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September , 2010
Thursday
वह हौवा है या भगवान जो भी है अब उसके सामने चुनौती वह खुद ही ...
मुंबई की पृष्ठभूमि पर बनी अपार्टमेंट शहरों की कामकाजी लड़कियों की दिक्कतों, मुश्किलों, दुविधाओं और ...
एडवांस लेप्रोस्कोपी र्सजरी विधि से आँपरेशन को लेकर पर्वाचल के विराटनर में जुटे चार देशों ...
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री शत्रुघ्न प्रसाद ...
माउन्ट एवरेस्ट का उत्तरी भू-भाग चीन का है और यह मान्यता चीन सरकार की है ...
काठमांडू में ४ से ६ दिसम्बर २००९ तक भारतीय राजदूतावास और बी.पी. कोइराला भारत-नेपाल प्रतिष्ठान ...
अमेरिका की तरफ से की गयी पहल और मंर्बई हमले के करीब १४ महीने बाद ...
दीपिका पादुकोण और विजय माल्या के बेटे सिद्धार्थ के बीच लिंक अप की अफवाहों ने ...
मजदूर दिवस के अवसर पर नेपाली फिल्म के मशहूर अभिनेत्री रेखा थापा विराटनगर में मजदूरों ...
भौतिक एवं योजना तथा निर्माण राज्य मन्त्री संजय साह आज मधेश के एक कर्मठ एवं ...
नेपाल से प्रकाशित एक मात्र हिन्दी पत्रिका हिमालिनी की संस्थापक संपादक एवं पद्मकन्या काँलेज में ...
नेपालअपने प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के लिए विश्व में प्रसिद्ध है । नेपाल में ८ ...
पाल की भावी शासकीय संरचना कैसी और किस प्रकार की हो - सभी भाषा-भाषी, जात-जाति ...
इस कदर आदमी आज रोने लगा दाग सारे बिना पानी धोने लगा । रात सोये तो ...
सृष्टि में केवल मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसे प्रभु ने विवेक, बुद्धि, ज्ञान, विश्लेषणात्मक क्षमता, ...
सिर्फआसन प्रणायाम करनेवाले योगी नहीं, वे सिर्फकथावाचक नहीं, वे सिर्फआचार्य नहीं, वे एक उपदेशक नहीं बल्कि वे ...
वियाना यूरोपीय देश अस्टि्रया की राजधानी है । यह राजधानी नगर अत्यंत रमणीय है । ...
दश भर में विशेष सुरक्षा योजना लागू होने के बाद सशस्त्र संगठनों के बीच एकीकरण की प्रक्रिया ...
भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण ...
नेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में ...
चार और संचार जगत, पत्रिका और पत्रकार जगत, इन दोनों को मिलाकर इन दोनों जगहों पर ...
ईन फ्लू की तरह हैपेर्टाईटिस-बी का भी भारी आतंक अनेक वर्षो तक फैलाकर अरबों रूपया ...
प्रचण्डजी की नेतृत्व की सरकार ने जब उट की टेढी पीठ की तरह करवट भी ...
नेपाली राजनीति में लगभग साढे छह दशक तक कोईराला अविश्रान्त कर्म योद्धा बनकर नेपाल की ...
नेपाल की राजनीति आज कठिनतम दौर से गुजर रही है । नवसंविधान के निर्माण की ...
काबिले गौर है कि नक्सलियों की समस्या विकट रूप लेती जा रही है - आँपरेशन ...
टुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर ...
जनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों ...
बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जारी ल्रि्रहान आयोग रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में एक नया ...
०६,२०६६ के दिन राज्य पर्नर्संरचना तथा राज्य शक्ति विभाजन समिति की अन्तिम बैठक बुलाई गई ...
में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है ...
विराटनगर भारत-नेपाल दो देश । सीमाएं अलग-परतंु दिलों के बीच नहीं है कोई हद । दोनों ...
आउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे ...
राजनीति’ में राजनीतिज्ञ बनी हैं। उनका ‍जो लुक है, उसे देखकर कहा जा रहा है ...

