साहित्यिक समारोह::मुकुन्द आचार्य
एक नजदीकी मित्र ने बहुत दूर से फोन किया, एक नई पत्रिका का विमोचन समारोह है कृपया आप भी पधारे ।
मैने पूछा , और कौन-कौन पधार रहे है उस विमोचन समारोह में -
उधर से मित्र ने क्या कहा, मै ना तो ठीक से कुछ सुन सका और ना कुछ समझ सका , हालाँकि मोबाईल नामक यंत्र को श्रवण-कान) पर मैने यथाशक्ति जोर से चिपकाया था कोई फेविकाल नही लगाया था ।
आप फरमाएंगे, अजी ओल्ड चैप जीव आपने सुना ही नहीं , तो समझोगे क्या खाक ।
बिल्कुल सही फरमाया जनाव आपने । नेपाल टेलिकम ने अपने प्यारे ग्राहको को बहुत सारी सुविधाएँ दी हैं । उनमें से एक है -मोवाईल में लम्बी चौडÞी बापत कर सकते है मगर आपके पले पडेगा सिर्फदो- चार शब्द । उतने में आपको संतोष करना होगा टेलिकम को पता है, आजकल के ग्राहक बहुत स्मार्ट होते है दो -चार शब्द सुन कर ही बाकी सारी बातें अनुमान से समझ सकते हंै ग्राहक की समझदारी बढÞी है या नेपाल टेलिकम की, इसका फैसला सभी मोबाईलधारी मित्रंों पर छोडता हूँ ।
बहुत दिन हो गए थे किसी समारोह में कविता सुनाकर लोगों को बोर नही कर पाया था । सोचा अच्छा मौका है । घंटों दिमाग को कागज कलम पर रगडÞने से एक जिन्न पैदा हुआ ।
उस जिन्न ने कहा, मेरे आका । मेरे लिए क्या हुक्म है –
मैने कहा कल परसों में एक साहित्यिक समारोह में कविता वाचन करना चाहता हूँ । तुम जरा माहौल बढिÞया बना देना और क्या । लोग कविता सुनकर ताली पीटे अपना सिर नही ।
जिन्न ने कहा, आका मेरे । मैं सिर्फश्रोता वर्ग में माहौल बनाऊँगा । मंच का माहौल तो समारोह के आयोजक ही संभालेगेे न …….।
मैने हथियार डाल दिए और कहा ठीक है । तुम श्रोताओं को ठीक से संभाले रखना, मैं थोडÞे समय मैं ज्यादा से ज्यादा श्रोतागण को बोर करने कार् इमानदार प्रयास करुँगा । मंच के लोग तो वैसे भी दूसरे की कुछ भी सुनना नही चाहते । उनका खुद का राग और खुद की डफली होती है । लोग सुने, ना सुने-ठंेगे से ।
लम्बे इन्तजार के बाद ,जब पचास प्रतिशत श्रोता किसी न किसी बहाने से नौ-दो-ग्यारह हो चुके थे एक युवक मंच पर प्रकट हुआ । वेश -भूषा चाल -ढाÞल, आनी – बानी से वह साहित्यसेवी कम किसी पार्टर्ीीा कार्यकर्ता ज्यादा लगता था । उसने माइक से आकाशवाणी की ,आपलोग सिर्फएक घंटा और धर्ैय धारण करें । हमारे प्रमुख अतिथि माननीय मंत्री जी दो कार्यक्रमों का उद्घाटन करके सीधे यही पधार रहे हैं मुझे पूरा विश्वास है जो वास्तविक साहित्य प्रेमी होंगे वे दो तीन घंटे की प्रतीक्षा हंसते-हंसते झेल लेंगे ।
तब तक प्रायः सभी राजनैतिक दल के नुमाइन्दे मंच में अपनी कर्ुर्सर्ीीर चिपक चुके थे । बचे – खुचे श्रोतागण उपस्थित लडÞकियों को ‘इम्प्रेस’ करने के लिए जोर – जोर से बोल और हँस रहे थे । मिला -जुलाकर माहौल खुशनुमा ही था ।
