ना खुदा मिला ना विशाले सनम… ::वीणा सिन्हा
काठमांडू बसन्तपुर क्षेत्र, डाक्टर, इन्जीनियर वकील, व्यवसायी, कलाकार, स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों तथा विभिन्न पेशाकर्मियों के भीड से खचाखच भरा हुआ था । यह भीड किसी दल विशेष के आहृवान पर यहाँ नही जुटी थी वह भी एकीकृत माओवादी के चौतर्फी बन्द के दौरान । अब तक काठमांडू की जनता किसी भी पार्टी बन्द का आहृवान मात्र पर ही अपने घर में बैठकर समय बिताने में ही अपने आप को सुरक्षित मानती थी लेकिन यही जनता अपना संयम एवं धर्य तथा मौनता तोडते हुए हजारों की संख्या में माओवादी बन्द का प्रतिरोध करते हुए बसंतपुर पहुँची । सात दिनांे तक अपने ही घरों में बंधक बनी जनता सरकार के लाचारिपन तथा एकीकृत माओवादी के गर्जना से ऊब गयी । मंत्रीगण के सिंहदरबार को ही अपना शैय्या बनाने के लिए विवश करने वाली माओवादियों को काठमांडू की जनता की अमन चैन की माँग के समझ नत मस्तक होना पडा और अपनी असंवैधानिक एवं असामयिक अनिश्चितकालीन हडताल को स्थगित करना पडा । अत प्रचण्ड को यह स्वीकार करना पडा की अनिश्चितकालीन बन्द हडÞताल की घोषणा करना उनकी सबसे बडी राजनैतिक भूल थी । और भविष्य में ऐसा आन्दोलन नहीं किया जायेगा ।
जब माओवादी आंदोलन शुरू करने का आहृवान किये तो उनलोगों ने इस आंदोलन को जनआन्दोलन तथा शांन्तिपर्ूण्ा आन्दोलन की संज्ञा दी । आन्दोलन आरम्भ में शांतिपर्ूण्ा दिखा भी । माओवादियों के पिछले बन्द, हडतालों, आन्दोलनों में हिंसा का जो रूप देखने को मिलता था, उससे यह आन्दोलन भिन्न जरुर लगा । कुछ हद तक अनुशासित भी रहा । लेकिन बाघ कब तक शाकाहारी बना रहेगा, जो खून मांस का स्वाद चख चुका हो वह कब तक भक्त बना रहेगा । नेपाल की शांतिप्रिय जनता को लगने लगा था कि प्रचण्ड के आहृवान में सच्चाई है अब डाकू वाल्मीकि बन गया है लेकिन यह भ्रम शीघ्र टूटने लगा । सडकों पर बैठी भूखी-प्यासी जनता मदारी के बन्दर की तरह कब तक उछल-कूद मचाती – आखिर अपने नैर्सर्गिक स्वभाव पर उतरने लगी । अपने दादागिरी वाले हाव-भाव दिखलाने लगे तो देश भर में उसका विरोध स्थानीय पीडित जनता द्वारा किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया ही कही जायेगी । कही बच्चा साँप के काटने के पश्चात उपचार के अभाव में मर रहा था तो कही गर्भवती महिला प्रसव पीडा से छटपटा रही थी तो कहीं सातों दिन चुल्हा आग का मुँह नहीं देख पाया । किस शांति सुव्यवस्था की बात माओवादी कर रहे थे । बर्दाश्त की भी हद होती है । दैनिक मजदूरी करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पालने वाले हजारों नेपाली की समझ से परे यह कथित जनआंदोलन था – किसके हित के लिए था -
