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September , 2010
Wednesday
हाँ चाह वहाँ राह' की कहावत को र्सार्थकता देते हुए बांके की कुछ महिलाओं ने ...
स्कृत नेपाल की ही नहीं अपितु सम्पर्ूण्ा विश्व की क्रान्तिचेता संास्कृतिक भाषा है । विश्व ...
ल ही में भारत आये अपनी व्यक्तिगत यात्रा लेकिन विभिन्न राजनीतिक नेताओं से मिले मधेशी जनाधिकार फोरम ...
नवर्निमाण में छात्र-युवाओं की भूमिका महत्वपर्ण् होती है । इतिहास गवाह है कि युवाओं ने ...
राजधानी काठमांडू के अन्नपूर्ण होटल में भारत -नेपाल मैत्री समाज द्वारा नेपाल भारत सम्बन्ध वर्त्तमान ...
टुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर ...
नेपालगन्ज के वरिष्ठ समाजसेवी तथा उद्योगपति कृष्णगोपाल टंडन बूढे होकर भी जवानी के जोश में ...
ऋतुओं में बंसत को ऋतुराज कहा जाता है, आनन्द को पर्ण्ता कहा जाता है, खिले ...
भौतिक एवं योजना तथा निर्माण राज्य मन्त्री संजय साह आज मधेश के एक कर्मठ एवं ...
नेपाल में अन्तर्रर्रीय गिरोह के बढते शिकंजे एव व्यापारिक निवेश के चलते इन गिरोहों के ...
पाणिनि व्याकरण के अनुसार 'युज्' धातु से बना हुआ 'योग' शब्द का अर्थ है- समाधि, ...
काबिले गौर है कि नक्सलियों की समस्या विकट रूप लेती जा रही है - आँपरेशन ...
रोज बालकनी में खडा होकर एक बच्चे को देखता हूं स्कूल जाते हुए अच्छी साफ यूनिफार्ँम पहने अजब ...
-वीणा सिन्हा उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र की कार्यप्रणाली, उद्देश्य एवं आचार-सीमाओं का निर्धारण होने के बावजूद ...
मंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते ...
चितवन, जेष्ठ २१ - माओवादीले भरतपुरस्थित वीपी कोइराला क्यान्सर अस्पतालका कार्यकारी निर्देशक डा. भक्तमान श्रेष्ठ ...
उपनिवेश वाद वह शासन है जिसका संचालन विजेता राष्ट्र विजित राष्ट्र की जनता पर करते ...
भारत एवं नेपाल में अध्यात्म का परचम लहराने वाले रामघाट अयोध्या -भारत) के महान संत ...
माउण्ट एवरेस्टको नेपाल में सगरमाथा कहा जाता है । माउण्ट एवरेस्ट नेपाल का है यह विश्वव्यापी रुप ...
काठमाडौ, चैत्र ७ - काँग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइरालाको शनिबार दिउँसो देहवासन भएको छ । ...
वियाना यूरोपीय देश अस्टि्रया की राजधानी है । यह राजधानी नगर अत्यंत रमणीय है । ...
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना ...
सप्ताह के सात दिन केवल दिन ही नही होतें,एक परिभाषा होते हैं, एक भावार्थ होते ...
जनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों ...
तुलसीदास जी एवं उनके द्वारा रचित महान ग्रन्थ रामचरित मानस से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर ...
'बडे भाग मानुष तन पावा, सुर दर्लभ सब संतन गावा' गोस्वामी तुलसीदास रचित राम चरित ...
आउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे ...
दुनिया का राजनीतिक चौधरी और ग्लोबल विलेज के महाजन की भूमिका निभाने वाले संयुक्त राज्य ...
नानीबाई रो मायरो कार्यक्रम भावभीनी कृष्ण-कर्तन के साथ सम्पन्न हुआ । इस कार्यक्रम के समापन-समारोह ...
लीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण ...
मुंबई की पृष्ठभूमि पर बनी अपार्टमेंट शहरों की कामकाजी लड़कियों की दिक्कतों, मुश्किलों, दुविधाओं और ...
येष्ठ १४ की मध्य रात्रि को महत्वपर्तीन दलों ने जो तीन सूत्रीय समझौताकिया, उसे नेपाली ...
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी ...
पाल की भावी शासकीय संरचना कैसी और किस प्रकार की हो - सभी भाषा-भाषी, जात-जाति ...

Archive for the ‘इंडिया’ Category

पटना पर नीतीश की मेहरबानी::पुष्य मित्र

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

pushya mitraबिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से यह कहते हुए केंद्र पर अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं कि बिहार का विकास किए बगैर देश विकसित नहीं हो सकता, मगर जब बात उनके अपने राज्य की आती है तो संभवतः यह तर्क वे भूल जाते हैं और विकास की बडÞी राशि पटना में ही खर्च कर डालते हैं, भले भागलपुर, पूणिर्या या सुपौल जैसे जिले पिछडे ही रह जाएं । अभूतपर्ूव विकास और सुशासन के दावे के दम पर वे बिहार में दुबारा सत्ता की कमान हासिल करने के लिए जी तोडÞ कोशिश कर रहे हैं । मगर विकास की प्रक्रिया चलाते हुए उनकी सरकार ने जो अनोखी मिसाल पेश की है उससे उसके कट्टर र्समर्थक भी असहमत होंगे । दरअसल एक हालिया र्सवेक्षण के मुताबिक उनकी सरकार ने राज्य में खर्च हर्ुइ विकास राशि का ४४ फीसदी हिस्सा अकेले राजधानी पटना में ही खर्च कर डाला है । यह आंकडÞा निश्चित तौर पर उनके विरोधियों के लिए भी संजीवनी साबित होने वाली है जो अब केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के उस आंकडÞे से सहमे हुए थे, जिसके मुताबिक राज्य ने उनके शासनकाल में ११.३ फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी । २००९/१० के लिए हुए स्टेट इकाँनामिक र्सर्वे के मुताबिक अब तक केंद्र सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाने वाले बिहार में आंतरिक स्तर पर क्षेत्रीय असमानता की स्थिति कहीं अधिक गंभीर है । र्सर्वे के मुताबिक पटना जिले की औसत प्रतिव्यक्ति आय ३७,७३७ रुपये प्रतिवर्षहै । जबकि इसके बाद राज्य में दूसरे स्थान पर रहने वाले जिले मुंगेर के लोगों की प्रतिव्यक्ति औसत आय सिर्फ१२,३७० रुपये है । इसके बाद बेगुसराय का नंबर आता है जिसकी औसत आय १०,४०९ है । सबसे पिछडÞे तीन शहर में जमर्ुइ -५,५१६ रु.), अररिया -५२४५ रु.) और शिवहर -४,३९८रु.) है । पटना जिले की आबादी राज्य का सिर्फ५.७ प्रतिशत है, जबकि क्षेत्रफल ३.४ प्रतिशत । जबकि राज्य में विकास कार्य के लिए व्यय हुए धन का ४४ प्रतिशत सिर्फइसी जिले में खर्च हुआ । राज्य के ३८ जिलों में र्सवाधिक प्रति व्यक्ति व्यय भी २९,३९० रुपये भी यही का है, जबकि राज्य का औसत प्रति व्यक्ति व्यय सिर्फ३,८२१ रुपये है ।
राज्य के मौजूदा बजट का भी बडÞा हिस्सा पटना हडÞप कर गया है । प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में इस जिले को प्रति व्यक्ति ३,८६७ रुपये हासिल हुए हैं, जबकि इस क्षेत्र में राज्य का औसत सिर्फ४२५ रुपये है । वही स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर पटना को प्रतिव्यक्ति ५५.४ रुपये हासिल हुए हैं, जबकि राज्य का औसत १०५.९२ रुपये हंै । स्वच्छता अभियान के अर्ंतर्गत पटना को प्रति व्यक्ति ५५.४ रुपये आवंटित किया गया, जबकि राज्य का औसत ६.४ रुपये है । अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछडÞों के विकास के नाम पर पटना को ८७.४६ पैसे प्रति व्यक्ति मिले, जबकि इस मद में राज्य का औसत सिर्फ२३.३२ रुपये है । अगर आंकडÞों को दूसरे तरीके से देख्ों तो विषमता और अधिक कटु लगने लगती है । जैसे पटना को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए ४१० करोडÞ रुपये आवंटित किए जाते हैं, जबकि शिवहर जिले को सिर्फ२.९ करोडÞ । पेयजल के लिए इस पिछडÞे जिले के हिस्से में कोई राशि नहीं डाली जाती है । तकरीबन यही स्थिति अरवल, नवादा और लखीसराय जिले की है । ३८ में से ६ जिलों को इस मद में कोई राशि आवंटित नहीं की गई है। ये आंकडÞे २००८-०९ के वित्तीय वर्षके हैं । इस मामले में सरकार के विरोधी कहते हैं कि दरअसल नीतीश पटना को चमकाकर रखना चाहते हैं ताकि बाहर से आने वाला हर व्यक्ति यह राय लेकर लौटे कि बिहार में सचमुच विकास हो रहा है। जबकि राजधानी से बाहर कैसा विकास हो रहा है, उसकी गवाही तो ये आंकडÞे दे ही रहे हैं । ऐसे में केद्रीय सांख्यिकी संगठन के ११.३ प्रतिशत वृद्धि दर वाले आंकडÞे के सहारे चुनाव जीतने को आश्वस्त दिख रहे नीतीश के गले कही यह दूसरा आंकडÞा न पडÞ जाए इस बात की आशंका बलवती होने लगी है ।

मीडिया की कलमबंद माओ::अनिल सौमित्र

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

anil saumitraआउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे पढÞने वाले एक मित्र ने कहा-इस आलेख में जबर्दस्त माओवादी अपील है, वैसे ही जैसे शोभा-डे के लिखे लेख में सेक्स अपील होती है। पाठक ने स्मरण दिलाया- हजार चैरासी की मां फिल्म में भी ऐसी ही माओवादी अपील था । पाठक ने बताया अरूंधती को पढÞकर माओवादी बन जाने का मन करता है। विकास, आदिवासी और जंगल की बात करने का मन करता है । माओवादियो की तरह हत्या, लूट, डाका, वसूली, बलात्कार और अत्याचार करने का जी करता है । अरुंधती के पास कौन-सा स्वप्न है ! क्या उनका स्वप्न आदिवासियों या आम लोगों का दुःस्वप्न है – विकास के नाम पर विनाश और हिंसा को जायज ठहराने वाले ये भी तो बताये कि आखिर माओवादी किसका विकास कर रहे हैं- भले ही माओवादी-नक्सली विकास की आडÞ लेकर विनाश का तांडव कर रहे हैं, लेकिन उनके र्समर्थ सरकारी कार्यवाई की निंदा यह कह कर कर रहे हैं कि माओवाद-नक्सलवाद पिछडÞेपन, विषमता और गरीबी से पैदा हुआ है । बिहार, बंगाल, उडÞीसा, छत्तीसगढ से लेकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश तक माओवादियों के मार्फ किसका विकास हुआ है, किसका विकास रुका है – ये विनाश का काँरीडोर किसके लिए बन रहा है यह भी देखा और पूछा जाना चाहिए । दंतेवाडा में इंद्रावती नदी के पार माओवादियों के नियंत्रित इलाके में सन्नाटा पसरा है । जिन बच्चों को स्कूल में किताब-कापियों और कलम-पंेसिल के साथ होना चाहिए था, वे माओवादियों के शिविरों में गोली-बारुद और एके ४७-५६ का प्रशिक्षण लेकर विनाशक दस्ते बना रहे हैं । स्कूलों में भय के कारण पढÞने और पढÞाने वाले दोनों ही नदारद हैं । निश्चित तौर पर खनिज और वन संसाधनों से भरपूर वन-प्रांत में संर्घष्ारत पुलिस बल और माओवादी-नक्सली हर लिहाज से परस्पर भिन्न और असमान हैं । एक तरफ माओवादियों की पैशाचिक वृत्ति, मानवाधिकारों से बेपरवाह, देशी लूट और विदेशी अनुदान से संकलित असलहे, मीडिया का दृश्य-अदृश्य तंत्र, भय पैदा करने के हरसंभव हथकंडों से लैस तथा छल-बल से अर्जित निर्दोष-निरीह आदिवासियों का र्समर्थन प्राप्त, अत्यन्त सुसंगठित व दर्ुदांत प्रेरणा से भरा हुआ माओवादी लडाकू छापामार बल । वही दूसरी ओर निर्दोंषों पर बल प्रयोग न करने की नैतिक जिम्मेदारी लिए, संसाधनों और सुविधाओं की कमी झेल रहे, राजनैतिक नेतृत्व की ऊहापोह से ग्रस्त, नौकरशाही के जंजाल से ग्रस्त, मानवाधिकार संगठनों के दुराग्रहों से लांछित, राज्य और केन्द्र की नीति-अनीति का शिकार, वन-प्रांतों की भौगोलिक, सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक ढांचे से अंजान या बेहद कम जानकार सरकार के अर्धसैनिक बल । बेहतर जिंदगी की लालसा दोनों को है । एक परिवार की देश-समाज की बेहतरी चाहता है दूसरा माओवादियों का जत्था है जो किसकी बेहतरी और सुरक्षा के लिए मार-काट मचा रहा है उसे खुद नहीं मालूम । बस हत्या अभियान में मारे गए शवों और लूटे गए हथियारों की गिनती ही उन्हें करनी है । मार्क्स, लेनिन और माओ को कौन जानता है उन सुदूर वनवासी क्षेत्रों में, जानते हैं तो बस उनके नाम से चलाए जाने वाले भय को। जो वनवासी योद्धा अंग्रेजों से दो-दो हाथ कर रहा था, उसकी तुलना इन माओवादियों से नही की जा सकती जिनका स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व में कोई विश्वास नहीं । माओवादी लेखक और बुद्धिजीवी माओवादी-नक्सलियों को आदिवासियों और शोषितों का प्रतिनिधि बताते थकते नहीं । लेकिन कोई उनसे यह क्यों नहीं पूछता कि चारू मजूमदार और कानून सान्याल से लेकर गणपति, कोटेश्वर राव, पापाराव, रामन्ना, हिदमा, तेलगू दीपक और कोबाद गांधी जैसे कथित क्रांतिकारियों की पृष्ठभूमि पर गौर करने से उनका आदिवासी-किसान विरोधी व्यक्तित्व की झलक क्यों मिलती है – ये माओवादी भले ही शोषितों की लडर्Þाई की बात करते हो लेकिन इनके भीतर भी जातीय श्रेष्ठता का दुराग्रह भरा हुआ है । माओवादी नेता कोटेश्वर राव के नजदीकी गुरूचरण किस्कू ने एक साक्षात्कार में कहा था कि बंगाल में किशनजी की अगुआई में जारी आंदोलन आदिवासी र्समर्थ नहीं, आदिवासी विरोधी है । हत्या पसंद उन क्रूर और निर्मम माओवादियों द्वारा चुनावों को पाखंडÞ और संसद को सुअरवाडÞा कह देने से काम नहीं चल जाता । अरूंधती को उसके आगे भी पूछना चाहिए । आखिर उनका बूचरखाने कोई विकल्प तो नहीं हो सकता । राय यह भी तो बताएं कि वे भारतीय राजतंत्र का र्समर्थन करती हैं कि माओवादियों की तरह खुल्लम-खुल्ला पलट का इरादा रखती हैं । अपने इस इरादे पर उन्हें राजतंत्र के इरादे की परवाह है भी या नहीं! पश्चिम बंगाल के नक्सलवादी अब माओवादी क्यों हो गए – आखिर वहां से नक्सलवादी क्यों चले गए थे, क्या नक्सलवादियों का स्वप्न पश्चिम बंगाल में पूरा हो गया था । ये कैसा स्वप्न है जो बार-बार दुःस्वप्न में बदल जाता है । बंगाल की माक्सवादी-कम्युनिस्ट सरकार तो नक्सलियों के स्वप्न साकार करने के लिए ही बनी थी । फिर २०-३० वर्ष के मार्क्सवादी राज में उनके स्वप्ना स्वप्न क्यों हो गए – अभागे नक्सली, माओवादी बनने पर क्यों मजबूर हुए । बंगाल में असफल नक्सली छत्तीसगढÞ, उडÞीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के सफल माओवादी कैसे हो सकते हैं – वकौल अरूंधती को मान लिया जाए कि भारतीय संसद द्वारा १९५० में लागू किया गया संविधान जन-जातियों और वनवासियों के लिए दुःख भरा है । संविधान ने उपनिवेशवादी नीति का अनुमोदन किया और राज्य को जन-जातियों की आवास-भूमि का संरक्षक बना दिया। रातों-रात उसने जन-जातीय आबादी को अपनी ही भूमि का अत्रि्रमण करने वालों में तब्दील कर दिया । मतदान के अधिकार के बदले में संविधान ने उनसे आजीविका और सम्मान के अधिकार छीन लिए । संसद द्वारा अपनाए गए संविधान से जन-जातीय समाज ही नहीं अन्य बहुत लोगों को दुःख हो सकता है तो क्या लाखों-करोडÞों लोग माओवादियों की तरह हथियार उठा ले और लाखों-करोडÞों अपना शत्रु बना ले – निश्चित तौर पर बडेÞ बांधों से विस्थापन होता है । सबसे अधिक प्रभावित वनवासी-आदिवासी ही होते हैं । लेकिन सिर्फबांधों की ऊंचाई का विरोध निषेधात्मक काम है, अरूंधती या मेधा पाटेकर विकल्प भी तो बतांए-कुछ करके भी दिखाएं । सरकार के कल्याणकारी बातों से सिर्फचिंता करने से नही होगा । सरकार और आमलोगों को भी तब चिंता सताने लगती है जब अरूंंधती वन-प्रांत में माओवादियों से मिलने जाती हैं । आदिवासियों का विकास अगर उद्योगपति-पूंजीपति र्समर्थक गृहमंत्री पी. चिदंबरम नहीं कर सकते जैसे माओवादी र्समर्थक अरूंधती नहीं कर सकती । एजेंट होने का आरोप दोनों पर लग सकता है । एक पूंजीपतियों का, दूसरा माओवादियों का । वर्षों से कब्जे की जद्दोजहद गरीब और संसाधन विपन्न क्षेत्रों में नहीं हो रही है, बल्कि गरीब और संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों में हो रही है । माओवादी वही हैं जहां खनिज संसाधनों की मलाई है । वे वही अपना पैर पसार रहे हैं जहां कंपनियां उत्खनन को बेताब हैं। क्योंकि उगाही और वसूली के लिए यही उर्वर क्षेत्र है । उडÞीसा के कालाहांडी में भी गरीबी है । वहां सरकार नहीं पहँुची, तो क्यों नहीं माओवादी वहां भुखमरी समस्या खत्म कर देते। इन र्सवहारा लडÞकों के वे सभी वर्ग मित्र हैं जो इन्हें अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए असलहा, पूंजी और साधन उपलब्ध कराते हैं। बाकी सब वर्ग शत्रु । उनके नियम में लिखा है । शत्रु को नष्ट कर ही दिया जाना चाहिए, उसके हथियार छीन लेने चाहिए और उसे अशक्त कर दिया जाना चाहिए तो इस संर्घष्ा में सिर्फवही बचेंगे जो वर्गमित्र बन सकेंगे, बाकी सब मिटा दिए जायेंगे । अरुंधती को कमरेडÞ कमला की बार-बार याद आती है । वे कई बार उसके बारे में सोचती हैं । वह सत्रह की है । कमर में देशी कट्टा बांधे रहती है । उस १७ वषर्ीय कमरेडÞ की मुस्कान पर वे फिदा हैं । होना भी चाहिए । लेकिन वह अगर पुलिस के हत्थे चढÞ गई तो वे उसे मार देंगे । हो सकता है कि वे पहले उसके साथ बलात्कार करें । अरूंधती को लगता है कि इस पर कोई सवाल नहीं पूछे जायेंगे । क्योंकि वह आंतरिक सुरक्षा को खतरा है । ऐसा तो सब प्रकार की असुरक्षा के प्रति कोई भी करेगा । क्या आंतरिक, क्या बाहृय असुरक्षा । कोई पुलिस की सिपाही सत्रह वषर्ीय कमला होगी तो माओवादी क्या करेंगे – क्या वे उसे दर्ुगारुपिणी मान उसकी पूजा करेंगे – बाद में वे ससम्मान उसे पुलिस मुख्यालय या उसके मां-बाप के पास पहुँचा देंगे – अरूंधती उन माओवादी कामरेडों से पूछ लेती तो देश को पता चल जाता । अगर वो पुलिस की सिपाही कमला १७ वषर्ीया आदिवासी भी होती तो हत्थे चढÞने पर माओवादी निश्चित ही पहले बलात्कार करते और उसे उसके परिवार वालों के सामने जिंदा दफन कर देते । आदिवासी क्षेत्रों की कितनी ही कमलाएं माओवादियों के हत्थे चढÞकर बलात्कार और जिंदा दफन की शिकार हो चुकी हैं । डर के मारे आंकडÞे भी संकलित नहीं होते । पुलिसिया हिंसा या आतंक के खिलाफ तो मानवाधिकार भी है और लेखक-बुद्धिजीवी भी, लेकिन माओवादी हिंसा और आतंक के खिलाफ कौन बोलेगा – चाहे हथियारबंद माओवादी हो या कलमबंद माओवादी, देश की अनेक समस्याओं का वास्ता देकर हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता । माओवाद र्समर्थको के दोगले चरित्र को समाज और सरकार को समझना ही होगा । आखिर किस बिना पर हथियारबंद माओवादी तख्ता पलट की योजना बना रहे हैं । क्या ये कलमबंद र्समर्थन उनके इशारे पर चल रहे हैं – देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा कर सत्ता को बंदूक की नली से प्राप्त करने की रणनीति का एक हिस्सा तो नहीं, ये कलमबंद माओवादी – आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि बीच का कोई रास्ता नहीं दिखता । न तो सरकार के लिए और ना ही आम लोगों के लिए । फिर ये माओवादी बुद्धिजीवी विकास की कमी, मानवाधिकार, आदिवासी उत्पीडÞन की बात लिख-कहकर देश के आमलोगों को गुमराह क्यों कर रहे हैं – आप अगर माओवादी हिंसा का खुलेआम विरोध नहीं करेंगे, उन्हें ग्लैमराइज करेंगे, उसके पक्ष में माहौल बनायेंगे, सरकार की नीतियों का विरोध करेंगे बिना कोई वैकल्पिक नीति बताये तो आप भी माओवादियों के संरक्षक, उनके र्समर्थन और उनके मददगार के रूप में क्यों न चिन्हित किए जाएं – आपके साथ भी माओवादी-नक्सलियों जैसा बर्ताव क्यों न किया जाए – जिस दिन दंतेवाडÞा में पुलिस बल और माओवादियों के बीच मुठभेडÞ हो रही थी उसी दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ बुद्धिजीवी माओवाद विरोधी अभियान का विरोध कर रहे थे । बाद में खबर आई कि देश की राजधानी नई दिल्ली में केन्द्र सरकार के नाक के नीचे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ क्रांतिकारी छात्रों ने माओवादियों द्वारा देश के पुलिस जवानों की हत्या पर जश्न मनाया । कुछ छात्रों द्वारा विरोध करने पर झडÞप की नौबत आ गई । क्या लोकतंत्र और स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का यही मतलब है – क्या देश की जनता और सरकार विश्वविद्यालय को करोडÞों की सब्सिडी इसलिए देती है कि वहां से पढÞकर छात्र देश विरोधी कार्य करें । ऐसे छात्र, छात्र संगठनों और विश्वविद्यालय पर सरकार ने क्या कार्यवाई की, सरकार की क्या नीति है – देश का कानून माओवाद-नक्सलवाद र्समर्थकों और देश के सुरक्षा बल के विरोधियों के बारे में क्या कहता है, देश को जानने का हक है । क्या ये मीडिया के माओवादी है जो आतंक को, हिंसा को और भय को ग्लैमराइज कर रहे हैं और इसे स्वप्न में देखने लायक बना कर परोस रहे हैं । ये कलमबंद माओवादी जो हथियारबंद होने, राज्य के खिलाफ आंतंक और हिंसा का तांडव करने और समाज को क्षत-विक्षत कर देने की प्रेरणा दे रहे हैं इनके बारे में राज्य और समाज क्या सोचता है – यह कलमबंदी और हथियारबंदी माओ का कैसा ताना-बाना है -

