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September , 2010
Thursday
सप्ताह के सात दिन केवल दिन ही नही होतें,एक परिभाषा होते हैं, एक भावार्थ होते ...
बडी मुश्किल से 'एप्पाटमेंन्ट' मिला था, भगवान कृष्ण से मिलने का । उन्हें आजकल के ...
पतिदिन राजनीतिक दलों की बैठक, धमकी, आग्रह और आन्दोलन से फिर नेपाली जनता परेशान हो रही ...
नेपाल से प्रकाशित एक मात्र हिन्दी पत्रिका हिमालिनी की संस्थापक संपादक एवं पद्मकन्या काँलेज में ...
मधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया ...
भौतिक एवं योजना तथा निर्माण राज्य मन्त्री संजय साह आज मधेश के एक कर्मठ एवं ...
नेपाल में अन्तर्रर्रीय गिरोह के बढते शिकंजे एव व्यापारिक निवेश के चलते इन गिरोहों के ...
की राजनीति तो समझ में आती है, किन्तु शिक्षा में राजनीति समझ में नहीं ...
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री शत्रुघ्न प्रसाद ...
दीपिका पादुकोण और विजय माल्या के बेटे सिद्धार्थ के बीच लिंक अप की अफवाहों ने ...
सामान्यतः लोग इंटरनेट को जानकारी लेने, लोगों से जुडे और चैटिंग करने के लिए ही ...
हमारे जीवन में एक गुरू का होना बहुत जरूरी है, गुरु भी ऐसा हो, जो ...
हित्यकार का व्यक्तित्व अपने ही अनुरुपविशिष्ट शैली, माध्यम और उपकरण का चयन करता है । अतएव ...
काठमांडू बसन्तपुर क्षेत्र, डाक्टर, इन्जीनियर वकील, व्यवसायी, कलाकार, स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों तथा विभिन्न पेशाकर्मियों ...
जनकपुरधाम-नेपाल का धार्मिक-सँास्कृतिक नगर आजकल विविध कारणों से चर्चा का केन्द्र बनता रहता है । ...
निर्माण काल से ही विश्व शान्ति और मानव कल्याण की दिशा में मिथिला की राजधानी ...
सेक्सी स्लिम तथा ग्लैमरस दिखने के लिए बलिउड के हिरोइनों में होड लगी रहती है ...
मंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते ...
पाकिस्तान के बारे में आज सबसे बडा सच यह है कि "बोया बीज बबूल का तो आम ...
महाभारत में वैसे तो कई पात्र हैलेकिन उसमें एक पात्र ऐसा था जिसने पुत्र मोह के ...
मना का संपादकीय लिखा जा चुका है । मराठी में लिखा गया बाल ठाकरे का ...
भारत विरोध कब तक खों लोगों के बीच मंच सजा हुआ और उस पर आसीन ...
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना ...
इतिहास में राजनैतिक उद्देश्य की परिपर्र्ति के लिए युद्ध को प्रथम अथवा अंतिम विकल्प के ...
राजनीति’ में राजनीतिज्ञ बनी हैं। उनका ‍जो लुक है, उसे देखकर कहा जा रहा है ...
प्रधानमंत्री नेपाल की भारत यात्रा को दो दृष्टिकोणों के तहत आंका जा रहा है । अपनी भारत ...
सृष्टि में केवल मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसे प्रभु ने विवेक, बुद्धि, ज्ञान, विश्लेषणात्मक क्षमता, ...
स्लीवलेस परिधानों की कशिश नारी मन में हमेशा से रही है फैशन आते जाते रहे, ...
नेपाली राजनीति में लगभग साढे छह दशक तक कोईराला अविश्रान्त कर्म योद्धा बनकर नेपाल की ...
पाल की भावी शासकीय संरचना कैसी और किस प्रकार की हो - सभी भाषा-भाषी, जात-जाति ...
नवर्निमाण में छात्र-युवाओं की भूमिका महत्वपर्ण् होती है । इतिहास गवाह है कि युवाओं ने ...
०६,२०६६ के दिन राज्य पर्नर्संरचना तथा राज्य शक्ति विभाजन समिति की अन्तिम बैठक बुलाई गई ...
नेपाली कांग्रेस महासमिति की बैठक काठमाण्डू में सम्पन्न हई । आयोजक केन्द्रीय समिति ने तीन दिन की ...
नुख्ता के हेरफेर से खुदा जुदा हो गया । अतः नुख्त निकालने, लगाने और प्रयोग ...

Archive for the ‘विश्व’ Category

सबसे युवा अरबपति मार्क जुकर्रवर्ग’::शाशवत तिवारी

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

सामान्यतः लोग इंटरनेट को जानकारी लेने, लोगों से जुडे और चैटिंग करने के लिए ही इस्तेमाल करते है । बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो साइवर संसार से जुडÞी हर चीज का इस्तेमाल भली प्रकार करना और इनमें इनोवेशन करना जानते है । इन्हीं में से एक है ‘फेसबुक’ नामक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के संस्थापक २५ वषर्ीय मार्कजुकर्रबर्ग जो इसकी वजह से बन गए है दुनिया के सबसे युवा अरबपति । व्यवसाय से कंप्यूटर प्रोग्रामर मार्क ने हार्व्ड यूनिवर्सिटी में पढÞते समय फेसबुक का निर्माण किया, जो आज विश्व भर के छात्रों और युवाओं के बीच प्रसिद्ध है । फेसबुक के र्सर्ीइओ मार्क को ‘टाइम’ मैगजीन ने वर्षके सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में शामिल किया है । इस सूची में उन्हे अंतर्रर्य पटल पर नई क्रांति लाने वाले बराक ओबामा, दलाई लामा और माइकल फेल्प्स के साथ जगह दी गई है । बचपन से कंप्यूटर प्रेमी १४ मई १९८४ को न्यूयार्क के डÞाक्टर दंपति एर्डवर्डÞर कैरन जुकर्रबर्ग के घर जन्मे मार्क बचपन से ही कंप्यूटर प्रेमी थे । मिडिल स्कूल में पढÞते समय ही उन्होंने कंप्यूटर प्रोग्रामिंग शुरू कर दी थी । उन्हें नए-नए प्रोग्राम, कम्युनिकेशन टूल्स और गेम्स बनाना पसंद था । हाईस्कूल में पढÞते समय मार्क ने पिता के आफिस में काम करने वाले कर्मचारियों के बात करने के लिए कम्युनिकेशन प्रोग्राम तैयार किया । उसके बाद उन्होंने ‘सिनैप्स’ नामक म्यूजिक प्लेयर बनाया, जो उसे इस्तेमाल करने वाले की आदतों को ट्रैक कर लेता था । माइक्रोसाफ्ट और एओएल ने सिनैप्स खरीदने और मार्क को जब लेने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने हार्व्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेने का निर्ण्र्ाालिया । मार्क ने फेसबुक का प्रारंभ अपने हास्टल के रूम से ४ फरवरी २००४ में किया । यह बहुत जल्दी हार्व्ड में प्रसिद्ध हो गई और कालेज के दो-तिहाई छात्र पहले दो सप्ताह में ही इसमें शामिल हो गए । हार्वर्ड में प्रसिद्ध होने के बाद मार्क ने इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों में भी फैलाने की ठानी और इसके लिए उन्होंने अपने रूम पार्टर डस्टिन मोस्कोटि्ज की सहायता ली । २००४ की गर्मियों में मार्कर मोस्कोविज ने इसे पैतालिस शैक्षिक संस्थानों में विस्तृत कर दिया और जल्द ही इसमें हजारों छात्र शामिल हो गए । कैलिफोर्निया का क्रांतिकारी सफर २००४ की गर्मियों में ही मार्कव मोस्कोविज अपने कुछ अन्य मित्रों के साथ पालो अल्टो, कैलिफोर्निया आ गए । मार्क के अनुसार, कैलिफोर्निया में बर्फगिरने के कारण ग्रूप ने वापस हार्वर्ड लौटने की तैयारी शुरू की, लेकिन फिर अचानक हमने निर्ण्र्ााकिया कि हमें यही रहना चाहिए । उस दिन के बाद वह एक छात्र के रूप में लौटकर हार्व्ड नही गए । उन्होंने कैलिफोर्निया में एक छोटा सा घर किराए पर लिया और आँफिस के रूप में वहां काम करना शुरू किया । गर्मियों के बाद उनकी मुलाकात पीटर थील से हर्ुइ, जो मार्क की कंपनी में पूंजी लगाने को तैयार हो गए । कुछ माह बाद पालो अल्टो स्थित यूनिवर्सिटी के पास उन्हें अपना पहला ‘असली आँफिस’ मिला । आज वहां सात इमारतों में फेसबुक के सैकडÞों कर्मचारी काम कर रहे हैं । मार्क ने इस जगह को र्’अर्ब कैंपस’ का नाम दिया है । नई सेवाओं ने बढर्Þाई गुणवत्ता ५ सितंबर २००६ को मार्क ने फेसबुक की गुणवत्ता बढÞाते हुए उसमें कुछ बदलाव किए । अब फेसबुक में यूजर यह भी देख सकते थे कि उनका मित्र साइट पर क्या कर रहा है – २४ मई २००७ को मार्क ने फेसबुक प्लेटफार्म की घोषणा की । इस प्लेटफार्म पर प्रोग्रामर सोशल एप्लीकेशन विकसित कर सकते थे । एक सप्ताह में ही इसमें कई प्रोग्रामर ने सोशल एप्लीकेशन बनाई और उन एप्लीकेशन को लाखों उपभोक्ता भी मिल गए । आज फेसबुक प्लेटफार्म का फायदा दुनिया भर में करीब ४,००,००० लोग उठा रहे है । इसके दो साल बाद फेसबुक ने विश्व के नंबर एक र्सच कइंजन गूगल की बोली को नकार कर अपने शेयरों की १/६ प्रतिशत साझेदारी माइक्रोसाफ्ट काँरपोरेशन को २४० मिलियन डालर में बेच दी । इस बोली के समय यह तथ्य भी सामने आया कि उस समय फेसबुक की कुल मार्केट वैल्यू ५/५ बिलियन डाँलर थी !

