8
September , 2010
Wednesday
चार और संचार जगत, पत्रिका और पत्रकार जगत, इन दोनों को मिलाकर इन दोनों जगहों पर ...
ल ही में भारत आये अपनी व्यक्तिगत यात्रा लेकिन विभिन्न राजनीतिक नेताओं से मिले मधेशी जनाधिकार फोरम ...
भारत के प्रति चीन की दर्भावना को लेकर एक और प्रश्न आम तौर पर पूछा ...
किसी भी राज्य में रहनेवाले व्यक्ति की हैसियत तथा उसके राज्य के साथ का सम्बन्ध ...
सर्र्खियों में है दलाई लामा । चीन की वजह से ही हो रहा है ...
नेपालके अग्रणी औद्यागिक घराना गोल्छार् अर्गनाइजेशन देश के उद्योग व्यवसाय के साथ-साथ समाजसेवा का विविध कार्यक्रम में ...
आउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे ...
मल्लिका बोल रही हिस्स.
मान्यवर, युगों से सुप्रसिद्ध इस आध्यात्मिक प्रागैतिहासिक नगरी जनकपुरधाम में सम्पर्ण् मधेशवादी, मधेश प्रेमी नेपाली ...
नेपाल की राजनीति आज कठिनतम दौर से गुजर रही है । नवसंविधान के निर्माण की ...
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री शत्रुघ्न प्रसाद ...
नेपाल में अन्तर्रर्रीय गिरोह के बढते शिकंजे एव व्यापारिक निवेश के चलते इन गिरोहों के ...
जनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की ...
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से यह कहते हुए केंद्र पर अनदेखी का आरोप ...
नवम्बर 5, 2009 को अमेरिका में एक हादसा हो गया । 9/11 की घटना के बाद ...
महीने तक पद पर काम करने से महरुम नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानन्द झा फिर ...
भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण ...
२००३ साल से ही लोकतंत्र और राजसंस्था में जंग की शुरूआत हर्इ थी । लेकिन ...
मगवान श्रीकृष्ण ने सोलह हजार से भी ज्यादा लडकियों से शादी रचा कर भावी युवकों ...
राजनीति’ में राजनीतिज्ञ बनी हैं। उनका ‍जो लुक है, उसे देखकर कहा जा रहा है ...
की राजनीति तो समझ में आती है, किन्तु शिक्षा में राजनीति समझ में नहीं ...
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना ...
इस आधुनिक युग की दौडÞ में किसी भी व्यक्ति के पास इतना समय नहीं ...
येष्ठ १४ की मध्य रात्रि को महत्वपर्तीन दलों ने जो तीन सूत्रीय समझौताकिया, उसे नेपाली ...
हित्यकार का व्यक्तित्व अपने ही अनुरुपविशिष्ट शैली, माध्यम और उपकरण का चयन करता है । अतएव ...
वियाना यूरोपीय देश अस्टि्रया की राजधानी है । यह राजधानी नगर अत्यंत रमणीय है । ...
पर्ूव पाँप स्टार विक्टोरिया बेकहम इस वर्षकी वर्ल्ड मोस्ट ग्लर्ैमर्स सेलिब्रिटी बनी है । मेकअप ...
नेपाल में सब से ज्यादा गाली किस को मिला - गिरिजाबाबू को । सब से ...
वह हौवा है या भगवान जो भी है अब उसके सामने चुनौती वह खुद ही ...
बाँर्तमान अन्तर्रर्रीय दृष्टिकोण के अनुसार संघीयता एक शंकास्पद विषय माना जाने लगा है । बहुत ...
गंणतंत्र दिवस के मौके पर भारत सरकार तथा भारत की जनता को बधाई दी । ...
नेपाली राजनीति में लगभग साढे छह दशक तक कोईराला अविश्रान्त कर्म योद्धा बनकर नेपाल की ...
बिहार ने विकास दर का जादुर्इ अंकडा छू लिया । किसी को यकीन नहीं । ...
नागरिकता का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आया है । मधेशवादी नेता गजेन्द्र ...

Archive for the ‘आवरण कथा’ Category

ना खुदा मिला ना विशाले सनम… ::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On June - 6 - 2010 ADD COMMENTS

