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September , 2010
Wednesday
इतिहास में राजनैतिक उद्देश्य की परिपर्र्ति के लिए युद्ध को प्रथम अथवा अंतिम विकल्प के ...
-वीणा सिन्हा उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र की कार्यप्रणाली, उद्देश्य एवं आचार-सीमाओं का निर्धारण होने के बावजूद ...
मगवान श्रीकृष्ण ने सोलह हजार से भी ज्यादा लडकियों से शादी रचा कर भावी युवकों ...
देश अजीबो-गरीब भंवर जाल मेंफँसा हुआ है । राजतंत्र की बिदाई और गणतंत्र की स्थापना के ...
गंणतंत्र दिवस के मौके पर भारत सरकार तथा भारत की जनता को बधाई दी । ...
देश की राजनीति दिशाहीन होती जा रही है । संविधान निर्माण प्रक्रिया दिशाहीन राजनीति ...
मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक की ओर से पर्यटन एवं उड्डयन राज्य मंत्री शत्रुघ्न प्रसाद ...
नागरिकता का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आया है । मधेशवादी नेता गजेन्द्र ...
रेश एक अच्छी कम्पनी में नौकरी करता था । उसका बाँस और वह पिछले पाँच ...
भारत विरोध कब तक खों लोगों के बीच मंच सजा हुआ और उस पर आसीन ...
डा. दयानन्द वज्राचार्य, डा. खुमनारायण पौडेल और डा.र्इशान गौतम कृत पुस्तक "नेपालमा विज्ञान तथा प्रविधि" के मुताबिक ...
भारत धर्मभीरु देश है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है । हिन्दुस्तान ...
'बडे भाग मानुष तन पावा, सुर दर्लभ सब संतन गावा' गोस्वामी तुलसीदास रचित राम चरित ...
सर्र्खियों में है दलाई लामा । चीन की वजह से ही हो रहा है ...
नेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में ...
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी ...
लीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण ...
दुनियाँ अनोखी है । यहाँ रहने वाले अनोखें-अनोखें शौक भी पाला करते हैं । ...
ऋतुओं में बंसत को ऋतुराज कहा जाता है, आनन्द को पर्ण्ता कहा जाता है, खिले ...
भारत के प्रति चीन की दर्भावना को लेकर एक और प्रश्न आम तौर पर पूछा ...
नेपाली राजनीति के महानायक गिरिजाप्रसाद कोईराला की मृत्यु के परिणाम स्वरूप राष्ट्र ने एक अनुभवी ...
काठमाडौ, चैत्र ७ - काँग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइरालाको शनिबार दिउँसो देहवासन भएको छ । ...
कनाडा का वेन्क्युवर टोरेन्टो एवं मोनट्रेल के बाद तीसरा सबसे बडा शहर है । वेन्क्युवर ...
जनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की ...
हम छोटे थे, शहर गली में गलियारें या किसी नुक्कड पर या हो सकता ...
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हिमालिनी डेस्क अन्तरक्षेत्रीय सर्म्पर्क अभिवृद्धि औरु जलवायु परिवर्तन की चुनौती का संयुक्त रूप से सामना करने ...
तर्रार्इर्र्मधेश से जुडे मुद्दं सत्ताधारी मधेशवादी दलों के लक्ष्य से बहुत दूर होता नजर आ ...
प्रचण्डजी की नेतृत्व की सरकार ने जब उट की टेढी पीठ की तरह करवट भी ...
यह तो शुरूआत हैं, आगे बहुत कुछ करना है’वीरगंज । विगत २७ और २९ फागुन ...
इस राजनीतिक संगठन की स्थापना मधेश-तर्राई समेत अन्य समुदाय में राज्य द्वारा किये जाने वाले ...
स्लीवलेस परिधानों की कशिश नारी मन में हमेशा से रही है फैशन आते जाते रहे, ...
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी ...
बच्चे के फेवरेट रंग सिर्फ उसकी पसंद या नापसंद नहीं होते, ये उसकी पर्सनैलिटी के ...
नेपाली राजनीति में लगभग साढे छह दशक तक कोईराला अविश्रान्त कर्म योद्धा बनकर नेपाल की ...

Archive for September, 2009

राशि और आपका मेकअप::मानसी

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

feshionना खूबसूरती बनानेवाले की मेहरबानी से मिलती है
मगर उसे बनाये रखना हर हसीना की सबसे बडÞी जिम्मेदारी होनी चाहिए । और यदि आपको अपनी राशि के अनुसार मेकअप का हुनर आ जाये तो आपके लिए खूबसूरत नजर आना और भी आसान हो जायेगा । तो लीजिए जानिए कि किन महिलाओं को किस प्रकार का मेकअप करना चाहिए ः
· पृथ्वी तत्व -वृषभ, कन्या, मकर) ः इन राशि वालों को प्रैक्टिकल, दूसरों पर निर्भर रहने वाली तथा बेहद आकर्ष मेकअप पसंद होता है । इन्हें मेकअप के लिए ज्यादातर टोन्स जैसे ब्राउन, ब्रान्च, कापर आदि का प्रयोग करना चाहिए । स्किन केयर स्टीन का खास ख्याल रखें ताकि त्वचा खिली-निखरी नजर आये ।
· वायु तत्व -मिथुन, तुला, कुंभ) ः इस राशि की महिलायें अपने लुक को लेकर काफी जागरुक होती है । आपको खास कर आई मेकअप के लिए सिल्वर, ब्लू जैसे स्मोकी शेड्स का चुनाव करना चाहिए । होठों का मेकअप नेचुरल ही रखें ।
· जल तत्व र्-कर्क, वृश्चिक, मीन) ः इस राशि की महिलाओं का व्यक्तित्व काफी प्रभावशाली होता है । ऐसी महिलायें आई मेकअप के लिए ग्रीन, ब्लू जैसे शेड्स का प्रयोग करें । होठों पर नेचुरल लिपिस्टिक लगायें तो बेहतर रहेगा ।
· अग्नि तत्व -मेष, सिंह, धनु) ः इस राशि वाली महिलायें बेहद रचनात्मक व तुरंत निर्ण्र्ाालेने वाली होती है । अतः इन राशियों की महिलाओं को बोन्ड व मैटालिक शेड्स का इस्तेमाल करना चाहिए । मेकअप के लिए डलगोल्ड, मंजेटा, डीन मैसन, काँपर आदि शेड्स का प्रयोग करें ।

