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September , 2010
Wednesday
''जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'' कैसी महान, पवित्र और अनन्य भावनाओं से भरा है भगवान राम ...
एक दशक से ज्यादा समय से भारत में 'महिला आरक्षण बिल पास करने के अथक ...
सिर्फआसन प्रणायाम करनेवाले योगी नहीं, वे सिर्फकथावाचक नहीं, वे सिर्फआचार्य नहीं, वे एक उपदेशक नहीं बल्कि वे ...
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हिमालिनी डेस्क अन्तरक्षेत्रीय सर्म्पर्क अभिवृद्धि औरु जलवायु परिवर्तन की चुनौती का संयुक्त रूप से सामना करने ...
भारत एवं नेपाल में अध्यात्म का परचम लहराने वाले रामघाट अयोध्या -भारत) के महान संत ...
नेपाल में पाँच बार प्रधानमंत्री रह चुके गिरिजाप्रसाद कोइराला का आज यहाँ निधन हो गया। ...
मगवान श्रीकृष्ण ने सोलह हजार से भी ज्यादा लडकियों से शादी रचा कर भावी युवकों ...
कई पत्नियों के साथ रहने के लिए चर्चित दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा ने ...
चलचित्र प्राविधिक संघ द्वारा आयोजित 'फिल्म अवार्ड' कार्यक्रम में 'म तिमी बिना मरिहाल्छु' फिल्म ...
जनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों ...
नेपालके अग्रणी औद्यागिक घराना गोल्छार् अर्गनाइजेशन देश के उद्योग व्यवसाय के साथ-साथ समाजसेवा का विविध कार्यक्रम में ...
नेपाल में सफेद कारोबार की आड में काला धंधा करने वाले बदनाम लोगों की जान ...
नानीबाई रो मायरो कार्यक्रम भावभीनी कृष्ण-कर्तन के साथ सम्पन्न हुआ । इस कार्यक्रम के समापन-समारोह ...
अफ़ग़ानिस्तान में जिरगा ने राष्ट्रपति हामिद करज़ई के तालेबान से शांति समझौते के प्रयासों का ...
दुनियाँ अनोखी है । यहाँ रहने वाले अनोखें-अनोखें शौक भी पाला करते हैं । ...
देश अजीबो-गरीब भंवर जाल मेंफँसा हुआ है । राजतंत्र की बिदाई और गणतंत्र की स्थापना के ...
नुख्ता के हेरफेर से खुदा जुदा हो गया । अतः नुख्त निकालने, लगाने और प्रयोग ...
इस कदर आदमी आज रोने लगा दाग सारे बिना पानी धोने लगा । रात सोये तो ...
नवम्बर 5, 2009 को अमेरिका में एक हादसा हो गया । 9/11 की घटना के बाद ...
नेपाली कांग्रेस महासमिति की बैठक काठमाण्डू में सम्पन्न हई । आयोजक केन्द्रीय समिति ने तीन दिन की ...
हर बच्चा अपने माता पिता की आखों का तारा होता हैं । यही वजह है ...
धर्म की दुकान पर इतनी भीड क्यों -, पशुपति मंदिर के मूल भट्ट के नियुक्ति ...
में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है ...
नेपाल भारत समेत दुनिया के ५० से अधिक देशो में योग का परचम लहराने वाले ...
हिमालय की चोटियों से लेकर हिन्द महासागर के विशाल तटों तक सम्पर्ूण्ा भूखण्ड की जीवन धाराएँ एक ...
बाँर्तमान अन्तर्रर्रीय दृष्टिकोण के अनुसार संघीयता एक शंकास्पद विषय माना जाने लगा है । बहुत ...
सेक्सी स्लिम तथा ग्लैमरस दिखने के लिए बलिउड के हिरोइनों में होड लगी रहती है ...
वहुत लम्बे समय के बाद नेपाल में संविधान सभा का चुनाव कराया गया है । ...
गोल्डेन आई फिल्म प्रा.लि. द्वारा निर्मित नवल खडका की प्रस्तुति दशगजा फिल्म का लक्ष्य नेपाल-भारत ...
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी ...
तुलसीदास जी एवं उनके द्वारा रचित महान ग्रन्थ रामचरित मानस से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर ...
काठमांडू- राजधानी के त्रिपुरेश्वर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर हाँल में २४ दिसंबर को 'प्रस्तावित वीरगंज ...
हाँ चाह वहाँ राह' की कहावत को र्सार्थकता देते हुए बांके की कुछ महिलाओं ने ...
दुनिया का राजनीतिक चौधरी और ग्लोबल विलेज के महाजन की भूमिका निभाने वाले संयुक्त राज्य ...

Archive for the ‘साहित्य’ Category

मा::वेद प्रकाश

Posted by Himalini On June - 4 - 2010 1 COMMENT

रोज बालकनी में खडा होकर
एक बच्चे को देखता हूं
स्कूल जाते हुए अच्छी साफ यूनिफार्ँम पहने
अजब अंदाज में चलते हुए
उसकी माँ उसका बैंग
कंधे पर लटकाए होती है
दूसरे कंधे पर पानी की बोतल होती है
साथ-साथ चलती है उसकी उँगली पकडÞे हुए
रोज बालकनी मं खड होकर देखता हंू
गरमी के दिनों में चिलचिलाती धूप में
लडÞके को छतरी के नीचे लिए
खुद धूप में चलती है
बरसात में खुद भीगती है मगर
लडÞके को छतरी के नीचे बचाकर चलती है
भीग कर बीमार न हो जाए कहीं
रोज बालकनी में खडÞा सोचता हूं
मँा किस लगन से प्यार से लडÞके
का बैग उठाए उसकी पानी की बोतल लेकर
रोज स्कूल छोडÞने जाती है, ताकि बडÞा होकर
एक अच्छा इंसान बने, उसका सहारा बनें
और फिर सोचता हूं
एक दिन यह लडÞका अच्छी शिक्षा
पाने के लिए अमेरिका जाएगा
अपनी मां की आंखो का तारा
वहां किसी लडÞकी से शादी कर लेगा
और अमेरिका में ही बस जायेगा
माँ यहाँ अकेली रह जायेगी
और सोचेगी क्या इस दिन के लिए
उसे नौ माह पेट में रखा
पैदा किया, बडÞे लाडÞ- प्यार से बडÞा किया
कि एक दिन मेरा सहारा बनेगा ।
मगर वो अमेरिका बस गया
मां फिर अकेली रह गयी
रोज बालकनी में खडा हो कर एक बच्ची को स्कूल जाते देखता हूं
पोनीटेल किए वह सुन्दर लडÞकी
बडÞे अंदाज से मटक-मटक कर चलती है
उसकी माँ कंधे पर बैग डÞाले
दूसरे कंधे पर पानी की बोतल लटकाये
साथ-साथ चलती है उसकी उंगली पकडÞे
रोज बालकनी में खडÞा हो कर देखता हूं
किस लगन से, किस प्यार से
उस लडÞकी की माँ उसका बैग उठाए
उसकी बोतल उठाए
उसकी उंगली पकडे हर रोज स्कूल छोडÞने जाती है
गरमी के दिनां में छतरी के नीचे छांव
मंे रखती है लडÞकी को खुद धूप में चलती है
बरसात में उसे छतरी को नीचे रखती है
ताकि वह भीगे नहीं बीमार न हो जाए खुद भीगती रहती है
रोज बालकनी में खडा होकर देखता हूं किस लगन से लडÞकी को पढÞा रही है
एक अच्छी बेटी बनाने के लिए
बाप की दुलारी बनाने के लिए
बडÞी होकर एक सुन्दर युवती बनें
और मैं बालकनी में खडÞा होकर सोचता हूं
एक दिन इसकी शादी हो जायेगी
मां भी आंखो में आंसू होंगे
क्या माँ इस दिन के लिए
इसे स्कूल ले जाती है
उसका बैग उठाती है
उसकी बोतल कंधे पर लटकाती है
उसे बारिश से बचाती है
खुद भीगती है
खुद धूप मंे चलती है
उसे छतरी में रखती है
कि एक दिन जवान होकर
उसे छोडÞ कर चली जायेगी
अपनी दुनिया बसाने
माँ फिर अकेली रह जायेगी
मैं बालकनी में खडÞा होकर
सोचता हूं
खखख