काठमांडू बसन्तपुर क्षेत्र, डाक्टर, इन्जीनियर वकील, व्यवसायी, कलाकार, स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों तथा विभिन्न पेशाकर्मियों के भीड से खचाखच भरा हुआ था । यह भीड किसी दल विशेष के आहृवान पर यहाँ नही जुटी थी वह भी एकीकृत माओवादी के चौतर्फी बन्द के दौरान । अब तक काठमांडू की जनता किसी भी पार्टी बन्द का आहृवान मात्र पर ही अपने घर में बैठकर समय बिताने में ही अपने आप को सुरक्षित मानती थी लेकिन यही जनता अपना संयम एवं धर्य तथा मौनता तोडते हुए हजारों की संख्या में माओवादी बन्द का प्रतिरोध करते हुए बसंतपुर पहुँची । सात दिनांे तक अपने ही घरों में बंधक बनी जनता सरकार के लाचारिपन तथा एकीकृत माओवादी के गर्जना से ऊब गयी । मंत्रीगण के सिंहदरबार को ही अपना शैय्या बनाने के लिए विवश करने वाली माओवादियों को काठमांडू की जनता की अमन चैन की माँग के समझ नत मस्तक होना पडा और अपनी असंवैधानिक एवं असामयिक अनिश्चितकालीन हडताल को स्थगित करना पडा । अत प्रचण्ड को यह स्वीकार करना पडा की अनिश्चितकालीन बन्द हडÞताल की घोषणा करना उनकी सबसे बडी राजनैतिक भूल थी । और भविष्य में ऐसा आन्दोलन नहीं किया जायेगा ।
जब माओवादी आंदोलन शुरू करने का आहृवान किये तो उनलोगों ने इस आंदोलन को जनआन्दोलन तथा शांन्तिपर्ूण्ा आन्दोलन की संज्ञा दी । आन्दोलन आरम्भ में शांतिपर्ूण्ा दिखा भी । माओवादियों के पिछले बन्द, हडतालों, आन्दोलनों में हिंसा का जो रूप देखने को मिलता था, उससे यह आन्दोलन भिन्न जरुर लगा । कुछ हद तक अनुशासित भी रहा । लेकिन बाघ कब तक शाकाहारी बना रहेगा, जो खून मांस का स्वाद चख चुका हो वह कब तक भक्त बना रहेगा । नेपाल की शांतिप्रिय जनता को लगने लगा था कि प्रचण्ड के आहृवान में सच्चाई है अब डाकू वाल्मीकि बन गया है लेकिन यह भ्रम शीघ्र टूटने लगा । सडकों पर बैठी भूखी-प्यासी जनता मदारी के बन्दर की तरह कब तक उछल-कूद मचाती – आखिर अपने नैर्सर्गिक स्वभाव पर उतरने लगी । अपने दादागिरी वाले हाव-भाव दिखलाने लगे तो देश भर में उसका विरोध स्थानीय पीडित जनता द्वारा किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया ही कही जायेगी । कही बच्चा साँप के काटने के पश्चात उपचार के अभाव में मर रहा था तो कही गर्भवती महिला प्रसव पीडा से छटपटा रही थी तो कहीं सातों दिन चुल्हा आग का मुँह नहीं देख पाया । किस शांति सुव्यवस्था की बात माओवादी कर रहे थे । बर्दाश्त की भी हद होती है । दैनिक मजदूरी करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पालने वाले हजारों नेपाली की समझ से परे यह कथित जनआंदोलन था – किसके हित के लिए था -
खुकुरी, लाठी, डंडा, हाथ में लिये भाजते-नाचते-गाते माओवादी युवा सडकों पर जमा होकर क्या हासिल करना चाहते है – हजारों की संख्या में आये देश के विभिन्न क्षेत्रों से युवा-युवती महिला और पुरुष को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि ये माओवादी पार्टी कार्यकर्ता नहीं है । एक गरीब देश के एक पिछडे समाज के बेरोजगार, निराश, हताश जनता है जो कि दो जुन भरपेट खाने और देश की राजधानी काठमाडूं-हाँ काठमांडू जो कि दूर-दराज पहाड-तर्राई के निवासियों के लिए स्वप्निल शहर हैं । नजदीक से देखने-महसूस करने की चाह से खींचे चले आये लेकिन काठमांडू आने के बाद उन्हें हकीकत पता चला कि यहाँ तो बडे-बडे नेताओं द्वारा उन्हें ठगने का कार्य किया जा रहा है । काठमांडू की चकाचौंध बन्द हडताल ने निगल लिया । ऊपर से मौसम ने भी उनके साथ खूब आँख मिचौनी खेलना शुरू कर दिया । सैकडांे आन्दोलन में सहभागी होने वाले लोग बीमार पडÞ गये । न तो उनके रहने-खाने की उचित व्यवस्ाा थी और न उपचार की । यही कारण था कि आन्दोलन के दूसरे-तीसरे दिन से यातायात के साधन न चलने पर भी बडÞी संख्या में आन्दोलनकारी अपने घर की ओर पैदल ही उन्मुख हो गये । यह देख-सुन कर माओवादी नेताओं के होश-हवास गुम होने लगे । जिन लोगों के बल पर वे सत्ता कब्जा करने का सपना देख रहे थे वही उनका साथ छोडÞे जा रहे है, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब करें तो क्या करें । एक लाख लोगों को काठमांडू तर्थयात्रा कराने के पश्चात भी देश की सत्ता रूपी भगवान हिले तक नही दूसरी ओर बडी आशा ओर विश्वास के साथ माओवादियों के झाँसे में खींची चली आई उनकी प्यारी जनता भी उनका साथ छोड रही है । अब किस के बल पर वे राष्ट्रीय-अंतर्रर््रीय जगत पर अपना रोब जमायंेगे । इसी बीच अंतर्रर््रीय जगत से भी माओवादियों का आम हडÞताल वापस लेने हेतु उच्च दबाव पड रहा था । अभी तक किसी भी आन्दोलन में अपना जबान न खोलने की कसम खाये चीन ने भी अपना मुख खोल ही दिया और सहमति के साथ आगे बढÞने का सुझाव दे ही डाला । अब बचे भारत एवं अमेरिका । आरम्भ में भारत के राजदूत की संदेहास्पद चुप्पी का कारण माधव नेपाल को थिप्पु में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वारा पीठ ठांेक कर बढावा देना, समझी जा रही थी लेकिन वही “तुम चुप हो जरुर कोई बात है…. ।” को और रहस्यमयी बना रही थी । राजदूत के चुप्पी के पीछे माधव नेपाल को परूण्ा र्समर्थन की बात भी उछल रही थी । मई दिवस पर प्रचण्ड ने अपनी प्यारी जनता को यह जानकारी मुहैया कर्राई थी कि माधव नेपाल को हवा भरने का काम भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा की गयी है । शायद यही कारण था कि र्सतकता बरतते हुए आरम्भ में भारत की ओर से इस आन्दोलन के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की गयी, लेकिन जब खुद माओवादी नेताओं द्वारा दिल्ली दरबार में “कुछ तो बोले, मुँह अपना खोले की” गुहार लगाने हेतु दौडा-दौडी शुरू हर्ुइ, तब जाकर भारतीय नेपाल स्थित राजदूत राकेश सूद ने भारतीय दृष्टिकोण स्पष्ट किया और राष्ट्रीय सहमति तथा सहकार्य के लिए अन्य राजदूतों के साथ मिलकर माओवादी नेताओं को देश की बिगडÞती हालत जो कि उनके हठधमर्मिता एवं असमझादरी के कारण दिनों-दिन खराब होती जा रही थी, संभालने हेतु आन्दोलन वापस लेने की सलाह दी ताकि वैधानिक विधि सम्मत समस्या का समाधान की ओर सभी दल अग्रसर हो सकें ।
इस बन्द और आम हडÞताल के कारण वाणिज्य-व्यावसायिक क्षेत्र में अरबों रुपया की क्षति हर्ुइ इस बात की ओर वाणिज्य उद्योग संघ के अध्यक्ष कुशकुमार जोशी बार-बार ध्यान दिला रहे थे, उनके साथ नेपाल पत्रकार महासंघ के विशेष पहल पर तीनांे दलों के नेताओं की आपसी सहमति के लिए बैठक भी आयोजित किया गया, लेकिन दिनभर मिल-जुलकर बैठने गप-शप करने फोटो खिंचवाने के पश्चात शाम को ‘कुरा मिले को छैन’ फिर मिलेंगे ओर हाथ-हिलाते हुए अपने गन्तव्य की ओर चल दिये । इसी प्रकार इस बन्दी ने यातायात क्षेत्र को एक अरब से ज्यादा का नुकसान पहुँचाया । पर्यटन व्यवसाय हो या फलफूल तरकारी व्यवसाय कोई भी क्षेत्र बन्द के दुष्प्रभाव से वंचित नही रहा ।
देश के भविष्य कहे जानेवाले बच्चों की स्थिति तो और भी बदतर हो गयी है । कुछ दिनों पर्ूव निजी विद्यालयों का शुल्क वृद्धि के नाम पर कई दिनों तक माओवादी क्रांतिकारियों ने बंद करवाया था, किसी तरह एक-दो दिन नये वर्षमें बच्चे स्कूल का मुख देखे ही थे कि पुनः अनिश्चितकाल के लिए स्कूल बन्द । ३० हजार सामुदायिक विद्यालय तथा १० हजार निजी विद्यालय में पठन-पाठन करने वाले ८० लाख विद्यार्थियों को घर बैठना पडÞा । परीक्षाएं रद्द करनी पडÞी । एक तो यह गरीब देश, उसपर से देशी उत्पादन प्रक्रिया पर्ूण्ात ः ठप्प । एक दो-दिन की बन्दी को देशभर की आम जनता ने सभी क्षेत्रों में संयम से सहा लेकिन अनिश्चितकालीन बन्द के सातवें दिन ही जनता की धर्ैयता का अन्त हो गया । देश में आन्दोलन के विरोध में जनता उतर आई । कब तक देश की जनता त्रास, धमकी और निराशा के जाल में कैदी के रूप में पडÞी रहती । माओवादी नेतृत्व पंक्ति इस दबाव को सहन करने की स्थिति में नही रह गई थी और अपनी इज्जत बचाने हेतु, जनता में अपनी साख बनाए रखने के लिए उन्हें तो एक उचित बहाना चाहिए था- आन्दोलन स्थगित कराने का । इसलिए उनलोगों ने यह आरोप लगाया कि प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को जनता से ही लडÞाने का प्रयास कर रही है । अत ः इस को ध्यान में रखते हुए आन्दोलन स्थगित करने की घोषणा बेमन से ही सही, कर दी । वैसे इसे सत्तारुढÞ दलों की नैतिक जीत कहा जाये या त्रसित जनता की शांति की कामना करने एवं रखने वाली नेपाली जनता की जीत ।
माओवादी इस आन्दोलन का जो उद्देश्य बतला रहे थे वह शुरू से ही विरोधाभास लिये हुए था- संविधान, शांति तथा राष्ट्रीय सहमति की सरकार । प्रथम उद्देश्य संविधान निर्माण का दावा पर्ूण्ात ः बेमानी था । अगर वास्तव में माओवादी संविधान निर्माण करने के पक्ष में रहते तो सत्ता से बाहर होने के पश्चात संविधान निर्माण कार्य में जुटते, न कि संविधान सभा को महीनों तक चलने न देते । और आज की तारीख में वे सदन में बैठकर सशक्त विपक्ष की भूमिका खेलते । लेकिन अन्य बडÞे दलों की तरह उनका भी उद्देश्य मात्र सत्ता प्रात करना ही है । उन्हें जब सत्ता प्राप्त हर्ुइ थी तो उसका कदर वे नहीं कर पाये । वैसे करते भी कैसे – दस वर्षो तक जंगल में बैठकर युद्ध संचालन करने से कोई निपर्ूण्ा राजनीतिज्ञ नही बन जाता है । ये बातें एमाले-कांग्रेस को अच्छी तरह पता है और यह भी पता हैं कि सत्ता का मोह दुनिया का सब से बडÞा मोह है । इससे चिपके रहना भी उन्हें बखूबी आता है ।
प्रचण्ड का दावा है कि आन्दोलन देश में शांति स्थापना के लिए किया जा रहा था, वह भी खोखला ही साबित हो गया । आन्दोलन के माध्यम से शांति तो कही दिखी नही बल्कि पूरे देश पहाड हो या तर्राई राजधानी हो या गाँव हिंसा और अशांति के क्षेत्र के रूप में परिवर्तित होने लगा । हाँ प्रचण्ड का यह कहना है कि राष्ट्रीय सहमति की सरकार के लिए यह आन्दोलन है कुछ हद तक ठीक हैं । लेकिन कमरेड प्रचण्ड को यह भी समझना होगा कि राष्ट्रीय सहमति धमकी, डर, त्रास पैदा करके नही बनाया जा सकता । इसके लिए सबसे पहले अपनी बोली, विचार और सोच को परिमार्जित करना होगा । स्वंय का आत्मालोचना करना होगा । तभी दूसरों के सुझाव, सलाह देने लायक बन सकते है और तब विश्वास का वातावरण कायम हो सकेगा । प्रचण्ड अपने प्रत्येक भाषण में सत्तारुढÞ दलों एवं मित्र राष्ट्रों को सत्ता प्राप्ति के मार्ग में अडÞचन पैदा करने वाले मान कर हमेशा तीव्र आलोचना करते रहे हैं । ऐसी स्थिति में सहकार्य, सहमति कैसे बन सकती है – संविधान लिखना, वह भी पौने तीन करोडÞ नेपाली जनता के लिए ऐसी सोच, अहं एवं मानसिकता रखने वाले नेताओं द्वारा कैसे संभव हो सकेगा -
माओवादी नेताओं ने इस आम हडताल को जनआन्दोलन-तीन का नाम दिया । लेकिन माओवादी नेतागण यह साबित करने में पर्ूण्ातः विफल रहे है कि यह किन अर्थाें में जनआन्दोलन हैं, कोई भी आन्दोलन तभी जन आन्दोलन बन सकता हैं जबकि उसके साथ जनता की मुद्दें सीधे तौर पर उसमें समाहृति हो और आन्दोलन के नेतृत्व के प्रति जनता में विश्वास की भावना हो लेकिन एक-डेढÞ लाख जनता नेपाल की सम्पर्ूण्ा जनता का प्रतिनिधित्व नही करती है । यह बात माओवादी नेतृत्व को समझ में बसन्तपुर के शांति सभा या देश के बाकी हिस्सो मंे आयोजित शान्ति रैलियो से स्पष्ट हो गया होगा ।
२०६३-६४ का जनआन्दोलन वास्तव में सही अर्थो में जनआन्दोलन था और यही कारण था सफल भी रहा । उसमें किसी एक दल की सहभागिता नहीं थी । सम्पर्ूण्ा नेपाली जनता की सहभागिता थी । डरा-धमका, प्रलोभन देकर निरीह, शोषित पीडिÞत जनता के माध्यम से प्रचण्ड देश की सत्ता पर कब्जा करने का स्वप्न देख रहे थे जो कि किसी भी दृष्टि से उचित नही था । गलत मंशा से किया गया कोई भी कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता है । यही कारण है, प्रचण्ड की स्थिति -
ना खुदा मिला ना विशाले सनम ।
ना इधर के रहे ना उधर के हम ।।