लोडसेडिंग:: पिरशु प्रधान

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

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म आई दरवाजे पर और काँलबेल बजाने लगी । मैंने लगातार बजते हुए काँलबेलको सुना पर दरवाजा खोलने का मन नहीं हुआ । काँलबेल लगातार बजती रही और मैं उसका आनंद लेता रहा । कान्छा दूध लेने गया है शायद नहीं तो वही दरवाजा खोलता । पर तुम काँलबेल बजाती रही । मैंने सोचा – कैसी गंवार लडÞकी है – इतने सबेरे क्यों यहां आई है – अभी तो सिर्फआज बजे हैं । नौकरी के लिए मेरी चापलूसी करने की जल्दी है उसे । बेमन से उठा मैं । नीचे उतरकर दरवाजा खोला । तुम वहां खडÞी थी । मैं देखता ही रह गया । तुम इतनी सुन्दर होगी मैंने सोचा नहीं था । दोस्त तो कह रहा था लडÞकी सुन्दर है सुन्दर, पर इतनी सुन्दर मेरी कल्पना से परे । तुम मेरी नजर को भांप गई । मैंने कहा – “चलो अन्दर ।” फिर हम अन्दर चले आए ।
बैठक में सिर्फमैं और तुम थे । मैं तुम्हारा सुबह का सूरज जैसा चेहरा देखने लगा । तुम मेरे बैठक को देखने लगीं । पर उस कमरे में ध्यान देकर देखनेवाली तो वैसी खास कुछ नहीं थी । टेबल पर रखे हुए फूल बासी पडÞ गए थे । सिंगापुर से लाई गई घडÞी भी वक्त बताना भूल चुकी थी । सोफे पुराने पडÞ गए थे । एक आकर्ष लडÞकी की नंगी तस्वीर पर तुम्हारी नजर म गई । तुम बहुत देर तक उस तस्वीर को देखती रही । मुझसे नजरें चुराकर भी तुम उसी तस्वीर को देखती रहीं । शायद तस्वीरवाली से खुद को तौल रही हो – है न -
यह किस कलाकार की तस्वीर है जो मेरी विदेशी दोस्त र्-गर्ल-प|mैंड) ने दी है । मैं तुम्हारी नजर उस तस्वीर से हटाना चाह रहा था ।
“यह तस्वीर मुझे बहुत अच्छी लगी । पर बैठक में क्यों… – बहुत लोग आते जाते हैं ।” तुमने पूछा । मुझे मालूम था तुम यह सवाल करोगी । और इसका जवाब मैंने तुरंत दिया – “नंगा होना मानव की प्रकृति है, सुन्दरता है । प्रकृति ने उसे नंगा ही पैदा किया है । क्यों हम कृतिमता की चादर ओढÞें -”
तुमने मेरी बातें ध्यान से सुनी । इसलिए मैं छोटामोटा भाषण देने को तैयार हो गया – आदमी प्रकृति से जन्मा है और वह प्रकृति में ही खुश होता है । हमने ही सुन्दर प्रकृति का बलात्कार किया औरु उसे कुरुप कर दिया है । हमें प्रकृति के शाश्वतता और सुन्दरता को संरक्षण देना है ।
इसी वक्त कान्छा दूध लेकर आ पहुंचा । मैंने उसे दो प्याली चाय बनाकर लाने के लिए कह दिया । और वह दौडÞते हुए किचन में चला गया । वह गैस जलाने लगा और हमें गैस की अजीब सी गंध सताने लगी । कहीं गैस सिलिन्डर से लीक तो नहीं हो रहा । मैं उठा और किचन की तरफ चला गया और कान्छा को चाय में चिनी कम रखने के लिए कह आया ।
चाय टेबल पर आ गई थी । चाय की भाप के साथ ही हमने बात करने की कोशिश की पर बातचीत का मुद्दा तय नहीं हो पा रहा था । मैं याद करने की कोशिश करने लगा ।
मुझे मालूम था तुम नौकरी की बात करोगी । क्योंकि कल रात ही मेरे एक दोस्त ने तुम्हें कहीं एडजस्ट करने की बात कही थी । और ‘बाकी बातें अपने जिम्मे’ की बात कही थी । कल रात शायद स्काँच कुछ ज्यादा ही लग गया । मैं हवा में कहीं उडÞ रहा था । उडÞान तो अच्छी थी, बादलों से लुकाछिपी खेलना अच्छा लग रहा था । वहीं पडÞे रहना बोरियतवाला काम था और मजा भी न आता । मैंने तुम्हारी नौकरी को बादलों के बीच की उडÞान से तुलना की । यानि कि तुम्हें नौकरी दिलवा देने या देने की बात जितनी आनन्द और उत्साहवर्द्धक थी, उसके नतीजे की स्थिति जमीं में पछाडÞ खाने जैसी थी । इस मामले में मेरा खास अनुभव था । उम्र के दौर में चालीस पार कर जाने पर लातें खाने की प्रक्रिया तीव्रतर हो जाती है ।
“तुम क्यों आई हो -” मैंने अब शुरु किया क्योंकि हम चाय पी चुके थे ।
“कहीं एडजस्ट होने के लिए ।” तुमने सरलता से अपनी बात रख दी ।
“एडजस्ट… नौकरी ढूंढ रही हो -” तुमने हां में शर हिलाया और मुझे अच्छा लगा ।
“तुम्हारी शिक्षा कितनी है और अनुभव कितने वर्षों का है -” मैंने एक ही बार में पूछ डाला । फिर तो तुम गंभीर बन गयी । थोडÞी देर बाद खयाल आया यह सवाल तो मुझे करना ही नहीं चाहिए था । पर तुम्हारी नौकरी के लिए कहीं एप्रोच करने के लिए यह जरुरी भी था । जवाब में तुमने टाइप किया हुआ बायोडाटा मेरे सामने रख दिया । जो इस तरह का था ः
नाम ः प्रीति
जन्मस्थान ः उदयपुर
शिक्षा ः दशवीं प्ास
अनुभव ः टेलिफोन व गार्मेंट संबंधी
पता ः नया बानेश्वर