सुगम होगा व्यापार’ भारत-नेपाल::मधुरेश प्रियदर्शी

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

Madhuresh भारत-नेपाल के बीच का सम्बन्ध बहुत पुराना है जिसका गवाह हमारा इतिहास है दोनों देशों को अपनी-अपनी सुरक्षा के लिए बेहतर सीमा प्रबंधन करना आवश्यक है । उक्त बातें भारतीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने २४ अप्रैल को भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित रक्सौल के मनटोका में इंट्रि्रेेटड चेक पोस्ट
-आर सीसी) निर्माण कार्य सीमा पार के व्यापार को सुगम बनाने के साथ ही सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं के समाधान के लिए देश की सीमा पर तेरह -१३) इंट्रि्रेटड चेक मोस्ट स्थापित किये जाने की बात बतलाई है । देश के पहले इंट्रि्रेटेड चेक पोस्ट का निर्माण कार्य बाधा बोर्डर अटारी में शुरू हो चुका है । देश का दूसरा शिलान्यास आज हो रहा है । चिदंबरम ने कहा कि २० करोडÞ रुपये कि लागत से बनने वाले इस चेकपोस्ट का निर्माण कार्य जुन २०११ में पूरा कर लिया जाएगा जिसका उद्घाटन वे खुद करेंगे । भारतीय गृहमंत्री ने कहा कि नवनिर्मित चेकपोस्ट न सिर्फहमारी सुरक्षा एवं व्यापार संबंधी चिंताओं को दूर करेगा, बल्कि पडÞोसी देश के साथ संबंध को बेहतर बनाने व बेरोजगारी दूर करने में भी अहम भूमिका निभायेगा ।
इंट्रि्रेटेड चेक पोस्ट -आइसीसी) अलग पहचान स्थापित करेगा । इस प्रकार का एक चेक पोस्ट बिहार के जोगबनी में भी बनेगा । गृहमंत्री ने जनसत्ता में कहा की वीर पंच वषर्ीय योजना के तहत इस तरह के चौकियों के निर्माण के लिए ६३५ करोडÞ की राशि का प्रावधान किया गया है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की माँग पर गृहमंत्री ने भारत-नेपाल सीमा पर बाईस किलोमीटर सडÞक निर्माण की जानकारी जनसमूह को देते हुए कहा कि इसमें से ५६४ किलो मीटर सडÞक सिर्फबिहार में बनेगी जिस पर १७५२ करोडÞ रुपये की लागत आयेगी । उन्होंने कहा कि कैबिनेट की मुहर इस पर जल्द लगा जाएगी । गृहमंत्री ने कहा की इंट्रि्रेटेड चेकपोस्ट निर्माण के लिए जिन किसानों की जमीन का अध्रि्रहण किया गया है हमारी सरकार उन किसानों को उचित मुआवजा देगी ।
शिलान्यास के मौके पर आयोजित जनसभा को सम्बोधित करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतिशकुमार ने कहा कि इंट्रि्रेटेड चेकपोस्ट से सूबे के विकास में एक नया अध्याय जुडÞ गया है । अध्रि्रहित भूमि के बदले मुआवजा की माँग को लेकर असंतुष्ट लोगों को आश्वस्त करते हुए नीतिश कुमार ने कहा कि आपको प्राप्त मुआवजा भी मिलेगा और इंसाफ भी । उन्होने कहा कि बिहार गृहमंत्री से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की माँग करते हुए कहा कि बिहार को पैसा नही विशेष राज्यका दर्जा चाहिए । मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार में सद्भाव का माहौल है । मुख्यमंत्री ने भी चिदंबरम को पुनः बिहार आने का न्यौता दिया । स्वागत भाषण करते हुए भारत सरकार के सीमा प्रबंधन के विभागीय सचिव र्एर् इ अहमद ने कहा कि नेपाल के वीरगंज में विदेश मंत्रालय द्वारा इंट्रि्रेटेड चेकपोस्ट का निर्माण किया जाएगा । कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन वी के मलीजा ने किया । इस अवसर पर नेपाल में भारत के राजदूत राकेश सूद, भारत में नेपाल के राजदूत पर्ूण्ा कटारिया, एस. एस. बी. के डायरेक्टर जेनरल एम. बी. कृष्णा राव, राज्यसभा सांसद साबिर अली, डा. सजंय जायसवाल, सांसद अनिल सहनी, रक्सौल के विधायक डा. अजय कुमार सिंह एवं विधायक श्याम बिहारी प्रसाद समेत भारत वÞ बिहार सरकार के कई पदाधिकारी एवं हजारों की संख्या में दोनों देशों के नागरिक उपस्थित थे ।
एक नजर में इंट्रि्रेटेड चेक पोस्ट
लागत- १२० करोडÞ
समय- जुन २०११ तक पूरा होगा निर्माण
निर्माण- सीमा पर बनेगी २२०० किलोमिटर सडÞक
क्या है इंड्रि्रेटेडÞ चेक पोस्ट
इंट्रि्रेटेड चेक पोस्ट -आइसीपी) एक ऐसी अवस्था है, जिसके तहत एक ही छत के नीचे व्यापार, कर वसूली, सीमा सुरक्षा, सीमा-शुल्क आदि की प्रक्रियाँए पूरी कर ली जाएगी । इससे व्यापार बढÞेगा । देश भर में १३ आइसीपी स्थापित किये जाने है । ऐसे चेक पोस्ट की जरूरत भारत-नेपाल सीमा पर लम्बे अरसे से महसूस की जा रही थी । इस चेक पोस्ट का निर्माण हो जाने से भारत-नेपाल के व्यापारी वर्ग को सामान लाने- ले जाने में अब आसानी होगी ।
उपलब्धि- कुल मिला कर यह तो कहा जा सकता है कि इंट्रि्रेटेड चेक पोस्ट के निर्माण से दोनों देशों के बीच व्यापार तो बढेÞगा ही साथ ही साथ राजस्व -कर) की प्राप्ति होगी । भारत सरकार के इस पहल का भारत-नेपाल के व्यापारियो ने स्वागत किया है । व्यापारी वर्ग का मानना है कि एक ही स्थल पर विभिन्न प्रकार की सुविधा प्राप्त होने से व्यवसाय बढेÞगा । व्यवसायियों ने चेक पोस्ट निर्माण शुरू करने के लिए भारत सरकार को बधाई दी है ।

इतिहास के दोराहे पर खडा पाकिस्तान :: रुचि सिंह

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

Ruchi Singhनिया भर में मोस्ट वान्टेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिन्दा है यह खुलासा एफ.बी.आई. द्वारा शिकागो में पकडÞे गए पाकिस्तानी मूल के टैक्सी ड्राइवर रजा लइराशिबखान ने किया । साथ ही उसने यह भी बताया कि अलकायदा आतंकवादी संगठन के बा इन इलियास कश्मीरी से उसका संबंध है । कश्मीरी, पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन इरकतउलजिहाद उली स्लामी हूजी का प्रमुख भी है ।
यह वाकया यह भी साबित करता है कि ओसामा पाकिस्तान में ही कहीं छुपा बैठा है । अमेरिका पर हुए हमलेे को लोग भूला भी नही पाए थे कि २६/११ के मुर्ंबई अटैक के लिए कसूरवार पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तौबा भारत के लिए ही खतरा नही है । ब्लकि उसने आपनो पैर, अहिस्ता-अहिस्ता बंगलादेश, नेपाल, मालदीप, श्रीलंका में भी फैलाना शुरू कर दिया है । इस बात की पुष्टि अमेरिकी सेना के यु एस पैसिफिक कमान के कमांडर एडÞमिरिल र्रार्बट बिर्लाड ने भी किया है । गौर तलब है कि पाकिस्तान में एक बार फिर सैनिक या अर्द्धसैनिक शासन लगने के आसार नजर आ रहे है । पाकिस्तान में इतिहास दोहराए जाने की पूरी-पूरी परिस्थितियाँ सामने आती जा रही है । अमेरिका-पाकिस्तान सुरक्षा संवाद की रहबरी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी, यह वार्तालाप कूटनीति का हिस्सा था । अफगानिस्तान और पाकिस्तान में तालिवान व अलकायदा के विरुद्ध चल रहे अमेरिकी अभियान यानि आफ-पाक पर चर्चा में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल अश्फाक परवेज कमानी ही पाकिस्तान की तरफ से रहे है । उनके साथ आई. एस. आई. के अध्यक्ष ले. जनरल शुजा पाशा भी रहे । इसी क्रम में अमेरिका भी अपनी ओर से इतिहास दोहराने जा रहा है । अमेरिका अपने राष्ट्रहितों को संवारने के लिए गणतंत्र का उल्लंघन करते हुए सैनिक शासन की तरफदारी करता रहा है । अमेरिका और यूरोपीय देश जो ‘नाटो’ सामरिक गुट के सदस्य है, अफगानिस्तान में लडर्Þाई लडÞ रहे है । उनके लिए पाकिस्तान का, खास करके सेना का योगदान अनिवार्य है । तदर्थ पाकिस्तान को हर साल आठ अरब डाँलर की मदद मिलेगी ।
काबिले गौर है कि पाकिस्तान में सक्रिय तालिवान पाकिस्तान की ही औल्ााद है । जिसने पूरी दुनिया के नाक में दम कर रखा है । आहिस्ता-आहिस्ता बलूचिस्तान भी पाक के जुल्मों को सहते हुए पर्ूण्ा आजादी की मांग कर रहे है ।
जब कि सच तो यह है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान ने अंग्रेजों के नस्लवादी शासन में और तिब्बत में चीन के जुल्मों से कई गुना अधिक अत्याचार किए है। पाकिस्तान की सेना ने पिछले ७० वर्षो में लगातार इस क्षेत्र में बमबारी कर बच्चों सहित हजारों लोगों की हत्या की है । उधर महिलाओं के शर्मअलशेख में जारी भारत-पाकिस्ता के संयुक्त वक्तव्य में बलूचिस्तान के जिक्र किए जाने पर काफी हाय-तौबा मचाया गया । गिलानी और कयानी की फौज इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा कर इतरा रही हैं -
लेकिन पाकिस्तान के अत्याचारों ने कम्पूचिया पोलपाट का रिर्काड भी तोडÞ डÞाला है । जब पाकिस्तान के सियासी पियादो को हमेशा बलूचिस्तान का खौप सताता रहा है । विगत सन्दर्भो को देखे तो पाकिस्तान ने हमेशा बलूच के खेतों में इंसानो के सर ही बोए । अब हालात दिनांे-दिन खराब होते जा रहे हैं । पाक में भी राजनैतिक परिस्थिति सुधरने की संभावना कम है क्योंकि यह ‘एक विफल राज्य’ के रूप में जल्द ही दिखने वाला हैं – जहाँ फैली अराजकता, दोगलीनीति का हल उसके हुक्मरानों के पास नही हैं । कौन नही जनता कि बलूच जनता भारतीय संघ में रहना चाहती थी । पश्चिमोत्तर प्रंात में अब्दुलकफ खांन और स्वतंन्त्रता सेनानी खान अब्दुल सयद खान के नेतृत्व में बलूच सत्याग्राही महात्मा गाँधी के आंदोलन में भी काफी सक्रिय रहे थे लेकिन भौगोलिक दूरी के कारण बलूचिस्तान भारत से कट गया । भारत से नाउम्मीद होकर ही बलूचियों ने पाकिस्तान के विरुद्ध आजादी की लडर्Þाई शुरु की जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी हैं ।
इसके बावजूद भी बलूच अब धीरे-धीरे पाक के हुक्सरानों की शह पर चीन का उपनिवेश बन रहा है । भारत तो केवल भारतीय कश्मीर पर चीन द्वारा कब्जाई गई भूमि पर कोराकोरम पाक-चीन राजमार्ग पर चिंता व्यक्त कर देता है । ऊपर ग्वादर बंदरगाह पर चीनी नौसेना के नियंन्त्रण से भी बलूच के भूभाग का सहारा लेकर चीन भारत पर शिकंजा कस रहा है । उधर अमेरिका ने पाकिस्तान को कई बार कह चुका है कि बलूचिस्तान में छुपे हुए आतंककियों को निशाना बनाए । जहाँ पहले से ही फौजी कार्रवाई जारी हो पाक के हमले से रोब बढÞ सकता हैं और पाक से अलग होने और पर्ूण्ा आजादी के लिए आंदोलन तेज हो सकता हैं । अतः पाक का भयभीत होना लाजिम है ।
सच यह तो है यह कि इन सबके लिए पाक खुद ही जिम्मेवार हैं । पहले यह आग लगा कर हाथ सेकता हैं और उसके बाद पाक इस आग की तपिश से जलने लगता है तो पैंतरे बदलने की भरपूर कोशिश करता है । मगर पाक के हालत इतनी आसानी से नही सुलझ सकती । आज नही तो कल बल्कि इसी साल, जरदारी को राष्ट्रपति पद छोडÞना पडÞेगा । इसी बात के मद्देनजर प्रधानमंत्री यूसुपफरजागिलानी जरदारी का साथ छोडÞ कर कयानी के र्इद-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं । सवाल यह पैदा होता है कि क्या गिलानी पाक को गणतंत्र का चोला पहनाये रखा पायेगे -
राजनैतिक अटकलें जोरों पर है – वास्तविकता तो यह है कि पाक कि सत्ता की असली चाँबी सेना और सेनाध्यक्ष के हाथ में होगी । अमेरिका भी यही चाहेगा कि ढकोसला ही सही पाक में गणतंत्र का नकाब कायम रहे । सेना जो कि कई बार सत्ता के अंदर और बाहर हो चुकी है किसी भी तरह वह तालिवान के विरुद्ध अपना अभियान चलाती रहे । पाक में लोकतंत्र को बनाए रखना है तो विपक्षी का भी साथ होना बेहद जरूरी है पर्ूव प्रधानमंत्री नवाजशरीफ भी अब सत्ता में आने की लिए बाट जोह रहे हंै । सऊदीअरब के दबाब में पाकिस्तान में जल्द ही चुनाव होने की संभावना है । यह भी हो सकता है कि अयूब खाँ यादियाखाँ, जियाउलहक, परवेज मर्ुशरफ की तरह मार्शल लाँ लागू हो ।
शरीफ के झोली में जीत का सेहरा आ भी गया तो यह निश्चित है कि अमेरिका उन्हंे पसंद नही करता क्योंकि वह तालिवान के खिलाफ लडर्Þाई का विरोध करते है । समझौता करने में शरीफ पीछे नहीं हटेगे । कयानी शुरू से ही भारत विरोधी रहे है । तिकडÞमी दिमाग के शातिर कमानी ही हैं जिन्होंने भारत विरोधी अभियान को जारी रखने में चीनी मदद नहीं ली । नेपाल में भी भारत विरोधी माहौल ततानि रहा है इसके लिए वह पर्दे के पीछे से अपनी भूमिका अपनी तरह से निभाते रहे है । अब चुकी अमेरिका में सुरक्षा संवाद के दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की वजह से क्या अमेरिका शुजापाशा और कयानी को अगस्त में रिटायर होने देना चाहेगे यह तो अभी कहना मुश्किल हैं । अमेरिका ने भी पाक की मांगो को ज्यादातर मंजूर ही किया यदि नही तो वह है भारत जैसा परमाणु ऊर्जा करार और कश्मीर के मामले को सुलझाने के लिए अमेरिका की दखला कहा तो यहाँ तक जाता है कि कमानी कि वजह से ही अमेरिका-भारत को अफगानिस्तान के मामले से दूर करने लगा है । कयानी की असलीयत यह है की वह स्वयं सेना के निचले स्तर से उठ कर ऊपर आए है । सेनाध्यक्ष तो ठीक है लेकिन कूटनीति एवं सत्ता की बागडोर संभालने कि लिए कयानी मुक्कमल नही है । फिर भी वह इसका फायदा उठा सकते है । क्योंकि जरदारी और उनकी पाकिस्तानी पीपुल्स पार्टर्ीीपना राजनैतिक वर्चस्व लगभग खो चुके है । आसिफ अली जरदारी भ्रष्टाचार के आरोपों में बुरी तरह से घिर चुके है । दूसरी ओर एन.आर.ओ के लेकर रस्साकशी चल रही है ।
एन.आर.ओ. यानि ‘राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश’ एक ऐसी व्यवस्था थी जो पर्ूव सैन्य राष्ट्रपति परवेज मर्ुशर्रफ और पाक के कुछ राजनीतिक दलों के बीच बनी । लिहाजा मर्ुशर्रफ ने पाक राजनेता को नौकरशाहों पर लगे भ्रष्टाचार के मामले को खारिज किया । मर्ुशर्रफ बिना वर्दी के भी राष्ट्रपति बने रहे और स्वेच्छा से पद छोडÞने का उन्हंे अवसर मिला और विपक्षी पार्टर्ीीो मदद मिली, पाक को सैन्य तानाशाही से लोकतंत्र की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ लेकिन पिछले साल ७ दिसम्बर को उच्चतम न्यायालय की १७ सदस्यीय एक पीठ ने एन.आर.ओ. को असंवैधानिक और अवैध करार देकर निरस्त कर दिया । फिलहाल पाक संसद में ऐसा बिल लाया जा रहा है कि संसद ऐसे बिल को अवश्य ही पास कर देगी ।
यदि यह संभव हो गया तो अमेरिकापरस्त कयानी सेनाध्यक्ष से पाक के राष्ट्रपति बन गए तो भारत के लिए ही नही बल्कि नेपाल के लिए भी मुसीबत खडÞी हो जायेगी वैसे भी पाक में नेपाली लडÞकियों को काम के बहाने से बुलाकर वेश्यावृत्ति जैसे घृणित कामों में ढÞकेला जाता है । आहिस्ता-आहिस्ता पाक इतिहास के दोराहे पर जा खडÞा होगा या अपनी फिदरत को बदलने की कोशिश करेगा वर्ना पाक एक नासूर की तरह एशिया में ही नही अपितु लंदन से लेकर मास्को तक के लिए पाक चुभन ही बना रहेगा । अतः भारत को आँख को पैनी रखना होगा वर्ना फिर कहीं पाक पुनः आतंकवाद का नया नाच न कर बैठे ।

भारत आर्थिक महासत्ता के रुप में अग्रसर

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

india_flagदुनिया का राजनीतिक चौधरी और ग्लोबल विलेज के महाजन की भूमिका निभाने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में आए मंदी के तूफान ने जहां वैश्विक आर्थिक नीतियों का खोखलापन जगजाहिर कर दिया, वही दुनिया को वित्तीय प्रबंधन का पाठ पढाने वाले अमेरिकी संस्थाओं के वित्तीय अनुशासन की भी पोल खोल कर रख दी है । वित्तीय अनुशासन की बात तो दूर रही, इन संस्थाओं ने तो पैसे कमाने के लिए बिना पर्ुनभुगतान क्षमता की जांच किए जिस तरह से ऋण बांटे और जैसे-जैसे गुल खिलाए, उसमें तो काँमनसेंस तक का अभाव दिखता है । इस मंदी ने न केवल वित्तीय प्रक्रिया के औचित्य पर सवाल खडे कर दिए, बल्कि विकास की दिशा और उसके मानदंडों को भी विवादों के घेरे में ला दिया है । जिस पर पूरी दुनिया के बुद्धिजीवी सोचने को मजबूर हो गए हैं । चिंता का विषय तो यह भी है कि, भारत देश जहां मंदी आई ही नहीं, वहां भी मंदी का बादल छाने का भ्रम मीडिया द्वारा खडा किया गया । ये काल्पनिक बादल भी कुछ लोगों के ऊपर अमृत की तरह बरसे तो बहुतेरों पर बिजलियां गिरा गयी । सिंतबर, २००८ से मार्च २००९ तक हर दिन हमारे देश के अखबारों के प्रथम पृष्ठ की सर्ुर्खियों के तौर पर मंदी र्छाई रही, तो चैनलों की हेडलाईन भी तय करती रही या यो कहें कि अखबार और चैनल मंदी का माहौल रचते रहे । सच तो यह है कि मंदी ने भारत को छुआ तक नहीं । ऐसे भी अर्थशास्त्रीय परिभाषा के तहत लगातार दो तिमाही में नकारात्मक विकास दर को मंदी कहा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि हमारी विकास दर शून्य और उससे नीचे की बात तो दूर रही, कभी ६.८ प्रतिशत से भी नीचे नहीं गया । आपको आर्श्चर्य होगा कि दुनिया के सत्तर प्रतिशत देशों के वित्तमंत्री सात प्रतिशत विकास दर के लिए लालायित रहते हैं, और हमलोग इस विकास दर पर मंदी का विलाप कर रहे थे । इसमें किसी की नासमझी नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी योजना थी । जिसे बडी चतुर्राई से अंजाम दिया गया और उसकी लहर भी अमेरिका से ही चली । अमेरिका में मंदी की प्रतिक्रिया के तौर पर एक बहुत बडा पैकेज आ गया, उसके साथ ही यूरोप की सरकारों ने भी मंदी से बचाने के लिए उद्योगों को भारी-भरकम पैकेज दिया । यह शृंखला चीन तक पहुंची, तो चीन के पडÞोसी भारत के उद्योगपति कहां पीछे रहने वाले वाले थे । लगे हाथों, यहां भी पैकेज की मांग होने लगी और तबतक चुनाव आ गया, देश के राजनीतिक नेतृत्व को डर होने लगा कि पैकेज नहीं देने पर बडे पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी होगी, जिसका चुनाव पर गलत असर होगा । इसी डर के तहत यहां भी भारी-भरकम पैकेज देने की घोषणा की गई । खुशी की बात यह है कि हम अब मंदी के अहसास से भी बाहर निकल चुके हैं और आर्थिक छलांग लगाने में दुनिया से होड लेने को बेताब दिख रहे है ं। इस उत्साह का राज १९९१ के दशक में छिपा हुआ है । उस समय भी भारत एक मंदी का शिकार हुआ था जो बाकी दुनिया के लिए नहीं था । हमारा विदेशी मुद्रा भंडार शून्य हो गया था और देश दुनिया के सामने हाथ फैला रहा था । उस दौरान मजबूरी के तौर पर हमारे नीति-निर्माताओं द्वारा शुरू की गई उदारीकरण की प्रक्रिया ने मंदी के उस अभिशाप को भी वरदान में बदल डाला। हमारा अर्थचक्र आंधी की रफ्तार से गतिमान हो गया । इसके पीछे एक कारण जहां हमारी अर्थव्यवस्था के संचालन में आया सैद्धांतिक बदलाव था तो दूसरा कारण दुनिया में आई सूचना क्रांति का प्रभाव था । अर्थव्यवस्था में नव-प्रविष्ट उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण -एलपीजी) की नीतियों ने अर्थव्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया, हां उनको जमीन पर उतारना अब भी बाकी है । एलपीजी में निहित संभावनाओं को देखकर ही चीन जैसे साम्यवादी देश ने भी भारत से तेरह साल पहले उसे अपनी अर्थव्यवस्था के महत्वपर्ूण्ाअंग के तौर पर अंगीकार किया । हमारे यहां शुरूआती दौर में इसके सर्ंदर्भ में संशय स्थापित किया गया, लेकिन कुछ अपवादों को छोडकर आज यह गरीबी के निवारण का महत्वपर्ूण्ा उपकरण बन गया है । नई आर्थिक नीति ने न केवल हमारी विकास दर में इजाफा किया या विदेशी मुद्रा भंडार को बढाया, बल्कि गरीबी रेखा से नीचे के लोगों का प्रतिशत घटाने में भी युगांतकारी भूमिका अदा की । जो इससे पहले सोचा भी नहीं जा सका था । १९९१ के दशक में आए आर्थिक बदलाव की क्रांति धर्मिता पर दृष्टिपात के लिए हमें पर्ूवर्त्तर्ीीनयोजन प्रक्रियाओं की दिशा और दशा पर भी दृष्टिपात करना होगा । १९५१ में पंचवषर्ीय विकास योजनाओं की शुरूआत करते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि हर दस साल के बाद देशवासियों का जीवनस्तर दुगुना हो जाएगा । जबकि १९५१ से १९८५ तक हमारी आर्थिक वृद्धि दर ३.५ प्रतिशत थी और जनसंख्या वृद्धि दर २.२ प्रतिशत रही । इसका अर्थ यह हुआ कि देशवासियों के आय में केवल ३.५-२.२ यानी १.३ प्रतिशत की वृद्धि हर्ुइ । अगर इस दर से वृद्धि होती तो देशवासियों का जीवन-स्तर दोगुना होने में ५९ साल लगते । जबकि चीन ने यह कमाल केवल तेरह सालों में कर दिखाया । आज भारत की विकास दर छह फीसदी से नौ फीसदी के बीच में दोलायमान है और आमजनों के जीवन-स्तर में हर्ुइ वृद्धि किसी आंकडे की मुंहताज नहीं है। जिसके कारण आज हम चीन के बाद दूसरे सबसे तेज विकास करने वाले देश की श्रेणी में आ गए हैं । इसी का परिणाम है कि आज गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत ४४ फीसदी से घटकर २३ फीसदी पर आ गया है। साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार ३०० टि्रलियन डलर को पार कर चुका है और विदेशी मुद्रा भंडार की विशालता की दृष्टि से हम छठे नंबर पर हैं । हमने १९९१ में लिया गया सारा कर्ज १९९६ तक वापस कर दिया और अब दुनिया के दूसरे गरीब देशों के लिए भारत अंतर्रर्ााट्रय मुद्रा कोष को पिछले तीन साल से कर्जदे रहा है । उदारीकरण की पूरी तस्वीर केवल आशाजनक नहीं है, इसके डरावने पहलू भी हैं । हमारा विकास दर भले ही बढ गया है, लेकिन तदानुसार रोजगार सृजन दर में वृद्धि न होने के कारण अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढती जा रही है, जिसपर जल्द ही काबू नहीं पाया गया तो सामाजिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा हो सकता है । जिसकी बडी कीमत हमें चुकानी होगी और सारा विकास दर मिटी में मिल जाएगा । आज भी हमारे देश में २६-२७ प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, इसका अर्थ है कि देश के पैंतीस करोड लोग दर्रि्रता के शिकार हैं और दुनिया में गरीबों की र्सवाधिक संख्या भारत में है । उदारीकरण के दौर में खेती की उपेक्षा की व्रि्रूपता भरी तस्वीर दहलाने वाली है । १९९७ से २००५ के बीच बडी संख्या में आई किसानों की आत्महत्या की खबरें विकास के आंकडों को मुंह चिढाती दिख रही है । इन नकारात्मक तस्वीरों के बावजूद मुझे भरोसा है कि भारत आर्थिक महासत्ता के रूप में आगे आएगा । जब मैंने १९९४ में पुणे में यह भविष्यवाणी की तो लोगों ने मेरा मजाक उडाया । कई अर्थशास्त्री मित्र मेरे इस बयान की गंभीरता पर सवाल उठाते रहे । उनका तर्कथा कि अभी तीन साल पहले आए आर्थिक संकट से हम उबरे भी नहीं हैं, तो आर्थिक महाशक्ति होने की बात करना दिवा-स्वप्न नहीं । सोलह साल बीत जाने के बावजूद भी मेरे लिए अपने भरोसे पर कायम रहने के पीछे कई कारण हैं । र्सवप्रथम तो मेरी आशा का आधार देश की जनसांख्यिकी में युवाओं का अनुपात है । आज हमारी औसत उम्र २४ वर्षहै जो २०२० में २७ वर्षहोगी । जबकि २०२० में अमेरिका की औसत उम्र ३७ वर्षऔर जापानियों की औसत उम्र ४४ साल होगी । लेकिन युवा शक्ति के इन आंकडों का अंकगणित देश को आर्थिक सुपर पावर नहीं बना सकता है । हमारे यहां अपने युवाओं के कौशल विकास के लिए कोई सुव्यवस्थित तंत्र नहीं है । अगर हमने इस पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया तो आर्थिक महाशक्ति बनने के हमारे सपने बीच में ही दम तोड देंगे । स्थिति तो यह है कि १८ से २६ साल के युवक-युवतियों का सकल नामांकन अनुपात केवल १२.४ फीसदी है । इसके विपरीत दुनिया के दूसरे विकासशील देशों में इसका औसत अनुपात साठ से पैंसठ फीसदी के बीच है । कही-कही तो यह प्रतिशत ८४ तक है और आर्थिक महाशक्ति बनने का स्वप्न देखने वाले हम भारतवासी १२ फीसदी पर ही चिपके हैं । इसका तार्त्पर्य है कि देश के ८८ प्रतिशत युवकों को उच्चशिक्षा का अवसर प्राप्त नहीं है । इस क्षेत्र में खर्चके मामले में भी हम विकासशील देशों से काफी पीछे हैं । इस पर अगर जल्द ही निवेश नहीं बढाया गया तो आज की तकनीकी दुनिया में हमारी युवा पीढी के दिशाहीन होने का खतरा है और इसके परिणाम सोचकर ही रोंगटे खडे कर देने वाले हैं । १९६६ में कोठारी आयोग ने सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत शिक्षा पर निवेश करने की अनुशंसा की थी । इस आयोग की रिपोर्टके आए हुए ४४ साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक हम कुल जीडीपी के ३.७ फीसदी से अधिक शिक्षा पर निवेश नहीं कर पा रहे हैं। यह बात अलग है कि आठ फीसदी से अधिक नौजवानों को जाँब के दौरान तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है । इन दोनों को अगर जोडा जाय तब भी आंकडा दस प्रतिशत से आगे नहीं जाता है, यानी नब्बे प्रतिशत नवयुवक-नवयुवतियां हमारी आर्थिक प्रक्रिया में भागीदारी के लिए कुशल नहीं हैं। जबकि कोरिया में यह आंकडा ८७ प्रतिशत के आस-पास है । हमें भी उच्च शिक्षा और कौशल विकास पर काफी ध्यान देने की आवश्यकता है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे गंभीरता से लेते हुए २०२२ तक पचास करोड लोगों को तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करने की घोषणा की है । अगर यह लक्ष्य पूरा हो गया तो हम न केवल मानव संसाधन की दृष्टि से बहुत सक्षम होंगे बल्कि पूरी दुनिया को दक्ष श्रमशक्ति आपर्ूर्ति करने की क्षमता हमारे पास होगी । मानव संसाधन के अलावा भारत दूसरी सबसे बडी ताकत है, यहां के निवासियों की मल्टीटास्किंग योग्यता । अमेरिका में नौ साल बिताने के दौरान मैंने महसूस किया कि एक औसत अमेरिकी व्यक्ति में एक बार में दो काम करने की क्षमता नहीं होती । जबकि आप भारत के किसी गांव में चले जाएं तो वहां का दुकानदार एक ग्राहक को कीमत बोलता मिलेगा, तो दूसरे के लिए पुडिया बांध रहा होगा और बीच-बीच में घर के अंदर झांककर पत्नी को घरेलू काम के लिए निर्दश दे रहा होगा । भारतीय भाषाओं में एक शब्द है अष्टावधानी । जिसका मतलब है आठ बातों पर एक साथ ध्यान रखना । भारतीयों का ‘अष्टावधानी’ होना एक बहुत बडी उपलब्धि है जो हमें आर्थिक महाशक्ति होने की आशा जगाता है । ऐसा नहीं है कि भारत भविष्य में आर्थिक महाशक्ति बनने वाला है । अगर एक अमेरिकी अर्थशास्त्री के शोध निष्कर्षपर विश्वास करें तो हम अतीत में भी आर्थिक महाशक्ति रह चुके हैं । आंगस मेडिसन नामक अर्थशास्त्री नर्ेर् इस्वी सन् एक से लेकर्रर् इस्वी सन् एक हजार तक की जीडीपी निकालने की कोशिश की है । मेडिसन के निष्कर्षचौंकाने वाले हैं । उस अर्थशास्त्री के अनुसार्रर् इस्वी सन् एक से लेकर एक हजार तक भारत और चीन एक के बाद एक लगातार आर्थिक महाशक्ति बने रहे र्।र् इस्वी सन् एक में उसने भारत के सकल घरेलू उत्पाद की गणना करने पर इसे दुनिया का ३१.५ प्रतिशत पाया । अर्थात् दुनिया का एक तिहाई उत्पादन अकेले भारत में होता था । वहीं १९९१ में यह जीडीपी तीन फीसदी पर आ गिरा । इसके कारणों की पडताल करने पर लोग अत्यंत भावनात्मक रूप से जवाब देते हैं कि अंग्रेजों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हर्ुइ । लेकिन तथ्य र्सवथा विपरीत हैं, सच्चाई बिल्कुल भिन्न है । हमारी अर्थव्यवस्था के शिखर से गर्त में गिरने के कारण बिलकुल देसी हैं और वह है भारत की जाति-व्यवस्था । भारतीय समाज की सामाजिक समस्या से भी बढकर इस मनोवैज्ञानिक समस्या ने देश का चतर्ुर्दिक अहित किया है । जिस समाज में केवल चार प्रतिशत लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हो और ९६ प्रतिशत लोग जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित किए जाते हों, उन्हें अपना कैरियर और पेशा चुनने की स्वतंत्रता नहीं हो, यहां तक कि माता-पिता का पेशा चुनने को ही मजबूर किए जाते हों, उस समाज को पतन से भला कौन रोक सकता है । इन ९६ फीसदी लोगों में कितने आइंस्टीन हो गए होंगे, कितनी प्रतिभाएं खो गई होंगी लेकिन समाज उनके योगदान से वंचित रह गया । इस क्षति की भरपाई नहीं हो सकती लेकिन इस गलती से सबक जरुर सीख सकते हैं । हजारों सालों तक समाज के हाशिए पर रहे उस वंचित वर्ग ने आज मुख्य धारा में शिरकत करना शुरू कर दिया है जिसके कारण हमारी अर्थव्यवस्था एक बार फिर से छलांग लगाने लगी है । हम अगर देश को आर्थिक महाशक्ति बनाना चाहते हैं तो उस वंचित तबके की समग्र भागीदारी के बिना यह असंभव होगा । आज पूरी दुनिया में चल रहे र्सवसमावेशी विकास की बहस भारत के सर्ंदर्भ में अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ समाजशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए । अगर हम देश की आबादी और प्रतिभाओं की समान भागीदारी और उनके प्रबंधन की योजना नहीं बनाएंगे, तो आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब संजोना छोड दें ।
-लेखक, भारत सरकार के योजना आयोग में सदस्य, प्रख्यात अर्थशास्त्री तथा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं ।) खखख