जैसी हो गई हैं ।
प्रचण्ड माधव कुमार नेपाल की नेतृत्व वाली सरकार के हटाने के लिए तरह-तरह के व्यूह रचना करते रहे है । जबकि माधव कुमार नेपाल द्वारा शांति प्रक्रिया में दिया गया अतुलनीय योगदान के कारण संविधान सभा निर्वाचन में दो-दो निर्वाचन क्षेत्र में पराजित होने के बावजूद सभी राजनीतिक दलो के नेताओं में माधव नेपाल के प्रति सम्मान के भाव थे और इसी भाव को देखते हुए माओवादी नेता प्रचण्ड जो कि उस समय देश के प्रधानमंत्री थे, निष्त्रिmय माधव कुमार नेपाल को संवैधानिक समिति का अध्यक्ष बनने हेतु विशेष अनुग्रह कर के वापस लाये । लेकिन यह विडम्बना ही कही जायेगी की प्रचण्ड के सत्ता से बाहर होने पर माधव नेपाल को देश का बागडोर संभालना पडÞा । माधव कुमार नेपाल द्वारा जनआंदोलन एवं शांति प्रक्रिया में निभाये गये विशेष योगदान के कारण देश की जनता एवं अन्य दलों के शर्ीष्ा नेताओं को उन्हें प्रधानमंत्री के रूप मंे स्वीकारने में कोई हिचकिचाहट नहीं हर्ुइ और उनके समन्वयकारी तथा मेल-मिलाप वाली छवि के कारण संविधान निर्माण कार्य की पर्ूण्ाता की भी अपेक्षा की गयी । माओवादी के विशेष अनुरोध पर संविधान सभा में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हुए माधव नेपाल प्रधानमंत्री बनते ही उनके आँखों का काँटा बन गये । कल्प वृक्ष से विष वृक्ष दिखने लगे । लेकिन माओवादी शायद यह भूल गये कि माधव नेपाल की सरकार २२ दलों के र्समर्थन से अस्तित्व में आयी है ।
आज माधव नेपाल की सरकार को संसद में ६५ प्रतिशत सदस्यों का र्समर्थन प्राप्त होने के बावजूद उन पर विदेशी भाडे की कठपुतली सरकार की संज्ञा देना, देश की जनता द्वारा चुने गये सभासदों का खुल्लम-खुल्ला उपहास नही तो और क्या हैं – आज देश को इस संक्रमण काल के चर्माेत्कर्षपर पहुँचाने में माओवादियों का परूण्ा नही तो आधा हाथ जरुर है । आज उन पर न तो देश की जनता का न ही किसी राजनीतिक दल का न ही अंतर्रर्ाा्रीय जगत में विश्वास बन पाया है । वैसे में देश की बागडोर पुनः सौपने के पश्चात देश की स्थिति हम तो डुबेगें, सनम तुझको भी ले डुबेगें, वाली हो जायगी । इस में कोई शक नही है ।
प्रचण्ड बुद्ध के देश में पैदा हुए है जिन्होंने विश्व को अहिंसा एवं प्रेम का पाठ पढाया, सम्राट अशोक को भी बुद्ध के शरण में आना पडा । हम आशा करते हैं कि माओवादी नेता हिंसा धमकी की बातें छोडÞ अहिंसा प्रेम की ज्योति जगायंेगे, बुद्ध ने राजपद त्याग कर विश्व को जो ज्ञान दिया, उसी पथ पर चलकर अतुलनीय योगदान प्रस्तुत करें । देश की जनता भी दिखला दी है कि यह बन्द, हडÞताल हिंसायुक्त नेपाल नहीं बल्कि शांत, सुन्दर स्वच्छ नेपाल चाहती है । इसके लिए देश के सभी राजनीतिक दलों को आपसी समन्वयकारी नीति का आवलम्बन कर आगे बढÞना होगा । यह तभी संभव है जबकि सभी नेतागण तुच्छ कर्म एवं वचन से ऊपर उठंे और पिछली घटनाओं से सबक लंे । प्रचण्ड को अपनी गलती का अहसास हो गया हैं । यह बहुत बडी बात है । साथ ही, वे अपने शर्तों में जो लचकता अपनाने का संकेत दे रहे हैं वह स्वागत योग्य है । साथ ही यह आशा की जाती है कि आगे भी इसी प्रकार अपने विचारो और कार्याे में लचकता अपनाते रहेंगे । अब वास्तव में गेंद सत्तारुढÞ दलों के कोर्ट में है कि वे माओवादियों के इस लचकता को किस प्रकार सही आकार देकर देश को सहमति के आधार पर आगे ले जाये, वरना प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जो कि मौके की तलाश में हैं देश को खूनी रणक्षेत्र में बदलने के लिए, जिसका आभास शायद माओवादी नेतृत्व पंक्ति को हो चुका हैं । अब सत्तारुढ दल भी इस हकीकत को आत्मसात कर आगे बढें और देश को विनाश के भँवर से बाहर निकाल कर विकास के सही पटरी पर ले आये इसी में देश की, देश की जनता की और नेताओं की भलाई हैं ।

विरक्ति::रामभरोस कापडि भ्रमर’

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

ramvarosलीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण हो आया( सर, बहुत ही जोशीला था वह । हम दोनों सिन्धुली से पोखरा रोजी-रोटी की खोज में आये थे ।
आज से दस वर्षपर्ूव पोखरा आने के समय को स्मरण करते हुये थापा बोलता है( “साथी को सैनिक में नौकरी करने की इच्छा जागी । मेरा मन नहीं माना । उसे भी रोकने की चेष्टा की पर वह नही माना और सेना में चला गया । तालिम कर उसे काभ्रे की तरफ गश्ती में भेज दिया गया…. ।”
पोखरा-बागलुंग सडक पर साठ किलोमिटर प्रति घन्टा की गति में अपना टैक्सी दौडÞाते थापा बोलते-बोलते एकाएक रुक गया । लुम्ले के तरफ से आरहा ट्रक को पास देने के लिए वह टैक्सी को बगल में ले रहा था । ट्रक के गुजर जाने के बाद वह फिर से स्टेयरिंग को सम्भालते हुए टैक्सी को अपना स्वाभाविक लेन व गति में ले आया ।
“फिर क्या हुआ थापा -”( मैं प्रश्न करता हूँ । मेरे प्रश्न से थापा के चेहरे पर गंभीर पीडÞा बोध का भाव झलक आया( “क्या होगा सर, वह काभ्रे की तरफ जाते हुये एम्बूस में पडÞ गया… ।” एक क्षण स्टेयरिंग थरथराया । मैं डर गया, कही थापा भावविहृवल होकर अपना नियन्त्रण खो दिया तो…! कल्पना भी न कर सकने वाला परिणाम की तरफ अचानक मन को दौडÞाया । थापा तत्काल खुद को नियन्त्रण में किया । भर आयी आखों को खुला छोडÞकर स्टेयरिंग पर हाथ कसा और सडÞक पर तीव्र गति में टैक्सी दौडÞाने लगा ।
मैं एक क्षण के लिए चिन्तन में पडÞ गया । पोखरा में ब्रिटिश, भारत, सिंगापुर सेना के लिए भर्ती होने हेतु हरेक दिन युवक सब प्रशिक्षण ले रहे होते हैं । स्टेडियम में लाल, पीले कपडÞों में प्रशिक्षार्थी सब ‘जवान’ बनने के लिए ले रहे कडÞा प्रशिक्षण सेना प्रति के आकर्षा ही मानना चाहिए । पोखरा में लाहुरे लोगों के लिए दिया जाने वाला सम्मान व उनका भव्य घर आकर्षा का दूसरा कारण भी हो सकता है । सम्भवतः इसलिये भी अपना जीविका की खोजी में पोखरा आया प्रेम अपने साथी की इच्छा विपरीत सेना में भर्ती हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ । वह जनयुद्ध का समय था, खतरा तो था ही, वह गया और एम्बूस का शिकार हो गया… ।
उस घटना का कठोर छाप लीला बहादुर के मन पर पडÞा है । २६(२७ वर्षका अविवाहित युवा थापा सैनिक प्रहरी को देखते ही भयभीत व विरक्त हो जाता है । उसे लगता है वही वर्दी उसके दोस्त को उससे अलग कर दिया है… ।
मैं यात्रा के दौरान उसके मन मस्तिष्क पर जमा हुआ विरक्ति को बार-बार महसूस करता हूँ । पोखरा-बागलुंग का ७२ कि. मि. का रास्ता बिना कुछ बोले काटना खुद को सजा देने के बराबर था । और थापा का क्लांत चेहरा हमें यह सजा काटने पर विवश कर रहा था । थापा का आन्तरिक पीडÞा से मर्माहत उसका चेहरा और पत्थरों और साल के टहनियों से अवरुद्ध हो बहती सेती नदी जैसी विक्षुब्ध बहती आखें( हमें चुपचाप गन्तव्य की तरफ चलने पर मजबूर कर रहा था ।