यह बायोडाटा साधारण सा था । मुझे मालूम पडÞ गया तुम प्रीति हो । पर उस बायोडाटा में तुम्हारी जाति नहीं लिखी थी । यह जानकारी भ्ी नहीं थी कि तुम विवाहित हो या अविवाहित । अनुभव भी कुछ स्पष्ट नहीं था । जन्म की तारिख न होने से तुम्हारी उम्र का पता भी नहीं चला । मैंने इन बातों को जानने की कोशिश नहीं की । मैंने पूछा – “कितनी पगार की आशा करती हो -”
“कम से कम दो हजार भी न हों तो काठमांडू में कैसे जीया जा सकता है -” तुमने कहा और मैंने सर हिलाकर र्समर्थन जताया ।
“बायोडाटा में फोटो तो नहीं है -” मैंने दूसरा सवाल दागा ।
“मैं खुद सर के सामने उपस्थित हूं तो फिर फोटो की क्या जरुरत -” तुम्हारा जवाब सटीक था ।
तुमने पहली बार मुझे ‘सर’ पुकार कर मान्यता प्रदान की यह अच्छी बात थी । पर मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी क्योंकि में तुम्हें दोस्त के रुप में देखना चाहता था । तुमने पहली मुलाकात में ही बाँस और मुलाजिम का संबंध गढÞना चाहा जो मुझे सहज नहीं लगा ।
“नौकरी देनेवाले तो दूसरे लोग हैं और वे तुम्हारा फोटो देखना चाहेंगे … फिर मां बाप और जाति के बारे में भी कुछ नहीं लिखा ।”
“औरत की कोई जात होती है सर -” तुम गंभीर रुप से मुस्कुर्राई । मैंने सोचा – आजकल की लडÞकियां मेकअप के अलावा बातें बनाना भी खूब जानती हैं ।
“इसका मतलब तुम शादीसुदा नहीं हो -” मैंने पूछा ।
“आपको मैं बेटी जैसी नहीं लगती क्या -” यह मेरे लिए मुश्किल सवाल था । मेरे दिमाग में तूफान उठने लगा । क्या मैं इतना बूढा हो गया हूं – मुझे वक्त ने इतनी दूर एकांत में ला पटका है – अर्थात् मेरे वक्त के स्वर मिटने लगे । मुझे लगा मैं वहां से उठकर चला जाऊं । चक्कर सा आने लगा और लगा उलटी हो जाएगी । मेरे चेहरे पर अचानक आए परिवर्तन से वाकिफ हो तुमने सवाल किया – “आज सर की तबीयत ठीक नहीं है क्या -”
“कल ज्यादा शराब पी गया था । सबेर से ही हैंग ओवर है, सर दर्द से फटा जा रहा है ।” मैंने स्थिति को सहज बनाया । पर भीतर से मैं जल रहा था और भन्ना रहा था । मेरे सारे रास्ते बंद होते देख मैंै घबरा गया । सोचने लगा – भाग्य ने मुझ को प्रदूशित नदी के किनारे ला फेंका है । कान्छा को और दो कप चाय का आर्ँडर देकर मैं खुद को आश्वस्त करने की कोशिश करने लगा ।
तुम वातावरण में सहजता ढूंढ रही थी । कहा – “मैं सर को दुःख दे रही हूं, क्या करुं, मैं बहुत अभागिन हूं सर ।”
“तुम्हारी बीती हर्ुइ कहानी मुझे नहीं सुननी प्रीति । क्या फायदा सुनकर भी । सभी डेवलपिंग कन्ट्री के लोगों की कहानी एक सी होती है । वक्त, जगह और नाम में अंतर होता है बस ।” मैं जरा दार्शनिक हो गया था । नौ बजने वाले थे और मुझे फैक्टरी के लिए देर हो रही थी । वहां आजकल बहुत काम बढÞ गया था । जर्मनी व अमरिका के खरीदकर्ताओं ने न केवल आर्ँडर बढÞाया था बल्कि वे खुद फैक्टरी देखने के लिए आने वाले थे ।
“सर का परिवार कहां है -” तुमने दूसरा सवाल किया ।
“पत्नी अमरिका चली गई, बेटों के साथ रहने । मैं अकेला बूढा यहा हूं । एक नौकर के सहारे मुझे छोडÞ गए हैं ।” कहते हुए मैंने हंसने की कोशिश की पर मुझे मालूम था उस हंसी में कडÞवाहट घुला हुआ था ।
बैठक में रखे हुए मेरे पुराने फोटो पर तुम्हारी नजर अटक गई । आज से तीस साल पुरानी वह तस्वीर एक सुन्दर व आकर्ष युवक की थी तब । मैं अब जल्दी में था । तुम्हें शायद अपनी नौकरी पक्की करनी थी । परन्तु मेरे यहां तो नौकरी थी नहीं ।
मैं क्या चाहता हुं तुम्हें मालूम करना चाहिए था मैंने पूछा – आज कौन सा दिन है – मैं आजकल बहुत व्यस्त हूं ।
“रविवार” तुमने झट् कह दिया ।
“शुक्रबार को आ जाओ… गुड प|mाइडे… शाम को क्यों – मैं उसी दिन तुम्हारी नौकरी पक्की कर दूंगा ।” मैने स्पष्ट शब्दों में कहा और तुम चली गई ।
रविवार से शुक्रवार तक के छह दिन मेरे लिए कष्टकर गुजरे । एक युवती के बारे में इतना सीरियस शायद मैं पहली बार हुआ था । छह दिन तक भावुक बनता रहा और अच्छी सी शुक्रवार का इन्तजार करता रहा । दिन कैसे बीते मैं याद नहीं कर सका । पर इस दौरान में सिर्फतुम्हें याद करता रहा । प्रीति को याद करता रहा और खुद से सवाल करता रहा – इस उमर में भी कोई प्रेम में पागल हो सकता है क्या – क्या बूढे पेडÞ में भी फूल खिलाया जा सकता है -
वह शुक्रवार का दिन था । मैने आँफिस से छुट्टी ले रखी थी । उस दिन सूरज चाय के साथ न होकर रेडलेवल हृविस्की के साथ उगा था । अपने सफेद बालों में कालिख पोतकर काला बना लिया था मैंने । चेहरे पर क्रिम लगाकर दिनभर प|mाइड चिकन के साथ छछछ सिगरेट पीता रहा । स्टार टीवी के उत्तेजक दृश्यों को देखकर खुद को कामुकता की लहरों पर उद्वेलित करता रहा । अखबार हाथ में था पर उसमें क्या छपा था मुझे मालूम नहीं था । मैंने खुद को तीस साल पहलेवाले अपने रुप में ले जाने की कोशिश की । वो भी एक समय था जब सिर्फप्रेम के गीत गाते थे, प्रेम की कविताएं लिखते और पढÞते थे । वो क्या वक्त था – चौराहे पर घंटों बैठते । मैंने फिल्म फेयिर देखकर रख दिया । मुस्तांग का घोडÞा बनने के लिए मुस्तांग की दो गोलियां निगल ली । समय खाली ही बीत रहा था । सिर्फशून्य था और खाली दिमाग में हृविस्की का प्रभावपर्ूण्ा आक्रमण था ।