खैर, मंत्री जी पधारे । दीप प्रज्ज्वलित किए और राजनैतिक दल के खिलाडिÞयों ने ताली की गडÞगडÞाहट से सभाकक्ष को गुंजायमान किया । दुबली – पतली पत्रिका प्रकाशक की आर्थिक दर्ुबलता को उजागर कर रही थी । ताली की गडÞगडÞाहट से कुछ सोए हुए श्रोता जग पडंेÞ, और लाल – लाल आँखों से नींद उडÞनेवालों को ढूँढने लगे । नींद उडÞानेवाला कोई मंत्री है । इतना जानते ही वे खुद ताली पीटने लगे ।
साहित्यिक मंच का पूरा राजनीतिकरण हो चुका था मंच में किसी कोने में दुबक कर एक – दो साहित्यकार शरमा कर बैठे हुए थे ।
नेतागण ने मंच का सदुपयोग करते हुए विपक्षी दलवालों को सभ्य भाषा में असभ्य गालियाँ दी । मेरी बारी आई मैने नई पत्रिका को अपनी नई कविता में शुभकामना प्रदान की । मैं तालियाँ चाहता था चाय की प्यालियँा बजने लगी । लोग कविता सुनना छोडकर चाय पर टूट पडंे उस समय मुझे बोध हुआ, कविता तो चाय की प्याली से बहुत सस्ती है । कोई भी कवि कही कभी अपनी कविता सुना देगा मगर चाय पिलाने वाला जल्दी कोई मिलता नहीं । हाय रे जमाना । जी हुआ, चाय की प्याली मंे डुब कर वही शहीद हो जाउFm । कुछ सुकन्याएँ चाय बिस्किट से सुसज्जित ट्रे लेकर इधर -उधर भटक रही थी । और श्रोताओं की निगाहें उनकी ओर भटक और मटक रही थीं ।
एक सज्जन ने मुझसे कहा पत्रिका विमोचन में नेतालोगों का क्या काम । देश में साहित्यकारों की कमी तो नहीं है । मंच में सारे के सारे दलबाजी और नारावाजी करनेवालों का हुजुम जमा कर दिया गया ।
मैंने उन्हें समझाने का असफल प्रयास किया, मंत्री जी पत्रिका का उद्घाटन करेंगे तो पत्रिका का स्वस्थ और दर्ीघजीवी होने की संभावना बढÞ जाती है ।
सज्जन बोले, आपने बिल्कुल ठीक कहा । मै भी कितना नालायक हँू । इतनी छोटी और मोटी बात भी मेरे दिमाग में पहले क्यों नही आई । इतना कहकर अपनी नालायकी दूर करने के लिए वे चाय और बिस्किट पर निर्दयतापर्ूवक टूट पडेंÞ ।

































बडी मुश्किल से ‘एप्पाटमेंन्ट’ मिला था, भगवान कृष्ण से मिलने का । उन्हें आजकल के पत्रकारों से वही पुरानी शिकायत थी- सब पत्रकार भगवान कृष्ण को केवल ‘रोमान्टिक हीरो’ मानते हैं, उनकी भागवत्ताकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता ! पीत पत्रकारिता की हद हो गई !
चोट पहुँचानें का भरसक प्रयास किया यह सभी को पता है कि भारत के साथ नेपाल का एक पडोसी का ही नहीं एक बडे भाई, संरक्षक, हितैषी तथा बेटी-रोटी का संबन्ध सदियों से चला आ रहा है और आज भी भारत हर मुसीबत में नेपाल को हर संभव सहायता करने हेतु तत्पर है । उसके बावजूद अपने कम्युनिस्ट माइंड के कारण उपेन्द्र यादव इस हकीकत को भूल कर चीनी नीति ‘फूट डालो राज करो’ की भूल-भुलैया में अटके रहे । उन्होंने जान बूझ कर इस यथार्थ को नकारने की कोशिश की और आज भी उनके वक्तव्यों से भारत के प्रति द्वेष की भावना स्पष्ट उजागर होती है ।