खूनी भिडन्त

Posted by Himalini On March - 25 - 2010 ADD COMMENTS

नेपाल में अन्तर्रर्रीय गिरोह के बढते शिकंजे एव व्यापारिक निवेश के चलते इन गिरोहों के बीच खूनी भिडन्त के आसार नजर आने लगे हैं । गत फरवरी महीने की सात तारीख को काठमांडू के लाजिम्पाट मुहल्ले की व्यस्त सडक के बीच नेपाल के संचार व्यवसायी जमीम शाह की दिन के ठीक २ बज के २० मिनट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई । जबकि हत्या स्थल से सिर्फ१ कि .मी. दूरी पर स्थित राष्ट्रपति भवन में उपराष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह को मनाया जा रहा था ।
जमीम शाह की नृशंस हत्या के बाद नेपाल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न तो लगे ही, लेकिन हत्या के दूसरे दिन नेपाल के दैनिक अखबार में जिस कहानी की रचना की गई उसी कहानी को मानकर अनुसंधान आगे बढाने के कारण अपराधियांे तक पुलिस की पहुंच असम्भव होती जा रही है । नेपाल प्रहरी के मुताबिक उक्त हत्या अन्तर्रर्ट्रय गिरोह के सरगना छोटा राजन के द्वारा जमीम की हत्या की कहानी गढÞी गई है । जबकि इस काल्पनिक कहानी के अलावा नेपाल प्रहरी के पास हत्या के मुख्य कारण के बारे में पूछे जाने वाले किसी भी सवाल का जबाब नहीं है ।
अन्तर्रर्रीय सरगना दाउद इब्राहीम और छोटा राजन कुछ वर्षपहले साथ-साथ काम करते थे । बाद में आपसी मनमुटाव के चलते छोटा राजन ने अपना अलग गिरोह खडा किया । भारतीय सरकार की नजरों में दोनों ही अपराधी है और दोनों के विपक्ष में कानूनी फैसले हो चुके हैं । हालांकि दाउद इब्राहीम पाकिस्तान सरकार के संरक्षण और आश्रय में पाकिस्तान में छिपा है । लेकिन छोटा राजन भारतीय जेल मे कैद है ।
स्पेस र्टाईम नेर्टवर्क के हर्ताकर्ता जमीम शाह किसी समय आई.एस.आई और दाउद इब्राहीम के नजदीकी माने जाते थे । सूत्र बताते है कि कुछ साल पहले तक दाउद को नकली नोट और ड्रग्स का कारोबार जमीम के मार्फ हुआ करता था । लेकिन इराक में १ दर्जन नेपाली की हत्या के मामले में आक्रोशित भीड द्वारा जमीम के कार्यालय मंे की गई आगजनी के बाद जमीम का व्यवसाय धीरे-धीरे खिसकने लगा । हत्या से कुछ महीने पहले जमीम द्वारा लिए गए कर्जो को समय में न चुका पाने के कारण कर्जे के एवज में रखी गई जमीन और घर नीलाम हो चुके हैं । व्यवसायिक जीवन से असफल जमीम की हत्या में छोटा राजन की संलग्नता का कोई कारण इसलिए भी नहीं दिखता है कि विगत कई महीने पहले जमीम और छोटा राजन बीच अच्छे सम्बन्ध बन रहे थे जो कि जमीम के बैकाँक स्थित कार्यालय के प्रयास के कारण था ।
व्स्तव में नकली नोट और ड्रग्स के साथ पकडे गए यूनुस अंसारी और जमीम के बीच विगत के वर्षो से छत्तीस का आँकडा चल रहा था । कुछ साल पहले पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. द्वारा नेपाल के संचार क्षेत्र मे निवेश करने की योजना के तहत एभीन्यूज टेलिवीजन के लिए जमीम का नाम प्रस्तावित किया गया । जिस पर आपत्ति प्रकट करते हुए यूनुस के पिता सलीम मिंया अन्सारी ने एभीन्यूज का अध्यक्ष किसी सफल संचार व्यवसायी को देने की बात रखी । सलीम मिंया अन्सारी के प्रयास से ही जमीम शाह का पत्ता साफ हुआ और यूनुस अन्सारी को एभीन्यूज के बोर्ड डाइरेक्टर में प्रवेश कराने की साजिश भी रंग लाई । अपने नकली नोट और ड्रग्स के कारोबार को छीने जाने ही नही बार-बार व्यवसायिक मार्गर् में अवरोध बनने के कारण जमीम शाह दाउद और सलीम मियाँ गिरोह से नाराज रहने लगा । लेकिन अपने पैसे वापसी के दाउद के तकादे को पूरा कर पाने मे असफल जमीम ने अन्ततः मजबूरी में यूनुस के आपराधिक क्रियाकलाप एवं तस्करी की सूचना पुलिस को देनी शुरु कर दी । फलतः २५ लाख नकली भारु और साढे तीन किलो ड्रग्स के साथ यूनुस के पकडे जाने के बाद यूनुस और दाउद ने मिलकर जमीम को हत्या करा दी ।
नकली मुद्रा का कारोबार
नकली मुद्रा जिसे प्राविधिक भाषा में ‘काउन्टफिट नोट्स’ कहा जाता है, समय-समय पर अर्न्तर्राष्ट्रीय संचार माध्यमों में महत्त्वपर्ूण्ा समाचार बनकर प्रसारित होता है । नेपाल में नकली मुद्रा का प्रचलन नेपाली नोट तक ही सीमित नहीं है बल्कि नकली अमेरिकन डाँलर, नकली भारतीय करेन्सी के साथ-साथ विगत कुछ समय मेंे नकली चायनीज युयान के मामले भी सामने आने लगे है । हालाँकि नकली भारतीय नोट्स की तुलना में उपरोक्त अन्य मुद्राओं का प्रसार एवं प्रचलन नगण्य है । नेपाल राष्ट्र बैंक से प्राप्त तथ्यांक अनुसार गत वर्षनकली नेपाली मुद्रा के रूप में करीब २२८नोट नेपाल राष्ट्र बैंक सामने आए जिनमंे रु १०००/की दर के सौ, ५००/की दर के एक सौ पच्चीस और १००/ की दर के चार नोट पकडÞी गए । नेपाली मुद्रा की शुद्धता को प्रमाणित करने वाली नेपाल राष्ट्र बैंक कीे एक मात्र आधिकारिक निकाय नोट विभाग के प्रमुख के अनुसार करीब १ खरब ५३ अरब ८८ करोडÞी के नेपाली नोट निष्कासित होने की अवस्था में उक्त परिमाण मेंे बरामद नकली नोट का परिमाण नगण्य है । लेकिन एक भी नकली नोट राष्ट्रीय अर्थतंत्र के लिए खराब होता है । इसलिए नकली नोट के प्रचलन को रोकने के लिए आम उपभोक्ता को जागरुक और नोट के बारे मे जानकार होना जरूरी है ।
नेपाल प्रहरी के अपराध अनुसंधान विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार चालू आर्थिक वर्षमें अन्सारी प्रकरण के अलावा करीब २३,७१,५००/ मूल्य बराबर की नकली भारतीय मुद्रा पकडÞी गयी है, जिसमंे नकली ने.रु का मूल्य २६,०००/ और नकली अमेरिकी डँालर के रूप में २७१ नोट पकडÞी गये हैं । हाल“ाकि नेपाली मुद्रा की शुद्धता प्रमाणित करने के अलावा नेपाल राष्ट्र बैंक के पास नकली भारतीय मुद्रा एवं नकली डाँलर की घोषणा करने का अधिकार नहीं है । विदेशी मुद्रा के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया लम्बी है ।
उपरोक्त तथ्यांक के अनुसार कुछ दिन पर्ूव पकडÞे गए अन्सारी समूह से बरामद नकली भारतीय रुपये और नेपाल प्रहरी से प्राप्त चालू आर्थिक वर्षके प्रथम तिमाही मंे बरामद नकली नोटों को जोडÞा जाए तो यह एक चुनौती एव चिन्ताजनक अवस्था है । हालाँकि पुलिस को दिए गए बयानों मंे यूनुस द्वारा अब तक करीब १० करोडÞ नकली भारतीय मुद्रा भारतीय बजार में भेजे जाने की बात स्वीकार की गई है । करीब नोट मूल्य के ३५% में मिलने वाले इन नकली नोट की कमाई अपराधी पेशा लोगो को आकषिर्त करती आई हैं ।
नेपाल राष्ट्र बैंक के अनुसार नकली नेपाली नोट का गुणस्तर, सुरक्षा धागा एवं पानी छाप के अलावा नोट मे शामिल सुरक्षा उपायांे के कारण नकली नेपाली मुद्रा को सहज ही पहचाना जा सकता है । लेकिन नकली भारतीय मुद्रा के मामले मंे सेक्युरिटी पेपर से लेकर अन्य सुरक्षा उपायों की हुबहू नकल के कारण पहचान कठिन होती जा रही है । हालाँकि नेपाल राष्ट्र बैंक ने बंैक और वित्तीय संस्थाओं से उच्च स्तरीय नोट गणक मशीन रखने के निर्देशन जारी कर दिए है । लेकिन नकली भातीय मुद्रा का मामला सरकारी सहयोग से जुडÞा है और सेक्युरिटी पेपर की आपर्ूर्ति मंे पाकिस्तान सरकार सहयोग कर रही है तो निश्चय ही यह मामला पानी नाक के ऊपर पहँुचने जैसा है ।