फिर तो वही बात हो गई । शुक्रवार शाम को तुम आई और उसी तरह काँलबेल बजाने लगी । मैं खुद दरवाजा खोलने के लिए जा पहुंचा ।
“क्या घर में कोई और नहीं है जो सर खुद दरवाजा खोलने आ पहुंचे -” तुमने पूछा ।
“आज तुम्हारी सेवा कर रहा हूं ।” मैंने मुस्कुराते हुए तुम्हें छेडÞा । हम फिर बैठक में आ गए ।
टेबल पर हृविस्की और बियर की बोतलें थी -
“क्या लोगी -” मैंने पूछा ।
“कुछ नहीं ।” तुम्हारा जवाब था ।
“मैं तो हृविस्की लूंगा । एक ग्लास बियर नहीं लोगी -”
“मैंने कभी पी नहीं है ।”
“तब आज पी लो न … ।”
मैंने एक ग्लास में बियर उंडेलकर तुम्हारे हाथ मैं थमा दिया । तुमने बियर चाय की तरह धीरे धीरे न पीकर मठ्ठे की तरह एक ही बार में पूरा ग्लास गटक दिया । मैं हैरान हो गया और एक ग्लास और तुम्हारे हाथ में दे दिया ।
“तुम किस तरह की नौकरी करोगी -” मैंने गंभीर होकर पूछा ।
“जैसी मिलेगी… खाने पीने और रहने के लिए पैसे हो बस… ” तुम्हारे चेहरे पर रंग चढÞने लगा ।
तुम और लाल दिखने लगी । तुमसे बातें करने के लिए मेरे पास विषय नहीं था । थोडÞी देर सोचता रहा । हां तुम जब पहली बार आई थी तो तुमने मेरे फोटो के बारे में पूछा था और बहुत देर तक देखती रही थी । मैंने पूछा – “मेरा फोटो कैसा लगा -”
“बहुत अच्छा । बहुत सुन्दर है पर क्या वह फोटो आपका ही है -”
“क्या मेरा फोटो जैसा नहीं लगता -”
“नहीं, बिल्कुल नहीं । उस चेहरे में जो यौवन का तेज है, जिस सौर्न्दर्य का मान्यता है वह आपमें कहाँ – आप जल्दी बूढे हो गए लगते हैं … ।” तुमने कमेंट किया ।
“हां वैसा ही है । मैं अपनी इच्छा से बूढÞा तो नहीं हुआ, न ही अब होना चाहता हूं । पर प्रकृति से कोई लडÞ सका है क्या -”
शाम होने को आई थी । उस दिन लोडसेडिङ का दिन था । कैंडल के शुभ्र उजाले में तुम्हारा चेहरा देखकर भूपि शेरचन की कविता “मैनबत्ती को शिखा” अचानक याद आ गई ।
“चिली चिकन खाओ न… मैंने खुद बनाया है ।”
“अच्छा है, बहुत स्वादिष्ट है ।”
मैं एक प्रकार से शून्य हो चला था । मैं अमरिका में बिताए गए हसीन लम्हें याद कर रहा था । मैंने तुम्हें पास बुलाया साथ बैठने के लिए । तुम डर गई । तुम्हारी भयभीत आंखें हिरण की जैसी लगी – जो शिकारी के भय से छिपती है जंगल में । मैं उत्तेजित होने की कोशिश करने लगा । एक जवान औरत के आगे खुद को उत्तेजित करने की विसंगति ने मुझे निराश कर दिया । पर मैं तैयार तो हो गया । मैंने तुम्हारे नरम हाथ अपने हाथ में लिए और सहलाने लगा ।
“क्या आपको शोभा देता है – ऐसी हरकत करते हुए इस उमर में -” दो शब्द मेरे भीतर पहुंचे और कहीं गुम हो गए ।
“मैं तुम्हारी हस्तरेखाएं देखूं । तुम्हारा भाग्य कैसा है – कैसा पति मिलेगा – कैसी नौकरी मिलेगी – बच्चे कितने होंगे -” तुम्हारे नरम और कमसिन हाथ लेकर उन्हें सहलाता रहा । खेलता रहा उनसे । ज्योतिष विद्या को कभी न जाननेवाला, आदमी की हस्तरेखाएं देखकर भविष्यवाणी करना कम हास्यास्पद नहीं था । किन्तु में मजबूर था । तुम सहज नहीं हो रही थी, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम था और तुम्हारा चेहरा लजाना, तुम्हारा न खुल पाना मुझे खुशी और आनंद दे रहा था ।
मैंने तुम्हें बाहों में लिया और चुमने की कोशिश करने लगा । तुम्हारे होठों से अपने होंठ सटाए आनंदानुभूति करने लगा । तुम्हारे कोमल अंगों को सहलाए । अपने आवेग को शांत करने की कोशिश करने लगा । तुम खुद को मुझ से मुक्त करने की कोशिश में लगी थी । मैंने तो तुम्हे न छोडÞने की कसम ही ले रखा था । मैं अपने तीस साल पुरानी जवानी को पुनर्जीवित करने की धुन में था । मैं विगत में जाकर जंग बहादुर बनना चाह रहा था और तुम्हें भोगना चाह रहा था ।
लगता था वक्त थम गया है । लोडसेडिंग का वक्त अभी खत्म नहीं हुआ था । मैंने अपने अन्दर बहुत गर्मी महसूस की । वह गर्मी बिजली की तार की तरह ही मेरे बदन के नीचले हिस्से में बह गई । ठीक उसी वक्त एक ठंडी लहर दौडÞ गई बदन में । मैंने बरफ होने का यथार्थ स्वीकार कर लिया । लगा एक लहर बहुत ऊँचा उठकर फिर बैठ गया है । लोडसेडिंग खत्म होने पर हम वहां नहीं थे ।
उसके बाद दूसरे दिन के स्थानीय अखबार में मैंने तुम्हें रेप किया – ऐसी सनसनी खेज खबर छपी थी ।
अनुवाद ः कुमुद अधिकारी

