे हुए एक गोप बालक ने माखन मिश्री लाकर मेरे सामने रख दी । मै भोग लगाने में पीछे क्यों पडता – मिश्री की डली को बचेखुचे दाँतों से कटकटाते हुए मैं पूछ बैठा, दो चार वर्षहमारे महान नेता गिरिजा बाबू को हमारे बीच रहने देते तो आप का क्या बिगड जाता – आप जनता जनार्दन’ भी कहे जाते हैं मगर जनता की भावना को जरा भी नहीं समझते ! देश में सुख शांति स्थापित हो जाती । गिरिजा बाबू के बिना वहाँ र्स्वर्ग में कोई बहुत बडी हानि हो जाती क्या – झट से छीनकर ले गए !
मैं माखन मिश्री खाकर भी मीठा मीठा नहीं बोल सका ! मुझे खेद हैं ! और लम्बे समय तक खेद बना रहेगा !
पीताम्बर को भूमि पर आसन बनाते हुए श्रीकृष्ण बोले, नासमझ वृद्ध बालक ! सब की आयु निश्चित होती है । मृत्यु के बारे में मैं फिर से अपनी गीता को दुहराना नहीं चाहता । वैसे मैं भी गीता बहुत कुछ भूल चुका हूँ । वैसे गिरिजा बाबू तो छह छह बार नेपाल में प्रधानमन्त्री बन चुके हैं । जब छह बार में देश नहीं सुधार सका….. तो अब क्या सुधारेगा ! हो सकता है, उनकी मौत से नेतागण में कुछ सद्बुद्धि आ जाए । हो सकता हैं, क्षुद्र स्वार्थों को त्यागकर आपस में लडÞना-झगडÞना छोड दें !
मैने कान में अपनी कलम खोंस ली और कृष्णजी ने अपनी कमर में बाँसुरी ! अब हम दोनों योद्धा मैदान में आमने सामने ताल ठोककर खडे थे । मैं कुछ ज्यादा ही कडÞवा बोल बैठा, कृष्णजी ! आप तो सब कुछ जानते है, फिर भी मुझ से ही कहलवाना चाहते हैं ! देश में नयाँ संविधान बनने जा रहा है । संविधान का ‘स’ तक जो नहीं जानते वे संविधान सभा के सभासद् बनकर देश को लूट रहे हैं । आपने कौरवसभा में द्रौपदी की इज्जत बचाई थी, यहाँ तो पूरे देश की इज्जत दाव पर है । बचा लीजिए मेरे देश को प्रभु ! असफल राष्ट्र बनने में इसे कभी सफलता न मिले !
मैने तो गिरिजा बाबू की इज्जत रख ली । वे जिन्दा रहते और संविधान नहीं बन पाता तो उनकी क्या इज्जत रह जाती – इसीलिए कहा जाता है, भगवान, जो करता है अच्छा करता है । स्मित हास्य के साथ श्रीकृष्ण ने कूटनीतिक भाषा में मुझे समझाया !
और जो आपने गीता में कहा हैं, ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतां धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।’ उसका क्या हुआ – मैं मानता हूँ नेता भ्रष्ट हैं, कर्मचारी भी भ्रष्ट हैं, व्यापारी उच्च श्रेणी के भ्रष्ट है फिर भी र्सवसााधरण जनता क्यों तकलीफ भोगती रहे – उसका क्या कसूर – ( मैं भी जरा आवेग में आ गया !
अरे भाई ! बात को समझा करो ! सारे भ्रष्टों का र्समर्थन करनेवाली जनता को भी भोगना ही पडता है । गेहूँ के साथ घुन स्वतः पीसे जाते है । जनता किस हद तकर् इमान्दार है जरा उधर भी ध्यान देना ! भगवान मुझे देखना होगा ।
इतने में एक दिव्य यान यमुना किनारे अवतरित हुआ । उस में से भव्य पुरुष लोग प्रकट हुए । वे अनेक देशों से आए थे । श्रीकृष्ण से राजनीति सीखने मैंने कृष्ण से इजाजत चाही । चलते चलते उन्होंने कहा, बच्चा एक बात याद रखना । मानस की इस पंक्ति को कभी न भूलना( र्’कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ।’ मैंने भी एक विनती की, गोविन्द ! गिरिजा बाबू को तो आप नहीं बचाए, मगर देश को बचालेना ।
मैं थोडी दूर ही लौटा था, रास्ते में गिरिजापुत्री सुजाता मिल गई( अस्त व्यस्त और त्रस्त मुद्रा में । मैने पूछा क्या हुआ उपप्रधान और विदेश मन्त्रीजी – फूट फूटकर रोने लगी । और रुक रुककर कहने लगी
मेरी ही पार्टर्ीीले मुझे अब दूध की मक्खी की तरह कैंबिनेट से निकाल बाहर करना चाहते हैं । सेभ मी कृष्णा ! कहते हुए वे उत्तर से दक्षिण की ओर भाग रही थीं ।

पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला का निधन

Posted by admin On March - 20 - 2010 1 COMMENT

नेपाल में पाँच बार प्रधानमंत्री रह चुके गिरिजाप्रसाद कोइराला का आज यहाँ निधन हो गया। वे पिछले कुछ माह से बीमार थे और उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।

नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष गोपाल मान श्रेष्ठ ने बताया 87 वर्षीय कोइराला का निधन स्थानीय समयानुसार 12 बज कर 10 मिनट पर उनकी बेटी और उपप्रधानमंत्री सुजाता कोइराला के निवास पर हुआ।

नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष कोइराला पिछले कई माह से बीमार थे। नेपाली कांग्रेस देश में सत्तारूढ़ सीपीएन-यूएमएल की एक मुख्य घटक है।

सुधार के लक्षण नजर आने के बाद कोइराला को बुधवार को मार्ती गंगा लाल हार्ट सेंटर से छुट्टी दे दी गई थी और तब से वे अपनी बेटी के घर पर थे। सुजाता विदेश मंत्री भी हैं। पूर्व में सुजाता के सलाहकार चिरंजीवी नेपाल ने बताया था कोइराला को अतिसार हो गया था और वे कोमा में चले गए।

पार्टी सूत्रों ने बताया कि कोइराला के रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो गया था और उन्हें साँस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। नेपाल में करीब एक दशक से चले आ रहे सशस्त्र संघर्ष को समाप्त कर माओवादियों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने तथा शांति प्रक्रिया की अगुआई में कोइराला की उल्लेखनीय भूमिका थी। करीब एक दशक के सशस्त्र संघर्ष में 16,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।

नेपाल में 240 साल से चली आ रही राजशाही को दो साल पहले समाप्त करने और देश को एक गणराज्य में में तब्दील करने में भी कोइराला की महत्वपूर्ण भूमिका थी। श्रेष्ठ ने बताया कि कोइराला का अंतिम संस्कार कल किया जाएगा।