Archive for the ‘Monthly Issue’ Category

संविधान सभा की कालावधि ::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

kumarनेपाल की राजनीति आज कठिनतम दौर से गुजर रही है । नवसंविधान के निर्माण की कलावधि समाप्त होने जा रही है और जेठ १४ गते को लक्ष्मणरेखा की प्रज्वलित अग्नि पूरे देश को अपनी चपेट में लेने को तत्पर है । सहमति और सहकार्य जैसे बहुप्रचारित शब्द नेपाल के सर्न्दर्भ में अपनी अर्थवत्ता खोने लगे हैं । संर्घष्ा और टकराव नेपाली राजनीति और जीवन का यथार्थ बन चुका है । यद्यीप उस संर्घष्ा और टकराव के पीछे राजनीति के शिल्पकारों के अपने निहितार्थ तो हो सकते है लेकिन आमलोगों का जीवन दिनोंदिन नारकीय बनता जा रहा है । समय तीव्र से बढÞता जा रहा है । लेकिन राजनीति की सारी शक्तियाँ सत्ता और शक्ति का संतुलन स्थापित करने में धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा खोकर कान्तिविहीन होती जा रही है । निश्चित ही हमारी धरती पर बहुत कुछ ऐसा है, जिसकी बदौलत हम इस पर अभिमान कर सकते है, लेकिन हमारी राजनीति ऐसी है, जिसके सर्न्दर्भ में ‘तौबा-तौबा’ जैसे घृणाभिव्यक्तिकारक शब्द युग्ध ही प्रासंगिक लगता है । क्योंकि संविधान निर्माण की शपथ लेने वाली शक्तियाँ सत्ता के समीकरणों का तोडने-जोडÞने में व्यस्त और मधेश मुक्ति के आकांक्षी मंत्रालय की साधना में मग्न । सब कुछ उल्टा-पुल्टा गडमगड । हमारी नेतृत्व पंक्ति का यह अनोखा राग आमलोगों को मोक्ष या मुक्ति में सहाय हो या नहीं लेकिन कम-से-कम उसमें धीरे-धीरे वैराग्य का भाव तो भर ही रहा है ।
आज नेपाली राजनीति में जो संर्घष्ा और टकराव देखा जा रहा है यह सत्ता का संर्घष्ा या टकराव है, उससे कही अधिक विचारधारा का टकराव है । यहाँ लोकतांत्रिक शक्ति या और अधिनायकवादी शक्तियाँ परस्पर संर्घष्ारत है । इस बात से अनेक लोगों को विमती हो सकती है लेकिन माओवादी नेतृत्व पंक्ति द्वारा विगत में बार-बार यह अभिव्यक्ति दी जा चुकी है वार्ता समझौता, या सत्ता तो उनके लिए साधन मात्र है । उनका लक्ष्य कुछ और है । वह वास्तव में र्सवहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना उनका उद्देश्य है । और उसके निमित्त उसने दस वषर्ीय जनयुद्ध का संचालन किया और २०६२-०६३ के आंदोलन को सफलता को अपनी उपलब्धि मानी । संविधान सभा के निर्वाचन में सबसे बडे दल के रूप में उभरने और सरकार को नेतृत्व का अवसर पाने के बात उसने शासन के समस्त अंग को धीरे -धीरे अपने प्रभाव में लेना प्रारम्भ किया लेकिन देश की सैन्य संरचना में हस्तक्षेप के बाद ऐसा राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ और ऐसी परिस्थितियाँ उपजी की उसे सरकार छोडनी पडी । लेकिन रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने और संविधान निर्माण कि प्रतिबद्धता छोडÞ आज माओवादी जब सरकार के नेतृत्व का दुराग्रह कर रहे है तो यह बात साफ झलकती है कि सरकार को माध्यम बनाकर वह अपने लक्ष्य पर अपेक्षाकृत सहजता से पहुँच सकते है क्योंकि जो धु्रवीकरण माओवादियों के विरोध में हुआ है, उससे वह अपने अनुकूल संविधान का निर्माण नही कर सकता ।
आज माओवादी सडÞक के द्वारा मौजूदा सरकार को अपदस्थ करने के कवायद में जुडा है । वे जानते है कि संसद का गणित उस के पक्ष मंे नहीं है । इसलिए सडÞक को शक्ति पर््रदर्शन का केन्द्र बनाकर अपनी राजनीति को आगे बढाना चाहते हैं । माधव नेपाल के समस्या यह कि वे पार्टी आधार पर सरकार में अल्पमत में है और गठबन्धन सरकार का मुखिया है( । इसलिए सबकी आकांक्षाओं की कसौटी पर खडÞा उतरना उनके वश की बात नहीं है । एक ओर उन्हें नेकपा माओवादी के प्रबल विरोध का सामना करना पर रहा है दूसरी ओर उनके अपने दल में भी अनेक विभीषण है जो अपने ही लंका के जलने की प्रतिक्षा में सम्राट बन ने का सपना संजोए बैठे है । तिकडम राजनीति का अभिन्न अंग है । सत्ता शर्ष् पर पहुँचने के लिए दल के भीतर तोडजोड को एक हद तक उचित ठहराया भी जा सकता है । लेकिन दूसरे की महत्वकांक्षा की पर्ूर्ति का माध्यम बन कर अपने घर को तोडने और फोडÞने के नीति को तर्क सम्मत तो नहीं ही कहा जा सकता, वैसे नेपाल की प्रजातांत्रिक राजनीति इस दृष्टि से कुख्यात है ही अगर फिर कोई समीकरण बनता है उसे समस्या के समाधान की दिशा में उठाया गया महत्वपर् लक्ष्य नहीं, अवसरवादी राजनीति का बढÞता प्रभाव के रूप में स्वीकार किया जा सकता है ।
आज माधव नेपाल के नेतृत्व वाली सरकार को गिराकर संविधान निर्माण का बहाना बनाकर नई सरकार की जिस किसी संभावना की बात की जा रही है, उसके पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे वर्तमान राजनीति के ठहराव को समाप्त किया जा सकता है । लेकिन सवाल उठता है कैसे – आज जब संविधान सभा अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाई है, इसका जिम्मेवार संविधान निर्माण की महत्वपर्ूण्ा जिम्मेवारी वहन करने वाला सब से महत्वपर्ूण्ा दल है आज जो शक्ति सरकार के नाम पर वह संविधान निर्माण को प्रक्रिया को अवरुद्ध किये हुए है, कल अगर सरकार बन भी जाती है तो अपने अनुसार संविधान न बनता देख वह संवैधानिक प्रक्रिया को अवरुद्ध कर सकती है । इसलिए नये नेतृत्व में सरकार निर्माण से संविधान निर्माण की प्रक्रिया को सुनिश्चित करने का सपना देखना महज बौद्धिक दिवालियापन हो सकता है । यह निश्चित है कि जब तक हमारी प्रतिबद्धताएं और प्राथमिकताएं सुनिश्चित नहीं होती तब तक लक्ष्य व्रि्रम की स्थिति तो रहेगी ही । आज देश-मधेश उसी पीडा से ग्रस्त है । अपनी-अपनी महत्वकांक्षा और अपनी-अपनी सोच अपने लोगों पर लादने के मनोविज्ञान के कारण आज संविधान निर्माण की प्रक्रिया अवरुद्ध है । इसलिए जब तक हमारी मानसिकता में परिवर्तन नही होता सरकार परिवर्तन किसी भी समस्या का निदान नही हो सकता ।
आज तक आमलोगों के मन में यह जिज्ञासा थी की जेठ १४ गते के बाद क्या होगा – संविधान बनेगा या नहीं लेकिन अब यह जिज्ञासा लगभग समाप्त हो चुकी है । और अगर कोई चमत्कार नहीं हुआ तो उस दिन तक संविधान लागू होना असंभव है । ऐसे में एक ही सही विकल्प हो सकता है कि सारे महत्वपर्ूण्ा दल एक चर्टाई पर बैठकर संविधान निर्माण के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त करें और संविधान सभा की अवधि ६ महिना के लिए आगे बढाएँ । लेकिन अभी दलों के बीच जो रस्सा-कस्सी की स्थिति है, उसमें सरकार परिवर्तन के बगैर इन दलों का एक साथ भूमि पर अवस्थित होना अनिश्चित है । ऐसी परिस्थिति में संविधान सभा की अवधि बढाना भी औचित्यहीन है । सवाल उठता है कि विकल्प क्या हो सकता है । एक बात निश्चित है कि संविधान तब तक ही महत्वपर्ण्ा और सम्मानीय होता है, जब तक उसके प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता होता है । उसके अभाव में यह महज एक किताब है । फिर शक्ति के आधार पर संविधान को पद दलित करने के अनेक उदाहरण विश्व इतिहास में विद्यमान है । और नेपाल भी इस का उदाहरण बन सकता है । क्योंकि अनेक संविधानों का सामना इस देश ने किया है । इसलिए संविधान हीनता की स्थिति में अलोकतांत्रिक शक्तियों की सिर उठाने का संभावना से इन्कार नही किया जा सकता । और अगर ऐसा होता है तो उसका जिम्मेवार हमारा नेतृत्व वर्ग होगा ।
आज माओवादी न केवल देश का सबसे बडा राजनीतिक दल है बल्कि नई राजनीतिक शक्ति है और नवीन राजनीतिक चेतना का वाहक भी है । लेकिन उसके प्रतिबद्धताएँ बदली-बदली सी दिखलाई दे रही है । नव संविधान से उसकी नवीन राजनीतिक मुद्ददों का संस्थागत किया जाना है । किन्तु संविधान उसकी द्वितीय प्राथमिकता बन गई है और सरकार प्रथम । इसलिए मौजूदा सरकार को गिराने के लिए वह हठयोग को अपनी नीति में शुमार कर लिया है । वस्तुत उसके भी निहितार्थ है, माओवादीयों ने अपने कार्यकर्ता और र्समर्थक को तथाकथित वर्ग संर्घष्ा का सपना देखाकर अपेक्षाकृत सुन्दर सुखमय और समृद्धि का चित्र खिचा है सरकार में गये बगैर आनन-फानन उसे कार्य रूप नही दिया जा सकता । ऐसे में दल के उग्रपंथी कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना व्याप्त हो सकती है । और अधिक दिनों तक उन्हें समेटकर नहीं रखा जा सकता । दूसरी ओर एनेकपा माओवादी देख रही है कि उनके विरुद्ध संसद में मजबूत राजनीतिक धु्रवीकरण है जिसके कारण वह संसद में अल्पमत में है । इसलिए उस ध्रुवीकरण के रहते वह तथाकथित जनमुखी संविधान नहीं बना सकता । इसलिए राजनीतिक कदम संविधान निर्माण के प्रक्रिया का बाधक लग रहे है और सरकार को तो उस के प्रबल विरोध का सामना पडÞ ही रहा है ।
आज माओवादियों की सबसे बडÞी विडम्बना यह है कि संविधान सभा की सबसे बडी पार्टर्ीीोकर भी सत्ता से च्युत है । और सत्ता हस्तगत करने के लिए उसके पास सडÞक के सिवाय कोई रास्ता नहीं बच गया है । यह भी सच है की आज माओवादियों के सरकार विरोधी कदमों का र्समर्थन देने वाला दल भी है । एक तरह से देखा जाए तो अवसर से चुके लोग सरकार का विरोध कर रहे है । और अवसर उपभोग कर रहे दल सरकार का र्समर्थन कर रहे है । संविधान और मुद्दें तो अवसर की साधना के माध्यम बन कर रह गए है । ऊँट किस करवट बैठेगा, नेपाल की राजनीति के सर्न्दर्भ में इस बात की भविष्यवाणी करना तो मुश्किल है लेकिन उतना तो कहा ही जा सकता है कि अगर सडÞक द्वारा सरकार परिवर्तन संभव हो पाया तो लोकतंत्र के इतिहास की दृष्टि से एक बहुत ही नकारात्मक उदाहरण होगा । आज माओवादी सडÞक के हथियार बना रहे है । कल दूसरे ऐसा कर सकते है उस तरह राजनीतिक और स्थिरता संर्घष्ा और हिंसा को उसे स्वीकृति मिलेगी । एक बात और है कि संसद को रखते हुए अगर सडÞक सत्ता परिवर्तन का माध्यम बनता है तो संसद का क्या औचित्य है – इसलिए लोकतंत्र का राग अलापनेवालों से यह अपेक्षा की ही जा सकती है कि वे विरोध को सांकेतिक रखें और संसद की जोरअजमाइश की जगह बनावें ।
आज माओवादी नेतृत्व अपनी आकांक्षा के प्रचार में अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियों में सब से बडÞा अवरोधक भारत को समझ रहा है । यह सच है कि नेपाल के अन्दरुनी राजनीति में भारत का प्रभाव यदाकदा दिखलाई देता रहा है । नेपाल की भौगोलिक संरचना और नेपाल के खुले सीमा के कारण भारत विरोधी और उग्रसाम्यवादी विचारधारा पर आधारित शासन प्रणाली के विकास के हतोत्साही कारण उसकी विदेश नीति की प्राथमिकता हो सकती है । यही कारण है कि नेकपा माओवादी सरकार को भारत के प्रति यद्यपि अच्छे सम्बन्धों की इच्छा की बात वह करता है लेकिन उसके प्रति हल्ला बोलने की मनस्थिति में है । लेकिन इनके साथ सब से बडÞी विडम्बना यह घटित हर्ुइ है कि देश के भीतर भी उनके विरोध में व्यापक धु्रवीकरण देखा जा रहा है । सरकार के र्समर्थन मे २२ दलों का खडा होना भी उसी का नतीजा है । इन सारे घटनाक्रमों को कहीं न कहीं भारत के कूटनीति के प्रभाव से जोडÞकर विश्लेषित किया जा रहा है । इस आन्दोलन के समक्ष माधव नेपाल के न झुकने की दृढÞता के र्सार्क सम्मेलन को दौरान भारतीय प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात को परिणाम के रूप में आकलित किया जा रहा है । सच चाहे जो हो लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि घर में अगर सीमायें तोडÞकर हम झगडेंगे तो पडोसियों को झाँकने का अवसर मिल ही जाता है । यद्यपि इस बात में कितनी सत्यता है उसे दोनांे राष्ट्र प्रमुख ही जानें, लेकिन इतना तो कहाँ ही जा सकता है कि पडÞोसी को हस्तक्षेप करने का निर्ण्र्ाातो खुद हमारी राजनीति देती है ।
आज माओवादियों की यह विडम्बना यह ही है कि संविधान सभा की सबसे बडी पार्टीकर भी उसे सत्ता से बहिर्गमन करना पडा । उसके लिए राष्ट्र प्रमुख के साथ-साथ सेना, सरकार, और उसके र्समर्थन दे रहे प्रमुख राजनीतिक दलों को वह जिम्मेवार मान रहा है । वैसे भी अगर यह पार्टीमझती है कि उसके साथ अन्याय हुआ है तो संविधान निर्माण में रचनात्मक सहयोग देते हुए वे अपने प्रति हुए अन्यायों को जनता तक ले जाने के लिए स्वतन्त्र हैं । फिर संविधान की घोषणा के बाद यह सभा औचित्यहीन होती और इसका निर्वाचन निर्धारित समय में करवाना सरकार की विवशता होती । अपने उस कदम के द्वारा माओवादी अपने राजनीतिक चरित्र की अपव्याख्या को रोक सकती थी और जनता के बीच सिर उठाकर घोर नैतिक बल के साथ अपना आधार तलाश सकती थी । फिर जनता भी अन्धी और विवेकशून्य नहीं है और अन्ततः आमलोगों की साधना ही लोकतंत्र में राजनैतिक दलों का प्रमुख लक्ष्य और उनका र्समर्थन ही प्रमुख ताकत होती है । लेकिन सेनापति प्रकरण के बाद सत्ता से बहिर्गमन के साथ ही जो सत्तालिप्सा माओवादी नेतृत्व की प्रकट हर्ुइ है और संविधान सभा में अब तक की जो उनकी भूमिका रही है उससे उनके जिम्मेवारी बोध पर प्रश्न चिन्ह उठता है । सरकार को अपदस्थ करने के लिए उनके द्वारा उठाया गया अनिश्चितकालीन हडÞताल जैसा कदम उनकी राजनीतिक हताशा का संकेत लग रहा है ।
आज समय के जटिल मोडÞ पर देश खडÞा है । संविधान सभा के निर्वाचन के बाद जो सत्ता संर्घष्ा नेपाली राजनीति में देखने को मिला है उससे यह सवाल गहराने लगा है कि क्या यह संविधानसभा निर्धारित समय की तो बात ही छोड दें । ६ महिना के कार्यावधि बढÞाकर भी अपने लक्ष्य तक पहुँच पाएगी – कहीं ऐसा तो नहीं जनआंदोलन २ परिणामहीन हो जाएगा । आज हम पर्ूव राजा की बढÞती गतिविधि का हवाला देते हैं, राष्ट्रपति की बढÞते कदम की बात करते हंै । सवाल उठता है कि उसका जिम्मेवार कौन है – बार-बार की राजनीतिक अस्थिरता और संकट का सामना कर चुकी नेपाली जनता विगत संविधान सभा के सफल निर्वाचन के बाद चैन की साँस ली थी और उनके बीच आशा का संचार हुआ था । लेकिन उनके लिए उस से बडÞी विडम्बना क्या हो सकती है कि जिन्हें उन्होंने संविधानसभा में भेजा है आज वही निर्धारित समय में संविधान न बनने की बात दुहराते फिर रहे हैं । देश मुठभेडÞ की कठिन दौर से गुजर रहा है । जनता त्रास मंे जीवन व्यतीत कर रही है । ऐसे समय में यह कहना अनुचित नहीं लगता कि जिस दिन आमलोगों को उन दलों पर से विश्वास उठ जायगा, उस दिन कार्यकर्ताओं का पृष्ठपोषण करने वाली अवसरवादी राजनीति नकारा साबित होगी । अपने जीवन, धन और शान्ति के कामना में वह जो विकल्प चुनंेगी उससे नवस्थापित लोकतंत्र का तो भला नहीं होगा ।

श्रद्धापूर्ण तर्पण महान राजनेता को ::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On April - 25 - 2010 ADD COMMENTS

