संविधान सभा की कालावधि ::कुमार सच्चिदानन्द
नेपाल की राजनीति आज कठिनतम दौर से गुजर रही है । नवसंविधान के निर्माण की कलावधि समाप्त होने जा रही है और जेठ १४ गते को लक्ष्मणरेखा की प्रज्वलित अग्नि पूरे देश को अपनी चपेट में लेने को तत्पर है । सहमति और सहकार्य जैसे बहुप्रचारित शब्द नेपाल के सर्न्दर्भ में अपनी अर्थवत्ता खोने लगे हैं । संर्घष्ा और टकराव नेपाली राजनीति और जीवन का यथार्थ बन चुका है । यद्यीप उस संर्घष्ा और टकराव के पीछे राजनीति के शिल्पकारों के अपने निहितार्थ तो हो सकते है लेकिन आमलोगों का जीवन दिनोंदिन नारकीय बनता जा रहा है । समय तीव्र से बढÞता जा रहा है । लेकिन राजनीति की सारी शक्तियाँ सत्ता और शक्ति का संतुलन स्थापित करने में धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा खोकर कान्तिविहीन होती जा रही है । निश्चित ही हमारी धरती पर बहुत कुछ ऐसा है, जिसकी बदौलत हम इस पर अभिमान कर सकते है, लेकिन हमारी राजनीति ऐसी है, जिसके सर्न्दर्भ में ‘तौबा-तौबा’ जैसे घृणाभिव्यक्तिकारक शब्द युग्ध ही प्रासंगिक लगता है । क्योंकि संविधान निर्माण की शपथ लेने वाली शक्तियाँ सत्ता के समीकरणों का तोडने-जोडÞने में व्यस्त और मधेश मुक्ति के आकांक्षी मंत्रालय की साधना में मग्न । सब कुछ उल्टा-पुल्टा गडमगड । हमारी नेतृत्व पंक्ति का यह अनोखा राग आमलोगों को मोक्ष या मुक्ति में सहाय हो या नहीं लेकिन कम-से-कम उसमें धीरे-धीरे वैराग्य का भाव तो भर ही रहा है ।
आज नेपाली राजनीति में जो संर्घष्ा और टकराव देखा जा रहा है यह सत्ता का संर्घष्ा या टकराव है, उससे कही अधिक विचारधारा का टकराव है । यहाँ लोकतांत्रिक शक्ति या और अधिनायकवादी शक्तियाँ परस्पर संर्घष्ारत है । इस बात से अनेक लोगों को विमती हो सकती है लेकिन माओवादी नेतृत्व पंक्ति द्वारा विगत में बार-बार यह अभिव्यक्ति दी जा चुकी है वार्ता समझौता, या सत्ता तो उनके लिए साधन मात्र है । उनका लक्ष्य कुछ और है । वह वास्तव में र्सवहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना उनका उद्देश्य है । और उसके निमित्त उसने दस वषर्ीय जनयुद्ध का संचालन किया और २०६२-०६३ के आंदोलन को सफलता को अपनी उपलब्धि मानी । संविधान सभा के निर्वाचन में सबसे बडे दल के रूप में उभरने और सरकार को नेतृत्व का अवसर पाने के बात उसने शासन के समस्त अंग को धीरे -धीरे अपने प्रभाव में लेना प्रारम्भ किया लेकिन देश की सैन्य संरचना में हस्तक्षेप के बाद ऐसा राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ और ऐसी परिस्थितियाँ उपजी की उसे सरकार छोडनी पडी । लेकिन रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने और संविधान निर्माण कि प्रतिबद्धता छोडÞ आज माओवादी जब सरकार के नेतृत्व का दुराग्रह कर रहे है तो यह बात साफ झलकती है कि सरकार को माध्यम बनाकर वह अपने लक्ष्य पर अपेक्षाकृत सहजता से पहुँच सकते है क्योंकि जो धु्रवीकरण माओवादियों के विरोध में हुआ है, उससे वह अपने अनुकूल संविधान का निर्माण नही कर सकता ।