कडवा सच

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 4 COMMENTS

भारत विरोध कब तक
खों लोगों के बीच मंच सजा हुआ और उस पर आसीन है मधेश के मुक्तिदाता नेतागण । अचानक सभा स्थल के पीछे से एक जूता मंच की ओर फेंका जाता है । उसके साथ ही, आमसभा में आये लोगों के बीच भागदौड मच जाती है । मंच पर बैठे नेता गण भौच्चक है- यह क्या – यह वही मधेश है – क्या यह वही मधेशी जनता है – जिनकी मुक्ति के लिए वे लम्बे-लम्बे भाषण करते नहीं थक रहे हैं । आज यह स्थिति कैसे उत्पन्न हो गयी कि जिस उपेन्द्र यादव को इसी मधेश की जनता अपना सिरमौर बनाये हर्इ थी उसी उपेन्द्र यादव पर जूता फेंका जा रहा है । इस बदली हर्इ परिदृश्य के पीछे मुड कर देखा जाये तो कारण स्पष्ट झलकने लगता है । मधेश की जनता को उपेन्द्र यादव मं यदुवंशी कृष्ण का अवतार की झलक दीख रही थी जिसने मथुरा से द्वारिका जा कर कंस से उत्पीडित जनता को मुक्ति दिलाई थी । उसी प्रकार उपेन्द्र यादव मधेश से काठमांडू जा कर मधेश के असहाय, उत्पीडित-शोषित जनता को उनके दर्भाग्यों से मुक्ति दिलायेंगे । लेकिन उन्हे क्या पता था कि उपेन्द्र यादव भी सिंहदरबार पहुँच कर मधेश की आम जनता के आशाओं एवं विश्वासों पर कुठाराघात कर खस शासकों के उत्तराधिकारी शासकों के दरवार के एक दरबारी मात्र बन कर अपना दिन सँवारने में लग जायेंगे । विदेश भ्रमण के शुभ अवसर को छोडकर मधेश दर्शन भला वे क्यों करे – सत्ता के नशे मं वे ऐसे चूर हो गये कि अपनों को भूल गये । लेकिन उसका नशा तब टूटा जबकि पार्टी टुटकर दो भागों मं बँट गयी । अधिकांश सभासद एवं केन्द्रीय सदस्य जो कि उपेन्द्र यादव में एक बडी सभावनायें देखते थे छोड कर चले गए । तब जाकर उपेन्द्र यादव को होश आयी । तब आयी उन्हें अपने घर -मधेश) की याद । इस दौरान उपेन्द्र यादव ने भारत जो कि नेपाल का सबसे निकट चाहे वह आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या व्यापारिक क्षेत्रों के साथ सम्बधों को प्रगाढ करने के बजाय उस पर कभी अपने वक्तव्यों तो कभी अपने कृत्यों से uendra yadavचोट पहुँचानें का भरसक प्रयास किया यह सभी को पता है कि भारत के साथ नेपाल का एक पडोसी का ही नहीं एक बडे भाई, संरक्षक, हितैषी तथा बेटी-रोटी का संबन्ध सदियों से चला आ रहा है और आज भी भारत हर मुसीबत में नेपाल को हर संभव सहायता करने हेतु तत्पर है । उसके बावजूद अपने कम्युनिस्ट माइंड के कारण उपेन्द्र यादव इस हकीकत को भूल कर चीनी नीति ‘फूट डालो राज करो’ की भूल-भुलैया में अटके रहे । उन्होंने जान बूझ कर इस यथार्थ को नकारने की कोशिश की और आज भी उनके वक्तव्यों से भारत के प्रति द्वेष की भावना स्पष्ट उजागर होती है ।

आज फिर उपेन्द्र यादव मधेश की जनता के बीच अपनी मौजूदगी का एहसास कराने के उनके दुःखर्-दर्द तथा समस्याओं से मुक्ति के वायदे कर रहे हैं । इसके लिए अपनी पार्टी तीसरे मधेश जन आन्दोलन का आह्वान भी कर रहें हैं लेकिन इसके साथ-ही-साथ उन्हें यह भी समझना होगा कि वे चीनी नीति को लेकर मधेश में टिक नहीं सकते । उन्हें भारत के साथ मधेशी जनता की भावनाओं का कद्र करना ही होगा । अगर उपेन्द्र यादव को मधेश में एक सही अर्थों में मधेशी जनता के संरक्षक, पालनहार बनना है तो उन्हें अपने कर्म वचन को ऐसा बनना होगा जिससे मधेशी जनता को टूटे विश्वास पुनः जुड सकें । उन्हें जनता अपने आप में आत्मसात कर सके इसके लिए भारत को कोसने या पहाडी शासकों को खरी खोटी सुनाने से नहीं होगा बल्कि उन्हें देखना होगा कि मधेश की जनता का सबसे बडा शुभचिन्तक कौन है – भारत के साथ सम्बध बिगाड कर मधेश का हित नहीं हो सकता । यह बात पूरा देश जानता हैं और उपेन्द्र यादव का भी इस कडवे सच को स्वीकार कर अमल करना होगा । आज इस बात को समझने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है कि मधेश का शुभचितंक कौन है- मीलों दूर चीन या कोसों दूर भारत -