भारत के प्रति चीन का मनोविज्ञान ::डाँ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

manmohanभारत के प्रति चीन की दर्भावना को लेकर एक और प्रश्न आम तौर पर पूछा जाता है । वह प्रश्न चीन के इतिहास और संस्कृति से ताल्लुक रखता है । आज से लगभग दो हजार साल पहले चीन में बुद्ध वचनों का प्रसार हुआ था । बुद्ध के वचनों और बुद्ध के प्रवचनों ने चीन की मानसिकता को बनाने में महत्वपर्ूण्ा भूमिका निभाई है । चीन में स्थान-स्थान पर भगवान बुद्ध के विशाल मंदिर बने हुए हैं । बुद्ध मत से सम्बंधित सभी महत्वपर् ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ है । नालंदा विश्वविद्यालय जो अपने वक्त में बौद्ध दर्शन का विश्व विख्यात केन्द्र था, चीन से पढने के लिए अनेक छात्र और विद्वान आते थे । विख्यात चीनी दार्शनिक हृवेनसांग इसी ध्येय की पर्र्ति के लिए अनेक कठिनाइयां सहते हुए भारत आया था । भारत और चीन के बीच दर्शन शास्त्र के विद्वानों का आना जाना लगा रहता था । चीन के लोग भारत को पावन स्थल मानते थे और उनके जीवन की एक आकांक्षा बौद्ध गया और सारनाथ के दर्शन करने की भी रहती थी । साधारण चीनी के मन में भारत का स्वरूप एक तर्थस्थान का स्वरूप बनता था । अतः चीनियों के मन में भारत के प्रति दर्ुभावना हो, ऐसा सम्भव नहीं लगता । यह परम्परा प्राचीन इतिहास पर ही आधारित नहीं है बल्कि इसको अद्यतन इतिहास तक में देखा जा सकता है । रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने जब शांति निकेतन की स्थापना की तो उसमें अध्ययन के लिए चीनी विभाग स्थापित किया और चीन से विद्वानों को निमंत्रित किया । यहां तक कि माओ ने जब चीन में गृह युद्ध शुरु किया तो उस गृह युद्ध में दुख भोग रहे चीनियों की सहायता के लिए महाराष्ट्र के एक डाक्टर श्री कोटनिस ने अपना पूरा जीवन ही उनकी सेवा में समर्पित कर दिया । वे भारत से चीन चले गए और गृह-युद्ध में घायल चीनियों की सेवा-सुश्रूषा करते रहे । वहीं उन्होंने एक चीनी लडÞकी से शादी की । और सेवा करते-करते उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए । चीन के लोग आज भी डाँ.कोटनिस का स्मरण करते हुए नतमस्तक हो जाते हैं । तब यह प्रश्न पैदा होता है कि इस परम्परा की पृष्ठभूमि में चीन भारत का विरोधी कैसे हो गया । इतना विरोधी कि उसने १९६२ में भारत पर आक्रमण ही कर दिया और आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी उसने अपने भारत विरोध को छोडा नहीं है । इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले एक और प्रश्न का सामना करना पडेगा । वह प्रश्न है कि यदि आज का चीनी शासकतंत्र सचमुच चीन के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है – चीन में जो साम्यवादी पार्टर्त्ता पर कुंडली मारकर बैठी है उसने यह सत्ता बंदूक के बल पर हथियाई है, न कि लोकमानस के प्रतिनिधि बनकर। साम्यवादी दल का सत्ता संभाले हुए आज ६० साल से भी ज्यादा हो गए हैं लेकिन उन्होंने कभी भी लोक मानस को जानने का प्रयास नहीं किया और न ही कभी लोगों की इच्छाओं के अनुरूप चुनाव होने दिए । इसके विपरीत लोक इच्छा को दबाने के लिए शासक साम्यवादी दल ने ध्यानमेन चौक पर अपने ही लोगों पर टैंक चढा कर उन्हें मार दिया । साम्यवादी दल, दरअसल चीन की पुरानी परम्परा और सांस्कृतिक विरासत को समाप्त करने का प्रयास कर रहा है इसलिए उसने चीन में महात्मा बुद्ध के प्रभाव को विदेशी प्रभाव घोषित कर दिया है। साम्यवाद मूलतः भौतिकवादी दर्शन है । वह मुनष्य को बाकी सभी स्थानों से तोडकर केवल भौतिक प्राणी के नाते विकसित करना चाहता है । चीन में कम्युनिस्ट प्रयोग कर रही है । इस प्रयोग के लिए यह जरुरी है कि चीन को उसकी विरासत, इतिहास औंर संस्कृति से तोडा जाए । इसलिए, आधिकारिक चीनी प्रकाशनों में भगवान बुद्ध को कायर और पलायनवादी तक बताया गया है । एक चीनी अधिकारी ने तो यहां तक कहा कि बुद्ध के माध्यम से भारत ने चीन पर बिना कोई सैनिक भेजे दो हजार साल तक राज्य किया । इन प्रश्नों को लेकर चीन के भीतर भी घमासान मचा हुआ है । चीनी साम्यवादी शासकदल लोगों का इन प्रश्नों पर एक प्रकार से मानसिक दमन कर रहा है और उन्हें पशुबल से चुप रहने के लिए विवश किया जा रहा है । रूस ने लगभग एक शताब्दी तक यह प्रयोग मध्य एशिया के अनेक देशों में किया था लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाया । चीन के लिए महात्मा बुद्ध के प्रभाव को समाप्त करने के लिए जरुरी था कि बुद्ध वचनों के उद्गम स्थल भारत को भी शत्रु की श्रेणी में रखा जाए । चीनी साम्यवादी शासक दल के भारत विरोध का यह एक मुख्य कारण हो सकता है । चीन के लोग कहां खडे हैं और चीन की साम्यवादी शासक पार्टर्ीीहां खडी है इसका पता तो तभी चलेगा जब भविष्य में कभी चीन में लोगों द्वारा चुनी गई सरकार स्थापित होगी । तब भारत और चीन के रिश्तों की नए सिरे से व्याख्या होगी । लेकिन यह सब भविष्य की बातें हैं । फिलहाल तो चीन हिमालय पर घात लगाकर बैठा है ।

माओवादी आतंक से त्रस्त भारत:: रुची सिंह

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

Ruchi Singhकाबिले गौर है कि नक्सलियों की समस्या विकट रूप लेती जा रही है –
आँपरेशन ग्रीनहंट और माओवादियों के खिलाफ सीधी -सीधी भिंडत से यह तो साबित होता है कि गृहमंत्रालय अपनी चाल को साधते हुए नक्सली छवि को तार- तार करने के लिए मनोवैज्ञानिक लर्डाई भी लडÞ रहा है । माओवादी हमेशा समझौते को नकार जाते है । माओवादियो की ओर से संर्घष् विराम की घोषणा से केन्द्र सरकार का रूख नरम नहीं दिखता । सरकार चाहती है कि नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले लोगों का नजरिया बदले यह जरुरी भी है – जो लोग उन्हें राज्य के उत्पीडन के खिलाफ , आदिवासियां , गरीबां के लिए लडÞने वाले मसीहा मानते है यह गलत है – यह मासूम लोगों के खिलाफ निर्मम हिंसा हत्या के कर्ताधर्ता है । खुफिया सूत्राे के मुताबिक इन माओवादिये ने अपनी गतिविधियां १२,००० वर्ग कि. मी.क्षेत्र में २२० से अधिक जिलांे या देश के तकरीबन ४५ फीसदी भूभाग में फैला रखा है । सरकार एवं माओवादियों के बीच बातचीत के आशा कम ही है अगर वार्ता शुरु हो भी गई तो इसको अंजाम तक पहुँचने की उम्मीद बेहद कम है गौरतलब है कि गृहमंत्री पी. चिदंम्बरम द्धारा माओवादियों को दिए गए संदेश के मुताबिक ७२ घंटे के लिए वह हिंसा छोडते है तो सरकार उनसे बातचीत करने का रास्ता निकाल सकती है । माओवादियों द्धारा हाल के किए गए हमले और लगातार हमले से उनसे सहानुभुति जताने वालो को खासी आलोचना का सामना करना पडता है । केन्द्र एंव राज्य सरकारां की संयुक्त कार्यवाही आँपरेशन ग्रीनहंट की सीधी लर्डाई ने उनके संर्घष्ा को एक अलग कतार में खडा कर दिया है । लिहाजा वह बडे हमले करते जा रहे है । इसके बावजूद भी माओवादिये को बातचीत के लिए बाध्य होना पडा है । फिलहाल माओवादी अभियान महाराष्ट्र छत्तीसगढ, झंारखंड एव उडीसा रहा है परंतु बिहार पश्चिम बंगाल, एवं आंध्र्रप्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित है । यह नक्सली नेपाली सीमा तक पहुँचकर लालगलियारे को और भी मजबूत बना रहे है । आहिस्ता -आहिस्ता उत्तरप्रदेश ,कर्नाटका, हरियाणा तक नक्सली आंतक पहँच गया है । गृहहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक “माओवादी तब ही बातचीत के लिए गंभीर होगें, जब वे काफी दबाव में होगं फिलहाल कई बडे माओवादी नेता -नारायण सन्याल , कोबाद गाँधी, प्रमेाद मिश्र, सुशील राय , अभिताभ बागली , सुशील मल एवं बलदेव को पुलिस गिरफ्तार करने मंे कामयाब हर्इ है । नारायण सन्याल एवं कोबाद गाँधी तो पोलिटब्यूरो के सदस्य है अतः नेतृत्व का संकट पैदा हो चुका है ।
विगत सन्दर्भो के मुताबिक आंध्र-प्रदेश में सरकार एंव नक्सालिये के बीच दो बार बातचीत हर्इ । बातचीत के दौरान पुलिसबलों का अभियान बंद हो गया । जिसका नक्सालियांे ने पूरा – पूरा फायदा उठाते हुए अपने सशस्त्र दस्तांे को फिर एकजूट और संगठित कर डाला और वार्ता विफल हो गई । केन्द्र सरकार के सामने उनके द्वारा वार्ता की पेशकश इनकी सोची समझी चाल है । दर असर वे आपरेशन ग्रीनहंट से कुछ समय के लिए राहत पाना चाहते है । वर्ष२००२ मे आँध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायूड ने भाकपा – माओवादी के पर्ूवावतार ) पीपुल्सग्रुप के साथ वार्ता शुरू की थी उस वक्त तेलुगू के मशहूर कवि वखराराद एंव लोकगायक मड्ढर ने नक्सलियांे की तरफ से वार्ता में भाग लिया था परंतु सरकार पर ही लगातार मुठभेड का आरोप लगाते हुए वे वार्ता बीच मे ही छोडकर चले गए । उस वक्त इनकी ताकत इतनी बढ गई थी कि इन्होंने चन्द्रबाबू नायडू की हत्या तक करने की कोशिश कर डाली पर वे बाल-बाल बच गए । दूसरी बार २००४ में वहिएस राजशेखर रेड्ढी की सरकार ने माओवादियों के साथ वार्ता शुरु की दोनांेतरफ के मध्यस्थों के बीच कई बार की बातचीत के पहचात युद्धविराम की घोषणा हर्ुइ । सरकर ने पीपुल्सवार ग्रुप एंव जनसंगठनों पर लगाया गया प्रतिबंध हटा लिया । पीपुल्सवारग्रुप की तरफ से रामकृष्ण,गणेश एंव सुधाकर वार्ता मंे शामिल हुए थे । नक्सलियांे ने अतिरिक्त जमीने को गरीबों मंे बाटनंे का प्रावधान रखा जिसे सरकार ने मान लिया और अतिरिक्त जमीन की पहचान के लिए समिति बनाने की घोषणा की और नक्सलियो के हथियार डालने के लिए कहा इसके लिए वह तैयार नही हुए। और पहले दौर की बातचीत के बाद वह लौट कर नही आए ।
लिहाजा पीपुल्सवारग्रुप और एमसीसी का आपस मे विलय हो गया जिसके तहत माओवादी भी ताकतवर बन कर सामने आ गए इसका सबसे बडा उदाहरण है कि माओवादी नेता कोबद गाँधी के खिलाफ अदालत मे दायर आरोप पत्र मे तीन मानवअधिकार कार्यकर्ता को नक्सलवादिये के हमदर्द के रूप मंे नामजद किया गया है । आरोप पत्र में पीपुल्स यूनियन आंफ डेमोक्रेटिक राइट्स -पीयूडीआर) पीपुल्स यूनियन आंफ सिविल लिंबर्टीपीयूसील) एंव एसोसियशन फार प्रोटेक्शन आँफ डेमेक्रोटिक राइटस-एपीडीआर) के माओवादियो की सहायता करने वाले संगठनांे के तौर पर चिन्हित किये गये है । निर्दोष लोगो की हत्या करके माओवादी सरकर को क्या सबक देना चाहते है – कडी चौकसी के बावजूद इस तरह से निर्दोष ग्रामीणांे की हत्या ये दर्शाती है कि नक्सली समस्या से पीडित राज्यों की सरकार जो भी दावा करती हो लेकिन उनकी तैयारी मंे ढेरों खामियाँ है । आंकंे बताते है कि पिछले कई वषर् से नक्सली हिंसा मंे सुरक्षाकमियो और निहत्थे नागरिक को अपनी जान से हाथ धोना पड रहा है । भारत दुनिया के उन देशो मंे है जहां आबादी के अनुपात में पुलिस की सुरक्षा सबसे कम मुहैया है । झारखंड, बिहार, छत्ाीसगढ वैसे प्रदेश नक्सली हिंसा के बुरी तरह से शिकार बने हुए है । अब तो इन माओवादियों के संबध नेपाल के माओवादियांे – छापामारांे के साथ भी जुड गए है । हांलाकि पिछले २० सालांे से सरकार ने इस ओर ध्यान न देकर महज पांच साल पहले ही लालकोरिडोर को एक गंभीर खतरा मानना शुरू किया । प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने उन्हें देश की सुरक्षा का सबसे बडÞा खतरा बताया था, तब के तत्कालीन गृहमंत्री शिवराजपाटिल ने माओवादी व्रि्रोहियों से निबटना छोडÞ कर उन्हे देश के “पथ भ्रमित बच्चों की संज्ञा दी थी ।
काबिले गैार है की पश्चिम बंगाल ,बिहार एंव झारखंड में नक्सालियांे से निपटने के तरीके से गृहमंत्रालय खुश नही है । और तो और अपहृत प्रखंड विकास पदाधिकारी सुरक्षित लाने के लिए मुख्यमंत्री शिब सोरेन ने दो दर्जन माओवादियांे के रिहाई के लिए माओवादी के साथ गुप्त एंव निजी समझौता किया । यह तो र्सवविदित है कि शिबू सोरेन अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकते है । माओवादी समय-समय पर हत्याकांड करके भले ही यह साबित करने की कोशिश करते रहे है कि वह लगातार कहर बरसाने मंे सक्षम है । माओवादियांे के हौसले दुस्त हो रहे है । वह चाहते है कि बारिश होने तक आपरेशन ग्रीनहंट टल जाए क्योकि ग्रीनहट के तहत गर्मियांे में पुलिस और अर्धसैनिक बल सघन जंगलों मंे अपना डेरा जमाने मंे सफल हो सकते है ।
अतः अब समय आ गया है कि लाल-आंतक के हमंे भी जवाबी मुकाबले से खत्म करना होगा यह माओवादी मौके के फिराक में लाल-तबही मचाते ही रहेंगे । आंतरिक सुरक्षा ऐसा मसला है जिस पर केन्द्र एंव राज्य सरकार दोनांे की जवाबदेही होती है । आरोप-प्रत्यारोपांे की झडीÞ से अक्सर असली मुद्दा दब कर रह जाता है । इसलिए राज्य और केन्द्र सरकार दोनो ही यथाशीघ्र ऐसे “ब्लु-प्रिंट” तैयार करे जिसे दिल से नही दिमाग से एक हिम्मती फैसला लेते हुए इन नक्सलवादियांे का मुकाबला करते हुए इन्हें जडÞ से खत्म करना होगा वर्ना माआोवदी नासूर बन कर दर्द देते रहेगें और मासूमांे के खुन से लाल-कोरिडोर और भी लाल होता रहेगा । अब लाल -आंतक के बजाए शांति- समझौता एंव समस्याआंे का समाधान करना होगा वरना गरीबों एव आदिवासियांे की आड मंे खूनी खेल की होली जारी रहेगी मूक बेबस एंव गरीब केवल चिता मेें दहकने के लिए डर के साये मंे मर-मर के जीते रहेगंे । लिहाजा गृहमंत्री को छापामार हमलों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण का काम फौरन शुरु करना होगा, वर्ना यह समस्या कभी भी नहीं सुृलझेगी । लाल-सलाम के लिए एडिया जुडती रहेगी हाथ उठते रहेगंे । खखख