kumarजीवन के अनेक रंग होते हैं लेकिन यह अपने आप में भी एक गाढा रंग है जो दिन-का-दिन फिका होते होते एक दिन बेरंग हो जाता हैं । यह जीवन की नीयती भी है और सनातन सत्य भी । इस यथार्थ से सबको एक न एक दिन गुजरना ही पडता है । २०६६ चैत्र ७ गते का दिन गिरिजाप्रसाद कोईराला के लिए ऐसा ही दिन था क्यांकि उस दिन अपने विशिष्ट पद चिहों को छोडकर उन्होंने इस धराधाम से महाप्रणाण किया और अपनी संर्घष्शील जीवन यात्रा को सदा के लिए विराम दिया । हम उन्हें नेपाली राजनीति का महार्सर्य कहे, महारथी, महानायक शिखरपुरुष लेकिन यह स्वीकार करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि नेपाल के लोकतांत्रिक यात्रा के वे जीवन्त दस्तावेज थे । यह सच है कि देश को वर्तमान मुकाम तक पहुँचाने में योगदान की दृष्टि से मूल्यांकन किया जाए तो निश्चय ही स्व. कोईराला देश के महान में अग्रण्यी थे । लगभग ८ दशकों के नेपाल के लोकतांत्रिक आन्दोलन में स्व. कोईराला की सक्रिय राजनीति का इतिहास भी उतना ही पुराना है । अपने जीवन के अंतिम साँसों तक वे सक्रिय रहें तथा देश के प्रति अपनी चिंताओं को अभिव्यक्त किया । उनके इन्हीं योगदानों को रेखांकित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने उन्हें दक्षिण एशिया का महान नेता के रूप में मूल्यांकित किया । girija
राजनीति और विवाद दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है । स्व. कोईराला का राजनीतिक जीवन लगभग साठ वर्षपुराना है । इसलिए समय-समय पर वे विवादों में आए, जिनकी आलोचनाएँ हर्इं । लेकिन विवादों और आलोचनाओं से गुजरते हुए उनके व्यत्तित्व ने इतनी उँचाई प्राप्त की कि देश ही नहीं महादेश के महानायकों में उनकी गणना होने लगी । आज स्व. कोईराला हमारे बीच नहीं है । मातम और संवेदना के इस माहौल में पूरा देश एक स्वर से स्वीकार कर रहा है कि उनके निधन के बाद देश अभिभावक विहीन को गया है । पक्ष विपक्षी आलोचक प्रशंसक आज सभी इस बिन्दु पर एकमत है । वास्तव में जीवन के अन्तिम चरण में आकर उनका व्यक्तित्व इतना व्यापक और अटल हो गया कि बावली राजनीतिक की कोई भी अनियंत्रित लहर उनके व्यक्तित्व की शिला से चोट खाकर वापस लौट जाती थी । देश की मौजुदा परिस्थितियों के मद्दंेनजर अन्तिम समय तक वे देश के भविष्य के प्रति चिन्ता ग्रस्त थे और सहमति तथा सहकार्य की अभिभावकीय सलाह देते रहे । अब जब कि वे हमारे बीच नही हैं, उनकी भावना एवं सपना देश को दिशा देने के लिए सक्षम है । आवश्यकता है उसे व्यवहार में उतारने और आगे बढने की ।
स्व. कोईराला का सम्पर्ूण्ा जीवन ही राजनैतिक संर्घष् का पर्याय रहा है । नेपाल का यह सौभाग्य है कि उसे कभी भी गुलामी का त्रास नही झेलना पडा और दर्ुभाग्य यही है कि लगभग छ वर्षो से यह देश राजनैतिक स्थिरता की तलाश में भटक रहा है । उस भटकते देश को दिशा देने की दृष्टि से एक महानसेनानी थे । जिस समय उनका जन्म हुआ देश राणा शक्ति के अन्यायओं का शिकार था और उनके विरुद्ध आवाज बुलन्द करने के कारण इनके परिवार को निर्वासन का जीवन व्यतीत करना पड रहा था । राणाशाही के कुशासन की काली छाया में ही उनके जीवन के प्रारम्भिक दिन गुजरे । उनके राजनैतिक जीवन की शुरुआत सन् २००-२००४ में विराटनगर के जुट मिल में हुए मजदुर आन्दोलन के नेता के रूप में हुआ और यहाँ से वे अपनी राजनैतिक यात्रा प्रारम्भ कर के २०४८ साल में प्रधानमन्त्री बनें । राणा शाही के चंगुल से देश की जनता की मुक्ति के लिए उन्होंने केवल हथियार उठाया ब्लकि सशस्त्र आन्दोलन के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से विमान अपहरण तक की घटनाओं को अंजाम दिया उससे स्पष्ट होता है कि वे अपने धुन के कितने पक्के और लक्ष्य के प्रति कितने समर्पित थे ।
वि.सं. २०४६ में बहुदलीय प्रजातंत्र की स्थापना के बाद स्व. कोईराला नेपाली राजनीति के केन्द्र में रहे । उस समय से अबतक वे पाँच बार देश के प्रधानमन्त्री बने । सत्ता की राजनीति का अपना यथार्थ और अपने समीकरण होते है । उन्हें साधने के क्रम में अनेक आरोपों प्रत्यारोपों के दौर से भी उन्हें गुजरना पडÞा लेकिन नेपाली राजनीति में उनकी सर्वोपरिता या र्सवमान्यता का स्वर वि.सं. २०५९ आश्विन १८ गते को राजा ज्ञानेन्द्र के सत्ता की बागडोर सीधा अपने हाथ में लेने के बाद बुलंद होने लगे । नेपाली कांग्रेस के नेता के रूप में वे., राजा द्वारा विघटित प्रतिनिधिसभा की पुनर्स्थापना की माँग कर रहे थे । दूसरी ओर अन्य महत्वपर्ूण्ा पार्टियाँ राजा की आकांक्षा की छत्रछायाँ मे सत्ता और सरकार की साधना में संलग्न थी । लेकिन अन्ततः उन दलों ने भी यथार्थ को समझा और कोईराला के नेतृत्व में २०६२/०६३ के जनाअन्दोलन में अपना योगदान दिया । उस आन्दोलन को सफल और निर्ण्यक बनाने के लिए उन्होनें न केवल आमलोग का आह्वान किया जबकि विगत एक दशक से जनयुद्ध में शामिल नेकपा माआवादी को भी इस आन्दोलन में शरीक किया गया था, निर्ण्ाायक आन्दोलन का नेतृत्व किया । उस आन्दोलन मं राजतंत्र की समाप्ति के साथ साथ नेकपा माओवादी को राजनीति की मुख्य धारा में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
स्व. कोईराला एक राजनेता की नही बल्कि नेपाली राजनीति के नितान्त शिल्पी भी थे । उनके राजनैतिक जीवन के प्रारम्भिक दिनों में जहाँ वे व्रि्रोही नेता के रूप में सामने आए वही संवैधानिक राजतन्त्र के काल में राजसंस्था से भी उन्होंने उचित संतुलन रखा । राष्ट्र के कार्यकारी प्रमुख होने के नाते देश में बढ रहे माओवादियों के प्रभाव तथा उनके आतंक का प्रतिउत्तर देने के लिए उन्होंने अनेक प्रभावकारी कदम उठायें जिसके कारण माओवादी उन्हें अपना सबसे प्रबल प्रतिद्वन्दी समझने लगे । लेकिन जब राजा ज्ञानेन्द्र सत्ता हस्तगत कर निरंकुशता की ओर बढÞने लगंे तो उन्होंने समझा कि उनके महत्वाकांक्षी कदमों को रोकने के लिए एक वृहत् राजनैतिक गठबंधन की आवश्यकता है । यद्यपि इस यथार्थ को समझने में नेपाल के अन्य राजनैतिक दलों को समय लगा तथापि यही से प्रारम्भ होती है सहमति और सहकार्य की नीति तथा गठबंधन की राजनीति । राजनीति के इस रंग में उन्हें किसी से वर्जन नही थी और माओवादी भी उनकी सहानुभूति के दायरे में आते थे । कम्युनिष्ट पार्टियों और उसके नेताओं के प्रति उनकी सहानुभूति किसी से छुपी नहीं थी । माधवकुमार नेपाल की नेतृत्व वाली मौजूदा गठबंधन सरकार को आकार देने में उनकी भूमिका को कौन इन्कार कर सकता है -
निश्चय ही नेपाली राजनीति में स्व. कोईराला का पदार्पण सशस्त्र क्रान्ति के प्रणेता के रूप में हुआ । शस्त्र और संवेदना दोनों परस्पर विरोधी चीजें हैं लेकिन कोईराला की शख्सियत यह खासियत रही है कि वे चिन्तन के धरातल पर उन दोनों में किसी के प्रति अतिवादी नहीं हुए । एक तरह से लक्ष्य के प्रति की तटस्थ रहे । इसलिए उन दोनों भावों का उपयोग उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति के लिए ही किया । २०४६ के आन्दोलन में राजा और राजसंस्था के प्रति अनुदार थे । दरबार हत्याकाण्ड के बाद जब ज्ञानेन्द्र राजा बने तो उन्होंने उन्हें भी कुछ हृदय से स्वीकार किया । लेकिन जब उनके कदम निरंकुशता की ओर बढने लगे तो उन्होंने ज्ञानेन्द्र के प्रति विरोध की आवाज बुलंद की और विभिन्न मंचों से उन्हें अपनी भूल समझाने का परामर्श भी दिया । लेकिन राजभवन पर जब इसका कभी प्रभाव नहीं पडÞा तो लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए निर्ण्ाायक आन्दोलन का नेतृत्व किया उसके बावजूद राजा और राजसंस्था के प्रति नही उनके मन में कोई द्वैष था । इसीलिए कभी भी सेरिमोनियल और कभी बेबी किंग की अवधारणा प्रस्तुत कर विवाद में आते रहे । निश्चित ही उन अवधारणओके पीछे कही न कही राजा के प्रति उनकी सहानुभूति थी, इस बिन्दु पर अग्रज वी.पी. के चिन्तन के धरातल से ऐक्य करते नजर आते हैं ।
जो व्यक्ति महान होता है उसकी करुणा की धारा किसी एक दिशा में प्रवाहित नही होती । उसका व्यक्तित्व तो विशाल वट वृक्ष की तरह होता है जिसकी छाया में होनेवाले हर जीवजन्तु को शीतलता का अहसास होता है । राजनैतिक रूप से उनके व्यक्तित्व की विशालता तो राष्ट्र के समक्ष आया ही, बिना बुलाये लाखों लोगों का हुजुम उन्हें विदा करने के लिए उमड पडा । अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी वे उतने ही उदार, सहृदय सहज और दायित्वपर् थे । उनके व्यक्तिगत जीवन में अगर झाँककर देखा आए तो अल्पायु में पत्नी की हृदयविदारक मौत और एकमात्र किशोरी पुत्री के लालन पालन का दायित्व कंधे पर होने के बावजूद यौवन और चिर वियोग का कोई भी राग रंग उनके व्यक्तिव में छिछलापन नहीं ला पाया और उन्हें लक्ष्य विमुख करने में सक्षम न रहा । प्रायः ऐसा होता है कि उम्र के साथ-साथ व्यक्ति के स्वयं का दायरा प्रबल होता जाता है । लेकिन मनुष्य की इस स्वाभाविक कमजोरी ने कोईराला के व्यक्तित्व को प्रभावित नहीं किया बालुवाटार से महाराजगंज और अन्तिम समय में सेवा और सौभाग्य पुत्री को देने के लिए पुत्री निवास में उनका पदार्पण पूरे परिवार के प्रति सकारात्मक सोच के कारण यदा कदा उनपर परिवारवाद का भी आरोप लगे । लेकिन ये आरोप किसी न किसी रूप में समस्त परिवार के प्रति उनकी सकारात्मक सोच का परिणाम है ।
कोईराला न केवल महान राजनेता थे वरन् देश के विकास की योजना भी उनके पास थी । वि.सं. २०४६ साल में प्रजातंत्र की पुनर्स्थापना को अर्थ विश्लेषण केवल राजनैतिक परिवर्तन मात्र नही मानते । उनके अनुसार आर्थिक दृष्टि से भी यह नवयुग की शुरुआत थी । तत्कालीन सरकार ने खुली अर्थनीति का अवलम्बन किया था और देश के तीव्र विकास का आधार यही परिवर्तन बना था तथा उसका नेतृत्व किया था तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. गिरिजाप्रसाद कोईराला ने । कोईराला सरकार के तीन वषर्य शासनकाल में देश ने उच्च विकास दर प्राप्त किया था और आर्थिक वर्ष२०५०(५१ में यह विकास दर ७.६ प्रतिशत था । आज की तुलना में यह विकास दर स्वप्न जैसा प्रतीत होता है, उस काल को ‘आर्थिक स्वर्ण्र्ल’ मानते है । आज उनके निधन से देश के निजी उद्योग व्यवसाय का क्षेत्र भी स्वयं को मर्माहत महसूस कर रहा है क्योंकि देश में उदारीकरण की शुरुआत और निजी क्षेत्र पर विश्वास कोईराला की देन रही है ।
महान व्यक्ति की कथा ही अनकथ होती है और महान व्यक्ति के व्यक्तित्व की व्यापकता को शब्दों से सीमांकित करना लगभग असंभव होता है । इसलिए यह आलेख कोईराला जैसे महान व्यक्तित्व को शब्दबद्ध करने का न तो दावा करता है और न ही लेखकीय क्षमता के पर्रदर्शन की भावना इसमें है । आज कोईराला के निधन से पूरा देश शोकाकुल हैं । शोक और संवेदना की इस घडी में उन्हें स्मरण करने के बहाने जो बातें अभिव्यक्त हैं, वास्तव में उस महामानव की आत्मा की चिर शांति के लिए एक अकिंचन की ओर से शब्दों का श्रद्धापर्ूण्ा तर्पण हैं और हिमालीनी’ परिवार की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि ।