एचआईवी संक्रमित नहीं हूँ- ज़ूमा

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

कई पत्नियों के साथ रहने के लिए चर्चित दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा ने अपने बारे में एक व्यक्तिगत बात उजागर की है – कि वे एचआईवी निगेटिव हैं.

ज़ूमा ने एचआईवी की रोकथाम और इसके परीक्षण के लिए एक सरकारी कार्यक्रम का आरंभ करते हुए अपने एचआईवी संक्रमित नहीं होने की घोषणा.

उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने परीक्षण की बात को इसलिए उजागर किया है ताकि एचआईवी और एड्स के बारे में लोगों में ख़ुलकर चर्चा को बढ़ावा मिल सके.

जैकब ज़ूमा इससे पहले अपने ऐसे परीक्षण होने की बात को तो ज़ाहिर कर चुके हैं लेकिन ये पहली बार है जब उन्होंने अपने परीक्षण के परिणाम को सार्वजनिक किया है.

68 वर्षीय ज़ूमा ने कहा,”मैंने काफ़ी सोच-समझकर दक्षिण अफ़्रीकी लोगों को अपने टेस्ट का परिणाम बताने का फ़ैसला किया है.

“अप्रैल में हुई जाँच के परिणाम, पिछले तीन बार हुए परीक्षणों के ही समान नकारात्मक रहे हैं.”

जोहानेसबर्ग में एक अस्पताल के पास एक सभा में दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने अपने परीक्षण की बात को इसलिए सार्वजनिक किया है ताकि इससे ख़ुलेपन को बढ़ावा मिल सके और इस महामारी के साथ जुड़ी चुप्पी और बदनामी को दूर किया जा सके.

ज़ूमा ने कहा,”हमें दक्षिण अफ़्रीकी जनता को समझाना है कि एचआईवी से संक्रमित लोगों ने कोई गुनाह नहीं किया है.

मुश्किल में चीन::करुणा झा

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

सर्र्खियों में है दलाई लामा । चीन की वजह से ही हो रहा है ये कारनामा । ड्रैगन आग बबुला है कि तिब्बतियों के धर्मगुरु तवांग मठ पर क्या आ रहे है । पर मठ के चारों तरफ भारत और तिब्बत के झंडे लहराते प्रेमी उनके स्वागत में पलके बिछाये हुये थे । पर, चीन को ये गंवारा नहीं ।
इधर चीन अपनी ६० वी वर्षांठ धूमधाम से पर तानाशाही शैली में मनाई । यह हिटलर के रैलियों के जैसी लग रही थी । प्रथम विश्वयुद्ध में हारे जर्मनी को जिस तरह एक नई जान दी और पूरे यूरोप पर इसने कब्जा करने की ताकत दे डाली थी । चीन अब या तो अमेरिका जैसा उदार और अमीर देश बनेगा या जापान, जर्मनी, इटली जैसा कट्टर तानाशाही पर खुंखार अमीर देश बनेगा, यह कहा नही जा सकता है । पर यह डर जरुर बना हुआ है कि अगर चीन रुस की जगह लेगा तो अमेरिका को पछाडने की कोशिश जरुर करेगा ।
जिस तरह ६० वें सालगिरह पर उसने अपने नागरिकों को घर से बाहर न झांकने, गुब्बारे न उडाने, पतंगबाजी न करने पर और वीजिंग में बाहर न निकलने पर पाबंदियाँ लगाई, उससे साफ है कि चीन का शासक वर्ग चीनियों को पैसा कमाने की इजाजत दे देगी पर राजनीतिक अधिकार नहीं । जो देश अपनी जनता को मशीनी रोबोट समझते है वे कही भी सही गलत का फैसला अपने हिसाब से करेंगे । मानवता के नाते नहीं ।
गौरतलब है कि भारत, यूरोप, अमेरिका आदि को चिंता होगी पर वे कर क्या सकते है । चीन दुनिया की सबसे बडी अपनी सेना, अपने पैसे के भंडार, अपनी बडी जनसंख्या का इस्तेमाल किसी मानव उद्धार के लिए करेगा ऐसा नही लगता । चीन के असल दोस्त तानाशाह देश है वह सुडान, बर्मा, उत्तरी कोरिया व पाकिस्तान के साथ है । उसे लोकतान्त्रिक देश अछूत लगते हैं । मानव अधिकार चीन की नीति के हिस्से में नही आते ।
तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने जबसे अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया है, तब से चीन की बौखलाहट और बढी हर्ुइ है । पर भारत अपने ‘अतिथि देवो भवः’ के र्सार्थकता को पूरी तरह से फलीभूत कर दिखाया । और चीन ने जिसने भारत को चेतावनी दे रखी थी कि अगर दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश का दौरा करेंगे तो किसी भी कीमत पर भारत को बख्शा नही जायेगा । भारत को चीन से सबसे ज्यादा खतरा है । भारत के चारांे तरफ चीन ने अपने अड्डे बनाने शुरु कर दिये हैं । तिब्बती शरणार्थियों के कारण चीन भारत से पहले से ही नाखुश है । सीमा विवाद का हल भी अधर में लटका हुआ है । बर्मा, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान में चीन और भारत दोनांे की ही रुचि है । अभी हाल ही मंे जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन का भ्रमण किया तो चीन को लगा कि अमेरिका से बिगडे हुऐ संबन्ध अब शायद सुधर जायेंगे और भारत की अपेक्षा चीन में उनका व्यापार कुछ ज्यादा ही जमेगा जिससे अमेरिका से उनका संबन्ध मजबूत होगा । चीन तो कभी गुलाम नही रहा । पर भारतीयों का संबन्ध तो गुलामी से बहुत पुराना है ।
ऐसे मे चीन अमेरिका के साथ अच्छे संबन्ध का ख्याली पुलाव पका रहे थे । पर उनके सपनों को झटका तब लगा जब इस महीने निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे दलाई लामा अमेरिका पहुँचे । चीन के व्यापक विरोध के बाबजूद भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन के विरोध को बिल्कुल ही नजर अंदाज कर दिया । और बराक ओबामा ने भव्य रूप से दलाई लामा का स्वागत भी किया । दलाई लामा ने बराक ओबामा से तिब्बत की समस्या का समाधान करने का आग्रह भी किया है ।
चीन चिढता है तो चिढे । पर उनका नारा है “भारत तिब्बत संबंध जिन्दाबाद” । तवांग में तीस हजार तिब्बतियों सहित भारत, नेपाल, भूटान के सैकडांे भक्त उनके दर्शन को लालायित है । भले ही चीन की निगाह में वे १९५९ से ही निर्वासित जीवन जी रहे हैं । इस बार मठ में धार्मिक प्रवचन देने वे उसी रास्ते से गए, जिधर से वे भारत आये थे । आज भी वही प्यार, सम्मान संरक्षण, उन्हें यहाँ मिला । चीन इस यात्रा और दलाईलामा के प्रवचन को विध्वंशकारी ठहरा रहा है । १३ तवांग मठ के नाते ही अरुणाचल पर अपना कब्जा जता रहा है । इसी बात से वो भारत से जला-भूना है । दलाई लामा के छठी तवांग यात्रा पर भारत के रवैये पर चीन उसे गाली दे रहा है । तवांग हिस्सा और तिब्बताध्यक्ष को अतिथि देवो भवः कहना उसे फूर्टर्ीीाँख नही सुहा रहा है । दलाई लामा के जरिये ही सही भारत को चीन की धमकियों का जबाब देने का मौका तो मिल गया । अभी भी चीन का भौंकना जारी है । पर वह भारत के बेपरवाह रुख से अंदर ही अन्दर हिल गया है । शिमला-संधि को भूले चीन को भारत ने भी बता दिया कि भारत तिब्बत के साथ है और भारत के लिए कल भी सम्मानीय थे आज भी सम्मानीय है दलाई लामा ।
चीन ने दलाई लामा को पृथकतावादी नेता कहा है जिससे दोनांे देशों के संबन्ध खराब होने का संकेत है । अमेरिका ने कहा है कि दलाईलामा अन्तर्रर्ााट्रय धार्मिक नेता हैं । अब देखना यह है कि चीन और अमेरिका के संबन्ध आगे क्या गुल खिलाते है । अस्तु ।।

