गोरखालैण्ड आन्दोलन पश्चिम बंगाल में लगातार तेज होता जा रहा है । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अब आमने-सामने की कारवाई शरु कर दी है । वैसे तो, मोर्चा ने हिंसक आन्दोलन से परहेज करने का भरोसा दिया था, लेकिन उसका आन्दोलन अब हिंसात्मक रुप ले चुकी है । सीधी कारवाई के तहत दार्जिलिंग सहित कुछ हिस्सों के सभी गाडियाँ सरकारी दफ्तरों व थानों में वेस्ट बंगाल हटाकर वहाँ गोरखालैण्ड लिखा जाना शुरु हो गया है । पहाडों और पहाडी शहरों मे गोरखालैण्ड की मातृभूमि का गीत गुंजायमान हो रहा है, जिससे यह आन्दोलन और भी जोशीला होता जा रहा है ।
दार्जिलिंग जिले में यह आन्दोलन इतना ज्यादा जोर पकड लिया है कि सीपीएम सहित तमाम दूसरे दलों का फिलहाल वहाँ नामोनिशान मिट चुका है । जीएनएलएफ का भी लगभग सफाया हो चुका है । काँग्रेस की पकड थोडी बहुत जरुर दिखाई देती है लेकिन काँग्रेस को लोग यहाँ पसन्द नही करते । इसकी वजह यह है कि दूसरा नेतृत्व बांगला भाषियों के हाथो में हैं ।
तृणमूल काँग्रेस, एसयूसीआई जैसी पार्टियों का भी यहाँ जनाधार नहीं रहा । क्योंकि गोरखालैण्ड अलग राज्य की मांग के खिलाफ विधानसभा में इन दलों ने भी प्रस्ताव पारित करने में सरकार की मदद की थी । भाजपा ने इस आन्दोलन को र्समर्थन दिया था, पर राज्य की भाजपा इस मामले में ज्यादा कुछ खास नही कर सकीं । कहा जा सकता है कि सीपीआई झारखण्ड मुक्ति मोर्चा जैसे कुछ छोटे दलो को छोडकर तमाम दल गोरखालैण्ड अलग राज्य के खिलाफ थे । गौरतलब है कि, बंगाल बाम मोर्चा के सभी घटक दल गोरखालैण्ड के खिलाफ है, वही देश के अन्य हिस्सों मे सीपीआई आरएसपी फार्रवर्ड ब्लाँक नये राज्यो के निर्माण के पक्ष में हैं । झारखण्ड में वाममोर्चा की सभी पार्टियोंका अस्तित्व है । क्योंकि अलग राज्य बनाने के आन्दोलन मंे सीपीएम को छोड लगभग तमाम वाम दल क्रियाशील थे । सीपीआई ने तो उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ के निर्माण का भी पूरा र्समर्थन किया था । सीपीआई विदर्भ तेलांगना आदि राज्यों के गठन का भी हिमायती रहा है मगर वही सीपीआई बंगाल विभाजन का पूरजोर विरोध कर रही है । इसकी बडी वजह सीपीआई “बंगालीबाद” है ।
तेलांगना पर सीपीएम के रूख से यह भ्रम और भी बढा है क्योंकि यह पार्टर्ीीेश में नये एवं छोटे राज्यों के गठन का जमकर विरोध करती है । झारखण्ड आन्दोलन को उसने एक साजिश करार दिया था । अब वही सीपीएम राष्ट्रीय दबाब में हो या राजनीतिक मजबूरी के कारण तेलांगना अलग राज्य को र्समर्थन देने लगी है ।
दरअसल, राष्ट्रिय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने के लिए सीपीएम के पास दलों का अकाल सा पडÞ गया है । तेलांगना की टीआरएस के साथ समझौता करने के लिए सीपीएम पैंतरा बदला और तेलांगना अलग राज्य को रणनीतिक र्समर्थन दे दिया ।
