हित्यकार का व्यक्तित्व अपने ही अनुरुपविशिष्ट शैली, माध्यम और उपकरण का चयन करता है । अतएव कृतित्व की मूल प्रेरणाओं को समझने के लिए साहित्यकार के व्यक्तित्व की प्रमुख विशिष्टताओं की विवृति आवश्यक है । बेनीपुरी जी की विविधता से भरे हुए जीवन में व्यक्तित्व की कई विशिष्टताएँ निखर कर हमारे सामने आती हैं ।
बेनीपुरी जी मध्यम कद, साँवले रंग एवं गठीले शरीर के व्यक्ति थे । आँखों पर मोटा चश्मा, मुंह में पान की ललाई और होठों पर प्रकट हास्य के कारण उनका व्यक्तित्व अधिक निखरा हुआ लगता था । वे धोती, कर्ुता पहनते थे । हिन्दी मंदिर के महान साहित्यकार के आकर्ष व्यक्तित्व की एक झांकी राममर्ूर्ति ‘रेणु’ ने इस प्रकार दी है -काले प|mेम के चश्मे, जिनमें से स्नेह बरसने वाली दृष्टियाँ हमारे अंतर में पैठकर गहराइयों को टटोलकर आत्मीयता एवं अपनत्व के अमृतदह में हमें नहला देती हैं, प्रतिभा-किरणों को बिखेरने वाला उन्नट ललाट, ताम्बूल-रस से अरुण बने होठों पर आँख मिचौनी करनेवाली स्मृति रेखा जिससे ‘खिलखिल’ । अट्ठहास में बदलते देर कभी नहीं लगती, साँवला चमकदार मुखमंडल, यह श्वेत खद्दर धोती व कमीज पर काली ऊनी नेहरु बास्कट – थोडÞे में यही श्री बेनीपुरी जी का भौतिक रुप रहा था जो कि एक साथ जीवन के सरलतम एवं गहनतम मूल्यों का अप्रतिम प्रतीक रहा । बेनीपुरी जी के साहित्य में व्रि्रोह की जो गति है, उनकी विविध रचनाओं में नवसमाज की जो जिज्ञासा और नये पन का आकर्षा है, वह उनके शारीरिक गठन और बाहृय व्यक्तित्व के अनुरुप ही है । डाँ. जगदीश चन्द्र माथुर ने लिखा है कि मैंने यह प्रफुल्ल चेहरा देखा तो मुझे लगा कि उनकी फडÞकती हर्ुइ गद्य-शैली ने ही देह धारण कर ली हो । लेखन शैली और बाहृय व्यक्तित्व का ऐसा सामंजस्य कम ही होता है ।
बेनीपुरी जी अपनी सृजनात्मक रचनाओं के साथ-साथ अमर हैं, परन्तु हिन्दी साहित्य के दर्जनों कवियों और साहित्यकारों के सफल प्रेरक के रुप में उनका महत्व कुछ कम नहीं है । उनसे प्रेरणा पाकर साहित्य क्षेत्र में पैर रखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकारों की लम्बी सूची बन सकती है । साहित्य के क्षेत्र में नया आनेवाला जो भी व्यक्तित्व उन्हें मिलता, वे उस नई पौध को पल्लवित-पुष्पित करने के लिए दौडÞधूप करते थे । उनकी रचनाओं को अपनी पत्रिकाओं में प्रकाशित करना, पुस्तककार रुप में प्रकाशित करना और प्रेरणा देना बेनीपुरी जी कभी नहीं भूलते थे । राष्ट्र कवि दिनकर ने बेनीपुरी को अपनी ‘आत्मा की शिल्पी’ मानते हुए लिखा है – बेनीपुरी के । अपनी आत्मा का शिल्पी कहकर मैंने अत्युक्ति नहीं की थी । वे सचमुच मेरी आत्मा के शिल्पी और कवि जीवन के निर्माता थे । अपनी तात्कालीन कविताओं में कई बातें मैंने बेनीपुरी के मुख से सुनकर लिखी थी ।