गोरखालैण्ड और वाम राजनीति::करुणा झा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

गोरखालैण्ड आन्दोलन पश्चिम बंगाल में लगातार तेज होता जा रहा है । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अब आमने-सामने की कारवाई शरु कर दी है । वैसे तो, मोर्चा ने हिंसक आन्दोलन से परहेज करने का भरोसा दिया था, लेकिन उसका आन्दोलन अब हिंसात्मक रुप ले चुकी है । सीधी कारवाई के तहत दार्जिलिंग सहित कुछ हिस्सों के सभी गाडियाँ सरकारी दफ्तरों व थानों में वेस्ट बंगाल हटाकर वहाँ गोरखालैण्ड लिखा जाना शुरु हो गया है । पहाडों और पहाडी शहरों मे गोरखालैण्ड की मातृभूमि का गीत गुंजायमान हो रहा है, जिससे यह आन्दोलन और भी जोशीला होता जा रहा है ।

दार्जिलिंग जिले में यह आन्दोलन इतना ज्यादा जोर पकड लिया है कि सीपीएम सहित तमाम दूसरे दलों का फिलहाल वहाँ नामोनिशान मिट चुका है । जीएनएलएफ का भी लगभग सफाया हो चुका है । काँग्रेस की पकड थोडी बहुत जरुर दिखाई देती है लेकिन काँग्रेस को लोग यहाँ पसन्द नही करते । इसकी वजह यह है कि दूसरा नेतृत्व बांगला भाषियों के हाथो में हैं ।

तृणमूल काँग्रेस, एसयूसीआई जैसी पार्टियों का भी यहाँ जनाधार नहीं रहा । क्योंकि गोरखालैण्ड अलग राज्य की मांग के खिलाफ विधानसभा में इन दलों ने भी प्रस्ताव पारित करने में सरकार की मदद की थी । भाजपा ने इस आन्दोलन को र्समर्थन दिया था, पर राज्य की भाजपा इस मामले में ज्यादा कुछ खास नही कर सकीं । कहा जा सकता है कि सीपीआई झारखण्ड मुक्ति मोर्चा जैसे कुछ छोटे दलो को छोडकर तमाम दल गोरखालैण्ड अलग राज्य के खिलाफ थे । गौरतलब है कि, बंगाल बाम मोर्चा के सभी घटक दल गोरखालैण्ड के खिलाफ है, वही देश के अन्य हिस्सों मे सीपीआई आरएसपी फार्रवर्ड ब्लाँक नये राज्यो के निर्माण के पक्ष में हैं । झारखण्ड में वाममोर्चा की सभी पार्टियोंका अस्तित्व है । क्योंकि अलग राज्य बनाने के आन्दोलन मंे सीपीएम को छोड लगभग तमाम वाम दल क्रियाशील थे । सीपीआई ने तो उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ के निर्माण का भी पूरा र्समर्थन किया था । सीपीआई विदर्भ तेलांगना आदि राज्यों के गठन का भी हिमायती रहा है मगर वही सीपीआई बंगाल विभाजन का पूरजोर विरोध कर रही है । इसकी बडी वजह सीपीआई “बंगालीबाद” है ।

तेलांगना पर सीपीएम के रूख से यह भ्रम और भी बढा है क्योंकि यह पार्टर्ीीेश में नये एवं छोटे राज्यों के गठन का जमकर विरोध करती है । झारखण्ड आन्दोलन को उसने एक साजिश करार दिया था । अब वही सीपीएम राष्ट्रीय दबाब में हो या राजनीतिक मजबूरी के कारण तेलांगना अलग राज्य को र्समर्थन देने लगी है ।

दरअसल, राष्ट्रिय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने के लिए सीपीएम के पास दलों का अकाल सा पडÞ गया है । तेलांगना की टीआरएस के साथ समझौता करने के लिए सीपीएम पैंतरा बदला और तेलांगना अलग राज्य को रणनीतिक र्समर्थन दे दिया ।
सीपीएम समेत वाममोर्चा के घटक दल इस प्रचार में लगे हुए हैं कि गोरखालैण्ड अलग राज्य बन जाने से भारत की स्थिति कमजोर पड जायेगी और देश में विरोधी ताकत को बल मिलेगा । इस प्रचार में कई विपक्षी दल भी शामिल है । इस तरफ के आधार पर कि दार्जिलिंग के चारों तरफ चार पडोसी देश नेपाल, चीन, भूटान, बंगलादेश है । चीन की सीमा से सीधे भले ही दार्जिलिंग न लगी हो, लेकिन सिक्किम तो मिलती है, फिर सिक्किम और दार्जिलिंग में दूरी ही कितनी है ।

दार्जिलिंग और आस पास के क्षेत्र से लगे भूटान, बंगलादेश और नेपाल में आतंकवादियों ने पहले से ही अपना डेरा जमा चुके हैं ।

कामतापुरी और गोरखामुक्ति मोर्चा के बीच साठगांठ की खबर तो आती ही रहती है । कामतापुरी के उगवादी संगठन के एल ओ और असम के उल्फा के बीच भी संबन्ध जगजाहिर है, और इन संगठनों के हुजी और आईएसआई के साथ भी घनिष्ठ संबन्ध बताये जाते हैं । हालाकि जनमुक्ति मोर्चाके नेता विमल गुरुंग कहते है कि भारतीय गोरखाओं की भारत भक्ति विश्वप्रसिद्ध है । नेपाल में माओवादीओं के सत्ता में आने के बावजूद दार्जिलिंग के गोरखाओं का माओवाद से कुछ लेना देना नहीं । लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि नेपाल का माओवादी भारत विरोधी है और नेपाली मूल के गोरखाओं का भारत में एक अलग राज्य बनाने से भारत विरोधी कारवाई बढÞ सकती है दार्जिलिंग की वह पतली सी पट्टी वाली भूभाग, जो पूर्वोत्तर भारत को मुख्य भारत से जोडती है । भारत की कमजोर कडी हंै । बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के ठीक उत्तर की ओर दार्जिलिंग जिला है । दार्जिलिंग जिले के दक्षिण तरफ की ओर नक्सलवादी से लेकर फांसीदेवा तक कुछ किलोमीटर तक पतली पट्टी के दोनों ओर नेपाल और बांगलादेश है । एक समय में नेपाल और बांगलादेश ने इस क्षेत्र पर एक स्वतंत्र हाइवे की मांग की थी, ताकि दोनो देश के बीच बेरोकटोक आयात निर्यात हो सकंे, पर भारत सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया था । लेकिन नेपाल और बंगलादेश अभी भी यह सपना देख रहा है । गोरखालैण्ड विरोधी दलांे का यह कहना है कि दार्जिलिंग के अलग राज्य बन जाने से कानूनी तौर पर न सही, मगर गैर कानूनी तरीके से नेपाल और बांगलादेश के बीच तस्करी को बढावा मिलेगा साथ ही भारत विरोधी गतिविधि को भी बल मिलेगा ।