राजनीतिक दबाब

नकली भारतीय मुद्रा और ड्रग्स के साथ रंगे हाथ पकडे गए लोगों के बयान एवं सबूतांे के आधार पर यूनुस अन्सारी के ऊपर कानूनी कारवाई की प्रक्रिया पर विभिन्न शक्ति केन्द्र अनुचित दबाव डाल रहे है । अनुसंधान मंे शामिल पुलिस सूत्रांे के अनुसार उन्हें यूनुस को बचाने के लिए राजनीतिक एवं उच्च प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड रहा है । हाला“कि पुलिस सूत्र दबाव उत्पन्न करने वाले व्यक्तियों के नाम बताने से डर रही है । लेकिन सबूत और गवाहों के बयानों को मद्देंनजर रखकर प्रहरी द्वारा तैयार की गई सिफारिश के उलट सरकारी वकील बद्री ओली ने केस को कमजोर बनाने का षडयन्त्र किया है ।
सरकारवादी केस मंे पहली बार अभियुक्त को अधिकतम सजा की सिफरिश करने के अनुभव एव नजीर के विपरीत जिला न्यायाधिवक्ता कार्यालय प्रमुख बद्री ओली ने कानून कोे दरकिनार कर नेपाल राष्ट्र बैंक के नियमानुुसार मुकदमा चलाने का निर्ण्र्ााकिया है । राष्ट्रीय कानून की तुलना में नेपाल राष्ट्र बैंक अत्यन्त कमजोर एवं अभियुक्त के पक्ष मंे माना जाता है । सूत्रांे के अनुसार जिला न्यायाधिवक्ता बद्री ओली ने केस को कमजोर करने के एवज में २५ लाख नेपाली रुपये घूस लिया है ।
निश्चय ही नकली नोट और ड्रग्स एक ही गिरोह द्वारा संचालित अपराध है लेकिन यूनुस अन्सारी को बचाने के लिए इस केस को दो भागों में बाँट दिया गया है और सम्बन्धित पक्षों के साथ साथ नेपाली जनता का ध्यान जाली नोटों में केन्द्रि त करके यूनुस को ड्रग्स के मामले मंे छूट देने के षडयंत्र रचे गए हंै । फरवरी २ तारीख को सेन्ट्रल जेल चलान कर दिए गए चारों अभियुक्तों पर नकली नोट का मुकदमा चल रहा है लेकिन ब्राउन हेरोइन के मुद्दें को अनुसंधान का विषय बनाकर इसे लम्बा खींचने की साजिश रची जा रही है । शुरुआती दृष्टि में ही ड्रग्स में यूनुस की संग्लनता के बारे में शंकित विचार व्यक्त करने वाली जांच संस्थाए अन्ततः यूनुस को ड्रग्स के मामले मंे बचाने का निर्ण्र्ााकर चुकी है ।

जहाँ चाह वहाँ राह::गुरुमत यादव

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

हाँ चाह वहाँ राह’ की कहावत को र्सार्थकता देते हुए बांके की कुछ महिलाओं ने यह प्रमाणित करके दिखा दिया है । तमाम सामाजिक संघ-संस्थाआं के वयस्कों के लिए चलाया जाने वाला कार्यक्रम अनौपचारिक प्रौढकक्षा असफल होते आ रहे समय में ही यहां की महिलाआं ने सरकारी स्कूलां जैसी विद्यालय संचालन करके दिखा दिया है । नाती-पोता को स्कूल भेजने की जिम्मेदारी निर्वाह करनेवाली उम्र की यहाँ की महिलाएं घर का अपना सारा काम निपटा कर खुद विद्यालय जाकर पढÞती है । ४८ बर्षकी मनकली खड्का को इस उम्र मं घर के काम से कही ज्यादा चिन्ता उनकी अपनी पढर्Þाई के बारे में सताती है । खडका सुबह उठकर अपनी दिनचर्या समाप्त कर के बच्चां की तरह स्कूल जाने की तैयारी में रहती है । बांके जिला के मनिकापुर गाँबिस रांझा निवासी खड्का तीन किलोमीटर की दूरी तय करके प्रति दिन स्कूल जाती है ।
उन्हें और महिलाआं जैसा काम करके बैठकर गपशप करने में दिलचस्पी नहीं है, बताती है । जितना जल्दी हो सके काम समाप्त करके वह निश्चित समय पर ही ३ कि.मी. दूर रहा कारकांदौ विद्यालय में पढने जाना जल्दी होता है ।
बचपन मं अभिभावक के द्वारा न पढाए जाने के कारण इस उम्र मं उन्हें साथियां के सामने शरमिन्दगी महसूस होने के कारण इस उम्र मं साथियांे के सामने लज्जित होना न पडे इसलिए इस उम्र मं ही स्कूल में जाकर पढÞना लिखना शुरु करना पडा । दृढ संकल्प हो तो उम्र किसी को कुछ करने के लिए बाधा उत्पन्न नहीं करता मनकली का कहना है । राजधानी मं बडा लडका इन्जीनियर और दो लडकियां एम. ए. और बी.ए. पढती है बतानेवाली खडका स्वयं अपना वर्तमान मं प्राथमिक कक्षा मं वृद्धावस्था में ४ कक्षा की किताब पढ रही है । वे कहती है, कुछ सीखने को पाती हूँ और फर्ुसत का समय भी बीत जाता है यही सोचकर स्कूल आती हूँ । खडका २०६४ साल फाल्गुन से नियमित विद्यालय मंे पढने आती है । इसी तरह ३६ वषिर्या लक्ष्मी हमाल सुबह बच्चां को स्कूल भेजने के बाद खुद अपना स्कूल जाने की बात बताती है । सुबह ४ बजे उठकर खाना बनाकर सवा सात बजे दो बच्चो को तैयार कर का बोर्डिग स्कूल भेजने के बाद घर का सारा काम करके अपना स्कूल जाती है । साथी और पडोसिया मे निरक्षर से ज्यादा साक्षर लोगां का मान सम्मान और धाक-रवाफ होने का सबलोग विश्वास करते देखकर पढने की लालसा हर्इ बताते हुए भृकुटी नगर की जानुका सिग्देल भी इस समय बच्चे बच्चियां की तरह स्वयं स्कूल जाने की रुटींग बनाने की बात बताती है । घर मं छोटा-मोटा हिसाब करने पर भी पडोसियांे का अथवा दूसरे का सहयोग लेने की समस्या से हैरान होकर में स्कूल जाकर खुद पढकर अपना हिसाब किताब करने का दृढÞता लेकर स्कूल भर्ना होने की बात सिग्देल कहती है । पिछले १ साल से विद्यालय जा रही सिग्देल अब अपना हिसाब-किताब खुद करने के साथ-साथ पडोसियांे का भी हिसाब-किताब करने और चिटठी-पत्र लिखने-पढने तक का ज्ञान पा चुकी है । बच्चों को स्कूल भेज कर खुद घर का काम खत्म कर पढने के लिए स्कूल जा रही सिग्देल मैं कम से कम उच्च शिक्षा तक पढूंगी ऐसी इच्छा प्रकट करती हैै । मनकली, लक्ष्मी और जानुका मात्र ही न होकर इस क्षेत्र मंे पहली बार महिलाओं ने स्थापना किया पौरखी महिला प्राथमिक विद्यालय मंे उन लोगों जैसी १ सौ ५० से ज्यादा महिलाएँ पढÞ रही है । बांके खास कारकादौ वार्ड नम्बर ७ शिवनगर मे रहे उस विद्यालय में १५ से ५० साल तक की महिलाएं पढÞने आती हैं ।
पढने-लिखने के उम्र मंे पढ न पाई महिलाएं और युवतियां उस स्कूल मंे पढने आ रही है विद्यालय व्यवस्थापन समिति की अध्यक्ष रुक्मिणी शर्मा बताती है । सुबह १० बजे बच्चो को विद्यालय भेजने का काम होने की वजह से महिलाओं नेे सुबह ११ बजे से लेकर अपरान्ह साढे तीन बजे तक पढने के लिए स्कूल का समय सीमा निर्धारित किया है । २०६२ साल मंे स्थानीय रुक्मिणी शर्मा नेे अपने ही पहल मंे प्रति विद्यार्थीर् एक रुपैया चन्दा उठाकर सञ्चालन किया । विद्यालय में कभी-कभी कही-कही से हल्का-फुल्का सहयोग मिल रहा है । सरकारी स्तर मंे एक कक्षा तक की स्वीकृति पाए उस विद्यालय मंे २ से ५ कक्षा तक का नि.मा.वि लग्दहवासे स्वीकृत लेकर पांच कक्ष तक पठन-पाठन कराते आए हैं । रांझा एयरपोर्टसे लेकर नेपालगंज भृकुटीनगर तक लगभग ८ कि.मी. तक की दूरी तक की महिलाएं स्कूल मंे पढने आती हैं । दूरदूर तक की महिलाएं पढÞने आ रही इस स्कूल के नाम मंे स्थान या कोई चल-अचल सम्पति तो दूर, इस स्कूल का भवन तक नहीं है । चार कोठा का कमरा भाडे मंे लेकर विद्यालय सञ्चालन किया गया है । व्यवस्थापन समिति को उन कमरों का मासिक एक हजार ४ सौ रुपैया भाडा और बत्ती का बिल अनुसार की रकम देते आ रहे हैं । विद्यालय व्यवस्थापन समिति की अध्यक्षा शर्मा दो शिक्षकांे को एक हजार पांच सौ रुपैया देकर स्कूल संचालन कर रही है । शिक्षा कार्यालय बांके ने एक शिक्षक को राहत कोटा मंे रखकर तलब देकर स्कूल को सहयोग करने की जानकारी अध्यक्षा शर्मा ने दी । जि.बि.स बांके ने बीते साल में ५० हजार सहयोग किया था तोे बांके युनेस्को क्लब १ वर्षतक के लिए १ शिक्षक का तलब बराबर का सहयोग किया था । शुरु मंे ३२ महिला विद्यार्थियों से विद्यालय सञ्चालन करने कीे जानकारी देते हुए अध्यक्षा शर्मा ने बीते दीपावली मंे भैलो खेलकर २० हजार रकम संकलन कर के शिक्षिकांे को वेतन देने की बात बतायी । “शर्मा कहती है विद्यालय को कारकांदौ गाबिस ने भी गतवर्ष२५ हजार दिया था तों इस वर्षभी २६ हजार रुपैया देने का आश्वासन दिया है ।” विद्यालय का फर्निचर का भी गा.वि.स.ने सहयोग किया है लेकिन विद्यार्थी निरन्तर वृद्धि होने के कारण व्यवस्थापन को चिन्ता बढ रही है । शुरु में सीखने आते हंै जानकार हो जाने के बाद विद्यालय छोडने की समस्या भी बनी रहती है व्यवस्थापन समिति की अध्यक्षा शर्मा ने कहा – कुछ जानकार होने के बाद कोर्स पूरा ही न करके छोडना एक समस्या ही बन गयी है ।
भवन बना देने वालेे संस्था वाले आए लेकिन भवन बनाने का स्थान न मिलने और महँगंे स्थान मंे स्थान खरीदने की रकम न होने के कारण विद्यालय का भवन निर्माण नही हो पा रहा है । दयनीय अवस्था से गुजरते हुए अच्छी अवस्था तक आ जाने के कारण सेे अब विद्यालय अच्छे ढंग से चलेगा इस बात पर व्यवस्थापन समिति विश्वस्त है । लेकिन वृद्ध महिलाओं को पढाना उतना आसान नहीं बल्कि बहुत कठिन होता है शिक्षिका दर्ुगा राना का अनुभव है । भूलने की समस्या होती है आज पढर्Þाई गयी बात भूल जाती है तो बार बार एक ही बात को रटाना पडÞता है महिलाआंे का पहल और उत्साह को देखकर जिल्ाा शिक्षा कार्यालय बांके नेे विद्यालय को पाँच कक्षा तक की स्वीकृति देने की तैयारी मंे है अध्यक्षा शर्मा ने कहा । राहत कोटा से एक शिक्षिका और कुछ पुस्तक सहयोग आ रहा है । जिला शिक्षा कार्यालय बांके के योजना अधिकृत डबल बिसी ने बताया । शिक्षा कार्यलय उस विद्यालय मंे छात्रवृत्ति भी देने की जानकारीे अधिकृत बिसीे ने दी । पढने के उम्र मंे स्कूल जाकर न पढ पाने वाले महिलाओं के लिए सरकार ने सभी के लिए शिक्षा कार्यक्रम अर्न्तगत हर जिल्ो मंे ऐसी कक्षा सञ्चालन कर रही है । विद्यालय को शिक्षा विभाग और जिला विकास समिति बांके भी सहयोग करने के लिए सोच बना रहे है ऐसा सम्बद्ध अधिकारियों ने जानकारी दी है । सभी के लिए शिक्षा कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए ऐसा ही विद्यालय ग्ांाव गांव मंे स्थापना करने का उपाय सरकार अवलम्बन करे और कारकांदांे के महिलाआंे जैसी ही उत्साह और हौसला रखकर निरक्षर महिला-पुरुष शर्मिन्दगी छोडकर स्कूल जा कर पढने के लिए तैयार हो तो देश की साक्षरता दर में तो वृद्धि होगी ही । देश कोइभी हर आदमी को निरक्षर नही रहना पडÞेगा ।