कालाम के जदुगर::डाँ. अवध किशोर सिंह

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

हित्यकार का व्यक्तित्व अपने ही अनुरुपविशिष्ट शैली, माध्यम और उपकरण का चयन करता है । अतएव कृतित्व की मूल प्रेरणाओं को समझने के लिए साहित्यकार के व्यक्तित्व की प्रमुख विशिष्टताओं की विवृति आवश्यक है । बेनीपुरी जी की विविधता से भरे हुए जीवन में व्यक्तित्व की कई विशिष्टताएँ निखर कर हमारे सामने आती हैं ।
बेनीपुरी जी मध्यम कद, साँवले रंग एवं गठीले शरीर के व्यक्ति थे । आँखों पर मोटा चश्मा, मुंह में पान की ललाई और होठों पर प्रकट हास्य के कारण उनका व्यक्तित्व अधिक निखरा हुआ लगता था । वे धोती, कर्ुता पहनते थे । हिन्दी मंदिर के महान साहित्यकार के आकर्ष व्यक्तित्व की एक झांकी राममर्ूर्ति ‘रेणु’ ने इस प्रकार दी है -काले प|mेम के चश्मे, जिनमें से स्नेह बरसने वाली दृष्टियाँ हमारे अंतर में पैठकर गहराइयों को टटोलकर आत्मीयता एवं अपनत्व के अमृतदह में हमें नहला देती हैं, प्रतिभा-किरणों को बिखेरने वाला उन्नट ललाट, ताम्बूल-रस से अरुण बने होठों पर आँख मिचौनी करनेवाली स्मृति रेखा जिससे ‘खिलखिल’ । अट्ठहास में बदलते देर कभी नहीं लगती, साँवला चमकदार मुखमंडल, यह श्वेत खद्दर धोती व कमीज पर काली ऊनी नेहरु बास्कट – थोडÞे में यही श्री बेनीपुरी जी का भौतिक रुप रहा था जो कि एक साथ जीवन के सरलतम एवं गहनतम मूल्यों का अप्रतिम प्रतीक रहा । बेनीपुरी जी के साहित्य में व्रि्रोह की जो गति है, उनकी विविध रचनाओं में नवसमाज की जो जिज्ञासा और नये पन का आकर्षा है, वह उनके शारीरिक गठन और बाहृय व्यक्तित्व के अनुरुप ही है । डाँ. जगदीश चन्द्र माथुर ने लिखा है कि मैंने यह प्रफुल्ल चेहरा देखा तो मुझे लगा कि उनकी फडÞकती हर्ुइ गद्य-शैली ने ही देह धारण कर ली हो । लेखन शैली और बाहृय व्यक्तित्व का ऐसा सामंजस्य कम ही होता है ।
बेनीपुरी जी अपनी सृजनात्मक रचनाओं के साथ-साथ अमर हैं, परन्तु हिन्दी साहित्य के दर्जनों कवियों और साहित्यकारों के सफल प्रेरक के रुप में उनका महत्व कुछ कम नहीं है । उनसे प्रेरणा पाकर साहित्य क्षेत्र में पैर रखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकारों की लम्बी सूची बन सकती है । साहित्य के क्षेत्र में नया आनेवाला जो भी व्यक्तित्व उन्हें मिलता, वे उस नई पौध को पल्लवित-पुष्पित करने के लिए दौडÞधूप करते थे । उनकी रचनाओं को अपनी पत्रिकाओं में प्रकाशित करना, पुस्तककार रुप में प्रकाशित करना और प्रेरणा देना बेनीपुरी जी कभी नहीं भूलते थे । राष्ट्र कवि दिनकर ने बेनीपुरी को अपनी ‘आत्मा की शिल्पी’ मानते हुए लिखा है – बेनीपुरी के । अपनी आत्मा का शिल्पी कहकर मैंने अत्युक्ति नहीं की थी । वे सचमुच मेरी आत्मा के शिल्पी और कवि जीवन के निर्माता थे । अपनी तात्कालीन कविताओं में कई बातें मैंने बेनीपुरी के मुख से सुनकर लिखी थी ।
बेनीपुरी जी की प्रेरणा से बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन में एक नयी चमक आ गयी थी । अपनी विविध पत्रिकाओं में उन्होंने नये लेखकों को स्थान दिया । वे प्रायः कहते हैं – मैं नयी प्रतिभाओं का शुरु से ही प्रशंसी रहा हूं । भला नये पौधे किसे नहीं भाते । लक्ष्मी नारायण मिश्र जी की प्रारम्भिक कृति की पांडुलिपि, जो प्रसाद जी के पास कई दिनों तक पडÞी थी, बेनीपुरी जी ले गए थे और एक रात में ही छपवा कर दूसरे दिन प्रसाद जी के पास प्रतियाँ देकर उन्होंने प्रसाद जी को भी आर्श्चर्यचकित कर दिया था । लक्ष्मी नारायण मिश्र जी का नाटक ‘अशोक’ बेनीपुरी जी की प्रेरणा से ही लिखा गया था । प्रभाकर माधवे ने भी उनकी प्रेरणा को स्वीकार करते हुए लिखा है – मुझे अब भी याद आता है कि वे -बेनीपुरी) न होते तो आज जो भी मैं कुछ लिख रहा हूं वह कभी नहीं लिख पाता । श्री क्षेमेन्द्र सुमन ने लिखा है – बिहार में जो भी साहित्यकार प्रतिष्ठा के उत्तुंग शिखर पर समासीन है, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिन्हें यदि बेनीपुरी जी जैसे साहित्यकार का र्सतर्क, सबल और प्रेरक सहयोग प्राप्त न हुआ तो कदाचित् वे इतनी प्रतिष्ठा अर्जित नहीं कर पाते । इस प्रकार बेनीपुरी अतुल प्रेरणा के प्रचण्ड स्रोत थे । आधुनिक मूल्य विघटन के युग में छोटों के प्रति दिखाई गयी इस सघन आस्था के लिए हिन्दी साहित्य बेनीपुरी जी का चिर ऋणी रहेगा ।