पूर्ण अधिकार से वंचित मधेशी::लक्ष्मीनारायण चौधरी

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

laxmi narayan chauमधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया राणा शासक द्वारा पहाडÞ के लिए पहाडÞ माल-सवाल तथा मधेश के लिए मधेश माल-सवाल नामक दो कानून बनाकर एकीकृत नेपाल को दो भाग पहाड और मधेश के नाम से विभाजित कर देने के कारण मधेश के वस्तुतः कानूनी रुप में ही आ जाने की वजह से मधेश में रहनेवालों को मधेशी कहना कोई नई बात नहीं हैं । नेपाल को पहाड और मधेश दो नामाकरण करने के बावजूद पहाड के निवासियों जैसा व्यवहार मधेश के लोगों के साथ नहीं किया गया सिर्फमधेस माल-सवाल जैसा कानून मधेश के जगह जमीन तक ही सीमित रखा गया । पृथ्वी नारायण शाह ने भी नेपाल में ३६ जात की फूलवारी है यह कहकर उद्घोषण किया परन्तु राजा के दरबार में कभी भी मधेशी को स्थान नहीं दिया । यहाँ तक कि अपने को महान् प्रजातान्त्रिक बताने वाले राजा महेन्द्र ने तो मधेश का जंगल काटकर पहाडी लोगों को तर्राई में बसाया और उसका एकमात्र उद्देश्य तर्राईवासी को अल्पसंख्यक करना तथा भविष्य में मधेशी के बढते वर्चस्व को रोकना था । यहाँ तक कि उत्तरी सीमा से दक्षिण सीमा को जोडकर मधेशी राजनीतिक भविष्य को खत्म करने के उद्देश्य से राज्य को १४ अंचल तथा ५ विकास क्षेत्र में विभाजित किया गया । इतिहास गवाह है कि जहानिया राणा शासन के अन्त का आन्दोलन भी मधेस से ही उग्ररुप लिया और प्रजातन्त्र की स्थापना हर्इ । परन्तु मधेशी का स्थान दूसरे दर्जे का ही रहा । तर्राई की राजनीति में भी तर्राई में निवास करने वाले पहाडी मूल के व्यक्ति का वर्चस्व रहा । उस वर्चस्वशाली व्यक्ति के बीच कहीं लाचारीवश एक-आध मधेशी को समावेश किया भी तो वह अपवाद में ही हं और उस अपवादित व्यक्ति का स्थान भी सम्बन्धित क्षेत्र में दूसरे दर्जा का ही रहा हैं ।