महिला आरक्षण बिल:: पुष्पा ठाकुर

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

pushpa thakuएक दशक से ज्यादा समय से भारत में ‘महिला आरक्षण बिल पास करने के अथक प्रयास होते रहे और अब जाकर भारत के राज्य-सभा ने इस ‘आरक्षण बिल’ को पास किया है ।
इस महिला-आरक्षण बिल के पास होने से भारत की महिलाएँ उम्मीद कर सकती हं कि अब कोई भी ऐसा ‘विधेयक’ जो महिला के हित में नही होगा संसद से पास नही होगा साथ ही ऐसे अनेक कानून भी संशोधन किया जा सकेगा जो अब तक संसद में पुरुषों के वर्चस्व के कारण संशोधित नहीं हो सके हैं । निश्चित रूप से भारत की महिलाओं के लिए यह महत्वपर् उपलब्धि है । अब तक विश्व में संसद में उच्च महिला प्रतिनिधित्व करने वाले १४ देश निम्न लिखित हैं ।
१. रुवान्डा ५६५
२. स्वीडेन ४७५
३. क्युबा ४३.२५
४. फिनलैन्ड ४१.५५
५. अर्जेण्टिना ४०५
६. नेदरलैन्ड ३९.३५
७. डेनमार्क ३८५
८. ऐंगोला ३७.३५
९. कोस्टारिका ३६.८५
१०. स्पेन ३६.३५
११. नार्वे ३६.१५
१२. बेल्जियम ३६.१५
१३. मोजम्बिक ३४.८५
१४. आइसलैण्ड ३३.३५
१५. नेपाल ३३.२५
स्रोत ः क्ष्लतभच-उबचष्बिmबलतबचथ ग्लष्यल। ध्omभल ष्ल ल्बतष्यलब एिबचष्बिmभलतक। क्ष्तगबतष्यल बक या घज्ञ इअतयदभच, द्दण्ण्ड, ज्ञडड ऋयगलतचष्भक अबिककषष्भम दथ मभकअभलमष्लन यचमभच या यिधभच जयगकभ यच कष्लनभि जयगकभ।
अब महिलाओं को राष्ट्रिय राजनीति से दूर रखकर पुरुषों के द्वारा एकाधिपत्य जमाने का युग समाप्त हो गया है । अभी तक महिला आरक्षण बिल का पास नहीं हो पाने में एक बडा कारण यह रहा है कि संसद में उपस्थित पुरुषों को यह भय व्याप्त थी कि आरक्षण से अगर एक तिहाई महिला संसद मंे आ जायेगीं तो न सिर्फउनका संसद में वर्चस्व समाप्त हो जायेगा वरन उन्हें एक तिहाई चुनाव क्षेत्र छोडने होगें तथा पार्टर टिकट प्राप्त करने में कठिनाई होगी जिसके परिणाम स्वरूप कहीं उन्हें राजनीति से सन्यास ही न लेना पडे. । संसद में उपस्थित महिलाओं को भी यह भय सताता रहा है कि इतनी बडी संख्या में महिलाएँ संसद में आ गयी तो उनका वर्चस्व एवं प्रभाव-क्षेत्र में भी हस्तक्षेप होने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है । अगर ‘महिला आरक्षण-बिल भारत की लोक सभा ने भी पास कर दिया तो निश्चित ही संसद में बगैर महिलाओं की सहमति से कोई भी विधेयक पास करना कठिन हो जोयगा क्यों कि वर्तमान अवस्था में किसी भी पार्टर् संसद-संख्या बहुमत में नही रहने के कारण मिली-जुली सरकार बनाना राजनीतिक पार्टियों की बाध्यता हो गयी है । ऐसे में विभिन्न पार्टर् महिलाओं की शक्ति बढेगी ही । आरक्षण से जहाँ एक ओर महिलाओं की राजनीति में स्थिति सुदृढ हर्इ है वही इसका एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि जहाँ एक ओर एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित चुनाव क्षेत्र के कारण इस क्षेत्र के पुरुष नेताओं को अपने लिए ‘वोट माँगने के लिए दूसरे चुनाव क्षेत्र में जाना होगा वही दूसरी ओर हरेक-बार आरक्षित क्षेत्र बदल जाने के कारण प्रत्येक-बार एक नया चुनाव-क्षेत्र महिला तथा पुरुष नेताओं के समक्ष होगा अर्थात् भटकते रहो-यहाँ से उहाँ तक की स्थिति बनी रहेगी ।
इस व्यवस्था के कारण कोई भी सांसद अपने चुनाव क्षेत्र के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होगा साथ ही जनता के प्रति उनमें उत्तरदायित्व बोध में भी ह्रास होना स्वाभाविक होगा ।
शायद यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह कहना है कि आरक्षण के द्वारा राजनीति में महिलाओं की समानुपातिक प्रतिनिधित्व से बेहतर है समानुपातिक चुनाव प्रणाली अपनाना । नेपाल में समानुपातिक चुनाव प्रणाली अपना कर ही संसद में महिला सहभागिता ३३ प्रतिशत हर्इ है । आरक्षण में सब-कोटा दलित तथा जनजाति के लिए नहीं होने से उनका प्रतिनिधित्व समानुपातिक रूप से हो पायेगा यह भी विचारणीय है ।
इसके साथ ही प्रश्न यह भी है कि क्या आरक्षण से राजनीति में महिला की स्थिति सुदृढ होगी – वह भी स्थानीय स्तर में ‘मुखिया’ के लिए महिला आरक्षित क्षेत्र में महिलाएँ मुखियाँ है परन्तु सामाजिक मानसिकता में जागृति नहीं होने के फलस्वरूप महिला मुखिया के सारे अधिकारों का प्रयोग ज्यादातर उनके घर के पुरुष ही करते नजर आते है । इसके साथ ही हमारे समक्ष उदाहरण है कि ६० वर्षसे भारत में दलितों के प्रति सामाजिक भेदभाव को कम करने के लिए आरक्षण नियम तथा कई कानून है परन्तु क्या दलितों को उनका समुचित हक-अधिकार प्राप्त हो सका है – नही ।
महिलाएँ सिर्फराजनीति में ही नही वरन जीवन के अनेक क्षेत्रों में लैंगिक विभेद का शिकार होती रही है । भ्रूण हत्या, शिशु हत्या तथा दहेज जैसी कुप्रथाओं के कारण होनेवाली हत्या और इन हत्याओं से बच जाने वाली महिलाओं को भोजन शिक्षा तथा स्वास्थ्य में पक्षपातपर् रवैया को भोगना पडता है । इसके साथ ही घर एवं बाहर शारीरिक दर्ुर्व्यवहार को सहना उनकी नियति होती है ।
विश्व के सबसे अधिक मातृ-मृत्युदर एवं महिला रक्तक्षीणता के कारण मृत्यु होनेवाले देशों में से भारत भी एक है । ऐसा नहीं है कि इन लंैगिक विभेदों को अन्त करने के लिए भारत में कोई संवैधानिक व्यवस्था या नियम कानून नहीं बनाए गये । परन्तु, समाज की मानसिकता में बदलाव लाने के लिए सिर्फकानून पर््रयाप्त नहीं है ।
महिलाओं के प्रति विभेद का अन्त तबतक सम्भव नहीं है जबतक आम जनता की सोच में परिवर्तन नहीं होगा । आम जनता की सोच में परिवर्तन लाने के लिए निरन्तर विचारों का प्रभाव करते हुए लोगों के चेतना को जागृत करना होगा । गाँव-गाँव शहर-शहर में राजा राम मोहन राय जैसे समाज सुधारकों की आवश्यकता है जो भगिरथ प्रयास के द्वारा महिलाओं के प्रति लैगिक विभेद का अन्त कर सके । अन्त में इतना तो सत्य है कि सर्वोत्तम उपाय न होने का मतलब यह नहीं होता कि एक अच्छे प्रयास की सराहना नहीं कि जाय ।
अन्तः भारत की महिलाओं के प्रति लैगिक विभेद का अन्त करने के प्रयास में ‘महिला आरक्षण बिल’ के पास होने की सराहना एवं बधाई । खखख

सिर्फबात के लिए बातचीत::शेष नारायाण सिंह

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

अमेरिका की तरफ से की गयी पहल और मंर्बई हमले के करीब १४ महीने बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर बातचीत का सिलसिला शुरु हो गया है, विदेश सचिव स्तर की बातचीत से कुछ नहीं निकलेगा – यह सबको मालूम था लेकिन तथाकथित शांतिदूतों को लाँलीपाप जरुर मिल गया है ।
भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी समस्या है, वह राजनीतिक है । जाहिर है कि उसका हल भी राजनीतिक होना चाहिए । इसलिए जब भी सचिव स्तर की बातचीत होती है उसे तैयारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए । लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश करने वालों का ओर भी बहुत कुछ ध्यान में रखना चाहिए । अपने ६३ साल के इतिहास में न तो पाकिस्तान के शासक कभी यह नहीं भूले हैं कि भारत उनका दुश्मन नंबर एक है और नही उन्होंने अपनी जनता को भी यह बात भूलने का अवसर दिया है – शुरुआती गलती तो पाकिस्तान के संस्थापक, मुहम्मद अली जिन्ना ने ही कर दी थी । उन्होंने अविभाजित भारत के मुसलमानों को मुगालते में रखा और सबको यह उम्मीद बनी रही कि उनका अपना इलाका पाकिस्तान में आ जाएग् लेकिन जब वर्तमान पाकिस्तान का नक्शा बना तो उसमें वह कुछ नहीं था जिसका वादा करके जिन्ना ने मुसलमानों को पाकिस्तान के पक्ष में लाने सफल भी हुए थे । बाद में लोगों की नाराजÞगी के चलते पाकिस्तानी शासकों ने कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढÞ का बात में अपने देशवालों का कुछ दिन तक भरमाये रखा ।
लेकिन काठ की हांडी की एक उम्र होती है और वह बहुत दिन तक काम नहीं आ सकती । वही पाकिस्तान के हुक्मरान के साथ भी हुआ । जिसका नतीजा यह है कि पाकिस्तान में आज सारे लोगों की एकता को सुनिश्चित करने के लिए कश्मीर की बोगी का इस्तेमाल होता है । पिछले ६० वर्षो में इतनी बार कश्मीर को अपना बताया है इन बेचारे नेताओं और फौजियों ने कि अब कश्मीर के बारे में कोई भी तर्कसंगत बात की ही नहीं जा सकती है । जहां तक भारत का सवाल है, वह कश्मीर को अपना हिस्सा मानता है और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को अपने इलाके में मिलाना चाहता है । पाकिस्तानी हुकूमतें कहती रही हैं कि कश्मीर के मसले पर उन्होंने भारत से तीन युद्ध लडÞे हैं । लिहाजा वे कश्मीर को छोडÞ नहीं सकते । बहरहाल, यह पाकिस्तानी अवाम का दर्भाग्य है कि अपनी आजादी के ६३ वर्षो में उन्हें महात्मा गांधी, सरदार पटेल और नेहरु जैसा कोई नेता नहीं मिला । दूसरा दर्ुभाग्य यह है कि पाकिस्तान की आजादी के लिए कोई लडर्ई नही लडी गई । वास्तव में पाकिस्तान की स्थापना भारत की आजादी की लडर्ई को बेकार साबित करने के लिए अंग्रेजों की तरफ से डिजाइन किया गया एक धोखा है जिसे जिन्ना को उनकी अँग्रेजपरस्ती के लिए इनाम में दे दिया गया था ।
आज की हकीकते बिल्कुल अलग हैं । आज जब पाकिस्तानी विदेश सचिव दिल्ली में बात कर रहे हैं, उनके ऊपर पाकिस्तानी सत्ता के तीन केन्द्रों को खुश रखने का लक्ष्य है । जाहिर तौर पर तो वहाँ पाकिस्तानी राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री हैं । जिनकी अपनी विश्वसनीयता की कोई औकात नहीं है । वे दोनों ही वहां इसलिए बैठे हैं कि उन्हें अमरिका का आशर्वाद प्राप्त है । वे दोनों ही अमेरीका के हुक्म के गुलाम हैं, शुरु से ही फौज ने भारत विरोधी माहौल बना रखा है । इसी भारत विरोध से उनकी दाल रोटी चलती है और शायद इसीलिए पाकिस्तानी समाज में भी फौजी होना स्टेटस सिम्बल माना जाता है । आईएसआई भी इसी फौजी खेल का हिस्सा हैं । तीसरी ताकÞत है वहां का आतंकवादी, इसे भी सरकार और फौज का आशर्ीवाद प्राप्त है । धार्मिक नेताओं के जÞरिये बेरोजगार नौजवानों को जिहादी बनाने काम १९७९ में जनरल जिया उल हक ने शुरु किया था । उसी दौर में आज आंतक का पर्याय बन चुका हाफिज मुहम्मद र्सइद, जनरल जिया उल हक का सलाहकार बना था । और आज वह इतना बडÞा हो गया है कि पाकिस्तान में कोई भी उसको नाप नहीं सकता । जिया के वक्Þत में उसका इतना रुतबा था कि वह लोगों को देश की बडी से बडी नौकरियों पर बैठा सकता था । बताते है कि पाकिस्तानी हुकुमत के हर विभाग में उसकी कृपा से नौकरी पाए हुए लोगों की भरमार है, जिसमें फौजी अफसर तो हैं ही, जज और सिविलियन अधिकारी भी शामिल हैं । पाकिस्तान में बहुत सारे नेता भी आज उसकी कृपा से ही राजनीति में हैं ।
पाकिस्तान के पर्व प्रधान मंत्री, नवाज शरीफ भी कभी हाफिज र्सइद का हुक्का भरते थे । भारत के खिलाफ जो भी माहौल है, उसके मूल में इसी हाफिज र्सइद का हाथ है । बताया गया है । ऐसी हालत में विदेश मंत्री, शाह महमूद कुरेशी भी इसी हा र्सइद के अखाडे का एक मामूली पहलवान है । ऐसी हालत में विदेश सचिव स्तर की बातचीत से कुछ भी नहीं निकलना था और न निकलेगा । भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिवों की बातचीत को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए । शायद इसी लिए वार्ता शुरु होने से पहले ही चीन में जाकर पाकिस्तानी विदेश मंत्री, शाह महमूद कुरेशी ने चीन को बिचौलिया बनाने की बात कर डाली । सब को मालूम है कि इस सुझाव को कोई नहीं माननेवाला है । पाकिस्तान की रोज रोटी पानी का खर्च उठा रहे अमेरिका को भी यह सुझाव नागवार गुजरा है ।
पाकिस्तानी फौज को मालूम है कि अगर भारत को सैन्य विकल्प का इस्तेमाल करना पडा तो पाकिस्तान का तथाकथित परमाणु बम धरा रह जाएगा और पाकिस्तान का वही हश्र हो सकता है जो १९७१ की लडर्ई के बाद हुआ था लेकिन फौज किसी कीमत पर दोेनों देशों के बीच सामान्य सम्बन्ध नहीं होने देगी । क्योंकि अगर भारत और पाकिस्तान में दुश्मनी न रही तो पाकिस्तानी फौज के औचित्य पर ही सवाल पैदा होने लगेगें । आई.एस.आई और उसके सहयोगी आतंकवादी संगठनों को भी भारत विरोधी माहौल चाहिए, क्योंकि उसके बिना उनका अस्तित्व भी खतरे में पडÞ जाएगा । जहाँ तक जÞरदारी-गिलानी जोडी का सवाल है उनकी तरफ से भारत से बातचीत का राग चलता रहेगा क्योंकि अगर उन्होंने भी इससे ना नुकुर की तो अमेरिका नाराजÞ हो जाएगा और अमेरिका के नाराजÞ होने का मतलब यह है कि पकिस्तान में भुखमरी फैल जायेगी । आज पाकिस्तान की बुनियादी जÞरुरतें भी अमेरिकी खैरात से चलती हैं । इसलिए बातचीत की प्रक्रिया को चलाते रहना उनकी मजबूर है । लेकिन उनकी राजनीतिक हैसियत इतनी नहीं है कि वे कोई फैसला ले सकें । इसलिए पूरे भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में निकट भविष्य में कोई सुधार नहीं होने वाला है ।

राजनीति में पत्रकारिता::संजय तिवारी

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

मना का संपादकीय लिखा जा चुका है । मराठी में लिखा गया बाल ठाकरे का संपादकीय हिन्दी में अनुवादित किया गया है जिसमें कहा गया है कि पुणे विस्फोट के बाद कांगे्रसियों को सुन्नत करा लेनी चाहिए और पाकिस्तान जाकर बस जाना चाहिए । बाल ठाकरे का यह संपादकीय हो सकता है कल फिर मीडिया में चर्चा का विषय बने कि उन्होंने कांग्रेसियों को सुन्नत कराने और पाकिस्तान बसने की सलाह दी है । लेकिन खान विवाद और पुणे विस्फोट के बीच बाल ठाकरे का यह रुख उनकी विचारधारा के अनुसार ही है ।
इधर संपादकीय विभाग के लिए सबसे महत्वपर्ण् काम पूरा हुआ तो काम करनेवाले लोग स्थानीय खबरों और अन्य पृष्ठों को बनाने संवारने में जुट गये । आज रविवार है इसलिए लोगों की संख्या कम है । फिर भी पूरे सामना कार्यालय में आम दिनों जैसी चहल पहल है । सामना मराठी और हिन्दी दोनों के संपादक यही बैठते हैं । प्रभादेवी के इस इलाके में कभी सिर्फचाल और खपरैल के मकान ही हुआ करते थे । आज भी अधिकांश मकान और दुकाने उसी तरह से हैं । सामना दफ्तर के सामने वाकडÞ चाल आज भी भरी पूरी अवस्था में है जिसमें डेरी और अन्य कई दुकानों के मालिक उत्तर भारतीय हैं । फिर भी अब यह इलाका भी मंहगा हो चला है इसलिए प्रभादेवी से सामना कार्यालय के लिए मुडते ही आपको सामने ऊंची अट्टालिकाएं बनती दिखाई देगी । सामना का कार्यालय जिस सद्रुरु दर्शन नामक बिल्डिंग में है वह खुद भी पांच मंजिला है जिसमें दो मंजिलों पर सिर्फसामना के कार्यालय हैं । इनमें संपादकीय विभाग के अलावा विपणन और विज्ञापन विभाग के लोग भी शामिल हैं । जैसे ही सामना कार्यालय के लिए अंदर आते हैं सामने एक गार्ड बैठा है । वह आपसे ज्यादा पूछताछ नहीं करता । दो पुलिसवाले भी मौजूद रहते हैं लेकिन वे सुरक्षा व्यवस्था को चाकचौबंद रखने की बजाय स्थानीय बच्चों के साथ खेलने और उनके झगडÞे निपटाने में ज्यादा मशगूल नजर आते हैं । ऊपर आकर बायी ओर संपादकीय विभाग और दाहिनी ओर एक कांप|mेस टेबल रखी हर्ुइ है । यह कांप|mेस टेबल अंशकालिक संवाददाताओं से मिलने से लेकर व्यापारिक गतिविधियों की योजना बनाने तक सबके लिए इस्तेमाल होती है । आखिर में कार्यकारी संपादक का कमरा है ।
जिस दिन मैं सामना के कार्यालय में दाखिल हुआ उस दिन सामना के लिखे एक संपादकीय को आधार बनाकर अखबारों ने काफी हल्ला मचाया था । सामना के संपादकीय आमतौर पर मीडिया के बाल ठाकरे का बयान ही होते हैं क्योंकि जब बाल ठाकरे खूब भाषण देेते थे तब भी अपनी असली बात लिखकर ही कहते थे । एक लिहाज से देखा जाए तो बाल ठाकरे ने राजनीति में पत्रकारिता को अपने ही अंदाज में बचाये रखा है अन्यथा किसी भी राजनीतिक दल के लिए अपना मुखपत्र निकालने के बारे में सिर्फशिवसेना ही एक मात्र ऐसी पार्टर्ीीै जो अपने कार्यकर्ताओं के लिए हिन्दी और मराठी में दैनिक अखबारों का प्रकाशन करती है । संभवतः बाल ठाकरे का अपने कार्यकर्ताओं से नित्य संवाद करने का अपना तरीका है क्योंकि वे मानते हैं कि वे अखबार आम आदमी के लिए नहीं बल्कि अपने कार्यकर्ताओं और र्समर्थकों के लिए निकालते हैं । अगर यह गांधी के बाद अपनी तरह का अकेला प्रयोग है तो इसके विषय वस्तु की भले ही निंदा कर लें लेकिन इस प्रयोग की निंदा करने से पहले थोडÞा सोचना जायज होगा । अगर हर राजनीतिक दल आज यह तय कर ले कि वह अपनी विचारधारा का घोषित तौर पर मुखपत्र प्रकाशित करेगा तो संभवतः राजनीति मैनेजरों को मीडिया पर पानी की तरह पैसा नहीं बहाना पडÞेगा । लेकिन राजनीतिक दलों के मैनेजर अंदर से न तो पार्टर्ीीे बारे में और नही उसकी विचारधारा के बारे में इतने मजबूत हैं कि इस बारे में कोई विचार कर सकें । लेकिन बाल ठाकरे ने अपनी पत्रकारिता को अपनी बात अपने र्समर्थकों तक पहुंचाने के लिए बहुत सटीक तरीके से इस्तेमाल किया है । पिछले कई महीनों से उन्होंने कोई र्सार्वजनिक बयान नहीं दिया है । उन्हें जो कुछ कहना होता है वे लिखकर कहते हैं । शुरुआती दिनों में बाल ठाकरे का संपादकीय उनके कार्यकर्ताओं के लिए नियमित संदेश भले ही होता लेकिन अब ऐसा लगता नहीं है । अब बाल ठाकरे का संपादकीय मीडिया के लिए खबर होता है । फिर भी यह क्रम अनवरत जारी रहता है ।
मैं एक उत्तर भारतीय हुँ शिवसेना के भाषा में कहें तो भैया, मैं उनके दफ्तर में जाता हूँ । हिन्दी में ही बात करता हूँ लेकिन यहां का सारा स्टाफ मेरे साथ हिन्दी में सहज नजर आता हैं । ऐसे वक्त में जब शाहरुख खान विवाद के कारण शिवसेना राष्ट्रीय मीडिया की चर्चा के केन्द्र में खडÞा है, मैं सामना के कार्यालय में पांच-छह घण्टे बैठा रहता हूँ लेकिन मुझे वह विद्वेष कहीं दिखाई नहीं देता जिसकी चर्चा हमारी मीडिया हमें बता रही है । क्या मेरी मति मारी गयी है या फिर सचमुच हालात वैसे नहीं है जैसे मीडिया हमारे सामने रख रहा है -
संपादकीय लेखन पूरा हुआ तो लोग तितर-बितर हो गये । मैंने एक कर्मचारी से आग्रह किया कि मुझे पिछले महीने के फाइल दे सकते हैं – उसने सामना की फाइल लाकर दे दी । हिन्दी का सामना १६ पृष्ठों का टेबलाइड साइज का अखबार है । पूरे महीने पहला पन्ना उसी तरह के खबरों को समर्पित है जो मुर्ंबई की मांग हो सकती है । लेकिन जब-तब बाल ठाकरे का विशेष संपादकीय भी दिखता है । वैसे नियमित संपादकीय तो अंदर के पृष्ठ पर जाता ही है । सामना के एक महीने की फाइल जब मैंने सरसरी तौर देखी तो स्पष्ट तौर पर दो बातें समझ में आयी । हो सकता है वह बाल ठाकरे की पार्टर्ीीा मुखपत्र हो लेकिन उसने बाजार और टैबलाइड अखबारों की मांग का भी ध्यान रखा है । सोलहवें पन्ने पर सोलहों दिन किसी न किसी मादक अदाकारा की अधनंगी फोटो प्रकाशित होती है । उन फोटोग्राफ्स के साथ अंगूठा चूसने और राज की बात फ्लैश हो जाने जैसी फिल्मी गाशिप भी मौजूद होते हैं । अंदर के पन्नों पर खबरें मुर्ंबई के हिन्दी पाठकों के अनुसार ही हैं । कही नल टूटा है तो कहीं सडÞक खराब हो गयी है । किसी की चैन छिन गयी है तो कहीं किसी कार्यक्रम में किसी उत्तर भारतीय का स्वागत हो गया है । राष्ट्रीय स्तर की कुछ खबरों को भी जगह दी जाती है लेकिन वह जगह सिर्फजगह देने के लिए ही दी जाती है । संभवतः सामना का संपादकीय विभाग इस बात को जानता है कि उन्हें क्या पढÞवाना है और उनका पाठक क्या पढÞना चाहता है । फिर भी आज मुर्ंबई के के हिन्दी अखबारों के टैबलाइड बजार में हिन्दी सामना सबसे बडÞा अखबार बना हुआ है ।
यहां आकर एक बात का अहसास जरुर होता है कि हमें कल्पनालोक में जीवित रहने में आनंद आता है । सामना का दफ्तर भी आम अखबारी दफ्तर जैसा ही है सिर्फएक विशिष्टताबोध के अलावा कि यह शिवसेना का मुखपत्र है । रोजमर्रर्ााी जिन्दगी से दो चार होते इस अखबार के पत्रकार भी खबरों की उसी समझ के साथ काम करते हैं जैसे कोई सामान्य पत्रकार करता है । लेकिन आमतौर पर जब हम सामना का नाम लेते हैं तो एक हौवा के रूप में उसे परिभाषित करते हैं । संभवतः मीडिया को सामना और शिवसेना का यही स्वरूप चाहिए इसलिए वे उसे परिभाषित करते हैं । सामना कार्यालय में बैठे हुए मेरे मन में बार बार यही बात आ रही है कि अन्य राजनीतिक दल अखबार न सही कम से कम मासिक पत्रिका तो प्रकाशित करते ही हैं । फिर सामना में ऐसा क्या है कि उसके संपादकीय लगातार खबरों में बने रहते हैं और पत्रिकाओं के जरिए अपना वैचारिक फैलाव करनेवाले कांग्रेस और भाजपा जैसे बडÞे दलों की भी कभी चर्चा नहीं होती -