बेनीपुरी जी का टढ वर्षों का जीवन कर्मक्षेत्र के योद्धा का जीवन है । जीवन के अनेक क्षेत्रों में उनकी सफलता का प्रमुख रहस्य यही था कि वे निःस्वार्थ भाव से कार्य किया करते थे । इसी में वे जीवन का सच्चा आनंद, खुशी और सुख मानते थे । इस सर्ंदर्भ में विश्वविख्यात नाटककार जार्ज वनार्ड शा की यह उक्ति उनके लिए आदर्श थी – ‘कार्य ही मेरे जीवन की खुशी है ।’ जिस किसी क्षेत्र में पैर बढÞा वे इसी निष्ठा के साथ कार्य करते थे । साठ साल के हो जाने पर भी उनकी निष्ठा में परिवर्तन नहीं हुआ । वागमती काँलेज और गाँधी भूमि की स्थापना में उन्होंने जिस कर्मनिष्ठा का परिचय दिया वह अपने आपमें एक आदर्श है । र्सर्दी के दिनों में वे रात-दिन चन्दा उगाहने के लिए घूमते रहते थे । भाग्य अथवा नसीब में उनका विश्वास नहीं था । उनके मतानुसार मनुष्य से बढÞकर कोई भाग्य विधाता नहीं । पहले मनुष्य का पौरुष, शक्ति, काम करने की धुन और तब भाग्य । वे कहते थे – ‘जो बीत गया वह भाग्य, जो हो रहा है, वह पौरुष और जो आनेवाला है – वह विश्वास ।’ कर्म के संबंध में वे गीता के सिद्धान्त का पालन करते थे और दूसरों को भी उसी प्रकार की सलाह देते थे । कर्मवाद उनके रोम-रोम में बैठ गया था, तभी उनमें अंग्रेजी शासन की कडÞी-बेडिÞयों को जर्जर करने की क्षमता आयी थी । समाजवादी दल का संगठन, किसान संगठन, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का विकास, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का कार्य, बेनीपुरी प्रकाशन और उसके द्वारा ग्रंथावली के दो खंडों का प्रकाशन, उनकी भाषा में स्मारक रुप, उनका बडÞा मकान ये ऐसे कार्य हैं, जो बेनीपुरी की कर्मनिष्ठा के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
बेनीपुरी जी व्रि्रोही व्यक्तित्व के साहित्यकार थे । उनकी दृष्टि नये समाज पर थी । नया समाज का रचनाकार अपने युग की परम्परित चेतना के विरुद्ध आवाज बुलंद करता है । बेनीपुरी जी के व्रि्रोही व्यक्तित्व के बीज उनके बाल्यकाल में पडÞ गये थे । समाज में बढÞती अंधविश्वास, कुरीतियों और उत्पीडÞन का प्रत्यक्ष ज्ञान उन्हें बचपन में ही हो गया था । अपने जीवन के संस्मरणों में उन्होंने कहा है कि जब उनकी माँ की मृत्यु हर्ुइ तब उसके पैरों में इसलिए कीलें ठोकी गयी कि वह चुडैÞल बनकर कहीं वापस न आये । इस बुरे रिवाज का बालक रामवृक्ष के मन पर गहरा असर हुआ था । बचपन में अग्रेजी सिपाही द्वारा निरपराध भारतीयों पर कोडÞे बरसते हुए देखकर उनके मन में शासकों के अत्याचारों के खिलाफ व्रि्रोह की भावना जगी थी । इस व्रि्रोह भावना ने आगे वह रुप धारण किया कि उनका क्रांतिकारी, आंदोलनकारी, राजनीतिक योद्धा और अगियाबैताल वाला रुप प्रायः बहुत उभरकर लोगों के सामने आया । वे व्रि्रोह के प्रतीक बन गये । उनको प्रत्येक पग इसी भावना द्वारा प्रेरित था । उन्होंने अपने परिवेश और परिस्थितियों के अवांछनीय तत्वों के सम्मुख स्वयं को कभी समर्पित नहीं किया । उनका विरोधी व्यक्तित्व कभी निर्बल नहीं पडÞा ।
benipiuiयह कहना असंगत नहीं होगा कि बेनीपुरी जी की कथनी और करनी में काफी एकरुपता थी । उन्होंने क्रान्तिकारी विचारधारा को केवल व्यक्त ही नहीं किया वरन उस विचारधारा के अनुरुप ही अपने जीवन को प्रवर्तित भी किया । उन्होंने कहा भी है – केवल प्रचलित विचार प्रवाह को ही बदलना क्रांतिकारी का काम नहीं होता – ‘थियोरी’ के साथ ‘एक्शन’ पर भी पूरा ध्यान देता है । वह जहाँ कहीं अत्याचार देखता है, भिडÞ जाता है, लडÞ पडÞता है । जहाँ एक ओर बेनीपुरी जी का साहित्य क्रांति की ‘थियोरी’ है वहाँ दूसरी ओर उनका जीवन एक व्रि्रोही का जीवन है । बीमारी के दिनों में अस्पताल में उन्हें पानी देने वाले एक आदमी के संबंध में जब उनकी पत्नी ने कहा कि न जाने, कौन मेहतर या जमादार पानी पिला गया, तो बेनीपुरी जी तुरुन्त उठ कह उठे – मेहतर जमादार क्या होता है – आदमी था । पानी लेकर आया, मैंने पी लिया । आदमी ने आदमी को पानी पिलाया । उनका यह उत्तर स्पष्ट कर देता है कि उन्होंने अपने को र्सवथा नये समाज के अनुकूल बनाया था । निःसंदेह वे ‘क्रांतिकारी’ मनुष्य थे और उनका ध्येय नये मूल्यों की स्थापना एवं नये समाज का निर्माण करना था । समाज जब बदलने लगता है, वह अपनी प्रतिक्रिया को तेज करने के लिए बेचैन मनुष्य को जन्म देता है । बेनीपुरी जी के भीतर बेचैन कवि, बेचैन चिंतक, बेचैन क्रांतिकारी और निर्भीक योद्धा, सभी एक साथ निवास करते थे ।
लेखक म.बि.ब. क्याम्पस, राजविराज सह-प्राध्यापक -हिन्दी) हैं ।