नए राज्यों के गठन के र्समर्थक दल इन तर्को को खारिज करते है । उनका कहना है कि अभी पश्च्िाम बंगाल खुद ही आतंकवादियों का सबसे बडÞा आश्रयस्थल बना हुआ है, इसमें दार्जिलिंग के गोरखाओं को भारत के अन्दर एक अलग राज्य दिया जा रहा है । अलग देश नहीं । वे लोग कश्मीरियों की तरह पाकिस्तान जिन्दावाद नही बल्कि हिन्दुस्तान जिंदावाद के नारे लगायेंगे ।

असम को तोडकर कुछ नये प्रदेश बनाये गये । लेकिन उन राज्यों मंे कभी भारत विरोधी ताकत को पनपने नही दिया गया, जिससे भारत की अखण्डता पर कोई खतरा पैदा हो जाये । लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश चीन से सटे होने के बाबजूद वहाँ कोई बडी साजिश का जन्म नही हुआ नव दार्जिलिंग में ये कैसे संभव है ।

गोरखालैण्ड के र्समर्थकों का कहना है कि दार्जिलिंग के गोरखे भारत के प्रति पूरी तरह वफादार हैं, उन्हें सिर्फबंगलाभाषियों से नफरत है । इस नफरत की वजह है कि आजादी के बाद से ही बंगलाभाषियों ने दार्जिलिंग का सिर्फदोहन किया है । जैसे अंग्रेजो ने किया था । गोरखाओं का कुली, मजदुर, रिक्शावाला बहादुर से ज्यादा कुछ नही समझा गया । पहाडों पर बंगालियों सहित अन्य धनपतियों के बंगले, चायबगान पर्यटन स्थल बनें मगर गोरखाओं की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती चली गई ।

जीएनएलएफ के आन्दोलन के कारण गोरखाओं की हालत में थोडा बहुत सुधार जरुर आया, लेकिन सुभाष घिसिंग के पतन के बाद सारे किये धरे पर पानी फिर गया । दार्जिलिंग के स्थानीय लोगों का कुछ खास विकास नही हो पाया । यहाँ तक कि गोरखाली भाषा को भी खत्म करने की कोशिश की गई थी मगर गोरखाओं के आन्दोलन और केन्द्र सरकार के दबाब के कारण गोरखाली भाषा को संविधान मंे मान्यता मिली । फिलहाल, गोरखालैण्ड का आन्दोलन तेज से तेज होता जा रहा है । उधर आन्दोलन के विरुद्ध सीपीएम संगठनों ने जबाबी आन्दोलन शुरु कर दिया है । पहाडों पर गाडियों को जाने से रोका जा रहा है । सिलिगुडी में भी बन्द का आह्वान किया जा रहा है “आमरा बंगाली” और “बंगला भाषा बचाओ समिति” सांप्रादायिकता फैलाने में लगी है ।

यह आन्दोलन उग्र रुप ले चुका है । पर्यटन पर आश्रति अर्थव्यवस्था चरमरा जाये और वे लोग आत्मर्समर्पण को तैयार हो जायंे, पर इससे तो हालात और भी बिगडेंगा । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंगठ का कहना है कि राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी के अनुरोध पर फिलहाल दफ्तरो, गाडी, के र्साईन बोर्ड पर गोरखालैण्ड लिखा जाना बंद कर दिया जाए पर आन्दोलन जारी है । दूसरी तरफ, पश्च्िम बंगाल सरकार मौन धारण किये हुये है । ज्योति, बसु के कार्यकाल में इस आन्दोलन के खिलाफ जमकर कारवाई हर्ुइ थी, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हर्ुइ और हजारों की संख्या में लोग घायल हुये थे । लेकिन इस समय वाममोर्चा की सरकार बैकफूट पर आ चुकी है । उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है । विभिन्न आन्दोलन और पुलिसिया कारवाई के कारण वाममोर्चा सरकार रसातल में पहँुच गई है ।

लेकिन इस बार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अलग राज्य के अलावा और कुछ नही चाहती । ऐसी स्थिति में अगर इस आन्दोलन को रोका गया तो यह आग और भडक सकती हंै । इसमंे कोई शक नही । नेपाली भाषा और नेपालीपन के आधार पर गोरखालैण्ड की मांग हो रही है । वैसे भी गोरखाओं की पहचान नेपाल से ही है । गोरखा से ही नेपाल के एकीकरण का अभियान संचालन हुआ था । अब जबकि नेपाल के बाहर गोरखालैण्ड नेपाली भाषा, नेपालीपनकी मान्यता की बात हो तो नेपाल सरकार की भूमिका महत्वपर्ूण्ा समझी जा सकती है । पर नेपाल राज्य में रुपान्तरण हो या न हो भारत सरकार की रवैया तेलांगना के मामले में स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है । फिलहाल गोरखालैण्ड की मान्यता इतनी आसान से मिल पाएगी यह दिखाता नहीं है ।

अपने ही लगाये आग में जल रहा पाकिस्तान::रुचि सिंह

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

Ruchi Singhपाकिस्तान के बारे में आज सबसे बडा सच यह है कि “बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होय” । पाकिस्तान के कभी लाहौर कभी कराची, पेशावर, राजधानी इस्लामावाद आतंकी कार्यवाही से दहक रहा है । गोरिल्ला हमले और आत्मघाती बमों के धमाकों से अफरा-तफरी का माहौल बन गया है । दर्दात बेतुल्लाह मेहसूद के मारे जाने के बाद जो सेना खुश हो रही थी, वही इन लगातार हमलों से दबाब में आ गई दीख रही है । सच तो यह है कि पाकिस्तान की वही सेना जिसने दहशतगर्दों की फौज खडी की थी, आज खुद अपने निशाने पर है । आज उसी का परिणाम सामने आ रहा है कि पाकिस्तान को अपनी ही सरहदों के अंदर संपर्ण् युद्ध छेडना पडा है । पाकिस्तान की स्थापना का आंदोलन चलाते समय मोहम्मद अली जिन्ना यह भूल गए थे कि कौमें मुल्क से बनती है मजहब से नही । मजहब की आड में खेला गया खेल आखिर ऐसी ही परिणति में बदलता है । एक कथा है कि भगवान शंकर ने भस्मासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर वर दिया कि “जा जिसके सर पर तुम हाथ रखोगे वह भस्म हो जाएगा” भस्मासुर ऐसा वरदान पाकर निरंकुश हो गया और भगवान शंकर को ही भस्म करने दौड पडा ।

