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September , 2010
Wednesday
भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण ...
मधेश की जनभावना को राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का हवाला देकर नकारने कीजो प्रवृत्ति नेपाल की ...
पाकिस्तान के बारे में आज सबसे बडा सच यह है कि "बोया बीज बबूल का तो आम ...
काठमाडौ, चैत्र ९ - दोषी सुरक्षा अधिकारीमाथि कारवाहीको मांग राख्दै सोमबार तेश्रो दिनपनि जनकपुर विहानैदेखि ...
गर्भपात करानेवाली महिलाएँ चिंता और तनाव से घिरी रहती हैं । यह नये अनुसंधान से ...
-वीणा सिन्हा उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र की कार्यप्रणाली, उद्देश्य एवं आचार-सीमाओं का निर्धारण होने के बावजूद ...
टुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर ...
सिनेमा को एक कमाउ उद्योग के रूप में लिया जाता है । सिनेमा की ...
नेपाल में पाँच बार प्रधानमंत्री रह चुके गिरिजाप्रसाद कोइराला का आज यहाँ निधन हो गया। ...
मंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते ...
वियाना यूरोपीय देश अस्टि्रया की राजधानी है । यह राजधानी नगर अत्यंत रमणीय है । ...
पाल की भावी शासकीय संरचना कैसी और किस प्रकार की हो - सभी भाषा-भाषी, जात-जाति ...
नेपाल में सफेद कारोबार की आड में काला धंधा करने वाले बदनाम लोगों की जान ...
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना ...
नेपाल की राजनीति आज कठिनतम दौर से गुजर रही है । नवसंविधान के निर्माण की ...
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हिमालिनी डेस्क अन्तरक्षेत्रीय सर्म्पर्क अभिवृद्धि औरु जलवायु परिवर्तन की चुनौती का संयुक्त रूप से सामना करने ...
तुलसीदास जी एवं उनके द्वारा रचित महान ग्रन्थ रामचरित मानस से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर ...
मानव समुदाय दो प्रकार का होता है- प्रथम सभ्य समाज, दूसरा असभ्य मानव समााज । ...
अमेरिका की तरफ से की गयी पहल और मंर्बई हमले के करीब १४ महीने बाद ...
नये साल की पर्व संध्या में शराब, शबाब और बत्तियों की झिलमिल से जगमगाता ठमेल ...
दुनिया का राजनीतिक चौधरी और ग्लोबल विलेज के महाजन की भूमिका निभाने वाले संयुक्त राज्य ...
स्कृत नेपाल की ही नहीं अपितु सम्पर्ूण्ा विश्व की क्रान्तिचेता संास्कृतिक भाषा है । विश्व ...
सप्ताह के सात दिन केवल दिन ही नही होतें,एक परिभाषा होते हैं, एक भावार्थ होते ...
भारतीय फिल्म निर्माता प्रकाश झा की कहानी किसी भी फिल्म से कम नहीं है । ...
ना खूबसूरती बनानेवाले की मेहरबानी से मिलती है मगर उसे बनाये रखना हर हसीना की सबसे बडÞी ...
विराटनगर भारत-नेपाल दो देश । सीमाएं अलग-परतंु दिलों के बीच नहीं है कोई हद । दोनों ...
आउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे ...
नेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में ...
हम छोटे थे, शहर गली में गलियारें या किसी नुक्कड पर या हो सकता ...
काठमांडू- राजधानी के त्रिपुरेश्वर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर हाँल में २४ दिसंबर को 'प्रस्तावित वीरगंज ...
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी ...
किसी भी राज्य में रहनेवाले व्यक्ति की हैसियत तथा उसके राज्य के साथ का सम्बन्ध ...
भारत धर्मभीरु देश है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है । हिन्दुस्तान ...
नानीबाई रो मायरो कार्यक्रम भावभीनी कृष्ण-कर्तन के साथ सम्पन्न हुआ । इस कार्यक्रम के समापन-समारोह ...

Archive for the ‘विविध’ Category

पर्यटन वर्षका शुभारंभ:: वरुणमाला मिश्र

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

barunmalaविराटनगर/औद्योगिक नगरी विराटनगर में गत महीना मेची-कोशी पर्यटन वर्ष२०११ विभिन्न कार्यक्रम के साथ हर्षोल्लासपर्ूण्ा वातावरण में सम्पन्न हुआ ।
कार्यक्रम का शुभारम्भ उपप्रधानमंत्री विजयकुमार गच्छेदार ने फीता काट कर की । इस मौके पर पर्यटन तथा उडड्यनमंत्री शरदसिंह भण्डारी, राज्यमंत्री शत्रुधनप्रसाद सिंह मौजूद थे । कार्यक्रम को भव्य बनाने हेतु विभिन्न समुदाय के द्वारा निकाले गये आकर्ष झाँकी नगर परिक्रमा किया ।
आयोजक के द्वारा झाँकी के माध्यम से सांस्कृतिक पहचान, परम्परा को दर्शाने का प्रयास रहा । कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए उपप्रधानमंत्री श्री गच्छेदार ने कहा कि पर्यटन के विकास से ही मुल्क का विकास होगा । उन्होंने पर्यटकों को बढÞावा देने हेतु ग्रामीण क्षेत्र मंे प्रचार-प्रसार, लोगों में जागरूकता लाने पर जोडÞ दिया । उन्होंने विराटनगर के विकास के लिए जल्द कई योजनाओं को भी लाने की जानकारी दी ।
इस मौके पर आयोजित समारोह में विशिष्ट अतिथि पर्यटन तथा उडड्यनमंत्री श्री भण्डारी ने कहा कि एक पर्यटन से नौ लोगों को रोजगार मिलता है । अगर पर्यटन पर ध्यान दिया जाए तो यहाँ कोई बेरोजगार नही मिलेगा । आयोजित समारोह में पर्यटन तथा नागरिक उडड्यन राज्यमंत्री शत्रुधन प्रसाद सिंह, नेपाल पर्यटन बोर्ड का कार्यकारी निर्देशक सुभाष निरौला, कोशी-मेची पर्यटन वर्ष२०११ का संयोजक रेवतबहादुर थापा, विराट क्षेत्र पर्यटन पर््रबर्द्धन विकास समिति का संयोजक भविशकुमार श्रेष्ठ ने संयुक्त रूप से पर्यटन के विकास हेतु सभी के लिए एकजूट होने के लिए जोरदार अपील की ।
इस अवसर पर खेलकूद प्रतियोगिता में पदक विजेता को विराटनगर उपमहानगरपालिका, जिला विकास समिति मोरंग व्यापार संघ, उद्योग संगठन मोरंग के प्रतिनिधियों ने पुरस्कार देकर सम्मानित किया ।

र्पर्यटकों को लुभाने की तैयारी:: राकेश कुमार मिश्र

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

rakeshkumarनेपालगन्ज/’पाहुना का स्वागत सत्कार, नेपाली का संस्कार, अब पाली आर्थिक क्रान्ति का’ मूल नारा के साथ शुरू हुआ पर्यटन वर्ष२०११ नेपालगन्ज में वैशाख ८ गते एक कार्यक्रम के बीच शुभारम्भ किया गया । र्
पर्यटन तथा नागरिक उडड्यन मन्त्री शरदसिंह भण्डारी ने एक समारोह के बीच उद्घाटन करते हुए १० से १५ लाख तक पर्यटक लाने का लक्ष्य लेकर नेपाल सरकार ने पर्यटन वर्ष२०११ भव्य रूप से मनाना शुरू करने की बात बतायी ।
उन्होंने आर्थिक क्रान्ति नही हो सकने पर आम जनता ने मुलुक में गणतन्त्र आने की अनुभूति तक नहीं कर पायी है, को बताते हुए कहा आर्थिक क्रान्ति के मूलभूत मेरुदण्ड पर्यटन ही है उसके पहचान के लिए सरकार ने अभियान चलाया है । उन्होंने पर्यटन वर्षके उद्देश्य को बताते हुए आगे कहा, पहला उद्देश्य १० वर्षका हिंसा-हत्या, और दरबार काण्ड सहित के घटना से विश्व में बनी हिंसक छवि को सुधारना है, तो दूसरा नेपाल जैसे पर्यटन क्षेत्र को ज्यादा सम्भावना होने से मुलुक को अपना अवसर दिखाना है ।
मन्त्री भण्डारी ने पर्यटक के लिए उपयुक्त गन्तव्य स्थल छह जगहों पर सरकार द्वारा निश्चित करने की भी जानकारी देते हुए कहा, सुदूर और मध्यपश्चिम के प्रवेशद्वार नेपालगन्ज को बनाने के लिए गृहकार्य हो रहा है । उन्होंने भारत के २४ बडÞे शहरों में सीधा हवाई सेवा की व्यवस्था नेपालगन्ज, भैरहवा, विराटनगर सहित विमानस्थल से मिलाने की जानकारी भी दी ।
उन्हांेने मुल्क में शान्तिसुरक्षा कायम नहीं होगा तो पर्यटक आने मंे समस्या होने को उल्लेख करते हुए कहा, प्रजातान्त्रिक मान्यता अनुसार अपने क्रियाकलाप करने के लिए राजनीतिक दलों को आग्रह करते हुए बन्द, हडÞताल, और चक्काजाम जैसे कार्य को न करने के लिए प्रतिबद्धता भी व्यक्त करने को कहा ।
कार्यक्रम में राजनीतिक दलो क ओर से नेपाली काँग्रेस बाँके के सभापति कृष्णमान श्रेष्ठ, विभिन्न धर्मगुरु की ओर से बागेश्वरी मंदिर के महन्त चन्द्रनाथ योगी, विभिन्न संचारकर्मी की ओर से नेपाल पत्रकार महासंघ के केन्द्रीय महासचिव पोषण केसी, उद्योगी व्यवसायी की तरफ से नेपालगन्ज उद्योग वाणिज्य संघ के अध्यक्ष सुनिल कुमार शर्मा ने प्रतिबद्धता जतलाया ।
कार्यक्रम मंे स्वागत मन्तव्य पर्यटन वर्ष२०११ का सुदूरपश्चिमांचल के संयोजक भवानी राणा ने दिया था । विशेष समारोह में नेपालगंज के धम्बोझी चौक से विभिन्न समुदाय अपने-अपने झाँकी सहित रैली नगर के विभिन्न क्षेत्र की परिक्रमा करके जिला प्रशासन कार्यलय में राष्ट्रीय मंच में पहुँची जहाँ सभा में परिणति हो गयी ।
झाँकी पर््रदर्शन में प्रथम स्थान ब्रहमकुमारी विश्व विद्यालय नेपालगन्ज, द्वितीय स्थान बर्दिया, तृतीय स्थान पर्वत समाज और सान्तवना स्थान होटल अर्गनाईजेशन बाँके और अवधी सांस्कृतिक प्रतिष्ठान नेपाल ने हासिल किया । कार्यक्रम मंे हास्य व्यंग्य कलाकार जीरे खर्ुसानी के जीतू नेपाल, और गोपाल नेपाल ने अपने कला प्रस्तुत किया । उनलोगों ने अपने कला प्रस्तुति के क्रम में सहभागी सभी लोगांे का रोचक मनोरंजन किया ।

चिंता-तनाव बढाता है गर्भपातर्

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

sex-duringगर्भपात करानेवाली महिलाएँ चिंता और तनाव से घिरी रहती हैं । यह नये अनुसंधान से स्पष्ट हुआ है न्युजीलैड की ओटैगो युनभर्सिटी के अध्ययनकर्त्तर् ने अपने अध्ययन में ५०० महिलाओं को शामिल किया । युनिवर्सिटी के साइकोलाँजिकल मेडिसिन डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डेविड फगरुसन ने सभी प्रतियोगियों का १५ से ३० साल की उम्र के दौरान ६ बार साक्षात्कार किया और पूछा की गर्भपात का एक बार उन पर नकारात्मक असर पडÞा । उनके दिल में दुःख, निराशा, अवसाद, पछताव और चिंता के भाव आए । अध्ययन से पता चला कि जिन महिलाओं के मन में नकारात्मक भाव आए, उनके गर्भपात न करावाने वाली महिलाओं के मुकाबले मानसिक समस्याओं से पीडित होने की संभावना १६ फी सदी अधिक थी ।

स्लीवलेस परिधानों की कशिश :: मानस

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

fashion2010स्लीवलेस परिधानों की कशिश नारी मन में हमेशा से रही है फैशन आते जाते रहे, मगर आम इंसान के मन ने स्लीवलेस परिधान पहनने वाली लडÞकी, किशोरी, स्त्री को फैशनेबुल की पदवी दे रखी हैं ।
वैसे, इसमें शक नही कि खूबसूरत साडी के साथ स्लीवलेस ब्लाऊज या रुटीन चुडीदार-कर्ुर्ते में पहना गया स्लीवलेस कर्ुता आपको भीडÞ में अलग पहचान और ग्लैमरस लुक देता हैं । मगर यही सिर्फस्लीवलेस पहनने से संभव नही है । इसके लिए आपको अपनी तरफ से थोडÞी-सी कोशिश भी करनी पडेÞगी-वो सब क्या है, आइए हम आपको बतलाते है ।
स्लीवलेस पहनने से पर्ूव की तैयारी
अनचाहे बालो से छुटकारा पाएं, इसके लिए कई साधन उपलब्ध हैं, उसमें से किसी एक को अपनाइए और साफ-सुथरी बन जाइए ।
वैसे तो स्लीवलेस न पहनना हो तो भी अनचाहे बालों को हटाते रहना चाहिए, वरना गर्मी से उपजा पसीना, पसीने से उपजी गंदगी, कीटाणु और सबकी मिलीजुली दर्ुगध आपकी पर्सनैलिटी को और दबा देेगी ।
डियोडरेंट या टेलकम पाउडर इस्तेमाल करें, क्योंकि खुली बगलों से गंध ज्यादा तीव्र निकलती हैं वैसे पाउडर की तुलना में डियोडरेंट लंबे समय ताजगी प्रदान करती हैं ।
इसके बाद आती है अंत ः वस्त्र के चुनाव की । अत ः जब भी स्लीवलेस पहने वाली हो तो यह जरूर जाँच लीजिए की अंत ः वस्त्र की स्टाइप्स स्लीवलेस से झंाक कर बाहर की दुनिया का नजारा तो नही देख रहे है । इसके लिए चाहे तो हर ब्लाउज, कर्ुर्ते में शोल्डर हुक लगवाएँ व उनका इस्तेमाल करें ।
ब्लाउज की लंबाई इतनी रखिए कि अंत ः वस्त्र की लंबाई ढक लें और अगर चुस्त व छोटा-सा ब्लाउज पहन रही हो तो सही फिटिग की नई ब्रा के साथ पहनंे, ताकि कही लटकर नीचे से अपने अस्तित्व का एहसास न कराकर आपकी गरिमा को मटियामेट कर देगे ।
स्लीवलेस ब्लाउज तभी फबता है जब कि आपकी बाहें सुडौल और आकर्ष हो अगर आपकी बाहें ऐसे नही है तो इसके लिए आप वैक्सिन कराइए, बाहों में कसाव लाने एवं कांतिमय बनाने के लिए हपते में एक बार घर का बनाया पैक लगाइए या उबटन, और आकर्ष एवं सुन्दर बाहें पाइए ।
अगर आपकी बाहें ज्यादा ही मोटे हैं, फिर भी आप स्लीवलेस पहनने का शौक रखती है तो जरूर पहनें, मगर स्लीवलेस में डीप कट मत रखें ।
भारी शरीर में स्लीवलेस पहने तो दोनों कंधों पर हल्का-सा पल्ला लपेट लें । पूरा खुला रखेगी तो पूरी मोर्टाई नजर आएगी । ढंकने से भ्रम बना रहेगा ।
स्लीवलेस ब्लाउज के साथ गले की डीपनेस थोडा कब ही रखें, वरना कुछ ज्यादा ही खुल्ला-खुल्ला हो जाएगा ।

पसंदीदा कलर से जानें, बच्चे का स्वभाव :: संध्या देवकुलियार

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

sandhyaबच्चे के फेवरेट रंग सिर्फ उसकी पसंद या नापसंद नहीं होते, ये उसकी पर्सनैलिटी के बारे में भी बताते हैं.
हर माता-पिता की ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा दुनिया का सबसे अच्छा, बच्चा हो, वो जहाँ भ्ाी जाए, लोगों की जबान पर उसकी तारीफ हो वो खूब नाम कमाए, कामयाबी के आसमान को छुंए , लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये सब आपकी और बच्चे की कोशिशों पर तो निर्भर करता ही है, आपके बच्चे के पसंदीदा रंग पर भी निर्भर करता है, क्योंकि ये रंग उसकी पर्सनैलिटी के बारे में बहुत कुछ कहता हैं.
वाँयलेट-वाँयलेट यानी बैंगनी रंग पसंद करनेवाले बच्चे प्रोडब्टिव और आध्यात्मिक होते हैं. इन्हें दूसरों की हमेशा फिक्र रहती है. वाँयलेट रंग पसंद करनेवाले बच्चे हाजिरजवाब और नियमों के पके होते हैं. इन्हें ऐशो-आराम की जिंदगी पसंद होती है.
ब्लू- ब्लू रंग का चुनावर् इमानदारी, संतुलन और दूरदर्शिता दर्शाता है. अगर आपके बच्चे को ब्लू रंग पसंद है तो इसका मतलब है और अनुशासित भी . इनके पास विश्लेषण की अद्भुत क्षमता होती है और इन्हें हर बात का पर्ूवाभ्ाास हो जाता है.क्योंकि इनका इंट्यूशन पावर गजब का होता है. ये बेहद संवेदनशील होते हैं और तनाव से बचना चाहते हैं ।
आदर्श ग्रीन- हरा रंग पसंद करनेवाले आदर्शवादी होते है. और नैतिक मूल्यों की अहमियत को समझते हैं. इन्हें संस्कारों व परपराओं से गहरा लगाव होता हैं.
इन बच्चों को लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है, लेकिन यर्ेर् इष्र्यालु और पवेसिव स्वभाव के होते हैं.
यलो- अगर आपके बच्चे को पीला रंग पसंद है,तो वह बुद्धिमान । भरोसेमंद और समझदार बच्चा है. ऐसे बच्चे क्रिएटिव होते हैं और इनकी कल्पनाओं मंे न जाने कितने रंग होते हैं.लेकिन ऐसे बच्चे थ्ाोडÞे रिर्जव यानी अर्ंतमुखी स्वभाव के भी होते है
आँरेज-आँरेज रंग से खास लगाव ये दर्शाता है कि आपका बच्चा महत्वाकंाक्षी, एनजेटिक और क्रिएटिव है, साथ्ा ही, ये इस बात का भ्ाी सबूत है कि आपका बच्चा खूबसूरत पर्सनैलिटी का मालिक है और वो जहां भी जाएगा, सबके आर्कषण का केन्द्र बन जाएगा. लेकिन आँरेंज रंग पसंद करनेवाले बच्चे थोडेÞ नर्वस और हमेशा बेचैन रहते हैं.
रेड- अगर आपके बच्चे का पसंदीदा रंग लाल है, तो वो बेहद एनर्जेटिक, उत्साही, धर्ैयवान और दूरदर्शी है लेकिन ऐसे बच्चे बेहद भावुक होते है. और बहुत जल्दी गुस्से में आ जाते हैं. ये चाहे जहां जाएं, किसी भी आर्ँगनाइजेशन या पोजीशन में हों-ये हमेशा टाँप पर ही होते हैं.

योग और मनोविज्ञान का रिश्ता::डा. ऋषि प्रसाद शर्मा

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

Dr. Rishi Prasadपाणिनि व्याकरण के अनुसार ‘युज्’ धातु से बना हुआ ‘योग’ शब्द का अर्थ है- समाधि, मनोसंयोग वा मनोनिरोध । ‘युज्यते समाधौ विधीयते मनः अनेन इति योगः ‘ अर्थात्- मन को एकाग्र कर समाधि लगाना योग है । अतः योगी को समाधि -योगः समाधि) भी कहा गया हंै । इस प्रकार योग और मनोविज्ञान का घनिष्ट सम्बन्ध हैं ।
मनोविज्ञान के विषय में विस्तृत व्याख्या की आवश्यकता नहीं है । आज मनोविज्ञान विश्व प्रसिद्ध एवं ख्यात्रि्राप्त विषय बन चुका है । इसके अर्न्तर्गत मन के विभिन्न प्रवृत्तियों की विवेचना की जाती है । मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में विश्व्विख्यात पाश्चात्य विद्वान सिगमन्ड प|mायड का नाम विशेष उल्लेख्य है । पर्ूर्वीय चिन्तकों ने भी मन के विषय में विशेष अध्ययन किया है । योग वाशिष्ठ में मन के विषय में विशेष विवरण उपलब्ध है । सदा मननशील होने से इसे ‘मन’ और चिन्तशील होने के कारण ‘चित्त’ कहा जाता है । ‘आत्मा’ का कर्ता भी मन है । मन के द्वारा ही आत्मा धर्म और अधर्म के कार्यों मे. प्रवृत्ति होती है । अतः मानव जाति के बन्धन और मोक्षका कारण मन को ही माना गया है ।
‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।’ वस्तुतः मन वश में न होने से प्राणी -आदमी) मानासिक रोगी हो जाता है । अच्छा काम र्-धर्म) क्या है यह जानते हुए भी उस में प्रवृत्ति नहीं होती है । खराव काम -पाप) क्या है यह जानते हुए भी उस से बच नहीं सकता । अन्दर -मन में) बैठा हुआ कोई उसे जैसा चाहता है वैसा ही नचाता रहता है ।
‘जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः
जानामि पाँपं न च मे प्रवृत्ति ः ।
केनापि देवेश । हृदिस्थतेन
यथा नियुक्तो˜स्मि तथा करोमि ।।’
अत्यन्त संक्षेप में कहें तो जिस ने अपने मन को जीत लिया है वह समस्त संसार को जीत लेता है ।
जगत जितं केन मनो हि तेन’
इस प्रकार हम लोगो की शारीरिक शक्ति सीमित है परन्तु मानसिक शक्ति असीमित है । पतञ्जलि नें ‘योगदर्शन’ में मनको शक्तिशाली एवं अनुकूल बनाने के लिए मार्ग निर्देश किया है । योगदर्शन करने मन तथा मन से सम्बद्ध अनेक विषयों की चर्चा की है । पतञ्जलि ने मन को ‘चित्त’ नाम देकर इस सम्बन्ध मे र्सवाङ्गीण व्याख्या की है । इस में मन की चञ्चलता का नियन्त्रण को ही योग माना गया है- योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’
शिक्षण और योगमनोविज्ञान
योग दर्शनमें प्रतिपादित मनोविज्ञान शिक्षा क्षेत्र में क्यों आवश्यक है – यह बतलाना भी इस लेखका उद्देश्य है । शिक्षा प्राप्ति में दो प्रकार के साधन उपयोगी हैं दृश्य और श्रव्य । इन दोनो का सीधे मन से रिश्ता है । यदि मन मलिन और चञ्चल है तो इन दोनो -दृश्य, श्रव्य) साधनाों से शिक्षा प्राप्त करना कदापि सम्भव नहीं है । अब योग क्या है तो – मन की चञ्चलता को हटाकर मन को एकाग्र करने की साधना का नाम ही योग है । अतः शिक्षाप्राप्ति में भी योग परमावश्यक हैं ।
योग दर्शन मनोविज्ञान ही है
योगशास्त्र का अध्ययन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार से किया जा सकता है । वस्तुतः योगदर्शन प्राचीन मनोविज्ञान ही है । योग के सम्यक प्रयोग से पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धि के साथ अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति का मार्ग तक खुल जाता है । योग दर्शन के अनुसार अभ्यास करने से व्यक्ति की र्सवाङ्गपर्ूण्ा अर्थात् शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति होती है । योग दर्शन में प्रतिपादित योगाङ्गो के अनुकून प्रक्रिया तो विशेष रुप मे मनोविज्ञान से सम्बद्ध है । अतः योगाङ्गो की संक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत करना प्रासङ्गकि है ।
योगाङ्गो की सङ्क्षिप्त व्याख्या और उपयोगिता
योग दर्शन के अनुसार योग के आठ अंग इस प्रकार हैं( यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ।
उपयुक्त पाँच बहिरङ्ग हैं तो शेष तीन अर्थात् धारणा ध्यान और समाधि अन्तरङ्ग हैं । इन का सम्बन्ध अन्तस्करण से होने से इन्हें अन्तरङ्ग कहा गया है ।
१. यम ः योगदर्शन अनुसार अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपर्रि्रह ये पाँच यम है । मनोविज्ञान में ‘यम’ का विशेष महत्व है । ‘यम’ डपरमे’ धातु से निष्पन्न ‘यम’ शब्द का अर्थ है निवृत्त होना । इस प्रकार हिंसा, असत्य, स्तेय, अब्रह्मचर्य ओर पर्रि्रहों के निवृत्तिस्वरुप अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और और अपर्रि्रहों का पालन ही योगसम्मत यम है ।
२. नियम ः शौच, सन्तोष, तप स्वाध्याय और इश्वरचिन्तन ये पाँच नियम है । अनुशासन पालन के लिए ये अत्यावश्यक हैं ।
३. आसन ः जिस में स्थायी सुख है उसे ‘आसन’ कहा गया है( ‘स्थिर सुख मासनम्’ आसन के अनेक प्रकार के भेद-प्रभेद है । सिद्धासन, पद्मासन, स्वस्तिकासन आदि अति उपयोगी है । आसनसिद्धि से जहाँ एक ओर मन को एकाग्र किया जा सकता है तो दूसरी ओर शारीरिक मानसिक रोगों से बचा जा सकता है । आसनों से संघर्षों के आघात को सहने की योग्यता प्राप्त होती है । -द्वन्द्वा˜नमिघातः) । आज आसनों को ही योग समझा जाने लगा है । कुछ लोग तो अंग्रेजी का अनुसरण करते हुए आसन को ‘योगा’ कहने लगे हैं । कुछ भी हो शरीर को स्वस्थ रखने तथा मानसिक विकास के लिए योगासनों के समान अन्य साधन नहीं है ।
४. प्राणायाम ः योगाङ्गो में प्राणायाम की अति उपयोगिता है । इस से इन्द्रिय और मन के दोष उसी प्रकार नष्ट होते हैं । जिस प्रकार धातुओं का मल आग मे भाष्म होता है । प्राणायाम से ही चञ्चल मनको निश्चल बनाया जा सकता है हस्( ‘चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चितं भवेत्ं । प्राणायाम से र्सवाङ्गीण उन्नति के साथ रक्तशुद्धि तथा अनेक रोगों से निवृत्ति हो कर आयुवृद्धि होती है । संक्षेप में कहें तो प्राणायाम करने से प्रकाश का आवरण हटाने तथा मन को एकाग्र करने की योग्यता प्राप्त होती है( ‘तत्ः क्षीयते प्रकाशावरणम् ।’
५. प्रत्याहार ः चित्त का अन्तर्मुखी होना ही प्रत्याहार है । अर्थात् इन्द्रियों का अपने विषयों से पृथक् होकर चित्त के स्वरुप को अनुकरण करने की अवस्था ही प्रत्याहार है । इस से आत्मिक शक्ति बृद्धि होकर दर्ुर्गुण और दर्ुर्व्यसन से लडÞने की शक्ति प्राप्त होती है ।
६. धारणा ः चित्त को एक देश -स्थान) नासिका आदि में स्थिर रखना ही धारणा है । प्रत्याहार के अभ्यास से प्राप्त शक्ति को नाभिचक्र आदि स्थानों में लगाने को ही धारणा कहते है. ।
७. ध्यान ः धारणा के विषय में चित्तवृत्तिकी एकात्मकता ही ध्यान है । महषिर् कपिल ने ‘ध्यानं निर्विषयं मन्’ कहते हुए मन को विषयों से पृथक -अलग) करने की क्रिया को ‘ध्यान’ माना है ।
८. समाधि ः ध्यान की सम्यक् विस्मृति ही ‘समाधि’ है । अर्थात् ध्यानावस्था में ध्यान, और ध्येय का ज्ञान योगी को होता है, पर जब ध्येय मात्र का ज्ञान रहता हैं, वह समाधि है ।
इस प्रकार उपयुक्त योगाङ्गों के अनुष्ठान से मन स्थिर होकर सम्प्रज्ञात योग की सिद्धि होती है । धारण, ध्यान और समाधि इन तीनों को एकत्रित रुप संयम है । इस तरह संयम में जय प्राप्त करने के पश्चात ‘प्रज्ञा’ का प्रकाश होता है- तज्जयत् प्रज्ञालोकः । जिसकी प्रज्ञा प्रकाशित हो गई हो वह ज्ञान-विज्ञान की निपुणता से पीछे कैसे रह सकता है – अतः प्राचीन गुरुकुल परम्परा में योगविद्या की भी शिक्षा दी जाती थी । वर्तमान में भी योग मनोविज्ञानको शिक्षा में उचित स्थान देखकर शिक्षा क्षेत्र में ‘योग’ का प्रयोग करना विशेष आवश्यक है ।