विकास का जादुर्इ आंकडा::सतीश सिंह

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

बिहार ने विकास दर का जादुर्इ अंकडा छू लिया । किसी को यकीन नहीं । कोई यह मानने को तैयार नहीं कि बिहार जैसे राज्य में ऐसा विकास सम्भव हो सकता है – चारों ओर बिहार में विकास के आंकडों को स्वीकार करने की बजाय उस पर सवाल खडा किया जा रहा है । आइये समझते हैं कि बिहार ने विकास की दहाई का जादर्इ अंकडा छूआ कैसे -
अर्थशास्त्र के सिद्घान्तों को मानें तो बिना उद्योग-धंधों के विकास के, किसी भी प्रदेश की विकास की बात करना बेमानी है । आमतौर पर माना जाता है कि विकास की प्रथम सीढी कृषि के क्षेत्र में विकास का होना होता है। विकास का रास्ता खेतों से निकल कर ही कल-कारखानाओं के आंगन तक जाता है । उसके बाद ही वह सेवा क्षेत्र की ओर रुख कर पाता है । बीमारु राज्य के रूप में पहचाने जाने वाले बिहार में २००४-०९ के दौरान जादर्इ तरीके से विकास हुआ और इसने ११.०३ फीसदी के दर के अंकडेÞ को आसानी से प्राप्त कर लिया । भारतीय साख्यिकी संगठन ने जब इस रपट को र्सार्वजनिक किया तो पूरा देश अविश्वास और आर्श्चर्यभरी मिश्रति प्रतिक्रिया से लबरेज हो गया । दूसरे प्रदेशों खासकर विकसित राज्यों के लिए यह लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐतिहासिक और क्लासिकल सिद्घान्त के अनुसार अर्थशास्त्र के स्थापित सिद्घान्त के तरीके के अलावा किसी दूसरे तरीके से विकास नहीं हो सकता है । जैसा कि हम जानते हैं विभाजन के बाद से ही बिहार कल-कारखानाओं और बेशकीमती खनिज पदार्थों दोनों से महरुम रहा है ।
उद्योग-धंधों, बिजली और अन्य संसाधनों की कमी से जूझते हुए बिहार के लिए सिर्फ कृषि के बलबूते पर विकास के ११.०३ फीसदी जैसे उ+mचे दर को प्राप्त करना मुश्किल था । कृषि के अलावा इस विकास में सेवा क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र, होटल-रेस्त्रंा और संचार की क्रंाति के योगदान को भी हम कम कर के नहीं अंाक सकते हैं । विकासशील देशों को छोडÞ दें तो विकसित देशों के विकास में सेवा क्षेत्र का सबसे महत्वपर्ूण्ा योगदान होता है । पर पिछडेÞ प्रदेशों में ऐसा होना सम्भव नहीं हो पाता है । फिर भी बिहार ने इस मिथक को बदला है और साथ ही विकास के वाहकों में हो रहे बदलाव की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया है । सही प्रकार से औद्योगीकरण की बयार कभी भी बिहार में बह नहीं पाई । फिर भी वहंा सेवा क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ । यह अर्थशास्त्र के मापदण्डों के जरुर खिलाफ है, पर है एकदम सच । सेवा क्षेत्र में विकास का ही नतीजा था कि बिहार में कृषि और कुटीर उद्योगों के विकास को बल मिला । संचार और निर्माण क्षेत्र में भी इसी वजह से विकास हुआ ।
थोडÞा आर्श्चर्यजनक लेकिन सच है कि मनीआर्डर उद्योग ने भी इस पूरे कवायद में अपनी सकारात्मक भूमिका निभायी है । प्रवासी बिहारियों ने देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है । ये प्रवासी बिहारी अपने परिवारों को मनीआर्डर के जरिये पैसा भेजते हैं, जिससे निर्माण क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है । यह विकास निजी और र्सार्वजनिक दोनों स्तरों पर गति पकडेÞ हुए हैं । परिणामतः सीमेंट और स्टील उद्योग को इससे फायदा पहुंच रहा है । वित्तीय वर्ष२००८-०९ में स्टील और सीमेंट क्षेत्र में विकास की गति इसके कारण भी सामान्य रही है ।
बिहार में, सेवा क्षेत्र के विकास में संचार क्रान्ति का योगदान १७.४ फीसदी है । आज पूरे देश में मोबाइल धारकों की संख्या तकरीबन ५०० मिलियन हो गई है । मोबाईल के क्षेत्र में थ्री जी सुविधा की भी जल्द ही शुरुआत होने जा रही है । बिहार के दूर-दराज के गँावों में भी मोबाईल की पहुंच हो गई है । यह रोजगार का एक विकल्प बनकर पूरे देश में उभरा है । मोबाईल और इसके सिम को खरीदने और बेचने का कार्य गाँवों में जोर-शोर से चल रहा है ! उल्लेखनीय है कि इससे वर्तमान में वे अपनी आमदानी का ६० फीसदी आय अर्जित करते हैं । बिहार के ग्रामीण जनों ने इस विकल्प का जम कर फायदा उठाया है । उन्होंने इसका इस्तेमाल अपने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के लिए भी की है । इतना ही नहीं वे इसके जरिये अपनी जानकारी को भी बढÞा रहे हैं । बजार पर उनकी इसके माध्यम से हमेशा नजÞर रहती है ।
बिहार में विकास के सर्ंदर्भ में यह कहना होगा कि निश्चित रूप से अब बिहार में स्वरोजगार के प्रतिशत में तेजी से इजाफा हुआ है । सरकारी नौकरी के अलावा अब बिहारी निजी क्षेत्र में जाने के अलावा स्वरोजगार पर भी अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं । बिहार में विकास की स्थिति के ऊपर किये गये हालिया र्सर्वेक्षण से स्पष्ट हो गया है कि अब वहंा के विकास में स्वरोजगार का योगदान ४०-५० फीसदी है और बिहार में आये इस बदलाव का ही नतीजा है कि बिहार में विकास दर तेजी से बढÞ रहा है । अर्थशास्त्री भी बिहार में टूटते अर्थशास्त्र के मानकों पर हैरान हैं । रिर्सच की जरुरत पर जोर दिया जा रहा है । जबकि इन सबसे अनजान अभी भी बिहार में बैंकिंग सुविधाओं से वंचित वर्ग को बैंकिंग सुविधाओं से लैस किया जा रहा है । मोबाइल बैंकिंग की सुविधा का विस्तार हो रहा है । इससे स्पष्ट है कि बिहार में संचय की प्रवृति को बल मिल रहा है। बेरोजगारी के काले बादल तेजी से छँट रहे हैं । लोगों में जागरुकता भी आ रही है । विकास के अन्यान्य विकल्पों को भी वहंा अपनाया जा रहा है । बडे कल-कारखानों की जगह कुटीर उद्योग पर ध्यान दिया जा रहा है ।
और आखिर में लेकिन सबसे महत्वपर्ण् बात, बिहार में विकास लगभग शून्य पर जा पहुंचा था, ऐसे में अगर पिछले चार सालों में बिहार का पुनर्निर्माण शुरू हुआ है तो वह शून्य से सीधे दहाई पर ही दिखाई देगा, हो सकता है आनेवाले सालों में इसमें कमी आये लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार ने अपने विकास का जो बीडÞा उठाया है वह उसे जारी रखेगा ।

नेपाली राष्ट्रपति की भारत यात्रा का औचित्य::रुचि सिंह

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

पहला अवसर है कि जब नेपाल के पहले राष्ट्रपति रामवरण यादव की पहली भारत यात्रा को नेपाल एक सुखद शरुआत के रूप में देख रहा है क्योंकि हाशिये पर खडी नेपाली राजनीति का जो भी हश्र हो रहा हैं वह किसी से भी नही छुपा है – माओवादी नेता प्रण्चड द्वारा लगातार भारत के लिए विषवमन करना जहाँ भारत को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि भारत विरोधी हवा के दौर में कैसे पडोसी देश में अमन का हालात उत्पन्न हो – हाँलाकि प्रधानमंत्री माधव नेपाल की भारत यात्रा में उतने सजावट और कसीदे नहीं थे लेकिन नेपाली राष्ट्रपति रामवरण यादव को जिस प्रमुखता का आभास कराते हुए आवभगत की गई वह साउथब्लाक का प्रयास रहा है, जो यह दर्शाने में कामयाब रहा कि राष्ट्रपति रामवरण यादव भारतीय हितैषी हैं – यह ऐसे वक्त में नए पैगाम की शुरुआत हैं जब नेपाली राजनीति शंतरज की बिसात पर लगातार शह और मात का खेल खेल रही हैं । नेपाल के बरअक्स चीन के साथ तेजी से बढते रिश्ते को लेकर भारत का चितिंत होना स्वभाविक ही है । विगत सन्दभोर्ं को देखें तो हिमालचुली नेता चाहे वह गिरिजा प्रसाद कोईराला हो, लोकेन्द्र बहादुर थापा हो या प्रण्चड हां अपने भारत यात्राओं को सफल बताया, लेकिन जब भारतीय नेता नेपाली नेता के साथ यह संवाद कर बैठते हैं कि नेपाल और नेपालियों के बीच भारत की भूमिका का क्या महत्व है और क्या होना चाहिए – सवाल यही पर आकर अटक जाता है । और सवाल पुनः शुरु होता है कि जो कुछ भी वर्तमान में नेपाली घटनाक्रम लगातार नए-नए मोडे पर आकर खडी हो जाती हैं कहीं उसमें किसी पडोसी राष्ट्र का हस्तक्षेप तो नहीं – यही प्रश्न भारतीय संकेतां को माने तो पिछले दिनांे नेपाल नरेश ज्ञानेन्द्र का दिल्ली प्रवास इस ओर संकेत करते है कि नेपाल नरेश का गद्दी से हटना भी नेपाल के लिए अहितकर साबित हो रहा है । नेपाल नरेश को यदि सेरोमोनियल किंग के रूप में रख दिया जाता तो शायद नेपाली घटनाक्रम इस तेजी से नहीं परिर्वतित होता । काठमांडू में पिछले दिनों राष्ट्रीय प्रजातंत्र अध्यक्ष कमल थापा को आहिस्ता-आहिस्ता जो जन र्समथन प्राप्त हो रहा हैं उससे यह विदित हो रहा है कि पर्ूव नरेश ज्ञानेन्द्र अपनी कछुए की चाल को निरन्तर बनाए रखने में सफलता की ओर अग्रसर हो रहे है । सूत्रों की माने तो यू.पी.ए. अध्यक्ष सोनिया गाँधी से नरेश ज्ञानेन्द्र ने गुप्तरूप से मुलाकात कर के नेपाल की बिगडÞती हालात के समाधान में सहयोग की अपेक्षा की हैं तो वही डां. कर्ण्र्संह ने सोनिया गाँधी को पर्ण्रूप से आश्वस्त कर दिया है कि र्सार्क-बिरादरी के नन्हें देश नेपाल से राजशाही को पर्ूण्ा रूप से हटाना भारत के लिए भी उचित नहीं रहा हैं – शायद कहीं यही तो समझनेे में चूकवश भारत के पर्ूव सचिव एवं उस समय नेपाल में कार्यरत भारतीय राजदूत श्याम शरण जो कि प्रधानमंत्री के सलाहकार थे उन्हें इसका खामियाजा उठाते हुए राम-राम कहना पडÞा ।
गौरतलब है कि कटुवाल प्रकरण में राष्ट्रपति रामवरण यादव के साहसिक कदम ने चाहे अनचाहे उन्हें साउथ ब्लाक के नजदीक ला दिया लेकिन २२ दल के दबाब के कारण ही प्रधानमंत्री प्रचण्ड के निर्ण्र्ााको वह पलट पाने में सफल हुए ।
बेशक भारतीय नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात के सर्न्दर्भ में नेपाल की राजनीतिक अवस्था, शांति-प्रक्रिया, संविधान-निर्माण, माओवादी गतिविधि भारत के प्रति नेपाली आस्था जैसे प्रसंग को बातचीत का मुद्दा क्यों ना बनाया हो लेकिन यह अलंकारिक राष्ट्रपति के द्वारा समाधान का विषय नहीं रहा हैं । बहरहाल स्वागत के तौर पर विदाई लेना ही पडÞता हैं जो कि नेपाली राष्ट्रपति लेकर ही आए है । अतः राष्ट्रपति की यात्रा को सफल या असफल के रूप में ना लेकर बल्कि यह सोचना होगा कि क्या नेपाली समस्या का समाधान भारत या चीन भ्रमण करके हासिल होगा, क्योंकि नेपाली राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा यह खुद भी राष्ट्रपति बता पाने में सक्षम नहीं हैं । बेशक वह साउथ ब्लाक को आश्वासन देकर क्यों ना आ गए हो नेपाल में समस्याओं को संभाल लिया जाएगा लेकिन सवाल पुनः सामने आता है यदि हिमालचुली में स्थिर राजनीति माहौल नेपाल में स्थापित नहीं हो पाता है तो कही पुनः वही स्थिति नेपाल में दोहराना ना पडÞे जो बंगलादेश में भारत को करना पडÞा था । आगे तो बेहतर पशुपतिनाथ ही जानें ।

संधि पुनरावलोकन के लिए भारत तैयार

Posted by admin On March - 12 - 2010 ADD COMMENTS

राजधानी काठमांडू के अन्नपूर्ण होटल में भारत -नेपाल मैत्री समाज द्वारा नेपाल भारत सम्बन्ध वर्त्तमान परिपेक्ष्य में रुनामक एक अन्तरक्रिया कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें देश के प्रमुख दलों के वरिष्ठ राजनेताओंकी उपस्थिति रही । इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे नेपाल में भारत के राजदूत महामहिम राकेश सूद । manmohan
मुख्य अतिथि राजदूत महामहिम राकेश सूद ने इस अवसर अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत का नेपाल के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं पारिवारिक सम्बंध है और यह सम्बंंध तो सैक्डों-लखों वर्षो से चला आ रहा है ।
१९५० की संधि की चर्चा करते हुए श्री सूद का कहना था कि इस संधि के कारण ही नेपाली नागरिकांे को भारत में भारतीय नागरिक की तरह अधिकार प्राप्त हो सका जिसके परिणाम स्वरुप आज भारत में ७० से ८० लाख नेपाली रोजगार प्राप्त किये हुए हैं । १९५० की मैत्री संधि के कारण ही नेपाली भारत की सेना में ब्रिगेडियर, अधिकारी, कलाकार एवं आर्किटेक आदि उच्च पदों पर आसीन हैं ।
महामहिम सूद का कहना था कि अगर नेपाल चाहे तो भारत इस्ा संधि के पुनरावलोकन के लिए तैयार है । नेपाल किन-किन मुद्दोंं पर पुनरावलोकन करवाना चाहता है इस बात को तो स्वंय नेपाल को ही स्पष्ट करना होगा । उनका यह भी कहना था कि नेेपाल के प्रधानमंत्रियों प्रचण्ड तथा माधव कुमार नेपाल के भारत भ्रमण के समय यह बात उठायी गयी थी, नेपाल किस प्रकार का नया संधि चाहता है स्पष्ट करे भारत इसके लिए तैयार है । विदेश मंत्री एस. एम. कृष्णा के नेपाल भ्रमण के समय यह मुद्दा दुहरायी गयी है कि नेपाल के इच्छा के अनुसार भारत, नेपाल के साथ नयी संधि करने के लिए तैयार है ।
महामहिम राकेश सूद ने बार-बार इस प्रकार की टिप्पणी किये जाने पर कि नेपाल बिहार जैसा बनता जा रहा है, कहा कि बिहार की आलोचना करने से पहले यह देखें कि आज बिहार कहाँ पहुँच गया है । आज बिहार की आर्थिक वृद्धि दर ११ प्रतिशत पहुँच गयी है नेपाल को उसका अनुकरण करना चाहिए ।
नेपाली नेताओं द्वारा भारत के साथ व्यापार घाटा के मुद्दे की चर्चा पर श्री सूद का कहना था कि इसके लिए नेपाल खुद दोषी है । उन्हांेने कहा कि भारत नेपाल को पेट्रोल तथा अन्य सामाग्री दूसरे देशों की तुलना में कम कीमत देता है ।
महामहिम सूद का कहना था कि अगर नेपाल चाहे तो भारत इस संधि के पुनरावलोकन के लिए तैयार है । नेपाल किन-किन मुद्दोंं पर पुनरावलोकन करवाना चाहता है इस बात को तो स्वंय नेपाल को ही स्पष्ट करना होगा । उनका यह भी कहना था कि नेेपाल के प्रधानमंत्रियों प्रचण्ड तथा माधव कुमार नेपाल के भारत भ्रमण के समय यह बात उठायी गयी थी, नेपाल किस प्रकार का नया संधि चाहता है स्पष्ट करे भारत इसके लिए तैयार है ।
नेपाल में भारतीय कम्पनियाँ पूँजी निवेश के लिए तैयार है लेकिन व्यापार के लिए एक सुरक्षित वातावरण भी होना चाहिए जो अभी नेपाल में नहीं है । आये दिन के बन्द, हडताल वगैरह से व्यापार कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है । सीमा क्षेत्र में २६ भन्सार केन्द्र हैं लेकिन नेपाल उसका सही उपयोग नहीं कर पा रहा है ।
महामहिम सूद ने महाकाली संधि की चर्चा करते हुए कहा कि महाकाली में नेपाल ने स्वयं मौका गँवाया है । १३ वर्षपर्ूव किये गये इस संधि का सही कार्यान्वयन किया जाता तो आज नेपाल में ५ हजार ६ सौ मेगावाट बिजली का उत्पादन होता रहता । जिसके फलस्वरुप आज नेपाल में दैनिक ११ घंटा लोडशेङगि की समस्या उत्पन्न नहीं होती । यह स्थिति अवसर खोने की उपज है ।
राजदूत सूद ने भारतीय संविधान की चर्चा करते हुए कहा कि भारत का संविधान आज से ६० वर्षपरूव बना था और उसमें अनेकांे बार जनता की इच्छा एवं आकांक्षाओं के अनुकूल संशोधन किया गया है । नेपाल में संविधान निर्माण प्रक्रिया चल रही है उन्होंने नेपाली राजनीतिज्ञों से अपील की कि वे नेपाली जनता की इच्छा एवं आकांक्षाओं के अनु磬 ऐसे संविधान का निर्माण करें ताकि एक सुदृढरुएवं स्थिर नेपाल का निर्माण हो सके तथा नेपाल विश्व को एक उत्कृष्ट संविधान देने में सफल हो सके ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारत-नेपाल मैत्री समाज के अध्यक्ष प्रेम लश्करी ने भारत के ६१ वें गंणतंत्र दिवस के मौके पर भारत सरकार तथा भारत की जनता को बधाई दी । प्रेम लश्करी ने अपने स्वागत भाषण में नेपाल-भारत के सदियों पुराने सम्बंध की याद दिलाई और यह सम्बंध आगे भी कायम रहेगा, ऐसी आशा व्यक्त की ।
कार्यक्रम में बोलते हुए एमाले नेता भरत मोहन अधिकारी ने दोनों देशों के बीच सम्बंध को और भी सुदृढ बनाने तथा आर्थिक एवं सामाजिक सम्बंध को और आगे बढाने की आवश्यकता बतलाई । उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार की असमझदारी उत्पन्न होने पर उसे सडक पर न लाकर कुटनीतिक स्तर पर सुलझाने का प्रयास करना चाहिए ।
इस अवसर पर नेपाली काँग्रेस के महामंत्री विमलेन्द्र निधि ने कहा कि भारत के साथ हमारे देश का ऐतिहास्ािक, प्राकृतिक, भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्बंध सदियों पुराना है औैर यह सम्बध हमेशा रहेगा । उन्होंने कहा कि नेपाल में चीन को बढÞावा देने की आवश्यकता नहीं है । उनका कहना था कि नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में भारत ने अहम् भूमिका निभाई है । वैसे तो भारत नेपाल को प्रत्येक क्षेत्र में सहयोग देता रहा है लेकिन अभी हमारा देश जिस संक्रमण काल से गुजर रहा हैं उससे उबारने के लिए देश में चल रही शांति प्रक्रिया को तार्किक निष्र्कष पर पहुँचाने तथा लोकतंत्र के सुदृढीकरण एवं नया संविधान निर्माण के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने में भारतीय सहयोग की परम आवश्यकता है ।
तर्राई मधेश लाकतात्रिक पार्टीके अध्यक्ष महन्थ ठाकुर ने भारत-नेपाल सम्बन्धों को सागर की तरह गहरा और सगरमाथा की तरह उँचा बतलाया और इस सम्बध को और भी मजबूती प्रदान करने की आवश्यकता पर जोर दिया । उनका कहना था कि भारत-नेपाल की जनता को प्रत्येक परिस्थिति में सहयोग एवं र्समर्थन देता रहा है । उन्होने विश्वास व्यक्त किया कि यह सहयोग आगे भी जारी रहेगा । अध्यक्ष ठाकुर का कहना था कि देश अभी 嘪रुकी स्थिति में है । मधेश सदियों से चली आ रही उपनिवेशवाद से मुक्ति चाहता है । देश में शांति स्थापति करने तथा नया संविधान-निर्माण में भारत यथासंभव सहयोग कर एक नये नेपाल के निर्माण के सपने को साकार करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा ।
राष्ट्रिय प्रजातांत्रिक पार्टीके अध्यक्ष पशुपति शमशेर राणा ने भारत को अब तक की प्रगति एवं विकास के लिए बधाई दी तथा नेपाल-भारत के बहुआयामी सम्बंधों की चर्चा करते हुए दोनों देशों के आपसी विवादित विषयों को संवाद के माध्यम से दूर करने का सुझाव दिया ।
कार्यक्रम की समाप्ति पर नेपाल-भारत मैत्री समाज के पदाधिकारियों द्वारा विशिष्ट महानुभावों को पे्रम स्वरुप उपहार प्रदान किया गया । कार्यव|mम के अन्त में गोकुल प्रसाद पोखरेल ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए नेपाल-भारत मैत्री को मजबूत बनाने पर बल दिया ।

भारतीय छात्रराजनीति के ६० वर्ष::एम. के. प्रियदर्शी

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नवर्निमाण में छात्र-युवाओं की भूमिका महत्वपर्ण् होती है । इतिहास गवाह है कि युवाओं ने समय-समय पर आंदोलन करके देश व समाज की दशा-दिशा को बदलने का काम किया है ।
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कई छात्र-युवा संगठनों का निर्माण हुआ । लेकिन स्वतन्त्र भारत के अधिकतर छात्र-युवा संगठन या तो किसी राजनीतिक दल के सहयोगी संगठन के रुप में कार्यरत रह कर दल की नीतियों पर चलने लगे या स्थापना के कुछेक वर्षवाद उनका पतन हो गया । लेकिन स्वाधीनता के पश्चात भारत की हजारों वर्षो की गौरवशाली परम्प्राओं को ध्यान में रखकर उसे पुनः आधुनिक, विकसित एवं परिस्थितिजन्य दोषों से मुक्त करने का सपना जब सारा देश देख रहा था उस समय कुछ भारतीय युवाओं ने इन सपनों को साकार करने के लिए देश के महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय परिसरों में गतिविधियाँ प्रारम्भ की । इन्ही गतिविधियों का देशव्यापी खुला मंच ९ जुलाई १९४९ को विधिवत स्थापित हुआ । जिसका नाम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् है ।abvp_rally
छात्रों द्वारा छात्र-युवाओं, देश व समाज के लिए हित के लिए कुछ कर गुजरने हेतु गठित इस छात्र संगठन ने वर्ष२००९ में ६० वर्षपूरे कर लिये हैं । छात्रों द्वारा प्रारम्भ यह सुधारवादी प्रक्रिया रुकी नहीं बल्कि निरतंर जारी रही । हाँ, अनंत बाधाएँ जरुर आयी, समय बदली परन्तु संगठन का कार्य जारी रहा । अभाविप भारत का ऐसा छात्र-युवा संगठन है जिसने ‘वन्दे मातरम’ एवं ‘भारत माता की जय’ के नारे को प्रत्यक्ष सक्रियता में बदल दिया है । जम्मू-कश्मीर से केरल तक तथा पूर्वोत्तर के मणिपुर, अरुणाचल से लेकर गुजरात तक परिषद् अपना पैर जमा चुकी है । देश का ऐसा कोई भी छोटा-बडÞा शहर नहीं है जहाँ अभाविप सक्रिय नहीं है ।
भारत में विभिन्न प्रकार के विचारों से प्रेरित छात्र संगठन काम करते हैं लेकिन अभाविप ही एक मात्र ऐसा छात्र-संगठन है जो सत्ता एवं दलगत राजनीति से अलग रहकर छात्र व समाज के हित में राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर रचनात्मक-संगठनात्मक एवं आंदोलनात्मक काम करता है ।
भारत के पर्ुनर्निमाण के लिए युवकों का आंदोलन हो या शिक्षा में सुधार के लिए आंदोलन परिषद ने सब में बढ चढ कर अपनी भूमिका निभायी
है । आतंकवाद- नक्सलवाद के विरूद्ध आंदोलन, राष्ट्रविरोधी शक्तियों से संर्घष्, पर्यावरण बचाओं आंदोलन, परिसर बचाओ आंदोलन, पश्चिम के अंधानुकरण का विरोध, श्रीनगर में तिरंगे के अपमान के विरोध में हुआ आंदोलन बंगला देशी घूसपैठ के विरुद्ध चलो चिकन नेक आंदोलन एवं समय-समय पर आनेवाली राष्ट्रव्यापी समस्यांओं के समाधान को लेकर संर्घष्ा कर व उन संर्घष् में सफलता प्राप्त कर परिषद् ने यह साबित कर दिया है कि वह राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए सदैव प्रयासरत रहने वाला छात्र संगठन है । इतना ही नही विद्यार्थी परिषद देश के महापुरुषों की जयन्ती पर रक्तदान, स्वच्छता एवं सामाजिक समरसता से जुडÞे कार्यक्रम भी आयोजित करती रही है । परिषद् के छात्रों ने बाढÞ, महामारी एवं भूकम्प के समय भी अपना महत्वपर्ण् सहयोग देकर देशवासियों को अपने राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से अवगत कराया है ।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के ६० वर्षपूरे होने पर संगठन के राष्ट्रीय मंत्री रमाशंकर सिन्हा कहते है कि एक
विकसित भारत के निर्माण का सपना परिषद् ने देखा है जिसे पूरा करने का संकल्प लेकर हम सक्रिय है । संगठन के बिहार प्रान्त के संगठन मंत्री गोपाल शर्मा के अनुसार संगठन का कार्य आज पूरे देश में फैल गया है इसका सबसे बडा कारण समस्याओं के त्वरित सामाधान हेतु परिषद् के छात्रों द्वारा किया जाने वाला सशक्त आंदोलन ही है । वहीं परिषद् के पर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डा. रामनरेश सिंह के शब्दों में ६० वर्षो में विद्यार्थी परिषद् ने जो सफर तय किया है उस साकारात्मक सफर ने आज परिषद् को देश ही नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बडा छात्र-संगठन बना दिया है । आज यह संगठन दुनिया भर में विश्व विद्यार्थी युवा संघ ९ध्इक्थ्० के नाम से काम कर रहा है । बिहार प्रान्त के पर्ूव प्रदेश सहमंत्री बसन्तकुमार मिश्रा का मानना है कि अ.भा.वि.प. के ६० साल में सबसे बडी उपलब्धि यह है कि अपनी कार्यशैली से तो परिषद् राष्ट्रव्यापी बन हीं गया, साथ ही भारत का यह पहला छात्र संगठन है जिसमें कभी विभाजन नहीं हुआ । जो परिषद् के लिए गौरव की बात है । इसी संगठन से जुडे शिक्षक नेता प्रो. प्रियारंजन चौबे उर्फगुड्डू चौवे का कहना है कि प्राचीन काल में भारत में जो गुरु-शिष्य परम्प्रा थी उसे विद्यार्थी परिषद् ने वर्तमान समय में जीवंत रखा है । इसी कारण देश के हजारों शिक्षक आज परिषद् से जुडे हैं ।
कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि भारत की आजादी के बाद देश में गौरवशाली सभ्यता-संस्कृति की स्थापना और उस में छात्र-युवा शक्ति की सहभागिता अगर कोई छात्र-युवा संगठन सुनिश्चित करा रहा है तो वह अभाविप हीं हैं इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । तभी तो सन् १९७४ के भारतीय छात्र आंदोलन के महान योद्धा लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने छात्रों का आह्वान करते हुए कहा था कि- ‘सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं ।’
सन् १९७४ के भारतीय छात्र आंदोलन में अ.भा.वि.प. द्वारा दिया गया नारा ‘जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है, तलवारों की धारों पर इतिहास हमारा बनता है’ आज भी छात्रों-युवाओं में जोश भरने का काम कर रहा है ।
-लेखक विगत कई वर्षों से भारतीय छात्र राजनीति का अध्ययन कर रहे हैं)