यह कथा आज पाकिस्तान के आतंकवादियों पर बखूबी लागू होती है । एक समय पाकिस्तान के फौजी अफसरानों ने फौजी ट्रेनिंग देकर आतंकवादियों को खडा किया था कश्मीर के नाम पर । लेकिन आज हालात यह है कि उन्हीं आतंकवादियों से घबडर्ई फौज को लोहा लेना पडÞ रहा है । साफ तौर पर कहा जा सकता है कि दहशतगर्दी से लहूलुहान पाकिस्तान आतंकवाद की आखिरी धूरी साबित हो रहा है ।
गौरतलब है कि कभी इसी पाकिस्तान ने अमेरिका के इशारे पर अफगानिस्तान से सोवियत सेना खदेडने के लिए तालिबान की मदद की थी । अमेरिका ने अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए को अफगानिस्तान में इस्लाम परस्त तत्वों की रुपए-पैसे हथियारों से मदद करने का वचन दिया था । सीआईए ने विश्व के विभिन्न देशों से हजारों सोवियत फौजों से लडने के लिए पाक-अफगान सीमा पर भेज दिए । बीसवीं सदी के सबसे बडे जिहाद के लिए ट्रांजिट पावर बन कर पाकिस्तान उभरा । 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं की वापसी के बाद खुद को इस क्षेत्र से अलग कर लिया । पाकिस्तानी मदरसों से जो जेहादी गए थे वही बाद में तालिबान सरकार की रीढÞ की हड्डी बने । पाकिस्तान को लेकर जो आशंकाएं थी वही सब एक-एक करके सामने आ रही है । आतंकियों के रोज ब रोज के हमलों ने पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवाल खडा करना शुरु कर दिया है ।
काबिलेगौर है कि पाकिस्तान वर्षों से इस्लामी उग्रवाद को पालता-पोसता आ रहा है । कश्मीर के लिए कश्मीर में आतंकवाद को पाकिस्तान ने हर तरह से मदद की । अमेरिकी रणनीतिज्ञो का मानना है कि इस्लामी उग्रवाद की जडें पाकिस्तान में ही है जब तक इन्हें जड से ध्वस्त नही कर दिया जाता, अफगानिस्तान में विजय हासिल करना नामुमकिन है । आज तालिबान सिर पर सवार है और इस्लामी निजाम के लिए सत्ता छोडÞने को कह रहा है । अफसोस यह है कि पाक बखूबी इन आतंकियों की चाल समझता है और उन्हें पालने की गहरी कीमत चुका रहा है । पेशावर में अब तक का सबसे बडा धमाका आतंकी कार्रवाई की तेरहवी घटना है । पेशावर की इस घटना के कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पाक की “अत्यन्त महत्वपर्ण्” यात्रा पर रावलपिंडी पहुँची थी । सवाल यह पैदा हो चुका है कि क्या चरमपंथी अपने नामुराद कृत्य से अमेरिका को भी कोई सबक देना चाहते है – अमेरिका बेशक आधिकारिक तौर पर भले ही कभी मानने तो कभी खारिज करने के अपने शब्दों का जाल क्यों न बुनता रहे पर पाकिस्तान शुरु से ही अमेरिका की भारी मदद का उपयोग केवल आतंकवादी कार्रवाइयों को बढावा देने के लिए ही करता आया है । फिलवक्त तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ वजीरिस्तान में शुरु हुआ सैन्य अभियान जारी है । कडे प्रतिरोध के बावजूद पाक सेना का आँपरेशन “राह-ए-निजात” जारी है । पाकिस्तानी सेना तालिबान को तीन दिशाओं से घेरने के लिए बेशक आगे जरुर बढ रही है लेकिन आतंकवादियों द्वारा पांच अगस्त को अपने नेता बैतुल्लाह महसूद के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने का बदला लेने के लिए पाक में हमले पर हमले करवाए जा रहे हैं । दक्षिणी वजीरिस्तान में ज्ञछण्ण् विदेशी लडाकों समेत करीब दस हजार तालिबान लडाके मौजूद हैं । समझा जाता है कि पाक में हुए डण् फीसदी आतंकवादी हमलों में इसी क्षेत्र के उग्रवादियों का हाथ है । अच्छी बात यह है कि दहशतगर्दों को कुचलते हुए सेना आगे बढ रही है ।
गौरतलब है कि अमेरिका ने पाकिस्तानी जमीन पर सीधे हमलों की चेतावनी तक दे डाली थी । पाकिस्तानी जमीन पर अमेरिका के विशेष सैनिक दस्ते अघोषित रुप से हमले करते रहे हैं । चालकविहीन ड्रोन विमानों की बमबारी निरंतर चलती रही है । अमेरिका ने साफ शब्दों में कह दिया था कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर उग्रवादी गढों को समाप्त करने के लिए खुद कार्रवाई करें या अमेरिकी आक्रमण झेलने के लिए तैयार रहें । अमेरिकी हमलों से पाकिस्तान का दर्जा एक पराधीन देश से अधिक कुछ नही होता । लिहाजा उसके पास सैनिक अभियान छेडने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नही बचा था । सैनिक अभियान के उपरांत उग्रवादी पूरे पाकिस्तान में बिखर गये है या बीहड पहाडों में शरण ले बैठे हैं । आज पूरा पाकिस्तान आतंकवादी हमलों से जल रहा है । पाक सरकार इसे रोक पाने में अर्समर्थ और लाचार नजर आ रही है, पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्ठानों में भी कई ऐसे है जिन्हें उग्रवाद के साथ हमदर्दी है । पाक और अफगानिस्तान के जमीन पर तमाम तरह के आतंकवादी संगठन एकजुट हो गए हैं जो पूरे विश्व के लिए खतरा बनते जा रहे हंै । भारत, इराक, अफगानिस्तान और चीन के एक प्रांत में भी इस्लामी उग्रवाद की कडिया किसी न किसी रुप में पाक से जुडी होती है इरान पर आतंकवादी हमला करने वाला बलूय संगठन भी तालिबान से मिल गया है साथ ही चीन के इस्लामी उग्रवाद भी तालिबान के गले लग चुके हैं । पाकिस्तान के पंजाबी आतंकवादी संगठन जिनमे कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठन भी शामिल है वह भी अपना तालमेल तालिबान के साथ मिला बैठे है । “अलकायदा और तालिबान अपने भर्ती के आधार का यूरोप और अमेरिका में विस्तार कर रहे हैं” इस लाईन की सूचना से दुनिया का बौखलाना स्वाभाविक है और चेत जाने के लिए खबरदार भी कर रही है । अलकायदा और तालिबान के जहरीले नाखून और पैने हो चुके है । अलकायदा ने जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका में सिर्फअपने अड्डे ही नही बनाए हं बल्कि वहाँ से युवकों को बरगला कर आतंकी प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान भी भेज रहा है ।
शिकागो निवासी डेविड कोलमैन हेडली और कनार्डाई नागरिक राणा की एफबीआई द्वारा गिरफ्तारी से यह तो साबित हो गया है कि दोनो पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम कर रहे थे । बहरहाल अमेरिका का आकलन है कि अगर अफगानिस्तान में कोई ढील बरती गई तो तालिबान को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल हो जाएगा । पाकिस्तान भी इस्लामी उग्रवाद से नही बच पायेगा । इसके बावजूद भी कुछ ना-ना करते भी पाकिस्तान को दी जाने वाली द्द।घ अरब डाँलर की सैन्य सहायता को हरी झंडी दे डाली है । राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने पाकिस्तान को अरबों डाँलर की मदद करने वाले केरी लूगर विधेयक पर बिना किसी बदलाव के हस्ताक्षर कर दिए हैं । क्या अब अमेरिका विचार करेगा कि पाक के घरेलू हालात के लिए कौन, किस हद तक जिम्मेदार है – क्या खुद पाकिस्तान या अमेरिकी नीति – आतंकवाद के इस ढेर में उठती इस्लामी उग्रवाद से यह गंभीर प्रश्न भी उठता है कि पाकिस्तान के नाभिकीय हथियारों के नियंत्रण का क्या होगा – नाभिकीय हथियार भी पाकिस्तान के लिए बहुत भारी सावित हो रहे है । आतंकी हमले ऐसे ही चलते रहे तो पाक की फौज का मनोबल ना टूट जाए । दहशतगर्दों ने अपने जंग में अलकायदा, तालिबान, जैश ए मोहम्मद, लश्कर ए झांगवी जैसे दहशतगर्दों से हाथ मिला लिया है । इन जेहादियों का एक ही सपना है इस्लामावाद पर कब्जा और एटमी ताकत हथियाना ।
फिलवक्त हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं जिनके चलते भारत को चिंतित होना भी स्वाभाविक है । पाकिस्तान का टूटना एक एटमी ताकत का टूटना होगा । आतंकियों के हाथ पहुँचने पर पूरी दुनिया खतरें में पड जाएगी । उधर दहशतगर्दों ने तो घोषणा कर दी है कि पाक की सत्ता काबिज करने के बाद उनका अगला निशाना भारत है । भारत ने पाकिस्तान की गंभीर हालात को समझा है । पहली बार सेना और सरकार ने प्रकारांतर से तालिबान के खतरे को स्वीकारा है । रक्षामंत्री ए.के. एंटनी और थलसेना प्रमुख दीपक कपूर ने कहा कि यदि तालिबान ने भारत में विध्वंसक कार्रवाई की तो उसका मूँह तोड जवाब दिया जाएगा । लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि पूरे विश्व में एक बडी ताकत के रुप में उभर चुके अलकायदा और तालिबान से क्या अकेले निपटा जा सकेगा – आतंकवाद के इस गठजोड को पराजित करने के लिए अमेरिका और पाकिस्तान के सैनिक अभियान नाकाफी साबित होंगे । इनके खात्में के लिए एक साझा अंतर्रर्रीय अभियान अवश्यंभावी हो गया है । लिहाजा इस मिशन में देर करना उचित नही है । सभी देशों को मिलकर अलकायदा और तालिबान पर हमला बोलना ही होगा क्योंकि अपने ही पैदा किये संकट में फंसा पाकिस्तान पडोसी देशों के लिए भी खतरा पैदा कर चुका है । इसके मद्देनजर भारत के साथ-साथ अन्य पडोसी देशों को भी र्सतर्क ही नही बल्कि अपनी “समग्र सुरक्षा नीति” का पुनर्निर्माण करना होगा ।
बहरहाल यह तभी संभव होगा जब हम सूचनाएँ और आतंक निरोधी तकनीकों को साझा करके ही आदमखोर आतंकवाद से निजात पा सकेंगे वरना दायित्व में चूक से कही बहुत बडा खामियाजा पुनः भारत या अन्य पडÞोसी मुल्कों को उठाना न पड जाए । देखना होगा पाकिस्तान किस हद तक अपने इस जंग में खरा उतरता है – अब तो जरदारी की कार्यशैली का इम्तहान है कि वह अपने मुल्क को आतंकवाद से छुटकारा दिला पाते हैं या मकडे की जाल में उलझा कर रखते हैं ।