आडम्बरी बाबाओं की दास्तान::करुणा झा

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

karuna jhaधर्म की दुकान पर इतनी भीड क्यों -, पशुपति मंदिर के मूल भट्ट के नियुक्ति में इतनी राजनीति क्यों -, जनकपुर में मठ के महन्थ पद के लिए हत्याएँ क्यों – अमरनाथ यात्रा के कारण कश्मीर में दंगे क्यों होते है – जगन्नाथपुरी में रथयात्रा में छेडÞखानी क्यों होती है – रथयात्रा में मंदिरों में भगदडÞ में मौते क्यों होते है – काँवरियों के कारण देश का मुख्य सडÞक अवरुद्ध क्यों होता है, मोहर्रम के जुलूस में दंगे क्यों होते है – सिखपंथ में धार्मिक समस्या का हल तलवारों से क्यों होता है – हिंसा के स्रोत मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे ही होते है । धर्म के नाम पर हर साल देश के अरबों रुपये बर्बाद होते है क्यों – इन सबके पीछे हमारी धार्मिक अंध आस्था ही तो है ।
हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं । तर्कपर्ूण्ा और ज्ञान के प्रकाश से सराबोर युग में जी रहे हैं । फिर हम क्यों धर्म के नाम पर धन और समय दोनों बर्बाद करते है । धर्म का दुकान, बाबाओं का आश्रम हमलोगों की वजह से ही फलफूल रहा है, अगर हम अपना विवेक किसी और के हाथ में सौपेंगे तो वह हम क्यों नही अपने इशारे पर चलायेगा । हम वैज्ञानिक युग में है, हमें धर्म के नाम पर इन बाबाओं द्वारा चलाये गये काली गुफाओं में आँख बंदकर नही घुसना है । हमंे अपना ज्ञान-चक्षु खोलकर जीना होगा, हर बात को जाँच परख कर ही आगे बढना होगा । धर्म जाति उपजाति, अंधविश्वास रीति रिवाज आप के विकास के पथ में रोडÞे नही पत्थर की दीवारे बन सकती है । इन्हें तोडिये ।
नरक और र्स्वर्ग की बातें महज एक कल्पना पर आधारित है लेकिन हिन्दू धर्म में लोगों मंे इतनी भ्रांतियाँ है कि व्यक्ति नरक के नाम से ही भयभीत हो जाता है, और इससे बचने के लिए लोग तरह तरह के बाबाओं के आश्रम, मठ मंदिर के पुजारियों को अपना भाग्य निर्माता समझ लेते हैं और फिर ऐसे ही भोली-भाली जनता इन बाबाओं की दुकानदारी को बढÞावा देते हंै । अभी बाबाओं की दुकानदारी का धंधा खूब जोर-शोर से चल रहा है । भारत हो या नेपाल कहीं भी धार्मिक आस्था से जुडे हुए लोगांे की भावनाओं को तब ठेस पहुँचती है, जब इन बाबाओं के बारे में हमें इनकी असलियत पता चलता है । अभी कुछ सालों से योग गुरु बाबा रामदेव काफी सर्ुर्खियों में है । इसमें दो मत नही कि बाबा रामदेव ने एक स्पष्ट मिशन के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी । निश्चित ही रामदेव इस समय योग की दुनिया के शर्ीष्ास्थ पुरुष हैं । संयुक्त राष्ट्र संघ में रामदेव का सम्बोधन करना गौरव की बात है । उनके मिशन से निश्चित ही विश्व में भारत की प्रतिष्ठा और गरिमा बढÞी है ।
पर, शायद हमारे देश और देशवासियों की या हमारी संस्कृति की पहचान है कि किसी व्यक्ति की एक अच्र्छाई पर हम उसकी सौ बुर्राईयों को नजर अंदाज कर देते है । यहाँ गेरुए वस्त्र में लिपटा हर शख्स साधु संन्यासी कोर् इश्वर की तरह पूजा जाता है । हर साधु-संन्यासी समाज में मान और प्रतिष्ठा पाता है । पर गेरुए वस्त्र में छिपे बैठे अपराधियों के जब असल चेहरे सामने आते हैं तो हमारी भावनाएँ और आस्था चूरचूर हो जाती है । आस्था का वृक्ष धीरे-धीरे देश के मन मष्तिष्क में अपनी गहरी जडÞे पसार लेता है और लाख झक-झोडÞने पर भी आस्था की ये जडेÞ उखडÞने का नाम नही लेती । बाबा रामदेव को न केवल भारत बल्कि विदेशों मेंं भी अनुलोम-विलोम, कपालभारती, भस्त्रिका आदि प्राणायाम के कारण आजर् इश्वर के समान दर्जा दिया जा रहा है । योग को व्यवहारिक बनाने और जन-जन तक पहुँचाने में इस व्यक्ति का अथक परिश्रम बेजोडÞ है । बाबा रामदेव से लगा कि वे एक मल्टीनेशनल कम्पनियों के लिए खतरे के रूप में उभर रहे है । स्वीस बैंकांे में जमा स्वदेशी धन वापस लाने की मुहिम छेडÞते हुए बाबा रामदेव से देश को कुछ उम्मीद बंधी थी । हमेशा स्वदेशी राग गाने वाले रामदेव, हमेशा पूँजीवाद के खिलाफ बोलनेवाले रामदेव, बडेÞ-बडÞे नेताओं, राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री तक के खिलाफ आग उगलनेवाले रामदेव कुछ ही दिनों मे रामदेव की छवि उसके कद से बडÞी होने लगी । आज रामदेव की लोकप्रियता का ग्राफ किसी फिल्मी हीरो या किसी राजनीतिक हस्ती से कही ऊपर है ।
लेकिन अब ये बाबा भी बदले-बदले नजर आने लगे है । बाबा रामदेव भी पूँजीवाद और बाजारबाद की गिरफ्त में आ गये हैं । उनके योग शिविरों के मंहगे पैकेज, आम जनता की पहुँच से बाहर है । देशविदेशों मे लगातार मंहगी संपत्तियों की खरीद फरोख्त और सबसे सोचनीय बात तो यह है कि अपने पुराने और अनुभवी लोगों को हाशिये पर धकेल देने की उनकी रणनीति और अपने परिजनों को लाभान्वित करने की घटना, कुछ भ्रष्ट छवि के लोगों को अपनी छत्रछाया मंे पालना क्या संकेत दे रही है – क्या इस योग गुरु की छवि योग सौदागर में परिणत हो चुकी है । इन तमाम सवालों के कारण बाबा रामदेव अपनी लोकप्रियता के बाबजूद संदेह के कठघरे में नजर आ रहे हंै । अगर बाबा रामदेव इतने ही देशभक्त हैं उन्हें अपने देश की जनता से इतना ही प्रेम है तो फिर रामदेव को न कोई संतान है ना परिवार वे सारा जीवन देश के नाम समर्पित करने की बात करते हैं तो क्यों नही अपनी पतंजलि योग ट्रस्ट की दवाओं को कर मुक्त बेचते हैं । पतंजलि ट्रस्ट की सदस्यता इतनी महंगी क्यों है । अच्छा वक्ता होना एक कला है । बाबा रामदेव सिर्फबोलते हैं तो लगता है कि वे गरीबों के मसीहा हैं पर वास्तव में उनकी दवाएँ आम लोगों की पहुँच से कोसों दूर है ।
अब एक और बाबा है आशाराम बापू । आशाराम बापू का जीवन विवादों से घिरा है । उन पर तरह तरह के आरोप है – सेक्स के भूखे साधु, जमीन हडÞपनेवाले सफेदपोश अपराधियों के नेता और खौफनाक तान्त्रिक । ये सारे आरोप उनके पर्ूव शिष्यों ने लगाये है । गुजरात में आशाराम बापू का मुख्य आश्रम है जो कि एक अवैध जमीन पर बना है । उनके आश्रम में बहुत सारे गैरकानूनी काम का पर्दाफाश तो हुआ ही, अभी हाल में उनके अपने ही एक शिष्य चाँडÞक ने उन पर एक घिनौना आरोप भी लगाया है । चाँडक का कहना था कि जयपुर के निकट एक अन्जान महिला से यौन सर्म्पर्क बनाते हुए देखा गया । वाक चतुर होने की वजह से आशाराम के शिष्यों की संख्या तेजी से बढती चली गई । ऐसे ही गुरु की भक्ति में लोग अंधभक्त बन जाते है । और अगर कोई उनके गुरु का विरोध करे तो वे हिंसक रूप धारण करने पर भी उतारु हो जाते है । क्या यही धर्म है । अभी हाल ही में दिल्ली के एक इच्छाधारी बाबा की भी पोल खुली । ये बाबा एक बहुत बडÞा आश्रम चलाते थे । हजारों लाखों की संख्या में इनके शिष्य भी है । पर ये सेक्स रैकेट चलाने वाले बाबा साबित हुए । सैकडों लडकियों के साथ यौन सम्बन्ध बनाना और फिर उन लडÞकियों को बडेÞ-बडेÞ पाँच सितारा होटलों राजनेताओं और विदेशांे से आए हुए मेहमानों के सामने परोसना ही इनका मुख्य पेशा है । क्या ऐसे बाबा हमारे समाज के लिए कौन सा धार्मिक उत्थान कर रहे हैं ।
इस्लाम धर्म में भी धर्म के नाम पर कट्टरपंथी लोग लोगों को गुमराह कर रहे हंै । आज दुनिया का सबसे बडÞा आतंकवादी “अलकायदा” भी धार्मिक कट्टरपंथी से जुडÞा हुआ है । धर्म के नाम पर देश तो बंटे ही हुए हैं लोगों के दिलों को भी बांटा जा चुका है ।र्
धर्म उसी को कहते हैं जिससे राष्ट्र में शान्ति की स्थापना हो । सनातन धर्म मंे “मोक्ष” को सर्वोपरि माना गया है । मनुष्य को जीवन में मोक्ष चाहिए । मगर ये धार्मिक रास्ता दिखानेवाला संत और बाबा सब मूल्य और मान्यता से कोसों दूर हटके अपने व्यक्तिगत पब्लिसिटी, व्यक्तिगत विकास में लग जाते हैं । अपने काले धन को और काला करने के लिए ये बाबा लोग सफेद वस्त्र और सफेद व्यवसाय धारण कर लेते है । धर्म मनुष्य के लिए बना है जिस धर्म के कारण लोगों में हिंसा हो, वैमनस्यता हो, फूट हो वो धर्म किस काम का -
मैं धर्म विरोधी नही हँू, मै नास्तिक भी नही हूँ । पर ये बाबा लोग सचमूच समाज का कल्याण चाहते हैं, लोगों की भलाई चाहते है, गरीबों की सेवा करना चाहते है, विश्व में शान्ति अहिंसा और मानवता की स्थापना चाहते हैं तो फिर ये लोग इतने लालची और महत्वाकांक्षी क्यों – अरबों रुपयों की संपत्ति क्यों रखते हैं अपने पास । टी.वी. चैनलों को खरीद कर अपने आपको हीरो बनाने में क्यों लगे रहते हैं । रामकृष्ण परमहंस की तरह साधु हो, मीराबाई की तरह जो राजमहल को ठोकर मार दी, महात्मा गाँधी की तरह त्यागी, मदर टेरेसा की तरह समाजसेवी, होने चाहिए । अभी दुनिया के धार्मिक कट्टरपंथी मूल एजेण्डा में है । अलकायदा अभी दुनिया का सबसे बडÞा आतंकवादी संगठन है जो धर्म के नाम पर है । मै नहीं चाहती कि अब दुनिया में तीसरा विश्वयुद्ध हो । अगर कही तीसरा विश्वयुद्ध होगा तो कहा नही जा सकता कि ये धर्म के कारण से नही होगा – अस्तु ।।

परिवर्तन अब बस…!::वेदना उपाध्याय

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 ADD COMMENTS

vedana_new”जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”
कैसी महान, पवित्र और अनन्य भावनाओं से भरा है भगवान राम के मुख बिंदु से निकला ये महान वाक्य । माँ और मातृभूमि की तुलना किसी भी वस्तु सोना, चाँदी हीरे .मोती से तो नही हो सकती, पर इन अमूल्यों की तुलना के लिए र्स्वर्ग जैसा काल्पनिक आनंद भी फीका पडÞ जाता है माँ, अतिशय पावन शब्द, माँ वह जो नौ महीने संतान को अपनी कोख में जतन से संवारती है, अपने मन -मस्तिष्क और हृदय में आने वाले नये मेहमान के लिए न जाने कितने मीठे-मीठे सपने सजाती है, अपनी जान पर खेलकर संतान को जन्म देती है कहते हैं कि संतानोत्पादन के बाद नारी का पर्ुनर्जन्म होता है ऐसी, सुरम्य संसार का दर्शन कराने वाली माँ को र्स्वर्ग से बढÞकर मानना न्यायसंगत ही है । परंतु ये वह युग था जब कौशल्या, कैकर्ेइ, देवकी, यशोदा जैसी ”माँ ” हुआ करती थी । शायद माँ के महत्व को दर्शाने के लिए ही नेपोलियन ने कहा होगा, ”तुम मुझे अच्छी माँ दो, मैं तुम्हें मजबूत शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र दूँगा” परिवर्तनशील संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है, यहाँ केवल मौसम या वस्तुएँ ही नहीं बदलती मानवीय स्वभाव और गुण भी बदल जाते हैं । पवित्र संबंध माँ का रूप भी बदल जाता है । कानों से सुना तथा आँखों से देखा था कि कैसे जन्म देकर माँ अवैध संतान को त्याग देती है । ताकि वह समाज के सम्मुख पाक दामन रह सके, देख कर, सुनकर दिल दहल जाता था, परंतु ये तो कुछ भी नहीं, बडÞी साधारण सी बात हो गया है, ये सब तो आजकल । प्राचीन समय में, पहले के युगों में राक्षसी परंपरा में भी ऐसा नहीं पढÞा ऐसा नही सुना कि माँ ऐसी व्यभिचारिणी जो अपने ही नन्हे-नन्हे पुत्रों से ९ल्भधक उबउभच तजभ जबबचभतश मबष्थि० ने एक ऐसी ही माँ की करतूत को छापा कि तलाकशुदा एक महिला जिसके दो बेटे बडÞा ११ साल का छोटा नौ साल का, वह उन नादान पुत्रों से बाल -जबरन अपनी कामना पर्ूर्ति करवाती, अपने ही नन्हें -नन्हें मासूमों के सम्मुख माँ कामया बन सकती है ! वनवास काल में अर्जुन की इंद्र लोक यात्रा से हम सब विज्ञ हैं, अप्सरा ने प्रणय तिरस्कार को अपमान मान तत्काल शाप तो दे दिया परंतु उसी रंभा ने माँ की मर्यादा, शब्द के सम्मान के लिए शाप को ही वरदान बना दिया । माँ का गौरव ही अपार । अपने आदर्श और सत्य के पालन के लिए महाराज हरिश्चंद्र के द्वारा अपने पुत्र, पत्नी और स्वयं तक को बेचने की बात से हम सभी विज्ञ है, ये हमारा धार्मिक इतिहास हमें बताता है । र्सवविदित है कि कारण चाहे जो भी हो पिता ने पुत्र का सौदा किया परंतु माँ की शर्त -जो माँ और पुत्र दोनों को खरीदेगा उनकी बिक्री उन्हीं के हाथों में होगी । ये है माँ की ममता जो कैसी भी परिस्थिति में साथ नहीं छोडÞती । पर, परिवर्तन, परिवर्तन को न जाने क्या मंजूर ! आज एक और नई घटना पढÞी स्वीडेन से इजराएल स्थानांतरित एक ४२ वषर्ीय महिला ने अपनी १२ वषर्ीय बेटी और नौ वर्षके बेटे को इंग्लैंड की किसी र्रइस महिला के हाथों बेच दिया यहाँ महाराज की सत्य निष्ठा नहीं स्वयं की भोग निष्ठा उत्तरदायी है । वही जल्लाद, शायद ये जल्लाद शब्द भी उसके लिए पर्याप्त नही अपने चार साल के बेटे को खाने को नहीं देती, मार-पीटकर घर से बाहर निकाल देती । बेमंजिल रास्ते पर भटकता बच्चा स्थानीय पुलिस के हाथ लगा जब पुलिस बच्चे को उसके घर ले गई तो बच्चा घर में जाना नहीं चाहता, दरवाजे के बाहर ही बैठा रहता है । एक अरबी माँ धार्मिक जिहाद के नाम पर अपने ही बच्चों को प्रताडित करती है ऐसी अनेकानेक घटनाओं से आज का समाज भरा पडÞा है, हर एक दिन के अखबार में रोंगटे खडÞी कर देने वाली कोई न कोई घटना होती है किस ओर आखिर किस ओर जा रहा है हमारा समाज ! ” विज्ञान यान पर चढÞी हर्ुइ सभ्यता डूबने जाती है । बचपन में अपनी दादी माँ और दादी समान पडÞोसन स्त्रियों को दबी -दबी जवान में कानाफूसी करते सुना था ”अरे वह तो वेश्या से भी गई बीती औरत है, उनके भी कुछ नियम होते हैं, इसने तो हद ही कर दी, जिसके साथ स्वयं रहती है उसी के साथ अपनी ११/१२ साल की बेटी को भी रख दिया, राम ! राम ! राम ! हमारा तो बचपन था बात समझ में नहीं आई, हमारे बचकाने दिमाग के लिए तो बात बडÞी साफ थी कि जहाँ जिसके साथ माँ रहेगी बेटी भी तो वहीं उसके ही साथ रहेगी । इन दादियों को आखिर क्या परेशानी है ! पर आज जब दुनियादारी समझ में आने लगी तो बचपन में वृद्धाओं की श्लेष वार्ता भी समझ में आने लगी । कैसे कम उम्र में हम लोगों से बहुत छोटी लडÞकी एकाएक किशोरी हो गई थी । मैने एक माँबेटी को बहुत करीब से देखा था ,जब पहले-पहल मैने उस बच्ची को देखा था तो वह कोई १२/१३ साल की दुबली-पतली, साँवली सी, सुंदर नैन नक्श की और छरहरे बदन की बालिका थी जो शहर के किसी इंग्लीश मीडियम स्कूल में पढÞती थी । परिवार दूरदराज के किसी गाँव का था जिसने काफी पहले गाँव से पलायन कर शहर में अपना ठिकाना बनाया था । परिवार का पुरुष बहुत मेहनती संयमी और मिलनसार व्यक्ति था जो जी-जान से परिश्रम कर परिवार पालने को मानों कृत संकल्प था । नहीं मालूम वह जानता था या नही, उसकी मेहनत-मजदूरी से जुटने वाली कमाई से उसकी पत्नी संतुष्ट नहीं थी, होने को तो शहर में उनका छोटासा ही सही अपना घर था, सो असंतुष्ट पत्नी पैसा कमाने को कुछ भी, कुछ भी करने को मानो उन्मादित, खैर ये तो पत्नी हैं जो चाहें करे, आजकल सब जगह डेमोक्रेसी है, पर साथ ही साथ वह माँ भी है । उसने अपनी बेटी की परवरिश भी बडÞे डेमोक्रेटिक ढंग से की । अपने समाज, धर्म, नीति एवं परंपराओं को दरकिनार करके । परिणाम स्वरूप नादान बच्ची उम्र और बुद्धि में परिपक्व होने से पहले ही दिल और दिमाग से जवान हो गई । आधुनिक परवरिश ने एक ही बात को उसमें कूट-कूट कर भरा-ऐनी हाऊमनी कमाओ । सो पैसे कमाने ऐश आराम का जीवन पाने की मृगतृष्णा में वह अपना जीवन ही बर्बाद कर बैठी । माँ सब कुछ जानती थी परंतु उसने कभी भी पुत्री का मार्गदर्शन नहीं किया बल्कि सदैव उसे आधुनिक जीवन के लिए प्रोत्साहित किया । आज उस बच्ची के जीवन की बर्बादी का जिम्मेदार कौन – माँ ऐसी माँ को तो शायद नर्क भी अपने पास जगह देने से कतराएगा । ये माँ नहीं माँ के नाम पर बदनुमा दाग हैं । आजकल विदेश प्रवास के दौरान अकेले में सोचते-सोचते कभी-कभी लगता है कि हमारे पर्ूवजों ने जो वसुधैव कुटुम्बकम का स्वप्न देखा था वह चाहे किसी भी रूप में हो फल फूल, फैल रहा है । जिस गति से आज संसार में वैश्वीकरण हो रहा है उसी गति से विकासोन्मुख और विकासशील राष्ट्रों की युवा शक्ति का, रोजगार की तलाश में और चार पैसे कमाने के उद्देश्य से विदेशों की ओर पलायन हो रहा है । पुराने समय में भी विदेश -परदेश) जाकर धनार्जन करने का रिवाज था पर तब पुरुष इसे अंजाम देता था । पर आज समय बदला, सोच बदली, आवश्यकताएँ और जिम्मेदारियाँ बदली, फलस्वरूप स्त्रियों का भी धनार्जन हेतु विदेश जाना प्रारंभ हो गया । धनार्जन तो ठीक ही है मगर । एक जवान अविवाहित लडÞकी एक दर्ुघटना ग्रस्त व्यक्ति की परिचारिका का काम कर रही थी, उस पुरुष के साथ उसके अभद्र संबंधों के बारे में सुना गया । मित्रों, शुभचिंतकों ने बहुत समझाया, पर आज स्वतंत्रता है जमाना बदल गया है हर व्यक्ति के पास अपने कृत्यों को सही साबित करने का तरीका है । जहाँ सामान्य रूप से उसके जैसा काम करने वाले अधिकतर १०००४ कमा पाते हैं वही वह कोई २५०० से ३००० तक कमाती है । उसने वहाँ कोई एक सवा साल तक काम किया । मनुष्य का मन ही तो है कभी-कभी अपने ही कृत्यों पर अंदर ही अंदर क्षुब्ध हो जाता है, सो उसने वह काम छोडÞ दिया । पर, मजे की बात तो ये फिर हम सबने सुना कि, उसकी माँ ने उससे फोन पर कहा, ” बेटा तुमने वह काम क्यों छोडÞ दिया तुम वहाँ अच्छा पैसा कमा रही थी ।” माँ को इस बात से भी कोई र्फक नहीं पडÞता कि बेटी को हर सप्ताह प्रेग्नेन्सी टेस्ट के लिए जाना पडÞता था । लोगों में बडÞी उत्सुकता थी जानने की कि आखिर क्या कारण है जो इस जैसी लडÞकी ऐसा काम कर रही है – आखिर एक दिन तथ्य सामने आ ही गया जो एक कठोर दर्द से भरा था उसके पिता को कैंसर था जिसके इलाज के लिए काफी पैसे चाहिए, घर में कमाने वाली वही एक बेटी । फिल्मी कहानी जीवन में भी घट जाती है । पिता के प्रति उसके दायित्वबोध और कर्तव्यभाव को जानकर मन के किसी कोने में उसके प्रति श्रद्धा का भाव जाग गया पर उसकी माँ का विचार जानकर मन वितृष्णा से भर गया । लगता है परिवर्तन .विकास, आधुनिकता, तथा औरों की बराबरी करने की जद्दोजहद में आज औरत के अंदर की औरत और माँ के अंदर की माँ मर चुकी है । ” इति ”

भारत रत्न के असली दावेदार सचिन तेंदुलकार’

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

Karuna_Jhaवह हौवा है या भगवान जो भी है अब उसके सामने चुनौती वह खुद ही है । वह खेलता भी है तो अपने ही बनाये रिकार्ड तोडता है । वो और कोई नहीं, क्रिकेट की दुनियाँ का बेताज बादशाह, रिकार्ड के एवरेस्ट पर बैठा सचिन तेंदुलकर है । १९८९ में पाकिस्तान के खिलाफ सीरीज में पहली बार क्रीज पर उतरे सचिन को अन्तर्रर्ाा्रीय क्रिकेट में पूरे २० साल हो चुके है ।sachin
उस बात पर बहुत खोजबीन की जाती रही है कि सचिन इतने महान क्रिकेटर कैसे बने – तेंदुलकर सिर्फइसलिए महान नहीं माने जाते कि उन्हांेने अन्तर्रर्ाा्रीय क्रिकेट में हजारों रन बनाये । दर्जनों विश्व रिकार्ड बनाते हुऐ अनेक मील के पत्थर स्थापित किये । वह महान ह, क्योंकि उन्हें बचपन से ही र्सवश्रेष्ठ बनने की चाह रही है । और इसके लिए वे किसी भी चुनौती से भागा नहीं, बल्कि उससे निपटने के लिए जी तोड मेहनत की । क्रिकेट के प्रति पूरी तरह समर्पित जीवन बिताया । उनके पिता रमेश तेंदुलकर महान संगीतकार और गायक सचिन देव बर्मन के -एस.डीर्.बर्मन) के शिष्य थे । इसलिए अपने बेटे का नाम उन्होने सचिन रखा था । शायद उन्होंने सोचा होगा कि, उनका सचिन भी बडा होकर संगीत की दुनियाँ में नाम करेगा । लेकिन जब सचिन को क्रिकेट के प्रति दीवानगी देखी तो बेटे को खूब प्रोत्साहित किया । इस संदेश के साथ की “जिन्दगी में चाहे कितने भी उतार चढाव आये, पर शाँट कट कभी मत अपना ।” बडे भाई अजीत ने सचिन के क्रिकेट कैरियर को संभालने की कमान संभाली । अपने “शारदाश्रम विद्यामंदिर” के कोच रमाकान्त अचरेकर के स्कूटर को पिछली सीट पर बैठ एक दिन में कई मैदानों पर बल्लेबाजी की । और अपने लगन और मेहनत के बल पर सचिन कामयाबी की सीढी चढते ही चले गये । जल्दी ही लोग मानने लगे कि सचिन में स्पेशल टैलेंट है । सचिन अपने सफलता का मंत्र कुछ इस तरह बताते है “जिंदगी में सफल वो लोग होते है जो, चुनौतियों को आगे बढ कर स्वीकार करते है । जो चुनौतियां से भागते है वे कभी शिखर पर नहीं पहुँच सकते । सचिन बचपन से ही हर तरह की चुनौतियों का सामना करने को तैयार रहते थे । उन्हांेने कभी चुनौतियों से मुँह नही मोडा । सचिन इतने महान है कि वे खुद को नही बल्कि क्रिकेट के खेल को महान मानते है । क्रिकेट के प्रति र्समर्पण, अनुशासन, जुनून को उन्होंने कभी कम नहीं होने दिया । टीम भावना में वे विश्वास रखते हैं और आलोचना पर घबराते नही बल्कि अपने इरादे और मजबूत बना लेते हैं । इन तमाम गुणों के बिना वे दो दशक तक किसी बादशाह की तरह अन्तर्रर्ाा्रीय क्रिकेट में टिके नही रह सकते थे । राहुल द्रविड ने सचिन की खूबियों को सलाम करते हुए कहा था – सचिन मैदान के अन्दर और बाहर जो अनुशासन दिखाते हैं वह महत्वपर्ूण्ा है । अनुशासन और क्रिकेट के प्रति तैयार और जुनून खेल सकते हैं । इसके बिना भारत जैसे देश में इतने दिनों तक खेल पाना आसान नही है । सचिन भी मानते है – जब मैंने पहली बार क्रिकेट का बल्ला थामा था, उस दिन जो प्यार और जुनून इस खेल के प्रति था, वह आज भी कायम है । सचिन को क्रिकेट जगत मेंं भगवान का दर्जा दिया जाता है । वह ऐसे शख्स है जो साथी खिलाडियों की ही नही ब्लकि विपक्षी क्रिकेटरों की भी मदद करने के लिए जाने जाते है । सचिन द्वारा दिया गया कोई सलाह या विचार, खिलाडियों, क्रिकेट बोर्ड, से लेकर अन्तर्रर्ाा्रीय क्रिकेट परिषद तक तुरंत स्वीकार कर लेती है । क्योंकि सचिन क्रिकेट के सबसे बडे जिनीयस है । हालांकि यह जिनीयस भी फेल हुआ है । असफलता देख चुका है । मायूसी और निराशा भी झेल चुका है । चोटों की वजह से भी बहुत बार उन्हें मायूसी मिली है । लेकिन, सचिन २० साल में हर बार अपने चाहने वालों के लिए, विरोधियोंं की आलोचना की आग में तपकर कुन्दन बनकर निकले हैं । तेंदुलकर चाहते है कि वे ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किये जाये जो टीम के लिए खेला, टीम का सच्चा, निष्पक्षर्,र् इमानदार सदस्य रहा । एक ऐसा खिलाडÞी जिसने टीम को अपना सब कुछ दिया, टीम के लिए सब कुछ किया । सचिन की तारीफ में विश्वप्रंसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने कहा – ”में क्रिकेट के बारे में ज्यादा नहीं जानती पर जब सचिन बैटिंग करता है तो मै टी.वी. से चिपक जाती हूँ ।” सदीं के महान अभिनेता अमिताभ बच्चन का कहना है – ”सचिन को बैटिंग करते हुए देखना अद्भूत नजारा है । कई बार सचिन के बल्ले के करिश्मा को देखने में मै इतना तल्लीन हो जाता हूँ कि शुटिंग पर जाना भी भूल जाता हूँ । वाकई सचिन जिनियस है व और उतना ही विनम्र इंसान भी । सचिन मेरा फैन है, ये उनकी महानता है । सचिन मुर्ंबई के एक एनजीओ “अपनालय” से जुडÞे हर साल २०० गरीब बच्चों को प्रयोजित करते है । समय समय पर गरीब, विकलांग, प्राकृतिक आपदा के शिकार लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते है । विश्व के महानतम क्रिकेटरों में सचिन का सर्वोत्तम स्थान हमेशा रहेगा । ब्रेडमैन, सुनील गावस्कर भी उनकी तारीफ से पिछे नहीं हटते । सचिन की पत्नी अंजली और बेटा अर्जुन भी ऐसे पति और पिता को पाकर गौरवान्वित होते हैं । सचिन एक कम बोलनेवाला और मृदुभाषी इंंसान हैं । अपनी आलोचनाओं और क्रिकेट के पंडिÞतों की टीका टिप्पणी पर भी वे जबाब अक्सर बल्ले से देते हैं । जब जब टीम इण्डिया संकट में आई उन्होंने अपने बल्ले से खेलते हुए टीम इंडिया के लिए संकटमोचन साबित हुऐ । वे जब क्रीज पर होते है तो बडेÞ-बडÞे गेंदबाजों को अपनी नानी याद आने लगती है । इसीलिए तो वे क्रिकेट की दुनिया के डाँन है । उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके टीम में रहते भारतीय टीम विश्वकप विजेता बनंे । भगवान करंे इस महान क्रिकेटर की महान इच्छा जरूर पूरी हो ।
सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के मैदान पर जो कुछ करते है, वह रिकार्डÞ ही कहलाता है । सचिन की बल्लेबाजी का अपना एक निराला अंदाज है । आज वह रिकाडर्र्Þों के एवरेस्ट पर बैठे है । हर कर्ीर्तिमान उनकी शख्सीयत के आगे बौना नजर आता है । क्रिकेट इतिहास के महान बल्लेबाजो में सचिन के नाम टेस्ट में १७ हजार से भी ज्यादा रन और ४५ शतक है । एक दिवसीय में भी १३ हजार से भी ज्यादा रन और ४५ शतक है । क्रिकेट के इतिहास मंे यह पहली बार हुआ है कि यह चारों रिकार्ड एक साथ किसी एक खिलाडी के नाम दर्ज हैं । क्रिकेट खेल को तकनीकी और शास्त्रीयता देनेवाले सचिन आक्रामक और सुरक्षात्मक अंदाज को मौके के मुताबिक ढाल देते है । मात्र ३७ वर्षकी उम्र मंे इस मुकाम पर पहुँचने वाले सचिन शेन वार्न जैसे फिरकी के जादूगर और शोएब अख्तर जैसे रावलपिंडी एक्सप्रेस के लिए तो हमेशा आतंक का पर्याय साबित हुए हैं । शेन वार्न ने तो यहाँ तक कहा था कि ‘उनके सपने में सचिन आते हैं और डर से मेरी नींद टूट जाती है ।’ फास्ट बाँलर हो या मध्यम स्पीनर हर एक पर सचिन कहर बनकर टूट पडे हैं । यही कारण है कि शोएब अख्तर हो या ब्रेटली हो या मुरलीधरन हर एक के गंेदों को बखूबी इस्तेमाल किया सचिन ने । क्रिकेट के इतिहास में र्सवश्रेष्ठ बल्लेबाज सर डाँन ब्रेड मैन ने अपनी आत्मकथा में कहा था कि तेंदुलकर के खेल में उन्हंे अपनी झलक मिलती है । अर्जेन्टीना के महानतम फूटबाल खिलाडी मैराडोना को जैसे भगवान का दर्जा दिया जाता है । वैसे ही भारत में सचिन को सौ करोड से भी ज्यादा लोग भारत में बसते है और भारत बसता है क्रिकेट में । तो क्यों न सचिन को भगवान कहा जाये । खेल के हर पक्ष में निपुण सचिन अपने शाट्स की विविधता तकनीकी कौशल और र्टाईमिंग में महारथ हासिल है । भारत में क्रिकेट के जुनून को घर-घर तक पहुँचाने में सचिन का भी अहम् योगदान है । क्रिकेट पर सम्पर्ूण्ा नियंत्रण का कौशल सचिन को सभी खिलाडिÞयों से अलग रखकर उन्हंे विशिष्टता प्रदान करता है ।
सचिन के शानदार पर््रदर्शन, प्रतिभा और उपलब्धि की महानता को भारत ने भी बखूबी सराहा है और पाठ्यपुस्तक में सचिन की जीवनी को समावेश कराया गया है । वेस्टइंडिज के ब्रायन लारा, आस्ट्रेलिया के एलेन वार्ँडर के स्टीव वाँ भारत के सुनील गवास्कर, राहुल द्रविड भी उनके बल्लेबाजी से सिखने की तमन्ना रखते है । सचिन इतने खुशनसीब इंसान है कि क्रिकेट मैदान के साथ-साथ बाहर भी उनका नाम जुडने मात्र से रिकार्ड बन जाते हैं । एक रिकार्ड ऐसा ही सचिन के आँटोग्राफ वाले आईपीएल टिकटो की बीडी से बना है । इंडियन प्रिमियर लीग के मैच देश भर में बडÞी स्क्रीन पर देखने क लिए स्टार बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के आँटोग्राफ वाले टिकटांे की नीलामी से ११ लाख रुपये की कमाई हर्ुइ । नीलामी का आधार मूल्य ५ लाख रुपये था जो बाद मे ११ लाख तक पहुँच गई । यह राशि चैरेटेबल संस्था अपनालय को दी जायेगी, जिसे तेंदुलकर का र्समर्थन प्राप्त है । उन्होंने घोषणा की है कि वे अपने उस बल्ले को भी चैरिटी क लिए दान करेंगे जिससे उन्होंने एक दिवसीय अन्तर्रर्ाा्रीय क्रिकेट में दोहरा शतक जडÞकर इतिहास रचा है । यह बल्ला उन सभी थिएटरों में पं्रदर्शित किये जा रहे है, जहाँ आइपीएल मैच दिखाए जा रहे हैं २४ फरवरी को खेल का नयाँ शिखर छूकर पूरे देश को अभिभूत कर दिया । ग्वालियर में दक्षिण अप्रिmका के विरुद्ध एक दिवसीय मैच के दौरान उन्होने जो पारी खेली उसे लोग शायद ही कभी भूल पायेंगे – इस पारी में नाबाद २०० रन बनाकर वह वन डे मैच में दोहरा शतक बनानेवाले क्रिकेट के इतिहास के पहले बल्लेबाज बने । इसके साथ ही उन्होंने क्रिकेट के इतिहास में सबसे ज्यादा १९४ रन का व्यक्तिगत रिकार्डÞ भी तोडा । यह विश्व रिकार्ड अब तक संयुक्त रूप से पाकिस्तानी खिलाडÞी र्सइद अनवर और जिम्बाब्बे के चार्ल्स कोवेट्री के नाम था । इस मैच में सचिन ने यादगार पर््रदर्शन करते हुए मात्र १४७ गेंदों में २०० रन का पहाडÞ खडÞा किया था । इससे पहले वन डे मे उनका स्वयं का र्सवश्रेष्ठ स्कोर १८६ रन था जो भारतीय बल्लेबाजो मंे भी सर्वोच्च ही था । अब ऐतिहासिक पारी के बाद सचिन के नाम लिखे गये कर्ीर्तिमानांे की संख्या कितनी पहुँची यह तो बताना आसान नहीं है लेकिन सबसे ज्यादा टेस्ट शतक सबसे ज्यादा वन डÞे शतक अन्तर्रर्ाा्रीय क्रिकेट में ३१ हजार से ज्यादा रन, कुल ९३ अन्तर्रर्ाा्रीय शतक और अब सर्वोच्च वन डे स्कोर के साथ सारे आँकडे यह खुद बयाँ करते हैं कि उन्हें क्यों “क्रिकेट का भगवान” कहा जाता है ।
इन्हें बहुत सारे सम्मान से सम्मानित किया गया । १९९७ में विजडन क्रिकेटर का सम्मान मिला । सचिन को राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार, पदक पद्मश्री तथा पद्मभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है । और अब भारत रत्न देने के लिए भारत में आवाजें बुलंद हो रही है ।
सचिन को भारत रत्न जैसे सम्मान से नवाजा जाने का प्रस्ताव भी भारत के कोने काने से आ रहा है । और आई.सी.सी. ने अप्रैल महीने की २४ तारीख को यानि सचिन के जन्म दिन को कर्ीर्तिमान दिवस के रूप में मनाने का फैसला लेकर तो मानो सचिन को वो सम्मान दिया है जो शायद अबतक के इतिहास में न हुआ और न भविष्य में होगा । खैर जो भी हो भारत रत्न जैसा सम्मान यदि भारत सरकार सचिन को देती है, तो ये भारत सरकार के लिए गर्व की बात होगी क्योंकि सचिन तो पूरे विश्व का एकमात्र रत्न है ।