बेनीपुरी जी की प्रेरणा से बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन में एक नयी चमक आ गयी थी । अपनी विविध पत्रिकाओं में उन्होंने नये लेखकों को स्थान दिया । वे प्रायः कहते हैं – मैं नयी प्रतिभाओं का शुरु से ही प्रशंसी रहा हूं । भला नये पौधे किसे नहीं भाते । लक्ष्मी नारायण मिश्र जी की प्रारम्भिक कृति की पांडुलिपि, जो प्रसाद जी के पास कई दिनों तक पडÞी थी, बेनीपुरी जी ले गए थे और एक रात में ही छपवा कर दूसरे दिन प्रसाद जी के पास प्रतियाँ देकर उन्होंने प्रसाद जी को भी आर्श्चर्यचकित कर दिया था । लक्ष्मी नारायण मिश्र जी का नाटक ‘अशोक’ बेनीपुरी जी की प्रेरणा से ही लिखा गया था । प्रभाकर माधवे ने भी उनकी प्रेरणा को स्वीकार करते हुए लिखा है – मुझे अब भी याद आता है कि वे -बेनीपुरी) न होते तो आज जो भी मैं कुछ लिख रहा हूं वह कभी नहीं लिख पाता । श्री क्षेमेन्द्र सुमन ने लिखा है – बिहार में जो भी साहित्यकार प्रतिष्ठा के उत्तुंग शिखर पर समासीन है, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिन्हें यदि बेनीपुरी जी जैसे साहित्यकार का र्सतर्क, सबल और प्रेरक सहयोग प्राप्त न हुआ तो कदाचित् वे इतनी प्रतिष्ठा अर्जित नहीं कर पाते । इस प्रकार बेनीपुरी अतुल प्रेरणा के प्रचण्ड स्रोत थे । आधुनिक मूल्य विघटन के युग में छोटों के प्रति दिखाई गयी इस सघन आस्था के लिए हिन्दी साहित्य बेनीपुरी जी का चिर ऋणी रहेगा ।
बेनीपुरी जी का टढ वर्षों का जीवन कर्मक्षेत्र के योद्धा का जीवन है । जीवन के अनेक क्षेत्रों में उनकी सफलता का प्रमुख रहस्य यही था कि वे निःस्वार्थ भाव से कार्य किया करते थे । इसी में वे जीवन का सच्चा आनंद, खुशी और सुख मानते थे । इस सर्ंदर्भ में विश्वविख्यात नाटककार जार्ज वनार्ड शा की यह उक्ति उनके लिए आदर्श थी – ‘कार्य ही मेरे जीवन की खुशी है ।’ जिस किसी क्षेत्र में पैर बढÞा वे इसी निष्ठा के साथ कार्य करते थे । साठ साल के हो जाने पर भी उनकी निष्ठा में परिवर्तन नहीं हुआ । वागमती काँलेज और गाँधी भूमि की स्थापना में उन्होंने जिस कर्मनिष्ठा का परिचय दिया वह अपने आपमें एक आदर्श है । र्सर्दी के दिनों में वे रात-दिन चन्दा उगाहने के लिए घूमते रहते थे । भाग्य अथवा नसीब में उनका विश्वास नहीं था । उनके मतानुसार मनुष्य से बढÞकर कोई भाग्य विधाता नहीं । पहले मनुष्य का पौरुष, शक्ति, काम करने की धुन और तब भाग्य । वे कहते थे – ‘जो बीत गया वह भाग्य, जो हो रहा है, वह पौरुष और जो आनेवाला है – वह विश्वास ।’ कर्म के संबंध में वे गीता के सिद्धान्त का पालन करते थे और दूसरों को भी उसी प्रकार की सलाह देते थे । कर्मवाद उनके रोम-रोम में बैठ गया था, तभी उनमें अंग्रेजी शासन की कडÞी-बेडिÞयों को जर्जर करने की क्षमता आयी थी । समाजवादी दल का संगठन, किसान संगठन, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का विकास, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का कार्य, बेनीपुरी प्रकाशन और उसके द्वारा ग्रंथावली के दो खंडों का प्रकाशन, उनकी भाषा में स्मारक रुप, उनका बडÞा मकान ये ऐसे कार्य हैं, जो बेनीपुरी की कर्मनिष्ठा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