राक्षसी प्रवृत्ति और कोपेन हेगन::योगेन्द्र प्रसाद साह

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

yogen_r1_c1नवम्बर 5, 2009 को अमेरिका में एक हादसा हो गया । 9/11 की घटना के बाद अमेरिकनों को इस हादसा ने झकझोर कर रख दिया है । मनोरोग चिकित्सक मेजर मिडाल मल्लिक हसन ने 12 गोरे अमेरिकन सैनिकों को बन्दूक की गोलियों से छलनी कर दिया और 20 सैनिक घायल हैं । टेक्सास राज्य की पोर्ट हुड की इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, “जल्दबाजी में हम कोई निष्कर्षनिकालकर अपनी राय व्यक्त न करें । जाँच से निष्कर्षनिकाल कर हम आगे की सोचेंगे ।”
अमेरिकी सरकार की विश्व की जनता के प्रति मालिकाना अन्दाज और घृणा के व्यवहार से उपजी यह घटना इराकी और अफगानी जंग की वैधता पर सवाल उठाने की गरज से भी हो सकती है या धार्मिक कट्टरपंथ को जायज मान कर भी हो सकतीहै । अगर मेजर मिडाल मल्लिक हसन ने मानसिक रोगी के रुप में भी इस घटना को अन्जाम दिया है, तब भी यह विचारणीय विषय होगा कि अफगानिस्तान में बरात में शामिल होने वाले बरातियों के नरसंहार जैसे अनेक हत्याकांडों से विक्षिप्त बनकर मेजर हसन ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया है अथवा यह अन्य कारणों से सचमुच में मानसिक रोगी था । अगर मेजर सचमुच में मानसिक रोगी था तब वह कार्यरत क्यों रखा गया था -
जिस दिन अमेरिकी सरकार ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम का प्रहार करके पलक झपकते ही लाखों लोगों का नर संहार किया था उसी दिन से अमेरिकी जनता पर राक्षसी दम्भ की शुरुआत हुयी थी । हिरोशिमा और नागासाकी महाविनाश में अपनी गलती का एहसास करने की बात तो दूर रही उल्टे एटम बम बनाकर देनेवाली यहूदी वैज्ञानिक ओपेन डियर द्वारा नरसंहार का विरोध करने पर उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया था । हिटलर से प्राण रक्षा के लिये भागे हुए जर्मन यहूदी वैज्ञानिकों ने अगर रुस को अणुबम बनाकर नहीं दिया होता तब विश्व की जनता अमेरिकी कैदखानों से कभी फर्ुसत नहीं पा सकती थी । 1945 के कुछ वर्षों बाद अणुबम के नाम पर ही रुस ने साम्यवाद फैलाने की हडकते तेज कर दी थी वहीं अमेरिका ने प्रजातंत्र की दुहाई देकर तीसरी दुनियाँ के देशों में जबरन तानाशाही हुकुमतों को प्रतिस्थापित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोडी । हिन्दू कट्टरपंथी धर्म के चलते मुसलमान और अंग्रेज भारत को कुचलने में सफल रहे – उसी प्रकार के इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण अमेरिका मुस्लिम जगत को रौंदने में सफल रहा है । अंग्रेज निर्मित पाकिस्तान के जियो-पोलिटिकल अस्तित्व के कारण आज भारत, चीन, मध्य एशिया के देश, अफगानिस्तान और इरान अमेरिकी सेनाओं से घिरते जा रहे हैं । अगर इराक और अफगानिस्तान में मानवीय क्षति और त्रासदी देखकर मेजर निडाल मल्लिक हसन ने यह बरदात किया है तब इतिहास उनके पक्ष में जायेगा । किन्तु इस्लाम धर्म के चौदह सौ वर्षपहले के धार्मिक प्रसार के विध्वंस पर गौरव गाथा लिखने की कोशिश होगी तब इस पृथ्वी ग्रह की मुसीबतें बढती जायेगी ।
विश्व धर्म एक है । बाकी धर्म सम्प्रदाय है । इसी शब्द से साम्प्रदायिकता का विकास होकर मनुष्य जाति नरक लोक का र्सगर्व निर्माण करती रही है । धर्म का उदय मनुष्य के सामाजिक आचार संहिता के प्राकृतिक रुप में उद्भव से सम्बन्धित प्रश्न रहा है । चेतनशील युक्त मनुष्य जगत ने अपने मानवीय गुणों का संयोजन करते हुए, मृत्युलोक के दुःखों से निजात पाने के लिए, आपसी सहयोग की भावना, त्याग, तप, प्रेम और भाईचारा का सिद्धान्त गढा है । निराशा और कुंठा को आशा में बदलने हेतु आध्यात्मिक आधार की कल्पना करकर्र् इश्वर की सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया है । सुखी जीवन के लिए प्राणदायिनी आधार स्तम्भ के रुप में स्थापितर् इश्वर को हमने अपने अनियंत्रित इच्छा आकांक्षाओं की लगाम उन के हाथों में थमा दिया है । साम्प्रदायिकता से अभ्रि्रेरित धर्म भटकाव और टकराव की राहें खोलता रहा है । मनुवादी धर्म की तेजधार अब मोथडा हो चुकी है । किन्त इर्साई धर्म और इस्लाम धर्म की राजनीतिकरण से इनके बीच विध्वंसपर्ण् झगडों का आकार ग्रहण करता रहा है ।र्इर्साई धर्म की अगुवाई अमेरिका करता रहा है । इस्लामिक जेहादी सउदी अरब की अगुवाई में पनपा है । एटम बम का अधिकारी होने के बाद पाकिस्तान इस्लामिक विश्व के नेता के रुप में स्थापित होने के लिए संर्घष्रत है । दर्भाग्य से एक ठिकेदार सबसे धनी और शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका है, दूसरा भीखमंगा राष्ट्र पाकिस्तान है । अमेरिकी प्रभर्ुर् इसा का अनुयायी होने के बावजूद अपने पर्ूवजों को नहीं भूले हैं । अपनी संस्कृति, रहन सहन, भाषा को यथावत रखते हुर्एर् इर्साई धर्मावलम्बी धर्म का प्रयोग अपने अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक हितों में करते रहे हैं । वहीं इस्लामिक कट्टरपंथी अमेरिकी छत्रछायाँ में पलकर चौदहर सौ वर्षपहले की अरबी संरचना का विश्व के इस्लामिक देशों पर हिंसा और धार्मिक सत्ता के बल पर लादने के प्रयास में, अपने समुदाय को भीषण द्वन्द्व की स्थिति में रखने की राह का सृजन कर रहे हैं । विदेशी भाषा और संस्कृति लादने की जेहादी हरकतों से अलकायदा ने इस्लाम धर्म के भीतर ही महाभारत की रचना कर दी है । पाकिस्तान के पर्व राष्ट्रपति परवेज मर्शर्रफ ने अपने शासनकाल में इस्लामावाद की 200 उल्लेमाओं की मीटिंग में कहा था – 18 वर्षों के उम्र के बाद ही धर्म की शिक्षा देनी चाहिए ताकि धर्म का अर्थ समझ में आ सके । उन्होंने दृढतापर्ूवक कहा था – विदेशी भाषा और संस्कृति को हम धर्म के नाम पर पाकिस्तान पर नहीं लाद सकते ।
विश्व धर्म अविभाज्य है । इसमें विभाजन आते ही मनुष्य के दुःखों का जो सिलसिला शुरु हुआ था वह आजतक निरंतर जारी है । सम्प्रदाय से साम्प्रदायिकता और अन्त में जातीय सोच में अटककर या भटककर ही जर्मनी ने जातीय उन्माद की तुष्टि के लिये दो विश्ययुद्धों को जन्म दिया था । मनुवादी जातीय संरचना के कारण भारत दो हजार वर्षों तक पराधिन रहा । नेपाल में उच्चजातीय दम्भ के कारण ही पर्यावरण विनाश के साथ वंश विनाश की स्थिति है । मुसलमान आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान और भारतीय कच्छ क्षेत्रों का जंगल विनाश करके मरुभूमि में परिणत कर दिया था । जब हिंसा का सहारा लेकर धर्म या जातीय दम्भ प्रकट होता है तब कालान्तर में जाकर हिंसक समाज का निर्माण हो जाता है । हिंसक समाज की सोच राक्षसी प्रवृत्ति की हो जाती है । पाकिस्तानी पहले आतंकवादी बनकर काश्मिर और अफगानिस्तान में लडते रहे और अब अपने ही घर में गृहयुद्ध में संलग्न होकर गर्व महसूस कर रहे हैं । नेपाल का खसवादी दम्भ गृहयुद्ध का आकार लेकर अपने घर की बर्बादी में जुटा है । वसुधैवः कुटुम्बकम् की सोच के अभाव में अमेरिकी कांग्रेस के बहुमत सदस्यों की धारणा है कि पृथ्वी लोक रहे न रहे – वे लोग अपने इण्डस्ट्रीज की कीमत पर पर्यावरण की रक्षा में योगदान नहीं देंगे । अभी हाल में ही भारत दौरे पर आए स्वीडीस प्रधानमंत्री ने इस राज को खोला है कि कोपेन गेहन बैठक को निष्प्रभावी बनाने का खेल अमेरिका शुरु कर चुका है ।
नेपाल में वन विनाश तेजी से जारी है । इसी कारण यहाँ का प्राकृतिक संतुलन बिगड चुका है । नेपाल सरकार बन विनाश की चर्चा भी सुनना नहीं चाहती है – वह तो एवरेस्ट पर बर्फन होने का रोना रोने के पर्ूवाभ्यास में लगी है ताकि कोपेन हेगन में चीख-चीख कर रोये और एवरेस्ट पर बर्फजमने के बहाने डाँलर मांगने में सफल हो सके । पृथ्वी कही जल रही है – कही बाढ में डुबी है और कहीं आँधी की विनाशलीला झेल रही है । किन्तु पृथ्वी को बचाने वाले सत्ताधारियों की सोच पर राक्षसी प्रवृत्ति इस कदर हावी है कि पृथ्वी रहे न रहे उनकी भोगवादी व्यवस्था पर अंकुश न लगे । हम रोज मन्दिर, मस्जिद और चर्च में जाते हैं । किन्तु हमर् इश्वर की संरचना पृथ्वीलोक को समाप्त करने में लगे है । क्या यहर् इश्वर भक्ति है – क्या सारी दुनिया नास्तिक और राक्षसी प्रवृत्ति की हो चुकी है । पृथ्वी नहीं रहेगी तब जीवधारी कहाँ रहेंगे – कलकारखाने कहाँ चलेंगे – कट्टरपंथी धर्म कहाँ रहेगा – जातीय दम्भ कहाँ प्रकट होगा – निर्ण्र्कोपेन हेगन में होगा ।