भोजपुरी सांस्कृतिक संगोष्ठी ::दिनेश गुप्ता

Posted by Himalini On April - 26 - 2010 ADD COMMENTS

Dinesh Guptaयह तो शुरूआत हैं, आगे बहुत कुछ करना है’वीरगंज । विगत २७ और २९ फागुन को वीरगंज के उद्योग वाणिज्य संघ के सभागृह में दो दिवसीय भोजपुरी सांस्कृतिक संगोष्ठी विभिन्न कार्यक्रमों के साथ सफलतापर्ूवक सम्पन्न हर्ुइ । नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान और भोजपुरी वाङ्मय प्रतिष्ठान के संयुक्त आयोजना में सम्पन्न भोजपुरी सांस्कृतिक संगोष्ठी को पाँच सत्रों में विभाजित किया गया और पाँचो सत्रों को भोजपुरीमय बनाने को सफल कोशिश की गई । नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान, संस्कृति विभाग के प्रमुख प्राज्ञ श्री राम भरोस कापडि, भ्रमर के प्रमुख आतिथ्य एवं भोजपुरी वाङ्मय प्रतिष्ठान के अध्यक्ष साहित्यकार श्री गोपाल अश्क की अध्यक्षता में सम्पन्न यह दो दिवसीय सांस्कृतिक संगोष्ठी कई मायनों में यादगार साबित हर्ुइ । भोजपुरी के नामी गिरामी विद्वानों ने अपनी उपस्थिति से इसे महत्वपर्ूण्ा संगोष्ठी बना डाला । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान के विश्वभाषा विभाग के प्रमुख डा. संजीता वर्मा, प्राज्ञसभा सदस्य उपेन्द्र सहनी, लोकगायक बृजकिशोर सहनी, शिवनंदन जयसवाल, अयोध्या प्रसाद चौधरी आदि की विशेष उपस्थिति थी ।
पहला दिन २७ फाल्गुन २०६६ पहला सत्र को उद्घाटन समारोह के रूप में मनाया गया जिसमे प्रमुख अतिथि प्राज्ञ श्री राम भरोस कापडि भ्रमर ने दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह को विधिवत शुरुआत की । इसी सत्र में कुमार सच्चिदानन्द सिंह ने ‘भोजपुरी लोकसंस्कृति आ लोक कला’ दिनेश गुप्ता ने( भोजपुरी लोकसंस्कृति आ लोक धर्म और गोपाल अश्क ने भोजपुरी लोकसंस्कृति आ लोकसाहित्य विषयक कार्यपत्र प्रस्तुत किया । जिस पर पंं. दीप नारायण मिश्र और शिव नंदन जयसवाल ने अपनी अपनी टिप्पणी रखी । २७ की शाम को सांस्कृतिक साँझ के रूप में मनाया गया जिसमें नीलम जैसी के नेतृत्व में स्थानीय महिला कलाकारों ने भोजपुरी लोकनृत्य झिझिया प्रस्तुत किया । एकाध गीतों पर नृत्य के बाद गायक जितेन्द्र मुस्कान के चइतावर, फगुआ, जोगिरा, वारहमासा, सोहर आदि गीत गाये गये । इस गीत गायन कार्यक्रम में रौतहट से आये गायक वृज किशोर सहनी और बाल गायिका रिंकु जायसवाल ने भी अपने गीत गाये जिसे खूब सराहा गया ।
इसी प्रकार दूसरे दिन अर्थात २८ फागुन को भी विविध सत्रों में बाँटा गया । पहले सत्र में शेष दो कार्यपत्र एक भोजपुरी के जातीय संस्कृति -प्रस्तोता डा. विश्वम्भर कुमार शर्मा) दो भोजपुरी लोकसंस्कृति आ. लोकजीवन -प्रस्तोता ः राम प्रसाद शाह) प्रस्तुत किये गये । इन दो कार्यपत्रों पर क्रमशः वीणा सिन्हा और पं. दीप नारायण मिश्र ने टिप्पणी की ।
दूसरे सत्र को कवि गोष्ठी के रूपमें मनाया गया । संचालन डा. विश्वम्बर कुमार शर्मा ने । इस कवि सम्मेलन ने डा लटपट ब्रजेश, डा. विश्वम्भर कुमार शर्मा, गोपाल अश्क, दिनेश गुप्ता, इन्द्रदेव कुँवर, सतीशचन्द्र झा सजल, विजय प्रकाश बीक, एम प्रार सिंह, ध्रुव सहनी, वीणा सिन्हा और राम भरोस कापडि भ्रमर ने काव्य पाठ किया ।
और २८ फाल्गुन की संध्या को एक बाद फिर सांस्कृतिक सांझ में तब्दील किया गया । जिसमें भोजपुरी लोक नृत्य के साथ राम भरोस कापडिÞ भ्रमर द्वारा लिखित मैथिली नाटक आ बौधु बाजि उठत का भोजपुरी अनुवाद आ बौधु बोल पडल का सफल माञ्चन रमेश यादव के सयोजकत्व और एम निवास दर्शन के निर्देशन मे हुआ । स्थानीय कलाकारों ने अपनी अपनी भूमिका मंे जान फूँक दी थी ।
समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए प्राज्ञ राम भरोस कापडि भ्रमर ने कहा- यह तो बुनियाद है, हम आगे बहुत दूर जाना चाहते है और इसके लिए आप सभी का साथ होना आवश्यक है । दो दिवसीय सांस्कृतिक संगोष्ठी कवि सम्मेलन, लोकनृत्य, लोक गायन ओर नाटक आदि के कार्यक्रम पर्ूण्ा रूप से सफल रहा । समारोह का समापन अध्यक्ष गोपाल अश्क के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ । सही मापने में यह दो दिवसीय भोजपुरी सांस्कृतिक एक यादगार संगोष्ठी रही ।

नेपाल के लोकतान्त्रिक आन्दोलन में संस्कृत भाषा की भूमिका::-डाँ. ऋषि प्रसाद शर्मा

Posted by Himalini On March - 22 - 2010 ADD COMMENTS

स्कृत नेपाल की ही नहीं अपितु सम्पर्ूण्ा विश्व की क्रान्तिचेता संास्कृतिक भाषा है । विश्व को लोकतान्त्रिक ज्ञान देने का श्रेय संस्कृत भाषा को है । नेपाल के पडÞोसी मित्र राष्ट्र भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति में और नेपाल को राणाशासन तथा राजशासन से मुक्त कराने में संस्कृत भाषा का ऐतिहासिक योगदान रहा है । नेपाल में प्रजातन्त्र प्राप्ति के मर्धन्य योद्धा, शहीद शिरोमणि शुक्रराज शास्त्री आदि की पे्ररणास्रोत संस्कृत भाषा की “श्रीमद्भगवद्गीता” ही थी । भारत में भी अरविन्द, तिलक, गान्धी आदि प्रबुद्ध नेताओं द्वारा विलायती शासन से मुक्ति प्राप्ति के लिए मार्गदर्शक के रूप में संस्कृत भाषा की पत्र-पत्रिकाओं ने तो स्वन्त्रता प्राप्ति हेतु प्राण की आहुति देने के लिए “स्वातन्त्रयं शरणं वरञ्च मरणं तत्प्राप्तये श्रीमताम्” जैसे उद्बोधनों द्वारा भारतीय स्वतन्त्रता प्रेमियों की नस-नस में क्रान्ति के बीज बोये । ब्रिटिशशासन के उन्मूलन के आन्दोलन में और उस की सफलता में महात्मा गान्धी को “अहिंसा परमो धर्मः”जैसे संस्कृत वाणियों ने प्रेरणा और सहारा दिया । आज भुटान में चल रहे लोकतन्त्र प्राप्ति के अभियान में टेकनाथ रिजाल जैसे संस्कृतज्ञ ही अग्रगामी हैं ।
जनतन्त्र -लोकतन्त्र) की जननी संस्कृत भाषा प्राचीन काल से ही लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के पक्ष में है । विश्व का र्सवप्रथम लोकतान्त्रिक चेतना देनेवाली संस्कृत भाषा ही है । तथापि लोकतन्त्र की संवाहक इस भाषा को में निरकंुश शासकों की शक्ति बढाने के लिए और राजतन्त्र की प्रशस्ति गाने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग किया गया । घोर आर्श्चर्य तो तब होता है जब राजनीति शास्त्र में बडें-बडें विद्वान आज तक भी संसार में पहले राजतन्त्र का जन्म हुआ और उसका विकसित रूप ही जनतन्त्र वा लोकतन्त्र है ऐसा जानते और मानते आ रहे हैं । परन्तु संस्कृत में राजतन्त्र से पहले जनतन्त्र के उदय के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं । यदि हम वेद महाभारत संस्कृत बौद्धग्रन्थ पाणिनि व्याकरण कौटिल्य का अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों का मन्थन करें तो उस से जो तत्व निकलता है वह यह है कि प्राचीनकाल में शासनसत्ता का प्रयोग जनता द्वारा जनता के लिए होता था । इससे सिद्ध होता है कि पहले जनतन्त्र का जन्म हुआ और राजतन्त्र उसका विकृत रूप है । इतना ही नहीं वेदों के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि वैदिक काल में ही जनतन्त्र का रूप पर्ूण्ा विकसित हो चुका था । विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ “ऋग्वेद” ने जनता के शासन जनतन्त्र को ही महान् मानकर नमन किया है-”महते जानराज्याय” । संस्कृत भाषा में जनता द्वारा चुना हुआ शासक को भी “राजा” ही कहा जाता था और राजा की स्थिति जनता पर निर्भर थी-”विशि राजा प्रतिष्ठित” -यजर्ुर्वेद) “त्वां विशो वृणतां राज्याय” -अथर्ववेद)