ल्रि्रहान रिपोर्ट पर राजनीतिक बावेला::अवधेश कुमार

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जारी ल्रि्रहान आयोग रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है । राष्टीय स्वयंसेवक संघ परिवार एवं भाजपा विरोधी इसमें दोषी माने गए नेताओं और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं । दूसरी ओर भाजपा ने इस रिपोर्ट को एक सिरे से ही नकार दिया है । भारतीय संसद के दोनों सदनों में इस पर बहस हो चुकी है और गृह मंत्री पीं चिदम्बरम बहसों के जवाब में सरकार का पक्ष भी रख चुके हैं । यह बात तो बिल्कुल साफ है कि केन्द्र सरकार ल्रि्रहान आयोग की रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखने के लिए अभी तैयार नहीं थी । एक समाचार पत्र ने ल्रि्राहन अयोग की रिपोर्ट लीक होने का दावा नहीं किया होता और उसे आधार बनाकर संसद में सम्पर्ण् विपक्ष ने एक स्वर से उसे पेश करने की मांग न की होती तो सरकार इसे पेश करने में कुछ समय और लगाती । ३० जून को न्यायमर्र्ति ल्रि्रहान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रिपोर्ट पेश की और कायदे से इसे संसद में रखने के लिए सरकार के पास छः महीने का समय था । संसद मे गृहमन्त्री पी. चिदम्बरम ने कहा भी था कि सरकार कार्रवाई रिपोर्ट के साथ इसी सत्र में ल्रि्रहान रिपोर्ट पेश करेगी । संसद के सत्र के बीच यदि पूरी रिपोर्ट या उसके कुछ अंश बाहर आ गए तो यह यकीनन संसदीय विशेषाधिकार पर आघात है । जो अंश प्रकाशित हुए वे मूल रिपोर्ट में भी हैं । जाहिर है, कहीं न कहीं से रिपोर्ट के कुछ अंश अवश्य बाहर आए । गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि आयोग के रिपोर्ट की एक ही काँपी गृहमंत्रालय के पास है । उन्होंने यह बयान संसद में दिया, इसलिए इस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । अगर ऐसा है तो फिर वहां से लीक होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए । न्यायमर्र्ति ल्रि्रहान ने भी कहा कि उनका नैतिक पतन इतना नहीं हुआ कि वे रिपोर्ट लीक कर दें ।

लेकिन आरंभ में भले रिपोर्ट का लीक होना मुद्दा था, अब यह गौण हो गया है । आगे क्या होगा कहना कठिन है, पर यह बात साफ है कि कहीं न कहीं इस रिपोर्ट को लीक कराने के पीछे राजनीतिक रणनीति रही है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टर्जस प्रकार अपने खोए हुए जनाधार को पाने
के लिए छटपटा रही है उसमें यह आशंका स्वभाविक तौर पर बलवती होती है कि मुसलमानों का र्समर्थन पाने के लिए उसने ऐसा किया हो । जाहिर है, अयोध्या एवं ल्रि्रहान रिपोर्ट पर राजनीतिक कवायद हमें आगे भी देखने को मिलेंगे । किंतु प्रश्न है कि क्या वाकई इस समय ल्रि्रहान रिपोर्ट के सामने आने से बाबरी विध्वंस मामले में काई गुणात्मक अंतर आएगा – क्या १७ वर्षबाद आए ऐसे रिपोर्ट का किसी भी दृष्टिकोण से कोई औचित्य भी हैं – बाबारी विध्वंस से संबंधित ऐसे कौन से तथ्य देश के सामने पहले से उपलब्ध नहीं है जो ल्रि्रहान रिपोर्ट के कारण उजागर हुआ है – ल्रि्रहान रिपोर्ट में जिन ६८ नेताओं का नामोल्लेख किया गया है वे सारे पहले से ज्ञात हैं । वास्तव में थोडे शब्दों में कहा जाए तो न्यायमरूरत मनमोहन सिंह ल्रि्राहन की बाबरी विध्वंस संबंधी जांच रिपोर्ट आज के लिए अप्रासंगिक बेमानी तो है ही बाबरी विध्वंस के मूल कारणों की गहर्राई से छानबीन करने की जगह केवल अपने विचार को स्थापित करन वाले अत्यंत ही सतही तर्को और कई बार बेतुके और हास्यास्पद निष्कषार्ंर्ेेे भरे हुए हैं । १७ वर्ष ३९९ बैठकें, १०० गवाहों के बयान, ४८ बार विस्तार से ल्रि्रहान आयोग ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं लाया है जिनसे मामले पर नई रोशनी पडे ।
इस रिपोर्ट में १०२९ पृष्ठ और १६ अध्याय है ।
इसके बाद गवाहों की सूची और नक्शा है । रिपोर्ट पढने से साफ हो जाता है कि बाबरी विध्वंस से संबंधित उन्होंने अपना जो विचार निर्धारीत किया उसे ही आरंभ से अंत तक साबित किया है । परिचय -इंट्रोडक्शन) और निष्कर्ष-कन्क्लूजन) वाले अध्याय को पढÞ लीजिए । परिचय के आरंभ पैरा १.१ में वे कहते हैं कि कुछ के लिए सत्ता सर्वोपरि है और सत्ता पाने की प्रक्रिया में देश, समाज, व्यक्ति कुछ भी मायने नहीं रखता है । वस्तुपूरकता, बौद्धिकर् इमानदारी एवं तार्किकता आदि सब इसमें खो जाते हैं । अपना राजनीतिक लक्ष्य पाने के लिए संविधान, कानून, लिखित-अलिखित मोरल इथिक्स.. आदि की निंदाजनक अनदेखी -क्नटेम्ट्यूअसली इग्नोर्ड) की जाती है । पैरा १.२ में वे लिखते हैं कि संघ, भाजपा, विहिप, शिवसेना के नेता विध्वंस के समय सक्रिय या निष्त्रिmय सहयोग कर रहे थे । यह सारी प्रक्रिया राजनीतिक सत्ता पाने और इस प्रकार अपना इच्छित राजनीतिक परिणाम हासिल करने की ओर लक्षित था । १.३ में उन्होंने लिखा है कि भारत एवं हिन्दू धर्म के इतिहास में यह सबसे घृणित धार्मिक असहिष्णुता का वाकया था । पृष्ठ संख्या ९४१ म् प्स्यूटो मोडरेट आफ द परिवार नाम के शर्ीष्ाक में वाजपेयी, आडवाणी, जोशी सभी की तीखी आलोचना की है । उनके चरित्र को नकली उदारवादी साबित करने के लिए ल्रि्रहान ने पूरी ऊर्जा लगाई है । संतुलन बिठाने के लिए ९४५ पृष्ठ पर मुस्लिम आर्ँगनाइजेशन नामक शर्ष्क से कुछ मुसलमान नेताओं को सांप्रदायिक कहते हुए उनके रवैये की भी आलोचना की है । वे कहते हैं कि मुसलमान नेताओं की विफलता अपने आप में ६ दिसंबर की घटना के लिए उत्तरदायी नहीं है । लेकिन उनका ठीक से काम न करने का जो आरोप है उससे संघ परिवार
का काम आसान हो गया । आयोग अपने लोगों के पक्ष को प्रभावी रूप से न उठाने के लिए और एक प्रभावी लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका अदा करने में विफलता के लिए केवल टेरटियरी लेवेल पर ही मुस्लिम संगठनों एवं नेताओं को दोषी मानता है ।

पूरी रिपोर्ट में ल्रि्रहान इस बात को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि अयोध्या आंदोलन जनता का आंदोलन कभी था ही नहीं, जन भावना उससे कभी जुडÞी ही नहीं, बस, भाजपा एवं विहिप के निहित स्वार्थी नेताओं द्वारा भावनाएं भडकाने के कारण अति सीमित संख्या में आम आदमी बहकावे में आ गए । पृष्ठ संख्या ९३१ के पैरा १५८.२ में ल्रि्रहान लिखते हैं, ‘अतिशयोक्तियों के अलावा अयोध्या अभियान को -कैम्पेन शब्द प्रयोग किया गया है, मूवमेंट नहीं ।) आम आदमी यहां तक की औसत हिन्दू की इच्छा या स्वैच्छिक र्समर्थन हासिल नहीं था । हालांकि यह अभियान उन सबको चुप कराने एवं यह सुनिश्चित करने में सफल हो गया कि यदि उन्होंने अभियान के नेताओं के निंदात्मक भाषणों का विरोध किया या स्थिति का तार्किक मूल्यांकन किया तो उन्हें नास्तिक या हिन्दू विरोधी या गैर देशभक्त करार दे दिया जाएगा ।’ आगे पैरा १५८.३ में वे लिखते हैं, ‘इस प्रकार हालांकि इस रिपोर्ट में मूवमेंट शब्द का बार-बार प्रयोग है, किंतु अयोध्या में मंदिर की मांग शब्द के सच्चे अर्थ में कभी जनआंदोलन -पब्लिक मूवमेंट) नहीं हो पाया । परंपरागत रूप से मूवमेंट या आंदोलन शब्द का प्रयोग किसी विशेष परिणाम के लिए लोगों की सामूहिक चाहत को निर्दिष्ट करता है, अयोध्या अभियान कभी उस स्तर के समानुपात को भी छू नहीं पाया । …..’

तो इस प्रकार उनकी रिपोर्ट में इस बात पर
निरंतरता है कि अयोध्या आंदोलन नामक कोई आंदेलान नहीं था, इसे संघ परिवार के नेताओं ने केवल सत्ता पाने के लिए हथियार बनाया और वे इसे आंदोलन साबित करने के लिए कर्ुतर्क देते रहे । इसे ही उन्होंने बाबरी विध्वंस को साजिश साबित करने का भी आधार बना दिया है । उन्होंने कहा है कि किसी दृष्टिकोण से साबित नहीं होता कि उपस्थित कारसेवकों द्वारा स्वतःस्फर्ूत तरीके से ध्वंस को अंजाम दिया गया । भाजपा सहित संघ परिवार के सभी प्रमुख नेताओं को किसी न किसी तरह इसके लिए दोषी करार दिया गया है । संघ परिवार और उससे जुडÞे दूसरे संगठनों की भूमिका पर भी आयोग ने प्रकाश डाला है । इस रिपोर्ट के अनुसार भाजपा, संघ, विहिप के सभी प्रमुख नेताओं ने काफी बुद्धिमता से बाबरी ढांचा ध्वंस करने की योजना को तय समय पर क्रियान्वित किया एवं वहां आनन-फानन में एक अस्थायी मंदिर भी बना दिया गया । लेकिन पूरी रिपोर्ट में वे साजिश को साबित करने के लिए कोइ तथ्य नहीं देते । जहाँ तक अटलबिहारी वाजपेयी का प्रश्न है तो इन्हंे सीधे बाबरी विध्वंश से न जाडÞकर भडÞकाऊ भाषण देने का दोषी पाया गया है । आयोग ने वाजपेयी को गवाही के लिए बुलाना तक मुनासिब नहीं समझा । यही बात शंकरसिंह बाघेला के साथ भी है । इन दोनों से पूछताछ किए और उनको अपनी बात रखने का मौका दिए बिना आयोग कैसे उनको दोषी मानने के निष्कर्षपर पहंुच गया – कई दूसरे नेताओं और अधिकारियों के बारे में भी ऐसा ही है । देखा जाए तो उस समय केन्द्र एवं राज्य सरकार में जो भी संबंधित विभागों से जुडेÞ मंत्री या अधिकारी थे उन सबको किसी न किसी तरह बाबरी ध्वसं का दोषी माना है । वास्तव में इन करणों से यह अत्यंत ही साधारण दर्जे की रिपोर्ट बन गई है ।
कोई अयोध्या के विवादित स्थल पर श्रीरामजन्म
भूमि मंदिर निर्माण को लेकर चले आंदोलन का र्समर्थक हो या विरोधी, कोई भर्र् इमानदार पर्यवेक्षक इस निष्कर्षको स्वीकार नहीं कर सकता कि उस आंदोलन से जनता का जुडÞाव था ही नहीं या वह आंदोलन ही नहीं था । सच यह है कि आजादी के बाद भारत में दो ही बडे आंदोलन हुए जिनका देशव्यापी असर था, १. आपातकाल विरोधी आंदोलन एवं २, अयोध्या आंदोेलन । अगर यह आंदोलन इतना ही जनविहिन था तो फिर केन्द्र से लेकर राज्यों में कांग्रेस की सरकारें उसके सामने क्यों झूकती रहीं – शिलान्यास की अनुमति तो भाजपा की सरकार ने नहीं दी । ल्रि्रहान एवं उनके सुर में ताल मिलाने वाले नेता यह क्यों भूल जाते हैं कि अयोध्या आंदोलन से उत्पन्न ज्वार ने ही भाजपा को संसद के दो स्थानों से १९८९ में ८९ एवं १९९१ में ११९ तक पहुंचा दिया । स्वयं राजीव गांधी ने १९८९ का चुनाव अभियान अयोध्या से आंरभ किया एवं रामराज्य निर्माण की बात की । यह अयोध्या आंदोलन के जनता पर असर का ही परिणाम था । तो इस प्रकार जो रिपोर्ट अपना सैद्धांधिक आधार ही गलत कायम कर रहा हो उसकी अन्य व्यावस्थाओं को कैसे स्वीकार किया जा सकता है -

मजे की बात देखिए कि ल्रि्रहान स्वयं सच तक नहीं पहुंच पाने में अपनी विवशता भी दर्शाते हैं । पृष्ठ संख्या ६-७ के पैरा ३.५ में ल्रि्रहान कहते हैं कि उनका आयोग डिटेक्टिव एजेंसी नहीं है, इसलिए उसे जो खंडित, बिखरी हर्इ सूचनाएं या गलत सूचनाएं -पग्मेंटेड इन्प‘र्मेशन) दिया गया उसके साथ अपना काम करने लिए विवश था । वे लिखते हैं कि उनकी जांच का जो दायरा था उसमें वे राज्य सरकार, केन्द्र सरकार एवं नीजी व्यक्तियों के सहयोग पर निर्भर थे । उन्होंने राज्य एवं केन्द्र की एजेंसियों पर महत्वपर्ण् तथ्य
छिपाने का भी आरोप लगाया है । अध्याय आफ्टरवार्ड्स में ल्रि्रहान रोना रोते हैं कि क्यों देर हो गई । हमारे पास कर्मचारी स्थायी नहीं थे । कम कर्मचारी रहें । कोई कर्मचारी जब तक कमीशन का काम समझता तब तक उसका स्थानांतरण हो जाता । हमें बाहर से स्टेनोग्राफर लाना पडा । कोई आयोग छानबीन एजेंसी नहीं होता । सबकी सीमाएं होतीं हैं, लेकिन ल्रि्रहान अपने निष्कर्षों को ऐसे लिखते हैं मानो असुविधा, असहयोग और छानबीन एजेंसी न होने के बावजूद उन्होंने सच क पता लगा ही लिया । १९८३ से १९८७ तक कांग्रेस या संयुक्त मोर्चा की सरकार थी । ल्रि्रहान लिखते हैं कि लगातार विज्ञापन देने के बावजूद कोई भी साक्ष्य या किसी प्रकार की सूचना लेकर हमारे पास नहीं आया । जाहिर है, यदि आयोग को असहयोगात्मक रवैये का सामना करना पडा तो इसके लिए केवल भाजपा दोषी नहीं थी, स्वयं इस रिपोर्ट से ही यह साबित होता है कि सभी पार्टियों का रवैया असहयोगात्मक था ।

अब आइए अनुशंसाओं पर । पृष्ठ संख्या ९६३ से ९८१ यानी १८ पृष्ठों पर अनुशंसाएं हैं । इसमें दंगो को रोकने से लेकर, अपराध, न्याय प्रणाली में सुधार, पुलिस सुधार, सिविल सेवा सुधार जाने क्या-क्या नहीं है । वास्तव में यहंा ल्रि्रहान आजादी के बाद भारत में व्यवस्था के स्तर पर सबसे बडे परिवर्तनवादी बन जाते हैं । सच कहा जाए तो यह भानुमति का पिटारा है । ऐसा लगता है जैसे १७ सालोंकी कसर पूरी करने के लिए उन्होंने अनुशंसाओं को १८ पृष्ठों तक फैला दिया है । इसमें तो भारत की चुनाव प्रणाली से लेकर, राजनीति, न्याय प्रणाली, धार्मिक संस्थाओं की प्रकृति आदि सभी को बदल देने का सुझाव उन्होंने दे दिया है । वैसे भारत सरकार ने कहा है कि उसने रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है । किंतु १३ पृष्ठों की कार्रवाई रिपोर्ट में रिपोर्ट के आधार पर नए सिरे से मुकद्दमंके बारे में कुछ नहीं कहा है । किसी नेता या अधिकारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का संकेत इसमें नहीं है । केवल यह कहा गया है कि बाबरी ध्वंस से संबंधित न्यायालयों मंे चल रहे मुदकमों की गति तेज की जाएगी । प्रश्न है कि इसके लिए ल्रि्रहान रिपोर्ट की कोई आवश्यकता थी क्या – कार्रवाई रिपोर्ट में ल्रि्रहान आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर जो अन्य बातें कहीं गई हैं वे भी ऐसी ही है । मसलन, राष्ट्रीय एकता परिषद को वैधानिक अधिकार देना, आपराधिक न्याय आयोग की स्थापना, दंगों के क्षेत्र को कब्जे में लेने का केन्द्र सरकार को अधिकार देने के लिए कानून बनाना सरकारी अधिकारीयों के लिए धार्मिक संस्थाओं मे पद लेने का निषेध
आदि । सांप्रदायिक दंगा होने पर संबंधित क्षेत्र को केन्द्र सरकार द्वारा नियंत्रण में लेने संबंधी विधेयक भी सामने आ चुका है । कार्रवाई रिपोर्ट में राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के समाधान के लिए राजनीतिज्ञों के बजाय विशेषज्ञों की समिति बनाने की बात कही गई है । कह सकते हंै कि श्ाायद ल्रि्रहान रिपोर्ट नहीं आता तो सरकार इन दिशाओं में शायद ही विचार करती । वैसे कार्रवाई रिपोर्ट मं शामिल होने का अर्थ उनका अमल में आना नहीं है । कार्रवाई रिपोर्ट का स्वरूप भी अनुशंसात्मक ही होता है । इनमें कुछ बातें तो राज्यों के अधिकार क्षेत्र की हैं, केन्द्र किसी राज्य के दंगाग्रस्त क्षेत्र को अपने अधिकार म,ें ले इस पर राज्यों की सहमति आसानी से नहीं हो सकती ।

अब आए मुकदमों के पहलू पर । सीबीआई को रिपोर्ट सौंपने का कानूनी महत्व न के बराबर है । जहां तक इसके आपराधिक मुकदमे का पहलू है तोे महत्व केवल सीबीआई के आरोप पत्र का ही है, ल्रि्रहान रिपोर्ट का कोई कानूनी महत्व तभी हो सकता है जब इसके आधार पर मुकदमा दर्ज हो । मुकदमा दर्ज होने के बाद भी पुलिस को छानबीन करनी होगी और न्यायालय में उसका
आरोप पत्र ही मान्य होगा । यह ध्यान रखना जरूरी है कि बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई छानबीन कर काफी कुछ पहले से हीं सामने ला चुकी है ६ दिसम्बर १९९२ के बाबरी विध्वंश के बाद स्थानीय थाना मंे मुकदमा नं. १९७/९२ कारसेवकों के विरूद्ध एवं १९८/९२ नेताओं के खिलाफ दायर हुआ । २७ फरवरी १९९३ को सी.आइ.डी. ने ललितपुर के विशेष न्यायालय मं आरोप पत्र दायर कर दिया । ८ जुलाई को रायबरेली में विशेष न्यायालय बना । एवं २५ अगस्त १९८३ को सी.बी.आई. को मामला सौंप दिया गया । ८ सितम्बर १९८३ को लखनऊ में विशेष न्यायालय बना जहाँ सी.बी.आई. ने ४९ लोगों

के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया । सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर १९८/९२ के आरोपियों को भी लखनऊ न्यायालय में मुकदमा चलाने की बात कहीं । इसे बाद में उच्च न्यायालय ने अवैध करार दिया । इस समय इनके खिलाफ रायबरेली में मुकदमा चल रहा है । अन्य ४७ मामले लखनऊ के विशेष न्यायालय में चल ही रहा है ।

तेलंगाना को लेकर गरमायी राजनीति

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण को लेकर हुए आंदोलनों ने कई वार भारत सरकार को झुकने पर मजबूर भी किया है । इन्ही आंदोलनों का परिणाम है कि भारत में छतीसगढ, उत्तराखण्ड और झारखण्ड जैसे प्रदेश अपने-अपने मूल्य राज्यों से अलग होकर बने है ।

अभी हाल के दिनां में टी.आर. एस. प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव ने अलग तेलंगाना प्रदेश की माँग को लेकार आन्ध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद में आमरण अनशन शुरू किया था । ग्यारह दिनों के अनशन से केन्द्र की कांग्रेस सरकार और उसके प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इतने घबरा गये कि सरकार ने आनन-फानन में अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी । तेलंगाना राज्य निर्माण की मांग कोई नयी नहीं है । के. चन्द्रशेखर राव के पार्टर्लंगाना राष्ट्र समिति का गठन अलग तेलंगाना राज्य निर्माण की माँग को केन्द्र बिन्दु बना कर ही किया गया था । अपने स्थापना काल से हीं टी. आर. एस. अलग राज्य की माँग करता आ रहा है । वर्ष२००४ के लोकसभा चुनाव के बाद टी. आर. एस. को ऐसा लगा था कि उसने केन्द्र की काँग्रेस यू पीए सरकार को अगर र्समर्थन किया तो अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण अवश्य हो जाएगा । फलतः टी.आर.एस. ने सरकार को अपना र्समथन भी दिया । इतना ही नही टी.आर.एस. प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव उक्त सरकार में मन्त्री भी बने । लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल पूरे होने में जब कुछ ही दिन शेष थे तो चन्द्रशेखर राव को लगा कि सरकार तो अब उनके साथ धोखा कर रही है अतः उन्होने मंत्रीपरिषद से इस्तीफा देकर सरकार से र्समथन वापस ले लिया । सरकार से बाहर आने के बाद अलग राज्य की माँग को उन्होंने जोर-शेार से उठाया । एक प्रकार से आंदोलनों का दौर चल पडा और टी.आर.एस. प्रमुख के अनशन से घबरायी केन्द्र सरकार ने तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा कर डाली ।
केन्द्र द्वारा अलग तेलंगाना राज्य की घोषणा के साथ हीं पूरे आन्ध्रप्रदेश में राजनीतिक खेमाबन्दी का दौर शुरु हो गया । आन्ध्र की राजनीति इस मुद्दे पर दो भाग में बँट गई है । एक तरफ टी.आर.एस. अपनी माँग पूरी होने पर जश्न मना रहा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस का एक तबका समेत चन्द्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टर् फिल्म अभिनेता चिरंजीवी के नेतृत्व वाली प्रजा राज्यम् पार्टर् संयुक्त आन्ध्र प्रदेश को लेकर वृहत जनआन्दोलन छेड दिया है । तेलंगाना के पक्ष और विपक्ष में शुरू हुआ यह आन्दोलन आन्ध्रप्रदेश तक ही सीमित नहीं है । अब यू पी की मुख्यमंत्री मायावती देश के सबसे बडे राज्य यू पी को तीन भागों में बाँटने की माँग कर रही है तो दार्जलिंग में गोरखालैण्ड की पुरानी माँग अब नये सिरे से उठने लगी है । महाराष्ट्र में विदर्भ और बिहार में अलग मिथिलाचंल राज्य की माँग भी अब जोर-शोर से की जा रही है । पूरे देश में अलग राज्य की माँग को लेकर एक आँधी सी चल पडी है जो रूकने के लिए फिलहाल तैयार नही है । इधर आन्ध्रप्रदेश में अलग तेलंगाना और अखण्ड आन्ध्रप्रदेश को लेकर तटीय एवं राँयल सीमा क्षेत्र में चल रहे जोरदार आन्दोलनों और राज्य मन्त्रिमण्डल के मन्त्रियों, विधायकों के त्यागपत्र एवं अपने हीं पार्टर्नेताओं द्वारा जारी व्रि्रोह से घबरा कर केन्द्र सरकार ने अब पैतरा बदलना शरू कर दिया है । सरकार का यह ताजा बयान कि तेलंगाना पर फैसला सभी पक्षों को विश्वास में लेकर किया जायेगा, ने पुनः अन्ध्रा की राजनीति में नया आग लगा दिया है ।