कालाम के जदुगर::डाँ. अवध किशोर सिंह

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

हित्यकार का व्यक्तित्व अपने ही अनुरुपविशिष्ट शैली, माध्यम और उपकरण का चयन करता है । अतएव कृतित्व की मूल प्रेरणाओं को समझने के लिए साहित्यकार के व्यक्तित्व की प्रमुख विशिष्टताओं की विवृति आवश्यक है । बेनीपुरी जी की विविधता से भरे हुए जीवन में व्यक्तित्व की कई विशिष्टताएँ निखर कर हमारे सामने आती हैं ।
बेनीपुरी जी मध्यम कद, साँवले रंग एवं गठीले शरीर के व्यक्ति थे । आँखों पर मोटा चश्मा, मुंह में पान की ललाई और होठों पर प्रकट हास्य के कारण उनका व्यक्तित्व अधिक निखरा हुआ लगता था । वे धोती, कर्ुता पहनते थे । हिन्दी मंदिर के महान साहित्यकार के आकर्ष व्यक्तित्व की एक झांकी राममर्ूर्ति ‘रेणु’ ने इस प्रकार दी है -काले प|mेम के चश्मे, जिनमें से स्नेह बरसने वाली दृष्टियाँ हमारे अंतर में पैठकर गहराइयों को टटोलकर आत्मीयता एवं अपनत्व के अमृतदह में हमें नहला देती हैं, प्रतिभा-किरणों को बिखेरने वाला उन्नट ललाट, ताम्बूल-रस से अरुण बने होठों पर आँख मिचौनी करनेवाली स्मृति रेखा जिससे ‘खिलखिल’ । अट्ठहास में बदलते देर कभी नहीं लगती, साँवला चमकदार मुखमंडल, यह श्वेत खद्दर धोती व कमीज पर काली ऊनी नेहरु बास्कट – थोडÞे में यही श्री बेनीपुरी जी का भौतिक रुप रहा था जो कि एक साथ जीवन के सरलतम एवं गहनतम मूल्यों का अप्रतिम प्रतीक रहा । बेनीपुरी जी के साहित्य में व्रि्रोह की जो गति है, उनकी विविध रचनाओं में नवसमाज की जो जिज्ञासा और नये पन का आकर्षा है, वह उनके शारीरिक गठन और बाहृय व्यक्तित्व के अनुरुप ही है । डाँ. जगदीश चन्द्र माथुर ने लिखा है कि मैंने यह प्रफुल्ल चेहरा देखा तो मुझे लगा कि उनकी फडÞकती हर्ुइ गद्य-शैली ने ही देह धारण कर ली हो । लेखन शैली और बाहृय व्यक्तित्व का ऐसा सामंजस्य कम ही होता है ।
बेनीपुरी जी अपनी सृजनात्मक रचनाओं के साथ-साथ अमर हैं, परन्तु हिन्दी साहित्य के दर्जनों कवियों और साहित्यकारों के सफल प्रेरक के रुप में उनका महत्व कुछ कम नहीं है । उनसे प्रेरणा पाकर साहित्य क्षेत्र में पैर रखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकारों की लम्बी सूची बन सकती है । साहित्य के क्षेत्र में नया आनेवाला जो भी व्यक्तित्व उन्हें मिलता, वे उस नई पौध को पल्लवित-पुष्पित करने के लिए दौडÞधूप करते थे । उनकी रचनाओं को अपनी पत्रिकाओं में प्रकाशित करना, पुस्तककार रुप में प्रकाशित करना और प्रेरणा देना बेनीपुरी जी कभी नहीं भूलते थे । राष्ट्र कवि दिनकर ने बेनीपुरी को अपनी ‘आत्मा की शिल्पी’ मानते हुए लिखा है – बेनीपुरी के । अपनी आत्मा का शिल्पी कहकर मैंने अत्युक्ति नहीं की थी । वे सचमुच मेरी आत्मा के शिल्पी और कवि जीवन के निर्माता थे । अपनी तात्कालीन कविताओं में कई बातें मैंने बेनीपुरी के मुख से सुनकर लिखी थी ।
बेनीपुरी जी की प्रेरणा से बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन में एक नयी चमक आ गयी थी । अपनी विविध पत्रिकाओं में उन्होंने नये लेखकों को स्थान दिया । वे प्रायः कहते हैं – मैं नयी प्रतिभाओं का शुरु से ही प्रशंसी रहा हूं । भला नये पौधे किसे नहीं भाते । लक्ष्मी नारायण मिश्र जी की प्रारम्भिक कृति की पांडुलिपि, जो प्रसाद जी के पास कई दिनों तक पडÞी थी, बेनीपुरी जी ले गए थे और एक रात में ही छपवा कर दूसरे दिन प्रसाद जी के पास प्रतियाँ देकर उन्होंने प्रसाद जी को भी आर्श्चर्यचकित कर दिया था । लक्ष्मी नारायण मिश्र जी का नाटक ‘अशोक’ बेनीपुरी जी की प्रेरणा से ही लिखा गया था । प्रभाकर माधवे ने भी उनकी प्रेरणा को स्वीकार करते हुए लिखा है – मुझे अब भी याद आता है कि वे -बेनीपुरी) न होते तो आज जो भी मैं कुछ लिख रहा हूं वह कभी नहीं लिख पाता । श्री क्षेमेन्द्र सुमन ने लिखा है – बिहार में जो भी साहित्यकार प्रतिष्ठा के उत्तुंग शिखर पर समासीन है, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिन्हें यदि बेनीपुरी जी जैसे साहित्यकार का र्सतर्क, सबल और प्रेरक सहयोग प्राप्त न हुआ तो कदाचित् वे इतनी प्रतिष्ठा अर्जित नहीं कर पाते । इस प्रकार बेनीपुरी अतुल प्रेरणा के प्रचण्ड स्रोत थे । आधुनिक मूल्य विघटन के युग में छोटों के प्रति दिखाई गयी इस सघन आस्था के लिए हिन्दी साहित्य बेनीपुरी जी का चिर ऋणी रहेगा ।