सत्ता की हकदार पर सुरक्षा की मोहताज:: स्िमृति जोशी

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

mayawatiहनजी के राज में महिलाओं पर होते अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के बयान पर मचा बवाल इतनी जल्दी थमता नजर नहीं आता । हालाँकि इस जर्ुम के लिए रीता बहुगुणा जोशी को गिरफ्तार कर ज्ञद्ध दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है पर शायद अब सवाल यह नहीं है कि रीता ने मायावती के विरुद्ध क्यों अभद्र टिप्पणी की और क्यों की – इस टिप्पणी पर बौखलाए कथित मायावती र्समर्थकों ने इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप रीता बहुगुणा के सरकारी आवास पर हमला कर तोडÞ-फोडÞ व आगजनी की, इस घटना के बाद भी सवाल यह नही है कि इन कथित मायावती र्समर्थकों ने जो किया वह कितना सही है – सवाल बडÞा पुराना और बस इतना है कि आखिर एक स्त्री की इज्जत की कीमत क्या है -
क्या वह ओहदे और वर्ग के अनुसार बदल जाती है – या फिर हर औरत का उत्पीडÞन ताकत के अनुसार छोटा-बडÞा हो जाता है – अगर नहीं तो फिर भला क्यों एक महिला के विरुद्ध की गई टिप्पणी मात्र पर इतना बवाल जबकि बलात्कार की शिकार महिलाओं की एक लंबी सूची संवेदना के स्तर पर कोई हलचल नहीं मचा पाती – विशेषकर एक महिला ही जब मुख्यमंत्री हो तब ऐसी विडंबना तकलीफदेह है । सारा मामला इतना पेचीदा है कि पक्ष और पिक्ष कहीं नजर ही नहीं आता । अभद्रता के विरुद्ध और एक अभद्रता । अगर इस सारे प्रकरण में से राजनीति हटा दी जाए तो बचती है सिर्फमहिला और उसकी संवेदनहीनता ।
करोडÞों रुपए खर्च कर अपनी मर्ूर्तियाँ स्थापित कर दलित उद्धार करने की आकांक्षा पाले मायावती को अपने पद और गरिमा के अनुसार आचरण पर ध्यान देना था । तत्पश्चात् पिक्ष की नेता रीता को अपने बयानों में संयम बरतना था । जो कि नहीं हुआ, जब बचती है आम स्त्री । जिसे किसी भी संबोधन से पुकारा जाए उसकी नियति है छले जाना, और हमेशा की तरह वह फिर छली जा रही है । अब इस तथ्य को दिलचस्प कैसे कहें कि इस सारे मामले में बस महिला ही महिला है । मुख्यमंत्री महिला, पीडित महिला, मृतका महिला, बयान देने वाली नेता महिला । यानि महिला बनाम महिला । किसने किया बलात्कार – कौन है असली दोषी – किसे है फुरसत इस पर बात करने की – महिला इस देश में कितनी सुरक्षित है कौन सोचेगा इस पर – आर्श्चर्य कीजिए कि यह सब वर्तमान स्थिति में हो रहा है जबकि देश की राष्ट्रपति महिला, शासित दल की प्रमुख नेता, लोकसभा स्पीकर महिला, संसद में वर्चस्व बढÞाती महिला । कल तक जो हम महिलाएँ पुरुषों के विरुद्ध मोर्चा खोले रहती थी अब क्या कहें और किसके खिलाफ कहें – हमारे -यानी महिलाओं के) राज में वे -पुरुष) इतने अलमस्त कैसे हो गए कि अपराध करने के बाद उन पर किसी तरह का दबाव नहीं, उल्टे महिलाओं के बहाने महिलाएँ ही आपस में स्तरहीन होकर सामने आ खडÞी हर्ुइ – होना तो यह था कि महिलाओं के पदासीन होने पर एक आम स्त्री में आत्मविश्वास अंकुरित होता कि अब हम पाँवर में हैं, हमें कोई खतरा नहीं । पर हुआ क्या – हम महिलाएँ, महिलाओं से ही आतंकित है । और ऐसा इसलिए कि हम नारी संवेदनशीलता के