खुकुरी, लाठी, डंडा, हाथ में लिये भाजते-नाचते-गाते माओवादी युवा सडकों पर जमा होकर क्या हासिल करना चाहते है – हजारों की संख्या में आये देश के विभिन्न क्षेत्रों से युवा-युवती महिला और पुरुष को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि ये माओवादी पार्टी कार्यकर्ता नहीं है । एक गरीब देश के एक पिछडे समाज के बेरोजगार, निराश, हताश जनता है जो कि दो जुन भरपेट खाने और देश की राजधानी काठमाडूं-हाँ काठमांडू जो कि दूर-दराज पहाड-तर्राई के निवासियों के लिए स्वप्निल शहर हैं । नजदीक से देखने-महसूस करने की चाह से खींचे चले आये लेकिन काठमांडू आने के बाद उन्हें हकीकत पता चला कि यहाँ तो बडे-बडे नेताओं द्वारा उन्हें ठगने का कार्य किया जा रहा है । काठमांडू की चकाचौंध बन्द हडताल ने निगल लिया । ऊपर से मौसम ने भी उनके साथ खूब आँख मिचौनी खेलना शुरू कर दिया । सैकडांे आन्दोलन में सहभागी होने वाले लोग बीमार पडÞ गये । न तो उनके रहने-खाने की उचित व्यवस्ाा थी और न उपचार की । यही कारण था कि आन्दोलन के दूसरे-तीसरे दिन से यातायात के साधन न चलने पर भी बडÞी संख्या में आन्दोलनकारी अपने घर की ओर पैदल ही उन्मुख हो गये । यह देख-सुन कर माओवादी नेताओं के होश-हवास गुम होने लगे । जिन लोगों के बल पर वे सत्ता कब्जा करने का सपना देख रहे थे वही उनका साथ छोडÞे जा रहे है, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब करें तो क्या करें । एक लाख लोगों को काठमांडू तर्थयात्रा कराने के पश्चात भी देश की सत्ता रूपी भगवान हिले तक नही दूसरी ओर बडी आशा ओर विश्वास के साथ माओवादियों के झाँसे में खींची चली आई उनकी प्यारी जनता भी उनका साथ छोड रही है । अब किस के बल पर वे राष्ट्रीय-अंतर्रर््रीय जगत पर अपना रोब जमायंेगे । इसी बीच अंतर्रर््रीय जगत से भी माओवादियों का आम हडÞताल वापस लेने हेतु उच्च दबाव पड रहा था । अभी तक किसी भी आन्दोलन में अपना जबान न खोलने की कसम खाये चीन ने भी अपना मुख खोल ही दिया और सहमति के साथ आगे बढÞने का सुझाव दे ही डाला । अब बचे भारत एवं अमेरिका । आरम्भ में भारत के राजदूत की संदेहास्पद चुप्पी का कारण माधव नेपाल को थिप्पु में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वारा पीठ ठांेक कर बढावा देना, समझी जा रही थी लेकिन वही “तुम चुप हो जरुर कोई बात है…. ।” को और रहस्यमयी बना रही थी । राजदूत के चुप्पी के पीछे माधव नेपाल को परूण्ा र्समर्थन की बात भी उछल रही थी । मई दिवस पर प्रचण्ड ने अपनी प्यारी जनता को यह जानकारी मुहैया कर्राई थी कि माधव नेपाल को हवा भरने का काम भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा की गयी है । शायद यही कारण था कि र्सतकता बरतते हुए आरम्भ में भारत की ओर से इस आन्दोलन के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की गयी, लेकिन जब खुद माओवादी नेताओं द्वारा दिल्ली दरबार में “कुछ तो बोले, मुँह अपना खोले की” गुहार लगाने हेतु दौडा-दौडी शुरू हर्ुइ, तब जाकर भारतीय नेपाल स्थित राजदूत राकेश सूद ने भारतीय दृष्टिकोण स्पष्ट किया और राष्ट्रीय सहमति तथा सहकार्य के लिए अन्य राजदूतों के साथ मिलकर माओवादी नेताओं को देश की बिगडÞती हालत जो कि उनके हठधमर्मिता एवं असमझादरी के कारण दिनों-दिन खराब होती जा रही थी, संभालने हेतु आन्दोलन वापस लेने की सलाह दी ताकि वैधानिक विधि सम्मत समस्या का समाधान की ओर सभी दल अग्रसर हो सकें ।