अन्तरराष्ट्रिय गिरोह के शिकंजे में काठमांडू ::-अरुण ठकुरी

Posted by Himalini On March - 21 - 2010 ADD COMMENTS

arun thakuriनये साल की पर्व संध्या में शराब, शबाब और बत्तियों की झिलमिल से जगमगाता ठमेल । डान्स बार और डिस्कोथेक की चारदीवारी को चीर कर हवा में लहराता हुआ संगीत लोगों की कानों मंे घुसकर जिस्म को जंुबिश करने पर मजबूर कर रहा था । लेकिन ठमेल के इस मनचले वातावरण के अलग कुछ जिस्म र्सतर्कता पर्वक अलग किस्म की जंबिश में मशगूल थे । कुछ अखें इन जिस्मों को टटोल रही थी । चूहे-बिल्ली जैसे लगने वाले इस खेल के दौरान काशीराम अधिकारी थापाथली स्थित ब्लू स्टार काँम्प्लेक्स और ठमेल स्थित रेड प्लानेट होटल के बीच दो बार टैक्सी से यात्रा कर चुका था । होटल रेड प्लानेट के रूम नम्बर ३०४ में ठहरे राजू भाई से एक सूटकेश और रूम नम्बर २०४ के आमीर से दो सूटकेश ले कर टैक्सी से थापाथली पहुँचते-पहुँचते करीब रात के साढे बारह बज चुके थे । करीब १ बजे थापाथली-ठमेल की भागदौड से थक कर ब्लूस्टार कांम्प्लेक्स के रूम नम्बर ६११ – नेपाल कुश्ती संघ के नाम पर किराए पर लिया गया था के अन्दर आराम कर रहे काशीराम को नेपाल प्रहरी की टीम ने दबोच लिया । काशीराम अधिकारी को नियन्त्रण में लेने के कुछ देर बाद ठमेल के रेड प्लानेट होटल से काशीराम को सूटकेश देने वाले रूम नम्बर ३०४ के राजू भाई उर्फमोहम्मद सज्जाद खुराम और रूम नम्बर ३०४ के आमीर उर्फमोहम्मद इकबाल नाम के पकिस्तानी नागरिक भी पुलिस द्वारा पकड लिए गए । पकडे गए इन लोगों से २५ लाख ४४ हजार ५ सौ बराबर के नकली भारतीय नोट और तीन किलो सात सौ ग्राम ब्राउन हेरोइन बरामद हुआ, जिसका अंतर्रर्रीय बाजार मूल्य करोड रुपए है । ये सभी सामान पाकिस्तान से पकिस्तान इन्टरनेशनल एयरवेज -पी.आई.ए.) की फ्लाईट से काठमाण्डू लाए गए थे । एक दूसरे को पहचानने से इन्कार करने वाले इकबाल और सज्जाद एक दिन के अन्तराल मंे पी.आई.ए. की फ्लाईट से काठमांडू उतरे थे । दोनों के पास मेरो मोबाइल का नेपाली सिमकार्ड था जिसे वे लोग पाकिस्तान से लेकर आए थे । त्रिभुवन इन्टरनेशनल एयरपोर्ट कस्टम चेकिग में फंसने के डर से दोनां ने साथ में लाये गए चारों सूटकेश में खिलौने होने की बात बताई । बाद में कस्टम क्लियर करने की बात कहकर सामान वही डिपोजिट कर बाहर हो गए । ल्किन नोट और ड्रग्स से भरे सूटकेश बाद में बिना चेकिंग जिस तरह एयरपोर्ट से निकाले गए, इसके पीछे इस गिरोह की पहुंच और कस्टम के साथ-साथ सुरक्षाकर्मी की संलग्नता जांच के घेरे में है ।
काशीराम, इकबाल और सज्जाद से प्र्राप्त जानकारी के आधार पर अगले दिन दोपहर २ बजे नेपाल प्रहरी ने ललितपुर जिले के ताल्सीखेल स्थित घर से इस घटना के मुख्य व्यक्ति यूनुस अन्सारी को गिरफ्तार कर ंलिया । नेपाल जनता दल के अध्यक्ष परूव मंत्री सलीम मियाँ अन्सारी के पुत्र यूनुस अन्सारी जो खुद को व्यवसायी एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत करना पसंद करता है, वह नेशनल टेलिविजन का अध्यक्ष है । अपने राजनीतिक सम्बन्धों को व्यवसायिक हितों में उपयोग करने में माहिर यूनुस की गिरफ्तारी को लेकर नेपाल प्रहरी को जबरदस्त राजनीतिक दबाव झेलना पड रहा है । गत भाद्र २४ गते भारत के मध्यप्रदेश में जाली भारतीय मुद्रा के साथ पकडे गए राजेश गुप्ता और अतीक मोहम्मद के प्रकरण में यूनुस एवं पर्व युवराज पारस को जोड कर समाचार प्रसारित किए गए थे । जिनका पर्व युवराज पारस विज्ञप्ति मार्फ खंडन कर चुके हैं । शाही खर्च एंव शाहाना जीवनशैली जी रहे यूनुस को पिता सलीम मिया अंसारी के वन तथा भू-संरक्षण मंत्री बनने के दौरान राष्ट्रीय खेलकूद परिषद मंे सदस्य के तौर पर नियुक्ति मिली थी । नेपाल कुश्ती संघ के अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय खेलकूद परिषद के सदस्य की हैसियत की वजह से तत्कालीन परिषद के संरक्षक पर्व युवराज पारस के साथ युनुस के सम्बन्ध संस्थागत तौर पर थे, लेकिन अभी तक के अनुसंधान मं युनुस के कानूनी-गैरकानूनी व्यवसाय में पर्ूव युवराज पारस की संलग्नता से अनुसंधान सूत्र इन्कार करते आए हैं ।
पुलिस के अनुसार ब्लूस्टार कँाम्प्लेक्स के रूम नम्बर ६११ का यूनुस अन्सारी से सीधा सम्बन्ध है । यह कमरा नेपाल कुश्ती संघ ने किराये पर ले रखा है, जिसका मासिक किराया १०,०००/ रुपये है । इसे नेपाल कुश्ती संघ के अध्यक्ष की हैसियत से यूनुस ने कार्यालय प्रयोजन के नाम पर प्रयोग किया है । जाली मुद्रा एवं ड्रग्स के अवैध कारोबार में शंकास्पद यूनुस लम्बे समय से पुलिस की निगरानी में था । यूनुस के उ“mचे राजनीतिक एवं आर्थिक सम्बन्धों के कारण उस पर हाथ डालना काफी चुनौतीपरूण् था, लेकिन पुलिस ठोस सबूत का इन्तजार कर रही थी ।
यूनुस के प्रारम्भिक बयानों को माना जाए तो इस गिरोह ने अब तक करीब १० करोड से ज्यादा नकली भारतीय नोट बाजार में भेजे हैं । नकली नोट पाकिस्तान से नेपाल के रास्ते होकर भारतीय बाजार में पहुँचाए जाते हंै । एक खेप में कम से कम २५ लाख नकली नोट का कारोबार होने जैसे प्रारम्भिक बयानांे के बाद अब यूनुस अपने बयानों से इन्कार तो कर ही रहा है साथ ही अब कोई भी बयान देने से मुकर रहा है । पुलिस द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में वह सिर्फमुस्कुराता है । अनुसंधान में संलग्न सूत्र की माने तो एक जाली नोट मे ६५ प्रतिशत मुनाफा होता है ।
ठमेल के रेड प्लानेट होटल से पकडे गए इकबाल एवं सज्जाद द्वारा एक दूसरे को पहचानने से इन्कार करने के बावजूद दोनांे अभियुक्तों से बरामद साधनों, उनके क्रियाकलाप एवं श्रोत के आधार पर पुष्टि होती है कि दोनों एक ही गिरोह के सदस्य हं । सज्जाद ने ९८०८२०७१५१ नम्बर के ‘मेरो मोबाईल’ के सिम से पाकिस्तान के हाजी तलाद के पाकिस्तानी नम्बर ००९२३२१२३३२३६६ के मोबाईल पर पौष १६ गते दिन के ३ बजके ५४ मिनट ५७ सेकेण्ड पर एक मिनट बात की थी । हाजी के उसी नम्बर पर इकबाल ने ९८०८३७०३०१ नम्बर से पौष १५ गते ३ बार और पौष १६ गते ३ बार फोन किया था । यूनुस के सहयोगी काशीराम अधिकारी को सूटकेश देने से पहले उनकी हाजी तलाद के साथ सांझ ७:१५ बजे २ मिनट, ८:११ बजे २ मिनट और ८:२० बजे १ मिनट बातचीत होने के रिकार्ड हैं । दोनों ने स्वीकार किया है कि वे पाकिस्तान के खारादार के निवासी हाजी के गर्ुर्गे हैं । ये दोनांे इससे पहले भी तीन चार बार नेपाल आ चुके हैं ।
हाजी तलाद अली समूह पाकिस्तान का कुख्यात ड्रग्स एवं नकली नोटों का कारोबार करने वाला गिरोह है । यूनुस का सीधा सम्बन्ध पाकिस्तानी गिरोह के साथ होने के कारण नेपाल मंे उसके ऊपर किसी व्यक्ति के होने की संभावना से पुलिस सूत्र इन्कार करती है । डी. ग्रुप के हर्ताकर्ता दाउद इब्राहीम के साथ युनुस की संलग्नता की आशंका के कारण पुलिस ने अनुसंधान शुरु किया है । भारतीय गुप्तचर एजे सी सी.बी.आई. से प्राप्त सूचना एवं नेपाल प्रहरी के अनुसंधान के आधार पर यूनुस पाकिस्तानी जासूसी संस्था आई.एस.आई. के सदस्य के रूप में सामने आया है । हालंाकि इन सभी आरोपों से यूनुस इन्कार कर रहा है । इस प्रकरण में यूनुस की श्रीमती सलमा अंसारी ने खुलकर प्रचार युद्ध शुरू कर दिया है । श्रीमती सलमा अंसारी के अनुसार यह भारतीय पक्ष का षडÞयन्त्र है जिसमें प्रतिशोध के लिए उनके पति को प+mसाने की साजिश रची गयी है । श्रीमती सलमा ने पत्रकार सम्मेलन के दौरान स्वीकार किया था कि उनके टेलिभिजन चैनल का मुख्य उद्देश्य भारत विरोधी मिशन था । ये लोग खुदको राष्ट्रवादी पक्ष के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं ।
प्ाकिस्तानी गुप्तचर संस्था से संलग्नता के आधार पर काठमाण्डू स्थित पाकिस्तानी दूतावास से किए जा रहे प्रश्नों के जवाब मंे दूतावास मौन है । नकली नोट, ड्रग्स एवं अन्य आतंककारी गतिविधि मंे पाकिस्तान सरकार के संरक्षण होने का भारतीय पक्ष का आरोप है । हालांकि वि.स. २०६० भाद्र १ गते ४५,०००/ नकली भारतीय मुद्रा के साथ पकडÞा गया पाकिस्तानी नागरिक मुस्तफा जो कि दूतावास का कर्मचारी था । २०५८ पौष १९ गते ठमेल सें ४७ हजार नकली भारतीय नोट के साथ पकडा गए पाकिस्तानी दूतावास का र्क्लर्क सिराज अहमद सिद्दकी और २०५६ में वसीम सब्बर नाम के पाकिस्तानी दूतावास के कर्मचारी को नकली नोट के साथ नेपाल प्रहरी ने गिरफ्तार किया था । लगातार नकली नोट के साथ पाकिस्तानी दूतावास के कर्मचारियों कीे गिरफ्तारी के बावजूद पाकिस्तानी दूतावास ने षडयन्त्र एवं आपत्तिजनक व्यवहार के आरोप लगाए । दूतावास के कर्मचारी एवं कूटनीतिक व्यक्तियों पर हाथ डालने के पीछे भारतीय जासूसों के षडयन्त्र होने की बात कही ।
२५ लाख ४४ हजार ५०० रुपए बराबर की नकली भारतीय मुद्रा एवं ३ किलो ७०० ग्राम ब्राउन हेरोईन के साथ रंगे हाथ धरे गए मोहम्मद सज्जाद खुराम और मोहम्मद इकबाल कानून के कटघरे मंे खडÞे होकर अपने जर्ुम की सजा का इन्तजार कर रहे हंै । लेकिन इनके बावजूद नकली नोट और ड्रग्स की सप्लाई करने वाले इस गिरोह का सरगना हाजी तलाद पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहा है । आतंकियों और अपराधियों को सरक्षण देने वाली पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. के प्रभाव के चलते नेपाल की सुरक्षा एवं अनुसंधान संस्थाओं का हाजी तलाद तक पहुँच पाना दूर की कौडÞी ले आने के बराबर है । हालांकि नकली भारतीय नोट को भारतीय बाजार तक पहु“चाकर मुनाफा कमाना ही इस गिरोह का मकसद नहीं है । नकली भारतीय मुद्रा भारतीय अर्थतंत्र की रीढÞ की हड्Þडी में प्रहार करने की साजिश तो है ही जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव नेपाल के अर्थतंत्र पर भी पडता है । साथ ही साथ नशीले ड्रग्स की भारत एवं नेपाल में आपर्ूर्ति करके जिस तरह युवा पीढी को बरवाद करने की खतरनाक साजिश रची गई है । इसके पीछे पाकिस्तान सरकार की गुप्त नीति एवं कतिपय अन्तर्रर्ााट्रय अपराधियों की संलग्नता भी महसूस की जाने लगी है ।