वस्तुतः जनतन्त्रीय राज्य के प्रमुख को ही “राजा” कहा जाता था । निर्वाचित राजा द्वारा शपथ ग्रहण करने की प्राचीन परम्परा से भी यह तथ्य प्रमाणित होता है कि आरम्भ में राजा का पद वंशानुगत न होकर योग्यता के आधार पर जनता द्वारा चुना जाता था । राजा द्वारा शपथ ग्रहण करने के बाद जनता को रक्षा न करके प्रतिकूल आचरण करने पर जनता मे उसको राज्यच्युत करने का अधिकार मात्र न था बल्कि उसके वध करने तक का अधिकार जनता में निहित था । महाभारत के अनुशासन पर्व में निरकंुश हो कर जनता की सेवा न करने वाले राजा को तो ‘पागल कुत्ते की तरह वध कर देना चाहिए’ तक कहा गया हैः-
“अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।
स संहत्या निहन्तव्य श्वेव सोन्माद आतुरः ।।”
संस्कृत के “राजन” शब्द से बना हुआ “राजा” शब्द का सामान्य अर्थ है- राज्य करने वाला व्यक्ति अथवा शासक । आरम्भ में शासक बनने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति को जनता द्वारा चुना जाना अनिवार्य था- “विश्वस्त्वा र्सवा वाञ्छन्तु” -अथर्ववेद) प्रस्तुत प्रसंग में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपनाने की इतनी लम्बी परम्परा होते हुए भी वर्तमान नेपाल में आज दो-दो निर्वाचन क्षेत्रों से जनता द्वारा चुनाव में न चुने गए अनिवार्य व्यक्ति भी प्रधानमन्त्री -शासक) बने हुए हैं जो संस्कृत परम्परा और लोकतन्त्र के विपरीत है ।
इस प्रकार जनता द्वारा राजा -शासक) चुनने की संस्कृत की प्राचीन परम्परा ने राजा -शासक) को नहीं अपितु जनता को राज्य का शक्ति केन्द्र मानकर जनता के शासन को मान्यता दी है । वर्तमान में अंगरेजी में प्रचलित “डेमोक्रेसी” का अर्थ भी जनता का शासन अर्थात् सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित होता है । “डेमाँस” अर्थात जनता “क्रेटाँस” अर्थात शक्ति ये दो युनानी श्ाब्द मिलकर अंगरेजी का “डेमोक्रेसी” शब्द बना है । ऋगवेद में भी “यतेमहि स्वराज्य”े कहते हुए “स्वराज्य” अर्थात वास्तविक अर्थ में जनता का शासन स्थापित करने के लिए मार्गदर्शन किया गया है । अंगरेजी का “रिपब्लिक” शब्द नेपाली और हिन्दी में रूपान्तरित “गणराज्य” शब्द भी संस्कृत भाषा से लिया गया है ।
अर्थात- लोकतान्त्रिक गणतन्त्र ही ऐसी सर्वोत्कृष्ट व्यवस्था है जिस में सभी नागरिक समान एवं सम्पर्ूण्ा राजनीतिक शक्ति से सम्पन्न होते हैं ।
ऐसी ही संस्कृत भाषा की प्राचीन प्रभाव के कारण वर्तमान में भी प्रजातान्त्रिक और लोकतान्त्रिक आन्दोलन में संस्कृत मर्मज्ञों ने संस्कृत से प्रेरणा शक्ति और गति प्राप्त की है ।
१०४ वर्षलम्बे पारिवारिक निरकुंश राणाशासन के उन्मूलन के लिए संस्कृत क्षेत्र विशेषतः संस्कृत छात्रों ने “जयतु संस्कृतम्” अर्थात “संस्कृत की जय हो” का नारा लगाते हुए वि.सं.२००४ आषाढ १ -ज्ञढद्धठजून ज्ञछ) में आन्दोलन आरम्भ किया था, जो आज “जयतु संस्कृतम्” आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है । नेपाल के प्रजातन्त्रप्राप्ति के अभियान में “जयतु संस्कृतम्” आन्दोलन ने जहाँ एक ओर युवा छात्र शक्ति को ‘अजेय’ सिद्ध किया है तो दूसरी ओर संस्कृत के लोकतान्त्रिक एवं अग्रगामी भूमिका को प्रखर बनाया है । वस्तुतः “जयतु संस्कृतम्” आन्दोलन वि.सं. १९९६-ज्ञढघढ-द्धण्) में ‘प्रजापरिषद्’ द्वारा किया गया आन्दोलन के बाद का सब से बडा आन्दोलन था । उस समय राणाशासन का विरोध करने का मतलब सीधा मृत्यु के मुख में घुसना था तो भी “जयतु संस्कृतम्” के योद्धाओं ने खुल्लम-खुल्ला सडक पर उतर कर राणाशासन का विरोध करने का साहस दिखाया । इस आन्दोलन ने नेपाल में प्रजातन्त्र प्राप्ति के लिए राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, भाषिक, सांस्कृतिक, जागृति एवं नवचेतना का पे्ररणाप्रद भूमिका निर्वाह किया था । अतः राणाशासन का उन्मूलन कर नेपाल में प्रजातन्त्र स्थापना में क्रान्तिकारी संस्कृत भाषा और “जयतु संस्कृतम्” आन्दोलन का अविस्मरणीय योगदान रहा है ।
निरकुंश शासकों द्वारा जब-जब स्वतन्त्रता, प्रजातन्त्र, लोकतन्त्र वा जनतन्त्र घायल अथवा अपहरित हुआ है तब-तब संस्कृत के छात्र, शिक्षक, विद्वान और विदुषी उस के प्रतिरोध के लिए सत्त सर्घष्ा करते आ रहे हैं । २०४६ -ज्ञढढण्) के प्रजातन्त्र पर्ुनर्स्थापना के आन्दोलन में भी संस्कृत मर्मज्ञों की भूमिका उल्लेखनीय थी । प्रजातन्त्र प्राप्ति में “जयतु संस्कृतम्” आन्दोलन की जो भूमिका थी उसी के अनुरूप प्राप्त संसदीय बहुदलीय शासन पद्धति को सुदृढ तथा जनमुखी बनाने के लिए २०५५-ज्ञढढड) में “जयतु संस्कृतम् महासभा” नामक राजनीतिमूलक संगठन गठित किया गया। यद्यपि जनता के असीम त्याग और बलिदान के फलस्वरूप प्राप्त लोकतन्त्र -प्रजातन्त्र) में राजसंस्था के स्थान देना उचित नहीं था । तथापि अतीत में एक स्वतन्त्र तथा र्सार्वभौमसत्ता सम्पन्न राष्ट्र के रूप में नेपाल को विश्व समक्ष परिचित कराने में राजसंस्था ने जो भूमिका निर्वाह किया था उसी के आधार पर नेपाल में संवैधानिक राजतन्त्र सहित संसदीय बहुदलीय प्रजातन्त्र स्थापित हुआ । फिर तत्कालीन राजा वीरेन्द्र के वंशनाश -हत्या) के पश्चात् राजा ज्ञानेन्द्र ने सत्ता हथिया कर निरकंुशतन्त्र का सूत्रपात किया । फलस्वरूप निरकुंश राजतन्त्र का उन्मूलन कर लोकतान्त्रिक गणतन्त्र स्थापना के लिए आन्दोलन आरम्भ हुआ । इस आन्दोलन में “जयतु संस्कृतम् महासभा” आगे आयी । इस सभा ने घोषणा की कि अब नेपाल में राजसंस्था की सान्दर्भिकता समाप्त हर्ुइ ।
इस महासभा के महासचिव डा. ऋषिप्रसाद शर्मा -पंक्तिकार) ने २०६० साल, माघ १८ -द्दण्ण्द्ध फरबरी ठ) में संगठन की ओर से -रिर्पोर्टस क्लब) में पत्रकार सम्मेलन में घोषणा की कि नेपाल के सुन्दर, सुनिश्चित तथा समुन्नत भविष्य के लिए लोकतान्त्रिक गणतन्त्र का विकल्प नहीं है । इस अवसर पर क्रान्तिकारी पर्चा और प्रेस विज्ञप्ति भी वितरित की गई थी । इस समय तक नेपाल के स्थापित किसी भी राजनीतिक दलों ने अपने पार्टर्ीीे निर्ण्र्ाामें राजतन्त्र का उन्मूलन कर गणतन्त्र की स्थापना को घोषणा नहीं की थी । इस तरह नेपाल के लोकतान्त्रिक आन्दोलन के इतिहास में लोकतान्त्रिक गणतन्त्र स्थापना के लिए स्पष्ट आवाज उठाने वाली राजनीतिक संस्थाओं में जयतु संस्कृतम् महासभा ही अग्रणी रही है । उस समय नेपाल को राजतन्त्र से लोकतान्त्रिक गणतन्त्र की ओर ले जाने की लक्ष्य प्राप्ति के लिए जयतु संस्कृतम् महासभा ने यत्र-तत्र संस्कृत वाणी को आधार बनाकर पर््रार्थना का आयोजन भी किया था । जिस में देश को असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर तथा राजतन्त्र से गणतन्त्र की ओर ले जाने की पर््रार्थना है । जो गणतन्त्र स्थापना होने पर सफल भी हर्ुइ है । जयतु संस्कृतम् महासभा द्वारा गणतन्त्र प्राप्ति के लिए घर-घर गाँव-गाँव नगर-नगर और जन-जन में राजतन्त्र विरोधी अभियान को तीव्र बनाने के लिए व्यापक रूप में प्रचार किया गया । इस प्रसग मंे संस्कृत भाषा की पर््रार्थना पठनीय है-
असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
राजतन्त्रान्मा गणतन्त्रं गमय ।।