आज माओवादी सडÞक के द्वारा मौजूदा सरकार को अपदस्थ करने के कवायद में जुडा है । वे जानते है कि संसद का गणित उस के पक्ष मंे नहीं है । इसलिए सडÞक को शक्ति पर््रदर्शन का केन्द्र बनाकर अपनी राजनीति को आगे बढाना चाहते हैं । माधव नेपाल के समस्या यह कि वे पार्टी आधार पर सरकार में अल्पमत में है और गठबन्धन सरकार का मुखिया है( । इसलिए सबकी आकांक्षाओं की कसौटी पर खडÞा उतरना उनके वश की बात नहीं है । एक ओर उन्हें नेकपा माओवादी के प्रबल विरोध का सामना करना पर रहा है दूसरी ओर उनके अपने दल में भी अनेक विभीषण है जो अपने ही लंका के जलने की प्रतिक्षा में सम्राट बन ने का सपना संजोए बैठे है । तिकडम राजनीति का अभिन्न अंग है । सत्ता शर्ष् पर पहुँचने के लिए दल के भीतर तोडजोड को एक हद तक उचित ठहराया भी जा सकता है । लेकिन दूसरे की महत्वकांक्षा की पर्ूर्ति का माध्यम बन कर अपने घर को तोडने और फोडÞने के नीति को तर्क सम्मत तो नहीं ही कहा जा सकता, वैसे नेपाल की प्रजातांत्रिक राजनीति इस दृष्टि से कुख्यात है ही अगर फिर कोई समीकरण बनता है उसे समस्या के समाधान की दिशा में उठाया गया महत्वपर् लक्ष्य नहीं, अवसरवादी राजनीति का बढÞता प्रभाव के रूप में स्वीकार किया जा सकता है ।
आज माधव नेपाल के नेतृत्व वाली सरकार को गिराकर संविधान निर्माण का बहाना बनाकर नई सरकार की जिस किसी संभावना की बात की जा रही है, उसके पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे वर्तमान राजनीति के ठहराव को समाप्त किया जा सकता है । लेकिन सवाल उठता है कैसे – आज जब संविधान सभा अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाई है, इसका जिम्मेवार संविधान निर्माण की महत्वपर्ूण्ा जिम्मेवारी वहन करने वाला सब से महत्वपर्ूण्ा दल है आज जो शक्ति सरकार के नाम पर वह संविधान निर्माण को प्रक्रिया को अवरुद्ध किये हुए है, कल अगर सरकार बन भी जाती है तो अपने अनुसार संविधान न बनता देख वह संवैधानिक प्रक्रिया को अवरुद्ध कर सकती है । इसलिए नये नेतृत्व में सरकार निर्माण से संविधान निर्माण की प्रक्रिया को सुनिश्चित करने का सपना देखना महज बौद्धिक दिवालियापन हो सकता है । यह निश्चित है कि जब तक हमारी प्रतिबद्धताएं और प्राथमिकताएं सुनिश्चित नहीं होती तब तक लक्ष्य व्रि्रम की स्थिति तो रहेगी ही । आज देश-मधेश उसी पीडा से ग्रस्त है । अपनी-अपनी महत्वकांक्षा और अपनी-अपनी सोच अपने लोगों पर लादने के मनोविज्ञान के कारण आज संविधान निर्माण की प्रक्रिया अवरुद्ध है । इसलिए जब तक हमारी मानसिकता में परिवर्तन नही होता सरकार परिवर्तन किसी भी समस्या का निदान नही हो सकता ।