कोपेनहेगेन::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

kumarतपती धरती बदला मौसम और चिन्तित सारा विश्व । वातावरण के बदलते इस स्वरुप में अगर अपने सम्राट द्वारा अभिशापित यक्ष अपनी नवविवाहिता से दूर गंध मादन पर्वत पर निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा होता तो उसे अपनी प्रियतमा तक संदेश प्रेषित करने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस के काले-काले मेघ न मिलते । हाँ, उसके हाथ में सौर ऊर्जा से चालित सेलफोन या मोबाइल की परिकल्पना तो हम कर ही सकते हैं । लेकिन काले कजरारे मेघ से मोबाइल तक की इस महायात्रा में हमने भू-संशाधनों का इतना अधिक दोहन किया है कि धरती तो गर्म होने ही लगी है सदियों से हिमाच्छादित शैल-शिखर भी नग्न होने लगे हैं, बर्फा महासागर पिघलने लगा है और सागर का जलस्तर बढÞने लगा है जिससे विभिन्न देशों को तटवर्ती शहरों पर तो खतरा मँडरा ही रहा है, अनेक ऐसे देश जिसके भौगोलिक व्यक्तित्व का निर्धारण सागर की लहरे करती है, के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडराने लगे हैं । यही कारण है कि मालदीव जैसे देश ने अपने अस्तित्व के खतरे की ओर दुनिया को आकषिर्त करने के लिए सागर तल के भीतर कैबिनेट की बैठक की और नेपाल जैसे पर्वतीय देश नें हिमालय की पर्वत श्रृंखला पर । इसी समस्या का समाधान तलाशने और हमारी सुन्दर धरती को तपन और विनाश से बचाने के लिए डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन मे ७ से १८ दिसम्बर तक १९२ देशों का महाकुंभ आयोजित किया गया ।

बाढ और सूखे की समस्या मात्र हमारी नियति बन गई है । एक ही देश के हिस्से में बाढÞ तांडव नृत्य करती है और दूसरे हिस्से में सुखाड की विभीषिका होती है । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संबाहन -इसरो) नें ३ दिसम्बर २००९ को चेतावनी के लहजे में कहा कि गंगोत्री का ग्लेशियर ३० वर्षों में १.५ किलोमीटर घट गया है । हिन्दू मान्यताओं में बेहद पवित्र माने जानेवाले इस ग्लेशियर की रक्षा की जिम्मेवारी निश्चित तौर पर भारत सरकार की है लेकिन प्रकारान्तर से उसे वैश्विक स्तर पर पर्यावरण में सन्तुलन स्थापित कर के ही इस लक्ष्य को पाया जा सकता है । गत २ वर्षों में चीन में भी सूखे और बाढ की समस्या बडे पैमाने पर देखने को मिली है । इसलिए ग्लोवल वार्मिङ्ग चीन में भी बडा मुद्दा है । धरती और उसके जलवायु के चिन्ता आज सारें विश्व में देखी जा रही है । इससे पर्व सन् १९९२ में ब्राजील में हुए रियो पृथ्वी सम्मेलन
में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे युनाइटेड नेशन्स पम वर्क कन्वेन्शन अँन क्लाइमेट चेंज कहते हैं । कोपेनहेगेन में इसमें शामिल पक्षों का १५ वाँ सम्मेलन सम्पन्न हुआ है । इस बीच १९९७ में जापान में क्योटो और २००७ में इण्डोनेशिया कें बाली में हुए जलवायु सम्मेलन में अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ग्लोवल वार्मिङ को नियन्त्रित करने के प्रभावी उपायों को लागू करने पर जोड दिया गया । यह सम्मेलन उसी अभियान को आगे बढाने का विश्व स्तरीय प्रयास है । डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में ७ से १३ दिसम्बर तक चली क्लाइमेट चेन्ज कान्प|mेन्स में जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए एक अर्न्तराष्ट्रीय राजनीतिक समझौता होना    था । उस बैठक का एजेण्डा यह था कि विकसित और औद्योगिक राष्ट्र सन् २०२० तक ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्र्सजन में भारी कटौती लाने की घोषणा करें तथा विकासशील और गरीब देशों को इन खतरों से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद देने का ऐलान करें । इस बैठक में कई मुख्य लक्ष्य थे जिस में प्रमुख है कि सन् २०१२ के बाद से एक ग्लोवल क्लाइमेट एग्रिमेन्ट बनाना क्योंकि तबतक क्योटो प्रोटोकाँल खत्म हो जाएगा । इस सम्मेलन में क्लामेट पेमवर्क पर शामिल होने वाले १९२ देशों द्वारा मुहर लगाना था । इस राजनैतिक समझौते को २०१० में एक अर्न्तराष्ट्रीय संधि का रूप दिया जाना था जिसमें इसके प्रावधानों को मानना सभी राष्ट्रों के लिए कानूनी बाध्यता   होगी । इस समझौते से पृथ्वी को ग्रीन हाउस गैसों के खतरे से बचाने की जो मुहिम १९९७ के क्योटो प्रोटोकाँल से शुरु हर्इ थी उसे ठोस कार्यात्मक कदमों के साथ आगे बढाये जाने की संभावना  थी ।
लेकिन इस सम्मेलन के प्रारम्भ से ही विभिन्न खेमों में आबद्ध देशों के स्वार्थ इस रुप में टकराने लगे कि इस महासम्मेलन के परिणामों पर प्रारम्भ में हीं प्रश्न चिन्ह लगने लगा था । इस सम्मेलन में, शामिल देश तीन खेमों में बँटे हुए थे । एक ओर विभिन्न द्वीपीय देश थे जो समुंद्र तल से महज दो मीटर तक की उँचाई पर अपने अस्तित्व और जीवन का परचम लहरा रहे थे और समुंद्र के बढÞते जलस्तर से वे अपने अस्तित्व पर संकट के बादल मडÞराते हुए देख रहे थे । स्वभावतः वे इस सम्मेलन में पर्यावरण के सम्बन्ध में किसी कठोर संधि की आशा कर रहे थे जो विश्व के सभी देशों के लिए कल्याणकारी हो । दूसरी ओर वे विकसित देश थे जिन्होंने एक ओर अपने विकास यात्रा में तो पर्याप्त मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उर्त्र्सजन किया था और वर्तमान समय में भी अपने नागरिकों के ऐशो आराम की जीवन शैली के कारण कार्बन उर्त्र्सजन में महत्वपर्ण् भूमिका निभा रहे थे । ये देश विकासशील देशों को इस मुद्दो पर घेर कर पर्यावरण को अपने द्वारा पहुँचायी जा रही हानि की भरपाई करना चाहते थे । इन दोनों खेमों के देश आपस में संगठन की मुद्रा में थे । तीसरी ओर वे विकासशील देश थे जो कार्बन उर्त्र्सजन के मुद्दे पर किसी बाध्यकारी संधि के विरोध में थे और इसका अधिकतम दायित्व लेने के लिए विकसित देशों पर दबाव बनाने की मनःस्थिति मे थे और उस मुद्दे में भविष्य में होनेवाले खर्च के मद्देनजर इन देशों से दर्घकालीन स्तर पर आर्थिक सहायता की अपेक्षा कर रहे थे ।

युरोपीय संघ द्वारा विकासशील देशों पर उर्त्र्सजन में कटौती की अधिक जिम्मेदारी डालने वाला और क्योटो संधि से अधिक व्यापक प्रस्ताव पेश किया गया । लेकिन तीव्र विकास वाले विकासशील देश विशेषतः चीन, भारत, ब्राजील तथा सउदी अरब जैसे तेल उत्पादक देशों ने इस आधार पर इस का विरोध किया कि क्योटो प्रोटोकाँल से कोई भटकाव नहीं होना चाहिए जो अमेरिका को छोडÞकर अन्य औद्योगिक देशों पर कानूनी बाध्यकारी प्रतिबन्ध थोपती है । उन देशों को संदेह था की नये प्रोटोकाँल की यूरोपीय संघ का र्समर्थन क्योटो प्रोटोकाँल को कमजोर करने की साजिश भी हो सकती है । लेकिन छोटे द्वीपीय देशों के गठबन्धन का कहना था कि कोपेनहेगेन सम्मेलन में एक दस्तावेज तैयार किये जाने कि जरुरत है जो क्योटो प्रोटोकाँल से अधिक मजबूत  हो । स्वीडेन जैसे देशों का यह कथन था कि यदि हम ऐसे सम्ाझौतंे पर पहुँचते हैं जिसमें केवल क्योटो प्रोटोकाँल ही कानून बाध्यकारी होगा तो वे अपने उस मकसद को हासिल नहीं कर पायेंगे जिसकी उन्हें जरुरत   है । गौरतलब है कि सम्मेलन का महत्वपर्ूण्ा मकसद क्योटो प्रोटोकाँल को सन् २०१३ से शुरु हो रहे दूसरे प्रतिबद्धता चरण में ले जाना  था ।

इस सम्मेलन की समाप्ति एक दिन पर्व तक विश्वभर से आए वार्त्तरार विभिन्न समूहों में बँटकर समझौते का र्सवमान्य हल तलाशनें का प्रयास करते रहे लेकिन परिणाम शिफर   रहा । मुद्दा था विकसित देशों को कार्बन उर्त्र्सजन में कितने प्रतिशत की कटौती का लक्ष्य दिया  जाय । विकसित देश सन् २०२० इस्वी तक अपने कार्बन उर्त्र्सजन की दर में २० प्रतिशत तक कटौती करने के प्रति सहमत थे लेकिन विकासशील देश उस से सन्तुष्ट नहीं थे और उनकी अपेक्षा ४० प्रतिशत कटौती की थी । विकसित देशों का यह भी दृष्टिकोण था कि भारत और चीन जैसे तीव्र विकास दर वाले देशों को भी इस कटौती की सीमा में लाया जाना चाहिए । क्योंकि चीन वर्तमान समय में र्सवाधिक कार्बन उर्त्र्सजन करने वाला देश है । लेकिन ये दोनों देश उस सीमा में आना नही चहते थे क्योंकि इन्हे लम्बी विकास यात्रा तय करनी थी । इसके अतिरिक्त विकासशील देशों की यह भी अपेक्षा थी कि पर्यावरण की रक्षा एवं इससे उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए विकासशील देशों द्वारा खर्च की जानेवाली धनराशि सहायता स्वरुप दर्ीघकालीन स्तर पर उपलब्ध कर्राई जाय । इसके लिए विकसित देश सन् २०१० से अगले ३ वर्षों तक १० अरब डाँलर देने को सहमत तो थे किन्तु दर्घकालीन स्तर पर उनकी कोई ठोस योजना नहीं थी । इसपर संयुक्त राष्ट्र महासचिव वान की मून ने कहा कि विकासशील देशों को यह अपेक्षा छोडÞ देनी चाहिए कि विकसित राष्ट्र दर्घकालीन स्तर पर तत्काल कोई सहयोग की प्रतिबद्धता व्यक्त कर पाएँगे ।
पृथ्वी को हरा रखने ताकि सुन्दर श्वेत हिमालय की रक्षा हो सके का सपना लेकर कोपेनहेगेन सम्मेलन में नेपाल का प्रतिनिधित्व कर रहे नेपाल के प्रधानमन्त्री माधव कुमार नेपाल ने एक महत्वाकांक्षी और कानूनी रुप से सब के लिए बाध्यकारी होने वाले क्योटो प्रोटोकाँल सम्बन्धी समझौते को प्रस्तावित किया उन्होंने पृथ्वी के भविष्य के प्रति विश्व के ध्यानाकर्षा के साथ-साथ अल्प विकसित तथा जलवायु के कारण र्सवाधिक जोखिम में पडÞने वाले देशों पर विशेष ध्यान देने का प्रस्ताव भी विश्व के समक्ष रखा । प्रधानमन्त्री ने जोखिमग्रस्त अल्पविकसित देशों को विकसित देशों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर क्षमता अभिवृद्धि के लिए प्रविधि हस्तान्तरण और विकास में सहायता की बात कही । जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की ओर विश्व का ध्यान आकृष्ट कराने के लिए नेपाल द्वारा माउण्ट एवरेस्ट के आधार शिविर कालापत्थर -५५४२ मीटर उँचाई) पर मन्त्रिपरिषद की बैठक करने और जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी १० सूत्रीय ‘सागरमाथा घोषणा-पत्र’ जारी किये जाने की बात का भी उल्लेख किया । विश्व के बढते औसत तापमान का उल्लेख करते हुऐ श्री नेपाल ने कहा कि यह वृद्धि दर नेपाल में अधिक है और यह आगामी दिनों में इस क्षेत्र के सम्पर्ण् जल विज्ञान को प्रभावित करेगा ।