यहाँ सबसे तथ्यपरक बात यह है कि क्या के. चन्द्रशेखर राव के ग्यारह दिनों के आमरण-अनशन से घबरा कर केन्द्र सरकार को अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा करनी चाहिए थी या फिर टी.आर.एस. समेत देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों और आन्ध्रप्रदेश में कार्यरत क्षेत्रीय दलों के साथ मिल बैठ कर तेलंगाना मुद्दे का हल निकाला जाना चाहिए था । राजनीतिक पंडितो का ऐसा मानना है कि केन्द्र सरकार ने जल्दबाजी में निर्ण्र्लिया है । सरकार को बेहतर राजनीतिक माहौल में होशियारी पर्वक इस समस्या का सामाधान करना चाहिए था जो नहीं हो सका । भारत सरकार अगर सूझ-बुझ से काम ली होती तो आज आन्ध्रप्रदेश के अलावें अन्य राज्यों में अलग राज्य की माँग का जो सिलसिला शुरू हो गया है वह शुरू नहीं होता ।

देश की आजादी के बाद भारतीय संघ को मजबूत करने तथा भारत को एक सूत्र में बाँधने के लिए स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृहमन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने ६०० देशी रियासतों का विलय भारतीय परिसंघ में कराया था । सरदार पटेल ने अपने जीवन में कभी यह नहीं सोचा होगा कि जिस भारत को वे इतनी मजबूती प्रदान कर रहे हैं उसे हमारे हीं देश के नेता अपनी-अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाने के लिए अलग-अलग राज्यों में विभाजित कर देगें । खैर अभी भी समय है भारत सरकार गंभीरता पर्ूवक विचार करे । अलग राज्य का निर्माण विकास का मुख्य पैमाना नहीं हो सकता । उदाहरण के लिए हम बिहार से अलग हुए झारखण्ड को हीं देखें । अलग झारखण्ड निर्माण के बाद वहाँ शुरु राजनीतिक अस्थिरता और नक्सली गतिविधियाँ रुकने का नाम हीं नही ले रही है । अभी झारखण्ड में विकास का मुद्दा गौण हो गया है । अतः भारत सरकार और देश में कार्यरत सभी छोटे-बडÞे राजनीतिक दलों को अपने-अपने स्वार्थ-सत्ता से ऊपर उठकर देश की एकता-अखण्डता एवं विकास के लिए काम करना चाहिए । इसी में देश, सरकार एवं राजनीतिक दलों की भलाई है ।

भारत कि सुरक्षा को चीन की चुनौती::डाँ. राम तिवारी

Posted by Himalini On December - 2 - 2009 ADD COMMENTS

ram tiwariचीन विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। वर्तमान में इसकी
कुल जनसंख्या 1 अरब 27 करोड़ 31 लाख से अधिक है। इस देश की राजधानी बीजिंग (पुराना नाम पीकिंग) है तथा प्रमुख भाषा चीनी (मेंडारिन) है। इस देश का प्रमुख धर्म सरकारी स्तर पर अनीश्वरवादी है फिर भी ज्यादातर आबादी बौद्ध व ताओ धर्म की अनुयायी है तथा जातीय समूह हान चाइनीज है। यहाँ की मुद्रा युआन है।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार ईसा पूर्व 1500 में चीन में शांग राजवंश का शासन स्थापित था। सन् 1911 ई0 में एक जनक्रांति के द्वारा मांचू राजंवश का तख्ता पलट करने के बाद डॉ0 सन-यात सेन ने औपचारिक तौर पर 1 जनवरी 1912 ई0 को गणतंत्र की स्थापना की। कुओमितांग पार्टी के संस्थापक डॉ0 सन-यात सेन ने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में चीन की प्रगति के लिए अनेक कदम उठाए, किन्तु पराजित हुई राजशाही के कृत्यों के चलते यह देश एक बार पुनः गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। इस घटना के बाद चीनी राजनीतिक पटल पर सबसे शक्तिशाली व्यक्त्वि के रूप में माओत्सेतंुग का पदार्पण हुआ जिन्हें माओजिडांग के नाम से भी जाना जाता है। इन्होनें राजशाही समर्थकों व कुओमितांग पार्टी के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया। 1 अक्टूबर 1949 ई0 को माओत्सेतुंग के नेतृत्व में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की स्थापना हुई। माओत्सेतंुग के कार्यकाल में देश की प्रगति के लिए ‘महान अग्रगामी उछाल नीति (दि ग्रेट लीप फारवर्ड 1958-60) और सांस्कृतिक क्रांति (1965-68) का सूत्रपात हुआ। चीन में सांस्कृतिक क्रांति का दौर भारी उथल-पुथल का था। माओत्सेतंुग ने बुजुर्वा (जमीदारों व पूँजीपति मानसिकता) वर्ग के समापन के लिए नृशंस कदम उठाए और सरकारी आतंंक के चलते अनेक बुद्धिजीवियों, शिक्षकों व व्यापारियों को उत्पीड़ित किया गया।

9 सितम्बर, 1976 ई0 को माओत्सेतुंग की मृत्यु के पश्चात् डेंग शियाओपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी की बागडोर संभाली। डेंग के आगमन से चीन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। 1980 ई0 से डेंग ने चीन मे नव आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किये जो साम्यवाद (कम्युनिज्म) की मूलभूत मान्यताओं से मेल नहीं खाते थे। डेंग के इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को चीन के वर्तमान शासक जारी रखे हुए है।

चीन आर्थिक नीतियों के सन्दर्भ में तो पूँजीवाद की राह पर चल निकला है, पर इस देश में राजनीतिक व्यवस्था के रूप में साम्यवाद वर्तमान में भी कायम है। प्रशासनिक व्यवस्था के लिहाज से चीन को 22 प्रांतों में विभक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त 5 स्वायत्तशासी क्षेत्र और विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (हांगकांग व मकाओ) है।

चीन की सेना को ‘जनमुक्ति सेना’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

मुक्ति आन्दोलन के दौरान अस्तित्व में आई जनमुक्ति सेना (लाल सेना) की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैः-

1. जन सेना होने के कारण यह जनता के विभिन्न कार्यों व उत्पादन में उनकी सहायता करती है।

2. सेना का मुख्य कार्य साम्राज्यवादी आक्रमण से देश की रक्षा करना व देश के निर्माण को संरक्षित रखना है।

3. सेना में राजनीतिक कार्य तत्वतः सेना में दल का कार्य है और दल के कार्यकारी संगठन ही राजनैतिक अंग है। राजनीतिक अंगों के माध्यम से दल सारी सेना की वैचारिक शिक्षा को निर्देशित करता है।

भारत और चीन के मध्य विवाद के प्रमुख बिंदु :-

1. मैकमोहन लाइनः- ब्रिटेन और तिब्बत के बीच हुए सन् 1914 ई0 के शिमला समझौते के तहत जो लाइन ब्रिटिश भारत और तिब्बत की सीमा रेखा के तौर पर खींची गयी थी उसे ही मैकमोहन लाइन कहते है। इस लाइन को सर हेनरी मैकमोहन जो इस समझौते के मुख्य समन्वयक व उस वक्त भारत में ब्रिटेन के विदेश सचिव थे, के नाम पर मैकमोहन लाइन कहा जाता है। 550 मील की यह लाइन भूटान से हिमालय के सहारे ब्रह्मपुत्र नदी के महान मोड़ तक जाती है। यह लाइन लगभग उतनी ही लम्बी है जितनी भारत नियंत्रित क्षेत्र और चीन अधिकृत क्षेत्र के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा। इस लाइन को भारत अपनी स्थायी सीमा रेखा मानता है जबकि चीन इसे एक अस्थायी नियंत्रण रेखा मानता है। इसके अलावा चीन मैकमोहन लाइन के दक्षिण में स्थिति अरूणाचल प्रदेश पर भी अधिकार जताता है।

2. अरूणाचल प्रदेश :- भारत का यह सुदूर पूर्वी राज्य भारत और चीन के मध्य विवाद का एक मुख्य विषय बना हुआ है। मैकमोहन लाइन के दक्षिण में स्थित इस विवादित क्षेत्र को भारत ने सन् 1954 ई0 में पूर्वोत्तर सीमा एजेंसी (छवतजी म्ंेज थ्तवदजपमत ।हमदबल. छम्थ्।) नाम दिया और 1972 ई0 में इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया। सन् 1987 ई0 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया। सन् 1937 ई0 में सर्वे ऑफ इंडिया ने प्रथम बार अपने नक्शे में मैकमोहन लाइन को आधिकारिक सीमा रेखा के रूप में दर्शाया था और इस विवादित क्षेत्र को भारतीय हिस्सा माना था। इसके बाद सन् 1938 ई0 में ब्रिटेन द्वारा अधिकारिक तौर पर शिमला समझौते के प्रकाशन के बाद इस क्षेत्र पर भारतीय अधिकार सिद्ध हो गया था। लेकिन सन् 1949 ई0 में चीनी क्रांति के बाद स्थापित साम्यवादी सरकार ने इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया और तब से लेकर वर्तमान तक यह दोनों देशों के मध्य विवाद का बिंदु बना है।

3. अक्साई चिन – जम्मू-कश्मीर के पूर्वी क्षेत्र में स्थित अक्साई चिन का रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्व है। इस पर फिलहाल चीन का कब्जा है, जबकि भारत सदैव से ही इस पर अपना दावा जताता रहा है। अक्साई चिन उइगुर भाषा का शब्द है और इसका अर्थ चिन का सफेद पत्थरों वाला रेगिस्तान होता है (यहाँ चिन का अर्थ क्विंग वंश से है) 5,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित तिब्बती पठार के इस हिस्से को सोडा मैदान भी कहा जाता है। यहाँ बारिश बहुत ही कम होती है। इस हिस्से में आबादी न के बराबर है (चीनी सैनिकों को छोड़कर)।

अक्साई चिन 19वीं शताब्दी तक लद्दाख साम्राज्य का अभिन्न हिस्सा था। इसके बाद जब लद्दाख पर ‘कश्मीर’ का नियंत्रण हो गया तो ‘अक्साई चिन’ भी कश्मीर साम्राज्य का हिस्सा बन गया। सन् 1950 ई0 के दशक में अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर लिया और इस क्षेत्र में होते हुए उसने तिब्बत तक एक सड़क ‘चीन राष्ट्रीय राजमार्ग-219′ का निर्माण शुरू कर दिया। इसी सड़क के निर्माण को लेकर भारत-चीन के सम्बन्ध इस स्तर तक बिगड़े की इसकी परिणति 1962 ई0 के भारत-चीन युद्ध में हुई। अक्साई चिन का दायरा लगभग 38,000 वर्ग किमी0 है। चीन के लिए अक्साई चिन चीन राजमार्ग जिक्यिाँग एवं तिब्बत को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करता है और उसके लिए यह मार्ग सामरिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। स्त्रातजीय दृष्टि से भारत के लिए भी इस क्षेत्र का अधिक महत्व है क्योंकि यह एक ऐसा स्थल बिन्दु है जहाँ रूसी गणराज्य (तजाकिस्तान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत व चीन के भू-भाग मिलते है।

4. ब्रह्मपुत्र को मोड़ने की योजना :- चीन वर्तमान में एक ऐसी योजना को अंजाम देने की कोशिश कर रहा है। जिससे भारत की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। चीन की मंशा है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी से सलााना दो सौ अरब घन मी0, पानी येलो नदी में डाल दें। ब्रह्मपुत्र नदी से पानी लेने की योजना पर चीन पिछले कई वर्षों से कार्य कर रहा है। यह चीन की विशाल ‘साउथ नोर्थ वाटर लिंक’ योजना का हिस्सा है। चीन के इस कोशिश को नदी में ‘पानी की डकैती के रूप में देखा जा सकता है। भारत और बांग्लादेश के लिए ब्रह्मपुत्र पानी के बड़ी स्त्रोतों में से एक है। यदि चीन इस योजना में सफल हो जाता है तो इससे भारत के लिए जल-विज्ञान और भू-विज्ञान सम्बन्धी खतरे पैदा हो जाएंगे। चीन शूमाटन प्वाइंट पर प्रस्तावित बाँध के लिए ब्रह्मपुत्र नदी से पानी लेने की योजना बना रहा है। यह जगह चीन के हिमालय क्षेत्र मे है। यह वह जगह है जहाँ भारतीय और यूरेशियन प्लेटें मिलती है जिसकी वजह से भारतीय क्षेत्र में भूस्खलन या भूकम्प जैसी गतिविधियाँ होने की आशंका ज्यादा रहती है।

5. हिमालय पर चीन का खतरा :- चीन सतलुज और उसकी सहायक नदियों पर तिब्बत में कई बिजली परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है। इसके कारण बरसात के मौसम मंे यह नदियाँ हिमाचल प्रदेश में तबाही ला सकती है। दूसरी ओर गर्मियों में इनके कारण पानी का अकाल पड़ सकता है। जानकारी बाँटने के लिए भारत के साथ किये गये समझौते का पालन भी चीन नहीं कर रहा है।

6. तिब्बत का बिन्दु :- चीन के कब्जे में आने से पहले तिब्बत की भूमिका ब्रिटिश भारत और उत्तर-पूर्वी एशियाई देशों के बीच एक ‘बफर स्टेट’ के रूप में थी। उस समय बाहरी विश्व से तिब्बत का जो भी व्यापारिक या सांस्कृतिक सम्पर्क होता था वो भारत के जरिए होता था। सन् 1949 ई0 की चीनी क्रांति से पहले तिब्बत की राजधानी ल्हासा में भारत और चीन के दूतावास स्थापित थे।

सन् 1892 ई0 में तिब्बत को लेकर चीन ने दावे करने शुरू कर दिए और सन् 1913 ई0 तक उसने कई बार तिब्बत पर कब्जा करने के असफल प्रयास किये। सन् 1913 ई0 में तिब्बत ने स्वतन्त्रता की घोषण कर दी और सन् 1914 ई0 में इस मुद्दे को लेकर शिमला में बैठक हुई। ब्रिटेन, तिब्बत और चीन के बीच हुई इस बैठक में तिब्बत ने संप्रभुता की माँग रखी जिसे चीन ने मानने से इन्कार कर दिया। इसके बाद तिब्बत को आतंरिक व बाहरी तिब्बत में बाँटने का निश्चय किया गया। इसमें से बाहरी तिब्बत पर स्वायत्तता के साथ चीन की सर्वोच्चता स्थापित करने की बात कही गई। लेकिन चीन और आंतरिक तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण को लेकर बात बिगड़ गई और चीन इस बैठक से बाहर हो गया। बाद में तिब्बत ने ‘लोचन शात्रा शात्रा’ के नेतृत्व में और ब्रिटेन ने सर हैनरी मैकमिलन के नेतृत्व में द्विपक्षीय ‘शिमला समझौता’ किया और मैकमोहन लाइन अस्तित्व में आई। इस समझौता मे तिब्बत को एक स्वतंत्र राष्ट्र माना गया था न कि चीन का प्रांत। तब से लेकर अब तक चीन मैकमोहन लाइन को नकारता आ रहा है।

सन् 1949 ई0 में जब चीन में साम्यवादी सरकार बनी तब तिब्बत ने चीन से ल्हासा स्थित चीनी दूतावास छोड़ देने को कहा। इससे चीन और तिब्बत के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए। सन् 1950 ई0 की शुरूआत में चीन ने तिब्बत से शांतिपूर्वक विलय की बात कही और तिब्बत के पूर्व में स्थिति ‘चामदो’ शहर में अपनी सेना इकट्ठी कर ली। 7 अक्टूबर, 1950 ई0 को जब तिब्बती प्रतिनिधि मंडल चीन से वार्ता करने वाला था उसी समय चीन के 80,000 सैनिकों ने तिब्बत पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया और विश्व में प्रचारित किया कि हमने तिब्बतियों को साम्राज्यवादी शक्तियों (भारत) के शिकंजे से मुक्त कर दिया। इसके बाद 23 मई 1951 ई0 के दिन चीन ने दलाईलामा से 17 सूत्री समझौते पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करवा लिए और तिब्बत पर चीन का अधिकारिक कब्जा हो गया। इस घटना के बाद से दलाईलामा ने भारत में बहुत से तिब्बती लोगों के साथ शरण ले रखी है।

भारत के पड़ोसी देशों को चीन अपने प्रभाव में लेकर वहाँ भारत विरोध की जमीन तैयार कर रहा है यह स्थिति भारत के लिए खतरनाक होती जा रही है। पहले पाकिस्तान की बात करे तो चीन भारत के खिलाफ पाकिस्तान की नफरत का इस्तेमाल कर रहा है। नेपाल के माओवादी चीन से प्रशिक्षित है, वही से उनको हथियार और पैसा आ रहा है। भारत के खिलाफ साजिश रचने में चीन माओवादियों की भरपूर मदद कर रहा है। बांग्लादेश में चीन भारी मात्रा में पैसो का निवेश कर रहा है जिससे कि वह आगे चलकर भारत के विरूद्ध उसके बंदरगाह का प्रयोग कर सके। श्रीलंका में अनबटोटा में नौसेना का बंदरगाह चीन के सहयोग से बनाया जा रहा है। यह स्थिति भारत के लिए सामरिक दृष्टि से उचित नहीं है। सिक्किम के उत्तरी हिस्से में फिंगर टिप पर अगस्त 2009 के दूसरे पखवाड़े में चीन ने 1966 ई0 के द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन करते हुए गोलाबारी की जिससे दो जवान गम्भीर रूप से घायल हो गये। इस घटना से कुछ ही समय पहले ही 31 जुलाई, 2009 को लद्दाख में चीनी सैनिको ने घुसपैठ की और भारतीय सीमा के अंदर लाल झंडे लगाकर पत्थरों पर अपनी भाषा में चीन लिखने की हरकत की। चीन ढाई सौ से ज्यादा बार भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर चुका है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भारत को चीन के विरूद्ध ठोस कदम उठाने होंगे। क्योंकि चीन सिर्फ शक्ति की भाषा ही समझता है और अगर हम यह समझते है कि हमारी दोस्ती की भाषा से चीन प्रसन्न हो जाएगा तो ये हमारी सबसे बड़ी भूल होगी।

रक्षा विशेषज्ञ एवं प्रवक्ता

बढता क्षेत्रवाद भारत के लिए गंभीर खतरा::एम.के. प्रियदर्शी

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 2 COMMENTS

mk priya_r1_c1अनेकता में एकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध अपना देश भारतवर्तमान समय में संकट के दौर से गुजर रहा है । फिलहाल जो संकट देश के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने यक्ष प्रश्न बनकर खडा है उसके लिए भारत के पडोसी राष्ट्र या उन राष्ट्रों के शासक जिम्मेवार नहीं है । हाँ कुछ समस्याएँ पडोसी राष्ट्रों से भी है जैसे बंगलादेशी घूसपैठ, जाली नोटों की तस्करी, सीमा पार से चल रही आतंकी कारवायी एवं भारत-चीन सीमा पर चीन द्वारा हाल ही में उत्पन्न की गयी नई विवाद बगैरह ।
अभी जिस संकट के दौर से भारत गुजर रहा है वह है क्षेत्रवाद । देश में बढता क्षेत्रवाद अखण्ड भारत की परिकल्पना को खण्डित करता नजर आ रहा है । देश की आजादी के बाद भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने अथक प्रयास एवं सहयोगी भारतीय नेताओं के सहयोग से देश की करीब छह सौ से अधिक देशी रियासतों का विलय भरातीय संघ में कराया था । सरदार पटेल के मेहनत का ही परिणाम है कि आज भारत एक मजबूत राष्ट्र बना हुआ है । देशी रियासतों के विलय के बाद ही सरदर वल्लभभाई पटेल को “लौह पुरुष” की उपाधि दी गयी थी । एक वो जमाना था जब हमारे नेता देश की एकता-अखण्डता व सुरक्षा के लिए जान की बाजी लगा देते थे । पराधीन भारत को अंग्रेजों के चंगूल से मुक्त कराने के लिए न जाने कितने भारतीय वीरों ने देश हित में अपनी जान कर्ुबान कर दी थी फलतः आज हम एक आजाद पंक्षी की तरह आजाद भारत में एक आजाद नागरिक की हैसियत से रह रहे हैं । हमें जो आज आधिकार प्राप्त है वह हमारे पर्वजों के बनाये संविधान के कारण ही प्राप्त है । आज के नेताओं को तो अपने देश, समाज, जनता एवं शासन की कोई चिन्ता नही है । वोट की राजनीति में मशगूल हमारे नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए कब किस करवट बैठंगे इसका सहज अंदाजा लगाना मुश्किल है । आज दुनियाभर के सभी देश अपने आंतरिक संसाधनों को शसक्त कर सबल राष्ट्र बनने की होड में लगे हुए हैं । वही हमारे देश में हमारे कर्ण्र्ाार देश व देश के लोगों की चिन्ता छोडकर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाने में व्यस्त हैं ।
भारत देश के कश्मीर में कभी अलग राज्य की मांग होती है तो कभी पूर्वोत्तर के राज्य असम में कोई संगठन विभाजन की बात उठाता है । हमारे देश में राजनीतिक सोच का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि अब हमारे नेता राष्ट्रवाद के बदले क्षेत्रवाद को तरजीह दे रहे हैं । करीब एक वर्षपर्व से क्षेत्रवाद की बयार जरुरत से ज्यादा तेज हो गयी है । कभी मुर्ंबई में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने गये बिहारी छात्रों की पिर्टाई की जाती है तो कभी मराठी को मुद्दा बनाकर शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता बिहारियों एवं अन्य प्रदेश के वासियों के साथ बदसलूकी करते हैं । क्षेत्रवाद की आग में जल रहे इन्ही मराठी के ठेकेदारों ने पिछले महिनों एक बिहारी होनहार छात्र की हत्या कर दी थी । महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव मराठी के मुद्दे पर ही लडा था । महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा लगा था कि क्षेत्रवाद का मुद्दा अब ठंडा पड जाएगा । लेकिन महाराष्ट्र विधानसभा में हिन्दी में शपथ लेने पर मनसे विधायकों द्वारा हाल ही में सपा विधायक अबू आजमी पर जो हमला किया गया वह क्षेत्रवाद र्समर्थक नेताओं के बढते मनोबल का परिचायक है । क्षेत्रवाद की आग को भडकाने वाले नेताओं का मनोबल अगर यूँ ही बढÞता गया तो राष्ट्रवाद पर गंभीर संकट का बादल छा जाएगा । हम तारीफ करते हैं क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की जिन्होंने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए मुर्ंबई में हाल ही आयोजित पत्रकार सम्मेलन में यह जोर देकर कहा है कि हम मराठी जरुर हैं लेकिन सबसे पहले भारतीय हैं । हमे भारतीय होने पर गर्व है । सचिन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब मुर्ंबई में सपा विधायक के हिन्दी में शपथ लेने का मुद्दा शबाब पर है । हालांकि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सचिन तेंदुलकर के बयान का विरोध करते हुए शिवसेना के मुख्यपत्र सामना में लिखा है कि तेंदुलकर के बयान से मराठियों को दुःख पहुँचा है । हालांकि देश की सत्ताधारी कांग्रेस पाटी और मुख्य विपक्षी भाजपा ने सचिन के सूर में सूर मिलाया है ।
उधर पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने प्रदेश में एक सिमेन्ट कारखाना के उद्घाटन के क्रम में बिहारियों पर जो तीखे शब्दवाण छोडÞे उसने क्षेत्रवाद की आग में घी का काम किया । हाँ इतना जरुर हुआ कि विपक्ष में बैठे हमारे नेताओं को बोलने का एक नया बहाना मिल गया लेकिन देश की प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पाटी चुप्पी साधे रही क्योंकि मध्यप्रदेश में वह सत्ता में है । पाटी ने अपने वक्तव्य में घूमा-फिरा कर अपने ही मुख्यमंत्री का पक्ष लिया और कहा कि चौहान के वक्तव्य को तोड-मरोड कर पेश किया गया है । मुख्यमंत्री चौहान द्वारा बिहारियों के विरुद्ध की गयी टिप्पणी को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गंभीरता से लिया । उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वे बिहारियों को काम नहीं देने की बात कर रहे हैं हम अगर मध्यप्रदेश निर्मित वस्तुओं की बिहार में बिक्री पर प्रतिबंध लगा दें तो किसका भला होगा । राजद नेता पर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव व लोजपा अध्यक्ष पर्व केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने भी चौहान के विरुद्ध कारवायी की मांग की । खैर इन नेताओं ने अलग-अलग बयान देकर अपने कर्तव्यों की इतीश्री कर ली ।
यहाँ सबसे बडी बात यह है कि केन्द्र सरकार और उस सरकार में बैठे लोग इस क्षेत्रवाद के मुद्दे पर कितने गंभीर हैं । इस मामले में ठोस पहल न तो प्रधानमंत्री डाँ. मनमोहन सिंह कर रहे हैं और न भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व जिसकी मध्यप्रदेश में सरकार है । आज जरुरत है क्षेत्रवाद को बढावा देने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता को समाप्त करने की । यह काम तो चुनाव आयोग का है क्योंकि राजनीतिक दलों को चुनाव लडने की मान्यता वही प्रदान करता है । हाँ वैसे नेता जो अपने वक्तव्यों के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रवाद का जहर घोल रहे हैं उनके चुनाव लडने पर भी प्रतिबंध लगाना होगा । यहाँ सुप्रीम कोर्ट की भी भूमिका महत्वपर्ण् हो जाती है । क्षेत्रवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना होगा । वैसे नेताओं को कटघरे में खडा करना होगा । अन्यथा क्षेत्रवाद की तेज आग में हमारा अखण्ड देश भारत धू-धू कर जल उठेगा और एक ही देश के नागरिक होकर हम एक दूसरे भाषा-भाषी और प्रदेशों में रहनेवाले लोगों के दुश्मन बन जायेंगे ।