आज तक आमलोगों के मन में यह जिज्ञासा थी की जेठ १४ गते के बाद क्या होगा – संविधान बनेगा या नहीं लेकिन अब यह जिज्ञासा लगभग समाप्त हो चुकी है । और अगर कोई चमत्कार नहीं हुआ तो उस दिन तक संविधान लागू होना असंभव है । ऐसे में एक ही सही विकल्प हो सकता है कि सारे महत्वपर्ूण्ा दल एक चर्टाई पर बैठकर संविधान निर्माण के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त करें और संविधान सभा की अवधि ६ महिना के लिए आगे बढाएँ । लेकिन अभी दलों के बीच जो रस्सा-कस्सी की स्थिति है, उसमें सरकार परिवर्तन के बगैर इन दलों का एक साथ भूमि पर अवस्थित होना अनिश्चित है । ऐसी परिस्थिति में संविधान सभा की अवधि बढाना भी औचित्यहीन है । सवाल उठता है कि विकल्प क्या हो सकता है । एक बात निश्चित है कि संविधान तब तक ही महत्वपर्ण्ा और सम्मानीय होता है, जब तक उसके प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता होता है । उसके अभाव में यह महज एक किताब है । फिर शक्ति के आधार पर संविधान को पद दलित करने के अनेक उदाहरण विश्व इतिहास में विद्यमान है । और नेपाल भी इस का उदाहरण बन सकता है । क्योंकि अनेक संविधानों का सामना इस देश ने किया है । इसलिए संविधान हीनता की स्थिति में अलोकतांत्रिक शक्तियों की सिर उठाने का संभावना से इन्कार नही किया जा सकता । और अगर ऐसा होता है तो उसका जिम्मेवार हमारा नेतृत्व वर्ग होगा ।
आज माओवादी न केवल देश का सबसे बडा राजनीतिक दल है बल्कि नई राजनीतिक शक्ति है और नवीन राजनीतिक चेतना का वाहक भी है । लेकिन उसके प्रतिबद्धताएँ बदली-बदली सी दिखलाई दे रही है । नव संविधान से उसकी नवीन राजनीतिक मुद्ददों का संस्थागत किया जाना है । किन्तु संविधान उसकी द्वितीय प्राथमिकता बन गई है और सरकार प्रथम । इसलिए मौजूदा सरकार को गिराने के लिए वह हठयोग को अपनी नीति में शुमार कर लिया है । वस्तुत उसके भी निहितार्थ है, माओवादीयों ने अपने कार्यकर्ता और र्समर्थक को तथाकथित वर्ग संर्घष्ा का सपना देखाकर अपेक्षाकृत सुन्दर सुखमय और समृद्धि का चित्र खिचा है सरकार में गये बगैर आनन-फानन उसे कार्य रूप नही दिया जा सकता । ऐसे में दल के उग्रपंथी कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना व्याप्त हो सकती है । और अधिक दिनों तक उन्हें समेटकर नहीं रखा जा सकता । दूसरी ओर एनेकपा माओवादी देख रही है कि उनके विरुद्ध संसद में मजबूत राजनीतिक धु्रवीकरण है जिसके कारण वह संसद में अल्पमत में है । इसलिए उस ध्रुवीकरण के रहते वह तथाकथित जनमुखी संविधान नहीं बना सकता । इसलिए राजनीतिक कदम संविधान निर्माण के प्रक्रिया का बाधक लग रहे है और सरकार को तो उस के प्रबल विरोध का सामना पडÞ ही रहा है ।
आज माओवादियों की सबसे बडÞी विडम्बना यह है कि संविधान सभा की सबसे बडी पार्टर्ीीोकर भी सत्ता से च्युत है । और सत्ता हस्तगत करने के लिए उसके पास सडÞक के सिवाय कोई रास्ता नहीं बच गया है । यह भी सच है की आज माओवादियों के सरकार विरोधी कदमों का र्समर्थन देने वाला दल भी है । एक तरह से देखा जाए तो अवसर से चुके लोग सरकार का विरोध कर रहे है । और अवसर उपभोग कर रहे दल सरकार का र्समर्थन कर रहे है । संविधान और मुद्दें तो अवसर की साधना के माध्यम बन कर रह गए है । ऊँट किस करवट बैठेगा, नेपाल की राजनीति के सर्न्दर्भ में इस बात की भविष्यवाणी करना तो मुश्किल है लेकिन उतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर सडÞक द्वारा सरकार परिवर्तन संभव हो पाया तो लोकतंत्र के इतिहास की दृष्टि से एक बहुत ही नकारात्मक उदाहरण होगा । आज माओवादी सडÞक के हथियार बना रहे है । कल दूसरे ऐसा कर सकते है उस तरह राजनीतिक और स्थिरता संर्घष्ा और हिंसा को उसे स्वीकृति मिलेगी । एक बात और है कि संसद को रखते हुए अगर सडÞक सत्ता परिवर्तन का माध्यम बनता है तो संसद का क्या औचित्य है – इसलिए लोकतंत्र का राग अलापनेवालों से यह अपेक्षा की ही जा सकती है कि वे विरोध को सांकेतिक रखें और संसद की जोरअजमाइश की जगह बनावें ।
आज माओवादी नेतृत्व अपनी आकांक्षा के प्रचार में अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियों में सब से बडÞा अवरोधक भारत को समझ रहा है । यह सच है कि नेपाल के अन्दरुनी राजनीति में भारत का प्रभाव यदाकदा दिखलाई देता रहा है । नेपाल की भौगोलिक संरचना और नेपाल के खुले सीमा के कारण भारत विरोधी और उग्रसाम्यवादी विचारधारा पर आधारित शासन प्रणाली के विकास के हतोत्साही कारण उसकी विदेश नीति की प्राथमिकता हो सकती है । यही कारण है कि नेकपा माओवादी सरकार को भारत के प्रति यद्यपि अच्छे सम्बन्धों की इच्छा की बात वह करता है लेकिन उसके प्रति हल्ला बोलने की मनस्थिति में है । लेकिन इनके साथ सब से बडÞी विडम्बना यह घटित हर्ुइ है कि देश के भीतर भी उनके विरोध में व्यापक धु्रवीकरण देखा जा रहा है । सरकार के र्समर्थन मे २२ दलों का खडा होना भी उसी का नतीजा है । इन सारे घटनाक्रमों को कहीं न कहीं भारत के कूटनीति के प्रभाव से जोडÞकर विश्लेषित किया जा रहा है । इस आन्दोलन के समक्ष माधव नेपाल के न झुकने की दृढÞता के र्सार्क सम्मेलन को दौरान भारतीय प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात को परिणाम के रूप में आकलित किया जा रहा है । सच चाहे जो हो लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि घर में अगर सीमायें तोडÞकर हम झगडेंगे तो पडोसियों को झाँकने का अवसर मिल ही जाता है । यद्यपि इस बात में कितनी सत्यता है उसे दोनांे राष्ट्र प्रमुख ही जानें, लेकिन इतना तो कहाँ ही जा सकता है कि पडÞोसी को हस्तक्षेप करने का निर्ण्र्ाातो खुद हमारी राजनीति देती है ।
आज माओवादियों की यह विडम्बना यह ही है कि संविधान सभा की सबसे बडी पार्टीकर भी उसे सत्ता से बहिर्गमन करना पडा । उसके लिए राष्ट्र प्रमुख के साथ-साथ सेना, सरकार, और उसके र्समर्थन दे रहे प्रमुख राजनीतिक दलों को वह जिम्मेवार मान रहा है । वैसे भी अगर यह पार्टीमझती है कि उसके साथ अन्याय हुआ है तो संविधान निर्माण में रचनात्मक सहयोग देते हुए वे अपने प्रति हुए अन्यायों को जनता तक ले जाने के लिए स्वतन्त्र हैं । फिर संविधान की घोषणा के बाद यह सभा औचित्यहीन होती और इसका निर्वाचन निर्धारित समय में करवाना सरकार की विवशता होती । अपने उस कदम के द्वारा माओवादी अपने राजनीतिक चरित्र की अपव्याख्या को रोक सकती थी और जनता के बीच सिर उठाकर घोर नैतिक बल के साथ अपना आधार तलाश सकती थी । फिर जनता भी