शौक साहेब नेपालगंज की शान::खगेन्द्र गिरि

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

जुली तूफान कातिल रहजन, किस-किस की तुम बात करोगे एक है जान और लाखों दुश्मन, किस-किस की तुम बात करोगे मन को मायाजाल ने मारा तन को रोटी दाल ने मारा सौ जख्मों से चूर है जीवन, किस-किस की तुम बात करोगे ।

इस श्रुतिमधुर व कर्ण्र्रय गजल के दो शेर नेपालगंज के नामी उर्दू शायर अब्दुल लतीफ शौक द्वारा रचित हैं । उन का नाम नेपालगंज के गजल महफिल ही नहीं वरन उर्दू गजल साहित्य में उच्च सम्मान के साथ लिया जाता है ।

अब्दुल लतीफ शौक नेपालगंज के गजल परम्प्रा के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । विगत चार दशक से भी लम्बे समय से वे इस परम्परा को आगे बढा रहे हैं । वे मनोरंजन अथवा प्यार मुहब्बत के लिए गजल कहते हंै। वे आदमी के जज्बाती बातों को शब्दों मे उतारते हं । वे एक पर्ण्तः साहित्यिक गजलकार हं और उनका मकसद सामाजिक चेतना, मानवतावाद व सामाजिक सद्भाव ही है । ऊपर लिखे गए दो अर्थपर्ण् व तर्कपर्ण् शेरों से उन की काव्यिक क्षमता की स्पष्ट झलक भी मिलती है ।DSC_3759

नेपालगंज के गजल साहित्य का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है । भारत के उर्दू गजल साहित्य की बात करने पर लखनऊ की गजल परम्परा का अपना एक अलग ही रुतबा और एक अलग ही शान दिखलाई देता है । नेपालगंज के तकरीबन सभी गजल गायको-शायरो के गजल का अन्दाज व शैली भी लखनऊ की गजल परम्परा से ही रुबरु है । इसीलिए नेपालगंज के उर्दू गजलकारां द्वारा रचित गजलों मं एक विशिष्ट रचना शैली, एक अलग अन्दाजेबयाँ व शब्दो को पकडने का एक अलग ही नजरिया मिलता है । नेपालगंज के पुराने ऊर्दू गजल साहित्य के पन्ने पलटने पर कई अच्छे और नामी-गिरामी गजल शायर के नाम वा योगदान देखने को मिलते हैं । इन में अब्दुल हमिद हामी, मौलवी गुलाम वारीश गौर, अब्दुस्सलाम असलम, मङ्गलु सहर, अनवर अली अनवर, नसिरुद्दिन नासिर, अमिर मोहम्मद र्राई, मुन्सी असगर अली सहर, फारुक अहमद आरिफ, गुलाम अली मोमिन, नन्हे कुरैसी कैफ, गुलाम जिलानी राही, मास्टर सैदा भारती, श्यामलाल श्याम, मुरलीलाल मुरली, और मौलबी अमिरुल्लाह असअदी आदि का नाम आता है । नेपालगंज के उर्दू गजल साहित्य के इतिहास का और व्यापक तौर पर खोज एवं अनुसन्धान करने पर और भी ज्यादा अच्छे शायरों के बारे मे भी जानकारियं हमारे सामने आ सकती हैं ।

अभी इन दिनों ऊर्दू भाषा में गजल लिख कर साहित्य की सेवा में लगे हुए ऊर्दूर् शायरो में अब्दुल लतीफ शौक, रसूल मोहम्मद आरजु, मोहम्मद अमिन खयाली, मोहम्मद युनुस अदिब, प्रकाश राजापुरी, मोहम्मद उमर आदिल फारुखी, मोहम्मद उमर असर, मौलाना नुर आलम, मोहम्मद हासीम अंजुम, शौकत अली शौकत व मोहम्मद मुस्तफा अहसन आदि का नाम आता है ।

इन नामें मे से अपने आप को एक अलग ढंग से परिचित कराने मे सक्षम रहे सिद्धहस्त शायर अब्दुल लतीफ शौक का जन्म विक्रम सम्बत् १९९५ साल में नेपालगंज नगरपालिका के वार्ड नं. १५ भट्टटिोल में हुआ था । उनके पिता का नाम कुरवान जसगर व माता का नाम आमना जसगर है । शौक साहेब का वास्तविक नाम लतीफ जसगर है परन्तु साहित्य की दुनिया मं लोग उन्हें अब्दुल लतीफ शौक के नाम से जानते हैं । नेपालगंज स्थित मदरसा फैजन्नबी में उर्दू भाषा की प्राथमिक तक का अध्ययन करके अपने पैतृक व्यवसाय में लगे लतीफ जसगर ने अपने जमाने के नामी शायर फारुख अहमद आरिफ की प्रेरणा व प्रोत्साहन से गजल लिखना प्रारम्भ किया था । उन्हांेने पहली बार २०२७ साल में गजल-मुशायरा में अपनी गजल को प्रस्तुत किया था तब से उन्होने कभी भी पीछे मुड कर नही देखा । उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने के बावजूद उन्हें साहित्य का बखूबी ज्ञान   है । स्वअध्ययन से उन्होने साहित्य, जीवन-जगत व दर्शन का गहरा अध्ययन किया है । इसिलिए उनके रचनाओं में उच्च स्तर की तार्किकता व कवितात्मकता का मीठा स्वाद मिलता है । बडं बडं विद्वान भी उनकी क्षमता वा काबिलियत को मानते हैं । लम्बं समय तक वे नेपालगंज के ऊर्दूर् शायरो की संस्था नेपाल बज्म-ए-अदब से जुड कर क्रियाशील रहे । बाद में लम्बे समय तक गुलजार-ए-अदब से भी जुडे रहे । फिलहाल वे मध्यपश्चिमांचल गजल प्रतिष्ठान के अध्यक्ष व भेरी साहित्य समाज के उपाध्यक्ष के तौर पर साहित्य की सेवा मं दिलोंजान से लगे हुए हैं ।