जलवायु परिवर्तन पर किसी मसौदे को अन्तिम रुप दिये जाने की जद्दो-जहद के बीच भारतीय प्रधानमन्त्री डाँ. मनमोहन सिंह ने शिखर सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारतवर्षसन् २०२० तक कार्बन उर्त्र्सजन में वर्ष२००५ की तुलना में करीब २० प्रतिशत की कटौती करने के अपने स्वेच्छिक घोषणा को हर हाल में पूरा करने के लिए वचनबद्ध है । उन्होंने कहा कि क्योटो प्रोटोकाँल के सभी पक्षों को प्रदूषणकारी तत्वों के उर्त्र्सजन में कटौती के अपने संकल्प पर अमल करना चाहिए । उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना सबसे कठिन है । डाँ. सिंह ने आगे कहा कि अगर र्समर्थनकारी वैश्विक जलवायु सन्धि हो जाए तो हम कहीं ज्यादा काम कर सकते है । भारतीय प्रधानमन्त्री के इस स्वेच्छिक कार्वन उर्त्र्सजन सम्बन्धी प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने सराहना की । ओबामा ने कहा कि भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अपका ने पहली बार बेहद महत्वपर्ण् कटौती प्रयासों को घोषित किया है और मैं इसका श्रेय उन्हे देने चाहुँगा ।

विश्वभर से आए वार्ताकारों द्वारा सहमति की बिन्दु तलाशने में विफलता, अमेरिका, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर अल्प विकसित और विकासशील देशों की असहमति पर लोगों की उम्मीदें अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा से थी लेकिन उन्होंने जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध में प्रभावित एवं निर्ण्यक कदम उठाने की बात पर अपनी ओर से कोई ठोस वचनबद्धता जाहिर नहीं की । उन्होंने स्वीकार किया कि कानूनी तौर पर बाध्यकारी संधि अनिवार्य है किन्तु इसे अन्तिम रुप देना बहुत कठिन है ।

जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगेन, परिणामों कि दृष्टि से बिल्कुल विफल रहा । इसके बावजुद भारत सहित तीन अन्य उभरती ताकतों और अमेरिका के बीच उर्त्र्सजन कटौती पर गैरबाध्यकारी सम्झौता हुआ लेकिन अधिकांश विकासशील देशों ने समझौते को आत्मघाती करार देते हुए खारिज कर दिया । वैसे कोपेनहेगेन में जो कुछ भी हुआ वह अप्रत्याशित नहीं था । क्योंकि कोपेनहेगेन वार्ता के अध्यक्ष डेनमार्क और दूसरे कई देशों ने पहले ही कह दिया था कि यहाँ कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता नहीं होगा । विकसित देश किसी भी कानूनी बाध्यता के खिलाफ थे । भारत और चीन जैसे देश इसलिए खिलाफ थे क्योंकि विकसित देश इसका बोझ उनके सिर पर डालने की मनःस्थिति में थे । इस सम्मेलन के दौरान विकसित और विकासशील देशों के रवैये ने सिद्ध कर दिया कि कोई भी अन्तर्रर्ााट्रय समझौता या संगठन तभी सफल हो सकता है जब वह कम से कम बाध्यकारी और ज्यादा से ज्यादा लचिला हो ।

यह सच है कि कोपेनहेगन सम्मेलन असफल   रहा । विकसित देशों की आरामतलबी की जिन्दगी और विकासशील देशों की विकास की सम्भावनाओं के स्वार्थ पर यह सम्मेलन असफल रहा लेकिन धरती का तापक्रम जिस रफ्तार से बढ रहा है तो इसे नियन्त्रित करने का कोई ठोस प्रयास विश्व के देशों द्वारा नहीं होगा तो उसका खामियाजा मनुष्य जाति को भुगतना हीं पडेगा । निश्चय हीं विश्व स्तर पर कानूनन् बाध्यकारी समझौता नहीं हो पाया है लेकिन हमें इस दिशा में अपना प्रयास बन्द नहीं करना चाहिए । साथ ही अपने स्तर पर पर्यावरण रक्षा की चेतना के प्रसार का प्रयास करना चाहिए अन्यथा धरती का कोप किसी भी
क्षण हमारे भविष्य को निगल सकता है ।

मधेश और इसके मुद्दे के गुमने-गुमाने का खतरा बरकरार::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

kumarमधेश की जनभावना को राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का हवाला देकर नकारने कीजो प्रवृत्ति नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में विशेषतः सत्ता में सहभागी दो प्रमुख दलों में देखी जा रही है उसे राष्ट्रहित में अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता । किसी न किसी रुप में यह एक द्वन्द्व को निमंत्रण दे रहा है और उसका खामियाजा देश के आम लोगों को भुगतना ही पडÞेगा । यह सच है कि मधेश आन्दोलन के बाद देश में निवास कर रहे दोनों वर्गों के मनोविज्ञान में परिवर्तन आया है, दोनों ही वर्गों में शत्तिः और सीमाओं का एहसास होने लगा है लेकिन चरम स्वीकार्यता के भाव का अभाव देखा जा रहा है । जिन भावनाओं को तर्राई आन्दोलन ने आवाज दी थी वह कहीं न कहीं गुम होती दिखलाई दे रही है और इसका कारण मधेशी दलों की दिशाहीन राजनीति है । अपनी डफली अपना राग की राह पर चलते हुए इन लोगों ने अपने आदमी की निराशा को जिस हद तक पहुँचाया है उसका सही अन्दाजा तो निर्वाचन या सडÞक आन्दोलन के समय में ही होगा लेकिन अभी लौटने का अवसर है ।
मधेश के मुद्दे पर नेपाल की राजनैतिक शक्तियाँ दो भाग में विभाजित है । एक बात पर यहाँ लोकपरम्परावादी राजनैतिक शक्तियाँ है जिसमें नेपाली कांग्रेस के साथ-साथ एमाले और अन्य छोटी-बडी पार्टियाँ है जो मधेश के संरचनात्मक वैशिष्ट्य को स्वीकार करने तथा देश में समानता के आधार पर अधिकार सम्पन्न करने की सोच मात्र से विदकते हैं । दूसरी ओर नेकपा माओवादी के साथ अनेकानेक मधेशी दल हैं जो मधेश प्रदेश के निर्माण के साथ-साथ मधेशियों की मुक्ति का राग अलाप रहे हैं । लेकिन इन सारे दलों में कहीं न कहीं भावगत इमानदारी का अभाव है । इसलिए उनमें से किसी भी राजनैतिक दल के प्रति आम मधेशियों की सोच सकारात्मक नहीं है और उन्हें इस बात का एहसास होने लगा है कि वे इन राजनैतिक पार्टियों द्वारा उपयोग किये जा रहे हैं । वस्तुतः अब तक की इनकी नीतियों और कार्यक्रमों ने आम लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाया है । इसका एक अन्य महत्वपर्ूण्ा कारण उनमें परस्पर छींटाकसी भी है ।
माओवादियों की यह सोच है कि मधेश आन्दोलन के बाद यहाँ उनका जनाधार घटा है । कांग्रेस और नेकपा एमाले जैसे प्रबल प्रतिद्वन्द्वियों के साथ-साथ मधेश मे नव मधेशवादी दल अपनी भग्न अवस्था के बावजूद उन्हें शिकस्त देने की स्थिति में है । इसलिए उन्होंने अपने भातृ संगठन मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का महाधिवेशन किया और अपने दल के परिचित चेहरों के साथ-साथ दूसरी पार्टियों से आये नये चेहरे को नेतृत्व पंक्ति में लाया । निश्चित ही तर्राई में अभी संगठन विस्तार उनके राजनैतिक चिंतन का प्रमुख आधार है । इस महाधिवेशन के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए माओवादी सुप्रीमो प्रचण्ड ने जहाँ नव मधेशवादी दलों को कुकुरमुत्ता और पानी का बुलबुला कहा वहीं अपनी पार्टियाँ मधेशियों का सच्चा हितैषी कहा और स्वयं को पहाडी होते हुए भी पहाडीवाद का विरोधी घोषित किया । उनके इस बात में कितनी सच्चाई है, यह बात अलग है लेकिन इतना तो बेबाकी से कहा जा सकता है कि मधेश के सर्न्दर्भ में उनकी नीतियाँ गैर मधेशी पार्टियों से अधिक गतिशील है । लेकिन उनकी इन नीतियों में बौद्धिकता का पक्ष अधिक प्रबल है । यही कारण है कि मधेश आन्दोलन का र्सवाधिक आक्रामक विरोध माओवादियों ने ही किया था । गोईत, ज्वाला और मातृका सब उनके ही कारतूस थे, किन्तु समयक्रम में अपने रास्ते अलग किये । इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि मधेश सम्बन्धी अपनी नीतियों में थोडी सी भावनात्मक का सम्मिश्रण और जनता को हथियार न बनाकर उन्हें संवेदनात्मक र्स्पर्श भी दें ।
मधेशवादी दलों की राजनीति का अपना मिजाज है उनके क्रियाकलापों से मधेश के क्षेत्रीय हितों का जितना संरक्षण हो पाया है उससे अधिक तथाकथित राष्ट्रीय हितों का संरक्षण हो रहा है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आज मधेश की राजनीति यथास्थितिवादी या अवसरवादी प्रवाह में अग्रसर है जबकि सदियों से शोषित मधेश की जनता व्रि्रोही बातों में अधिक सुकून मानती है । एक तरह से देखें तो तर्राई मधेश की सम्पर्ूण्ा राजनैतिक शक्तियाँ जो मध्यम मार्ग पर चलने का दावा करती है वे सत्ता के भीतर है और जो बाहर है वे भी दरवाजे पर दस्तक दे रही है । निश्चित है कि संविधान निर्माण आज की प्रमुख राजनैतिक आवश्यकता है और इसके लिए सहभाव और सहकार्य आवश्यक है और सरकार में शामिल होने के उनके निर्ण्र्ााको भी अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । लेकिन सवाल उठता है कि दलगत स्वार्थ की साधना के लिए आपस में कबड्डी खेल रहे ये राजनैतिक दल मधेश मे मुद्दे पर परस्पर सहमत होकर एक चर्टाई पर बैठने का प्रयास करेंगे -
आज मधेश के मुद्दों के प्रति सबसे बडÞी विडम्बना यह घटित हर्इ है कि कुछ मधेशी दल ऐसे हैं जिनमें नेतृत्व को मधेश की संवेदना का ज्ञान ही नहीं है, कुछ ऐसे हैं जिन्हें संवेदना के साथ-साथ जमीनी सच्चाई की भी पहचान है किन्तु हस्तिनापुर के प्रति अतिशय प्रतिबद्धता के कारण भीष्म पितामह सधरैय धारण किए हुए हैं । आज स्थिति यह है कि मधेश के मुद्दे पर सत्ता में सहभागी दलों ने एक ओर जहाँ अपने प्रति आम लोगों का विश्वास खोया है तो दूसरी ओर अन्तर्ररा्रीय स्तर पर विशेषतः भारतीय कूटनीति से भी अपन पक्ष बनाने में असक्षम रहे हैं मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के एक पदाधिकारी उस स्थिति को रेखांकित करते हुए यह दावा करते हैं कि मधेशियों का सच्चा हितैषी नेकपा माओवादी और उनका भातृ संगठन मरामुमो है । इस बात से पर्ूण्ातया असहमति भी नहीं जतलायी जा सकती लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि मधेश के मुद्दा उनके लिए साधन रहा है । अतीत में मधेशियों से हुए संर्घष्ा और मरामुमो के विभिन्न नेताओं का इससे निकलना इसका प्रमाण है । एक बात तो निर्विवाद है कि आज हर वह मधेशी दल जो सत्ता में सहभागिता दे रहे हैं, मानसिक कुण्ठा का शिकार है और जो बाहर है उनकी आवाजें मुखर होकर निकल रही है लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें भी सत्ता में सहभागी होने के लिए विवश कर रही है । यद्यपि उनकी अपनी शर्तें हैं और उन शर्तों को अगर सरकार मान भी लेती है तो उन्हें कार्यान्वित कराने में सरकार में शामिल होने के बाद वे कितना सक्षम हो पाते हैं यह बात समय ही बतलाएगा क्योंकि इस दृष्टि से विगत के राजनीतिक अभ्यासों में ये असफल रहे हैं । विगत में हुए ज्ञद्द सूत्रीय और ड सूत्रीय समझौतों का क्या हश्र हुआ है उसे सभी जानते हैं, वस्तुतः समझौतों के विरुद्ध समझौते करना लोकतांत्रिक नवनेपाल के सरकारों की प्रमुख विशेषता रही है । संगठित होकर भी मधेशी दल जहाँ इन समझौतों को कार्यान्वित नहीं कर पाए तो आज विखरी हर्ुइ अवस्था में कितनी सफलता हासिल कर पाएँगे कहना कठिन है ।
आज दिल्ली को नेपाली राजनीति का मक्का-मदीना कहा जा रहा है और मधेशी दलों को हज के प्रति अधिक संवेदनशील मानना यहाँ की राष्ट्रीय सोच है । लेकिन मधेश के नेतृत्व वर्ग की एक विफलता यह भी है कि यहाँ के उलेमाओं की दृष्टि में वे अपनी प्राथमिकताओं का सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं और उनके अब तक के प्रश्न-चिन्हों से जिन प्राथमिकताओं का संदेश जगजाहिर होता है इनका मार्ग कभी सरकार बचाने के नाम पर और कभी संविधान निर्माण की गम्भीरता के नाम पर प्रशस्त किया जा रहा है और इस पथ पर जब वे चल पडÞते हैं तो कहीं न कहीं मधेश की माँगंे कमजोर होती है । यह नीतिगत सिद्धान्त है कि एक लक्ष्य के अन्वेषी परस्पर मित्र होते हैं । निश्चित ही सारे मधेशी दलों का लक्ष्य अन्ततः मधेश को देश के स्तरपर उसकी पहचान की प्रतिष्ठा के साथ-साथ भेदभाव से मुक्त समानता के धरातल पर उसे स्थापित करना है । लेकिन चुनावी गणित एवं सत्ता के समीकरणों ने उन्हें परस्पर विरोधी बना दिया है । वास्तव में अगर वे मधेश की मुक्ति के सच्चे साधक है तो उन्हें परस्पर एकताबद्ध होकर तथाकथित आकाओं से यह गुहार तो करनी ही चाहिए कि उनकी प्राथमिकता मधेश की सदियों से शोषित-पीडित जनता की मुक्ति है और उनकी इस मानवीय कामना को राजनीति या कूटनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए ।
आज मधेश की राजनीति की एक प्रमुख आवश्यकता विखरी हइ राजनैतिक शक्तियों को समेटने का प्रयास है । निश्चित ही अवसर और महत्व की छोटी सी अवधि में जितना विभाजन और विखराव मधेशी दलों का हुआ है वह अप्रत्याशित है । ऐसी शक्तियों में मजफो और नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीे विभिन्न घटक है । निश्चित है कि उनकी आवाजें अभी मुखर रुप से नहीं सुनाई दे रही या उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा कारण विखराव इतना अधिक है कि आम लोग उसे पागलपन तक की संज्ञा देने लगे हैं । वस्तुतः मधेशी नेतृत्व चाहे पर्दे के बाहर का हो या भीतर का, थोडा सा महत्व प्राप्त होते ही उनकी सोच इतना व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है कि वे अपनी पार्टर् तो टूटते ही है, समान विचारधारा वाली दूसरी पार्टियों में भी सहभागी नहीं होते और अपनी-अपनी दुकान खोलकर बैठ जाते हैं । इसलिए आज जितने नेता उतने दल की स्थिति मधेशी राजनीति में बनती जा रही है । इन विखरी हर्इ शक्तियों को संगठित कर लेना मधेशी राजनीति की महत्वपर्ण् घटना होगी ।
कुल मिलाकर अब तक की परिस्थितियाँ बहुत अधिक सकारात्मक नहीं मानी जा सकती । टूट-फूट और घात-प्रतिघात के दौर से मधेशी राजनीति गुजर रही है । अपनी आवाज को कमजोर करने के खेल में ये मधेशी दल जाने-अनजाने खुद ही अधिक सक्रिय हैं और देश की तथाकथित राष्ट्रवादी शक्तियाँ लीपापोती की मनःस्थिति में है । यह सच है कि बदली हर्इ परिस्थिति में मधेश मं भी राजनैतिक तौर पर चर्चे बटोरे हैं । इसलिए इसमें अन्तर्ररा्रीय कूटनीति का भी सरोकार बढा है । इनके हाथों की कठपुतली या उनके अन्तःसंर्घष् में मधेश और इसके मुद्दे के गुमने-गुमाने का खतरा बरकरार है । इसलिए सम्यक् मार्ग की साधना हमारे नेतृत्व वर्ग के लिए अपरिहार्य है ।