अन्धी और विवेकशून्य नहीं है और अन्ततः आमलोगों की साधना ही लोकतंत्र में राजनैतिक दलों का प्रमुख लक्ष्य और उनका र्समर्थन ही प्रमुख ताकत होती है । लेकिन सेनापति प्रकरण के बाद सत्ता से बहिर्गमन के साथ ही जो सत्तालिप्सा माओवादी नेतृत्व की प्रकट हर्ुइ है और संविधान सभा में अब तक की जो उनकी भूमिका रही है उससे उनके जिम्मेवारी बोध पर प्रश्न चिन्ह उठता है । सरकार को अपदस्थ करने के लिए उनके द्वारा उठाया गया अनिश्चितकालीन हडÞताल जैसा कदम उनकी राजनीतिक हताशा का संकेत लग रहा है ।
आज समय के जटिल मोडÞ पर देश खडÞा है । संविधान सभा के निर्वाचन के बाद जो सत्ता संर्घष्ा नेपाली राजनीति में देखने को मिला है उससे यह सवाल गहराने लगा है कि क्या यह संविधानसभा निर्धारित समय की तो बात ही छोड दें । ६ महिना के कार्यावधि बढÞाकर भी अपने लक्ष्य तक पहुँच पाएगी – कहीं ऐसा तो नहीं जनआंदोलन २ परिणामहीन हो जाएगा । आज हम पर्ूव राजा की बढÞती गतिविधि का हवाला देते हैं, राष्ट्रपति की बढÞते कदम की बात करते हंै । सवाल उठता है कि उसका जिम्मेवार कौन है – बार-बार की राजनीतिक अस्थिरता और संकट का सामना कर चुकी नेपाली जनता विगत संविधान सभा के सफल निर्वाचन के बाद चैन की साँस ली थी और उनके बीच आशा का संचार हुआ था । लेकिन उनके लिए उस से बडÞी विडम्बना क्या हो सकती है कि जिन्हें उन्होंने संविधानसभा में भेजा है आज वही निर्धारित समय में संविधान न बनने की बात दुहराते फिर रहे हैं । देश मुठभेडÞ की कठिन दौर से गुजर रहा है । जनता त्रास मंे जीवन व्यतीत कर रही है । ऐसे समय में यह कहना अनुचित नहीं लगता कि जिस दिन आमलोगों को उन दलों पर से विश्वास उठ जायगा, उस दिन कार्यकर्ताओं का पृष्ठपोषण करने वाली अवसरवादी राजनीति नकारा साबित होगी । अपने जीवन, धन और शान्ति के कामना में वह जो विकल्प चुनंेगी उससे नवस्थापित लोकतंत्र का तो भला नहीं होगा ।
































नये साल की पर्व संध्या में शराब, शबाब और बत्तियों की झिलमिल से जगमगाता ठमेल । डान्स बार और डिस्कोथेक की चारदीवारी को चीर कर हवा में लहराता हुआ संगीत लोगों की कानों मंे घुसकर जिस्म को जंुबिश करने पर मजबूर कर रहा था । लेकिन ठमेल के इस मनचले वातावरण के अलग कुछ जिस्म र्सतर्कता पर्वक अलग किस्म की जंबिश में मशगूल थे । कुछ अखें इन जिस्मों को टटोल रही थी । चूहे-बिल्ली जैसे लगने वाले इस खेल के दौरान काशीराम अधिकारी थापाथली स्थित ब्लू स्टार काँम्प्लेक्स और ठमेल स्थित रेड प्लानेट होटल के बीच दो बार टैक्सी से यात्रा कर चुका था । होटल रेड प्लानेट के रूम नम्बर ३०४ में ठहरे राजू भाई से एक सूटकेश और रूम नम्बर २०४ के आमीर से दो सूटकेश ले कर टैक्सी से थापाथली पहुँचते-पहुँचते करीब रात के साढे बारह बज चुके थे । करीब १ बजे थापाथली-ठमेल की भागदौड से थक कर ब्लूस्टार कांम्प्लेक्स के रूम नम्बर ६११ – नेपाल कुश्ती संघ के नाम पर किराए पर लिया गया था के अन्दर आराम कर रहे काशीराम को नेपाल प्रहरी की टीम ने दबोच लिया । काशीराम अधिकारी