बेनीपुरी जी व्रि्रोही व्यक्तित्व के साहित्यकार थे । उनकी दृष्टि नये समाज पर थी । नया समाज का रचनाकार अपने युग की परम्परित चेतना के विरुद्ध आवाज बुलंद करता है । बेनीपुरी जी के व्रि्रोही व्यक्तित्व के बीज उनके बाल्यकाल में पडÞ गये थे । समाज में बढÞती अंधविश्वास, कुरीतियों और उत्पीडÞन का प्रत्यक्ष ज्ञान उन्हें बचपन में ही हो गया था । अपने जीवन के संस्मरणों में उन्होंने कहा है कि जब उनकी माँ की मृत्यु हर्ुइ तब उसके पैरों में इसलिए कीलें ठोकी गयी कि वह चुडैÞल बनकर कहीं वापस न आये । इस बुरे रिवाज का बालक रामवृक्ष के मन पर गहरा असर हुआ था । बचपन में अग्रेजी सिपाही द्वारा निरपराध भारतीयों पर कोडÞे बरसते हुए देखकर उनके मन में शासकों के अत्याचारों के खिलाफ व्रि्रोह की भावना जगी थी । इस व्रि्रोह भावना ने आगे वह रुप धारण किया कि उनका क्रांतिकारी, आंदोलनकारी, राजनीतिक योद्धा और अगियाबैताल वाला रुप प्रायः बहुत उभरकर लोगों के सामने आया । वे व्रि्रोह के प्रतीक बन गये । उनको प्रत्येक पग इसी भावना द्वारा प्रेरित था । उन्होंने अपने परिवेश और परिस्थितियों के अवांछनीय तत्वों के सम्मुख स्वयं को कभी समर्पित नहीं किया । उनका विरोधी व्यक्तित्व कभी निर्बल नहीं पडÞा ।
यह कहना असंगत नहीं होगा कि बेनीपुरी जी की कथनी और करनी में काफी एकरुपता थी । उन्होंने क्रान्तिकारी विचारधारा को केवल व्यक्त ही नहीं किया वरन उस विचारधारा के अनुरुप ही अपने जीवन को प्रवर्तित भी किया । उन्होंने कहा भी है – केवल प्रचलित विचार प्रवाह को ही बदलना क्रांतिकारी का काम नहीं होता – ‘थियोरी’ के साथ ‘एक्शन’ पर भी पूरा ध्यान देता है । वह जहाँ कहीं अत्याचार देखता है, भिडÞ जाता है, लडÞ पडÞता है । जहाँ एक ओर बेनीपुरी जी का साहित्य क्रांति की ‘थियोरी’ है वहाँ दूसरी ओर उनका जीवन एक व्रि्रोही का जीवन है । बीमारी के दिनों में अस्पताल में उन्हें पानी देने वाले एक आदमी के संबंध में जब उनकी पत्नी ने कहा कि न जाने, कौन मेहतर या जमादार पानी पिला गया, तो बेनीपुरी जी तुरुन्त उठ कह उठे – मेहतर जमादार क्या होता है – आदमी था । पानी लेकर आया, मैंने पी लिया । आदमी ने आदमी को पानी पिलाया । उनका यह उत्तर स्पष्ट कर देता है कि उन्होंने अपने को र्सवथा नये समाज के अनुकूल बनाया था । निःसंदेह वे ‘क्रांतिकारी’ मनुष्य थे और उनका ध्येय नये मूल्यों की स्थापना एवं नये समाज का निर्माण करना था । समाज जब बदलने लगता है, वह अपनी प्रतिक्रिया को तेज करने के लिए बेचैन मनुष्य को जन्म देता है । बेनीपुरी जी के भीतर बेचैन कवि, बेचैन चिंतक, बेचैन क्रांतिकारी और निर्भीक योद्धा, सभी एक साथ निवास करते थे ।
लेखक म.बि.ब. क्याम्पस, राजविराज सह-प्राध्यापक -हिन्दी) हैं ।