अर्डर अर्डर नो हिन्दी::योगेन्द्र प्रसाद साह

Posted by admin On September - 14 - 2009 2 COMMENTS

yogendra Prasad shah2066-04-09 साल में सर्वोच्च अदालत ने एक धमाकेदार फैसला सुना दिया – जिसके चलते सुलझती शांति और नया संविधान निर्माण प्रक्रिया की तेजी में नये सिरे से दर्ुर्दिन के काले बादलों का अन्देशा पैदा होने लगा है । लोकहित में सत्य भडÞकाऊ खबरों को कायदे से ही संचार मीडिया छापता है । प्रधान न्यायाधीश मीन बहादुर रायमाझी के इजलास ने, उपराष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी भाषा में शपथ लेने को, राजा महेन्द्र शैली में अवैध घोषित करते हुए पुनः खस नेपाली भाषा में शपथ लेने का आदेश जारी कर दिया है ।
अन्तरिम संविधान काम चलाऊ है । नया संविधान बनने का सिलसिला तीव्र गति में जनप्रतिनिधियों द्वारा जारी है । इसीलिए अन्तरिम संविधान की व्याख्या करके राजनीतिक मुद्दों जिसे सुलझाने के लिये कसरत चल रहा हैं – उस पर पानी फेरना इन्साफ का तकाजा नहीं माना जा सकता है । न्यायालय का मूल उद्देश्य इन्साफ देना होता है । राजनीति करना या दुराचारी शासकों की सन्तुष्टि का आधार बनाना नहीं होता है । पाकिस्तानी पर्ूव न्यायाधीश इफि्तयार खान चौधरी ने राष्ट्रपति मर्ुशर्रफ के तानाशाही संविधान के खिलाफ फैसला सुनाकर वहाँ लोकतंत्र की स्थापना करवा दी है । न्यायाधीश अगर परिवारवादी, जातिवादी, अवसरवादी और पजेरोवादी बन जाय तब उस देश की दर्ुगति निश्चित है । थाईलैण्ड के राजा भूमिबोल सैनिक कू द्वारा भ्रष्ट प्रधानमंत्री थाक्सीन सिनेवात्रा को पदच्युत करके पुनः चुनाव द्वारा लोकतंत्र की स्थापना करवा चुके हैं । इसके विपरीत राजा महेन्द्र ने स्वार्थवश इन्साफ की परम्परा को तिलांजली देते हुए तस्करी को व्यापार घोषित किया । जनतंत्र को बन्दी बनाया, भूमिसुधार को मधेशियों को उजाडÞने का हथकंडा बनाया । न्याय प्रणाली को दरबार का दास समझा – उसका नतीजा यह निकला कि राजा महेन्द्र के परिवार से नशीली औषधी के कारोबारी निकले, कोई अफीम सेवन करने लगा, कोई राह चलते नागरिक की हत्या करने लगा और अन्त में राजा वीरेन्द्र के वंशनाश के साथ राजतंत्र समाप्त हो गया ।
भारत के रंगा-बिल्ला केस में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था । किन्तु इन्साफकर्ता को अच्छी तरह मालूम था कि हत्यारे वे दोनों ही थे । अतः सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा दे दी । सही इन्साफ उसे कहते हैं जो दोषी आत्मा से स्वीकार कर ले । इसके लिए न्यायाधीशों की आत्मा में निष्पक्ष, चरित्रवान और इन्साफ तक पहुँचने की ललक होनी चाहिए । दर्ुर्नियत वाला इन्साफ देश, समाज और आदर्श को बर्बाद करके मृत्युलोक को नरक में तब्दील कर देता है । अमेरिकी अदालत ने गलत फैसला देकर बुश को राष्ट्रपति बनवा दिया और चुनाव में जीत हासिल करने वाले अलगोर हार गए थे । इसी फैसले के नतीजे में इराक जंग आई, अमेरिकनों की मौत आई और अन्त में भारी मन्दी की मार लगी । साठ की दशक में कुछ अमेरिकन लडÞकियाँ स्लिमलेस ब्लाउज लगाकर सडÞकों पर घूमने लगी । शरीफ औरतों ने इसका पुरजोर विरोध किया । मामला अदालत में गया । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा श्रृंगार प्रसाधनों के विज्ञापन के लिए नंगीर्-अर्धनंगी लडÞकियों की जरुरत थी । बस हो गया फैसला स्लिमलेस के पक्ष में । आज स्थिति यह है कि हर तीन सेकेण्ड में एक बलात्कार की घटना घटती है । द्दछ हजार किशोर, किशोरियों से बलात्कार करके कनाडा में मार कर बर्फमें दफना दिया गया । दुश्चरित्र मां-बाप का जीन बच्चों में जाकर स्कूलों में किशोर बच्चे नरसंहार कर रहे हैं ।
भारत के दो न्यायाधीशों अरिजीत पसायत और मुकंदकम शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था – धाराओं में चिपकने से इन्साफ करने में बाधा हो रही हो तब धाराओं से चिपके रहना इन्साफ को धोखा देना है । समलिंगियों को अधिकार सृजित करने के लिए न संविधान में जगह खोजी गई न कानूनी धाराओं में । न्यायाधिशों ने तत्सम्बन्धी कानून बनाने का निर्देश दे दिया है । किसी के अधिकार को हनन से बचाने के लिए संविधान आडÞे नहीं आना चाहिए । उपराष्ट्रपति के हिन्दी शपथ प्रकरण में सर्वोच्च अदालत ने अगर संविधान संशोधन करके ज्ञट वें स्थान वाला मातृभाषा हिन्दी को प्रतिस्थापित करने का निर्देश दे दिया होता तब एक झटके में भर्ूइंफूटा वर्ग -शासकों) में दहशत फैल जाती और नया लोकतांत्रिक संविधान शीघ्र ही सही आकार ग्रहण कर लेता । यही मौका था जातिवादी, परिवारवादी और पजेरोवादी कुसंस्कार छुडÞवाने का । न्यायालय चाहे जितनी हिन्दी की उपेक्षा कर ले अंग्रेजी और हिन्दी विश्व भाषा बनी रहेगी । कार्यकारिणी की तर्ज पर नेपाली खस भाषा में उपराष्ट्रपति को सात दिनों के भीतर शपथ ग्रहण का अल्टीमेटम जैसा अदालत ने फैसला सुनाया है । वह सामाजिक सद्भाव में दरार पैदा कर सकता है । इस बात को सभी जानते है कि प्रथम फैसले से उत्पन्न द्वन्द्व की स्थिति टालने के लिए प्रधानमंत्री माधव नेपाल काफी सक्रिय थे । किन्तु न्यायाधीशों को उनका पहल रास नही आया । वे लोग जबरदस्ती पर उतर आए । इस दर्ुर्नियत वाले फैसले से लोकतंत्र का बहुत नुकसान हुआ है । प्रथम फैसले के बाद ही अपनी तीखी प्रतिक्रिया में उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने इसे दर्ुर्नियतपर्ूण्ा, दुराशययुक्त और पर्ूवाग्रही कहा है । इसी भाषा को तमलोपा, सद्भावना ओर दोनो फोरम पार्टियों ने दुहराया है । यह स्थिति की गंभीरता को उजागर करता है । उपराष्ट्रपति परमानन्द झा अगर नेपाली भाषा में शपथ लेंगे तब ही यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है । शपथ बहिष्कार के बाद सजा के भागीदार अगर वे बनाए जायेंगे तब मधेशी व्रि्रोह खुलकर सामने आ जायेगा ।
अन्तरिम संविधान का पालन क्या सिर्फमधेशी और जनजातियों को ही करना चाहिए – अब तक संविधान का आठ बार उल्लंघन हो चुका है । इन उल्लघंनों के लिए सर्वोच्च मौन क्यों है – नमूना जरा देखें । पहलीबार जेठ द्दण्टद्ध साल में संविधान सभा का चुनाव सम्पन्न करना था – नहीं हुआ । फिर अगहन द्दण्टद्ध साल में तय तिथि पर चुनाव न होकर चैत्र द्दड गते द्दण्टद्ध साल में दूसरा संविधान संशोधन द्वारा संविधान सभा का चुनाव हुआ था । दुसरा समावेशीकरण का मजाक उडÞाते हुए द्दट मनोनित सभासदों का तीन बडÞे दलों की राय से सात दलों और माओावदी ने भागबंडा कर लिया । वंचित समुदायों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो गया ।
तीसरा सभी तरह की नियुक्तियों में अंतरिम संविधान के खिलाफ निर्ण्र्ााहोता रहा है । और चौथा उपराष्ट्रपति परमानन्द झा, विजय गच्छदार, उपेन्द्र यादव, महंथ ठाकुर, राजेन्द्र महतो और हृदयेश त्रिपाठी सहित सभी मधेशी सभासदों ने हिन्दी में शपथ लिया है । पाँचवा पर्ूव प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने संविधान द्वारा निर्धारित शपथ पत्र अनुसार शपथ न लेकर जनता के नाम पर शपथ लिया था । और छठा प्रधानमंत्री माधव नेपाल ने प्रधानमंत्री के रुप मेर्ंर् इश्वर और अन्य नाम पर चुपी साधते हुए शपथ लिया था । सातवां पर्ूव प्रधानमंत्री बिना संवैधानिक हैसियत के प्रधान सेनापति रुक्मांगत कटवाल को अपने नौकर की तरह बर्खास्त कर दिया था और राष्ट्रपति ने गैर संवैधानिक तरीके से प्रधान सेनापति की पर्ुनबहाली कर दी ।