नेपाल में उन को अभी तक केवल युनेस्को बाँके ने सम्मानित किया है और पडोसी देश भारत के गोण्डा शहर में कुछ वर्षपर्व सम्पन्न हर्इ जश्न-ए-वासिफ कार्यक्रम में भी सम्मानित किया गया था । परन्तु उन का जितना मूल्यांकन होना चाहिए था नेपाल मं, सरकारी स्तर पर व नागरिक स्तर पर भी उतना मूल्यांकन नही हो पाया हैं ।

उन्होने अब तक करीब तीन सौ से ज्यादा गजलां की रचना करके गजल साहित्य के भण्डार को जीवन्त बनाया हैं । कुछ सालों से तो वे नेपाली भाषा में भी गजल लिखते हैं । उनकी नेपाली भाषा में लिखी गई कुछ गजल इस प्रकार हैं-
कण कणमा म खोजिरहेछु दाई मेरो नेपाल कता छ -
गाउँ शहरमा हेरिरहेछु दाई मेरो नेपाल कता    छ -

मानवता में प्यार व ममता की भाव बढाने के उद्देश्य से लिखे उनके कुछ शेरो को देखे-
काश नजदीक तुम आओ तो कोई बात बनं
फासले दिल के मिटाओ तो कोई बात बनं
अश्क भी दिल का लहू हैं, इसे पानी न कहां
इसको दामन पे सजाओ तो कोई बात बनें-

शौक साहेब इसी पुस महिने में अपने जीवन के ७० साल पूरे करके ७१ वें साल में प्रवेश कर गये हैं । उन्हें शतायु मिलं और उनसे अच्छे-अच्छे गजलों की रचना हो यह समस्त गजल प्रेमीओं की कामना है ।

व्यंग्य::मुकुन्द आचार्य

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

mukunda acharyaदुनियाँ अनोखी है । यहाँ रहने वाले अनोखें-अनोखें शौक भी पाला करते हैं । कितने सज्जन मूँछ को मर्दानगी का प्रतीक मानते हैं और फलस्वरुप उजले केश पर श्यामवर्ण्र् मेंहदी का रंग चढा लेते हैं । मगर मूँछ को श्वेत धवल छोड देते हैं अपनी बुजर्र्गी प्रदर्शित करने के लिए ।

कोई-कोई तो पाँच दस मीटर लम्बी मूँछ के मालिक बनकर गिनिज बुक में अपनी वीरता को दर्ज कराते हैं । कोई हनुमान जी के वंशज उसी मूँछ से गाडी तक खींचलेते हैं । अजीब-अजीब तमाशा और करतब मूँछ से करने वाले लोग धन्य हैं । उन्हें नमन करने को जी चाहता है । आजकल पचहत्तर प्रतिशत विज्ञापन में महिला के बाल और गाल कैसे सुन्दर बनाये जा सकते हैं- यही सब दर्शकों को परोसा जाता हैं । तो इस होडबाजी में मर्द क्यों पीछे रहे – उसे भी पूरा-पूरा हक है, अपनी मूँछं को बढावें, घटावें, अनेक आकर्ष रंगों में सजाएँ जो चाहे, करें । मियाँ जी दाढी-रखें चाहे उतार फेकें ।

ऐसे ही मुच्छड लोगों की एक मंडली जिसे हमलोग शिष्ट मंडल भी कह सकते हैं, नेपाल के जम्बो मंत्रीमंडल की तरह एक जम्बो जेट में सवार होकर विधाता ब्रड्ड जी से मिलने पहुँचीं । ब्रड्डजी का
मूड खराब था । उनकी सृष्टि को कोई अच्छा नहीं कह रहा था । सब कहते- ब्रड्ड जी अब सठिया गए है । इनसे अब अच्छी सृष्टि नहीं हो सकती । ब्रड्ड जी को अब स्वैच्छिक अवकाश लेकर घर बैठ जाना चाहिए और नई पीढी को सृजनात्मक दायित्व देना चाहिए । बूढे साँढ की तरह बेकार बीच चौक में खडे हैं, और ट्राफिक जाम !

खैर मुच्छडÞ मंडली वहाँ पहुँची । लम्बी दाढी वाले ब्रड्ड जी बडी-बडी मूछों को देखकर घबरा गए । डरते-डरते बोले-कहिए कैसे आना हुआ – आज का मानव तो पिता को नहीं मानता, फिर इस बूढे परपितामह से कौन सा काम आ पडा – मृत्युलोक में आप लोग जैसे निसंकोच भ्रष्टाचार करते हैं उसी तरह यहाँ पर बेझिझक होकर अपना दुखडा रो सकते हैं । हम अभी ‘कमर्सियल ब्रेक’ में हैं, आपकी बात सुन सकते हैं ।

बाबा ब्रड्ड जी की बात सुनकर मुच्छड मंडली के जोश में जो उफान था उसमें कुछ ठंडी छिटे पडÞ गई । फिर भी शिष्टमण्डल के नेता ने बनावटी विनम्रता के साथ कहा- हे आदि रचनाकार ! हम सभी के लकड-दादा ! आप देख ही रहे हैं, हम सभी मूँछवाले हैं । लेकिन अब हमे पूँछ वाले बनना चाहते हैं । ब्रड्डजी मूच्छड मंडली पर बमक पडे- छि छि छि ! मर्द होकर ऐसी बातें ! धिक्कार है इस कलियुगी मर्द को ! एक मुच्छड सजल नयन होकर फूट पडा- बाबा ! घर में बीबी तक मर्द नहीं मानती ! लानत है इस मूँछ पर !

गिनिज बुक में स्थान पानेवाला दूसरा मुच्छड बोला- ‘प्रभो ! मूँछवालों को गन्दा कहते हैं आजकल के क्लीन शेव्ड लोग ।

दूसरे सज्जन ने सुनाया मूँछ के बदले पूँछ मिलती तो हम सभी आज सफल होतें । बाँस के सामने कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते तो जल्दी जल्दी प्रमोशन मिलता । बीबी भी तो पूँछ हिलानेवाले कुत्ते को अपने घरवाले ज्यादा से प्यार करती है । मेरे हिस्से का दूध भी कुत्ते को पिला देती हैं ! मक्कार औरत !

दूसरे दुखी मुच्छड ने मुँह बनते हुए कहा, हमारा टाँमी दिनभर में पचासों बार बीबी को चाट लेता है, मगर मुझे बीबी साहिबा पास में फटकने नहीं देतीं । आखिर मेरे सब्र की भी तो कोई सीमा है ! मुझे कहती हैं आपकी मूँछे पुराने टूथब्रश की तरह नरम अंगों को कुरेदती हैं ! लानत है ऐसी मर्दानगी पर ! ऐसी मूँछ से तो पूँछ लाख गुना बेहतर ! किसी से कोई काम पटाना हो तो मूँछ दिखाने से नहीं पूँछ हिलाने से काम बन जाता है । पहले हर आफिस में मूँछ वाले तेरा जबाव नहीं !! कहा जाता था अब तो यही बात पूँछ वाले को कहा करते हैं । ‘पूछ वाला तेरा जबाव नही ।’ भगवान राम-कृष्ण भी तो मूँछ नहीं रखते थे ।

पीछे वाला मुच्छड भी टपक पडा, मूँछ के बदले पूँछ होती तो मजा ही मजा होता । किसी भी बडे आदमी से हाथ मिलाइए और साथ ही साथ पूँछ हिलाइए । मजाल है वह साला बडा आदमी आपका काम न करे – औरतों को पटाने में भी कितनी आसानी होती । लाखों का हार देने कें बदले बीबी के सामने दो मिनट पूँछ हीं हिला देते ! इस महँगाई में पूँछ हिलाकर किसी को पटाना बहुत ही सस्ता और नायाब तरीका माना जायगा ! पितामह श्री !

मंडली के नेता ने जोडा, अभी नेपाल में जो राजनैतिक तरलता है उसे जमाकर ठोस बनाने में पूँछ से बहुत मदद मिलती । लोग विपक्षी से हाथ तो मिलाते हैं, मगर पूँछ नहीं हिला पाते । होती तो हिलाते ! इघर पूँछ हिली उधर ‘पाँलिटीकल डेडलक’ खुली ! हे लकडÞ दादा श्री । अब मानव को मूँछ से मुक्ति दीजिए और एक लम्बी सी पूँछ प्रदान कीजिए ! ब्रड्डजी बेमन से हीं सही ‘तथास्तु’ कहकर अर्न्तध्यान हो गए ।

गजल::डाँ. कृष्णावतार त्रिपाठी राही’