रंगों की बहार, हर दिन के अनुसार

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

fashion2010सप्ताह के सात दिन केवल दिन ही नही होतें,एक परिभाषा होते हैं, एक भावार्थ होते हैं हमारी भावनाओं हमारी गतिविधियों और हमारी आकांक्षाओं की अभिव्यक्त्ति की. आप भी सप्ताह के सातों दिनों के मिजाज को पहचानिए और ऐसे रंगों में रंग जाइए कि हर दिन रहे ताजा और खुशनुमा.व्यत्तित्व् में चार चांद लगे, सो अलग.
पहला दिन यानी सोमवार चंद्रमा से संबंधित हे चंकि चांद का रंग श्वेत और उसका ंरूप सौम्य है, इस दिन श्वेत रंग के वस्त्र पहनने से आप भी खिली रहेंगी चांद की तरह ओेैर मन भी रहेगा.
दूसरा दिन यानि मंगलवार मंगल ग्रह से संबंधित है.मंगल ऊर्जा और प्रेम का प्रतीक है. और उसका प्रभावी रंग लाल है. तो क्यों न इस दिन मन में उमंग और जोश जगाने के लिए आप भी सज जाएं लाल रंग में.
तीसरा दिन यानि बुधवार.यह बुध ग्रह से संबंधित है और इसका प्रभावी रंग हरा है.हरा रंग चुस्ती और स्फर्ूर्ति का प्रतिक है.इसलिए कलर थैरेपी में भी बुधवार को हरे रंग के परिधान पहनने की सलाह दी जाती है.तो फिर ,खुद को चुस्त दुरुस्त रखने के लिए आप भी अपनाइए.हरा रंग.
चौथा दिन यानी बृहस्पतिवार बृहस्पति ग्रह से संबंधित है.इसका प्रभावी रंग पेट के साथ साथ बुद्धि को संतुलित रखता है.इसलिए यदि रहना हो फिट तो पहनिए पीले रंग का परिधान ।
पांचवा दिन यानी शुक्रवार .यह शुक्र ग्रह से संबंधित है.शुक्र विलासिता और सुख का चिरप्रतीक माना जाता है.इसका प्रभावी रंग सफेद या आफ व्हाइट है.हीरा इसका मुख्य रत्न है.इसलिए शांति और सुख पाने की चाह लिए आप भी पहनिए सफेद परिधान.
छठा दिन यानी शनिवार ,शनि ग्रह से संबंधित है.काला रंग इसका प्रभावी रंग है.हालांकि काले रंग को उदासी का प्रतीक माना जाता है, लेकिन शनिवार के दिन इसे पहनने से मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर फायदा होता है. वैसे आज का टेंरड भी हैं ब्लैक इज ब्यूटीफुल.
सातंवां दिन यानी रविवार, जो र्सर्य से संबंधित है.र्सर्ूय की किरणों से ही सभी रंग प्रभावित होते हैं. इस दिन का मुख्य रंग मजैटा या लाल माना जाता है.र्सर्ूय भी शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है यदि आप भी रहना चाहती हैं हमेशा सेहतमंद और जवां तो इस रंग को जरुर अपनाएं.

वियाना भ्रमण ::डा. रामदयाल राकेश

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

वियाना यूरोपीय देश अस्टि्रया की राजधानी है । यह राजधानी नगर अत्यंत रमणीय है । यह नगर मेरे वर्षों से प्रिय नगर रहा है । इसके भ्रमण की लालसा वषोर्ं से थी मेरे मन में । गत साल के दशहरे में इसके भ्रमण का अवसर प्राप्त हुआ । अवसर था अन्तर्रर्रीय पेन
-एभ्ल्) पोयट्स, प्लरोइटस, ऐसेइस्ट एण्ड नोभेलिस्ट अर्थात् कवियों, नाटककारों, निबंधकारों और उपन्यासकारों के ७५ वाषिर्क अवसर पर आयोजित सप्ताह व्यापी कार्यक्रम में भाग लेने का जो आस्टि्रया के लिंज शहर में आयोजित था । लिंज जाने के लिए वियाना जाना आवश्यक था क्योंकि यह शहर वियाना से दो घंटे की रेल यात्रा की दूरी पर अवस्थित है । लिंज शहर यूरोप की सांस्कृतिक नगर के रूप में भी विश्वविख्यात है । यहाँ पर प्रत्येक वर्षकोई न कोई साहित्यिक और सांस्कृतिक सम्मेलन होने की लम्बी परंपरा है । इस २००९ के अक्टूवर की १९ तारीख से २५ तारीख तक यह अन्तर्रर्ाा्रीय सम्मेलन लिंज में आयोजित था । इस समारोह में भाग लेने के लिए मेरा और कानूनविद् चन्द्रकान्त ज्ञवाली जी का मनोनय हुआ था । मैं उपाध्यक्ष हूँ तो ज्ञवाली जी नेपाल चैप्टर के सदस्य हैं । काठमाण्डू में दीपावली पर्व की तैयारी जोरों पर थी । ठीक दीपावली से एक दिन पहले हमलोगों को काडमाण्डू से प्रस्थान करना था वियाना के लिए । हमारी उडान निश्चित और निर्धारित समय पर हर्इ । हमलोग सकुशल दिल्ली के इन्दिरा गांधी अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल पर पहुँचे । मौसम अति मनोहर और मनोहर था । हमलोग विमान के वातायन से दिल्ली शहर के नयनाभिराम दृश्य का अवलोकन कुछ देर तक करते रहे । दिल्ली के अवसर पर एक नयी नवेली दुल्हन की तरह सज्जी और सँवरी थी । कुछ ही क्षणों में वह नजारा हमारी नजरों से ओझल हो गया । अब शुरू हुआ विमान के अन्दर का अपना ही अलग संसार । इस हवाई सुन्दरियों का सौर्ंदर्य तो लुभावना था ही इनके अधरों पर मुस्काने अठखेलियाँ खेल रही थीं । मन्द-मन्द मुस्कानों के साथ यात्रियों की सेवा में संलग्न थी । रात का सुस्वादु और स्वरुचि का भोजन साथ साथ में मन पसंद शराब का शबाब । रातभर सुखद स्वप्निल न्रि्रा में सफर करता रहा । सुबह सात बजे हम लोगों का विमान वियाना अन्तर्रर्ाा्रीय विमान स्थल पर सकुशल उतरा तो हम लागों के आनन्द की सीमा ही नहीं रही । विमान स्थल की औपचारिकताएँ समाप्त कर हमलोग विमान स्थल से बाहर निकले तो बडी ठंडी हवा चल रही थी । इसलिए हमलोग तुरंत अन्दर आ गए । हमलोग अपने माल-समान के साथ अन्दर इंतजार करने लगे अपने साथी के पुत्र दीपक शाह का जो वियाना में इंजीनियर हैं । वियाना में हमलोगों की प्रतीक्षा में थे । यहाँ विमान स्थल पर सारी सुविधाएँ उपलब्ध थी लेकिन हमलोग अभ्यस्त नही थे । दूरभाष के लिए भी दूसरे की सहायता लेनी पडी । फोन करने के एक घंटे की अन्दर ही दीपक दाखिला हो गए और हम दोनों को साथ लेकर अपने एपार्टमेन्ट में ले गए । सप्ताहान्त का दिन था । अतः दीपक को भी कोई परेशानी नही हर्ुइ । हमलोग नहा धोकर तैयार हो गए और वियाना शहर के भ्रमण के लिए निकल पडे । नयाँ शहर, नयाँ वातावरण, नये नये सवारी साधन ।
एक ही टिकट से ट्रेन, ट्राम और बस की सुविधायुक्त सेवाएँ उपलब्ध थी । दीपक ने ट्रेन सेन्टर से ही हमदोनों को उपलब्ध करा दिए थे । यहाँ तक की वियाना लिंज की टिकटे भी अग्रिम खरीद लिए थे । अतः हमलोग निश्चित होकर भ्रमण में निकल पडे थे लेकिन स्थान निर्धारण में भ्रम हो रहा था । वियाना बहुत जटिल शहर लगा । यद्यपि सवारी के सारे साधन शीत ताप नियंत्रित थे । इन सवारी साधनों में यात्रियों की संख्या नगण्य थी । काठमाण्डू कोलकत्ता और दिल्ली जैसी भीडभाड कहीं नहीं थी । चन्द्रकान्त जी के पास में नक्सा था और वियाना भ्रमण के वे ही मार्ग दर्शक थे मैं तो पिछलग्गू था । शायद मैं अकेला वियाना भ्रमण नही कर सकता था ।
दीपावली का दिन था । हमलोग घूमते घूमते वियाना सिटी सेन्टर पहुँच गए । यहाँ का नजारा देखने लायक था । इस दोनों दृश्यावलोकन के दीवाने हो गए थे । कैमरा हाथ में लिए चन्द्रकान्त जी अनोखी और अनूठी दृश्यावली को कैमरे में कैद कर रहे थे । हम दोनों के लिए सब कुछ नया-नया था । हमलोग आगे बढते गए और एक बहुत विशाल पार्क में प्रवेश कर गए । वहाँ का प्राकृतिक दृश्य वडा ही लुभावना था । फूलों से, पौधो से सारा पार्क सुशोभित और सुसज्जित था । कुछ लोग दौड लगा रहे थे तो कुछ लोग वर्जिश कर रहे थे । मध्याह्न का समय हो गया । अतः दिवाभोज -लंच) के लिए उपयुक्त होटल खोजने लगे ।
हम दोनो पिज्जा और काफी पीकर संतुष्ट हो गए । फिर घूमने लगे क्योंकि घूमना हमारा उद्देश्य था । संयुक्त राष्ट्र संघ का भवन दिख पडा । संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य राष्ट्रांे के झंडे हवा में फरफरा रहे थे । यही युनिसेफ का भवन भी है । वियाना स्वच्छ सफा सुथरा और सुन्दर शहरा है । यहाँ के वासिंन्दों में भी प्रचुर सौर्न्दर्य चेतना भरी पडी है । असुन्दर दृश्य तो कहीं भी नहीं दिखाई पड रहा था । सडÞक के दोनों किनारों पर, दुकानों पर और पैदल मागार्ंर्ेेर फूलों का सौर्न्दर्य मनमोहक और मनभावन लग रहा था । सभी कुछ करीने से सँजाए हुए थे । वही जगह जगह पर खाने के होटल हैं तो कैफे, पव और रेष्टुरेन्ट । कहीं पर बैठकर मज्जे से काफी पी सकते हैं । चाय भी मिलती है किन्तु काफी का प्रचलन बहुत है । काफी और वाइन का प्रचुर मात्रा मे प्रयोग होता है । मौसम र्सद है । अक्टूबर महीने से र्सर्दी का मौसम यहाँ शुरू हो जाता है । धूप कभी निकलती है कभी बदलों के अन्दर छिप जाती है । यह आँखमिचौनी आकर्ष लगती है किन्तु कभी-कभी अति कष्टकारी भी । हमलोग हरेक दो तीन घंटों में काँफी पी-पी कर अपने शरीर को गर्म करते रहते हैं ।
काँफी की गर्मी कितनी देर तक काम करे । फिर भी दूसरा विकल्प होते हुए भी हम लोग काँफी का सहारा ही दिनभर लेते रहे और घूमते रहे । सच कहा जाए तो यह निरुद्देश्य भ्रमण ही था । हमलोग सैलानियांे की भाँति सैर-सपाटे पर निकले थे । इसलिए दूसरे प्रयोजन का प्रश्न ही नहीं उठता था । हमलोग दिनभर घूमघाम कर शाम को दीपक के एपार्टमेंट के लिए चल पडें किन्तु बारिश की बाँैछार से रास्ते भर भींगते रहे ।

धवलपीठाधीश्वर बाबा कृष्ण मोहन दास’ का::मधुरेश प्रियदर्शी

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

Madhureshभारत एवं नेपाल में अध्यात्म का परचम लहराने वाले रामघाट अयोध्या -भारत) के महान संत धवल पीठाधीश्वर श्री श्री १०८ श्री बाबा कृष्णमोहन दास जी महाराज विगत् २३ फरवरी की संध्या महाप्रयाण प्राप्त किये । उन्नीसवीं सदी के महान संत कर्त्तर्म-धवलराम बाबा के शिष्य परम्परा के संत बाबा लक्ष्मी दास जी महाराज से १६ जनवरी सन् १९७८ को गुरूमुख हुए बाबा कृष्णमोहन दासजी ने जीवन पर्यन्त अध्यात्म का प्रचार-प्रसार किया साथ ही उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपर्ण्ा योगदान दिया । अपने गुरू से दीक्षा लेने के पर्व उन्होंने शिक्षादान का काम बखूबी किया । बालक एवं बालिका शिक्षा के लिए सदैव चिन्तित रहने वाले श्री दास ने मात्र १७ वर्षकी उम्र में बिहार राज्य के केसरिया में बाल विकास आवासीय विद्यालय एवं अत्रिकन्या बालिका उच्च विद्यालय की स्थापना सामाजिक सहयोग से करायी जो आज प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का मुख्य केन्द्र बना हुआ है । मात्र ५९ वर्षकी उम्र में महाप्रयाण पर गये इस महान संत ने धवलपीठ ढेकहाँ -केसरिया) का पीठाधीश्वर बनते ही अपने गुरू महाराज के यश और कर्ीर्ति को फैलाने का जो काम शुरू किया वह जीवन पर्यन्त जारी राखा । धवलपीठ ढेकहाँ के प्रांगण में भगवान श्री राम, भ्राता लक्ष्मण, माता जानकी, भक्त हनुमान, लक्ष्मीनारायण, राधे-कृष्ण, दर्गामाता, सर्यादि नवग्रह की प्रतिमा स्थापित की ही साथ ही साथ इस सुदूरवर्ती स्थान पर दर्लभ स्फटिक मणि शिवलिंग की स्थापना कर बाबा श्री दास ने धवलपीठ को धार्मिक आस्था का संगम बना दिया । धवलपीठ के मुख्य द्वार पर श्री दास ने हनुमान जी की ८४ फीट लम्बी प्रतिमा का निर्माण कार्य भी शुरु किया है जो अभी निर्माणाधीन है । अपने गुरू महाराज की कर्ीर्ति को आगे बढाते हुए बाबा ने अयोध्या के रामघाट में धवलपीठ की ओर से एक भव्य आश्रम का निर्माण हाल ही में सम्पन्न कराया था ।
धवलपीठाधीश्वर बाबा कृष्ण मोहन दास पहुँचे हुए संत के साथसाथ संगीत के बहुत बडे ज्ञाता थे । शास्त्रीय संगीत पर उनका मजबूत पकड थी । जब कभी संगीत की चर्चा होती और सैकडों की संख्या में संगीत के जानकार जुटते तो घण्टों संगीत पर चर्चा होती । एक से बढ कर एक भजन, गीत एवं ठुमरी की रचना बाबा श्री दास ने अपने जीवन काल में की । अध्यात्म के प्रचार के लिए बाबा श्री दास द्वारा पूरे देश में समय समय पर शिविर भी लगाया जाता था जिसमें वे लोगों को आध्यात्मिक योग, साधना सिद्धि एवं परमात्मा से आत्मा को मिलाने वाले योग समेत अन्य योगों का अभ्यास कराते थे । देश के विभिन्न साधना स्थलों पर पहुँच कर उन्होंने साधना भी की थी ।
बाबा कृष्णमोहन दास हठ योगी भी थे । आश्विन शुक्ल विजयादशमी दिनांक २७ अक्टुवर १९८२ को वे अपने आठ अन्य सहयोगियों के साथ विभिन्न धार्मिक स्थलों का भ्रमण करते हुए वाराणसी पहुँचे थे । इसके अलावे बाबा श्री दास ने हजारो मील की पद यात्रा की । भारत-नेपाल के सभी धार्मिक स्थलों का उन्होंने भ्रमण भी किया था ।
महान संत बाबा कृष्णमोहन दास जी महाराज एक विद्वान संत थे । हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, ऊर्दू एवं भोजपुरी भाषा में उन्हें महारथ हासिल था । चर्चा चाहे श्री रामचरितमानस पर करनी हो या महाभारत पर या कुरान पर या बाइबिल पर वे घन्टों धर्म ग्रन्थों पर बोलते रहते थे । भारत की कई धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं ने बाबा श्री दास को सम्मानित भी किया था ।
इस महान् संत के पार्थिव शरीर की समाधि २४ फरवरी २०१० को धवलपीठ ढेंकहां -केसरिया) में उसी कमरे में दी गयी जहां उनके गुरु महाराज की समाधि है । समाधि के समय उपस्थित हजारों लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से इस महान् संत को अंतिम विदाई दी जीवनभर अध्यात्म का परचम लहराते हुए महाप्रयाण पर जाने वाले महान संत श्री श्री १०८ श्री धवलपीठाधीश्वर बाबा कृष्णमोहन दास जी महाराज आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा शुरू आध्यात्मिक क्रान्ति की धारा अविरल बहती रहेगी । हम सभी नेपाल-भारतवासी महाप्रयाण को प्रस्थान कर चुके २१ वीं के महान् संत श्री श्री १००८ श्री धवलपीठाधीश्वर बाबा कृष्ण मोहन दास जी महाराज की महान आत्मा की शांति के लिर्एर् इश्वर से पर््रार्थना करते है ।

भव्य प्रवचन

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

babaनानीबाई रो मायरो कार्यक्रम भावभीनी कृष्ण-कर्तन के साथ सम्पन्न हुआ । इस कार्यक्रम के समापन-समारोह में बाल व्यास श्रीराधाकृष्णजी महाराज अपने भक्तिपर् तथा श्रद्धासम्पन्न लय-धून-नृत्य से सभी उपस्थित भक्त प्रेमियों का हृदय जीत लिया । स्वामीजी का एक-एक शब्द से भगवद्भक्ति का बोध तो होता ही था साथ ही मानव तथा मानवता की रक्षार्थ गो-सेवा माता-पिता सेबा व्यसनरहित संस्कार, शास्त्रोचित् हुए । वैसे तो यह कार्यक्रम नेपाल के इतिहास में पहली बार मारवाडी भाषा में हुआ, परन्तु स्वामीजी की मधुर-भाषा से गैर-मारवाडीजन भी इस धार्मिक प्रवचन कार्यक्रम का पूरा लाभ उठाते नजर आयंे । बूढे-बच्चे-युवक-युवती सभी इस सराहनीय कार्यक्रम को अपने-अपने समझ और आन्तरिक आह्लाद की जागरुकता को उजागर करने से नहीं रोक पाये । कार्यक्रम में स्वामीजी सभी के लिये भगवान कृष्ण का मानांे विशेष उपहार लुटायंे । सभी आमजनों से उन्होंने अपील करते हुए कहा कि अपने माता-पिता और गौ माता की सेवा अवश्य करें, मन्दिर में भगवान् की पूजा तभी र्सार्थक होगी जब हम घर में माता-पिता की पूजा-सेवा करते हैं । घर की बहुएं अपनी सास कों और सास अपनी बहुओं को क्रमशः माँ-बेटी समान समझकर आदर्श परिवार बनायें, सीरियल की वे अपने घर में या अपने भाग्यमें उद्वेलन नहीं देखें, रियल अलग है जो उनका अपना जीने का तरीका है । आजकल युवक यह जानते हुए कि गुटखा-तम्बाकू जानलेवा है, फिर भी व्यसन में रत हैं । इसका त्याग करके ही वे वास्तव में अपने जीवनसाथी या बच्चों या माता-पिता-समाज को अपना सही प्यार व योगदान दे सकते हैं । क्रिकेट के चौके-छक्के मात्र देखने से र्व्यर्थ समय ही खराब होगा, अपने जीवन की खेल-मैदान में सभी को अपना पर््रदर्शन बेहतर करना ही असल होगा । यदि हम सही समय पर सही कदम नहीं उठाएंगे तो हमें पश्चाताप के अलावा और कुछ भी नहीं मिलेगा । अपने बच्चों को हम समय रहते सही शिक्षा नहीं देंगे तो उनसे बाद में कुछ भी आशा करना र्व्यर्थ होगा । घर में हम सौम्य वातावरण का निर्माण करके ही अपने बच्चों को उचित शिक्षा दे सकते हैं । आइये हम मिलकर एक सही समाज का निर्माण करें तभी हम राष्ट्र की उन्नति देख सकते हैं ।
कार्यक्रम का मुख्य विषय नानीबाई का मायरा- अर्थात् सुप्रसिद्ध कृष्ण भक्त नरसी दासजी की सुपुत्री नानीबाई की सुपुत्री के विवाहोत्सव में परंपरानुसार नाना या मामा की तरफ से जो भी दहेज आदि आशर्ीवाद दोहिता-दोहिती य भान्जा-भान्जी को भेंट किया जाता है जिसे मायरा कहते हैं, पर नरसी दासजी तो पर्ूण्ा-समर्पित श्रीकृष्ण-भक्त पर्ूण्ा फकीर वो भला अपने दोहिती की शादी पर क्या दे सकते थे … पर समाज की कुछ रीतिया कुरीति रूप में तब परिणत हो जाती है जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की दयनीयता को दरकिनार करके अपनी माँग या आशा बरकरार रखते हैं । हाय रे नरसी दासजी !! उनके साथ-उनकी सुपुत्री नानीबाई के साथ भी यही होता है, नानीबाई की सास, ननद, देवर व अन्य सभी नरसीदासजी की फकीरी अवस्था को मजाक समझकर उनकी बर्ेइज्जती करते हैं । पर जब कोई भक्त यह ठान ले. कि बर्ेइज्जती उसकी तो हो नहीं सकती, बल्कि बर्ेइज्जती तो उनके शरण देनेवालर्ेर् इष्ट का किया गया है और फिर जब वह र्सवर्समर्थ परमेश्वर श्रीकृष्णको पुकारते हैं – फिर भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश कहाँ चुप रह सकते थे । उन्होंने ऋषि-सिद्धि-रानियों सहित उस विवाहोत्सव में स्वयं को नरसीदासजी का मुनीम-पुत्र के रूपमें परिचय कराते हुए वह रस्म अदा करने के लिये प्रस्तुत हुए और फिर ऐसा समाँ बंधा कि नानीबाई की परिवार-समाज के साथ-साथ नानीबाई के मायके तक के लोग सन्न रह गये । हाय रे भक्त-और हाय उनके भगवन् ! यही खास पक्ष रहा है सनातन धर्म का । इसी कथा को लयबद्ध तरीकेे पेश किये हमारे सुप्रसिद्ध बालव्यास श्री राधाकृष्णजी महाराज ने । इस कार्यक्रम की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम पडÞेगी । विराटनगरवासी अन्ततः रुँधे स्वर से कहते हैं- धन्य हो आयोजन पक्ष का जिन्होंने हमें इतने पवित्र कथा सुनने को लिये श्रद्धेय स्वामीजी का दर्शन कराया । भगवान् हम पर सदा ऐसे ही प्रसन्न रहें जिससे हमें पुनः-पुनः ऐसा लाभ मिले । मनुष्य रूप में जन्म का यही खास माहात्म्य है । हरिः ç ! हरिः हरः !! खखख