सीपीएम समेत वाममोर्चा के घटक दल इस प्रचार में लगे हुए हैं कि गोरखालैण्ड अलग राज्य बन जाने से भारत की स्थिति कमजोर पड जायेगी और देश में विरोधी ताकत को बल मिलेगा । इस प्रचार में कई विपक्षी दल भी शामिल है । इस तरफ के आधार पर कि दार्जिलिंग के चारों तरफ चार पडोसी देश नेपाल, चीन, भूटान, बंगलादेश है । चीन की सीमा से सीधे भले ही दार्जिलिंग न लगी हो, लेकिन सिक्किम तो मिलती है, फिर सिक्किम और दार्जिलिंग में दूरी ही कितनी है ।
दार्जिलिंग और आस पास के क्षेत्र से लगे भूटान, बंगलादेश और नेपाल में आतंकवादियों ने पहले से ही अपना डेरा जमा चुके हैं ।
कामतापुरी और गोरखामुक्ति मोर्चा के बीच साठगांठ की खबर तो आती ही रहती है । कामतापुरी के उगवादी संगठन के एल ओ और असम के उल्फा के बीच भी संबन्ध जगजाहिर है, और इन संगठनों के हुजी और आईएसआई के साथ भी घनिष्ठ संबन्ध बताये जाते हैं । हालाकि जनमुक्ति मोर्चाके नेता विमल गुरुंग कहते है कि भारतीय गोरखाओं की भारत भक्ति विश्वप्रसिद्ध है । नेपाल में माओवादीओं के सत्ता में आने के बावजूद दार्जिलिंग के गोरखाओं का माओवाद से कुछ लेना देना नहीं । लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि नेपाल का माओवादी भारत विरोधी है और नेपाली मूल के गोरखाओं का भारत में एक अलग राज्य बनाने से भारत विरोधी कारवाई बढÞ सकती है दार्जिलिंग की वह पतली सी पट्टी वाली भूभाग, जो पूर्वोत्तर भारत को मुख्य भारत से जोडती है । भारत की कमजोर कडी हंै । बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के ठीक उत्तर की ओर दार्जिलिंग जिला है । दार्जिलिंग जिले के दक्षिण तरफ की ओर नक्सलवादी से लेकर फांसीदेवा तक कुछ किलोमीटर तक पतली पट्टी के दोनों ओर नेपाल और बांगलादेश है । एक समय में नेपाल और बांगलादेश ने इस क्षेत्र पर एक स्वतंत्र हाइवे की मांग की थी, ताकि दोनो देश के बीच बेरोकटोक आयात निर्यात हो सकंे, पर भारत सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया था । लेकिन नेपाल और बंगलादेश अभी भी यह सपना देख रहा है । गोरखालैण्ड विरोधी दलांे का यह कहना है कि दार्जिलिंग के अलग राज्य बन जाने से कानूनी तौर पर न सही, मगर गैर कानूनी तरीके से नेपाल और बांगलादेश के बीच तस्करी को बढावा मिलेगा साथ ही भारत विरोधी गतिविधि को भी बल मिलेगा ।
नए राज्यों के गठन के र्समर्थक दल इन तर्को को खारिज करते है । उनका कहना है कि अभी पश्च्िाम बंगाल खुद ही आतंकवादियों का सबसे बडÞा आश्रयस्थल बना हुआ है, इसमें दार्जिलिंग के गोरखाओं को भारत के अन्दर एक अलग राज्य दिया जा रहा है । अलग देश नहीं । वे लोग कश्मीरियों की तरह पाकिस्तान जिन्दावाद नही बल्कि हिन्दुस्तान जिंदावाद के नारे लगायेंगे ।
असम को तोडकर कुछ नये प्रदेश बनाये गये । लेकिन उन राज्यों मंे कभी भारत विरोधी ताकत को पनपने नही दिया गया, जिससे भारत की अखण्डता पर कोई खतरा पैदा हो जाये । लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश चीन से सटे होने के बाबजूद वहाँ कोई बडी साजिश का जन्म नही हुआ नव दार्जिलिंग में ये कैसे संभव है ।