वैवाहिक रिश्तों पर आँच::मञ्चला झा

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 2 COMMENTS

किसी भी राज्य में रहनेवाले व्यक्ति की हैसियत तथा उसके राज्य के साथ का सम्बन्ध नागरिकता के अधिकार के आधार पर निर्धारित होता हैं । नागरिकता व्यक्ति की राष्ट्रीय पहचान का माध्यम हैं । किसी भी देश के नागरिक का यह मौलिक अधिकार है, जिसे पाकर ही व्यक्ति कानूनी तौर पर उस देश का नागरिक कहला सकता हैं । नेपाल में नागरिकता का इतिहास देखने से यह स्पष्ट होता है, कि यहाँ नागरिकता का मुद्दा वर्षों से विभेदपर्ण् होने के कारण विवादित रहा है । आने वाले दिनों में यह मुद्दा फिर से विवाद का विषय न बनं, संविधान सभा से आम नेपाली जनता की यही अपेक्षा है । परंतु, संविधानसभा मौलिक हक तथा राज्य निदेशक सिद्धान्त समिति ने गत माह जो नागरिकता सम्बन्धी प्रतिवेदन पेश किया है वह और भी जटिल और विभेदपर्ण् दिखता हैं । मसौदा के ४ -१) की धारा में, उल्लेखित है कि कोई भी नेपाली नागरिक विदेशी से शादी करने पर उस विदेशी पुरुष या महिला को नेपाली नागरिकता प्राप्त करने के लिए कानूनी तौर पर १५ वर्षतक नेपाल का निवासी बनकर रहना होगा । इस प्रावधान को पढकर यह स्पष्ट हो गया है कि आनेवाले दिनों में कोई भी नेपाली नागरिक यदि विदेशी के साथ शादी करं तो, उस विदेशी नागरिक को नेपाली राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए १५ वषां तक की लंबी प्रतीक्षा करनी होगी । इस दरमियान, उस विदेशी महिला या पुरुष को अपने देश की नागरिकता त्यागना होगा । उसके बाद ही वे नेपाल के अंगीकृत नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी हो सकते हैं । नागरिकता सम्बन्धी इस जटिल मसौदा ने आनवाले दिनों में वैवाहिक स्वतंत्रता पर ही पाबंदी लगा दी है । जो मानवीय मौलिक अधिकार के विरुद्ध हैं । जाहिर है कि इस प्रावधान से आने वाले दिनों में आम नेपालियों को विदेशियों से शादी करने के लिए सोचना होगा साथ ही इस से वैवाहिक रिश्तों पर भी प्रभाव पडेगा । एक ओर तो संविधान में वैवाहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख होना चाहिए इस बात की वकालत हमारी महिला अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ कर रही हं, परन्तु दूसरी ओर नागरिकता सम्बन्धी इस जटिल प्रावधान को लाने का बहस भी चल रहा है, इससे सबसे ज्यादा मार में महिला हीं रहेगी । अन्तरिम संविधान २०६३ की धारा ८ -६) में उल्लेखित नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान में इस बात की जिक्र की गई है कि कोई भी नेपाली महिला विदेशी पुरुष के साथ शादी करे तो वैवाहिक सम्बन्ध के आधार पर विदेशी पुरुष को नेपाली नागरिकता प्राप्त नहीं हो सकती । किन्तु, नेपाली पुरुष अगर विदेशी महिला से शादी करे,rama_sita तो विदेशी महिला को अंगीकृत नागरिकता प्राप्त हो सकती हैं । महिला के सम्बन्ध में उल्लेखित इस विभेदकारी प्रावधान को लेकर महिला अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ तीव्र विरोध करते हुए इस कानूनी व्यवस्था को तत्काल खारिज करने की माँग करती आ रही हैं । नये संविधान में वैवाहिक सम्बन्ध के आधार पर विदेशी पुरुष को भी नेपाली नागरिकता मिलनी चाहिए यही उनकी माँग है । परंतु, अधिकार खोजने की इस भाग दौड में स्वयं महिलाओं का ही अधिकार फिर से खो न जाए । इस के लिए महिलाओं को सजग रहने की आवश्यकता है । संख्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो विदेशी पुरुषों से शादी करने वाली नेपाली महिलाओं की तुलना में कई गुणा ज्यादा पुरुष हैं और कोई महिला जब नेपाल में बहू बनकर आएगी तो कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से उसका अपना घर नेपाल होगा किन्तु अपने ही घरों में वह १५ सालों तक राष्ट्रीय पहचान के वगैर रहे यह कैसा कानून – इस मसले पर अगर गौर से विचार किया जाए तो यह प्रावधान पहले की तुलना में और भी अधिक विभेदपर्ण् और संकरीण् दिखता है । इसके साथ ही विवाहित विदेशी महिला के नाम पर न जमीन खरीदी जा सकती है और न तो वह पति की सम्पति पर अधिकार जता सकती हैं । इस तरह तो वह महिला आर्थिक रूप से वर्षों तक कमजोर ही रहेगी । नागरिकता वगैर वह सरकारी नौकरी भी नहीं कर सकती । १५ सालों के बाद जब उसकी सरकारी नौकरी की उम्र ही गुजर जाएगी तो वह नागरिकता उसके लिए कितने मायने रख सकती है – विचारणीय हैंै ।