बच्चों के सोने के पोजिशन से जानें उनका स्वभाव

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

Child1हर बच्चा अपने माता पिता की आखों का तारा होता हैं । यही वजह है कि अपने बच्चे की हर हरकत पर उनकी नजर रहती हैं । यदि आप भी जानना चाहती है कि आपके लाडले का स्वभाव कैसा होगा तो बस उसकी स्लीपिंग पोजीशन को गौर से देखें, क्योंकि स्लीपिंग पोजिशन से भी उनके स्वभाव का पता चलता है ।
पेट मे बल सोने वाला बच्चा
जो बच्चा ज्यादातर पेट के बल सोते हैं, वे समझदार और संतुलित स्वभाव के होते हैं, लेकिन ऐसे बच्चे थोडेÞ संकर् विचारों के भी होते हैं । उनका अपना दायरा होता है,जिसके बाहर वो दूसरों का सुझाव सुनना पसंद नहीं करते, ऐसे बच्चे नियम के पक्के होते है ये जल्दी किसी से घुल मिल नहीं पाते है पर उनके ढेर सारे मित्र होते हैं और ये अपने दोस्तों में काफी लोकप्रिय होते है ।
करवट के बल सोने वाले बच्चे
जो बच्चे करवट के बल सोते हैं और जिनके घ्टने भी सीधे रहते है उनमें गजब का आत्मविश्वास रहता हैं, जिसके कारण सफलता उनके कदम चुमती है. ऐसे बच्च्ो मेहनती और अपने काम के प्रति समर्पित होते हैं अगर आपका बच्चा दाहिना हाथ सिर के नीचे रखकर दाहिना करवट सोता है तो समझिए उसके भाग्य का सितारा प्रबल है.
उकडं सोने वाले बच्चे
जो बच्चे अपने घुटनों को पेट में घुसाकर सोते हैं वे बेहद भावुक होते हैं. इनमें असुरक्ष्।ा की भावना रहती है.छोटी- छोटी बातें इन्हें दुखी कर देती है. ये बच्चे अपनी जरूरतों को ज्यादा अहमियत देते हैं, जिसके चलते कभी-कभी उनका स्वभाव उन्हें स्वार्थी बना देता है
एक पैर मोडकर सोने वाले बच्चे
जो बच्चे करवट के बल पर पैर मोडÞकर और एक पैर सीधा रखकर सोते है,ये अन्तमर्ुर्खी होने के साथ-साथ बुद्धिमान भी होते हैं.ये कम बोलते हैं.भावुकता इन्हें पसंद नहीं. ये बच्चे दिल की बजाए दिमाग से फैसला लेते हैं.
घुटनों को हल्का-सा मोडकर सोने वाला बच्चे
जो बच्चे घुटनों को मोंडकर सोते हैं,वे दिल के सच्चे और प्यार करने वाले होते हैं. ये स्वभाव से भावुक ,नम्र और शांत स्वभाव के होते है ये कई बार कठोर निर्ण्र्ााले लेते हैं. कुल मिलाकर इनका दिल बहुत साफ होता हैं ।
हाथों को सिर के पीछे रखकर सोने वाले बच्चे
जो बच्चे अपने दोनों हाथों को सिर के नीचे रखकर सीधे सोते हैं, वे बहुत बुद्धिमान होते हैं. ऐसे बच्चे का स्वभाव बहुत दोस्ताना होता है.ये बच्चे उन लोगों को पंसद करते हैं, जो इनके स्वभाव से मेल खाते हैं,लेकिन प्यार के मामले में ये कुछ चुजी होते हैं ।
पैरों को क्रा“स करके सोने वाले बच्चे
जो बच्चे पैरो को क्राँस करके सीधे सोते हैं,वे स्वभाव से घमंडी और धुन के पक्के होते हैं.जीवन में ठहराव को पसंद करने वाले ये बच्चे परिवर्तन को बडÞी मुश्किल से अपनाते हैं. ऐसे बच्चे हमेशा अतीत में खोये रहते हैं, इसलिए इन्हें अकेले रहना पसंद होता हैं.
हाथों और पैरों को फैलाकर सीधे सोने वाले बच्चे
ऐसे बच्चे आजाद ख्याल के होते हैं. इन्हें बंधकर रहना पसंद नही . अपनी आजादी इन्हें बहुत पसंद है. ऐसे बच्चों को गँासिप करने में मजा आता है. इन्हें ऐशो -आराम पसंद होता है, जिसके चलते ये फिजूलखर्च भी होते हैं ।

बुढापे मे भी जोश ::कृष्ण गोपाल टंडन’

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

tondonनेपालगन्ज के वरिष्ठ समाजसेवी तथा उद्योगपति कृष्णगोपाल टंडन बूढे होकर भी जवानी के जोश में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है । ९५ वर्षके टंडन अभी भी अपने दैनिक कार्य में सक्रिय हैं ।
सुबह ५ः३० बजे से दैनिक काम की शुरूआत करनेवाले नेपाल नेत्र ज्योति संघ बाँके के वर्तमान अध्यक्ष टंडन कार्यालय के काम में जवान जैसे व्यस्त रहते हैं ।
५ वषोर्ं से पत्नी वियोग की पीडा सहते आए समाजसेवी टंडन ने आँखों के आँसू पोछते हुए कहा ‘पत्नी के संसार छोडकर जाने के बाद मेरा जीवन वैराग्य जैसा हो गया है । लेकिन परिवार संगठित होने के कारण अपने को भाग्यशाली समझता हूँ ।
नेपालगंज का शिक्षा, स्वास्थ्य और धार्मिक सद्भाव के क्षेत्र मे महत्वपर् योगदान पहुँचाया उन्होंने । उन्होने सरकारी तथा विभिन्न गैर सरकारी निकाय में अनेक मानपदवी तथा प्रशसांपत्र सहित पाए है ।
बि. सं. १९७२ पुस कृष्णपक्ष के दिन माता दुरारी देवी टंडन और पिता राज नारायण टंडन की कोख से जन्म लिए उनके तीन लडके रतनकुमार टंडन, कमलकुमार टंडन और बिमलकुमार टंडन भी अपने पिता के पदचिह्न को सम्हालते समाजसेवा मे जुटे हुए हैं ।
तीन नाती-नातिनी और तीन पनाती पनातिनी के बडे बाबा कृष्ण गोपाल टंडन ने कहा ‘आजकल की समाजसेवा के मूल सिद्धान्त निस्वार्थ भावना पर आधारित होना चाहिए’ राजनीति पसन्द न करने वाले टंडन ने अभी का राजनीति का दोष सब दल के नेता को दिया । अभी का राजनीति नेताओ के कारण ‘भांडनीति’ जैसा हुआ है, उनकी टिप्पणी थी ।
उनका कहा है, आध्यात्मिक सैद्धान्तिक और व्यावहारिक धरातल में जीवन जीने को मान्यता मानते हुए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ श्रम, वनप्रस्थ श्रम और सन्यास आश्रम के आधार पर जीवनको परिभाषित करना चाहिए ।
समाज विकास के लिए जात धर्म को आधार न मानने में विश्वास रखने वाले समाजसेवी टंडन ने जातीयता के आधारपर मुल्क को रेखांकन न करने का सुझाव दिया । टंडन नेपालगंज के प्रमुख तथा प्रतिष्ठित उद्योगपति के रूप मे परिचित है ।

इतना र्फक क्यों ::वेदना उपाध्याय

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

vedana1 ‘बडे भाग मानुष तन पावा, सुर दर्लभ सब संतन गावा’ गोस्वामी तुलसीदास रचित राम चरित मानस की ये चौपाई मनुष्य के अस्तित्व, उसके जन्म, उसकी श्रेष्ठ योनि होने का बखान करती है । वैसे भी मनुष्य प्रकृति की र्सवश्रेष्ठ रचना है इससे संसार में किसी को भी एतराज नहीं होगा । मनुष्य शारीरिक बनावट, रूप सौर्ंदर्यमात्र में अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ नहीं है बल्कि बुद्धि, विवेक, विचार, कौतूहल, इच्छा, आकांक्षा तथा मनोबल और मनोयोग का भी उसमें अनूठा संगम है यही उसकी प्रकृति प्रदत्त स्वाभाविक वृत्तियाँ उसे प्रकृति के ही अन्य तीन अस्तित्वों जड, वनस्पति -प्रकृति) तथा पशुओं से अलग करती हैं । मनुष्य के ज्ञान, उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति और नित नये आविष्कारों को अंजाम देने की इच्छा ने आज समाज को इस ऊचाइ तक पहुँचाया है, ये अलग बात है कि उसकी इस प्रकार की खोजों से उसकी व्यक्तिगत शक्ति अवश्य क्षीण हर्ुइ है, पर मानव ने मानव को ऐसी मशीनी शक्ति से भर दिया है कि आज मनुष्य खुद मनुष्य की प्रगति को देखकर दाँतों तले उंगली दबाने को लाचार हो जाता है पर फिर भी आज की वैज्ञानिक उन्नति का लाभ उठा रहा है । आज विज्ञान की उन्नति ने जगहों की दूरियाँ मिटा दी हैं, विज्ञान ने बहुत हद तक गर्मी-र्सर्दी को मिटाया है, ये अलग बात है कि ग्लोबल वार्मिंग आज संसार के सामने एक बडी चुनौती बनकर खडी है । विज्ञान ने मनुष्य के नीरस जीवन को सरस करने का हर संभव प्रयास किया है उसने घर बैठे- बिठाए हर किस्म का मनोरंजन प्रदान कर दिया है । अनेक किस्म के उपकरण देकर उसने मानव के जीवन को ही बदल दिया है । मुझे याद आते हैं वे दिन जब मेरे पिताजी का विराटनगर से भेजा गया पत्र हमे मिलने में एक हफ्ते तो लगता ही था कभी कभी तो दो दो, तीन तीन हफ्ते भी लग जाते थे पर आज विज्ञान की तरक्की से जीवन कितना सुलभ हो गया है, आज आप जब चाहो जहाँ चाहो बात कर सकते हो अगर आप के पास विज्ञान का अजूबा चमत्कार कंप्यूटर मौजूद है तो आप सात समंदर पार बैठे भी अपने घर वालों के साथ सर्ंपर्कसाध सकते हो ऐसे जैसे कि आप आमने-सामने बैठे हों । परंतु ये दूसरी बात है कि आज इस कंप्यूटर देवता ने जहाँ लोगों के जीवन को सुख दिए हैं तो वहीं इसने कितनों के घर बर्बाद करने का वीडा उठाया है । कितने ही तथाकथित प्रेमी -उम्र की कोई सीमा नहीं) चैटिंग विद्या के द्वारा सात समंदर पार प्रेम की रास लीला खेल रहे हैं । अब कोई क्या कर सकता है ! ये तो र्सवविदित मान्यता ही है कि फूल के साथ काँटे भी होते हैं अब अगर फूलों से प्रेम करना है तो कांटों की चुभन के लिए भी तैयार रहना होगा । खैर छोडिए इसे, ये तो समय सापेक्ष बात है सो बीच में आ गई वर्ना अपना उद्देश्य विज्ञान के चमत्कारों या आधुनिक युवा युवतियों अथवा प्रौढ महिला-पुरुषों के करनामों की चर्चा कदापि नहीं है । हमारे इस लेख का उद्देश्य मात्र ये चर्चा करना है कि क्यों आज एक आदमी इतना प्रगतिगामी है कि वह अब धरती की उन्नति से संतुष्ट नही वह विधाता कृत अन्य ग्रहों की खोज या यात्रा में लगा है उसे पृथ्वी के पानी की फिकर नहीं, वह लगा है चंद्रमा पर पानी की खोज में्र ये कौतूहल ही तो है, ये संपन्नता, समृद्धि की निशानी ही तो है, ये गहन जिज्ञासा ही तो हैं । तो विषय है क्यों एक आदमी इतना सक्षम हो सका और दूसरा उसी कोटि का आदमी उसकी की हर्इ तरक्की को ऐसे देख रहा है जैसे ये इंसानी काम न होकर किसी तथाकथित देवता का किया हो । जैसे एक कहानी कहती है कि देवराज इंद्र के कोप से बचाने के लिए कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था और अपने सखा ग्वाल बालों की रक्षा की थी । पर, ये वैज्ञानिक कोई कृष्ण या राम नहीं बल्कि युग के साधारण किंतु क्षमता संपन्न मनुष्य है आखिर ये इतने सक्षम क्यों हो सके कोई विशेष कारण ! नही, कारण कोई विशेष नही । कारण है देश और समाज की व्यवस्था, कारण है गरीबी, कारण है शिक्षा का अभाव, कारण है चेतना का अभाव, कारण है लोगों का दमन और शोषण, कारण है पूंजी का अनुचित वितरण, कारण है अनुत्पादकता, कारण है परंपरावादी सोच ये ऐसे कारण है जिनके चलते आज इस देश के नागरिक अन्य विकसित देशों के नागरिकों की तुलना में २०० वर्षों से भी ज्यादा पीछे हैं । यह तो नहीं कहा जा सकता कि देश को प्रकृति ने अभिशप्त बनाया है । नहीं प्रकृति की तो इस पर अनुकंपा ही रही है । यहाँ कहावत ही है कि हरे-भरे वन, नेपाल का धन पर कहावत ही तो है सो किताबों में ही शोभा पाती है । पानी हवा के बाद की जीवन की दूसरी आवश्यकता हैसंसार जानता है कि ये देश जल संपदा में सम्पन्न राष्ट्र है परंतु अपनी ही कमी-कमजोरी के कारण हम प्यासे रहने को बाध्य हैं । कहते हैं ना कि थाली में परोसकर रखा हुआ भोजन भी बिना जरा से प्रयत्न के मुख में नही जाता । देखें बातों-बातों में संस्कृत का वह श्लोक याद आ गया जो बचपन में पढा था कितना सटीक है ‘उद्यमेन ही सिद्धयन्ति कार्याणि ना मनोरथैः नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रबिशन्ति मुखे मृगा ।’ इस देश का सबसे मन को तिक्त बनाने वाला कारण है यहाँ की हमेशा अस्त-व्यस्त राजनीतिक व्यवस्था । जननी ने सब कुछ जन्माया, नहीं जन्माया कैसे कहा जाय जिसने तो बुद्ध को जन्म दिया पर फिर भी वही जन्म भूमि देश के सच्चे सपूतों ,देश भक्तोंर्,र् इमानदार, दूरदर्शी, कर्तव्य परायण तथा सत संकल्प युक्त राजनीतिज्ञों को जन्म नहीं दे पाई । राजनीतिज्ञ तो पैदा हुए यहाँ, पर राजनीति समझने वाले नहीं । राज और नीति को अलग-अलग समझने वाले । सभी के व्यक्तिगत स्वार्थं से भरा नेपाल का राजनीतिक इतिहास मानों स्वार्थनीति का इतिहास है जिसके कारण देश दिन ब दिन नीचे गिरता गया पर देश की जनता का व्यक्तिगत रूप से विकास होता गया । इस लेख का उद्देश्य राजनीति, कूटनीति या स्वार्थनीति का वर्ण्र्ााकरना भी नहीं है छात्रावस्था में पढा था कि ”देशाटन” से ज्ञानार्जन होता है । बचपन में भी उस बात पर यकीन था परंतु वह विश्वास भी किताब के अक्षरों की तरह ही सैद्धांतिक थापरंतु जब अपनी ही जीवन परिस्थितियों के कारण विदेश प्रवास का मौका मिला-इस प्रवास को मैं दर्ुभाग्य नहीं कहूँगी भले ही इसमें अनेक कष्ट भी मिश्रति हैं) तो वे पढी हर्ुइ चीजे वास्तव में साकार हर्ुइ । राहुल सांकृत्यायन का वह लेख साकार हुआ ”अथातो घुमक्कड जिज्ञासा” । इजराएल-इस मुल्क में भी सभी धनी नहीं हैं यहाँ भी समाज धनी, मध्यम, और गरीब जैसे वर्गं में बँटा है । पर, यहाँ की सरकारी व्यवस्था इतनी मजबूत है इतनी सुव्यवस्थित है कि लोगों को जीवनयापन में हमारे देश की जैसी परेशानियाँ नहीं हैं मुझे सबसे अच्छा लगा यहाँ का पारिवारिक व्यवस्थापन और यहाँ के वृद्ध जनों का सुखी औंर निश्ंिचत जीवन । हमारे देश की तरह यहाँ के बच्चे अपने माँ-बाप की धन-संपत्ति पर नजर नहीं रखते । माँ-बाप अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुसार बच्चों को जितना पढा-लिखा देते हैं वही उनकी संपत्ति है थोडा सा सबल होने पर -काम करने लायक) वे माँ-बाप पर बोझ नहीं बनते कोई भी छोटा-मोटा काम करके भी अपनी जरूरतें खुद पूरी करते हैं । हमारे यहाँ की तरह यहाँ के लोगो में बेमतलब की इज्जत की झंडिÞयाँ नही लहराती कि ओ उसका बेटा तो होटल में काम करता है उसकी बेटी तो क्लब में ड्यूटी करती है । सब अपनी-अपनी जिम्मेदारी उठाते हैं । इसके विपरीत हमारे यहाँ माँ-बाप बच्चों के लिए क्या नहीं करते अपने बुढापे का सहारा अपनी जमीन-जायजाद बेचकर भी बच्चों को पढाते-लिखाते, उनकी शादी ब्याह करते फिर भी बच्चों की नजर माँ-बाप की संपत्ति पर ही लगी होती है चाहे बेचारे माँ-बाप के पास एक ही बीघा जमीन क्यों ना हो पर सभी बच्चे उसे गिद्ध नजरों से देखते हैं और बडे मजे की बात तो ये कि विचित्र कानूनभी इसी देश में बनते हैं कि माँ-बाप की संपत्ति पर बेटियों का भी समान हक ये कानून कोई सरकार नहीं बना पाई कि हरेक बच्चे पर माँ-बाप की उतनी ही जिम्मेदारी है । अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा उन्हें माँ-बाप को देना होगा । बेचारे समस्या ग्रस्त माँ-बाप ने जैसे-तैसे अपने बच्चों को बडा किया ये सोच कर कि जब वे बडे हो जाएँगे तो उनके सारे दुख दूर हो जाएँगे । दुख दूर तो क्या होंगे पर और बढेंगे इसका उन्हें अंदाजा न था एक माँ-बाप -दंपति) अपने चार बच्चों को पाल लेता है लेकिन चार बच्चों के लिए माँ-बाप भारी बोझ हो जाते हैं । तीन-चार के चक्कर में माँ बाप कहीं के नही रहते । जब तक माँ-बाप की संपत्ति का बटवारा नहीं हो जाता वे संताने होती हैं पर बंटवारे के बाद वे पडोसी हो जाते हैं । कैसी विडंबना की जिसका सब कुछ वही आज भिखारी सदृश । एक और बात- हमारे यहाँ पचास की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते लोगों को बूढा समझा जाने लगता है वे खुद भी वैसा सोचने लगते हैं तो फिर अब उनके लिए अच्छा खाना पहनना तो मानों अभिशाप । अगर थोडी सी प्रौढ महिला थोडा मेकअप करके, थोडे अच्छे कपडे पहन कर बाहर निकले तो हमारे समाज को बोलने का मसाला मिल जाता है ऐसे समाज में विधवा की स्थिति कैसी होगी – चाहे उसने अपनी पति को छोटी सी उम्र में ही क्यों ना गवाया हो – ऐसी स्थितियों से बिल्कुल विपरीत है यहाँ का समाज । हमारे समाज से कई गुना अच्छा है यहाँ के समाज में वृद्ध-वृद्धाओं का जीवन । वे अपने मन मर्जी के मालिक हैं । उनकी भविष्य निधि उनके ही पास सुरक्षित रहती है वे अपनी र्समर्थ अवस्था से ही अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं और उसके लिए अच्छी व्यबस्था रखते हैं उन्हें बच्चों के सामने हाथ पसारने की जरूरत नहीं पडÞती । वे सक्षम हैं, सबल है अपनी मन मर्जी का खाते हैं अपनी मन मर्जी का पहनते है । मन होने पर बाहर घूमने जाते हैं उन्हें कोई बंधन नही है । हमारे समाज में आजकल हमारे बुजुर्गों पर एक और बडी जिम्मेदारी आ पडी है बेटे-बहू कमाने के उद्देश्य से विदेश की ओर प्रस्थान करने पर उनके बच्चों की देखभाल कौन करेगा – वही बूढे माँ-बाप । यहाँ के बुजुर्गों को कोई ऐसा बंधन नहीं है यहाँ की पारिवारिक संरचना दूसरे किस्म की है जिसके बच्चे उसकी दूसरे को क्या मतलब – इसका मतलब ये कतई नहीं कि उनमें पारिवारिक प्रेम नहीं है, है पर जिम्मेदारी नहीं । यही कारण है कि यहाँ के ८०-९० वर्षकी उम्र के बुजर्ुग भी आनंद से क्लब में जाकर ताश खेलते हैं, कुछ बातचीत करके समय बिताते हैं, तो कुछ पढकर अपना समय बिताते हैं । बहरहाल वे अपनी मर्जी का जीवन बिताते हैं । उन लोगों की दिनचर्या में बदलाव आता है पर पहनने-ओढने खाने-पीने, मस्ती करने में नहीं । यहाँ इस बात से र्फक नहीं पडता कि कोई स्त्री विधवा हैउसके लिए कुछ खास नियम हैं । उनके सुखी संपन्न जीवन को देखकर मन आनंद से भर जाता है साथ ही कहीं मन में एक बात कचोटती है कि कितने असहाय हैं हमारे वृद्ध । पर आखिर क्या है इसका कारण – हम मनुष्यों के लिए बहुत आसान होता है झट से किसी भी बात को रीति-रिवाजों, धर्म-संस्कृति, परंपराओं और मान्यताओं के सिर मढ देना पर रीति रिवाज, धर्म-संस्कृति, परंपराएँ, मान्यताएँ हर समाज में होती हैं और हर समाज कम ज्यादा उनका पालन करता है । मुझे तो इसका एक ही मूलभूत कारण नजर आता है स्वार्थी , दमनपर्ूण्ा राजनीति । लंबा राजतंत्र जिसमें राजा का काम जनता से कर वसूल कर अपने सुखसाम्राज्य को बढाना लंबा जहानियाँ राणाशासन जिसका एक मात्र उद्देश्य भोगवाद ही था । फिर उसके बाद नाटकीय प्रजातंत्र, फिर पंचायती राजतंत्र, शाब्दिक प्रजातंत्र, फिर उसके बाद तो पार्टर्ीींत्र, भीड तंत्र, स्वार्थतंत्र, मारकाट तंत्र, दमन तंत्र, गठबंधन तन्त्र जैसे अनेक-अनेक तंत्र राजनीति में आए, आ रहे है । दुनिया में ही अपनी बुद्धि का पंचम लहराने वालों से लेकर अंगूठा छाप तक देश के शासन में शामिल हुए शासन में आने के लिए पसीना नहीं खून की नदियाँ बही और देशों की धराशायी व्यवस्था भी लाए पर, अफसोस किसी ने भी जन चेतना, शिक्षा का दरवाजा खोलने की कोशिश नहीं की । सरस्वती का निरादर नही उसके मंदिर को बमों से उडाकर वे काली को ही भोग देते रहे, दे रहे हैं । अपनी संतानों को तो पढÞने के लिए स्वदेश में होने वाले विद्यालयों की व्यवस्था ही उपयुक्त नहीं सो विदेशों की भूमि के सबसे अच्छे स्तरीय विद्यालयों में भेजा पर देश के गरीब नागरिकों के बच्चों को अपहरण की तरह उनके घर से उठाकर उनके हाथों से किताब-कापी का झोला छीनकर उनके नन्हें-नन्हें मासूम हाथों में बंदूके पकडा दी । फिर क्या कलम पकडने वाले हाथों ने गोलियाँ पकडी और किताबों का झोला उठाने वाले कंधों ने बंदूक का बोझ उठाया । देश चलाने की इच्छा होने वाले, सरकार बनाने की इच्छा होने वालों ने आतंकवाद की शिक्षा देने वाले प्रायोगिक स्कूल खोले पर मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले केंद्रों को नेस्तनाबूद कर दिया । मुझे लगता है कि अगर आज किसी भी आम नेपाली इंसान से पूछा जाय कि उसे अपने देश में कौन सा तन्त्र चाहिए तो जवाब होगा हमें कोई और तंत्र नहीं बस शांति तंत्र चाहिए अगर विकास का, शांति का, सुख का आधार ही खोखला हो तो इन की कल्पना भी कल्पनातीत है । इसी कल्पनातीत वातावरण में हमारे वृद्धों का आज, युवाओं और देश का भविष्य कहीं खो गया है । अस्तु
खखख

उत्कृष्ट मानव समाज ::फतेह बहादुर सिंह

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

phateh bhadur singhमानव समुदाय दो प्रकार का होता है- प्रथम सभ्य समाज, दूसरा असभ्य मानव समााज । जिसमें जंगल में रहने वाले आदिवासियों की गणना होती है । राउटे तथा कुसुम्भा ऐसे ही मनुष्य है, जो कि सभ्य संसार से दूर हैं । जनजातियों के लोग भी सभ्यता के प्रकाश में नहीं आए हैं । सभ्य मानव समाज उसे माना जाता है जो शिक्षित तथा सुसंस्कृत होते हैं । ऊँचे ऊँचे भवन, विद्यालय, पुस्तकालय, कानून, धर्म, वस्त्र तथा श्रृंगार प्रसाधन सभ्यता के चिह्न माने जाते हैं परन्तु पंडित जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि में सभ्यता के बाह्य प्रतीक इन्सान को सभ्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं । मनवीय विशेषताएँ जैसे दया, प्रेम, क्षमा, सहयोग तथा यौन पवित्रता असभ्य जनजातियों में भी विद्यमान होती है । तथाकथित सभ्य समाज के लोगे ने युद्धो में असंख्य निर्दोष लोगांे का नरसंहार किया । उन्हें सभ्य कैसे कहा जा सकता है । आदिवासियों जनजातियों तथा नीग्रों लोगों को जानवर को तरह के जंगलों से पकडकर दास व्यापार का संचालन किया तथा दक्षिण अमेरिका की गोरे जमीन्दारों के फामोर्ं पर जानवर जैसी कोडे मारकर गन्ना तथा कपासके उत्पादन से धन कमाया उन्हें सभ्य कैसे कहा जा सकता है –
मनुष्य भी जानवर की ही श्रेणी में आते हैं तथा उसमे पशु प्रवृत्ति भी विद्यमान होती है । केवल धर्म ही मनुष्य तथा पशु में अन्तर का कारक होता है । कहा गया है ।
आहार, न्रि्रा, भय, मैथुनञ्च, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्
धर्मो हि तेषाम् अधिको विशेष, धर्मेणहीनाः, पशुभिः समानाः
यह धर्म का तार्त्पर्य रिलिजन से नहीं है । धार्यते अनेन इति धर्मः अर्थात् वे विशेषताएँ जो मनुष्य में सदगुण जैसे दया, क्षमा, प्रेम, सदभाव, परोपकार, आदि दैवीय गुणांे का विकास करती हैं तथा मनुष्य में मानवीय संवेदना एवं सहनशीलता का विकास करती है मनुष्य को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनाती हैं ।
अतः सभ्य मानव समाज वह है, जिसमें मनुष्य मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित होता है तथा शिक्षा, कला, संस्कृति, साहित्य तथा धार्मिक एव आध्यात्मिक दर्शन का विकास कर व्यक्ति एवं समाज की सेवा करता है तथा समाज में शांति सुरक्षा तथा र्सवार्गींण विकास कर स्वर्ण्र्ााग का निर्माण करता है तथा व्यक्ति एवं समाज के उत्थान के लिए नये नये सत्य की खोजकर पंथ एवं संस्कृति का विकास करता है । ऐसे ही महापुरुषों, दार्शनिकों तथा सन्त-महात्माओं एवं पैगम्बरों ने मनुष्य को उत्कृष्ट मानव समाज के निर्माण के लिए पथ-पर््रदर्शन एवं मार्ग दर्शन किया है । सत्यम वद, धर्मम् चर, स्वाध्यायान् मा प्रमद तथा मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठबत्, आत्मवत् र्सवभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः । इत्यादि उत्कृष्ट सभ्य समाज के मार्ग दर्शक सिद्धान्त हैं । प्रभु यशु, पैगम्बर मुहम्मद साहेब, महात्मा बुद्ध तथा अन्य संतों, महात्माओं तथा दार्शनिकों ने उत्कृष्ट सभ्य समाज के निर्माण के लिए पथ-पर््रदर्शन किया परन्तु उत्कृष्ट सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सका तथा मनुष्य नरसंहार को वरीयता देते हुए युद्धांे एवं महायुद्धों का सञ्चालन करता रहा । सभ्य मानव समाज महापुरुषों के मार्ग दर्शन को भुला दिया तथा उत्कृष्ट मानव समाज का निर्माण न कर सका ।
उत्कृष्ट एवं सभ्य मानव समाज को रामराज्य अथवा यूटोपिया कहाँ जा सकता है जो केवल आदर्श में होता है तथा यथार्थ में अनुवादित नहीं किया जा सकता । दैहिक, दैविक, भौतिक तापा रामराज्य काहू नहि व्यापा । यह केवल काल्पनिक आदर्श है जो यथार्थ में नहीं पाया जा सकता है । परन्तु सभ्य मानव समाज का मार्ग दर्शक आदर्श ही होता है । अतः हमंे आदर्श को भुला नही देना चाहिए तथा नए आदशों का निर्माण करना चाहिए । सत्युग के देवी देवता का समाज सर्वोत्कृष्ट सभ्य समाज माना जा सकता है । बाद के युगी त्रेता तथा द्वापर में सतोगुण में कमी आई तथा सत्युग हमारा आदर्श हो गया ।
उत्कृष्ट सभ्य मानव समाज का निर्माण इस पृथ्वी पर हो सकता है । उसके लिए विश्व के नेता लोगों, धार्मिक गुरुजनों तथा मानव अधिकार कर्मियों को क्रियाशील तथा प्रयत्न शील होना होगा । उत्कृष्ट सभ्य मानव समाज वह है जिसमे मानवीय संवेदना नागरिक युगों, मानवीय मूल्यों एवं मान्यताओं के प्रति र्समर्पण विद्यमान होता है । संवेदनशील मानव अन्य मनुष्यों की पीडÞा को समझता है तथा महसूस करता है एवं उसके निराकरण करने का प्रयास करता है । अन्य व्यक्तियों की पीडÞा को महसूस करना मानव धर्म है । महात्मा गान्धी के भजन की हृदय स्पर्शी पंक्ति है, वैष्णव जनतो तेने कह, जे पीर पर्राई जाणेरे ।’
समाज के सभी मनुष्यों में पारस्परिक प्रेम एवं सद्भाव का होना उत्कृष्ट एवं सभ्य मानव समाज के लिए अपरिहार्य माना गया है । उत्कृष्ट मानव समाज सम्पर्ूण्ा विश्व के लिए अनुकरणीय होना चाहिए । प्राचीन वैदिक युग का समाज उत्कृष्ट मानव समाज बनाया था । जिसने वैदिक सभ्यता को उदाहरणीय बनाया था । मानव समाज में सत्य अहिंसा, परोपकार, त्याग, बलिदान, दया, क्षमा, तथा अन्य आवश्यक मानवीय गुणांे का समादर होता है तथा मनुष्य उन गुणों के अनुसार आचरण करता है । वही मनुष्य जीवन प्रशंसा का पात्र होता है जिसमे मानव मात्र के प्रति दया तथा करुणा का भाव होता है । घृणार्,र् इष्र्या, द्वेष, हिंसा तथा प्रताडन आदि सभ्यता एवं मानवता का उपहास करते हैं ।
आज के मानव समाज में संवेदनशीलता तथा मानवता का अवमूल्यन हो गया है । आज चोरी, डकैती, हत्या, अपहरण तथा तस्करी मानव समाज के लिए अभिशाप बन गए हैं । मनुष्य द्वारा निरीह व्यक्तियों का शोषण एवं उत्पीडन मानव समाज को सभ्य एवं उत्कृष्ट कैसे बना सकते हैं । दलितों का शोषण एवं उत्पीडन तथा महिलाआंेका क्रय-विक्रय मानव समाज के लिए कलंक है । अतः आज के मानव समाज को उत्कृष्ट नहीं कहा जा सकता । यद्यपि आज का यह मानव समाज सभ्य मानव समाज अवश्य माना गया है पर है नहीं ।
उत्कृष्ट मानव समाज यूटोपिया है क्योंकि प्रत्येक युग के समाज में राक्षसों एवं पाशविक प्रवृत्तियों का बोलबाला रहा है । त्रेता में रावण तथा अन्य राक्षसांे के अत्याचार ने समाज को निम्न स्तर का बना दिया था । द्वापर में भी कंस के अत्याचारों के कारण तथा दुर्योधन की धर्म विहीन गतिविधियों के कारण उत्कृष्ट समाज न बन सका । इसलिए युग-युग में राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर एवं गुरुनानक आदि महापुरुषों का अवतरण हुआ । खखख