गोरखालैण्ड के र्समर्थकों का कहना है कि दार्जिलिंग के गोरखे भारत के प्रति पूरी तरह वफादार हैं, उन्हें सिर्फबंगलाभाषियों से नफरत है । इस नफरत की वजह है कि आजादी के बाद से ही बंगलाभाषियों ने दार्जिलिंग का सिर्फदोहन किया है । जैसे अंग्रेजो ने किया था । गोरखाओं का कुली, मजदुर, रिक्शावाला बहादुर से ज्यादा कुछ नही समझा गया । पहाडों पर बंगालियों सहित अन्य धनपतियों के बंगले, चायबगान पर्यटन स्थल बनें मगर गोरखाओं की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती चली गई ।
जीएनएलएफ के आन्दोलन के कारण गोरखाओं की हालत में थोडा बहुत सुधार जरुर आया, लेकिन सुभाष घिसिंग के पतन के बाद सारे किये धरे पर पानी फिर गया । दार्जिलिंग के स्थानीय लोगों का कुछ खास विकास नही हो पाया । यहाँ तक कि गोरखाली भाषा को भी खत्म करने की कोशिश की गई थी मगर गोरखाओं के आन्दोलन और केन्द्र सरकार के दबाब के कारण गोरखाली भाषा को संविधान मंे मान्यता मिली । फिलहाल, गोरखालैण्ड का आन्दोलन तेज से तेज होता जा रहा है । उधर आन्दोलन के विरुद्ध सीपीएम संगठनों ने जबाबी आन्दोलन शुरु कर दिया है । पहाडों पर गाडियों को जाने से रोका जा रहा है । सिलिगुडी में भी बन्द का आह्वान किया जा रहा है “आमरा बंगाली” और “बंगला भाषा बचाओ समिति” सांप्रादायिकता फैलाने में लगी है ।
यह आन्दोलन उग्र रुप ले चुका है । पर्यटन पर आश्रति अर्थव्यवस्था चरमरा जाये और वे लोग आत्मर्समर्पण को तैयार हो जायंे, पर इससे तो हालात और भी बिगडेंगा । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंगठ का कहना है कि राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी के अनुरोध पर फिलहाल दफ्तरो, गाडी, के र्साईन बोर्ड पर गोरखालैण्ड लिखा जाना बंद कर दिया जाए पर आन्दोलन जारी है । दूसरी तरफ, पश्च्िम बंगाल सरकार मौन धारण किये हुये है । ज्योति, बसु के कार्यकाल में इस आन्दोलन के खिलाफ जमकर कारवाई हर्ुइ थी, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हर्ुइ और हजारों की संख्या में लोग घायल हुये थे । लेकिन इस समय वाममोर्चा की सरकार बैकफूट पर आ चुकी है । उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है । विभिन्न आन्दोलन और पुलिसिया कारवाई के कारण वाममोर्चा सरकार रसातल में पहँुच गई है ।
लेकिन इस बार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अलग राज्य के अलावा और कुछ नही चाहती । ऐसी स्थिति में अगर इस आन्दोलन को रोका गया तो यह आग और भडक सकती हंै । इसमंे कोई शक नही । नेपाली भाषा और नेपालीपन के आधार पर गोरखालैण्ड की मांग हो रही है । वैसे भी गोरखाओं की पहचान नेपाल से ही है । गोरखा से ही नेपाल के एकीकरण का अभियान संचालन हुआ था । अब जबकि नेपाल के बाहर गोरखालैण्ड नेपाली भाषा, नेपालीपनकी मान्यता की बात हो तो नेपाल सरकार की भूमिका महत्वपर्ूण्ा समझी जा सकती है । पर नेपाल राज्य में रुपान्तरण हो या न हो भारत सरकार की रवैया तेलांगना के मामले में स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है । फिलहाल गोरखालैण्ड की मान्यता इतनी आसान से मिल पाएगी यह दिखाता नहीं है ।