सत्ता की हकदार पर सुरक्षा की मोहताज:: स्िमृति जोशी

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

mayawatiहनजी के राज में महिलाओं पर होते अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के बयान पर मचा बवाल इतनी जल्दी थमता नजर नहीं आता । हालाँकि इस जर्ुम के लिए रीता बहुगुणा जोशी को गिरफ्तार कर ज्ञद्ध दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है पर शायद अब सवाल यह नहीं है कि रीता ने मायावती के विरुद्ध क्यों अभद्र टिप्पणी की और क्यों की – इस टिप्पणी पर बौखलाए कथित मायावती र्समर्थकों ने इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप रीता बहुगुणा के सरकारी आवास पर हमला कर तोडÞ-फोडÞ व आगजनी की, इस घटना के बाद भी सवाल यह नही है कि इन कथित मायावती र्समर्थकों ने जो किया वह कितना सही है – सवाल बडÞा पुराना और बस इतना है कि आखिर एक स्त्री की इज्जत की कीमत क्या है -
क्या वह ओहदे और वर्ग के अनुसार बदल जाती है – या फिर हर औरत का उत्पीडÞन ताकत के अनुसार छोटा-बडÞा हो जाता है – अगर नहीं तो फिर भला क्यों एक महिला के विरुद्ध की गई टिप्पणी मात्र पर इतना बवाल जबकि बलात्कार की शिकार महिलाओं की एक लंबी सूची संवेदना के स्तर पर कोई हलचल नहीं मचा पाती – विशेषकर एक महिला ही जब मुख्यमंत्री हो तब ऐसी विडंबना तकलीफदेह है । सारा मामला इतना पेचीदा है कि पक्ष और पिक्ष कहीं नजर ही नहीं आता । अभद्रता के विरुद्ध और एक अभद्रता । अगर इस सारे प्रकरण में से राजनीति हटा दी जाए तो बचती है सिर्फमहिला और उसकी संवेदनहीनता ।
करोडÞों रुपए खर्च कर अपनी मर्ूर्तियाँ स्थापित कर दलित उद्धार करने की आकांक्षा पाले मायावती को अपने पद और गरिमा के अनुसार आचरण पर ध्यान देना था । तत्पश्चात् पिक्ष की नेता रीता को अपने बयानों में संयम बरतना था । जो कि नहीं हुआ, जब बचती है आम स्त्री । जिसे किसी भी संबोधन से पुकारा जाए उसकी नियति है छले जाना, और हमेशा की तरह वह फिर छली जा रही है । अब इस तथ्य को दिलचस्प कैसे कहें कि इस सारे मामले में बस महिला ही महिला है । मुख्यमंत्री महिला, पीडित महिला, मृतका महिला, बयान देने वाली नेता महिला । यानि महिला बनाम महिला । किसने किया बलात्कार – कौन है असली दोषी – किसे है फुरसत इस पर बात करने की – महिला इस देश में कितनी सुरक्षित है कौन सोचेगा इस पर – आर्श्चर्य कीजिए कि यह सब वर्तमान स्थिति में हो रहा है जबकि देश की राष्ट्रपति महिला, शासित दल की प्रमुख नेता, लोकसभा स्पीकर महिला, संसद में वर्चस्व बढÞाती महिला । कल तक जो हम महिलाएँ पुरुषों के विरुद्ध मोर्चा खोले रहती थी अब क्या कहें और किसके खिलाफ कहें – हमारे -यानी महिलाओं के) राज में वे -पुरुष) इतने अलमस्त कैसे हो गए कि अपराध करने के बाद उन पर किसी तरह का दबाव नहीं, उल्टे महिलाओं के बहाने महिलाएँ ही आपस में स्तरहीन होकर सामने आ खडÞी हर्ुइ – होना तो यह था कि महिलाओं के पदासीन होने पर एक आम स्त्री में आत्मविश्वास अंकुरित होता कि अब हम पाँवर में हैं, हमें कोई खतरा नहीं । पर हुआ क्या – हम महिलाएँ, महिलाओं से ही आतंकित है । और ऐसा इसलिए कि हम नारी संवेदनशीलता के गहरे अहसास को भूलते जा रहे हैं । हम अपने ही संकर्ीण्ा दायरों में लिपटी आपस में उलझ रही हैं । जबकि यह मुद्दा सदियों से न्याय की आस में विवश हो छटपटा रहा है । प्रति वर्षबलात्कार पीडिÞताओं के आँकडÞे बढÞते जा रहे हैं और समाज से एक बर्ेशर्म खामोशी की परत है कि हटती ही नहीं । एक और सच कि आँकडÞों के पीछे छुपी कितनी पीडिÞताएँ हैं जो खामोश सो जाती है या सुला दी जाती है हमेशा के लिए – कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें समाज और इज्जत की दुहाई देकर खामोश रहने पर मजबूर कर दिया जाता है । ये आँकडÞे सतह के ऊपर आ ही नहीं पाते क्योंकि इनके प्रति हमारी नीयत ही दोषपर्ूण्ा है । हमने इस घृणित मुद्दे पर कभी गंभीर होने की कोशिश ही नहीं की । क्यों – क्योंकि यह मुद्दा, यह खबर, यह घटना हमारी मानसिकता पर कोई हलचल मचाने में कामयाब नहीं होती । हममें संवेदना नहीं बची, यही वजह है कि कोई महिला संयम खो बैठती है और दुःखी मन से कह जाती है कि तुम्हारे साथ होगा तब… – लेकिन ऐसे मुद्दे प्रत्यारोप नही माँगते, बहस भी नहीं माँगते ऐसे मुद्दे संवेदना और न्याय माँगते हैं । अगर इस देश में ये दो चीज कहीं मिले तो राजनीति को इनका पता दीजिए । शायद कुछ हासिल हो सके हम नारियों को ।

असली खतरा चीन से ::रुचि सिंह

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

Ruchi Singhडियन डिफेंस रिव्यू के संपादकीय में व्यक्त की गई भारत पर चीनी हमले की आशंका से किसी प्रकार की घबराहट या किर्ंकर्तव्यविमूढÞ होने की आवश्यकता नहीं है । दरअसल यह लेखक का अपना नजरिया है । चीन की दो मुँही नीति से कौन नही वाकिफ है – जब ज्ञढटद्द में हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे गूंज रहे थे । तब चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका और अचानक हमला कर दिया । फुकेट में आसियान के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा ने सीमा मुद्दे पर मतभेद के बावजूद भारत और चीन ने बेशक बहुआयामी संबंधों को प्रगाढÞ बताया । अपने चीनी समकक्षी से विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा को उम्मीदें क्यों ना हो – लेकिन चीन का अडिÞयल रवैया तवांग पर अपना हक मानता है । भारत और चीन के बीच ज्ञ,द्दण्,ण्ण्ण् वर्ग किलोमीटर जमीन विवादित है । अरुणांचल समेत इस भू-भाग मेंे डद्ध,ण्ण्ण् वर्ग किलोमीटर पर्ूर्वी क्षेत्र में पडÞता है। china
चीन के हाथों मिली पराजय का डंक इतना विषैला है कि भारत अभी तक भुला नही पाया है । विदेश मंत्रालय के सूत्रों की माने तो चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा तय न होने से अक्सर ही सैनिकों के बीच कहा सुनी हो जाती है । गौरतलब है कि चीन ने अरुणांचल से सटे अपने जियांग प्रांत में सडÞकों का जाल बिछा लिया है और वहां सैन्य हलचल तेज कर दी है । यह किसी से नही छुपा है कि चीन तवांग क्षेत्र को अपनी ही टेरीटरी मानता है । चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की बढÞती गतिविधियों के बाद भारतीय सेना की दो डिविजन तैनात करने की तैयारी हो रही है । चीन ने तिब्बत समेत पूरे सीमाई इलाके में लंबे समय से तकरीबन ज्ञछ डिवीजन सेना -पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) तैनात कर रखी है । तिब्बत में तकरीबन तीन लाख चीनी सैनिक मौजूद है । तिब्बत को अपना स्वायत्त क्षेत्र घोषित करने के बाद चीन ने वहां सैनिक सुविधाओं का महाजाल बिछा रखा है । विगत सन्दर्भों को देखें तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की द्दण्ण्ठ की चीन यात्रा ने साझेदारी के उन पलों को आगे बढÞाया जो ज्ञढडड में दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गंाधी के चीन यात्रा के दौरान चीन-भारत रिश्ते सामान्य हुये थे । चीनी प्रधानमंत्री ने राजीव गांधी से कहा था कि चीन और भारत के विकास के बिना अगली सदी सेंचुरी आँफ एशिया नही कही जा सकेगी । विदेश मंत्रियों की बातचीत के जरिए सीमा विवाद हल करने के लिए साझा कार्य समूह भी गठित हुए लेकिन सीमा विवाद हल करने के मुद्दे पर हमेशा चीन का रवैया या तो टालमटोल का रहा है या दबाब डालने का रहा है । फिलवक्त देखा जाए तो भारत-चीन के बीच सामरिक संबंध बेहद पेचीदगियों और विरोधाभासों से परिपर्ूण्ा है । सोनिया गांधी की चीन यात्रा को खत्म हुए द्दद्ध घंटे भी नहीं बीते थे कि चीन की तरफ से खबर आयी थी कि मैंकमोहन लाइन को चीन स्वीकार नही करेगा और भारत प्रसिद्ध बौद्धस्थल तवांग को उसके हवाले कर दे । भारत और चीन के बीच पिछले द्दढ सालों में विभिन्न स्तरों पर दो दर्जन से अधिक बैठकें हर्ुइ है । इन सभी बैठकों में चीन तवांग को अपना हिस्सा बताता रहा है । वैसे भी कई ज्वलंत मसलों को हल करने में चीन की भूमिका को अहम भी माना जाता है । लिहाजा चीन ने भारत को समझा भी दिया कि वह सामरिक भागीदारी की रणनीति को इस गरज से भी आगे बढÞाने की इच्छा रखता है जिससे भारत अमेरिका के नजदीक न जा पाए ।
armyफिलवक्त इस समय भारत और चीन के आर्थिक संबंध काफी सशक्त है । दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार ठ अरब डाँलर को छूने वाला है । जिसमें चीन को ज्यादा लाभ है । इंडियन डिफेंस रिव्यू में यह भी कहा गया है कि चीन की आर्थिक, सामाजिक दर्ुदशा के चलते रोजगार के मुद्दे पर विफल चीन इन समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए भारत पर हमला कर सकता है । इसके अलावा यह भी कहा गया है कि लगातार उठते अलगाववादी आंदोलन भी चीन की चिन्ता के लिए सिर्रदर्द बन गये हैं । वास्तविकता यह है कि तिब्बत और सिकियांग को छोडÞकर चीन में कोई बडÞा अलगाववादी आन्दोलन आसानी से सफल हो नहीं सकती है क्योंकि वहां की ढघ प्रतिशत आबादी चीनी मूल की हान जाति है ।
हालांकि चीन की वक्रदृष्टि पडÞोसी देशों पर शुरु से है । यह किसी से छुपा भी नही है । नेपाल की सीमा से सटे अपने क्षेत्र में चीनी सैनिकों की हलचल इस ओर इशारा करती है कि नेपाल बेशक चीन के अपना मित्र माने लेकिन चीन ने कभी भी दिल से नेपाल को अपना मित्र माना ही नही । गौरतलब है कि चीन के हांगकांग में जहाँ नेपालियों के लिए रोजगार के अवसर है लेकिन नेपालियों के प्रवेश के लिए प्रतिबन्ध चीनी मानसिकता की दोगली नीति को उजागर करता है । चीन की नीति हमेशा से ही स्वार्थी प्रवृत्ति को दर्शाती है । चीन का पर्ूव सोवियत संघ से सीमा विवाद रहा तो वही चीन ने वियतनाम पर चढर्Þाई की तो दक्षिण कोरिया और ताइवान से चीन का विवाद ही रहा है । जापान से भी कई मसलों पर टकराव बना रहा है । चीन ने हमेशा ही भारत की उदारता का फायदा उठाने की कोशिश की है । भारत ने सुरक्षा परिषद में चीन के दावे का बिना शर्त र्समर्थन दिया । तिब्बत में भी चीन के दावे को र्समर्थन देकर राष्ट्रीय और अंतर्रर्ाा्रीय स्तर पर आलोचना बर्दास्त की है । ज्ञढटठ में चीन ने सिक्किम पर हमला बोला । भारत के मध्य और पर्ूर्वी इलाके के अलावा पश्चिमी इलाकों में भी चीन द्वारा लगातार सीमा उल्लंघन किया जाता रहा है । साल द्दण्ण्ड में ऐसे द्दठण् मामले सामने आए जबकि इस साल ऐसी घटनाओं की संख्या टण् से भी ज्यादा हो चुकी है । अरुणांचल प्रदेश के साथ चीन की ज्ञ,ण्घण् किलोमीटर लंबी खुली सीमा है । इसी बात का फायदा उठाते हुए चीन बार-बार ऐसी हरकतों को दोहराता है । और तो और चीन ने हमेशा भारत को घेरने की कोशिश ही की है । द्दण्ण्ड में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की बैठक में भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील में बाधा पहुँचाई । जब-जब सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्यता की कोशिशें हर्ुइ चीन-पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए अवरोध खडÞा करता रहा है । सीमा मुद्दे पर मतभेद के चलते चीन ने हाल में अरुणांचल प्रदेश में एक परियोजना के चलते ए.डी.बी. की मदद को रोकने का प्रयास किया था ।
बरहाल चीन का नेतृत्व उतना मर्ूख नही है कि वह भारत जैसे एक नाभिकीय क्षमता सम्पन्न देश पर हमला कर देगा । भारत दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक एवं सामरिक शक्ति के रुप में शुमार किया जाता है । भारत कोई छोटा-मोटा लुंज-पुंज देश नहीं है कि कोई भी उस पर हमला कर देगा । रक्षा मंत्रालय ने भी यह साफ कर दिया है कि वह चीन की गतिविधियों को लेकर पूरी तरह से र्सतर्क है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में चीन सीमा पर बढÞते खतरे के मद्देनजर रक्षाबलों की तैयारियों का जायजा तक लिया है । ज्ञढटद्द से द्दण्ण्ढ तक आमूल परिवर्तन हो चुके है और द्दण्ज्ञद्द तक भारत के लिए किसी प्रतिकूल की संभावना तो है ही नही । खैर जो भी हो भारत खामख्वाह किसी भी देश के साथ नाहक विवाद करने के मूड में नही है । पडÞोसी देशों के साथ तो कतई भी नही ।

खतरनाक रोग:: सिंदीप तिवारी

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और इसके आका भारत से कितने मोर्चों पर एक साथ युद्ध कर सकते हैं इस बात की गंभीरता का अंदाजा उन्हें हो या नहीं हो लेकिन भारत को इसका अंदाजा अवश्य हो जाना चाहिए । भारत को जिन मोर्चों पर पाकिस्तानी हमलों का सामना करना पडÞ रहा है वे थोडÞे बहुत नहीं है बल्कि इनके अधिक है कि इन्हें रोकने में सरकार और इसकी सभी एजेंसियाँ भी असहाय नजर आती हैं ।note group
इतना ही नहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की करतूतों से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर असम तक आम भारतवासी प्रभावित है, वह केवल सीधा या छद्म हमला नहीं वरन ऐसी लडर्Þाई है जिनमें से कुछ ने तो आम भारतवासियों की जान ही सांसत में डाल रखी है । देश में जाली नोटों का प्रचलन एक ऐसी ही लडर्Þाई है जिससे हरेक भारतवासी को दो-चार होना पडÞ रहा है ।
इसलिए अगर आम नागरिक के सामने सौ, पाँच सौ या एक हजार रुपए मूल्य का नोट सामने आ जाता है तो उसके माथे पर पसीने के बूँदें नजर आने लग जाती है । उसकी समझ में नहीं आता कि उसके पास जो नोट है, वह असली है भी या नही । स्थिति यहाँ तक पहुँच गई हे कि अब एटीएम और बैंकों से भी जाली नोट निकल रहे हैं ।
देश में जाली नोटों का प्रचलन इतना अधिक हो गया है कि अधिकारी भी मानने लगे हैं कि रिजर्व बैंक, भारत के गृह मन्त्रालय और खुफिया एजेंसियों की सक्रियता के बावजूद देश में करीब एक लाख टढ हजार करोडÞ की जाली मुद्रा प्रचलन में हैं हालाँकि रिजर्व बैंक ऐसा नही मानता है । फिर भी समस्या का चिंताजनक पहलू यह है कि यह लगातार बढÞती जा रही है । जाली मुद्रा पर गठित नाईक समिति का कहना है कि देश में बडÞी मात्रा में जाली मुद्रा हैं और हम केवल करीब टघ करोडÞ की जाली मुद्रा ही पकडÞ पाते हैं । आम लोगों की हात यह है कि जब वे बैंक कर्मियों, दुकानदारों, व्यापारियों तथा पेट्रोल पम्प पर खडÞे होते हैं तो उन्हें डर सताता रहता है कि कहं िउनके नोट जाली न निकलें । इस डर के मारे लेन-देन में भी परेशानी होने लगी है ।
जाली नोट भी कितने असली दिख सकते हैं इस बात का अंदाजा इसी जानकारी से लगाया जा सकता है कि कुछ महीनें पहले महाराष्ट्र क्राइम ब्रांच और आतंकवाद रोधी दल के जासूसों ने ढ लाख से अधिक के नकली नोट बरामद किए । वे खुद यह तय नहीं कर पाए कि उन नोटों में से कितने असली और कितने नकली है ।
असली और नकली नोटों में ढछ फीसदी तक समानताएँ होती हैं और जो बहुत कम अंतर होते हैं, उन्हें बैंक कर्मी और अधिकारी तक नहीं भाँप पाते हैं । विभिन्न स्तरों पर जाली नोटों की पहचान करने की कोशिश की जाती रही है लेकिन इनका कागज और छपाई इतनी अच्छी होती है कि खुफिया अधिकारियों के लिए भी इनकी पहचान करना दुष्कर काम हो गया है । जाँच एजेंसियाँ मानती हैं कि इन जाली नोटों की छपाई कराची के मलीर छावनी स्थित सिक्यूरिटी प्रेस, क्वेटा के सरकारी प्रिंटिंग प्रेस और अन्य स्थानों पर होता है । यह भी पता है कि जाली मुद्रा का रैकेट चलाने वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश में बैठकर अपने काम को अंजाम देते हैं । वर्षद्दण्ण्ट में बांग्लादेश में भारतीय करंसी मिटिंग मशीन जब्त की गई थी । अब तो सीबीआई भी मानने लगी है कि भारत में करंसी नोट छापने के जो गोपनीय टेम्पलेट इस्तेमाल किए जाते हैं उनकी नकलें भारत के जरिये पाक या बांग्लादेश पहुँच गई हैं । सीबीआई के निदेशक अश्विनी कुमार का कहना है कि वर्षद्दण्ण्छ में नोटों की छपाई के लिए प्रयुक्त टेम्पलेट दुश्मन देशों में पहुँच चुका है और इस बात की संभावना से इनकार नही किया जा सकता है कि हम आज भी उसी टेम्पलेट से नोट छापे जा रहे हैं । यह कहना गलत न होगा कि नोटों के उत्पादन में जो स्याही, कागज और अनिवार्य वस्तुएँ लगती हैं, उनकी नकल या हूबहू काँपी उनके पास मौजूद है । नोट छापने का कागज और स्याही भारत विदेशों से मँगाता है और आईएसआई के आका भी इन चीजों का उन्हीं बिक्रेताओं से खरीदते होंगे ।
आरबीआई, आईबी, डीआरआईर्,र् इडी, सीबीआई, कस्टम्स और अर्धसैनिक बलों के बडÞे अधिकारियों ने ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के सामने यह मामला उठाया है । पर इसके साथ ही चिंता की बात यह भी है कि नोटों की छपाई से संबंधित जो सुरक्षा उपाय किए जाते हैं जैसे नोटों का सिरीज कोड, वह भी जाली नोट छापने वालों तक पहुँच जाता है । इसमें संदेह होता हे कि जाली नोट छापने वालों के एजेंट बैंकों के भीतर तक पहुँच गए हैं ।
सीबीआई नकली नोटों का नेशनल डाटा बैंक भी बना रही है ताकि इससे कुछ मदद मिल सके कि नकली नोटों का स्रोत कहाँ है और इन्हें किन क्षेत्रों में प्रसारित किया जाता है । देश में सबसे ज्यादा छण्ण् रुपए मूल्य के नोट नकली पाए गए हैं और इसे देखते हुए सरकार ने इन्हें छापने में लगने वाले विशेष कागज का देश में भी उत्पादन करने का फैसला किया है । मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में स्थित सिक्यूरिटी पेपर मिल को इस तरह का कागज उत्पादित करने की मंजूरी मिल चुकी है ।
समस्या केवल पाँच सौ और एक हजार मूल्य के नोटों की ही नहीं है । द्दण्ण्ट से पर््रवर्तन एजेंसियों ने पाँच सौ के नोटों की तुलना में सौ रुपए मूल्य के जाली नोट ज्यादा पकडÞे हैं । राज्यसभा में प्रश्नोत्तर के दौरान जानकारी दी गई थी कि देश में घज्ञ मई, द्दण्ण्ढ तक पाँच सौ और हजार रुपए मूल्य के इतने नोट पकडÞे गए कि जिनकी कीमत क्रमशः छ।ठट लाख और ज्ञ।ण्ढ लाख रुपए है । इसका एक अर्थ यह भी है कि इनकी तुलना में सौ रुपए मूल्य के कितने नकली नोट चल रहे हैं इसका पता ही नहीं है । आम तौर पर पाँच सौ और हजार के नोटों पर लोगों का ध्यान जाता है जबकि सौ रुपए को लेकर ज्यादा जाँच परख नहीं की जाती है । सरकार ने भी राज्यसभा में माना था कि द्दण्ण्ट से लेकर ण्ढ तक ठ।घद्ध लाख रुपए मूल्य से अधिक के सौ रुपए के नकली नोट कपडÞे गए हैं । वही पर््रवर्तन एजेंसियों का कहना है कि बैंकिंग चैनलों के जरिये वर्षद्दण्ण्ठ, ण्ड और ण्ढ में क्रमशः ज्ञण्।छद्ध करोडÞ, द्दज्ञ।द्धछ करोडÞ और द्ध।ण्ढ करोडÞ की जाली मुद्रा पकडÞी जा चुकी है । एजेंसियों ने इस मामलों में बडÞी संख्या में लोगों को पकडÞा लेकिन ये सभी नोटों को फैलाने वाले एजेंट ही साबित हुए । इनमें से कोई भी ऐसा नही था जो कि जाली नोटों के इस नेर्टवर्क के बारे में गोपनीय जानकारी दे सके ।
हालाँकि खुफिया अधिकारियों का मानना है कि जाली भारतीय मुद्रा का आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने में भी इस्तेमाल होता है । अभी तक जो जाँच से सामने आया है उसके अनुसार नेपाल में आरिफ बटकी नामक एक आईर्एर्सइ एजेंट है जो कि रक्सौल की सीमा के जरिए बिहार और उप्र में जाली नोटों की सप्लाई कराता है ।
बटकी सीधे आईएसआई के सर्म्पर्क में है और बिहार में पकडÞे गए उसके कुछ एजेंटों का कहना है कि बटकी पचास फीसदी कमीशन पर नकली नोट नेपाल में आईएसआई से हासिल करता है और चालीस फीसदी कमीशन पर अपने नेर्टवर्क से जुडÞे लोगों को बेच देता है । जाँच में यह बात भी सामने आई है कि आम लोगों के लिए कमीशन की दर बीस फीसदी तक हो सकती है । कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के एक बैंक में जाली नोट पाए गए थे जिससे यह बात भी साबित हर्ुइ थी कि इस तरह से जाली नोटों को फैलाने में एक बैंक कर्मी का भी हाथ था जो कि खुद कमीशन के लालच में यह काम करता था । देश में मुख्य रुप से तीन मार्गों से जाली नोटों और ड्रग्स्ा की तस्करी की जाती है । राजस्थान और पंजाब की सीमा से, बंगाल में बांग्लादेश की सीमा से और उप्र और बिहार में नेपाल की सीमा से इनकी तस्करी की जाती है । इस हमारी सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि हाल ही में बाघा सीमा से पाकिस्तान से एक गुड्स वैगन भारत आ गया था जिसमें से डायरेक्ट्रेट आँफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस के लोगों ने आठ करोडÞ की हेरोइन बरामद की थी ।
राजस्थान से तस्कर सीमा पार कर पास्कितान चले जाते हैं और वहाँ से करोडÞों रुपए की हेरोइन लेकर भारत आ जाते हैं । बाद में इन्हें पकडÞा भी जाता है लेकिन ज्यादातर मौकों पर ये सुरक्षा बलों, अर्धसैनिक बलों या अन्य अधिकारियों की मिलीभगत से सीमा पार कर जाते हैं । इसी तरह से जाली नोट भी देश में प्रवेश कर जाते हैं । जाली नोटों को चलाने में स्थानीय लोग भी लालच में शामिल होते हें उन्हें भी नोटों के चलाने पर कमीशन मिलता है । साथ ही इन लोगों को घर बैठे ही नकली नोटों की खेप मिलती है सो पकडÞे जाने का भी डर नहीं ।

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