उत्कृष्ट मानव समाज ::फतेह बहादुर सिंह

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

phateh bhadur singhमानव समुदाय दो प्रकार का होता है- प्रथम सभ्य समाज, दूसरा असभ्य मानव समााज । जिसमें जंगल में रहने वाले आदिवासियों की गणना होती है । राउटे तथा कुसुम्भा ऐसे ही मनुष्य है, जो कि सभ्य संसार से दूर हैं । जनजातियों के लोग भी सभ्यता के प्रकाश में नहीं आए हैं । सभ्य मानव समाज उसे माना जाता है जो शिक्षित तथा सुसंस्कृत होते हैं । ऊँचे ऊँचे भवन, विद्यालय, पुस्तकालय, कानून, धर्म, वस्त्र तथा श्रृंगार प्रसाधन सभ्यता के चिह्न माने जाते हैं परन्तु पंडित जवाहरलाल नेहरू की दृष्टि में सभ्यता के बाह्य प्रतीक इन्सान को सभ्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं । मनवीय विशेषताएँ जैसे दया, प्रेम, क्षमा, सहयोग तथा यौन पवित्रता असभ्य जनजातियों में भी विद्यमान होती है । तथाकथित सभ्य समाज के लोगे ने युद्धो में असंख्य निर्दोष लोगांे का नरसंहार किया । उन्हें सभ्य कैसे कहा जा सकता है । आदिवासियों जनजातियों तथा नीग्रों लोगों को जानवर को तरह के जंगलों से पकडकर दास व्यापार का संचालन किया तथा दक्षिण अमेरिका की गोरे जमीन्दारों के फामोर्ं पर जानवर जैसी कोडे मारकर गन्ना तथा कपासके उत्पादन से धन कमाया उन्हें सभ्य कैसे कहा जा सकता है –
मनुष्य भी जानवर की ही श्रेणी में आते हैं तथा उसमे पशु प्रवृत्ति भी विद्यमान होती है । केवल धर्म ही मनुष्य तथा पशु में अन्तर का कारक होता है । कहा गया है ।
आहार, न्रि्रा, भय, मैथुनञ्च, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्
धर्मो हि तेषाम् अधिको विशेष, धर्मेणहीनाः, पशुभिः समानाः
यह धर्म का तार्त्पर्य रिलिजन से नहीं है । धार्यते अनेन इति धर्मः अर्थात् वे विशेषताएँ जो मनुष्य में सदगुण जैसे दया, क्षमा, प्रेम, सदभाव, परोपकार, आदि दैवीय गुणांे का विकास करती हैं तथा मनुष्य में मानवीय संवेदना एवं सहनशीलता का विकास करती है मनुष्य को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनाती हैं ।
अतः सभ्य मानव समाज वह है, जिसमें मनुष्य मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित होता है तथा शिक्षा, कला, संस्कृति, साहित्य तथा धार्मिक एव आध्यात्मिक दर्शन का विकास कर व्यक्ति एवं समाज की सेवा करता है तथा समाज में शांति सुरक्षा तथा र्सवार्गींण विकास कर स्वर्ण्र्ााग का निर्माण करता है तथा व्यक्ति एवं समाज के उत्थान के लिए नये नये सत्य की खोजकर पंथ एवं संस्कृति का विकास करता है । ऐसे ही महापुरुषों, दार्शनिकों तथा सन्त-महात्माओं एवं पैगम्बरों ने मनुष्य को उत्कृष्ट मानव समाज के निर्माण के लिए पथ-पर््रदर्शन एवं मार्ग दर्शन किया है । सत्यम वद, धर्मम् चर, स्वाध्यायान् मा प्रमद तथा मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठबत्, आत्मवत् र्सवभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः । इत्यादि उत्कृष्ट सभ्य समाज के मार्ग दर्शक सिद्धान्त हैं । प्रभु यशु, पैगम्बर मुहम्मद साहेब, महात्मा बुद्ध तथा अन्य संतों, महात्माओं तथा दार्शनिकों ने उत्कृष्ट सभ्य समाज के निर्माण के लिए पथ-पर््रदर्शन किया परन्तु उत्कृष्ट सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सका तथा मनुष्य नरसंहार को वरीयता देते हुए युद्धांे एवं महायुद्धों का सञ्चालन करता रहा । सभ्य मानव समाज महापुरुषों के मार्ग दर्शन को भुला दिया तथा उत्कृष्ट मानव समाज का निर्माण न कर सका ।
उत्कृष्ट एवं सभ्य मानव समाज को रामराज्य अथवा यूटोपिया कहाँ जा सकता है जो केवल आदर्श में होता है तथा यथार्थ में अनुवादित नहीं किया जा सकता । दैहिक, दैविक, भौतिक तापा रामराज्य काहू नहि व्यापा । यह केवल काल्पनिक आदर्श है जो यथार्थ में नहीं पाया जा सकता है । परन्तु सभ्य मानव समाज का मार्ग दर्शक आदर्श ही होता है । अतः हमंे आदर्श को भुला नही देना चाहिए तथा नए आदशों का निर्माण करना चाहिए । सत्युग के देवी देवता का समाज सर्वोत्कृष्ट सभ्य समाज माना जा सकता है । बाद के युगी त्रेता तथा द्वापर में सतोगुण में कमी आई तथा सत्युग हमारा आदर्श हो गया ।
उत्कृष्ट सभ्य मानव समाज का निर्माण इस पृथ्वी पर हो सकता है । उसके लिए विश्व के नेता लोगों, धार्मिक गुरुजनों तथा मानव अधिकार कर्मियों को क्रियाशील तथा प्रयत्न शील होना होगा । उत्कृष्ट सभ्य मानव समाज वह है जिसमे मानवीय संवेदना नागरिक युगों, मानवीय मूल्यों एवं मान्यताओं के प्रति र्समर्पण विद्यमान होता है । संवेदनशील मानव अन्य मनुष्यों की पीडÞा को समझता है तथा महसूस करता है एवं उसके निराकरण करने का प्रयास करता है । अन्य व्यक्तियों की पीडÞा को महसूस करना मानव धर्म है । महात्मा गान्धी के भजन की हृदय स्पर्शी पंक्ति है, वैष्णव जनतो तेने कह, जे पीर पर्राई जाणेरे ।’
समाज के सभी मनुष्यों में पारस्परिक प्रेम एवं सद्भाव का होना उत्कृष्ट एवं सभ्य मानव समाज के लिए अपरिहार्य माना गया है । उत्कृष्ट मानव समाज सम्पर्ूण्ा विश्व के लिए अनुकरणीय होना चाहिए । प्राचीन वैदिक युग का समाज उत्कृष्ट मानव समाज बनाया था । जिसने वैदिक सभ्यता को उदाहरणीय बनाया था । मानव समाज में सत्य अहिंसा, परोपकार, त्याग, बलिदान, दया, क्षमा, तथा अन्य आवश्यक मानवीय गुणांे का समादर होता है तथा मनुष्य उन गुणों के अनुसार आचरण करता है । वही मनुष्य जीवन प्रशंसा का पात्र होता है जिसमे मानव मात्र के प्रति दया तथा करुणा का भाव होता है । घृणार्,र् इष्र्या, द्वेष, हिंसा तथा प्रताडन आदि सभ्यता एवं मानवता का उपहास करते हैं ।
आज के मानव समाज में संवेदनशीलता तथा मानवता का अवमूल्यन हो गया है । आज चोरी, डकैती, हत्या, अपहरण तथा तस्करी मानव समाज के लिए अभिशाप बन गए हैं । मनुष्य द्वारा निरीह व्यक्तियों का शोषण एवं उत्पीडन मानव समाज को सभ्य एवं उत्कृष्ट कैसे बना सकते हैं । दलितों का शोषण एवं उत्पीडन तथा महिलाआंेका क्रय-विक्रय मानव समाज के लिए कलंक है । अतः आज के मानव समाज को उत्कृष्ट नहीं कहा जा सकता । यद्यपि आज का यह मानव समाज सभ्य मानव समाज अवश्य माना गया है पर है नहीं ।
उत्कृष्ट मानव समाज यूटोपिया है क्योंकि प्रत्येक युग के समाज में राक्षसों एवं पाशविक प्रवृत्तियों का बोलबाला रहा है । त्रेता में रावण तथा अन्य राक्षसांे के अत्याचार ने समाज को निम्न स्तर का बना दिया था । द्वापर में भी कंस के अत्याचारों के कारण तथा दुर्योधन की धर्म विहीन गतिविधियों के कारण उत्कृष्ट समाज न बन सका । इसलिए युग-युग में राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर एवं गुरुनानक आदि महापुरुषों का अवतरण हुआ । खखख

झलकियँ एक शादी की !

Posted by Himalini On March - 25 - 2010 ADD COMMENTS

vivahमगवान श्रीकृष्ण ने सोलह हजार से भी ज्यादा लडकियों से शादी रचा कर भावी युवकों के मन में शादी करने की ललक जगा दी थी । “महाजनों येन गतः स पन्था”! बडों के बताए रास्ते पर चलना भी तो चाहिए ! हालँकि शादी खुद में आबादी है या बर्बादी इसे कोई नहीं जान पाया । मथुरा का पेडा – खानेवाले और न खानेवाले दोनों पछताते हैं । किसी पहुँचे हुए विद्वान ने कहा था, बेटा शादी जरूर करो । पत्नी भली मिली तो जिन्दगी सुधर जायेगी । यदि पत्नी वैसी न मिली तो तुम खुद सुधर जाओगे । तुम्हें संसार से वैराग्य हो जायेगा और परिणामस्वरूप भगवान के चरणों में प्रीति होगी ! मेरे जैसे अधकचरे भक्त शायद इसी श्रेणी में आते हैं ! अभी नेपाल की राजनीति जिस तरह अनेक उधेडबुन में जकडी हर्इ है और सुखद समाधान का कोई राह नजर नहीं आ रहा, शादी ठीक या बेठीक- यह मसला भी युगों से अधर में लटका हुआ है । खैर….हमलोग शादी की ओर    चलें । अभी अभी शादी का मौसम आया था । सभी को गुदगुदाकर चला गया । एक शानदार निमंत्रण पत्र मेरे सामने फडफडा रहा था और कह रहा था, लो एक और लल्लु शादी की बलिवेदी पर खुद को निछावर कर रहा है । उसे धीरज बँधा आओ । हालँाकि उसके दिल में अभी तो लड्डू फूट रहे हैं ! मैं ठहरा एक अधकचरा आध्यात्मिक आदमी । सोचा लगे हाथ वर-वधू को आशर्वाद दे आए । अदना-सा साहित्यकार आशर्वाद के अलावा और दे भी क्या सकता है – हृदय में आशर्ीवाद और हाथ में बडा सा बैग लटकाए मैंने दलबदलू नेता की तरह अपने पारिवारिक दलबल के साथ शादीवाले घर में धमाकेदार इन्ट्री मारी । यथायोग्य नमस्कार प्रणाम के बाद हमलोग दो चार दिन के लिए उसी घर में जानबूझकर गहर्राई तक धँस गए । लगा हमलोग घर के ‘पिलर’ हैं ।
दूल्हे राजा धरती पर चल नहीं पा रहे थे। अन्तरिक्ष में उड रहे थे । उनकी माताश्री खुशी के मारे बीमार हो गईं और पिताश्री को किसी पुराने रोग ने ऐसा धोबिया पाट मारा कि शादी भर प्रायः वे भूखे ही रहे ! ऊपर से सर पर मेहमाननवाजी और रस्म अदायगी का बोझ ! नीम चाढे करैला !
बाबा रामदेव के बहकावे में आकर कुछ सभ्य महिलाएँ असभ्य की तरह एक बन्द कमरे में बेमतलब हँस रही थीं । हँसने से मुप\mत में स्वास्थ्य अच्छा होता है और शादी के माहौल में भी चार चँाद लग जाते हैं- कुछ ऐसी ही उटपटाङ धारणाओं से महिलाएँ हँसे जा रही थीं । हँसी नहीं हर्इ, भारतीय टी.वी चैनल की धारावाहिक कहानी हो गई । रुकने का नाम ही न ले रही थी । एपिसोड पर एपिसोड चल रहा है । बेशुमार तादाद में लोग बारात की शोभा बढाने के लिए तैयार थे । पुराने-पुराने सूट और र्टाई का पर््रदर्शन पुरुष कर रहे थे और महिलायें सोने के गहने से लद कर ये साबित कर रही थीं कि सोना अभी उतना महंगा नहीं हुआ है, जो खरीदा ही न जा सके ! सावधान मर्दों !! लगभग दो सौ लोग बारात की शोभा बढÞा रहे थे या भीडÞ बढÞा रहे थे, कहना बहुत मुश्किल था । एक पुरानी-सी गाडी में बैण्डपार्टर्जधज कर बैठी थी । इत्तफाक से कुछ लोग उसी गाडÞी में घुस गए और तुरन्त नाक भौं सिकोडÞते हुए उतर भी आए । मैंने उन्हें कहा भी, देश में समावेशी संविधान बनने जा रहा है । आपलोग गाडी में समावेश होकर फिर मेढक की तरह बाहर क्यों उछल पडेÞ – चलिए, इसी में बैठा जाय ! मेरे इस उपदेश का बहुत बुरा नतीजा हुआ । बैंण्डवालों के साथ बैठना जिन्हें गँवारा न था, वे सब एक नई चमचमाती गाडी में चमगादर की तरह जहँ-तहा लटककर चलते    बने । मगर मुझे उपदेश देने के एवज में बैंण्डवालों के साथ ही बैठना पडÞा ! बैंण्डवालों ने मुझे भूल से अपना सगा समझकर बडेÞ प्रेम भाव के साथ बैठाया; और इस तरह मेरा बैण्ड बजा दिया ।
हालँाकि र्टाई वाले कुछ सज्जन जब पार्टर्ीीें अंगुर की बेटी -शराब) को दिल दे बैठे तब बैंण्डवालों के साथ खुद नाचते नजर आए । वैसे नाच क्या रहे थे, बन्दरों की तरह उछल कूद रहे थे । अब आप इसी को नाचना कहें तो मुझे कोई एतराज नहीं । वैसे बच्चन की ‘मेल कराती मधुशाला !’ मुझे उस वक्त याद आई थी ! बारात अब भीडÞ में तब्दील हो    गई । कौन बाराती है और कौन गैर बाराती है यह बतलाना किसी के वश में न था । स्थानीय स्मार्ट लडÞके भोजन की लाइन में घुस कर बारात की शोभा दिल खोलकर बढाने लगे । बेटी वाले उन्हें भी झेल रहे थे । वर्षों बाद एक पुराने मित्र नए अंदाज में  मिले । वे अहिंसावादी -शाकाहारी) भोजन कर रहे  थे । उन्होंने मुझसे पूछा, यार ! यह रविवार किस ने बनाया- मैंने कहा, यह रविवार खानेपीने का कोई नयँा आइटम है क्या- वे गोभी का बडÞा सा गुच्छा मुँह में ठूंसते हुए बोले, मैं सण्डे को शाकाहारी हो जाता हूँ । और सब दिन तो चलता है !
मैंने कहा यार ‘सण्डे’ -रविवार) ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया जो उसे अहिंसावादी बना    दिया ! मेरा उपदेश कौन सुनता है ! अब वे मिष्टान्न की तलाश में हाथ में प्लेट लिए भटक रहे थे ! मालूम पडÞ रहा था, वे अन्नपूर्ण्ाा देवी की आरती उतार रहे हैं ! एक साला मिल गया । ज्ाो पहले बिल्कुल सूअर की तरह मोटा था पर अभी दुबला पतला चालाक, और आजकल की भाषा में ‘स्मार्ट’ हो गया था । मैंने इस बदलाव का राज पूछा । साला बोला, जीजाजी ऐसी ही शादियों में नाचते-उछलते मेरा वजन पचीस किलो घट गया । अब देखिए मैं कितना स्मार्ट हूँ ! मैंने उसे भी एक टुकडÞा आशर्ीवाद दिया-हँा, वह तो देख ही रहा हूँ । खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान !
मैं जहँा थोडÞी देर बैठता वहीं उFmघने     लगता । रात को जल्दी सो जाने वाला जीव, यहँा शादी के हुडÞदंग में रात १२-१ बजे तक उनींदी अँाखों से झूलता रहता ! शादी जाय भँाडÞ में ! मैं घर पहुँच कर लम्बी चादर तानकर सोना चाहता  था । इसलिए शादी वाले घर से मैं सर पर पंाव रखकर भागा !
हँा….मैंने वर-वधू को आशर्ीवाद दियाः-
दूधो नहाओ पूतो फलो !
पर सन्तान तो दो ही भलो !!

धर्म में धंधा::लिमटी खरे

Posted by Himalini On March - 25 - 2010 ADD COMMENTS

Shirdi_Saibaba2010भारत धर्मभीरु देश है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है । हिन्दुस्तान में हर धर्म, हर भाषा, हर संप्रदाय, हर पंथ के लोगोंं को आजादी के साथ रहने का हक है । भारत ही इकलौता देश होगा जहं मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारे, चर्च सभी की चारदीवारी एक दूसरे से लगी होती है। भारत में अनेक ऐसे संत पुरुष हुए हैं, जिनकी जात-पात के बारे में आज भी लोगों को पता नहीं है, और ये सभी धर्मों के लोगों के द्वारा निर्विकार भाव से पूजे जाते हैं । करोडों रुपयें का चढÞावा आने वाले मंदिरों में सबसे ऊपर दक्षिण भारत में तिरूपति के निकट तिरूमला की पहाडिÞयों पर विराजे भगवान बालाजी जिन्हें तिरूपति बाला जी के नाम से जाना जाता है, सबसे आगे हैं । इसके बाद नंबर आता है उत्तर भारत में जम्मू के निकट त्रिकुटा पहाडी पर विराजी मातारानी वैष्णां देवी का । इन दोनों ही के बाद महाराष्ट्र प्रदेश के अहमदनगर जिले के शिरडी गंाव के फकीर र्साई बाबा के धाम का नाम लिया जाता है । शिरडी की भूमि में अचानक आए र्साई बाबा ने जो चमत्कार दिखाए वे पौराणिक काल के नहीं थे, आज भी बाबा के प्रति लोगों की अगाध श्रद्घा का कारण उनका चमत्कारिक व्यक्तित्व ही कहा जा सकता है । जीवन भर जिस फकीर ने अपनी बजाए मानव मात्र की चिंता की है, उसके नाम को आज व्यावसायिक चोला पहनाया जाना निस्संदेह निंदनीय है । सत्तर के दशक के बाद मनोज कुमार कृत “शिरडी वाले र्साई बाबा” चलचित्र और सदी के महानायक “अमिताभ बच्चन” की फिल्म “अमर अकबर एंथोनी” में ऋषि कपूर का गाना “शिरडी वाले र्साई बाबा, आया है दर पे तेरे सवाली….” ने धूम मचा दी । जिस तरह गुलशन कुमार के माता रानी के भजनों के बाद समूची देश त्रिकुटा पर्वत पर विराजी माता वैष्णों देवी का दीवाना हो गया था, ठीक उसी तरह बाबा के भक्तों की कतारें बढÞती ही गईं ।
र्साई भक्तों की आस्था के केंद्र शिरडी का चर्चा में रहना पुराना शगल है । जब तक बाबा सशरीर थे, तब तक फर्जी नीम हकीम और ओझाओं द्वारा बाबा पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर इस स्थान को चर्चाओं का केंद्र बनाया । सोने के सिंहासन और करोडों के दान के चलते यह स्थान चर्चाओं का केंद्र बिन्दु बने बिना नहीं रहा । अब यह बाबा के वी. आई. पी दर्शन के चलते चर्चाओं मंे आ गया है ।
सर्ंाई बाबा संस्थान द्वारा लिए गए निर्ण्र्ाकी काकड आरती के लिए पंाच सौ रुपयें तो, धूप के लिए दो सौ रुपयें वसूले जाएंगे, सर्ंाई भक्तों को जँच नहीं रहा है । यद्यपि यह व्यवस्था वर्तमान में प्रयोग के तौर पर ही लागू की गई है, किन्तु तीन माह में ही बाबा के भक्तों के बीच इस व्यवस्था को लेकर रोष और असंतोष गहराने लगे तो बडी बात नहीं । किसी भी आराध्य देव के दर्शन के लिए अगर उसके अनुयायी को कीमत चुकानी पडÞे तो यह उसकी आस्था पर सीधा कुठाराघात ही कहा जाएगा । हो सकता है कि बाहर से आने वाले लोगों की परेशानी को ध्यान में रख संस्थान ने यह व्यवस्था बनाना मुनासिब समझा होगा, किन्तु उत्तर भारत में माता रानी वैष्णों देवी के दर्शन के लिए आरंभ की गई हेलीकाप्टर सेवा का लाभ आम श्रद्घालु उठाने की कतई नहीं सोचता है । वैसे भी माना जाता है कि अपने आराध्य के दर्शन जितने कष्ट के बाद होते हैं उतना ही पुण्य प्रताप भक्त को मिलता है । शुल्क के बदले आराध्य के दर्शन की व्यवस्था माता वैष्णांे देवी र्श्राईन बोर्ड ने आरंभ की थी, जिसमें दो सौ रुपयें से एक हजार रुपयें तक का मूल्य चुकाने पर विशेष दर्शन की व्यवस्था की गई थी । बाद में भक्तों के भारी विरोध के बाद इस व्यवस्था को र्श्राईन बोर्ड ने बंद कर दिया था । देश की राजधानी दिल्ली में साकेत में विशाल र्साई प्रज्ञा धाम चलाने वाले स्वामी प्रज्ञानंद का कहना एकदम तर्कसंगत है कि शिरडी के संत र्साई बाबा गरीबों के मसीहा थे और उनके दर्शन के लिए धन के आधार पर भेदभाव किसी भी सूरत में तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता है ।
शिरडी के र्साई बाबा पर देश के करोडÞों लागों की अगाध श्रद्घा है। बाबा किस जात के थे, यह बात आज भी रहस्य ही है । बाबा जहंा बैठते थे, उस स्थान को द्वारका मस्जिद कहा जाता है । सभी धर्मों के लोगों द्वारा र्साई बाबा के प्रति आदर का भाव है । यही कारण है कि र्साई बाबा संस्थान शिरडी के कोष में दिन-दूनी-रात-चौगनी बढÞÞोत्तरी होती जा रही है । कोई बाबा को सोने का सिंहासन तो कोई रत्न जडिÞत मुकुट चढाने की बात करता है । बाबा को समाधि लिए अभी सौ साल भी नहीं बीते हैं और विडम्बना ही कही जाएगी कि बाबा की इस प्रसिद्घ िको भुनाने में धर्म के ठेकेदारों ने कोई कोर-कसर नहीं रख छोडा है । आज देश भर में बाबा के नाम पर छोटे बडे अस्सी हजार से अधिक मंदिर अस्तित्व में आ चुके हैं । इनसे होने वाली आय किस मद में खर्च की जा रही है, इसका भी कोई लेखा जोखा नहीं है । र्साई के नाम पर लोगों को ठगने वालों की तादाद आज देश में तेजी से बढÞी है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है ।
शिरडी का वह फकीर जो माया मोह से दूर था उसके समाधि लेने के बाद उनके मंदिर या समाधि स्थल को भव्य बनाना उनके भक्तों की भावनाएं प्रदर्शित करता है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए । इसके साथ ही साथ बाबा के भक्तों को यह भी सोचना चाहिए कि र्साई बाबा ने सदा ही मानवमात्र के कल्याण की बात सोची थी । बाबा के प्रति सही भक्ति अगर प्रदर्शित करना है तो संस्थान और दानदाता भक्तों को चाहिए कि शिरडी में सोने के सिंहासन या रत्न जडित मुकुट आदि के बजाए एक भव्य र्सवसुविधायुक्त अस्पताल अवश्य बनवा दें जिसमें हर साध्य और असाध्य रोगों का इलाज एकदम निःशुल्क हो, इससे बाबा की कर्ीर्ति में चार चंाद लग सकते हैं ।

होली के चुभते रंग::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On March - 23 - 2010 ADD COMMENTS

ऋतुओं में बंसत को ऋतुराज कहा जाता है, आनन्द को पर्ण्ता कहा जाता है, खिले फूल को सौर्न्दर्य, गन्ध को मादकता कहा जाता है और यही वह रूप है बसंत का, जिसके आगमन से समस्त प्रकृति का नवश्रृंगार आंरभ हो जाता है रंग-बिरंगी फूलों से बाग-बगीचा, गाँव-घर-आँगन खिल उठता है और उसके सुवासिंत रंग से ठड से ठिठुरे पतझड में बहार आ जाती है । खेते में गेंहु, जौ, सरसों की बालियों में निखार आने लगता है और और गाँव की गोरी के गालों पर रस छलकने लगता है गुलमोहर और सेमल का तो क्या कहना । र्सवत्र छा जाती है एक नयी मस्ती उल्लास, उमंग और उत्सवप्रियता । रंग ही रंग, उमंग ही उमंग, बौराना ही बौराना । ऐसे में कवि हृदय कह उठता है - पुलकित पलाश हुए बौराए आम
कोपल के अधरो पर वासन्ती नाम
वसुधा का कागज ले पुष्प लेखनी
मौसम ने पत्र लिखा यौवन के नाम ।
उत्सव, पर्व त्यौहार व्यक्ति को तनाव एवं संधर्षके बीच भी उल्लास पर्ूण्ा एवं उत्साह पर्ण्ा अपने कार्य संपादन के लिए प्रेरित करता है । आनन्द जीवन का मूल-मंत्र होता है और ये पर्व त्यौहार व्यक्ति के जीवन को आनन्द से परिपर्ण् करता हैं । जीवन में सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों की पर्र्ति एवं अभिव्यक्ति का माध्यम हैं ये त्यौहार । और वह भी होली जैसा आनन्ददायक एवं हर्षो-उल्लासपूर्ूण्ा पर्व । जिसमें व्यक्ति को अपने क्या पराए क्या सभी को मन चाहे ढंग से रंगने का भरपूर मौका मिल जाता हैं, आपसी द्धेष मिटाने का प्रेम एवं सौहार्द बढाने का ।
होली की चर्चा हो और साली की याद न आयें – होली और साली के बीच तो चोली दामन का रिश्ता होता है और होली जैसा त्यौहार ससुराल में ही सुहाता है । वह भी तब जब ससुराल रूपी बगीचा, साली रूपी फूलों से लदा-भरा हो । जिस प्रकार बगीचे में माली अच्छा लगता है, लडर्ई-झगडे में गाली उसी प्रकार ससुराल में साली । वैसे कहा जाता हैं कि साली गोरी हो या काली, जीजा के लिए सभी सालियाँ होती है दिलवाली । फिर जीजा की होली क्यांे न हो रंगीली । होली के बहाने जीजा को वर्षभर से दबी इच्छायें पूरी करने का सुनहरा, लाल, पीला, हरा करने का मौका जो मिल जाता है । जीजा खूबसूरत हो या बदसूरत, ठिगना हो या लंबा, बुढा हो या जवान, सभी का मन होली आते ही बालियों उछलने लगता हैं । हाँ यह पर्व केवल जीजा, साली का नहीं, देवर भाभी के लिए भी उतना ही महत्व रखता हैं, छेड-छाड प्यार भरे मनुहार का यह रंग-बिरंगी त्यौहार सभी के मन को रंगीन बना देता हैं ।
लेकिन अब होली का रंग अपना चमक खोने लगा हैं । शहरों में होली का भी शहरीकरण होता जा रहा है इंटरनेट एवं मोबाइल द्वारा होली खेली जाने लगी हैं । रंगों के जगह पानी भरे गुब्बारे लेने लगे है । इस भागती दौडती जिन्दगी में होली का भी हाईटेकीकरण हो गया है । लोेगों के पास समय कहा है, इस भाई-चारे एवं मैत्री के सन्देश देने वाले त्यौहार को मनाने के लिए । आज सभी का तन-मन रंगा हुआ है और वह भी इस कदर रंगा हुआ जिस तरह सूरदास ने कहा कि
“सूरदास काली कामरिया
पै चढै न दूजो रंग ।”
अब तो लगता हैं कि होली वह होली नहीं रही, बीते समय की बात बन गयी हैं कि होली के रंग अपनी इन्द्रधनुषी छटा बिखेरते थे । हर एक मौसम का एक रंग होता था और हर रंग का एक जीने का ढंग होता था । रंग पर रंग चढÞता था पर रंग से रंग लडÞता नहीं था, हर रंग अपने आपको ऊंचा समझता था, पर किसी दूसरे को नीचा नहीं समझता था । रंग तो जीने का ढंग सिखाता है और जीने का ढंग सिखाने का एक ही मूल-मंत्र है प्रेम ।
आज देश में हर रंग, बदरंग हो चुका है चाहे वह गणतंत्र का रंग हो या माओवादियो के क्रांति का या कांगे्रस-एमाले सरकार का रंग, यहाँ कोई भी अपनी चमक बरकरार रखने की कोशिश में नहीं है, ब्लकि दूसरे की चमक को धुँधला करने की कोशिश में लगा हुआ हैं ।
संघीयता के ऊपर जातियता का रंग, संविधान के ऊपर पाटियों के स्वार्थ का रंग, मधेश के ऊपर पहाडÞ का रंग और ये सभी रंग आपस में मिलकर इस रंग-बिरंगी देश को यहाँ के प्रत्येक नागरिक को बदरंग बनाते जा रहे हैं । यही कारण हैं कि आज रंग लुभाते नहीं है, ब्लकि चुभते है, मन को रंगीन नही करते ब्लकि व्यक्ति को व्यक्ति से लडÞाते हैं और उसी में अपना सकुन खोजते है ।
आज देश में, देश की जनता के मन में रंगो की इन्द्रधनुषी छटा बिखेरने के लिए जरुरी है की देश को मधेश पहाड में बाँटने के खेल खेलना, स्वार्थ के रंग में रंंगे नेताओं को छोडÞना होगा । आज सभी पर एक ही रंग चढें और वह है राष्ट्रीयता का रंग । उल्लास, उमंग और उत्साह के इस पावन पर्व होली को सभी जातिर्-धर्म-समुदाय के लोग आपसी बैर-वैमनश्य भुलाकर व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर मनायें, तभी सही अर्थों में होली पर्व की र्सार्थकता सिद्ध हो सकेगी । और देशरूपी एक बगीचा में ३६ जात-जाति की फूल अपनी प्राकृतिक रंगों में खिल कर मनोरम छँटा बिखेरेगें और सम्पर्ूण्ा वातावरण को सुवाषित बनायेंगे ।