इस बन्द और आम हडÞताल के कारण वाणिज्य-व्यावसायिक क्षेत्र में अरबों रुपया की क्षति हर्ुइ इस बात की ओर वाणिज्य उद्योग संघ के अध्यक्ष कुशकुमार जोशी बार-बार ध्यान दिला रहे थे, उनके साथ नेपाल पत्रकार महासंघ के विशेष पहल पर तीनांे दलों के नेताओं की आपसी सहमति के लिए बैठक भी आयोजित किया गया, लेकिन दिनभर मिल-जुलकर बैठने गप-शप करने फोटो खिंचवाने के पश्चात शाम को ‘कुरा मिले को छैन’ फिर मिलेंगे ओर हाथ-हिलाते हुए अपने गन्तव्य की ओर चल दिये । इसी प्रकार इस बन्दी ने यातायात क्षेत्र को एक अरब से ज्यादा का नुकसान पहुँचाया । पर्यटन व्यवसाय हो या फलफूल तरकारी व्यवसाय कोई भी क्षेत्र बन्द के दुष्प्रभाव से वंचित नही रहा ।
देश के भविष्य कहे जानेवाले बच्चों की स्थिति तो और भी बदतर हो गयी है । कुछ दिनों पर्ूव निजी विद्यालयों का शुल्क वृद्धि के नाम पर कई दिनों तक माओवादी क्रांतिकारियों ने बंद करवाया था, किसी तरह एक-दो दिन नये वर्षमें बच्चे स्कूल का मुख देखे ही थे कि पुनः अनिश्चितकाल के लिए स्कूल बन्द । ३० हजार सामुदायिक विद्यालय तथा १० हजार निजी विद्यालय में पठन-पाठन करने वाले ८० लाख विद्यार्थियों को घर बैठना पडÞा । परीक्षाएं रद्द करनी पडÞी । एक तो यह गरीब देश, उसपर से देशी उत्पादन प्रक्रिया पर्ूण्ात ः ठप्प । एक दो-दिन की बन्दी को देशभर की आम जनता ने सभी क्षेत्रों में संयम से सहा लेकिन अनिश्चितकालीन बन्द के सातवें दिन ही जनता की धर्ैयता का अन्त हो गया । देश में आन्दोलन के विरोध में जनता उतर आई । कब तक देश की जनता त्रास, धमकी और निराशा के जाल में कैदी के रूप में पडÞी रहती । माओवादी नेतृत्व पंक्ति इस दबाव को सहन करने की स्थिति में नही रह गई थी और अपनी इज्जत बचाने हेतु, जनता में अपनी साख बनाए रखने के लिए उन्हें तो एक उचित बहाना चाहिए था- आन्दोलन स्थगित कराने का । इसलिए उनलोगों ने यह आरोप लगाया कि प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को जनता से ही लडÞाने का प्रयास कर रही है । अत ः इस को ध्यान में रखते हुए आन्दोलन स्थगित करने की घोषणा बेमन से ही सही, कर दी । वैसे इसे सत्तारुढÞ दलों की नैतिक जीत कहा जाये या त्रसित जनता की शांति की कामना करने एवं रखने वाली नेपाली जनता की जीत ।
माओवादी इस आन्दोलन का जो उद्देश्य बतला रहे थे वह शुरू से ही विरोधाभास लिये हुए था- संविधान, शांति तथा राष्ट्रीय सहमति की सरकार । प्रथम उद्देश्य संविधान निर्माण का दावा पर्ूण्ात ः बेमानी था । अगर वास्तव में माओवादी संविधान निर्माण करने के पक्ष में रहते तो सत्ता से बाहर होने के पश्चात संविधान निर्माण कार्य में जुटते, न कि संविधान सभा को महीनों तक चलने न देते । और आज की तारीख में वे सदन में बैठकर सशक्त विपक्ष की भूमिका खेलते । लेकिन अन्य बडÞे दलों की तरह उनका भी उद्देश्य मात्र सत्ता प्रात करना ही है । उन्हें जब सत्ता प्राप्त हर्ुइ थी तो उसका कदर वे नहीं कर पाये । वैसे करते भी कैसे – दस वर्षो तक जंगल में बैठकर युद्ध संचालन करने से कोई निपर्ूण्ा राजनीतिज्ञ नही बन जाता है । ये बातें एमाले-कांग्रेस को अच्छी तरह पता है और यह भी पता हैं कि सत्ता का मोह दुनिया का सब से बडÞा मोह है । इससे चिपके रहना भी उन्हें बखूबी आता है ।