Posted by Himalini On November - 30 - 2009 2 COMMENTS

इस कदर आदमी आज रोने लगा
दाग सारे बिना पानी धोने लगा ।

रात सोये तो सोये न परवाह है
आदमी तब तो दिन में भी सोने लगा ।

मौत को कंधा देना जरुरी है पर
आदमी जिन्दगी को भी ढोने लगा ।

घर हो, मंदिर या मस्जिद गुरुद्वारा हो
गंदगी हर जगह जाके बोने लगा ।

जो दिया बन के जलते रहे रात भर
उनके भी राह में कांटे बोने लगा ।

‘राही’ जिनके लिए रोज मरता रहा
उनका व्यवहार दुश्मन सा होने लगा ।

::-डाँ. कृष्णावतार त्रिपाठी ँराही’
कुंवरगंज, ज्ञानपुर, उत्तरप्रदेश

विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत संगम::मनीषा मिश्र

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

manisha mishra_r1_c1सिर्फआसन प्रणायाम करनेवाले योगी नहीं, वे सिर्फकथावाचक नहीं, वे सिर्फआचार्य नहीं, वे एक उपदेशक नहीं बल्कि वे तो पृथ्वी पर प्रत्येक धर्म के मूल पुरुष के प्रेम प्राप्त सबके सामने एक साक्षात उदाहरण है । यदि किसी हिन्दू को अपने शास्त्रों पर शंका हो तो वह उनसे मिल सकता है क्योंकि शास्त्रों के रचयिता महषिर् वेदव्या;m महषिर् भारद्वाज, महषिर् दर्ुवाशा के साथ उन्होनें बैठक की है ।
यदि किसी मुसलमान को कुरान समझना है तो वह उनसे मिल सकता है क्योंकि बाबाजी पैगम्बर साहब का सान्निध्य पा चुके है । यदि किसर्ीर् इर्साई कोर् इसा मसीह पर संदेह है तो बाबाजर्ीर् इसामसीह से मिल कर आए हैं और उनके सुविचारों से अवगत कराएंगे । यदि किसी सिक्ख को नानकजी का स्वरुप पूछना है तो वह बाबाजी से मिल सकता है, क्योकि बाबजी नानक देवजी का पे्रम पा चुके है ।
पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं, मत नहीं, संप्रदाय नहीं जिसके मूल स्रोत महापुरुष का बाबाजी को दर्शन, साक्षात्कार नहीं । वे प्रत्येक धर्म का, सत्य का, परम शक्ति का, तपस्या का, जीवित प्रमाण बनकर समाज मे घूम रहे हं ।
जन्म – उनका जन्म भारत के विहार राज्य के रोहतास जिल्ला सासाराम के राजघराने में हुआ था ।
अध्ययन – उनका अध्ययन दार्जिलिङ सेन्टपाल मंे हुआ था और अन्तिम शिक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से आर्ग्यानिक केमेस्ट्री मे एम.एस.सी. ।
वो एक प्रसिद्ध जेट फाइटर प्लेन चालक, वीर एवं देशभक्त है । इसी कारण उनका नाम पाइलट बाबा पडा । उनका नाम गिनिज बुक मे ीयधभकत ँष्निजत ज्ष्भच के नामसे रर्ेकर्ड किया गया है ।
वे विश्व के एकमात्र अति उच्चकोटि के क्रियायोगी है, जो निर्विकल्प समाधि लगाते है । वे बहुत बार हिम समाधि, थल समाधि और जल समाधि लगा चुके हैं ।
बाबाजी को नेपाल से बहुत पे्रम है, क्योंकि नेपाल उनकी गुरुभूमि है । नेपाल के नारायणी नदी के किनारे मकवानपुर, भैंसेके त्रिखण्डी कुटी मे परम् पूजनीय हरिबाबाजी और गुरु गोरखनाथ द्वारा वे दीक्षा प्राप्त किये । उन्होनें महाअवतार बाबा से क्रिया योग की दीक्षा प्राप्त की है ।
नेपाल के राजसी परिवार की बहू सर्ूयापति के मर जाने के बाद प्रतारित होकर पुरुष जाति से तिरस्कृत होकर मरना चाहती थी । तभी एक कपालिक आघोर निमाईनाथ के सम्मोहन में सर्ूया घिरती चली गई, वह पर्ूण्ा योगिनी बन गयी ।
लेकिन वह अघोरियों के बन्धन मे बंधकर छटपटा रही थी । बाबाजी ने उसे सभी अतृप्त आत्माओं अघोरों और तान्त्रिकों से उसे मुक्त कराया ।
हरिबाबा बचपन से ही बाबाजी को हरेक दर्ुघटनाओं से बचाते आ रहे थे । एक बार जब जे नेफा की घाटियों के उपर फ्लाइट से उड रहे थे तो अचानक विमान में गडवडी महसूस हर्ुइ । ए.टी.सी. से सम्बन्ध टूट गया । सब प्रयास बेकार जा रहे थे । वे पैराशूट से कूदकर मौत को चकमा दे सकते थे लेकिन वो राष्ट्रकी सम्पत्ति की सुरक्षा कर रहे थे अपने जीवन को दांव पर लगाकर । जिन्दगी और मौत के बीच पलक झपकने से भी कम समय रह गया था । तभी विमान में झटका लगा और वो तेजी से उपर उठने लगा और सभी सर्म्पर्क सूत्र कार्य करने लगे । अब विमान को कपिल नहीं हरि बाबा बडे आराम से चला रहे थे । आज फिर उन्होनें कपिल को मौत के हाथों से छिन लिया । विमान जमीन र्स्पर्श कर जैसे ही दौडा हरिबाबा गायब हो गए । कपिल सोचने लगे – हरिबाबा की क्षमताओं की सीमा क्या है – और वे मुझसे क्या पाना चाहते है जो ऐसी सुरक्षा देते हैं -
इन्ही घटनाओं के बाद उनमे बैराग्य आ गया और वे सबकुछ छोड कर वर्षों हरिबाबा को खोजते रहे पर हरिबाबा कहीं मिलही नहीं रहे थे । वे हरिबाबा हर संकट में संकट मोचन बनकर स्वयं ही प्रकट हो जाते थे । वे अबतक झलक को दिखाने को भी तैयार नहीं थे ।
बाबाजी काठमाण्डू मे पुनः हरिबाबा की खोज में लग गये । शिवरात्री के मेला के समय पशुपतिनाथ मंदिर का दर्शन करने के बाद हरिबाबा को निकलते देखा, दौडकर उनतक पहुँचना चाहा तो वे भीड मे खो गये । बाबाजी सोच रहे थे कि महलों से निकाल कर सडÞक पर धक्के खाने के लिए छोड दिया अब मेरी तरफ ध्यान न देकर मुझे तडÞपा रहे हैं ।
तभी एक साधु गा रहा था -जो मै ऐसा जानता,
पे्रम करे दुख होय ।
नगर ढिढोंडा पीटता,
पे्रम करे नय ।
बाबाजी को अपने हृदय की हालत का चित्रण इस भजन में मिल गया । फिर एक ट्रक पर थोडÞी दूर चलने के बाद नारायणी नदी के किनारे उतर कर पैदल चलने लगे । नारायणी नदी पार करके बीहड जंगल मे प्रवेश कर गये । पूरी तरह से थक कर जब एक पत्थर पर बैठ गये तब हरिबाबा हाथ में कुल्हाडी लिए और कन्धों पर लकडी का एक गठ्ठर लिये हुए आये । हरिबाबा का र्स्पर्श होते ही कपिल के शरीर की थकान मिट गई । जहाँ से उन्होनें हाथ पकडा था वहाँ से बिजली तरंग की तरह वस्तु तरंगित होकर दौडने लगी । हरिबाबा उन्हे खींचते हुए गोरखनाथबाबा के पास लेकर आये । गोरखनाथबाबा बोले – आओ पथिक । तुम्हारे लिए हम एक युग से प्रतीक्षा कर रहे थे । वे दोनों महात्मा उन्हे त्रिखंडी के महादेव मन्दिर मे ले गये । वहाँ उन के लिए पहले से आसन तैयार था ।
गोरखनाथबाबा गुफा के एक किनारे बैठकर अपने शरीर छोडकर कपिल के शरीर में प्रवेश कर गये । कपिल सूक्ष्म शरीर से सब देखरहे थे । पर वे शक्ति शून्य बन गये थे । अब वे मात्र एक दर्शक थे, हरिबाबा और गोरखनाथबाबाजी की चमत्कारपर्ूण्ा कार्यशैली का ।
अब गोरखनाथबाबाजी ने हजारों मील दूर आकाश मार्ग से पलभर में ही तय कर ली । पहुंच गये कपिल के गांव उनकी माँ से खीचडÞी की भिक्षा मांगने ।
सब वहाँ बिलखकर पूछ रहे थे – “तूने ये क्या किया -”
योगी कर्ेर् इ नहीं थे । पर कपिल के सब अपने थे । देह धारण करने वाला अडिग भिक्षा के लिये अलख जगा रहा था । मां ममता नियन्त्रितकर भीतर जाती है और आंचल मे भरकर चावल-दाल लेकर आती है । योगी के उपर थोडा अक्षत फेंककर आशर्ीवाद देती है । “युग-युग जीओ मेरे लाल” फिर योगी की परिक्रमा कर के उस के खप्पड में खिचडÞी डाल देती है ।
माँ ने कहा – योगी मै तुझे पहचान गयी हूँ, तुम वह नहीं हो जिसे मैने पैदा किया है । योगी जाओ उसे कह देना ममता सदैव पे्ररणा देती है, जीव शरीर देता है, साधक साधना देता है वह बन्धन में नहीं रखता है ।
धन्य है वह माता, उनकी जयजयकार है । जो संयमित रह कर जीवन बिताती है और योग्य संतान को जन्म देकर महान त्याग करने में हिचकिताती नहीं, विश्व उन का ऋणी है हिमालय उनका एहसानमंद है ।
बाबाजी कहते हैं पर्ूव जन्म अन्धविश्वास नहीं है, तथ्य है । आत्मा और पर्ुनर्जन्म के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता । आधुनिक वैज्ञानिक भी समस्त दृश्य और अदृश्य जगत मानते हैं । सूक्ष्म तरंगों से बना प्रमाणित कर रहे हंै । इन तरंगों में तीन मुख्य तत्व हैं – जीवाणु, ऊर्जा और विचार । आत्मा इन तीनों का बिशिष्ट स्वरुप है ।
प्रसूति विज्ञान का एक ही महत्वपर्ूण्ा सूत्र है – सेन्टोजनी रिपीट्स फैलोजनी अर्थात माँ के गर्भाशय में मानव शिशु के पर्ूण्ाता से पहले विन्दु -र्स्पर्म) के रुप मे स्थापित जीव सम्पर्ूण्ा चौरासी लाख योनियों का रुपाकार बदलते-बदलते मनुष्य आकृति प्राप्त करता है । विन्दु रुप बीज एक तरह का अमीबा जैसा जीव होता है, जो अपने ही प्लाज्मा मे से एक से दूसरा ष ९अभिि० पैदा करके दो बनजाता है । सृष्टिमे दोषों वाले जीवको “डायटम” कहते है । दो से चार, चार से आठ, आठ से सोलह, इस क्रममे कोशिका का विस्तार सृष्टि के अनेक जीवों की सक्ल लेता हुआ विकसित होता है । कभी मछली कभी मेंढक जैसा बनता है तो कभी बकरी और बैल जैसा । प्रकृति के यह रहस्यमय लीला प्रभु के अतिरिक्त भला कौन समझ पायेगा – पर इस सत्य से पर्दा पूरी तरह उठने लगा है और विज्ञान भी अध्यात्म की राह पकडÞने के लिए बेताव है ।
अष्टांग योग भी कुछ ऐसा ही विज्ञान है जिस मे जड तथा चेतन दोनों ही प्रकार के परमाणुओं का इस तरह विकास होता है कि प्रकृति के पांचो तत्व पुथ्वी, जल, पवन, अग्नि तथा आकाश भी पर्ूण्ाता मिले, ताकि पांच प्रकार के प्राणो -प्राण-अपान, समान, उदान तथा ब्यान भी अपनी पर्ूण्ाता प्राप्त करे । यह पर्ूण्ाता ही अणु विभु लघु विराट बनाकर “यत्ब्रहृमाण्ड तत्पिण्डे” पिंड -शरीर) मे ही विराट ब्रहृमाण्ड का बोध करा देती है । बिन्दु से ब्रहृमाण्ड तक की इस यात्रा का नाम ही अष्टांग योग है ।
अध्यात्म विज्ञान, आत्मा के अनुसंधान के लिए कहता है । इस पांचभौतिक शरीर के पांचो तत्वों की लघुता और प्रभुता की खोज कर लेने पर्रर् इ भी मानव आत्मविज्ञानी बनकर ब्रहृमाण्ड की खोज कर सकता है । तब आज के विज्ञान को इतना भटकना नहीं पडÞेगा ।
हमारी सुषुम्ना -स्पाइनल कार्ड) के अन्दर क्या है – विज्ञान को वहाँ पहुँचने का प्रयास करना चाहिये । जहाँ विज्ञान समाप्त होता है वहाँ से योग प्रारम्भ हो जाता है । विज्ञान बाहर की ओर कार्यरत है तो योग अन्दर की ओर । दोनों की प्रक्रिया एक तरह की है । मेरुदण्ड, स्पाइनल कार्ड के दोनो ओर घनात्मक और ऋणात्मक विद्युत प्रवाह अनवरत चलता रहता है जिसे ‘पिंगला’ और ‘इडÞा’ नारी कहते है । सांइन्स उसे प्रोटोन और इलेक्ट्रोन कहते हंै । स्पाइनल कार्डए के अन्दर सुषुम्ना का प्रवाह है, जिसे न्युट्रोन कहा जाता है । सुषुम्ना के अन्दर ब्रहृम रंघ्र है, जिस पर संघात होने से अनुभूतियों का अलौकिक संसार दृष्टिगोचर होने लगता है, जिसमंे मनुष्य स्वयं की पराकाष्ठा और आत्मीय पराभाव जानकर ब्रहृमाण्ड के मायावी लोक-लोकान्तरों का अवलोकन इच्छानुसार कर सकता है ।
इतना ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्म जाननें वाले हमारे बाबाजी बहुत ही सरल हृदय है, वो सभी को अपना शिष्य बनाते है । उन की दीक्षा की प्रक्रिया बहुत ही अनोखी है । वो दीक्षा के दौरान एक रुद्राक्ष देते है जिसमंे वो संकल्प करके रखते है कि जब तक यह रुद्राक्ष गले में रहेगा तब तक उस शिष्य की आकस्मिक दर्ुघटना से मृत्यु नहीं होगी ।
वैसे तो विश्व के ज्ञटण् देशों में लगभग द्द करोडÞ तक उनके शिष्य है । मैने भारत और नेपाल के सभी उच्च पदस्थ नेता और कर्मचारी को उनके सामने समर्पित होकर शिष्य बनते हुए देखा है ।
ऐसे संत सद्गुरु पाइलट बाबाजी -कपिल अद्वैत) के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है ।