“मेकअप और ड्रेस का तालमेल”

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

fashion2010इस आधुनिक युग की दौडÞ में किसी भी व्यक्ति के पास इतना समय नहीं हैं कि वह किसी भी विषय, विशेषकर अपने मेकअप एवं फैशन पर ज्यादा माथापच्ची करें । सभी चाहते हैं कि शार्टकर्ट रास्ते अपना कर सुन्दर, समृद्धशाली, खुशहाल बन जायें, लेकिन जरुरी नहीं है कि इससे आप एक आकर्ष व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति बन सकते है । इसके लिए चाहिए कि आपको र्सवप्रथम अपनी आवश्यकता एवं मन की आवाज सुनें । आप सबों के दिमाग के पास यह जाँचने की अदभूत शक्ति होती है कि आप पर क्या अच्छा लग रहा है या क्या अच्छा नहीं लग रहा है – लेकिन इसका आप सही ढँग से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं तो चलिए हम आपको यह तय करने में मदद करते हैं ।
केवल महंगे-महंगे सौर्न्दर्य प्रसाधनों को खरीदने का अर्थ कदापि नहीं है कि आपकी मंशा पूरी हो गई है । हो सकता है यह आपकी त्वचा को सूट ही न करें । इसके लिए जरुरी है कि इस बात का
ध्यान रखना कि कौन से रंग के कपडो के साथ कैसे रंग का मेकअप का चुनाव करें ।
ब्राइट कलर्स- यदि आप आँरेंज, लाल या मजेंटा रंग के कपडÞे पहन रही हैं तो न्यूट्रल आई शैडो का इस्तेमाल करें । इसके साथ आप शहद जैसा पीला या भूरा अथवा हल्के भूरे रंग का बखूबी इस्तेमाल कर सकती है ।
यहाँ ध्यान देना जरुरी हैं कि आपके होठों का रंग आपके कपड अथवा ब्लश के साथ टकराव न पैदा करें । आप यदि सुनहरे काम वाली लाल रंग की साडÞी अथवा सलवार-समीज को पहन रही हैं तो सुनहरे रंग से अपनी आँखे भी सजाइए । इसके साथ ही लालिमा लिए हुए भूरे रंग के लाइनर का भी इस्तेमाल कर सकती हैं । पलकों को भी हल्के रंग के आई शेडो से खूबसूरत बना सकती है ।
हल्के कलर्स- आप गहरे रंग से आँखों का मेकअप और न्यूट्रल कलर के ग्लाँस का इस्तेमाल कर चार चांद लगा सकती है हल्के रंग से गहरे
रंगो का इस्तेमाल आपके लुक में एक गहर्राई और अदभूत सौर्न्दर्य का समावेश कर देगा ।
काला रंग कपडÞो का साथी- काला ड्रेस में आप किसी भी रंग का आई शैडो का इस्तेमाल कर सकती है । इस कलर में आप काला रंग अथवा चारकोल जैसे शैड का इस्तेमाल भी कर सकते है ।
हरे रगं के कपडे -समृद्धि का रंग)- हरे रंग के साथ गहरे भूरे रंग की लिपस्टिक खूब फबती है । इसके साथ ही न्यूट्रल कलर के आई शैडो जैसे लक्मे का शैम्पेनशेड, इस रंग के साथ बहुत ही जचँता है ।
गुलाबी रंग के कपडे -खूबसूरत बार्बी लुक) – गुलाबी रंग उत्तेजना का प्रतीक हैं । युवाओं का खास पसंदीदा कलर है । गुलाबी रंग के लैवेंडर कलर बहुत ही अच्छा लगता है । अपनी ड्रेस के साथ सही तालमेल बैठाने के लिए नीले रंग के आइशैडो का प्रयोग करें । जो लोग मेकअप में धीरे-धीरे रंगो का इस्तेमाल करना चाहते है वे एक प्यारा सा बार्वी लुक बनाने के लिए पीच कलर में लिपटे गुलाबी रंग के साथ बनाए रखें ।
पीले या भूरे रंग का ड्रेस- भूरे रंग के ड्रेस के साथ सुनहरे रंग का आई शैडो या गहरे भूरे रंग की लिपिस्टिक जिस में नारगी रंग की झलक हो, का प्रयोग करके कमाल सा लूक पा सकती है ।

हैपेटाइटिस-बीः- लाईलाज नहीं

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

ईन फ्लू की तरह हैपेर्टाईटिस-बी का भी भारी आतंक अनेक वर्षो तक फैलाकर अरबों रूपया दवा कम्पनियों के कमाया । जबकि सच यह है कि रोग से अधिक मृत्यु की घटनाएं दवा के प्रभाव से हर्इ । अमेरिका सहित संसार के अनेक देशों के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तथा चिकित्सकों ने हैपेटाइटिस-बी के इंजैक्शन अपने परिवार कhepatitis-c-liverे लोगों को नहीं लगने दिये । दो वर्षपहले पेन्सिलवेनिया के एक दर्शन की प्रोफेसर सोलन आई तो उसने प्रेस काँन्पे|mस में बतलाया कि उसके परिचत डाक्टर ने अपनी बेटी के हैपेटाइटिस का टीका नहीं लगाने दिया, और इसे अत्यन्त घातक बतलाया । हजारों जानकारी में आई घटनाएं हैं जिनमें इस इंजेक्शन से बच्चों की मृत्यु हो गई या वे जीवन भर के लिए विकलांग हो गए, कई बच्चे गम्भीर रूप से बीमार हो गए ।
हैपेटाइटिस वास्तव में लीवर की संक्रमण से पैदा हर्ुइ खराबी है जिसे हम पीलिया के नाम से जानते हैं । पर विश्वास रखें इलाज किसी भी प्रकार के पीलिया या हैपेटाइटिस का उनके -एलोपैथी) के लिये सम्भव नहीं । अभी तक इसका कोई प्रभावी दवा आधुनिक विज्ञान नहीं बना पाया है । इसके विपरीत भारतीय पारम्पारिक चिकित्सा में इसके अनेक सरल पर पक्के इलाज हैं । हैपेटाइटिस-ए,बी,सी, आदि जो भी हो वे सब निश्चित रूप से ठीक हो सकते हैं ।
रोगी में पीलिया के लक्षण नजर आने पर परहेज करवाते हुए निम्न में से कोई एक इलाज करें, प्रभु कृपा से वह ठीक हो जाएगा । गुम्मा नामक -द्रोण पुष्पी) पौधे को पहचानते हों तो उसका एक चम्मच चर्ूण्ा मिट्टी के बर्तन में १०० मि.ली. पानी डालकर भिगो दें । प्रातः मसल व छानकर रोगी को पिलाई तथा प्रातः भिगोकर रात को पिला दें । ५-७ दिन में रोगी ठीक हो जाएगा । थोडÞा शहद और अनार के दाने जितना कपूर मिलाकर देने से प्रभाव अधिक होगा । चूने का पानी २-२ चम्मच में ३ बार रोगी को पिलाएं हरड का चर्ूण्ा एक चम्मच तथा शहद या पुराना गुड -रहित) दिन में २-३ बार दें । उल्ाटा-सीधा न खाएं -चाय, काँफी,जंक फूडÞ) तो पित्ता -हाईपर ऐसिडिटी, खट्टा पानी आना, बदहजमी) पूरी तरह सदा के लिए ठीक हो जाएगी ।
श्योनाक -टाटबडंगा, अरलू, तलवार फल ) की छाल १५०-२०० ग्राम चर्ूण्ा २००-२५० मि.ली. पानी में मिट्टी के पात्र में भिगोकर रोज प्रातः दोपहर, सांय ३ बार में पिला दे । रोज नया चर्ूण्ा भिगोएं । ३-४ दिन में रोगी ठीक हो जाएगा । थोडÞा मीठा -खाण्ड-मिश्री) मिलाकर देना अधिक लाभदायक होगा । योग सन्देश में छपे लेख के अनुसार सिक्किम के एडीशनल कमीशन-एम्र्साईज ‘एम के प्रधान’ के अनुसार श्योनाक का एक अन्य प्रमाणिक प्रयोग इस प्रकार है ः-
उपरोक्त प्रकार से १५० ग्रा. श्योनाक की छाल १५०-२०० मि.ली. पानी में रात को भिगो दें । प्रातः २०० मि.ग्रा. -२ काले चने के बराबर) शुद्ध कपूर पानी से निगलकर ३० मिनट बाद श्योनाक का पानी छानकर पीने से १ या अधिक से अधिक ३ या ४ दिन में असाध्य पीलिया या ‘हैपेर्टाईटिस-बी’ तक ठीक हो जाता है ।

“र्स्वर्गद्वार” धरती का::जगदीश ठाकुर

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

swarhdwarनिर्माण काल से ही विश्व शान्ति और मानव कल्याण की दिशा में मिथिला की राजधानी जनकपुर दुनिया भर के लिए मार्गदर्शन का केन्द्र बिन्दु रहा है । जनकपुर देहबीहिन तपस्वी राजा निमी जनक एवम् जननी माता सीता की भूमि है । संसार में होनेवाली किसी भी प्रकार के परिवर्तन व बदलाव के लिए जनकपुर स्वतः पहले से ही खुद को तैयार रखता है । इसका जीता जागता उदाहरण है, जनकपुर का “र्स्वर्गद्वार” और “बाबा भूतनाथ का मन्दिर” । ज्ञातव्य हो, जनकपुर के ठीक बीचां-बीच ये वही स्थान है, जहाँ एक ओर पवित्र गंगासागर है, तो दूसरी तरफ सैकडांे सालों से हिन्दुआंे का अव्यवस्थित श्मशान जहां अब धरती का पहला र्स्वर्गद्वार बन चुुका है ।
ज्ञान, वैराग्य एवम् अभियान के अग्रज भूमि जनकपुरधाम मंे माघ २९ गते महाशिवरात्री के दिन धरती का पहला र्स्वर्गद्वार -श्मशान) में बाबा भूतनाथ का प्राण प्रतिष्ठा जगन्नाथपुरी के श्री श्री १०८ शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के हाथों हुआ । लगातार ९ दिनों तक पूरी विधि विधान तथा निष्ठापर्वक हर्इ इस महायज्ञ को जिस किसी ने भी अपनी नजरों से देखा उन्हांेने यही कहा, धन्य है पवन सिंघानिया, जिस्ने इतनी भयावह, डरावनी और अव्यवस्थित श्मशान को र्स्वर्गद्वार बना दिया ।
पिता हरद्वारी लाल सिघांनिया व माता जगदम्बा देवी सिंघानिया के द्वितीय पुत्र रत्न के रूप में ६ मार्च १९६० को माता सीता की पवित्र जन्म भूमि जनकपुरधाम के धार्मिक एवं सम्पन्न व्यवसायिक मारवाडी परिवार में पवन सिंघानिया का जन्म हुआ । पवनजी के बारे मंे इनके बाल सखा सफल व प्रख्यात कानून व्यवसायी विजय कुमार सिंह का कहना है, पवन जी बचपन से ही बहुत चंचल, निर्भिक एवम् रचनात्मक स्वभाव के होने के साथ साथ साथियों के साथ गप्पें मारने में प्रांगत थे और सैर सपाटा करना ही उनकी दिनचर्या थी । वैसे एक वक्त ऐसा भी था जब पवन सिंघानिया को जनकपुर का डँान भी कहा जाता था । काला ड्रेसकोड, काला चश्मा के साथ काले बुलेट पर सवारी करने पर देवानन्द को भी मात देने वाले पवन सिंघानिया के जीवन में एकाएक ऐसा दैवी चमत्कार हुआ कि सारी भौतिक सुख सुविधा और ऐशो-आराम को त्यागकर खुद को श्ामशान किंग बना बैठा ।
तो आईए जरा हम भी हिमालनी के माध्यम से यात्रा करते है “श्मशान से बना धरती का पहला र्स्वर्गद्वार  का”, जिसे अब सात कविताओं का र्स्वर्गद्वार भी कहा जाता है । क्यांेकि चन्दा मांगते वक्त जो कटु वचन सुनना पडता था पवन जी को, उस पीडा को उन्होंने अपनी सात कविता के माध्यम से व्यक्त किया है ।
श्मशान जीर्णोधार समिति द्वारा पर्ूव घोषित बाबा भूतनाथका प्राण प्रतिष्ठापन महायज्ञ तथा रामकथा वाचन सहित का कार्यक्रम माघ २१ ग्ाते को विशाल कलशयात्रा के साथ शुरु हुआ । माघ २१ गते विशाल कलश शोभा यात्रा को ऐतिहासिक तथा मनमोहक बनाने के लिए आयोजकांे ने कोई कसर नहीं छोडÞा । २५१ कलश मंे माथे पर गंगाजल भरकर कुँवारी कन्याएँ तथा महिलाआंे द्वारा शहर के विभिन्न भागों का परिक्रमा किया गया । कलश यात्रा के क्रम मंे बाबा भोलेनाथ के गणों की आकृति सजाकर भजन एवम् नाच गान करती जब मण्डली सडक पर निकली तो सबकी निगाहें स्वतः उधर ही ठहर गई । इस अदभूत नजारे को देखने के लिए हजारों जनकपुरवासी घरांे से निकलकर शहर के कई प्रमुख चौक चौराहे पर अपनी पलके बिछाए खडे थे, तो दूसरी ओर स्थानीय केबुल संचालको के ओर से भी कलश यात्रा को लाईव कास्ट कर जनकपुर व इस्ाकांे आसपास के इलाको में घरांे तक कार्यक्रम को प्रसारण की जा रही थी । इसके अलावा एफ.एम. रेडियो व अखबारांे ने भी कार्यक्रम के प्रचार प्रसार मंे अपनी तरफ से कोई भी कमी नही रहने दिया ।
ब्ााबा भूूतनाथ के प्राण प्रतिष्ठापन महायज्ञ के क्रम मंे ९ दिनांे तक होनेवाले राम कथा वाचन बिहार स्थित मुजपफरपुर के प्रसिद्ध कथावाचक विद्धान आचार्य श्री नेमाई जी महाराज द्वारा शुरु किया गया । जिसमें काफी संख्या में भक्तजन ने कथा श्रवण किया । वही दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर के ही प्रसिद्ध यज्ञाचार्य श्री कमला पति त्रिपाठी भी अपने पण्डित शिष्यांे के साथ यज्ञस्थल में वेदपाठ कार्यक्रम आरम्भ कर दिए । श्मशान से बना धरती का पहला र्स्वर्गद्वार मे कथा श्रवण के लिए आने वाले भक्तजन व अन्य श्रद्धालुआंे के बीच यह एक चर्चा और कौतुहल का बिषय बना हुआ था । कुछ वर्षपहले तक इस रास्ते से धोखे से भी कोई नहीं गुजरना चाहता था पर आज आलम यह है कि अब हर कोई जीते जी जीवन मे एकबार जरुर अपने पैरो पर चलकर श्मशान से बना र्स्वर्गद्वार में आना चाहता है ।
यज्ञ, हवन तथा रामकथा वाचन के बीच ही कार्यक्रम के ५ वे दिन विख्यात प्रस्तोता आचार्य प्रवर गुलाबजी महाराज के जनकपुर में दूसरी बार के आगमन से कार्यक्रम मंे और भी भव्यता आ गया । अपने सम्बोधन के क्रम मंे श्रोताओं की रुचि अनुसार आचार्य प्रवर श्री गुलाबजी महाराज ने विभिन्न विषयों पर सम्बोधन किए जिसे श्रद्धालुआंे ने ध्यानपर्ूवक श्रवण किया था । इसी बीच माघ २८ गते र्स्वर्ग द्वार के सम्बन्ध में जगदीश ठाकुर द्वारा लिखा गया “र्स्वर्गद्वार एवम् सात कविताएँ” नामक पुस्तक को पूरी पीठाधिश्वर शंकराचार्य, आचार्य प्रवर श्री गुलावजी महाराज, श्री नेमाइजी महाराज, यज्ञाचार्य श्री कमला पति त्रिपाठी तथा श्री हरद्वारी सिंघानिया लगायत ५ महापुरुषों के हाथों अपरान्हृ ४.३० बजे र्स्वर्गद्वार मंे विमोचन किया गया । इस पुस्तक को मिडिया तथा साहित्य से संबंधित स्रष्टाओं ने श्मशान मंे विमोचन होनेवाला दुनिया का पहला किताब का दर्जा   दिया ।
वैसे तो सभी दिन के कार्यक्रम पूरी धार्मिक अनुष्ठान से ही किया जाता पर बाबा भूतनाथ के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के पहले रात का कार्यक्रम इतना भव्य व निष्ठापर्ूवक किया गया कि उपस्थित हर व्यक्ति के लिए जीवन के स्मृतियों मंे संयोजने लायक एक अदभुत नजारा बन गया । यज्ञ आरम्भ के आठवें दिन अर्थात वृहस्पतिवार के रात्रि के ८ बजे से रुद्राभिषेक पूजन आरम्भ हुआ । भगवान भूतनाथ का रुद्राभिषेख कार्यक्रम इतना श्रद्धा और निष्ठा के साथ वैदिक ध्वनि के गुंजन से ऐसा लगता था जैसे कि साक्षात कैलाश र्स्वर्गद्वार में समाहित हो गया है । रात्रि ८ बजे से प्रारम्भ हुआ रुद्राभिषेख यज्ञ सुबह ४ बजे तक चला । माध २९ गते १२ बजे श्री श्री १००८ पूरी पीठाधिश्वर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के हाथो भगवान भूतनाथ को प्राण प्रतिष्ठा दिया गया । फागुन १ गते आयोजकांे ने “एक शाम भोले के नाम” का मनमोहक भजन संध्या का कार्यक्रम आयोजन   किया ।
समग्र मंे कहा जाए तो ऐतिहासिक शहर जनकपुर का शान जानकी मन्दिर, रामानन्दद्वार और अब र्स्वर्गद्वार इस पौराणिक शहर के आन, बान और शान में चार चांद लगाने को पर्ूण्ारूपेण तैयार हो चुका है । इन सभी स्थितियांे को राज्य द्वारार् इमान्ादारी पर्ूवक न्याय किया जाय तो मिथिला की राजधानी जनकपुर को नेपाल के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धार्मिक महानगरो के शर्ीष्ा स्थान मंे खडÞा किया जा सकता है ।

“पनौती”- एक र्पर्यटन स्थल::रामभरोस कापडि, ‘भ्रमर’

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

काभ्रे जिला का पनौती-१२ वर्षपर लगा मकर मेला में स्नान-पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है, ऐसा विश्वास है । और लोग इसी विश्वास के तहत खीचें चले जाते हैं पनौती ।panauti32
क्या महज विश्वास ही इस आकर्षा का कारण रहा है । मैं तर्राई क्षेत्र में लगने वाला मेलाओं का अच्छा शौकीन रहा हूँ । वहां मुझे जीवन के हरेक पक्ष से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है । वह चाहे जनकपुरधाम का ही रामनवमी व विवाहपञ्चमी मेला हो, सलहेस फुलवारी हो, उदयपुरका त्रिवेणी मेला हो अथवा एशिया का सब से बडा मेला सोनपुर हो । हर जगह जाने का यथेष्ठ कारण विद्यमान हैं । पर पनौती जैसे ग्रामीण क्षेत्र में आखिर क्या है, जो जन सैलाब उमडÞता है वहां । स्वयं नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव ने मेला का शुभारंभ कर, इसकी महत्ता को स्थापित किया है । नेपाल सरकार अगामी सन २०११ को पर्यटन वर्षके रूप में मनाने का कार्यक्रम तय कर चुका है । अनेको प्रकार के कार्यक्रम संचालन में है । लाखों पर्यटक नेपाल आये इसका उद्देश्य है । इसलिए भी नेपाल के भीतर रहे तमाम पर्यटकीय गन्तव्य को एक सूत्र में आबद्ध कर उसका उचित प्रचार-प्रसार व व्यवस्थापन किया जाए तो यह पर्यटन वर्षके सफलता के लिए सहयोगी की ही भूमिका होगी । सम्भवतः इसलिये भी नेपाल के विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक जगहों पर वहां की अपनी सम्पदाओं को जनसमक्ष लाते हुए महोत्सवों का आयोजन होता रहा है । इसका अच्छा प्रभाव भी पडÞ सकता है ।panauti
इसी क्रम में पनौती को देखा जा सकता है । इसकी विशेषता यह है कि यह बारह वर्षों के बाद आता है । इसलिए भी लोगों का विश्वास ज्यादा ही प्रखर होता है । महाभारतकालीन पाण्डवों के अज्ञातवास से सम्बद्ध स्थल होने का दावा यहां के संस्कृतिकर्मी करते रहे हैं । लिच्छवीकालीन राजा मानदेव के समय से मकर मेला का प्रारंभ मानने वाले यहां के निवासी पनौती क्षेत्र में वासुकीनाथ का निवास होने को ध्रुव सत्य समझते हैं और इसीलिए ढेकी व जांता का काम यहां नहीं किया जाता है । जनविश्वास है, इससे वासुकीनाथ को चोट पहुंचेगा । एक ही पत्थर पर बना होने के कारण भूकम्प का झटका नहीं लगना भी जनविश्वास में है ।
कोई भी सामान की बिक्री विक्रेता के कुशल व्यवहार, प्रस्तुति पर निर्भर करता है । पनौती का बारह वर्षका यह मकर मेला के प्रति का आकर्षा का कारण यहां के निवासियों का अपनी धरती प्रति के अगाध प्रेम व श्रद्धा ही माना जाना चाहिए । अपने यहां के धार्मिक, पुरातात्विक सामग्रियों का ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच पहुंचा सकने का जो उन्माद स्थानीय वासियों का है वह काबिले तारीफ है । जब मैं पनौती में था-वहांं के पर्यटन विकास के लिये प्रतिबद्ध संस्था के स्वयंसेवक प्रवेश का फार्म भरवाते थे, पनौती सम्बन्धी छपी पुस्तक बेचते थे । अतिथियों का आदÞरपर्ूवक स्वागत करते थे । एक छाप छोडÞते रहते हैं स्वयंसेवक सब । यह भी एक विशेषता मानना चाहिये । पनौती क्षेत्र में उपलब्ध पत्थर की मर्ूर्तियां कितनी पुरानी है, यह पुरातत्वेत्ता लोग ही बता पाएगेंे, शायद वहां जाने वाले इसलिये भी नहीं जाते हैं कि मर्ूर्तियां देखें । जाने का एक ही मकसद है- धार्मिक पर्यटन । पाण्डव के गुप्तवास से सम्बन्धित स्थलों का निरूपण और यहां के संगम व अन्य स्थानों का प्राचीन धार्मिक कथाओं से सम्बद्धता का पुरजोर प्रस्तुतीकरण । इस क्षेत्र में मंदिरो का जाल बिछा हुआ है । शिव मंदिर, कृष्ण मंदिर, राम-सीता मंदिर, हनुमान, र्सर्ूय, सरस्वती उन्मत्त भैरव, आदि का मंदिर हैं । सभी के प्रति अपनी-अपनी आस्था है । लोग जाते हैं । मन में आयी इच्छाओं को वहां व्यक्त कर खुद को हल्का महसूस करते है । ध्यान देने की बात है कि पनौती जाने वाले स्थानीयवासी ही बहुसंख्यक होते हैं । पहाडी क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन के लिये उपयुक्त स्थान के रूप में ऐसे स्थानों का विकास तेजी से हो रहा है । काठमाण्डू से निजी गाडी से एक घंटा व र्सार्वजनिक यातायात से दो घंटा में पनौती पहुंचा जा सकता है । पनौती जाने वाली निजी सवारियां रास्ते में ही रोक कर चन्दा वसूलने वाले लोगों के बारे में पत्र-पत्रिकाओं मंे अच्छी खासी टिप्पणीयां देखने को मिलती है । इस पर गंभीरता से विचार करना ही होगा । जहां तक तर्राई क्षेत्र के धार्मिक स्थलों का प्रश्न है, उसे स्थानीय नागरिक उचित रूप से आगे नहीं ला सके हैं । यही मकर मेला जनकपुर धाम से सटा उत्तर-पर्ूव १७ कि.मी. में अवस्थित धनुषाधाम में भी माघ में एक महीना तक चलता हैै । पर उसके बारे में राष्ट्रिय पत्र-पत्रिका कुछ लिखना जरूरी नहीं समझते । प्रत्येक रविवार लगने वाला मकर मेला बहुत बडÞा व विश्वास से परिपर्ूण्ा होते हुए भी उसके बारे में वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् कुछ भी नहीं कर पा रहा है । न कोई साहित्य, न कोई फोटो, न कोई विकास समिति । परिणामतः धार्मिक पर्यटन का यह महत्वपर्ूण्ा गन्तव्य पीछे पडÞता जा रहा है ।
र् पर्यटन विकास बोर्ड डालर प्राप्ति को ही पर्यटन विकास समझता है । वहां मधेश का कोई प्रतिनिधि नहीं होता है, परिणामतः तर्राई के संभावित पर्यटन स्थलों के बारे में खुलकर बहस नहीं हो पाता । और वहां के स्थल उपेक्षित रह जाते हैं ।
पनौती के बारे में जिस तरह का प्रचार अभियान चलाया जाता है, और जिसके बदौलत यात्रीगण वहां तक जा पहुंचते हैं, यह इल्म तर्राई वाले संस्कृति प्रेमी भी लगा पाएं तो अपनी बनी बनायी, इतिहास व शास्त्रों द्वारा स्थापित धार्मिक पर्यटन केन्द्र सैलानियों के अकार्षा केन्द्र बन सकते है ।