२०४६ साल के जनआन्दोलन के द्वारा प्रजातन्त्र की पुनर्स्थापना हरुइ वह भी मधेश के कारण फिर भी मधेशी की समस्या के ऊपर तत्कालीन पार्टर् भी ध्यान नहीं दिया । संपर्ण् मधेशवादी दल भी शासन सत्ता के कारण मधेशी समस्या को ओझल में रख दिये । इतने सारे मधेशी दल होने के बावजूद मधेशी के सही विचार और अवधारणा का प्रतिनिधित्व नही हो पा रहा है । ऐसा देखा गया है कि मधेश और मधेशी को स्वार्थ सिद्धि का विषय बनाया गया है । तर्सथ मधेशी के लिए नहीं मधेशी पर राजनीति किया जा रहा है । यहाँ तक कि मधेश और मधेशी के बारे में गैर-मधेशी वादीपार्टर् उच्च आवाज उठाने में पीछे नहीं है । जबकि गैर-मधेशी दल का उद्देश्य बिलकुल स्वार्थ परक है । गैर-मधेशी दल में समाहित मधेशी नेता भी अपने दल में मधशी के विचार और भावना को सहीरूप से रखने में र्समर्थ नहीं हैं और यह समस्या ज्यों का त्यों रहा । इस बीच माओवादी पार्टर् मुल्क को आतंकित अवस्था में पहुँचाया । आतंकित करने के उद्देश्य से माओवादी ने विभिन्न क्षेत्र, क्षेत्रीयता, सम्प्रदाय, विभिन्न जाति के विकास को नारा बनाया । माओवादी ने भले ही अपने उद्देश्य पर्र्ति के लिए नारा लगाया परन्तु यह किसी न किसी रूप में वर्ग-सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता को संगठित होने मे सहायक ही रहा । जब माओ के उद्देश्य के विपरीत दूसरे संगठन को उभरते देखा परिणामतः माओवादी ने उसके वर्चस्व को खत्म करने के लिए अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया । फलस्वरुप तर्राई में माओवादी और मधेशी के बीच भीडÞन्त हुइ । मधेशी ने अपना वर्चस्व जमाया उस आन्दोलन में किसी पार्टर्वशेष का सहयोग नहीं था । वह मधेशी का स्वतःस्फर्ूत आन्दोलन था । वह आन्दोलन अपने अस्तित्व और स्वामित्व का आन्दोलन था । मधेशी समुदाय के स्वतःस्फर्ूत आन्दोलन का लाभ उठाने हेतु विभिन्न दल और उनसे सम्बन्धित कुछ लोग जैसे तमलोपा -महन्थ ठाकुर), मधेशी जनअधिकार फोरम -उपेन्द्र यादव) ने अपना नेतृत्व स्थापित करने का प्रयास किया । आर्थिक लाभ उठाकर मधशी पार्टर् गैर-मधेशी लोगों को स्थान देकर मधेशी आवाज को विफल बनाया गया । यह संकेत किसकी ओर है वह कहने की बात नही हं । इसके बावजूद भी मधेशी की पहचान, प्रतिनिधित्व और स्वामित्व सुनिश्चित करने के लिए संविधान बनाने की ओर अग्रसर होने की जगह अन्य पार्टर् तरह अपने को मधेश का मसीहा कहते नहीं थकने वाले नेता भी सत्ता-संर्घष् में अपने आप को समर्पित कर चुके हैं । विगत के इतिहास का हम मनन करें तो तर्राईवासी के हक-हित का जडÞ गहरायी तक पहुँचाने के लिए संविधान में जड जमाना होगा । संविधान में मधेशी का हक सुरक्षित होने के बाद मधेशी का भविष्य सदा के लिए उज्जवल हो जाएगा । यह समझने के लिए हमें सात समुन्द्र पार नहीं जाना पडेगा । अपने पडÞोशी देश भारत जहाँ आज दलित तथा निचले वर्ग के लोग भी बडे से बडे पद पर हैं, क्योंकि उनका हक संविधान में सुनिश्चित है । मधेश और मधेशी के हक-हित के बारे में आवाज उठाने या संर्घष् करने का अर्थ पहाड और पहाडी का विरोध करना नहीं हैं । अपना हक खोजने का अर्थ दूसरे की हकमारी है यह नहीं समझना चाहिये । हम अपनी भाषा के स्थान के लिए आवाज उठाते हैं तो इसका अर्थ यह नही हैं कि हम दूसरे की भाषा का अपमान करना चाहते हैं । हम उनकी भाषा-संस्कृति का सम्मान करते हैं, अपनी भाषा संस्कृति का विकास करना कोई गुनाह नहीं है । क्योंकि भाषा के कारण ही उपराष्ट्रपति को बरखास्त किया गया । कहा गया हमलोगों का अस्तित्व और स्वतन्त्रता !

यह सब तभी सम्भव है, जब हम एक हो । हमारी पहचान जात, धर्म वर्ग से न होकर मधेश से हो । साथ ही यह स्थापित करने के लिए मधेशी को हक-अधिकार, राज्य संचालन तथा नीति-निर्माण के हरेक अंग, तह और निकाय में ५० प्रतिशत मधेशी का समावेश करना होगा ।

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