प्रचण्ड का दावा है कि आन्दोलन देश में शांति स्थापना के लिए किया जा रहा था, वह भी खोखला ही साबित हो गया । आन्दोलन के माध्यम से शांति तो कही दिखी नही बल्कि पूरे देश पहाड हो या तर्राई राजधानी हो या गाँव हिंसा और अशांति के क्षेत्र के रूप में परिवर्तित होने लगा । हाँ प्रचण्ड का यह कहना है कि राष्ट्रीय सहमति की सरकार के लिए यह आन्दोलन है कुछ हद तक ठीक हैं । लेकिन कमरेड प्रचण्ड को यह भी समझना होगा कि राष्ट्रीय सहमति धमकी, डर, त्रास पैदा करके नही बनाया जा सकता । इसके लिए सबसे पहले अपनी बोली, विचार और सोच को परिमार्जित करना होगा । स्वंय का आत्मालोचना करना होगा । तभी दूसरों के सुझाव, सलाह देने लायक बन सकते है और तब विश्वास का वातावरण कायम हो सकेगा । प्रचण्ड अपने प्रत्येक भाषण में सत्तारुढÞ दलों एवं मित्र राष्ट्रों को सत्ता प्राप्ति के मार्ग में अडÞचन पैदा करने वाले मान कर हमेशा तीव्र आलोचना करते रहे हैं । ऐसी स्थिति में सहकार्य, सहमति कैसे बन सकती है – संविधान लिखना, वह भी पौने तीन करोडÞ नेपाली जनता के लिए ऐसी सोच, अहं एवं मानसिकता रखने वाले नेताओं द्वारा कैसे संभव हो सकेगा -
माओवादी नेताओं ने इस आम हडताल को जनआन्दोलन-तीन का नाम दिया । लेकिन माओवादी नेतागण यह साबित करने में पर्ूण्ातः विफल रहे है कि यह किन अर्थाें में जनआन्दोलन हैं, कोई भी आन्दोलन तभी जन आन्दोलन बन सकता हैं जबकि उसके साथ जनता की मुद्दें सीधे तौर पर उसमें समाहृति हो और आन्दोलन के नेतृत्व के प्रति जनता में विश्वास की भावना हो लेकिन एक-डेढÞ लाख जनता नेपाल की सम्पर्ूण्ा जनता का प्रतिनिधित्व नही करती है । यह बात माओवादी नेतृत्व को समझ में बसन्तपुर के शांति सभा या देश के बाकी हिस्सो मंे आयोजित शान्ति रैलियो से स्पष्ट हो गया होगा ।
२०६३-६४ का जनआन्दोलन वास्तव में सही अर्थो में जनआन्दोलन था और यही कारण था सफल भी रहा । उसमें किसी एक दल की सहभागिता नहीं थी । सम्पर्ूण्ा नेपाली जनता की सहभागिता थी । डरा-धमका, प्रलोभन देकर निरीह, शोषित पीडिÞत जनता के माध्यम से प्रचण्ड देश की सत्ता पर कब्जा करने का स्वप्न देख रहे थे जो कि किसी भी दृष्टि से उचित नही था । गलत मंशा से किया गया कोई भी कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता है । यही कारण है, प्रचण्ड की स्थिति -
ना खुदा मिला ना विशाले सनम ।
ना इधर के रहे ना उधर के हम ।।
जैसी हो गई हैं ।
प्रचण्ड माधव कुमार नेपाल की नेतृत्व वाली सरकार के हटाने के लिए तरह-तरह के व्यूह रचना करते रहे है । जबकि माधव कुमार नेपाल द्वारा शांति प्रक्रिया में दिया गया अतुलनीय योगदान के कारण संविधान सभा निर्वाचन में दो-दो निर्वाचन क्षेत्र में पराजित होने के बावजूद सभी राजनीतिक दलो के नेताओं में माधव नेपाल के प्रति सम्मान के भाव थे और इसी भाव को देखते हुए माओवादी नेता प्रचण्ड जो कि उस समय देश के प्रधानमंत्री थे, निष्त्रिmय माधव कुमार नेपाल को संवैधानिक समिति का अध्यक्ष बनने हेतु विशेष अनुग्रह कर के वापस लाये । लेकिन यह विडम्बना ही कही जायेगी