प्रकृति संरक्षण हक या दायित्व ::पुष्पा ठाकुर

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

नेपालअपने प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के लिए विश्व में प्रसिद्ध है । नेपाल में ८ हजार ८ सौ ४८ मीटर ऊँचाई वाला विश्वप्रसिद्ध सगरमाथा, सगरमाथा से लेकर ६३ मीटर समतल भू-भाग, हिमाल पहाड एवं तर्राई क्षेत्र है जहाँ नदी-नाला, वन-जंगल, ताल, सिमसार और खान जैसे प्रकृतिक स्रोतों का भण्डार है । इन प्राकृतिक स्रोतों का सदुपयोग एवं संरक्षण न सिर्फसन्तुलन के लिए भी अत्यावश्यक है । बढÞती हर्इ जनसंख्या, विकास के क्रमानुसार बढÞती हर्इ ऊर्जा का उपभोग तथा प्राकृतिक वातावरण में नकारात्मक कारणों से विश्व के देशों में प्राकृतिक-स्रोतों में दिनों-दिन ह्रास होता जा रहा है । भौतिक विकास के साथ विकसित देशों में जैविक विविधता नष्ट होने के क्रम में है जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें कम विकासशील देशों पर जहाँ जैविक विविधता संरक्षित है, निर्भर होना पडÞ रहा है ।
इस समय पृथ्वी पर लगभग एक करोडÞ चालीस लाख पेड-पौधे और जीव प्रजातियाँ है जिनमें से १५ से ३६ प्रतिशत प्रजातियों का जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम के कारण २०५० तक विलुप्त हो जाने का खतरा है । एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि २०५० तक आस्ट्रेलियाँ में पाये जानेवाले जंगली डैगन की २० प्रतिशत प्रजातियाँ, यूरोप के मैम्पाई, मैक्सिको के जिको, मूषक-हिरन, दक्षिण अप्रिmका के राष्ट्रीय-पुष्प किंग प्राटी और इसी से जुडी एक अन्य प्रजाति के फूल-विरोला सेबीफेरा, स्काटलैंड में पायेजानेवाले वृक्ष स्काटिश क्रासबिल सहित अनेक प्रजातियाँ नष्ट हो जायेगें ।
अंतर्रर्ााट्रय वैज्ञानिकों का मानना है कि इस समय दुनिया को आतंकवाद के साथ जो सबसे बडÞा खतरा झेलना पडÞ रहा है, वह ग्लोबल वार्मिग है । ग्लोबल-वार्मिग के कारण ही पृथ्वी का सतह का तापमान निरन्तर बढÞ रहा है । इसमें कोई शक नहीं है कि अंर्टार्कटिका के अलावा किलिमंजारो पर्वत की बर्फीली चोटियों केा १५ प्रतिशत पिघला देने, गंगोत्री ग्लेशियर को आठ मीटर पीछे खिसका देने और १९७२ के बाद से वेनेजुएला स्थित छह हिमनदों -ग्लेशियर्स) में से चार को पूरी तरह से समाप्त करने जैसे अनेक मामलों में ग्रीन हाउस इफेक्ट से उपजी ग्लोबल वार्मिग का ही हाथ है जिसमें बहुत बडÞा हाथ विकसित देशों का है । पर्ूवजांे ने हमें निर्मल, स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण प्रदान किया परन्तु, हम अपने सन्ततियों को विरासत में क्या देना चाहते हैं – विभिन्न स्थान में जल तथा वायु-प्रदूषण, वन-विनाश, जैविक विविधताओं का विनाश, गैडा तथा बाघ जैसे अद्भूत प्राकृतिक सम्पदा का बढÞता ही जा रहा नाश के प्रति अभी भी सचेत नहीं हुए है तो अपूर्णर्य क्षति उठाने के साथ प्राकृतिक सन्तुलन बिगडÞने से सम्पर्ूण्ा मानव-जाति को इसके दृुष्परिणामों को भुगतना पडÞेगा । अतः प्रकृति तथा जीव अविच्छन्न रूप से अपने अस्तित्व कायम रखने का नैर्सर्गिक हक मौलिक हक में समावेश करना वर्तमान तथा भावी पुस्ता के हित के लिए आवश्यक है । नेपाल संघीयता में प्रवेश करने जा रहा है । अतः प्राकृतिक स्रोत सम्बन्धी स्पष्ट एवं सवैधानिक व्यवस्था होना अत्यन्त आवश्यक है । प्राकृतिक स्रोत के रूप में नेपाल में लगभग ६ हजार से ज्यादा नदी-नालाएँ है जिनमें ८३००० ःध् विद्युत्त उत्पादन की क्षमता है । २५००० से ४२००० ध तक विद्युत उत्पादन करने की आर्थिक रूप से सफल योजनाएँ है । अभी तक सिर्फ५५२ ःध् तक विद्युत की बढÞती ही जा रही माँग के कारण उत्पादन एवं आपर्ूर्ति के बीच बहुत बडÞा फासला उत्पन्न हो गया है जिसके कारण लोड-शेडिग बढÞता ही जा रहा है । एक अध्ययन के अनुसार २०२र्०र् इ.तक विद्युत डिमाण्ड १८२०ःध् हो जायेगी जिसकी आपर्ूर्ति के लिए सही नीति और योजनाएँ आवश्यक है । सही नीति और योजनाओं के सफल कार्यान्वयन से नेपाल न सिर्फअपनी विद्युत की आवश्यक्ताओं को पूरा कर सकता है । अपितु दक्षिण एशिया के देश के विकास में आवश्यक विद्युत की आपर्ूर्ति कर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकता है । नदी-नालाएँ अपने उद्गम-स्थल से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों को पार करते हुए पडÞोसी देश तक प्रवाहित है । अतः इस पर अधिकारों के बँटवारे में संकुचित दृष्टिकोण रखना उचित नहीं होगा । क्षेत्रीय अखण्डता के सिद्धान्तानुसार राष्ट्र के भीतर के जल का प्रयोग अपनी आवश्यकता एवं इच्छानुसार कर सकते हैं परन्तु तटीय सिद्धान्त है नदी के पानी का गुणात्मक रूप से नहीं घटाते हुए प्रवाह करने देना । बाढÞ से सुरक्षा, ऊपजाऊ जमीन को मरुभूमि होने से बचाने का दायित्व, उच्च बाँधों का निर्माण जिससे विद्युत के साथ सिंचाई का समुचित प्रबन्ध जैसे दायित्वों को पूरा करने के लिए जल जैसे प्राकृतिक स्रोत पर स्थानीय समुदाय, प्रान्त एवं राज्य का कैसे एवं कितना अधिकार हो गम्भीर विषय है । इसके साथ ही प्रदूषण एवं पानी के गुणस्तर में होते जा रहे ह्रास का दुष्परिणाम भोगनेवाले आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछडÞे समुदाय के प्रति जबाबदेहिता पर गहन विचार करना होगा ।
नेपाल के प्राकृतिक स्रोतों में से एक बहुत बडÞा स्रोत है वन-जंगल । नेपाल के कुल भू-भाग का ३९% वन जंगल है जिन्ामें बहुमूल्य काठ, दर्ुलभ जीव-जन्तु के साथ ही पूरी मानव जाति के कल्याणार्थ उपयोगी १०० से अधिक जाति के औषधीय गुणों से युक्त पौधें एवं जडÞी-बुटियाँ हैं । ३०० की जाँच भी की जा चुकी है और कुछ का विभिन्न देशों में औषधि-निर्माण हेतु निर्यात भी हो रहा है । इन औषधीय गुणोंवाले पौधे एवं जडÞी-बुटियों का उत्पादन, संरक्षण एवं प्रशोधन करने की क्षमता का विकास कर सके तो नेपाल को अपार आर्थिक लाभ हो सकता है क्योंकि प्रकृति के वरदान स्वरूप नेपाल के एक तरफ एक अरब से ज्यादा की आबादी वाला देश भारत है तो दूसरी तरफ सवा अरब की जनसंख्या वाला देश चीन है जिसका फायदा व्यापारिक एवं व्यावसायिक रूप से नेपाल उठा सकता है । हिमालियन रैज में पाये जानेवाली औषधीय गुणों वाली जडÞी-बुटियाँ प्रकृति की ओर से नेपाल को एक अनुपम उपहार प्राप्त है । इन पर किसका कितना और क्या अधिकार हो, इसके लिए वृहत दृष्टिकोण अपनानी होगी । जमीन भी प्राकृतिक स्रोत है पर इस पर सम्पति के रूप में व्यक्ति का अधिकार होने के कारण राज्य के द्वारा र्सार्वजनिक प्रयोग के लिए लेने की अवस्था में मुआवजा देना पडÞता है । नेपाल के कुल क्षेत्रफल का १८% जमीन कृषि योग्य है । १५% प्रतिशत तर्राई में और ३% पहाडÞ में जिनमें देश की कुल ८०% जनता आधारित है । कृषि पर आधारित अधिकांश कृषक गरीब एवं भूमिहीन है । भूमिसुधार के नाम पर जमीन आबंटित करने का कार्य भी विगत के शासकों ने किया परन्तु कोई र्सर्वे या आंकडÞा उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि इससे कितना फायदा हुआ है । लुभावने नारों से अशिक्षित एवं गरीब जनता को भ्रमित करते हुए बार-बार के भूमि विखण्डन से कृषि उत्पादन में होते जा रहे ह्रास से खाद्यान्न के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता बढÞती ही जा रही है । भूमि विखण्डन के बजाए समुचित सिंचाई व्यवस्था कर सामूहिक खेती, सहकारी खेती या सामुदायिक खेती अपनानी होगी तथा भूमि की पहचान कर वैज्ञानिक खेती द्वारा अन्न खेती, फल-फूल खेती, चाय-काँफी खेती तथा तरकारी खेती जैसी खेती करनी होगी जिससे कृषि को लाभदायक बनाते हुए सिर्फकृषक की स्थिति सुधारनी होगी, खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनना होगा । कृषि योग्य भूमि को बंजर रखनेवालों के लिए दण्ड का प्रावधान अपनाने होगें एवं गाँव के बेरोजगारों के लिए रोजगार के उपाय खोजने हांेगे ।
प्राकृतिक स्रोत के रूप में नेपाल के खानों का उत्खनन् करना होगा और सभी प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण, सदुपयोग तथा लाभ का समन्यायिक वितरण करने के साथ वातावरणीय सन्तुलन में ह्रास या क्षति पहुँचानेवाले से क्षतिपर्ूर्ति लेने का प्रावधान समावेश करना उचित होगा, जिससे ऐसे व्यक्ति वर्ग या समुदाय को निरुत्साहित करने के साथ ही वातावरणीय क्षति से अन्याय एवं पीडिÞत होनेवाले व्यक्ति, वर्ग या समुदाय को भी न्याय प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा ।

पत्रकारिता की दुकानदारी::पंकज झा

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

ऐक अटपटा सवाल आपसे पूछता हूँ, क्या आप ऐसा विमर्श पसंद करेंगे जिसमें मुद्दा यह हो कि बलात्कार होना चाहिए या नहीं – या बहस का विषय यह होगा कि बलात्कारियों की सजा मृत्युदंड हो या आजीवन कारावास- निश्चय ही आपका विकल्प दूसरा होगा । परंतु राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया विशेष के कुछ टुच्चे सदा इसी फिराक में उलझे रहते हैं कि नक्सलवाद को कैसे जस्टिफाई किया जाये या जिन कंधों पर उसके सफाये की जिम्मेदारी है या जिन स्थानीय कलमकारों ने अपने हाथों नक्सलियों को बेनकाब करने का बीडा उठाया है उसको कैसे बदनाम किया जाए । भले ही टूटता रहे जेल, होते रहे नरसंहार । इन्हें तो बस विमर्श और अपनी दुकानदारी से मतलब है ।
आजादी के आन्दोलन से लेकर देश के नवनिर्माण की प्रक्रिया में लोकतंत्र के साथ कदम से कदम मिला कर चलने की शानदार परंपरा वाले देश में कलम के कुछ दुकानदार इस तरह उच्छृंखल हो जाएंगे, विश्वास नहीं होता। सामान्य सी बात है, किसी भी विमर्श को जन्म देने का मतलब होता है कहीं न कहीं दोनों पक्ष को वैचारिक धरातल प्रदान करना । कहीं न कहीं उसे मान्यता प्रदान करना । और निश्चय ही उस प्रदेश में जहाँ आतंकियों ने लोगों का जीना हराम कर दिया हो, जहाँ खून की नदी बह रही हो वहाँ आप विमर्श करने बैठ जायें इसे कैसे बर्दाश्ात कर सकता है लोकतंत्र-ना केवल विमर्श करने बैठ जाए अपितु झठू पर झूठ गढ कर नक्सलियों की गोली के आगे सीना तान कर खडे चुनी हरुइ सरकार के साथ-साथ प्रादेशिक मीडिया के लोगों को बिकाऊ और दलाल कहने का दुस्साहस करें, क्यों नहीं आप के ऐसे जुबान को हलके से बाहर ना निकाल लिया जाय-
आज जब आजिज आकर राजधानी के प्रेस क्लब ने ऐसे लफंगों का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया है तो कृपया इसकी पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास कीजिये । क्या आपने कभी वीरप्पन का कोई आलेख देश के किसी कोने में पढा था- कभी खूनी जेहाद को वैचारिक आधार प्रदान करने वाला अफजल का कोई आलेख आपने किसी पत्रिका में देखा कभी- लेकिन ऐसा छत्तीसगढ में होता था । सदाशयता, भोलापन या अपरिपक्वतावश अपने लोगों की लाख आलोचना झेल कर भी प्रदेश के कुछ मीडिया समूह दर्ुदांत नक्सलियों किसी कथित गुरुसा उसेंडी, किसी कोसा को ससम्मान जगह देते थे । और तो और ऐसे प्रतिबंधित किये गए लोगों के आलेख का जब।ब खुद प्रदेश का पुलिस महानिदेशक आलेख लिख-लिख कर देता था। जिसकी आलोचना इन पंक्तियों के लेखक सहित बहुत से लोगों ने की थी। यहाँ के अखबारों में इन अभागों के ऐसे-ऐसे आलेख छापते थे जिसमे भारी बहुमत से बार-बार चुनकर आने वाले किसी मुख्यमंत्री को ऐसा राक्षस बताया जाता था जो “मर भी नहीं रहा है” जबकि लोकतंत्र की हत्या करने को अपना ध्येय बताने वाले कथित “गुरुसा उसेंडी” को “साहब” संबोधन देकर सलाम पहुँचाया जाता था। नक्सलियों की मदद करने के आरोप में जेल में बंद और पकडे जाने पर जेल में ही मोबाइल सिम गटक जाने वाले सान्याल जैसे लोगों को “श्री” का आदरणीय संबोधन दिया जाता था ।
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का लिहाजÞ कर जितना इन लोगों का प्रदेश का हर मंच इस्तेमाल करने दिया गया, ऐसा कोई उदाहरण आपको देश में दूसरा नहीं देखने को मिलेगा। कÞानून, लोकतंत्र और सभ्यता की कीमत पर भी किये जाने वाले किसी भी विमर्श में इतने से सवालों का जबाब भी नहीं दे पाए ये अभागे कि आखिर वो किस मांग के लिए अपना आन्दोलन चला रहे हैं और यहाँ के गरीब आदिवासियों ने उनका क्या बिगाडÞ लिया है। लोकतंत्र के र्समर्थक बुद्धिजीवियों ने इस पर कई बार दबाव बना कर
अभिव्यक्ति के इन लुटेरे सौदागरों की पडÞताल करना शुरु किया तो सच प्याज के छिलके की तरह परत-दर-परत उधरना शुरु हो गया। शुरुआत यहाँ से हर्ुइ कि “गुरुसा उसेंडी” जिसका परिचय नक्सलियों की कमिटी का प्रवक्ता कह कर दिया जाता था वो भिलाई के सुविधाजन फ्लैट में रहने वाला आन्ध्र प्रदेश का कोई”रेड्डी” निकला। इसी तरह नक्सलियों के पक्ष में लिखने वाले एक नियमित स्तंभकार के रिपोर्ट को क्राँस चेक किया गया तो उसकी दी हर्ुइ सभी जानकारी झूठ का पुलिंदा निकली । पता चला कि ढेर सारे आदिवासी उपनाम का इस्तेमाल कर और सरकारी गजÞट में आदिवासी गाँव का नाम खोज-खोज कर वह स्तंभकार अपनी रिपोर्ट ऐसे बनाता है जैसे हर जगह वर्षो तक वो उपस्थित रहा हो। इस तरह इनके पोल खुल जाने के बाद जब उनके हर रिपोर्ट को कम से कम राज्य में संदेह की नजÞर से देखा जाने लगा, तो अपनी दुकानदारी इन्हें बंद होती महसूस हर्ुइ और फिर ऐसे लोग प्रदेश को बदनाम करने के लिए पिल पडÞे । रायपुर के प्रेस क्लब में ऐसे उचक्कों के प्रवेश को प्रतिबंधित किये जाने की पृष्ठभूमि यही है। अन्यथा जैसे कि उपरोक्त उद्धरणों से आप समझ गए होंगे कि प्रचलित मान्यताओं से एक कदम आगे जाकर छत्तीसगढÞ ने अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सम्मान हेतु खुद को आत्मार्पित किया है ।
चीजें कई है, यदि उपरोक्त को छोडÞ दिया जाय तो भी यह निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि प्रदेश के समाचार माध्यमों ने बहुधा अपने सरोकारों में कई राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया को पीछे छोडÞ दिया है । आप देखेंगे कि देश के किसी अन्य जगह आतंकी हमला होने पर सारे दृश्य-श्रव्य मीडिया का दिन भर का विषय वही रहता है लेकिन बस्तर में ५० निरीहमार दिये जायें तो सभी राष्ट्रीय चैनल एक कोने या ज्यादा-से-ज्यादा डेढÞ मिनट का पैकेज देकर छुट्टी पा जाते हैं या कई बार दिल्ली में किसी लडÞकी की आत्महत्या करना भी छतीसगढÞ के दर्जÞनों जवानों की शहादत पर भारी पडÞ जाता है। तो राष्ट्रीय मीडिया की बात वे लोग जाने किन्तु कुछ उपरोक्त वणिर्त उच्छृंखल समूहों से ज्यादा उपलब्धियों भरा रहा है प्रदेश के माध्यमों का सफÞर । बात-बात में शुरु किये गये छत्तीसगढÞÞी भाषा का दोस्ताना आंदोलन एक उदाहरण है जिसमें कमोवेश सभी अखबारों ने जनमानस को स्वर दिया और यह मीडिया का ही साफलता कहा जाएगा कि इतनी आसानी से छत्तीसगढÞÞजनों को अपना प्राप्य प्राप्त हो सका । इसी तरह शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने में भी अखबारों की भूमिका उल्लेखनीय रही है और इसमें भी खासकर छोटे-छोटे एवं आंचलिक अखबारों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । इसके अलावा सरकार के किसी घपले-घोटाले को भी उजागर कर यहाँ के मीडिया ने लोकतंत्र को मजÞबूत किया है । यहाँ के एक छोटे से अखबार ने “धान घोटाले” का उद्भेदन कर सरकार की नाक में दम कर दिया था ।
तो अभी भी कम से कम छतीसगढÞ का मीडिया खÞबरों की चूहा-दौडÞ में शामिल होने से बहुत हद तक बचा हुआ है । मोटे तौर पर हम प्रदेश के ऐसे समाचार माध्यम की कल्पना करते हैं जो मानवाधिकारवादियों की आंख में आंख डाल के पूछ सकें कि क्यों भाई केवल मुट्ठी भर नक्सलियों का ही मानवाधिकार है – रानीबोदली के दर्जनों पुलिसवाले या र्एराबोर की बच्ची ज्योति कुट्टयम को जीने का अधिकार नहीं – जाब्बाजÞ पुलिस अधिकारी विनोद चौबे समेत मदनबाडÞा में शहीद हुए उन ३० पुलिस जवानों को जीने का अधिकार ज्यादा था या गुरुसा उसेंडी का – वो माओवादियों से साहस के साथ सवाल पूछे कि लोकतंत्र से उतनी ही नफरत है तो नेपाल में क्यों लोकतंत्र के लिए लडÞ रहे थे- वामपंथियों से पूछे कि नंदीग्राम में नक्सली का बहाना कर लोगों को मार रहे हो तो बस्तरों में क्यों उनका मनोबल बढÞाने पहुँच जाते हो – गुरुदास दासगुप्ता से पूछे कि भाई सिंगुर में टाटा सही है तो बस्तर में कैसे गलत हो गया – अपने भाई बंधुओं, पत्रकारों से भी पूछे कि विज्ञापनदाताओं का पैसा इसलिए है कि आप नराधमों का महिमा मंडन करें- और हाँ सरकार से भी बार-बार इस बात को पूछने का साहस करें कि क्या आपने जनता से किये अपने संकल्पों को पूरा किया – नेपोलियन कहा करता था हजारों फौज से मुझे कोई डर नहीं लगता, लेकिन एकर् इमानदार पत्रकार को देखकर मेरी घिघ्घी बंध जाती है । अपने ही बिरादरी के कहे जाने वाले कुछ नराधमों के खिलाफ खडेÞ होकर प्रदेश के मीडिया ने ऐसे हर्ीर् इमानदारी का परिचय दिया है ।

उठता विवाद::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

binaमंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते समय कोई सवारी साधन नहीं मिल रहा था । पुछताछ करने पर पता चला की सभी सवारी साधन बारा जा रहे थे । बडी मुश्किल से एक बस में नवलपुर तक के लिए सीट मिल सकी । जब बस के अन्दर घुसी तो वहाँ नजारा ही कुछ और था । यात्रियों के साथ-साथ बस विविध पशु-पक्षियों से भरा हुआ था यहाँ तक की बस के डिकी में भी बकरियाँ ही बकरियाँ थी । एक सहयात्री से पूछने पर पता चला कि ये लोग गढी माई मेला में भाग लेने जा रह हैं और अपने साथ लेकर जा रहें पशु-पक्षियों को माता को बलि चढÞायेगें । यह दृश्य केवल नेपाल के एक जिले की नहीं, बलकि मंसिर ७-८ गते को तर्राई के सभी क्षेत्रों में खचाखच लोगों से भरे सवारी साधन में सवार होकर बेतहाशा बारा की ओर चले जा रहें हैं यहाँ तक की विदेशों भारत, बंगलादेश से भी बडी संख्या में भक्तजन गढीमाई के इस पंच वषर्य मेला में सहभागी हुए और अपनी मनौती पूरा होने के उपलक्ष्य में विविध जीव-जन्तुओं को बलि चढायें । एक अनुमान के अनुसार, इस प्रकार मेला में आने वाले भक्तजनों की संख्या ४५ लाख थी और लगभग ५ लाख पशु-पक्षियों को माता को बलि दी गयी ।

प्रत्येक पाँच वर्षों पर बारा जिले के प्रसिद्ध गढी माई मंदिर में एक महीना तक मेला का आयोजना किया जाता है । इस एक महीना तक चलने बाले मेला में दो-तीन दिन माता को बलि चढाने का दिन निर्धारित होता है जो कि इस बार मंसिर ९-१० गते को था । पाँच वर्षके भीतर माता के नाम पर अपनी इच्छा पर्ण् होने पर लोग माता को बलि चढाने की मनौती मानते हैं और मनौती पर्ूण्ा होने पर पाँच वर्षपश्चात लगने वाले मेला में जाकर बलि के लिए माने हुए पशु-पक्षियों को बलि चढÞा कर अपनी मनौती का पूर्ण्हुति करते हैं ।

गढी माई मंदिर के मूल पुजारी मंगल चौधरी के घर में तांत्रिक विधि-विधान से रात्रि काल में पूजा किया जाता है जिसके पश्चात गढÞी माई मंदिर के निकट स्थित बड्डस्थान में एकाएक दिया जल उठती है, उसके पश्चात बलि देने का कार्यक्रम शुरु होता है ।
परम्परा के अनुसार, सबसे पहले गढी माई को पंचबलि चर्ढाई जाती है । उस में भी र्सवप्रथम एक श्वेत चूहा -जंगली), उसको बाद क्रमशः कबूतर, सुअर, बकारा तथा भैंसा की बलि देने की परम्परा है । पंचबलि दिये जाने के बाद हाथों में तेज हथियार जैसे खड्ग, तलवार लिये लोग बलि के लिए लाये गये जनावरों के भीड में घुसकर अंधाधुन्ध उनकी बलि चढाने लगते हैं फलतः जानवरों में डर के मारे भगदड मच जाती हैं । यह दृश्य भी युद्ध भूमि के दृश्य से कम प्रतीत नहीं होता है । इस बार २५० व्यक्तियों को मेला समिति ने बलि के लिये लाये गये पशु-पक्षियों को काटने हेतु नियुक्त किया था ।

बलि चढाने के लिए २ किलो मीटर क्षेत्र में बधशाला का निर्माण किया गया था । बलि चढाये गये जानवरों के सिर को मंदिर के नजदीक स्थित बनाये गये गढे में डालने की व्यवस्था की गयी थी । बलि चढÞाये जाने के कारण वहाँ के आस-पास का क्षेत्र रक्त की नदी में तब्दील हो गयी थी ।
मेला में देश-विदेशों से आये लोगों द्वारा बलि चढाने के लिए तांता लगा हुआ था । भारत के बिहार राज्य के एक व्यक्ति ने तो १५० भैसा का बलि माता को चढाया । इस बार पिछली बार की तुलना में ज्यादा बलि चढाया गया ।

बलि चढाये गये जानवरों का मांस को देश के विभिन्न भागों में खाने के प्रयोजन के लिए भेजा जाता है । इसके लिए ठेका-व्यवस्था की जाती हैं । इस बार दलितों के विरोध के कारण राजधानी काठमांडू में भैंसा का मांस नहीं जा सका ।
गढÞी माई में विविध पशु-पक्षियों को धर्म के नाम पर बलि देने का कार्य संसार की सबसे बडी ‘र्सार्वजनिक बध’ की घटना है ।

वैसे केवल गढÞीमाई मंदिर में ही बलि नहीं दी जाती है बल्कि नेपाल के विभिन्न मठ मंदिरों में वर्षभर बलि दी जाती है । दक्षिण काली मंदिर में भी सालों भर मनौती के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि चढर्Þाई जाती है । दर्ुगा-काली आदि देवियों को ही नहीं विभिन्न भैरवों को भी रक्त चढÞाने की परम्परा देश के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है ।

नेपाल में पशु-पक्षियों की बलि केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं दी जाती हैं । मुस्लिम समुदाय में तो उनके धर्म ग्रन्थों के अनुसार, सच्चे मुसलमान के पाँच आवश्यक गुण में एक कर्ुबानी -बलि) को आवश्यक भी माना गया हैं । देश के अनेक आदिवासी जनजातियों तथा बुद्ध धर्मावलम्बियों में भी बलि प्रथा प्रचलित है । वैसे बुद्ध धर्म में अहिंसा पर जोर दिया गया है लेकिन तिब्बत के बुद्धिज्म तथा ब्रजयोगिनी बुद्ध देवियों को बलि चढÞाने की परम्परा है ।

हिन्दू धर्म में बलि प्रथा की शुरुआत कब-कैसे हर्ुइ स्पष्ट तौर पर कहा नहीं जा सकता । लेकिन वेद के पर््रवर्तक आर्य जाति एशिया विशेषकर कैस्पियन सागर के पर्ूव की ओर बढÞते हुए सिन्धु नदी तक पहुँच कर भारतीय उप महाद्वीप में आकर फैल गये । इस प्रकार ये जहाँ जहाँ फैले वहाँ वहाँ की धार्मिक मान्यता परम्प्ारा एवं प्रचलन को भी अपनाते गये । वेद में ‘जीव ही जीव का भोजन है’ की बात कही गयी हैं । हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ पुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी अश्वमेघ यज्ञ में ‘घोडा बलि’, ‘नागमेघ’ में र्सप बलि जैसे यज्ञों की चर्चा है । उसी प्रकार समय-समय पर राजा-महाराजाओं एवं ऋषि मुनियों द्वारा भी अपने अनुष्ठानों में बलि देने की परम्प्ारा का उल्लेख है । इतना ही नहीं हिन्दू धर्म ग्रन्थों में तो नरबलि का भी उल्लेख है । वरुणदेव द्वारा नरबलि चढÞाने का उल्लेख रामायण में सीता जी द्वारा वनवास जाने के समय सकुशल लौटने पर गंगा माँ को बलि की मनौती मानी गई थी । काठमांडू के नरदेवी मंदिर नरबलि के ऐतिहासिक प्रमाण हैं ।
भारत के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर एवं छिन्नमस्तिका मंदिर में भी र्सार्वजनिक रूप में वलि देने की परम्परा है वैसे भारत में र्सार्वजनिक बलि मंदिरों में देने पर कानूनी रोक लगा दी गयी है । जहाँ नेपाल में दर्ुगापूजा के अवसर पर हजारों जीव जन्तुओं को बलि दी जाती है वहीं भारत में दर्ुगार्जी की बडी-बडी प्रतिमाएँ बनाकर पूजा करने की परम्परा है । वैसे देवी काली जी के नाम पर भारत मंे भी बलि देने की प्रथा है लेकिन पश्चिम बंगाल के कलकत्ता के प्रसिद्ध दक्षिण काली मंदिर में बलि नही दी जाती हं ।

हिन्दू धर्म के शैव सम्प्रदाय जब तांत्रिक मंत्र में दीक्षित होता है तब शिव के भैरव रूप एवं काली रूप में पूजा करने पर पशु-पंक्षियों को बलि देने की परम्परा है । शाक्त सम्प्रदाय बल्रि्रथा पर जोर देता है, उनके धार्मिक विश्वास के अनुसार, जबतक देवी को रक्त नहीं चढÞाया जाता है तबतक उनकी पूजा पर्ूण्ा नहीं होती । वैसे कहा जाता है की शाक्त साम्प्रदाय में बलि को महत्व ज्यादा होने का प्रमुख कारण पूजा तंत्र पर आधारित है । तन्त्र में पंचमकार अनिवार्य है जिस के अर्न्तर्गत मांस एवं मछली चढÞाना ।

नेपाल के मंदिरों में बलि प्रथा प्रचलित होने के कारण पूजाविधि तंत्र शक्ति पर आधारित होना है । यही कारण हैं कि देश के अनेक मंदिरों में मांस, मछली, अण्डा तथा शराब वगैरह देवी-देवताओं को चढÞाया जाता है ।

परापर्ूवकाल में ही तांत्रिक पूजा विधान की परम्परा के अर्न्तर्गत बलि प्रथा चली आ रही है और इस सदियों पुरानी परम्परा का अचानक रोक पाना असम्भव है । यही कारण है कि इस बार के गढÞीमाई मेला में बलि पर रोक लगाने के राष्ट्रीय-अन्तर्रर्ाा्रीय सभी प्रयास बिफल हो गये लेकिन इसे पर्ूण्ा असफल भी नहीं माना जा सकता । इन प्रयासों ने जनता के भीतर एक सन्देश तो अवश्य ही छोडÞा है कि क्या अपनी इच्छापर्ूर्ति के लिए किसी और जीवों की हत्या करना कहाँ तक उचित है – सपना को आधार बनाकर देवी-देवताओं के नाम पर निरीह असहाय जानवरों को काटना प्रकृति के नियम ‘जीयो और जीनें दो’ को कहाँ चरितार्थ करता है – यह कैसे विश्वास करने योग्य बात हैं कि सृष्टिकर्ता भगवान अपनी सृष्टि के नाश से खुश होता होगा – सृष्टिकर्ता ने मानव का विकास मांसाहारी के रूप में नहीं बल्कि शाकाहारी के रूप में किया है । व्यक्ति के दाँत एवं उसकी पाचनक्रिया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ।

पंचवषर्ीय गढÞी माई मेला में र्सार्वजनिक बलि को रोकने के लिए डेढÞ-दो महीना पर्ूव से ही विभिन्न पशुकर्मी, विभिन्न संघ-संस्थायें, संत-महात्माओं जिसमें तपस्वी रामबहादुर बम्जन, नेपाल कृष्ण प्रणामी विश्व हिन्दू महासंघ, भारत के पशु अधिकारकर्मी मेनुका गाँधी प|mांसीसी अभिनेत्री ब्रिजिट बार्र्डोट तथा अन्य प्रबुद्ध समाज के लोगों ने सरकार तथा जनता से अपील की, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला । यद्यपि वाद-विवाद की स्थिति का सृजना अवश्य हुआ ।
यह सही है कि सदियांे से चली आ रही यह परम्परा या प्रथा एकाएक बन्द नहीं हो सकती । वैसे भी नेपाल की जनता का एक बहुत बडÞा वर्ग निरक्षर है उन में जनचेतना, जागृति की कमी है । वैसी स्थिति में युगांे-युगांे से चली आ रही धार्मिक परम्पराओं रीति-रिवाजों को एकाएक परिवर्तित करना या उनपर प्रतिबंध लगाना किसी भी सरकार या संघ-संस्थाओं के लिए अत्यन्त ही कठिन कार्य है । वैसे जो प्रयास इस दिशा में शुरू हुआ है वह स्वागत योग्य हंै और सही दिशा में सही लक्ष्य को लेकर किया गया कोई भी प्रयास कभी भी विफल नहीं होता । यह प्रयास निरन्तर जारी रहा तो एक दिन यह प्रयास इस दिशा में ‘मील का पत्थर’ साबित होगा ।

बलि-प्रथा पर रोक लगाने के सम्बंध में सबसे पहले सरकारी तौर पर एवं संघ-संस्थाओं के माध्यम से भी मठ-मंदिर के पुजारियों को शिक्षित करना होगा जिनकी बातों का सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण भोले-भाले जनता में होती है । इसके साथ ही, राजनीतिज्ञों, सामाजिककर्त्तर्ााें को भी अपने नीजी स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने सन्देशों, भाषणों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से बलि प्रथा के कारण उत्पन्न समस्याओं, दुष्परिणामों के प्रति जनता में जागृत्ति तथा चेतना फैलाना होगा । तभी असहाय, निरीह, अबोध पशु-पंक्षियोें के वध का सिलसिला रुक सकेगा ।

मांस खाने के नाम पर पशुओं को काटना एक अलग बात है लेकिन धर्म के नाम पर इस प्रकार का कृत्य कहाँ तक जायज हैं – मनौती माननी ही हैं तो फल-फूल-मिर्ठाई आदि सामग्रियाँ मानें, चढÞायें और प्रसाद ग्रहण करें । जिनका निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है उनका नाश करने का किसी को भी अधिकार नहीं हैं ।