बेनीपुरी जी का टढ वर्षों का जीवन कर्मक्षेत्र के योद्धा का जीवन है । जीवन के अनेक क्षेत्रों में उनकी सफलता का प्रमुख रहस्य यही था कि वे निःस्वार्थ भाव से कार्य किया करते थे । इसी में वे जीवन का सच्चा आनंद, खुशी और सुख मानते थे । इस सर्ंदर्भ में विश्वविख्यात नाटककार जार्ज वनार्ड शा की यह उक्ति उनके लिए आदर्श थी – ‘कार्य ही मेरे जीवन की खुशी है ।’ जिस किसी क्षेत्र में पैर बढÞा वे इसी निष्ठा के साथ कार्य करते थे । साठ साल के हो जाने पर भी उनकी निष्ठा में परिवर्तन नहीं हुआ । वागमती काँलेज और गाँधी भूमि की स्थापना में उन्होंने जिस कर्मनिष्ठा का परिचय दिया वह अपने आपमें एक आदर्श है । र्सर्दी के दिनों में वे रात-दिन चन्दा उगाहने के लिए घूमते रहते थे । भाग्य अथवा नसीब में उनका विश्वास नहीं था । उनके मतानुसार मनुष्य से बढÞकर कोई भाग्य विधाता नहीं । पहले मनुष्य का पौरुष, शक्ति, काम करने की धुन और तब भाग्य । वे कहते थे – ‘जो बीत गया वह भाग्य, जो हो रहा है, वह पौरुष और जो आनेवाला है – वह विश्वास ।’ कर्म के संबंध में वे गीता के सिद्धान्त का पालन करते थे और दूसरों को भी उसी प्रकार की सलाह देते थे । कर्मवाद उनके रोम-रोम में बैठ गया था, तभी उनमें अंग्रेजी शासन की कडÞी-बेडिÞयों को जर्जर करने की क्षमता आयी थी । समाजवादी दल का संगठन, किसान संगठन, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का विकास, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का कार्य, बेनीपुरी प्रकाशन और उसके द्वारा ग्रंथावली के दो खंडों का प्रकाशन, उनकी भाषा में स्मारक रुप, उनका बडÞा मकान ये ऐसे कार्य हैं, जो बेनीपुरी की कर्मनिष्ठा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
बेनीपुरी जी व्रि्रोही व्यक्तित्व के साहित्यकार थे । उनकी दृष्टि नये समाज पर थी । नया समाज का रचनाकार अपने युग की परम्परित चेतना के विरुद्ध आवाज बुलंद करता है । बेनीपुरी जी के व्रि्रोही व्यक्तित्व के बीज उनके बाल्यकाल में पडÞ गये थे । समाज में बढÞती अंधविश्वास, कुरीतियों और उत्पीडÞन का प्रत्यक्ष ज्ञान उन्हें बचपन में ही हो गया था । अपने जीवन के संस्मरणों में उन्होंने कहा है कि जब उनकी माँ की मृत्यु हर्ुइ तब उसके पैरों में इसलिए कीलें ठोकी गयी कि वह चुडैÞल बनकर कहीं वापस न आये । इस बुरे रिवाज का बालक रामवृक्ष के मन पर गहरा असर हुआ था । बचपन में अग्रेजी सिपाही द्वारा निरपराध भारतीयों पर कोडÞे बरसते हुए देखकर उनके मन में शासकों के अत्याचारों के खिलाफ व्रि्रोह की भावना जगी थी । इस व्रि्रोह भावना ने आगे वह रुप धारण किया कि उनका क्रांतिकारी, आंदोलनकारी, राजनीतिक योद्धा और अगियाबैताल वाला रुप प्रायः बहुत उभरकर लोगों के सामने आया । वे व्रि्रोह के प्रतीक बन गये । उनको प्रत्येक पग इसी भावना द्वारा प्रेरित था । उन्होंने अपने परिवेश और परिस्थितियों के अवांछनीय तत्वों के सम्मुख स्वयं को कभी समर्पित नहीं किया । उनका विरोधी व्यक्तित्व कभी निर्बल नहीं पडÞा ।
benipiuiयह कहना असंगत नहीं होगा कि बेनीपुरी जी की कथनी और करनी में काफी एकरुपता थी । उन्होंने क्रान्तिकारी विचारधारा को केवल व्यक्त ही नहीं किया वरन उस विचारधारा के अनुरुप ही अपने जीवन को प्रवर्तित भी किया । उन्होंने कहा भी है – केवल प्रचलित विचार प्रवाह को ही बदलना क्रांतिकारी का काम नहीं होता – ‘थियोरी’ के साथ ‘एक्शन’ पर भी पूरा ध्यान देता है । वह जहाँ कहीं अत्याचार देखता है, भिडÞ जाता है, लडÞ पडÞता है । जहाँ एक ओर बेनीपुरी जी का साहित्य क्रांति की ‘थियोरी’ है वहाँ दूसरी ओर उनका जीवन एक व्रि्रोही का जीवन है । बीमारी के दिनों में अस्पताल में उन्हें पानी देने वाले एक आदमी के संबंध में जब उनकी पत्नी ने कहा कि न जाने, कौन मेहतर या जमादार पानी पिला गया, तो बेनीपुरी जी तुरुन्त उठ कह उठे – मेहतर जमादार क्या होता है – आदमी था । पानी लेकर आया, मैंने पी लिया । आदमी ने आदमी को पानी पिलाया । उनका यह उत्तर स्पष्ट कर देता है कि उन्होंने अपने को र्सवथा नये समाज के अनुकूल बनाया था । निःसंदेह वे ‘क्रांतिकारी’ मनुष्य थे और उनका ध्येय नये मूल्यों की स्थापना एवं नये समाज का निर्माण करना था । समाज जब बदलने लगता है, वह अपनी प्रतिक्रिया को तेज करने के लिए बेचैन मनुष्य को जन्म देता है । बेनीपुरी जी के भीतर बेचैन कवि, बेचैन चिंतक, बेचैन क्रांतिकारी और निर्भीक योद्धा, सभी एक साथ निवास करते थे ।
लेखक म.बि.ब. क्याम्पस, राजविराज सह-प्राध्यापक -हिन्दी) हैं ।

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