को नियन्त्रण में लेने के कुछ देर बाद ठमेल के रेड प्लानेट होटल से काशीराम को सूटकेश देने वाले रूम नम्बर ३०४ के राजू भाई उर्फमोहम्मद सज्जाद खुराम और रूम नम्बर ३०४ के आमीर उर्फमोहम्मद इकबाल नाम के पकिस्तानी नागरिक भी पुलिस द्वारा पकड लिए गए । पकडे गए इन लोगों से २५ लाख ४४ हजार ५ सौ बराबर के नकली भारतीय नोट और तीन किलो सात सौ ग्राम ब्राउन हेरोइन बरामद हुआ, जिसका अंतर्रर्रीय बाजार मूल्य करोड रुपए है । ये सभी सामान पाकिस्तान से पकिस्तान इन्टरनेशनल एयरवेज -पी.आई.ए.) की फ्लाईट से काठमाण्डू लाए गए थे । एक दूसरे को पहचानने से इन्कार करने वाले इकबाल और सज्जाद एक दिन के अन्तराल मंे पी.आई.ए. की फ्लाईट से काठमांडू उतरे थे । दोनों के पास मेरो मोबाइल का नेपाली सिमकार्ड था जिसे वे लोग पाकिस्तान से लेकर आए थे । त्रिभुवन इन्टरनेशनल एयरपोर्ट कस्टम चेकिग में फंसने के डर से दोनां ने साथ में लाये गए चारों सूटकेश में खिलौने होने की बात बताई । बाद में कस्टम क्लियर करने की बात कहकर सामान वही डिपोजिट कर बाहर हो गए । ल्किन नोट और ड्रग्स से भरे सूटकेश बाद में बिना चेकिंग जिस तरह एयरपोर्ट से निकाले गए, इसके पीछे इस गिरोह की पहुंच और कस्टम के साथ-साथ सुरक्षाकर्मी की संलग्नता जांच के घेरे में है ।
मधेश की जनभावना को राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का हवाला देकर नकारने कीजो प्रवृत्ति नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में विशेषतः सत्ता में सहभागी दो प्रमुख दलों में देखी जा रही है उसे राष्ट्रहित में अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता । किसी न किसी रुप में यह एक द्वन्द्व को निमंत्रण दे रहा है और उसका खामियाजा देश के आम लोगों को भुगतना ही पडÞेगा । यह सच है कि मधेश आन्दोलन के बाद देश में निवास कर रहे दोनों वर्गों के मनोविज्ञान में परिवर्तन आया है, दोनों ही वर्गों में शत्तिः और सीमाओं का एहसास होने लगा है लेकिन चरम स्वीकार्यता के भाव का अभाव देखा जा रहा है । जिन भावनाओं को तर्राई आन्दोलन ने आवाज दी थी वह कहीं न कहीं गुम होती दिखलाई दे रही है और इसका कारण मधेशी दलों की दिशाहीन राजनीति है । अपनी डफली अपना राग की राह पर चलते हुए इन लोगों ने अपने आदमी की निराशा को जिस हद तक पहुँचाया है उसका सही अन्दाजा तो निर्वाचन या सडÞक आन्दोलन के समय में ही होगा लेकिन अभी लौटने का अवसर है ।
2066-04-09 साल में सर्वोच्च अदालत ने एक धमाकेदार फैसला सुना दिया – जिसके चलते सुलझती शांति और नया संविधान निर्माण प्रक्रिया की तेजी में नये सिरे से दर्ुर्दिन के काले बादलों का अन्देशा पैदा होने लगा है । लोकहित में सत्य भडÞकाऊ खबरों को कायदे से ही संचार मीडिया छापता है । प्रधान न्यायाधीश मीन बहादुर रायमाझी के इजलास ने, उपराष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी भाषा में शपथ लेने को, राजा महेन्द्र शैली में अवैध घोषित करते हुए पुनः खस नेपाली भाषा में शपथ लेने का आदेश जारी कर दिया है ।