लेप्रोस्कोपी कार्यशाला सम्पन्न::वरुणमाला मिश्रा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

barunmalaएडवांस लेप्रोस्कोपी र्सजरी विधि से आँपरेशन को लेकर पर्वाचल के विराटनर में जुटे चार देशों के सैकडों र्सजनों ने गत दिनों विराट हास्पीटल एण्ड रिर्सच सेन्टर में अपने-अपने अनुभव बाँटे । दो-दिवसीय अन्तर्रररीय कार्यशाला में नेपाल, भारत, जर्मनी व कजाकिस्तान के सैकों चिकित्सकों ने भाग लिया । वर्कशाँप कार्यशाला में लेप्रोस्कोपी विधि से आँपरेशन कर रहे डाक्टरों ने शल्य चिकित्सा की विभिन्न विधि-तकनीक एवं अपने अनुभवों का आदान-प्रदान किया । इस मौके पर एक दर्जन माहिलाओं के बच्चेदानी का सफल आपरेशन का लाइव टेलीकास्ट दिखाया गया । इस मौके पर विशिष्ट अतिथि के रूप में जर्मनी के वरिष्ठ र्सजन डा. एच. आर. टेनर्ेवर्ग सहित कजिकिस्तान के डाक्टर रूसलमसुले एवं भारत के दर्जनों र्सजन के अलावा चिकित्सक ज्ञानेन्द्रमान सिंह कार्की द्वारा आँपरेशन करने की विधि को दिखाया गया । इस आयोजन के संयोजक विराट हास्पीटल के चेयरमैन तथा स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. ज्ञानेन्द्रमान सिंह कार्की ने बताया कि इस अन्तर्रर्रीय वर्कशाँप का उद्देश्य शेयरिंग आँफ इक्सपेरियन्स है । एडवांस लेप्रोस्कोपी विधि से १५ हजार आँपरेशन कर चुके डाक्टर कार्की ने बताया कि इस विधि को बढÞावा देने एवं इसके लिए लोगों को जागरुक करने के लिए जन-जागरण की आवश्यकता है । डा. कार्की ने यह भी बताया कि बिना चीर-फाडÞ के इस आँपरेशन के कई फायदे हैं । इसमें चीर-फाडÞ नहीं किया जाता जिससे घाव में दर्द कम होता है । दर्द कम होने के कारण दवा कम लगती है और मरीज जल्द डिस्चार्ज हो जाते हैं । जिसके कारण मरीजों के परिजनों पर आर्थिक बोझ भी कम पडÞता है । जर्मन में एक ट्रेनर के रूप मे काम कर चुके डा. कार्की ने बताया कि लेप्रोस्कोपी विधि से सबसे पहले १९८७ मे पस के चिकित्सक डा. फिलिप मोरे ने पहला सफल आँपरेशन किया था ।

नेपाल में पहली बार मेडिकल क्षेत्र में नयी तकनीक के प्रयोग हेतु आमन्त्रण पर पंहुचे जर्मनी के वरिष्ठ र्सजन डा. टेनर्ेवर्ग ने बताया कि यह विधि कैंसर रोगियों के इलाज में भी कारगर है । उन्होने कहा कि पडÞोसी देश भारत सहित अन्य विकासशील देशों में इस विधि को तेजी से अपनाया जा रहा है । जर्मनी के गायनी एंडोस्कोपिक सोसाइटी के अध्यक्ष ५९ वषर्ीय श्री टेनर्वर्ग ने बताया कि चीर-फाड नहीं होने के कारण कैंसर रोगियों के बीच लेप्रोस्कोपी र्सजरी विधि बहुत प्रभावकारी साहित हो रही है । वरिष्ठ चिकित्सक टेनर्ेवर्ग ने कहा कि वे भारत के कई महानगरों मे आयोजित अन्तर्रर्रीय वर्कशाँप में भाग ले चुके हं । नेपाल के चिकित्सक भी इस विधि का प्रयोग करें इस से वे नेपाल दौरे पर पहुँचे हैं । दो दिनों तक चले मेडिकल के नये तकनीकी के पर््रदर्शन में कई वरिष्ठ र्सजन जिसमे क्रमशः डा. लता वी खडÞका, डा. सुनील कुमार, डा. राहुल आर्वे, डा. राजेन्द्र वैद्य, डा. जयंत शर्मा, डा. अनिल कुमार सहित दर्जनों र्सजन मौजूद थें । दो दिवसीय इस वर्कशाप का उद्घाटन पर्ूवाञ्चल विश्विद्यालय के उपकुलपति प्रो. डा. रामअवतार यादव ने किया जबकि मंच संचालन
डा.आष्दीप शर्मा ने किया ।

जनकपुर का अस्तित्व संकट में::डी जे.मैथिल

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

janaki-mandirजनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की राजधानी जनकपुर को अब तक विश्वस्तरीय पहचान नहीं मिल सकी है । यहाँ का जानकी मन्दिर आकर्ष और विश्व-प्रसिद्ध होते हुए भी विश्व सम्पदा सूची में शामिल नहीं हो सका है जो हैरत की बात है । जबकि काठमांडू उपत्यिका का भक्तपुर दरबार विश्व-संपदा सूची में है । जनकपुर के राजनेता और बुद्धिजीवी अपने भाषण-सम्बोधन में जानकी मन्दिर की चर्चा करते नहीं थकते । वे इसे मिथिला की शान के रूप में प्रस्तुत करते हैं लेकिन जानकी मन्दिर को विश्व सम्पदा सूची में शामिल कराने में अब तक ये राजनेता एवं बुद्धिजीवी असफल ही रहे हैं । अत्यधिक राजस्व देने वाली यह पौराणिक नगरी आज भी उपेक्षित है । जनकपुरधाम ५२ तालाब सहित विभिन्न ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है । यहाँ का धनुष सागर, गंगा-सागर, विषहरा पोखर, गोड धोई पोखर, दशरथ तालाब, इन्द्र सरोवर, सीता कुण्ड, राम तालाब एवं जनक कुण्ड आदि अतिक्रमण के चपेट में हं । इन सभी तालाबों का नामों-निशान मिटता जा रहा है । लेकिन इन सभी धरोहरों पर किसी की ध्यान नहीं है । जनकपुर के राममन्दिर की हालत भी दिन-प्रतिदिन बिगडती जा रही है । राममन्दिर की छत कभी भी धराशायी हो सकती है । राममन्दिर के महंथ राम गिरि मन्दिर की स्थिति को लेकर काफी चिन्तित हैं । यहा के कर्मचारी सरकार से पैसा तो लेते हैं लेकिन अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं हैं । यहा पचासों वर्षपुरानी नियमावली आज भी लागू है जो अनुचित है । वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र परिषद् की तरफ से राममन्दिर को पाँच लाख रूपये कुछ दिन पहले प्राप्त हुआ था लेकिन अब उसका कोई अता-पता नहीं है पूछे जाने पर महंथ राम गिरि कहते है कि मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं हैं ।

जनकपुर में रेलवे की भी स्थिति खराब है । हमेशा यहाँ रेल का डिब्बा पटरी से उतर जाता है जिससे यात्रियों में भय बना रहता है । नेपाल सरकार ने जनकपुर रेलवे का नाम तो बदलकर नेपाल रेलवे कम्पनी लिमिटेड कर दिया लेकिन रेलवे में विकास एवं सुधार की चिन्ता सरकार को नहीं है । रेलवे के अध्यक्ष तथा यातायात व्यवस्था कार्यालय जनकपुर के प्रमुख जमुना पंजियार आजकल सिर्फकर्र्सर्ंभालने में व्यस्त हैं । रेलवे की व्यवस्था व विकास के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि हम अकेले क्या-क्या करें – जनकपुर की सडÞक व्यवस्था भी जर्जर है । सडÞकों पर कूडेर्-कर्कट के ढेर लगे हैं । इन सडÞकों पर सवारियों की कौन कहें पैदल चलना मुश्किल है । नगरपालिकाकर्मियों को साफ-सफाई की चिन्ता नहीं है । विकास के नाम पर मौन, जिला विकास समिति भी सरकारी धन के बन्दरबाट में लगी है ।

कुल मिला कर जगत जननी माता सीता की पवित्र जन्मस्थली पौराणिक मिथिला राज्य की राजधानी जनकपुरधाम समस्याओं के मकड जाल में उलझकर रह गयी है । जनकपुर की स्थिति को देखकर यह लगता है कि राम-जानकी स्वयंवर का प्रत्यक्ष गवाह बना यह पौराणिक शहर अब किसी सरकार या प्रशासन के भरोसे नहीं बल्कि भगवान श्रीराम एवं माता जानकी की प्रतिक्षा में है कि कभी न कभी श्रीराम यहाँ पहुँच कर इस पौराणिक नगरी का उद्धार जरूर करेंगे ।

बाल तेरा क्या कहना :फेशन

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

ईश्वर ने नारी को बडी उदारता के साथ सौर्ंदर्य का वरदान दिया है उसमें जुल्फों की अदा का क्या कहना….। जुल्फे खूबसूरती और तारीफ का पैमाना ही नहीं होती बल्कि ये व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान भी होती   है । बाल व्यक्ति के विचार, स्वभाव, व्यक्तित्व और उनकी जीवनशैली का आईना भी होते है ।
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आइए जानंे कि किस प्रकार बाल व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व को दर्शाते है -
घुंघराले बाल- घुंघरे बालो बांली महिलायें कलाकार स्वभाव की होती है । साहित्य-संगीत से उन्हंे बहुत लगाव होता हंै, ये ज्यादातर कल्पना के आकाश में उडÞान भरती रहती है । उन्हें मेहमाननवाजी का शौक होता है । औरो की तुलना में वे दो कदम आगे रहती हैं । इस प्रकार की महिलाये ‘जियो और जीनें दो’ के सिद्धात पर बहुत भरोसा करतीं हैं ।

लम्बें बाल- लम्बें बाल वाली महिलायें यर्थाथ के धरातल पर जीती है । कल्पना की दुनिया के बजाय यथार्थ अर्थात ठोस परिणाम वाले कार्य करना वे ज्यादा पसंद करती हंै । ये अपने कार्य में बिना शोर-गुल किये लगी रहती हैं । बातें कम और काम ज्यादा उनके जीवन का मूलमंत्र होता  है । परिस्थितियों पर विचार करके बोलना ये अच्छी तरह जानती है । पैसे की कीमत समझती हैं इसलिए हर चीज में किफायत करना उन्हें आता है । साथ ही ये बहुत व्यवहारिक भी होती हैं ।

पतले एवं कम बाल- ऐसे बालों वाली महिलायं मेहनत एवर्ंर् इमानदारी की रोटी पर पर्ण्तः भरोसा करती है । उनका मूलमंत्र है जो मिल गया उसी को किस्मत समझो जो खो गया उसपर पछतावा न करों । ये मुखर नहीं होती । ऐसे बालों वाली महिलायें कम रोमांटिक होती हैं और प्यार में अक्सर धोखा खाती है स्वभाव से शर्मीली ये बहुत सारे राज अपने सीने में दफन कर लेती हैं । उनका जीवन शांतिमय व्यत होता हैं ।

छोटे बाल- छोटे बालांे की स्वामिनी महिलायें बहुत मेहनती होती हैं कडे अनुशासन में रहना उनकी आदत होती है । उनका व्यक्तित्व कई बार दोहरा नजर आता है । प्यार और नफरत उनके भीतर बराबर विद्यमान रहता है । ये धोखेबाज नहीं होती । ये महिलाये स्पष्टवादी होती है फलतः लोग उन्हे घमंडी समझते हंै । ये थोडÞी स्वार्थी लेकिन अति-महत्वकांक्षी भी होती होती हैं । ये अपने हित के लिए हमेशा परेशान रहती है । पार्टर्हफिल उनके शौक में शामिल हैं । दोस्त बनाने में चुजी होती हैं ।

एक रोमांचकारी यात्रा- कनाडा की::पुष्पा ठाकुर

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

pushpa thakuकनाडा का वेन्क्युवर टोरेन्टो एवं मोनट्रेल के बाद तीसरा सबसे बडा शहर है । वेन्क्युवर २०१० के विंटर ओलम्पिक का मेजबान शहर है । इस शहर को मुझे देखने का मौका मिला तो अपार खुशी हर्इ ।

मै १९ घंटे के लम्बी हवाई यात्रा के पश्चात् वेनक्युवर पहुँची । यहाँ हमलोगों के रहने का इंतजाम टाइमस्क्वाइर सुइट में था । जो कि समुद्र के किनारे को बाँध कर बनाया गया है । यहाँ से वेनक्युवर शहर का अवलोकन आसानी से किया जा सकता है । किराये पर र्साईकिल लेकर या पैसेन्जर फेरी द्वारा भी वाल का चक्कर लगाया जा सकता है ।

वेनक्युवर में मैने स्काई ट्रेन में सवारी की जो कि अति तीव्र गति की थी और जिसमें २५० डालर में २ घण्टे की अवधि तक अपनी आवश्यकता एवं इच्छा अनुकूल सवारी की जा सकती है । इस शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में सी बस र्टर्मिनल, वाटर-पन्ट सेन्टर, वेनक्यूवर आर्ट गैलरी, गेस्ट टाउन, डाउन टाउन, चाइना टाउन, ग्रेन विल आइलैण्ड वेनक्यूवर ऐक्यूरियम तथा स्टेनली पार्क दर्शनीय है । इसके साथ हीं विभिन्न जाति-प्रजाति के पेडÞ-पौधों के साथ होल वृक्ष तथा एक हजार वर्षपुराना वृक्ष भी देखने योग्य है । वेनक्यूवर शापिंग माँल के लिए भी प्रसिद्ध हैं जहाँ विश्व के नामी ब्राण्ड वाली चीजें उचित मूल्य पर उपलब्ध है । कनाडा का तीसरा सबसे उँचा फाँल सेनामा है जिसे देखने हमलोग कोच से पहुँचें । उस सं आगे चलने पर स्नोफाँल शुरू हो गया और सडके बर्फसे ढक गई ।

स्नोकटर से सडको पर पडी बर्फको काटा जा रहा था उसके पश्चात् हमलोग स्की के लिए व्हीसलर के महशूर क्षेत्र में पहुँचें । हिम से अच्छादित इस क्षेत्र के मनमोहक दृश्यों को देखकर हमलोग मंत्रमुग्ध हो गये । यहाँ सैकडों सैलानी इस प्रकृति के मनोरम दृश्य को देखने में मग्न थे । काफी लोग स्की का अभ्यास भी कर रहे थे ।

अगले दिन हमलोग विक्टोरिया बी.सी. देखने के लिए फेरी पर सवार हुए । यह फेरी इतना बडÞा था कि इसमें २००० बस-ट्रक तथा कार एवं ४००० यात्री सवारी कर सकते है । छह मंजिला इस फेरी से डेढÞ घंटे की समुद्र की रोमांच भरी यात्रा हमने की । इसके पश्चात् बुचारट गार्डर्जिसे रोबट पिम बुचारट दम्पत्ति ने खुली लाइन स्टोन खान की सुन्दरता को उभारने के लिए बनाया था । इसमें बुचारट दम्पत्ति ने अपनी विश्व
यात्रा के दौरान इकट्ठा किये गये दर्बल झाडियों तथा पेड-पौधों के मिलन से निर्माण किया है जिसे ‘सन किन बाग’ के नाम से जाना जाता है । इस गार्डर्में रोज गार्डन जापानी गार्डन, इटालियन गार्डन तथा स्टार पौण्ड का निर्माण किया गया हैं । इस् बुचारट गार्डर्में रेस्टुरेन्ट एवं बाग तथा उपहार केन्द्र भी हैं । यहाँ प्रति दिन सैकडों सैलानियों का आगमन गार्डर्की सुन्दरता को देखने के लिए होता है । विक्टोरिया शहर रात के रोशनी में और भी आर्कषक लगता है । रोशनी में जगमगाता विक्टोरिया बी.सी. का पार्लियामेन्ट हाउस बहुत ही सुन्दर लग रहा था । यहाँ भारतीय खाना के शौकिन लोगों के लिए भारतीय रेस्टोरेन्ट भी है । विक्टोरिया में विश्व प्रसिद्ध वैक्स म्यूजियम भी है जहाँ विश्व के प्रमुख व्यक्तियों जैसे क्वीन विक्टोरिया, एलिजाबेथ, आब्राहम लिंकन, महात्मा गाँधी, पोप जान पाल कोलम्बस, बुद्ध, मार्टिन लुथर आदि महान हस्तियों की मूतियाँ है जो कि देखने में जीवंत प्रतीत होती है । म्यूजियम के पास ही ‘सी वर्ल्ड’ है और कुछ ही दूरी पर ब्रिटिश म्यूजियम भी है । हमलोगो ने यहाँ के थियेटर में फिल्म भी देखा । थियेटर का स्कीन ७० फीट ऊँचा और इतना ही चौडा भी था । पास स्थित म्यूजिम में कनाडा की सभ्यता को झलकाती तथा उसके विकास-क्रम को बडÞे ही चरणबद्ध ढंग से दर्शाया गया है ।canada

वषर्ा एवं समुद्री तूफान की आशंका से हमें उस दिन वेन्क्युवर जाने का कार्यक्रम रद्द करना पडÞा । अगले दिन सुबह ४ बजे ही हमलोग वेन्क्युवर के लिए चल पडंेÞ क्योंकि अब समुद्र शांत था । वेन्क्युवर से हाँगकाँग होते हुए हमलोग काठमांडू वापसी के यात्रा पर निकल पडÞें । इस अद्भुत रोमांचकारी यात्रा के अनुभव से यह अवगत हुआ कि किसी भी देश को पर्यटकों के अनुकूल बनाने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था करना अत्यन्त जरुरी है । जहाँ तक हमारे देश नेपाल की बात हैं तो २०१र्१र् इ. को पर्यटक वर्षके रुप में मनाने की तैयारी चल रही है लेकिन अभी तक हम उन बातों पर गंभीर नहीं है जो कि पर्यटकों के लिए अत्यन्त जरूरी है । जैसेः-
१. पर्यटन स्थलों को स्वच्छ, सुरक्षित एवं सुविधायुक्त बनाने की व्यवस्था ।
२. सेवामुखी ट्रेंड गाइड ।
३. उचित मूल्यों पर सुरक्षित पैकेज ।
४. देशी-विदेशी व्यंजनों वाले उचित मूल्य के रेस्टोरेन्ट की व्यवस्था ।
५.गृह उत्पादक वस्तुओं की अच्छी बाजार व्यवस्था ।
६. सभी क्षेत्रों में शौचालय की व्यवस्था ।
७. पर्यटकों के प्रति सम्मान भाव ।

इन आवश्यक बातों पर ध्यान देकर इनकी उचित व्यवस्था की जाये तो नेपाल भी विश्व के एक
प्रमुख पर्यटकीय देश के रूप में विश्व मानचित्र में जाना जायेगा और यह विदेशी मुद्रा आर्जित करने की स्रोत भी बन सकेंगा । साथ ही साथ इससे घरेलु पर्यटन को भी बढावा मिलेगा ।

काठमांडू में कबीर महोत्सव सम्पन्न::आभा झा

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

काठमांडू में ४ से ६ दिसम्बर २००९ तक भारतीय राजदूतावास और बी.पी. कोइराला भारत-नेपाल प्रतिष्ठान द्वारा तीन दिवसीय कबीर महोत्सव का आयोजन किया गया । इस कबीर महोत्सव का उद्घाटन भारतीय राजदूत महामहिम राकेश सूद के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ । अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने निर्गुण साधक महान् संत कबीर के जीवनी पर प्रकाश डाला ।

१५ वीं शताब्दी के निर्गुण निराकार मतानुयायी, रहस्यवादी एवं फकीर कवि कबीर के बिचारों में तादात्म्य स्थापित करने का महान अवसर नेपालवासियों को मिला । तादात्म्य स्थापित करने के कुछ दृश्य और श्रव्य साधन थे, श्रृंखलाबद्ध कबीर से संबन्धित फिल्म पर््रदर्शनी, भारत से आये लोक गीत गायकों द्वारा उदात्त एवं जीवंत सांगीतिक प्रस्तुति और विभिन्न विद्वानों द्वारा समूहगत परिचर्चा गोष्ठी प्रमुख रहे । कबीर के साखियों एवं बीजकों पर आधारित फिल्मों की पर््रदर्शनी, भारत से पधारे अतिथि लोक गीत गायकों की जीवन्त प्रस्तुति तथा समूहगत परिचर्चा के माध्यम से दर्शक, श्रोता, वक्ता, टिप्पणीकर्ता और ज्ञानी जिज्ञासु सभी के द्वारा युग परिवर्तनकारी कवि कबीर के उदात्त विचारों में समीक्षात्मक डुबकी लगाने की कोशिश की गई ।
कबीर के बीजक साखी जैसी कविताओं में छिपी वैचारिक क्रांति लाने की शक्ति के
साथ-साथ भारतीय गायक मण्डली द्वारा गाये गये गीतों में दर्शकों एवं श्रोताओं को आनन्दानुभव करने का मौका प्राप्त हुआ । महेश राय और कालूराम बमनिया के दो सांस्कृतिक दलों ने अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए । महेश राम रातभर चलने वाले जागरणों तथा सत्संगों की मौखिक एवं पारम्परिक माध्यमों से कबीर के लोकगीत शैली के प्रतिनिधि गायक हैं तो कालूराम बमनिया देवास, गोरखनाथ, कबीर, मीरा जैसे संत कवियों की कविताएँ सुनाकर लोगों का मन मन्त्रमुग्ध करते हैं । उक्त दोनों सांस्कृतिक दलों की गायन प्रस्तुति को देखने-सुनने वाले दर्शक और श्रोतागण कुछ क्षण के लिए कबीर के निर्गुण निराकार में विलीन हो गए थे ।

फिल्म पर््रदर्शन और सांगीतिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त इस अवसर पर दो समूहगत परिचर्चाएँ भी आयाजित की गई थी ।
परिचर्चा गोष्ठी वाले सत्र में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने कार्यपत्र
प्रस्तुत किये । कार्यपत्र प्रस्तुत करने वालों में प्रो. अभि सुदेवी, डा. विष्णुराज आत्रेय, डा. अरुण गुप्तो और डा. गंगाप्रसाद अकेला सामिल थे । परिचर्चा गोष्ठी सत्र के अन्त में कबीर शब्द की व्युत्पत्ति, अर्थ, जाति आदि विषय पर टीका टिप्पणी भी की गई । प्रो. अभि सुवेदी ने कबीर और नेपाल के जोसमनी फकीर लोगों के बारे में चर्चा की । अन्त में सुश्री शबनम विरमानी के साथ अर्न्तक्रिया कार्यक्रम सत्र आयोजित किया गया था ।

कबीर महोत्सव के शुभ अवसर पर चार फिल्म दिखाई गई थी । इनमें- हद अनहद ः राम और कबीर के साथ यात्रा, कबीरा खडा बजार में ः पवित्र और धर्म निरपेक्ष कबीर के साथ यात्रा, कोई सुनता है ः कुमार और कबीर के समथ यात्रा एवं चलो हमारा देश ः कबीर और साथियों के साथ । इस दौरान कबीर परियोजना की संयोजक तथा यात्रा के निर्देशक सुश्री शबनम विरमानी भी उपस्थित थीं । कबीर महोत्सव के अवसर पर देशी-विदेशी विद्वानों तथा प्रबुद्धजनों की उपस्थिति उत्साहजनक रही ।

उक्त त्रिदिवसीय कबीर महोत्सव समारोह के सफलतम आयोजन के लिए रात-दिन परिश्रम करनेवाली भारतीय राजदूतावास की प्रथम
सचिव अपर्ूवा श्रीवास्तव का प्रयास काफी सराहनीय रहा । प्रथम सचिव के सहयोगियों के रुप में भारतीय राजदूतावास के अत्तासे डा. शंकर कुमार एवं धीरज बर्मा का योगदान समारोह को सफल बनाने में महत्वपर्ूण्ा रहा ।
इस महोत्सव को लोगों ने खूब सराहा है तथा संचार माध्यमों नें इस महोत्सव को विशेष महत्व देने के साथ ही वृहत्तर स्थान प्रदान किया है ।

कबीर के साथ यात्रा, कबीरा खडा बजार में ः पवित्र और धर्म निरपेक्ष कबीर के साथ यात्रा, कोई सुनता है ः कुमार और कबीर के समथ यात्रा एवं चलो हमारा देश ः कबीर और साथियों के साथ । इस दौरान कबीर परियोजना की संयोजक तथा यात्रा के निर्देशक सुश्री शबनम विरमानी भी उपस्थित थीं । कबीर महोत्सव के अवसर पर देशी-विदेशी विद्वानों तथा प्रबुद्धजनों की उपस्थिति उत्साहजनक रही ।

उक्त त्रिदिवसीय कबीर महोत्सव समारोह के सफलतम आयोजन के लिए रात-दिन परिश्रम करनेवाली भारतीय राजदूतावास की प्रथम सचिव अपर्ूवा श्रीवास्तव का प्रयास काफी सराहनीय रहा । प्रथम सचिव के सहयोगियों के रुप में भारतीय राजदूतावास के अत्तासे डा. शंकर कुमार एवं धीरज बर्मा का योगदान समारोह को सफल बनाने में महत्वपर्ूण्ा रहा ।

इस महोत्सव को लोगों ने खूब सराहा है तथा संचार माध्यमों नें इस महोत्सव को विशेष महत्व देने के साथ ही वृहत्तर स्थान प्रदान किया है ।

विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी का महाप्रयाण

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नेपाल भारत समेत दुनिया के ५० से अधिक देशो में योग का परचम लहराने वाले विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी अब दुनिया में नहीं रहे । ८७ वषर्ीय स्वामी जी भारतीय राज्य झारखण्ड के देवघर स्थित रखिया पीठ आश्रम मे गत ५ दिसंबर की मध्य रात्रि ध्यानस्थ हुए और महाप्रयाण पर चले गये । देवघर समेत पूरे विश्व मे उनके चाहने वालो ने जहाँ भी यह खबर सुनी उन्हे सहज विश्वास ही नही हुआ । महा-प्रयाण के दिन ही शाम ६ बने उन्होंने रखिया पीठ मे महा-समाधि ली थी । उस समय हजारों की संख्या मंे भक्तगण मौजूद थे इससे पर्ूव दो दिसंबर को उत्सव के मौके पर भक्तों को स्वामी जी के दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ था उस दिन स्वामी जी प्रसन्न चित मुद्रा मे दिखे थे ।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती का जन्म भारतीय राज्य उत्तरप्रदेश -अब उत्तराखंड) के अल्मोड मे सन् १९२३ में हुआ था । सन् १९४३ मे ऋषिकेश मे उन्हे स्वामी शिवानन्द का दर्शन हुआ और उसी समय उन्होने दशनामी सन्यास पद्धति अपना ली । सन् १९५५ में स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने पर्रि्राजक रुप मे भ्रमण करने के लिए गुरु आश्रम को छोड दिया । स्वामी जी ने सन् १९६३ मे अर्न्तराष्ट्रीय योग मित्र मण्डल एवं सन् १९६४ मे बिहार योग विद्यालय की स्थापना की । अगले २० वर्षो तक वे योग के अग्रणी प्रवक्ता के रुप मे विश्व भ्रमण करते रहे । ८० से अधिक ग्रन्थों के प्रणेता स्वामी जी थे । ग्राम्य-विकास की भावना से सन् १९८७ मे दातव्य संस्था -शिवानन्द मठ)

एवं योग शोध संस्थान की स्थापना की । १९८८ मे स्वामी जी ने अपने मिशन से अवकाश ले लिया तत्पश्चात क्षेत्र सन्यास अपना कर उन्होने र्सार्वभौम दृष्टि से परमहंस सन्यासी का जीवन अपना लिया ।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती योग क्षेत्र मे अग्रणी थे उनके तरीके में नवीनता और निरालापन था । अजपाजप अंतमौन, पवनमुक्तासन, क्रियायोग एवं प्राणविया जैसे अभ्यासो को उन्होने विधिपर्ूवक व सरलतम तरीके से बताया है । इस बहुमूल्य और अबतक के अगम्य विज्ञान को स्वामी जी ने जनसाधारण के लिए सुगम बनाने का काम बखूबी किया । स्वामी जी ने तन्त्र की न्यास पद्धति पर शोध कर योग न्रि्रा का अविष्कार किया । अपनी गहरी अर्ंतदृष्टि से उन्होने ध्यान के इस अभ्यास की प्रभावशीलता को देख कर उसे इस तरह प्रस्तुत किया कि अभी तक केवल उपासना की एक पर्वपेक्षित क्रिया के रुप मे प्रयुक्त होने वाला यह अभ्यास सभी के लिए व्यावहारिक योग का एक अभ्यास बन गया । योग न्रि्रा प्राचीन पद्धतियांे मंे स्वामी जी की अर्ंतभेदी दृष्टि और गहरी समझ का एक उदाहरण मात्र है ।

स्वामी जी का दुष्टिकोण प्रेरणाप्रद एंव उद्धारक होने के साथ-साथ गहरा और मर्मस्पर्शी था । फिर भी उनकी भाषा और व्याख्या सदा सरल रही है । स्वामी जी द्धारा रचित ८०० से अघिक पुस्तको को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों एवं विद्यालयांने पाठ पुस्तक के रुप मे स्वीकार किया है । स्वामी जी द्धारा लिखित पुस्तकों का इटालियन, जर्मन, स्पेनिश, रशियन, चीनी, पन्च, ग्रीक, इरानी, युगोस्लावियन समेत विश्व की प्रमुख भाषाआंे में अनुवाद किया जा चुका है । लोगांे ने स्वामी जी के विचारांे को अपनाया तथा सभी आस्थाआं एवं राष्ट्रां के आध्यात्मिक जिज्ञासु उनकी ओर उमङÞ पडे । स्वामी जी ने हजारांे लोगांे को मन्त्र और सन्यास-दीक्षा दी तथा उनमे दिव्य जीवन के बीज डाले । उन्होने योग के प्रकाश को फैलाने मे दर्र्जेय उत्साह और शक्ति का पर्रदर्शन किया । स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने बीस वर्षों के अल्पकाल मंे ही अपने गुरु के मिशन को पूरा कर दिया ।

स्वामी जी की प्रेरणादायी उक्तिः
योग विद्या भारत वर्षकी सबसे प्राचीन संस्कृति और जीवन-पद्धति है । इसी विद्या के बल पर
भारतवासी प्राचीनकाल में सुखी, स्वस्थ तथा समृद्ध जीवन व्यतित करते थे । जब से भारत मे योग विद्या का ह्रास हुआ तभी से देशवासी गरीब, दुःखी और अस्वस्थ हं। पूजा पाठ, धर्मर्-कर्म से शान्ति मिलती है और योग्भ्यास से धन-धान्य, समृद्धि और स्वास्थ्य । स्वामी जी ने दुनिया भर के लोगों को सुख, शान्ति, समृद्धि एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए योगाभ्यास को अपने जीवन मं शामिल करने का मूलमन्त्र दिया है ।

धन्य है भारतवर्षकी भूमि जहाँ पैदा हुए विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने दुनिया भर में योग का परचम लहरा दिया साथ ही दुनिया भर के देशों को यह राह दिखायी कि बैगर योग के मानव जीवन परूण् नही है । महाप्रयाण को प्रस्थान कर चुके स्वामी जी की महान् आत्मा को हम सभी नेपालवासी शत्-शत् नमन करते है ।

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