क्या अन्तरिम संविधान के धाराओं के पालन की जिम्मेवारी सिर्फमधेशवादी दलों की ही है – गिरिजा प्रसाद कोईराला ने अपने उपर लगे भ्रष्टाचार मुद्दे में सर्वोच्च अदालत के आदेश के अनुसार उपस्थित होकर बयान देने से इन्कार कर दिया था । इस पर उन पर अदालत की अवमानना का मुद्दा चल गया । किन्तु ज्यों ही गिरिजा प्रसाद प्रधानमत्री की कर्ुर्सर्ीीर बैठे सारे मुद्दे कब गायब हो गये – जनता को आज तक पता नही है । द्दण्छद्द साल भाद्र ज्ञद्द गते तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश विश्वनाथ उपाध्याय ने संविधान का अपव्याख्या करके एमाले के प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी की सरकार को गिरवा दी थी । सात वर्षों के अपने काठमांडू प्रवास के बाद लौटे समाजसेवी विद्वान जाँन फादर ने मनमोहन जी की सरकार गिरने के बाद कहा था – अगर उनकी सरकार टिक गई होती तब नेपाल प्रगति की राह पकडÞ लेता । यानि जानबूझकर संवैधानिक ट्रैक से बाहर जाकर भी खस ब्राहृमणवादी सोच, इस देश से नियोजित रुप में गरीबी नहीं हटने दे रही है । आदिवासियों के हक हित सम्बन्धी मुद्दों में सर्वोच्च अदालत ने राजनीतिक तौर पर सुलझाने का फैसला दिया था । क्या हिन्दी राजनैतिक मुद्दा नहीं है – क्या खस ब्राहृमण भगोडÞे भारतीय नहीं है – तब उनकी भाषा नेपाली कैसे हो गई – असल में र्राई, गुरुंग, कच्छारी, राउटे, शर्ेपा, लिम्बु भाषा इत्यादि ही नेपाली भाषा है । हिन्दी तर्राई की शुद्ध नेपाली भाषा है । क्या लोकगीत रचयिता कवि विद्यापति नेपाली थे – जिनके नाम पर ज्ञ करोडÞ रुपये की राशि बजट में दिया गया है – मैथिली, भोजपुरी और अवधी भी भारत में नहीं बोली जाती है -
शांति सेना में खटने वाले जवानों के वेतन और सुविधा का हिसाब सर्वोच्च अदालत मांगते रह गया – किन्तु मिला नहीं । तब सर्वोच्च अदालत की अवमानना नहीं हर्ुइ थी – विदेशों से डाँलर में प्राप्त अनुदान, कर्ज और सहयोग राशियों को जाँचने का अधिकार महा लेखापाल को नहीं दिया गया है । पहाडÞी उच्चवर्ग इस राशि को हडÞप लेता है और कर्ज चढÞता है मधेशियों, जनजातियों और दलितों पर । इस पर सर्वोच्च अदालत मौन क्यों है – संसार जानता है कि नेपाल भ्रष्ट देशों में ख्याति प्राप्त देश है । ट्रान्सपरेंसी इन्टरनेशनल ने अपनी सूची में इस देश को ज्ञद्धद्द वें स्थान पर रखा है । किन्तु एक भी प्रधानमंत्री, मंत्री, सिंह दरबार के सचिव, वरिष्ठ कर्मचारी नेता दंडित नहीं हो सका है । सर्वोच्च अदालत ही बताए कि इस देश में भ्रष्टाचारी कौन है – ठद्दण् पक्की पुल द्दण् वर्षों मी जर्ीण्ा अवस्था में पहुँच चुके हैं – इनका जिम्मेवार कौन है – जब कि पुरानी प्रविधि से बना बैरगनियाँ-ढेंग -भारत) बीच का रेल पुल ज्ञण्ण् वर्षों से आज भी कायम है । इस पर सरपट रेलगाडÞी दौड रही है । अभी कुछ दिनों पहले ही केन्द्रीय बार एशोसिएसन ने न्यायाधिशों पर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया था । इस पर बार के केन्द्रीय अध्यक्ष पर मानहानी का मुद्दा भी सर्वोच्च अदालत में दायर हुआ था । जब वकील अडÞ गये तब एक समझौता के तहत मामले को रफादफा न्यायाधीशों ने कर दिया था । कई राजनीतिक मुद्दें अदालत में काफी दिनों से विचाराधीन है – जैसे प्रधान सेनापति बर्खास्तगी प्रकरण । किन्तु जल्दीबाजी में हिन्दी प्रकरण ही क्यों सूझा -
हिन्दी भाषा वाला फैसला देशहित में नही है । इस फैसला से देश में अशान्ति फैलने का खतरा उपस्थित हो गया है । जरुरत है संविधान संशोधन करके हिन्दी को राष्ट्रभाषा में स्वीकार कर लेने की । नेपाली भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में ज्ञद्द वें स्थान पर है । भारतीय नेपाली जनजातियों में र्राई, गुरुंग, लिम्बु, लेप्चा, शर्ेपा इत्यादि मातृभाषाएं बोली जाती है । किन्तु विदेशी भाषा नेपाली को इन लोगों ने सर्म्पर्क भाषा के लिए चुन लिया है । नेपाल से हमेशा ही खस नेपाली भाषा के विद्वान भारत के दार्जिलिंग में जाकर बहुत पहले से सहयोग करते रहे हैं । इसी सिलसिले में ज्ञढद्दर्द्धर् इ. में दार्जिलिंग जाकर धरणीधर कोइराला ने एक कविता पढÞी थी – तर आफ्नो भाषा न पाई अक्क बक्क पर्छन् । चार दिन में जान्ने कुरा वर्षदिन मा सिक्छन् । -आभाष कांतिपुर द्दछ अगस्त ण्ढ) क्या यही सिद्धान्त हिन्दी पर लागू नहीं होता है – हिन्दी भाषी -तर्राई में बसने वाले) विद्वान कभी नेपाली भाषा का पुरस्कार प्राप्त करने में सफल रहे
है – नेपाली उच्च वर्ग से एक लेखक की उक्ति देखिए – खास गरी दार्जिलिंग, सिक्किम, भूटान अझ भनौं सम्पर्ूण्ा उत्तर पर्ूर्वी भारतमा रहेका विभिन्न जात र थरका नेपालीले किन नेपाली भाषा नै अपनाएका होलान् – -आभास कांतिपुर द्दछ अगस्त ण्ढ) ।
इसी तज पर मैथिली, अवधि और भोजपुरी भाषी जमात सर्म्पर्क भाषा के रुप में हिन्दी बोलता है तब अपराध कैसे हो गया – आर्श्चर्य तो यह है कि यही लेखक हिन्दी सर्म्पर्क भाषा के खिलाफ जहर उगलने से नहीं चूकते । राष्ट्रीय पोशाक और नेपाली भाषा में शपथ लेकर भी राष्ट्र के साथ राष्ट्रघात करने वालों की सूची कम नहीं है । यह देश की जनता से छिपी बात नहीं है । दबाब में राष्ट्र के हित के लिये शपथ खाने वाले का आचरण कैसा होगा – असल में हिन्दी भाषा का प्रश्न उलझाना मधेशियों के शोषण करने का हथकण्डा मात्र है । भाषा सम्बन्धी प्रश्न सर्वोच्च अदालत द्वारा संविधान सभा में सौंपा जाना चाहिए था । इस देश में रंगे हाथों पकडÞे गए नशीली औषधि के तस्करों की रिहाई हो जाती है । नाम में र्फक पडÞ जाने से जघन्य अपराधी छोडÞ दिए जाते हैं । काग के साथ पकडÞे गए और जेल सजा काट रहे अपराधियों को आम माफी मिलती है । मधेश में भूमि विवाद बढÞाने के लिए न्यायिक सहारा दिया जाता है । किस संविधान के तहत सिर्फपहाडÞी समुदाय को सुकुम्बासी मानकर तर्राई के जंगलों को उजाडÞा जा रहा है – क्या सर्वोच्च अदालत को इसका इन्साफ नहीं करना चाहिए – सुनसरी में टछ हजार निवेदनों में से ठ हजार पहाडÞी सुकुम्बासियों को लालपर्ुजा मिल चुका है । हाथियों को आवाजाही में रुकावटे आ रही है । अब सरकार ने बाली क्षतिपर्ूर्ति के रुप में ज्ञ लाख रुपये बांटने का एलान कर दिया है । यह पुरस्कार पहाडÞी सुकुम्बासियों को जंगल विनाश के लिए दिया जाने वाला है । क्या उन ठ हजार लालपर्ुजा धारियों में कच्छारी, हरिजन, थारु और मधेशी भीखमंगों से एक भी नाम सम्मिलित है -
पाँच न्यायाधीशों द्वारा अल्टीमेटम वाला हिन्दी भाषा में शपथ ग्रहण वाला फैसला मानने से उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने इन्कार कर दिया है । उनका कहना है कि – शपथ ग्रहण की भाषा मेरी होगी । सर्वोच्च अदालत को उपराष्ट्रपति पद से हटाने का संवैधानिक अधिकार नही है । तमलोपा, दोनों फोरम, सद्भावना पार्टर्ीीे साथ ही माओवादी संगठन ने हिन्दी शपथ ग्रहण को जायज माना है । न्याय समिति के माओवादी सभापति प्रभु साह की अगुवाई में द्दड सभासदों ने एक विज्ञप्ति द्वारा उपराष्ट्रपति परमानन्द के कदम का र्समर्थन किया है । भारत से जोडÞकर मधेशियों को दबाने की की कोशिशें हुयी तब दुष्परिणाम चीन, भारत और नेपाल तीनों देशों को भोगने होंगे । देखें प्रधानमंत्री माधव नेपाल परिस्थिति को गंभीरता से समझते हैं कि नहीं ।

गांव है । गांव में मुखिया है

Posted by admin On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

गांव है । गांव में मुखिया है । गांव में दुखिया है । गांव में ओझा है । गुणी है । मंतरिया -भक्ता) है । डायन है । कुल्टा है । गांव में भूत-प्रेत है । गांव में सरपन्च है । गांव में प्रपंच है । गांव में किसान है । मजदूर है, चोर है, सिपाही है । गांव में विरह है । गांव में प्रेम है । गांव में आल्हा है । गांव में लौंडा का नाच है । कोयल की कूक है । कुत्ते की भूंक है । चूडिÞयों की खनक है । पायल की छन-छन है । गोरी की तडÞपन है । पुरबा बयार है । गांव में रस की फुहार है । गांव में पहाडÞी है । गांव में मधेशी है । गांव में सुकुम्बासी है । गांव में कांग्रेस है । गांव में माओवादी है । गांव में खाओवादी है । गांव में एमाले है । गांव में तमलोपा है । गांव में फोरम है । गांव में सदभावना है । गांव में जनतांत्रिक है । गांव में साधु है । गांव में शैतान है । गांव अब गांव नही है । गांव राजनीति का अखाडÞा बन गया है । गांव जल रही है । गांव में निराशा है । गांव में अमेरिका है । गांव में भारत है । गांव में एन.जी.ओ. है । गांव में आई.एन.जी.ओ. है । गांव में नींबूपानी गायब हो गया है । गांव में अब पेप्सी, कोक है । गांव में मल्टीनेशनल है । गांव अब “ग्लोबल विलेज” बन गया है । गांव से ही आशा है । इसलिए हे कामरेड तू ग

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