बहरहाल, यह मसौदा अभी बहस का विषय बना हुआ है । इस मसौदे को लेकर मधेशी सभासद के साथ ही अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ प्रतिवेदन के विरुद्ध में आवाज उठा रहीं हैं । जाहिर है कि इस प्रावधान से आनेवाले दिनों में सबसे ज्यादा मधेशी जनता ही प्रभावित होगी । क्योंकि भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में रहनेवाले तर्राई मधेश की जनता और भारतीयों के बीच सदियों से जो बेटी-रोटी का रिश्ता रहा है, उसपर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पडेÞगा । नेपाल और भारत के बीच कुटनीतिक और राजनीतिक सम्बन्धों की बुनियाद को मजबूत बनाने में वैवाहिक रिश्ता सेतु का काम कर रही है । इस बात को जानकर भी कुछ लोग इस नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान का खुलकर र्समर्थन कर रहे हैं । उनका मानना है कि नागरिकता में दी गई ढिलाई के कारण ही २०६३ साल में २५ लाख लोंगो ने इसका नजायज फायदा उठाया । गृह मंत्रालय के अभिलेख के अनुसार करीब पाँच लाख भारतीयों ने इस दरमियान नागरिकता प्राप्त की है । ‘नव नागरिकों’ के आगमन से अभी तर्राई मधेश की जमीन का भाव दुगुणा हो जाना, भारतीय नम्बर प्लेट की गाडियाँ खुलेआम सीमावर्ती क्षेत्रों में दिखाई देना इसका सांकेतिक उदाहरण है । सीमावर्ती भारतीय क्षेत्र से अधिक नेपाल में अवसर सहज होने के कारण नेपाली नागरिकता के प्रति भारतीयों का विशेष आकर्षा रहा है । अतः आने वाले दिनों में नागरिकता प्रमाण पत्र लेने के लिए आधार प्रमाणपत्र जुटाने की अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए । इसके लिए मधेशवादी दलों के साथ ही मधेश के पुराने निवासियों को भी चिन्तन करना होगा । जाहिर है, सीमा पार से आने वाले अथाह जनसागर का पहला दबाव मधेशियों पर ही पडेगा । यह एक अलग बहस का विषय है, जिस पर आम मधेशियों को विचार करना ही होगा । किन्तु इस वजह से वैवाहिक रिश्तों पर जो कुठराघात किया जा रहा है, वह र्सवथा अनुचित हैं ।

इतिहास साक्षी है नेपाल और भारत के बीच का वैवाहिक रिश्ता सदियों से चला आ रहा हैं । त्रेतायुग में मिथिला नरेश राजषिर् जनक की सुपुत्री जानकी का विवाह अयोध्या नरेश राम से होना इसका ज्वलंत उदाहरण है । इसी तरह नेपाल के लिच्छवीकालीन राजा नरेन्द्र देव के सुपुत्र शिवदेव द्वितीय का विवाह मौखरी राजा भोग वर्मा की सुपुत्री वत्सदेवी के साथ हुआ था । जयदेव द्वितीय के पशुपति अभिलेख इं. सं. ७३३ में जयदेव द्वितीय का विवाह कलिंग आसाम और कौशल के राजा हर्षेव की सुपुत्री के साथ होने की बात का उल्लेख हैं । भारत के सम्राट अशोक ने अपनी सुपुत्री चारुमति का विवाह नेपाल के क्षत्रीय देवपाल के साथ करवा कर दो मुल्कों के बीच वैवाहिक सम्बन्धों को और भी प्रगाढ बनाया था । नेपाल के तर्राई-मधेश में रहनेवाले मधेशी ही नहीं आसाम, दार्जिलिंग, सिक्किम तथा भूटान से भारी संख्या में आए नेपाली भाषियों का वैवाहिक सम्बन्ध भी भारत के साथ रहा है । साथ ही नेपाल के राणा और राज घराना परिवार का वैवाहिक सम्बन्ध भी चलता आ रहा है । किन्तु, संविधान सभा के मौलिक हक तथा राज्यनिदेशक सिद्धान्त समिति में नागरिकता के सम्बन्ध में धारा ४ -१) में जोे प्रावधान रखा गया है, उससे आने वाले दिनों में नेपाल और भारत के बीच वैवाहिक रिश्तों में आँच पहुँचने की पूरी सम्भावना दिखती है । साथ ही इससे भारत और नेपाल के बीच परम्परा से चलती आ रही वैवाहिक रिश्ते की बुनियाद डगमगा न जाए । इस के लिए सचेत रहना होगा ।

विवादों के घेरे में नागरिकता::श्रीमननारायण

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नागरिकता का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आया है । मधेशवादी नेता गजेन्द्र नारायण सिंह और उनकी पार्टि नेपाल सद्भावना पार्टर् इस मुद्दे को दो दशक तक अनवरत रूप से उठाया । जनआन्दोलन २ की सफलता के पश्चात् इसके समाधान कर्र् इमानदार प्रयास भी हुए । तकरीबन २८ लाख लोगों को नागरिकता भी मिली । इनमें अधिकांश गैर मधेशी ही हैं । माना जा रहा था कि नागरिकता के समस्या का बहुत हद तक समाधान हो चुका है परन्तु नेपाल के गैर मधेशवादी दल के नेताओं की दकियानुसी सोच ने एक बार फिर से इसे जटिल समस्या बना दिया है । संविधान सभा की मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धान्त समिति ने जो प्रतिवेदन तैयार किया है, उसमें नागरिकता प्राप्ति की प्रक्रिया को काफी जटिल बना दिया है ।

प्रतिवेदन के अनुसार नये संविधान के प्रारम्भ होने के बाद नेपाली नागरिक से विवाह करने वाले विदेशी नागरिको को विदेश की नागरिकता त्याग करने और लगातार १५ वर्षतक नेपाल में निवास करने पर ही अंगीकृत नागरिकता प्रदान किया जा सकता है । अब तक यह व्यवस्था रही है कि नेपाली नागरिक से विवाह करने वाली विदेशी महिला अपने पुराने देश की नागरिकता त्याग करने की लिखित सूचना स्थानीय अधिकारी को देती है तो वह नेपाल की नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी मानी जाऐंगी । पहले किसी विदेशी महिला को नेपाल की नागरिकता प्राप्त करना काफी सहज था । बनाए जा रहें प्रावधान के अनुसार किसी विदेशी लडकी की शादी अगर किसी नेपाली लडके से होती है तो नेपाल की नागरिकता पाने के लिए उसे १५ वर्षतक इन्तजार करना होगा । जाहिर है इन १५ वर्षों में न तो उनके नाम से नेपाल में जमीन की खरीद-बिक्री हो सकेगी और ना ही नेपाल के बैंकों में उनका खाता ही खुल सकेंगा । अगर उनके श्रीमान पाँच या दस वर्षके लिए विदेश जाऐंगे तो उनके बच्चं का नामांकन भी स्कूलां में नहीं हो सकेगा । जाहिर है १५ वर्षतक उन्हें अनागरिक होकर ही समय बिताना होगा । नेपाल एवं भारत के बीच परम्परागत बहुआयामिक सम्बन्ध है दोनों देशों का सांस्कृतिक सम्बन्ध काफी मजबूत है । वैवाहिक सम्बन्ध की शुरुआत त्रेताकाल से है । अयोध्या के राजकुमार राम की शादी जनकपुर की राजकुमारी सीता से हर्इ थी तब से लेकर आज तक लाखों-करोडों नेपाली भारतीयों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध हो चुके हं । यह सम्बन्ध साधारण परिवार से लेकर राजपरिवार तक हैं । फिर भी नये प्रावधान लागू करने का प्रयास हो रहा है तो इस के पीछे अवश्य ही किसी बडे षडयन्त्र की आशंका है । नयें प्रावधान के तहत जिन्हं नेपाल की नागरिकता नही होगी वे मताधिकार से भी वंचित होंगे, नेपाल में उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार नहीं होगा और किसी भी तरह का र्सार्वजनिक पद धारण करने के योग्य भी वे नहीं माने जाऐंगे । पहले ऐसा नही था । जिन्हें नागरिकता नहीं होती थी वे भी अपने मताधिकार का प्रयोग कर पाते थे ।