तुलसी की दृष्टि में आतंक::डाँ. बद्रीनारायण तिवारी

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

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तुलसीदास जी एवं उनके द्वारा रचित महान ग्रन्थ रामचरित मानस से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर भारत वर्षतथा विदेशोे के अनेक इतिहासकारों तथा स्वतन्त्र वक्ताओं ने अपनी लेखनी के माध्यम से बुद्धिजीवियों, जिज्ञासु पाठक गणों तथा सामान्यजनों का ध्यान आकषिर्त किया है । परन्तु इस महान ग्रन्थ का आतंकवाद निवारण में कैसे योगदान हो इस तथ्य को ‘तुलसीदास’ की दृष्टि से अध्ययन करने का केन्द्र विन्दु बहुत कम विद्वानों ने ही बनाया है । डाँ. बद्रीनारायण तिवारी जी उनमें से एक है । जिस समय पूरा विश्व आतंकवाद से ग्रसित होकर इस समस्या का निदान खोज रहा है । ऐसी स्थिति में प्रकाशित यह पुस्तक निश्चित रुप से सहायक होगी तथा सम्बन्धित विषय के पाठकों के ज्ञानवर्धन एवं दृष्टिकोण को नवीनता प्रदान करेगी । सम्पर्ूण्ा पुस्तक पच्चीस अध्यायों की अपने विस्तार क्रम में समाहित किये हुये है । तुलसीदास जी के रचित दोहों को श्री तिवारी जी ने प्रत्येक अध्याय में उल्लेखित किया है और उन दोहों के अर्थों पर अध्यायों के शर्ीष्ाक को विश्लेषित किया है ।
प्रथम अध्याय में श्री तिवारी जी ने आतंकवाद एवं आतंकवादी कृत्यों को तुलसीदास जी ने रामायण में निसाचर कृत्यों एवं निसाचरी को कई स्थानों पर प्रस्तुत किया है जो की आतंकवादी कृत्यों की व्याख्या करती है । आतंकवाद के कृत्यों में धर्म को कभी शामिल नही किया जा सकता है क्योंकि कोई भी धर्म निर्वल एवं निर्दोषजन को कष्ट नही देने की बात सदैव करता है ।
दूसरे अध्याय में समाज एवं राष्ट्र को रामराज्य की कल्पना पर आधारित रखते हुए श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी के ममता एवं समतापर्ूण्ा राज्य दर्शन को प्रस्तुत किया है ।
तृतीय अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास के लेखन के प्रति विदेशी लेखकों के विचारों का सजीव चित्रण किया है ।
चतर्ुथ अध्याय में श्री तिवारी जी ने रामचरित मानस के लोकमंगल के पक्ष को तार्किक ढंग से प्रस्तुत कर आतंकवाद की समस्या का समाधान बताया है । क्योंकि जब तक सबके प्रति हित चिन्तन का भाव नही होगा तब तक विश्व-शान्ति की स्थापना सम्भव नही हो सकती है । पाश्चात्य विद्वान जे. एन. कारपेन्टर की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘थियालाजी आँफ तुलसीदास’ एवं डगलस पी. हित की पुस्तक दि होली लेक आँफ दि एक्ट्स आँफ राम में तुलसीदास जी के विश्व बन्धुत्व का उल्लेख है । इन विंदुओं का इस पुस्तक में उल्लेख कर लेखक के रामचरित मानस की आतंकवाद निवारण में विश्व स्वीकार्यता को नया आयाम दिया है ।
पंचम अध्याय में श्री तिवारी जी ने श्रद्धेय तुलसीदास के यस पक्ष को उल्लेखित किया है जो आम आदमी को जाने एवं विकास करने की कला सिखाता है ।
“गीत तुलसी ने लिखे तो आरती सबकी उतारी
राम का तो नाम है गाथा कहानी है हमारी ।”
छठे अध्याय में श्री तिवारी जी ने गोस्वामी तुलसीदास की अमर रचना रामचरित मानस पर विश्व में सबसे ज्यादा हुए शोधों का उदाहरण समेत वर्ण्र्ााकिया है ।
सातवें अध्याय में मुस्लिम कलमकारों द्वारा तुलसीदास जी के रामायण पर की गयी अभिव्यक्तियों का मौलिक वर्ण्र्ााहै । जैसे – उर्दू शायर ‘नजीर बनारसी’ की हृदयस्पर्शी तुलसी को सम्बोधित करती हर्ुइ पंक्तियां -
“संसार को राम ने संवारा लेकिन
संसार के राम को संवारा तुमने ।
जिस राम को बनवास दिया दशरथ ने
उस राम को पहुँचा दिया घर-घर तुमने ।।
इसी प्रकार डाँ. मलिक मोहम्मद, डाँ. जलाल अहमद खाँ, श्री नशूर वाहिदी, मोहम्मद फैयाजुद्दीन अहमद खान, आसिया खातून सिद्दकी, अब्बास अली खाँ, शम्सुद्दीन, हसीब अहमद राही दीन मोहम्मद ‘दीन’ आदि की तुलसी एवं रामायण पर अभिव्यक्ति को संकलित कर श्री तिवारी जी ने पुस्तक को कालजयी बना दिया है ।
आठवें, नवें, दसवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें तथा चौदहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी के बहुरंगी अभिव्यक्तियों को अपने उदाहरणों, उल्लेखों एवं संस्मरणों के आधार पर प्रस्तुत किया है ।
पन्द्रहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने ‘काशी’ में व्याप्त राम नाम की महत्ता एवं काशी में शव यात्रा के प्रस्थान के समय उच्चारित होने वाली ध्वनि ‘राम नाम सत्य है’ को भावुकतापर्ूण्ा अर्थों में प्रस्तुत कर अद्भुत आयाम स्थापित किया है -
जीवन में सत्य का ठिकाना मिलता नही
सत्य, सत्य, सत्य तो तुम्हारा राम नाम है ।
सोलहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण के सर्न्दर्भ में पर्ूव में लिखे लेखकों एवं वाल्मीकि जी की रचित रामायण से अलग किस प्रकार तुलसीदास जी ने अलग अभिव्यक्ति की तथा आम जनमानस के निकट पहुँचाया इसको बहुत से उदाहरणों द्वारा अद्भुत रुप में प्रस्तुत किया है, तथा संसार के आतंकवादियों जिन्हें तुलसीदास जी निसिचर कहते है । उस सर्न्दर्भ में उनकी रचित निम्नांकित महत्वपर्ूण्ा लाइन को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है ।
अस्थि समूह देखि रघुराया । पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ।।
सत्तरहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने भारतीय जनमानस के अमर ग्रन्थ राम-चरित मानस के सम्बन्ध में विदेशी लेखकों के हृदयस्पर्शी पे्रमभाव को उदाहरणों द्वारा भावपर्ूण्ा रुप से प्रस्तुत किया है जैसे रुसी भाषा के विद्वान अलेकर्सइ वारान्निकोव के समाधि स्थल पर देवनागरी लिपी में लिखे तुलसी का दोहा -
भलो भलाइहि पै लहइ-लहइ निचाइहि नीचु
सुधा सराहिअ अमरतों गरल सराहिअ मीचु ।।
अठ्ठारहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने, तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण की महत्ता एवं अयोध्या परिक्षेत्र की महत्ता को उचित उदाहरणों द्वारा स्थापित किया है ।
उन्ननीसवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी के गंगा महिमा के वर्ण्र्ााको भावपर्ूण्ा अभिव्यक्तियों द्वारा उल्लेखित कर मानव संस्कृति की रक्षा में तुलसीदास जी की पर्ूव दूरदर्शिता का उल्लेख किया है ।
बीसवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने राम मे लंका पर विजय का चित्रण मुस्लिम साहित्यकारों द्वारा किस प्रकार प्रस्तुत किया गया इसको उदाहरण सहित अभूतपर्ूव रुप में प्रस्तुत किया है ।
इक्कीसवीं अध्याय में श्री तिवारी जी ने दूर्रदर्शन दिल्ली केन्द्र से राष्ट्रीय प्रसारण में ‘निर्बल के बल राम’ के संस्मरण का उल्लेख किया है जो अविस्मरणीय है ।
बाइसवें, तेइसवें एवं चौबीसवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने आधुनिक लेखकों में दिनकर जी एवं महादेवी वर्मा, यशपाल जी इत्यादि के मानस रामायण एवं तुलसी चरित्र पर विश्लेषण को तर्कपर्ूण्ा रुप से प्रस्तुत किया है । इसके अलावा इन अध्यायों में तुलसी की रचना रामायण किस प्रकार आम जन मानस में चेतना जगा दी है इसका भी वर्ण्र्ााविस्तृत रुप में दर्शित होता है ।
पच्चीसवें अध्याय में आतंकवाद श्री राम और तुलसी की दृष्टि में श्री तिवारी जी ने पुस्तक के सार संक्षेप को प्रस्तुत किया है ।
इस अध्याय में आतंकवाद नीति को किस प्रकार हतोत्साहित किया जाय इसका चित्रण मानस के चौपाइयों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है जिसमें मानव कल्याण की स्थापना में श्री राम के सफल प्रयासों का वर्ण्र्ााहै । अतः डाँ. बद्रीनारायण तिवारी जी की पुस्तक आतंक ः तुलसी की दृष्टि में पुस्तक के गहन अध्ययन के उपरान्त निश्चित रुप से इस तथ्य को स्थापित किया जा सकता है कि ‘आतंक’ के निवारण में श्री राम जैसी संकल्पबद्धता, श्री हनुमान जी जैसी दृढÞता, सीता जी जैसी शुचिता, श्री दशरथ जी जैसी ममता, कौशल्या जी जैसी समता, श्री लक्ष्मण जी की आक्रोशित ही सहायक हो सकती है ।
यह पुस्तक प्रबुद्धजनों, प्रज्ञाविदो, रक्षाविदों, शोधार्थियों एवं आम नागरिकों का ध्यान निश्चित रुप से अपनी ओर आकषिर्त करेगाी । तथा सम्पर्ूण्ा भारतवर्षमे गवेषणा एवं चिन्तन आधार स्तम्भ के अर्न्तर्गत प्रमुख पुस्तक के रुप में जानी एवं पढÞी जायेगी ऐसा मेरा अटल विश्वास है ।
अंत में डाँ. बद्रीनारायण जी के लेखन के प्रति संकल्पबद्धता को शत्-शत् नमन करते हुए उनसे अन्य नये लेखन मानको की अपेक्षा है ।
प्रस्तुतिः डाँ. आर तिवारी