की प्रचण्ड के सत्ता से बाहर होने पर माधव नेपाल को देश का बागडोर संभालना पडÞा । माधव कुमार नेपाल द्वारा जनआंदोलन एवं शांति प्रक्रिया में निभाये गये विशेष योगदान के कारण देश की जनता एवं अन्य दलों के शर्ीष्ा नेताओं को उन्हें प्रधानमंत्री के रूप मंे स्वीकारने में कोई हिचकिचाहट नहीं हर्ुइ और उनके समन्वयकारी तथा मेल-मिलाप वाली छवि के कारण संविधान निर्माण कार्य की पर्ूण्ाता की भी अपेक्षा की गयी । माओवादी के विशेष अनुरोध पर संविधान सभा में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार हुए माधव नेपाल प्रधानमंत्री बनते ही उनके आँखों का काँटा बन गये । कल्प वृक्ष से विष वृक्ष दिखने लगे । लेकिन माओवादी शायद यह भूल गये कि माधव नेपाल की सरकार २२ दलों के र्समर्थन से अस्तित्व में आयी है ।
आज माधव नेपाल की सरकार को संसद में ६५ प्रतिशत सदस्यों का र्समर्थन प्राप्त होने के बावजूद उन पर विदेशी भाडे की कठपुतली सरकार की संज्ञा देना, देश की जनता द्वारा चुने गये सभासदों का खुल्लम-खुल्ला उपहास नही तो और क्या हैं – आज देश को इस संक्रमण काल के चर्माेत्कर्षपर पहुँचाने में माओवादियों का परूण्ा नही तो आधा हाथ जरुर है । आज उन पर न तो देश की जनता का न ही किसी राजनीतिक दल का न ही अंतर्रर्ाा्रीय जगत में विश्वास बन पाया है । वैसे में देश की बागडोर पुनः सौपने के पश्चात देश की स्थिति हम तो डुबेगें, सनम तुझको भी ले डुबेगें, वाली हो जायगी । इस में कोई शक नही है ।
प्रचण्ड बुद्ध के देश में पैदा हुए है जिन्होंने विश्व को अहिंसा एवं प्रेम का पाठ पढाया, सम्राट अशोक को भी बुद्ध के शरण में आना पडा । हम आशा करते हैं कि माओवादी नेता हिंसा धमकी की बातें छोडÞ अहिंसा प्रेम की ज्योति जगायंेगे, बुद्ध ने राजपद त्याग कर विश्व को जो ज्ञान दिया, उसी पथ पर चलकर अतुलनीय योगदान प्रस्तुत करें । देश की जनता भी दिखला दी है कि यह बन्द, हडÞताल हिंसायुक्त नेपाल नहीं बल्कि शांत, सुन्दर स्वच्छ नेपाल चाहती है । इसके लिए देश के सभी राजनीतिक दलों को आपसी समन्वयकारी नीति का आवलम्बन कर आगे बढÞना होगा । यह तभी संभव है जबकि सभी नेतागण तुच्छ कर्म एवं वचन से ऊपर उठंे और पिछली घटनाओं से सबक लंे । प्रचण्ड को अपनी गलती का अहसास हो गया हैं । यह बहुत बडी बात है । साथ ही, वे अपने शर्तों में जो लचकता अपनाने का संकेत दे रहे हैं वह स्वागत योग्य है । साथ ही यह आशा की जाती है कि आगे भी इसी प्रकार अपने विचारो और कार्याे में लचकता अपनाते रहेंगे । अब वास्तव में गेंद सत्तारुढÞ दलों के कोर्ट में है कि वे माओवादियों के इस लचकता को किस प्रकार सही आकार देकर देश को सहमति के आधार पर आगे ले जाये, वरना प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जो कि मौके की तलाश में हैं देश को खूनी रणक्षेत्र में बदलने के लिए, जिसका आभास शायद माओवादी नेतृत्व पंक्ति को हो चुका हैं । अब सत्तारुढ दल भी इस हकीकत को आत्मसात कर आगे बढें और देश को विनाश के भँवर से बाहर निकाल कर विकास के सही पटरी पर ले आये इसी में देश की, देश की जनता की और नेताओं की भलाई हैं ।
































लीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण हो आया( सर, बहुत ही जोशीला था वह । हम दोनों सिन्धुली से पोखरा रोजी-रोटी की खोज में आये थे ।
तो विदेशी महिला को अंगीकृत नागरिकता प्राप्त हो सकती हैं । महिला के सम्बन्ध में उल्लेखित इस विभेदकारी प्रावधान को लेकर महिला अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ तीव्र विरोध करते हुए इस कानूनी व्यवस्था को तत्काल खारिज करने की माँग करती आ रही हैं । नये संविधान में वैवाहिक सम्बन्ध के आधार पर विदेशी पुरुष को भी नेपाली नागरिकता मिलनी चाहिए यही उनकी माँग है । परंतु, अधिकार खोजने की इस भाग दौड में स्वयं महिलाओं का ही अधिकार फिर से खो न जाए । इस के लिए महिलाओं को सजग रहने की आवश्यकता है । संख्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो विदेशी पुरुषों से शादी करने वाली नेपाली महिलाओं की तुलना में कई गुणा ज्यादा पुरुष हैं और कोई महिला जब नेपाल में बहू बनकर आएगी तो कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से उसका अपना घर नेपाल होगा किन्तु अपने ही घरों में वह १५ सालों तक राष्ट्रीय पहचान के वगैर रहे यह कैसा कानून – इस मसले पर अगर गौर से विचार किया जाए तो यह प्रावधान पहले की तुलना में और भी अधिक विभेदपर्ण् और संकरीण् दिखता है । इसके साथ ही विवाहित विदेशी महिला के नाम पर न जमीन खरीदी जा सकती है और न तो वह पति की सम्पति पर अधिकार जता सकती हैं । इस तरह तो वह महिला आर्थिक रूप से वर्षों तक कमजोर ही रहेगी । नागरिकता वगैर वह सरकारी नौकरी भी नहीं कर सकती । १५ सालों के बाद जब उसकी सरकारी नौकरी की उम्र ही गुजर जाएगी तो वह नागरिकता उसके लिए कितने मायने रख सकती है – विचारणीय हैंै ।
इस राजनीतिक संगठन की स्थापना मधेश-तर्राई समेत अन्य समुदाय में राज्य द्वारा किये जाने वाले विभेद के विरुद्ध अधिकार प्राप्ति और मधेश-पहाड-हिमाल को एकसूत्र में बाँधर सियासी मतभेद मिटाते हुए नयाँ नेपाल, जो सम्पर्ण् नेपाली का हो, की अभिभारा लेते हुए किया गया है । अभीतक मधेशी, आदिवासी, जनजाति, मुसलमान, दलित, पिछड वर्ग समेत सम्पर्ूण्ा समुदाय और पेशागत संघ संगठन ने देश में आमूल परिवर्तन के लिए जनआन्दोलन करने के बावजूद आन्दोलन का सम्झौता और संशोधन के रुप में यहाँ के प्रमुख राजनीतिक पार्टर्ीीे रुपान्तरण करके अपनी निजी स्वार्थ पर्र्ति के लिए खसवादी जातीय बाहुल्यता का संविधान बार-बार निर्माण किया । मधेश जनव्रि्रोह के बाद वर्षों से आन्तरिक गुलामी कर रहे मधेश और पहाड के आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं दलित अधिकार मिलने की आशा करते थे, लेकिन मधेशी दल चाहे वह मधेश जनव्रि्रोह का पथ पर््रदर्शक मधेशी जनअधिकार फोरम हो या तर्राई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर् सद्भावना । सब मधेशी मतों और मधेशवाद का दोहन करके शहीद के शहादत का उपहास करके संविधानसभा में पहुँच तो गए मगर जिस मुद्दा को लेकर जनता की आवाज बनकर आए थे, उसी को सत्ता के लोभ और भ्रष्टाचार में डूबा गए ।