कहने के लिए नेपाल मं लोकतंत्र है, गणतन्त्र है नये कानून से जनता को मतदान करने का अधिकार भी प्राप्त नही होगा । नेपाल की तीनो बडी पार्टिया नेपाली कांग्रेस, एमाले एवं माओवादी जिनका नेतृत्व गैर मधेशवादी करते हैं ये काफी साम्प्रदायिक, संकर्ण् एवं असहिष्णु प्रवृति के हैं । नारा या भाषण में तो ये लोग काफी उदार एवं खुला दिल के दिखते हैं परन्तु व्यवहार मे नहीं । विगत मंे भी ये तीनों दल नागरिकता-समस्या का समाधान नही चाहते थे परन्तु नेपाल सद्भावना पाटी -आनन्दी) के भारी दबाव के कारण इनहें झुकना पडा था । सन् २००७ मे जब नागरिकता-समस्या का बहुत हद तक समाधान हुआ तो मधेशी विरोधियों ने यह शिगुफा निकाला कि नेपाल अब फिजी बन जाएगा तथा नेपाली भाषी लोग अल्पमत में पड जाऐंगे । कुछ कम्युनिस्टों ने तो यहा तक कहा कि ४० लाख भारतीयों को नागरिकता मिली है । जब कि यथार्थ मं २८ लाख नागरिकता ही दिये गए और उस में ६० प्रतिशत से अधिक गैर मधेशी अर्थात् नेपाली भाषी ही लाभान्वित हुए । मधेशियों को नागरिकता मिली भी तो उनकी नागरिकता समाप्ति के लिए सैकडों शिकायत पत्र भी गृह मन्त्रालय मं भेजे गये । विगत मं नागरिकता प्राप्त लोगों की भी नागरिकता अगर समाप्त कर दी जाये तो आर्श्चर्य नहीं, क्योंकि सरकार के नए प्रावधान मंे इसकी भी गुन्जाइश है । जिन्हें नागरिकता मिल चुका है उन्हें नागरिकता से वंचित करने और भविष्य में अन्य लोगों का नागरिकता नहीं देने की मुकम्मल तैयारी सरकार ने कर ली हं । कल अगर कोई भारतीय नेपाल में अपने लडकी या लडके की शादी ही न करें तो इसमें आर्श्चर्य नहीं । इस प्रावधान के कारण नेपाल एवं भारत का वर्षो पुराना सांस्कृतिक सम्बन्ध प्रभावित होगा । शायद नेपाल के गोरखाली शासकांे को लगा हो कि मधेशी का भारत के साथ सम्बन्ध अच्छा न रहें इस के लिए जरूरी है कि सांस्कृतिक सम्बन्ध पर ही हमला बोल दिया जाय ।
नागरिकता के सम्बन्ध में आए नए प्रतिवेदन से मधेशवादी दल भौचक्का रह गए है । एक ओर नये संविधान मंे अपना अधिकार सुनिश्चित कराने के लिए ये लोग कसरत कर रहे हैं तो दूसरी ओर नागरिकता सम्बन्धी नये प्रतिवेदन से पुरानी उपलब्धियों को भी खो जाने का डर हं । सरकार मं शामिल मधेशवादी दल या सरकार से बाहर के मधेशवादी दल भी लाख उछलकुद कर लें परन्तु नेपाली कांग्रेस, एमाले एव माओवादी के परर्छाई से दूर ये नही जा सकतं । काठमांडू की सत्ता सदैव उपरोक्त तीन दलां के र्इदगिर्द ही घुमती रहेगी लिहाजा मधेशवादी दल भी इन दलों से बगावत करना नही चाहेगं । नेपाल के संविधान सभा में माओवादी, एमाले एवं कांग्रेस के सदस्यो की संख्या जोडकर साढे चार सौ आंकडा पार कर जाती हैं । जो कि संविधान सभा के कुल सदस्य संख्या के तीन चौथाई के करीब है । उपरोक्त तीन दलां के सहयोग एवं र्समर्थन के बिना संविधान नहीं बन सकता है । संघीयता, नागरिकता अन्य विषय भी उपरोक्त तीन दल के मर्जी पर ही निर्भर है । नागरिकता प्राप्ति प्रक्रिया को जटिल बनाने का प्रयास काफी सोची समझी एवं गहरी साजिश का हिस्सा है ।

डाँ. संजीता सद्भावना में

Posted by Himalini On December - 2 - 2009 ADD COMMENTS

Sampadakiya
नेपाल से प्रकाशित एक मात्र हिन्दी पत्रिका हिमालिनी की संस्थापक संपादक एवं पद्मकन्या काँलेज में हिन्दी की उपप्राध्यापक डाँ. संजीता वर्मा नेपाल सद्भावना पार्टीमें शामिल हो गई हैं । कार्तिक 22 गते सद्भावना पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय में आयोजित भव्य मिलन समारोह में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा नेपाल सरकार के वाणिज्य तथा आपर्र्तिमंत्री राजेन्द्र महतो ने उन्हें सदस्यता प्रदान की । पत्रकारिता एवं हिन्दी के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में अनवरत सक्रिय रहने वाली डाँ. वर्मा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सद्भावना पार्टी से की है । आशा ही नही अपितु विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि डाँ. वर्मा नेपाल की राजनीति में अपनी संगठन क्षमता का परिचय देते हुए एक सफल महिला राजनेत्री के रुप में उभरेगी । भव्य मिलन सदस्यता ग्रहण समारोह में पार्टी सहअध्यक्ष व नेपाल सरकार के मंत्री लक्ष्मणलाल कर्ण्र्था महासचिव अनिलकुमार झा के साथ-साथ अन्य लोगों की भी उपस्थिति थी ।
अपने संस्थापक संपादक डाँ. संजीता वर्मा द्वारा राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश का हिमालिनी परिवार स्वागत करते हुए उनके उत्तरोत्तर प्रगति की कामना करती है ।

मधेश तर्राई फोरम का उदयः लक्ष्मीनारायण चौधरी

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

laxmi narayan chau_r1_c1इस राजनीतिक संगठन की स्थापना मधेश-तर्राई समेत अन्य समुदाय में राज्य द्वारा किये जाने वाले विभेद के विरुद्ध अधिकार प्राप्ति और मधेश-पहाड-हिमाल को एकसूत्र में बाँधर सियासी मतभेद मिटाते हुए नयाँ नेपाल, जो सम्पर्ण् नेपाली का हो, की अभिभारा लेते हुए किया गया है । अभीतक मधेशी, आदिवासी, जनजाति, मुसलमान, दलित, पिछड वर्ग समेत सम्पर्ूण्ा समुदाय और पेशागत संघ संगठन ने देश में आमूल परिवर्तन के लिए जनआन्दोलन करने के बावजूद आन्दोलन का सम्झौता और संशोधन के रुप में यहाँ के प्रमुख राजनीतिक पार्टर्ीीे रुपान्तरण करके अपनी निजी स्वार्थ पर्र्ति के लिए खसवादी जातीय बाहुल्यता का संविधान बार-बार निर्माण किया । मधेश जनव्रि्रोह के बाद वर्षों से आन्तरिक गुलामी कर रहे मधेश और पहाड के आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं दलित अधिकार मिलने की आशा करते थे, लेकिन मधेशी दल चाहे वह मधेश जनव्रि्रोह का पथ पर््रदर्शक मधेशी जनअधिकार फोरम हो या तर्राई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर् सद्भावना । सब मधेशी मतों और मधेशवाद का दोहन करके शहीद के शहादत का उपहास करके संविधानसभा में पहुँच तो गए मगर जिस मुद्दा को लेकर जनता की आवाज बनकर आए थे, उसी को सत्ता के लोभ और भ्रष्टाचार में डूबा गए ।
न्यायप्रेमी जनता और सम्पर्ण् शहीदों के कुरबानी का स्मरण करते हुए “मधेश तर्राई फोरम” का स्थापना किया गया ताकि जो विश्वास मधेशी दल खो दिये है, उस विश्वास को फिर से मधेशी जनता में जगाया जाए । देश में आत्म निर्ण्र्का अधिकार सहित मधेशी का राष्ट्रीय पहाचन, स्वायत्त प्रदेश की स्थापना, भाविक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता देश के सम्पर्ूण्ा अंग में चाहे वह सेना हो या प्रशासनिक या न्यायिक जनसंख्या के आधार पर संलग्नता संवैधानिक जनगणना, देश में जारी सामाजिक उत्पीडन, आर्थिक असमानता और विभेद का अन्त करते हुए सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित सब के लिए समान अधिकार, अवसर सहित विभेद रहित सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना इस संगठन का लक्ष्य है । जो अभी मधेशी दल सत्ता के प्रभुत्व को स्वीकारते हुए आपस में फुटकर जनता के सपनों का, विश्वास और मधेश की पहचान ही मिटाने में लगे हुए हैं । इस परिवेश में मधेश तर्राई फोरम एक होकर मधेशी जनता का विश्वास हासिल कर एक मजबूत शक्ति के रुप में उभर रहा है । हमारा लडर्Þाई सिर्फसमान हक, अधिकार, भाषिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता, पहचान और स्वाभिमान के लिए है । इसके लिए हम चरणवद्ध रुपमें अहिंसात्मक, बन्द रहित आन्दोलन करेंगे और इसका श्री गणेश किया गया है ।

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