लोडसेडिंग:: पिरशु प्रधान

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

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म आई दरवाजे पर और काँलबेल बजाने लगी । मैंने लगातार बजते हुए काँलबेलको सुना पर दरवाजा खोलने का मन नहीं हुआ । काँलबेल लगातार बजती रही और मैं उसका आनंद लेता रहा । कान्छा दूध लेने गया है शायद नहीं तो वही दरवाजा खोलता । पर तुम काँलबेल बजाती रही । मैंने सोचा – कैसी गंवार लडÞकी है – इतने सबेरे क्यों यहां आई है – अभी तो सिर्फआज बजे हैं । नौकरी के लिए मेरी चापलूसी करने की जल्दी है उसे । बेमन से उठा मैं । नीचे उतरकर दरवाजा खोला । तुम वहां खडÞी थी । मैं देखता ही रह गया । तुम इतनी सुन्दर होगी मैंने सोचा नहीं था । दोस्त तो कह रहा था लडÞकी सुन्दर है सुन्दर, पर इतनी सुन्दर मेरी कल्पना से परे । तुम मेरी नजर को भांप गई । मैंने कहा – “चलो अन्दर ।” फिर हम अन्दर चले आए ।
बैठक में सिर्फमैं और तुम थे । मैं तुम्हारा सुबह का सूरज जैसा चेहरा देखने लगा । तुम मेरे बैठक को देखने लगीं । पर उस कमरे में ध्यान देकर देखनेवाली तो वैसी खास कुछ नहीं थी । टेबल पर रखे हुए फूल बासी पडÞ गए थे । सिंगापुर से लाई गई घडÞी भी वक्त बताना भूल चुकी थी । सोफे पुराने पडÞ गए थे । एक आकर्ष लडÞकी की नंगी तस्वीर पर तुम्हारी नजर म गई । तुम बहुत देर तक उस तस्वीर को देखती रही । मुझसे नजरें चुराकर भी तुम उसी तस्वीर को देखती रहीं । शायद तस्वीरवाली से खुद को तौल रही हो – है न -
यह किस कलाकार की तस्वीर है जो मेरी विदेशी दोस्त र्-गर्ल-प|mैंड) ने दी है । मैं तुम्हारी नजर उस तस्वीर से हटाना चाह रहा था ।
“यह तस्वीर मुझे बहुत अच्छी लगी । पर बैठक में क्यों… – बहुत लोग आते जाते हैं ।” तुमने पूछा । मुझे मालूम था तुम यह सवाल करोगी । और इसका जवाब मैंने तुरंत दिया – “नंगा होना मानव की प्रकृति है, सुन्दरता है । प्रकृति ने उसे नंगा ही पैदा किया है । क्यों हम कृतिमता की चादर ओढÞें -”
तुमने मेरी बातें ध्यान से सुनी । इसलिए मैं छोटामोटा भाषण देने को तैयार हो गया – आदमी प्रकृति से जन्मा है और वह प्रकृति में ही खुश होता है । हमने ही सुन्दर प्रकृति का बलात्कार किया औरु उसे कुरुप कर दिया है । हमें प्रकृति के शाश्वतता और सुन्दरता को संरक्षण देना है ।
इसी वक्त कान्छा दूध लेकर आ पहुंचा । मैंने उसे दो प्याली चाय बनाकर लाने के लिए कह दिया । और वह दौडÞते हुए किचन में चला गया । वह गैस जलाने लगा और हमें गैस की अजीब सी गंध सताने लगी । कहीं गैस सिलिन्डर से लीक तो नहीं हो रहा । मैं उठा और किचन की तरफ चला गया और कान्छा को चाय में चिनी कम रखने के लिए कह आया ।
चाय टेबल पर आ गई थी । चाय की भाप के साथ ही हमने बात करने की कोशिश की पर बातचीत का मुद्दा तय नहीं हो पा रहा था । मैं याद करने की कोशिश करने लगा ।
मुझे मालूम था तुम नौकरी की बात करोगी । क्योंकि कल रात ही मेरे एक दोस्त ने तुम्हें कहीं एडजस्ट करने की बात कही थी । और ‘बाकी बातें अपने जिम्मे’ की बात कही थी । कल रात शायद स्काँच कुछ ज्यादा ही लग गया । मैं हवा में कहीं उडÞ रहा था । उडÞान तो अच्छी थी, बादलों से लुकाछिपी खेलना अच्छा लग रहा था । वहीं पडÞे रहना बोरियतवाला काम था और मजा भी न आता । मैंने तुम्हारी नौकरी को बादलों के बीच की उडÞान से तुलना की । यानि कि तुम्हें नौकरी दिलवा देने या देने की बात जितनी आनन्द और उत्साहवर्द्धक थी, उसके नतीजे की स्थिति जमीं में पछाडÞ खाने जैसी थी । इस मामले में मेरा खास अनुभव था । उम्र के दौर में चालीस पार कर जाने पर लातें खाने की प्रक्रिया तीव्रतर हो जाती है ।
“तुम क्यों आई हो -” मैंने अब शुरु किया क्योंकि हम चाय पी चुके थे ।
“कहीं एडजस्ट होने के लिए ।” तुमने सरलता से अपनी बात रख दी ।
“एडजस्ट… नौकरी ढूंढ रही हो -” तुमने हां में शर हिलाया और मुझे अच्छा लगा ।
“तुम्हारी शिक्षा कितनी है और अनुभव कितने वर्षों का है -” मैंने एक ही बार में पूछ डाला । फिर तो तुम गंभीर बन गयी । थोडÞी देर बाद खयाल आया यह सवाल तो मुझे करना ही नहीं चाहिए था । पर तुम्हारी नौकरी के लिए कहीं एप्रोच करने के लिए यह जरुरी भी था । जवाब में तुमने टाइप किया हुआ बायोडाटा मेरे सामने रख दिया । जो इस तरह का था ः
नाम ः प्रीति
जन्मस्थान ः उदयपुर
शिक्षा ः दशवीं प्ास
अनुभव ः टेलिफोन व गार्मेंट संबंधी
पता ः नया बानेश्वर
यह बायोडाटा साधारण सा था । मुझे मालूम पडÞ गया तुम प्रीति हो । पर उस बायोडाटा में तुम्हारी जाति नहीं लिखी थी । यह जानकारी भ्ी नहीं थी कि तुम विवाहित हो या अविवाहित । अनुभव भी कुछ स्पष्ट नहीं था । जन्म की तारिख न होने से तुम्हारी उम्र का पता भी नहीं चला । मैंने इन बातों को जानने की कोशिश नहीं की । मैंने पूछा – “कितनी पगार की आशा करती हो -”
“कम से कम दो हजार भी न हों तो काठमांडू में कैसे जीया जा सकता है -” तुमने कहा और मैंने सर हिलाकर र्समर्थन जताया ।
“बायोडाटा में फोटो तो नहीं है -” मैंने दूसरा सवाल दागा ।
“मैं खुद सर के सामने उपस्थित हूं तो फिर फोटो की क्या जरुरत -” तुम्हारा जवाब सटीक था ।
तुमने पहली बार मुझे ‘सर’ पुकार कर मान्यता प्रदान की यह अच्छी बात थी । पर मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी क्योंकि में तुम्हें दोस्त के रुप में देखना चाहता था । तुमने पहली मुलाकात में ही बाँस और मुलाजिम का संबंध गढÞना चाहा जो मुझे सहज नहीं लगा ।
“नौकरी देनेवाले तो दूसरे लोग हैं और वे तुम्हारा फोटो देखना चाहेंगे … फिर मां बाप और जाति के बारे में भी कुछ नहीं लिखा ।”
“औरत की कोई जात होती है सर -” तुम गंभीर रुप से मुस्कुर्राई । मैंने सोचा – आजकल की लडÞकियां मेकअप के अलावा बातें बनाना भी खूब जानती हैं ।
“इसका मतलब तुम शादीसुदा नहीं हो -” मैंने पूछा ।
“आपको मैं बेटी जैसी नहीं लगती क्या -” यह मेरे लिए मुश्किल सवाल था । मेरे दिमाग में तूफान उठने लगा । क्या मैं इतना बूढा हो गया हूं – मुझे वक्त ने इतनी दूर एकांत में ला पटका है – अर्थात् मेरे वक्त के स्वर मिटने लगे । मुझे लगा मैं वहां से उठकर चला जाऊं । चक्कर सा आने लगा और लगा उलटी हो जाएगी । मेरे चेहरे पर अचानक आए परिवर्तन से वाकिफ हो तुमने सवाल किया – “आज सर की तबीयत ठीक नहीं है क्या -”
“कल ज्यादा शराब पी गया था । सबेर से ही हैंग ओवर है, सर दर्द से फटा जा रहा है ।” मैंने स्थिति को सहज बनाया । पर भीतर से मैं जल रहा था और भन्ना रहा था । मेरे सारे रास्ते बंद होते देख मैंै घबरा गया । सोचने लगा – भाग्य ने मुझ को प्रदूशित नदी के किनारे ला फेंका है । कान्छा को और दो कप चाय का आर्ँडर देकर मैं खुद को आश्वस्त करने की कोशिश करने लगा ।
तुम वातावरण में सहजता ढूंढ रही थी । कहा – “मैं सर को दुःख दे रही हूं, क्या करुं, मैं बहुत अभागिन हूं सर ।”
“तुम्हारी बीती हर्ुइ कहानी मुझे नहीं सुननी प्रीति । क्या फायदा सुनकर भी । सभी डेवलपिंग कन्ट्री के लोगों की कहानी एक सी होती है । वक्त, जगह और नाम में अंतर होता है बस ।” मैं जरा दार्शनिक हो गया था । नौ बजने वाले थे और मुझे फैक्टरी के लिए देर हो रही थी । वहां आजकल बहुत काम बढÞ गया था । जर्मनी व अमरिका के खरीदकर्ताओं ने न केवल आर्ँडर बढÞाया था बल्कि वे खुद फैक्टरी देखने के लिए आने वाले थे ।
“सर का परिवार कहां है -” तुमने दूसरा सवाल किया ।
“पत्नी अमरिका चली गई, बेटों के साथ रहने । मैं अकेला बूढा यहा हूं । एक नौकर के सहारे मुझे छोडÞ गए हैं ।” कहते हुए मैंने हंसने की कोशिश की पर मुझे मालूम था उस हंसी में कडÞवाहट घुला हुआ था ।
बैठक में रखे हुए मेरे पुराने फोटो पर तुम्हारी नजर अटक गई । आज से तीस साल पुरानी वह तस्वीर एक सुन्दर व आकर्ष युवक की थी तब । मैं अब जल्दी में था । तुम्हें शायद अपनी नौकरी पक्की करनी थी । परन्तु मेरे यहां तो नौकरी थी नहीं ।
मैं क्या चाहता हुं तुम्हें मालूम करना चाहिए था मैंने पूछा – आज कौन सा दिन है – मैं आजकल बहुत व्यस्त हूं ।
“रविवार” तुमने झट् कह दिया ।
“शुक्रबार को आ जाओ… गुड प|mाइडे… शाम को क्यों – मैं उसी दिन तुम्हारी नौकरी पक्की कर दूंगा ।” मैने स्पष्ट शब्दों में कहा और तुम चली गई ।
रविवार से शुक्रवार तक के छह दिन मेरे लिए कष्टकर गुजरे । एक युवती के बारे में इतना सीरियस शायद मैं पहली बार हुआ था । छह दिन तक भावुक बनता रहा और अच्छी सी शुक्रवार का इन्तजार करता रहा । दिन कैसे बीते मैं याद नहीं कर सका । पर इस दौरान में सिर्फतुम्हें याद करता रहा । प्रीति को याद करता रहा और खुद से सवाल करता रहा – इस उमर में भी कोई प्रेम में पागल हो सकता है क्या – क्या बूढे पेडÞ में भी फूल खिलाया जा सकता है -
वह शुक्रवार का दिन था । मैने आँफिस से छुट्टी ले रखी थी । उस दिन सूरज चाय के साथ न होकर रेडलेवल हृविस्की के साथ उगा था । अपने सफेद बालों में कालिख पोतकर काला बना लिया था मैंने । चेहरे पर क्रिम लगाकर दिनभर प|mाइड चिकन के साथ छछछ सिगरेट पीता रहा । स्टार टीवी के उत्तेजक दृश्यों को देखकर खुद को कामुकता की लहरों पर उद्वेलित करता रहा । अखबार हाथ में था पर उसमें क्या छपा था मुझे मालूम नहीं था । मैंने खुद को तीस साल पहलेवाले अपने रुप में ले जाने की कोशिश की । वो भी एक समय था जब सिर्फप्रेम के गीत गाते थे, प्रेम की कविताएं लिखते और पढÞते थे । वो क्या वक्त था – चौराहे पर घंटों बैठते । मैंने फिल्म फेयिर देखकर रख दिया । मुस्तांग का घोडÞा बनने के लिए मुस्तांग की दो गोलियां निगल ली । समय खाली ही बीत रहा था । सिर्फशून्य था और खाली दिमाग में हृविस्की का प्रभावपर्ूण्ा आक्रमण था ।
फिर तो वही बात हो गई । शुक्रवार शाम को तुम आई और उसी तरह काँलबेल बजाने लगी । मैं खुद दरवाजा खोलने के लिए जा पहुंचा ।
“क्या घर में कोई और नहीं है जो सर खुद दरवाजा खोलने आ पहुंचे -” तुमने पूछा ।
“आज तुम्हारी सेवा कर रहा हूं ।” मैंने मुस्कुराते हुए तुम्हें छेडÞा । हम फिर बैठक में आ गए ।
टेबल पर हृविस्की और बियर की बोतलें थी -
“क्या लोगी -” मैंने पूछा ।
“कुछ नहीं ।” तुम्हारा जवाब था ।
“मैं तो हृविस्की लूंगा । एक ग्लास बियर नहीं लोगी -”
“मैंने कभी पी नहीं है ।”
“तब आज पी लो न … ।”
मैंने एक ग्लास में बियर उंडेलकर तुम्हारे हाथ मैं थमा दिया । तुमने बियर चाय की तरह धीरे धीरे न पीकर मठ्ठे की तरह एक ही बार में पूरा ग्लास गटक दिया । मैं हैरान हो गया और एक ग्लास और तुम्हारे हाथ में दे दिया ।
“तुम किस तरह की नौकरी करोगी -” मैंने गंभीर होकर पूछा ।
“जैसी मिलेगी… खाने पीने और रहने के लिए पैसे हो बस… ” तुम्हारे चेहरे पर रंग चढÞने लगा ।
तुम और लाल दिखने लगी । तुमसे बातें करने के लिए मेरे पास विषय नहीं था । थोडÞी देर सोचता रहा । हां तुम जब पहली बार आई थी तो तुमने मेरे फोटो के बारे में पूछा था और बहुत देर तक देखती रही थी । मैंने पूछा – “मेरा फोटो कैसा लगा -”
“बहुत अच्छा । बहुत सुन्दर है पर क्या वह फोटो आपका ही है -”
“क्या मेरा फोटो जैसा नहीं लगता -”
“नहीं, बिल्कुल नहीं । उस चेहरे में जो यौवन का तेज है, जिस सौर्न्दर्य का मान्यता है वह आपमें कहाँ – आप जल्दी बूढे हो गए लगते हैं … ।” तुमने कमेंट किया ।
“हां वैसा ही है । मैं अपनी इच्छा से बूढÞा तो नहीं हुआ, न ही अब होना चाहता हूं । पर प्रकृति से कोई लडÞ सका है क्या -”
शाम होने को आई थी । उस दिन लोडसेडिङ का दिन था । कैंडल के शुभ्र उजाले में तुम्हारा चेहरा देखकर भूपि शेरचन की कविता “मैनबत्ती को शिखा” अचानक याद आ गई ।
“चिली चिकन खाओ न… मैंने खुद बनाया है ।”
“अच्छा है, बहुत स्वादिष्ट है ।”
मैं एक प्रकार से शून्य हो चला था । मैं अमरिका में बिताए गए हसीन लम्हें याद कर रहा था । मैंने तुम्हें पास बुलाया साथ बैठने के लिए । तुम डर गई । तुम्हारी भयभीत आंखें हिरण की जैसी लगी – जो शिकारी के भय से छिपती है जंगल में । मैं उत्तेजित होने की कोशिश करने लगा । एक जवान औरत के आगे खुद को उत्तेजित करने की विसंगति ने मुझे निराश कर दिया । पर मैं तैयार तो हो गया । मैंने तुम्हारे नरम हाथ अपने हाथ में लिए और सहलाने लगा ।
“क्या आपको शोभा देता है – ऐसी हरकत करते हुए इस उमर में -” दो शब्द मेरे भीतर पहुंचे और कहीं गुम हो गए ।
“मैं तुम्हारी हस्तरेखाएं देखूं । तुम्हारा भाग्य कैसा है – कैसा पति मिलेगा – कैसी नौकरी मिलेगी – बच्चे कितने होंगे -” तुम्हारे नरम और कमसिन हाथ लेकर उन्हें सहलाता रहा । खेलता रहा उनसे । ज्योतिष विद्या को कभी न जाननेवाला, आदमी की हस्तरेखाएं देखकर भविष्यवाणी करना कम हास्यास्पद नहीं था । किन्तु में मजबूर था । तुम सहज नहीं हो रही थी, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम था और तुम्हारा चेहरा लजाना, तुम्हारा न खुल पाना मुझे खुशी और आनंद दे रहा था ।
मैंने तुम्हें बाहों में लिया और चुमने की कोशिश करने लगा । तुम्हारे होठों से अपने होंठ सटाए आनंदानुभूति करने लगा । तुम्हारे कोमल अंगों को सहलाए । अपने आवेग को शांत करने की कोशिश करने लगा । तुम खुद को मुझ से मुक्त करने की कोशिश में लगी थी । मैंने तो तुम्हे न छोडÞने की कसम ही ले रखा था । मैं अपने तीस साल पुरानी जवानी को पुनर्जीवित करने की धुन में था । मैं विगत में जाकर जंग बहादुर बनना चाह रहा था और तुम्हें भोगना चाह रहा था ।
लगता था वक्त थम गया है । लोडसेडिंग का वक्त अभी खत्म नहीं हुआ था । मैंने अपने अन्दर बहुत गर्मी महसूस की । वह गर्मी बिजली की तार की तरह ही मेरे बदन के नीचले हिस्से में बह गई । ठीक उसी वक्त एक ठंडी लहर दौडÞ गई बदन में । मैंने बरफ होने का यथार्थ स्वीकार कर लिया । लगा एक लहर बहुत ऊँचा उठकर फिर बैठ गया है । लोडसेडिंग खत्म होने पर हम वहां नहीं थे ।
उसके बाद दूसरे दिन के स्थानीय अखबार में मैंने तुम्हें रेप किया – ऐसी सनसनी खेज खबर छपी थी ।
अनुवाद ः कुमुद अधिकारी

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