गहरे अहसास को भूलते जा रहे हैं । हम अपने ही संकर्ीण्ा दायरों में लिपटी आपस में उलझ रही हैं । जबकि यह मुद्दा सदियों से न्याय की आस में विवश हो छटपटा रहा है । प्रति वर्षबलात्कार पीडिÞताओं के आँकडÞे बढÞते जा रहे हैं और समाज से एक बर्ेशर्म खामोशी की परत है कि हटती ही नहीं । एक और सच कि आँकडÞों के पीछे छुपी कितनी पीडिÞताएँ हैं जो खामोश सो जाती है या सुला दी जाती है हमेशा के लिए – कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें समाज और इज्जत की दुहाई देकर खामोश रहने पर मजबूर कर दिया जाता है । ये आँकडÞे सतह के ऊपर आ ही नहीं पाते क्योंकि इनके प्रति हमारी नीयत ही दोषपर्ूण्ा है । हमने इस घृणित मुद्दे पर कभी गंभीर होने की कोशिश ही नहीं की । क्यों – क्योंकि यह मुद्दा, यह खबर, यह घटना हमारी मानसिकता पर कोई हलचल मचाने में कामयाब नहीं होती । हममें संवेदना नहीं बची, यही वजह है कि कोई महिला संयम खो बैठती है और दुःखी मन से कह जाती है कि तुम्हारे साथ होगा तब… – लेकिन ऐसे मुद्दे प्रत्यारोप नही माँगते, बहस भी नहीं माँगते ऐसे मुद्दे संवेदना और न्याय माँगते हैं । अगर इस देश में ये दो चीज कहीं मिले तो राजनीति को इनका पता दीजिए । शायद कुछ हासिल हो सके हम नारियों को ।

असली खतरा चीन से ::रुचि सिंह

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

Ruchi Singhडियन डिफेंस रिव्यू के संपादकीय में व्यक्त की गई भारत पर चीनी हमले की आशंका से किसी प्रकार की घबराहट या किर्ंकर्तव्यविमूढÞ होने की आवश्यकता नहीं है । दरअसल यह लेखक का अपना नजरिया है । चीन की दो मुँही नीति से कौन नही वाकिफ है – जब ज्ञढटद्द में हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे गूंज रहे थे । तब चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका और अचानक हमला कर दिया । फुकेट में आसियान के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा ने सीमा मुद्दे पर मतभेद के बावजूद भारत और चीन ने बेशक बहुआयामी संबंधों को प्रगाढÞ बताया । अपने चीनी समकक्षी से विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा को उम्मीदें क्यों ना हो – लेकिन चीन का अडिÞयल रवैया तवांग पर अपना हक मानता है । भारत और चीन के बीच ज्ञ,द्दण्,ण्ण्ण् वर्ग किलोमीटर जमीन विवादित है । अरुणांचल समेत इस भू-भाग मेंे डद्ध,ण्ण्ण् वर्ग किलोमीटर पर्ूर्वी क्षेत्र में पडÞता है। china
चीन के हाथों मिली पराजय का डंक इतना विषैला है कि भारत अभी तक भुला नही पाया है । विदेश मंत्रालय के सूत्रों की माने तो चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा तय न होने से अक्सर ही सैनिकों के बीच कहा सुनी हो जाती है । गौरतलब है कि चीन ने अरुणांचल से सटे अपने जियांग प्रांत में सडÞकों का जाल बिछा लिया है और वहां सैन्य हलचल तेज कर दी है । यह किसी से नही छुपा है कि चीन तवांग क्षेत्र को अपनी ही टेरीटरी मानता है । चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की बढÞती गतिविधियों के बाद भारतीय सेना की दो डिविजन तैनात करने की तैयारी हो रही है । चीन ने तिब्बत समेत पूरे सीमाई इलाके में लंबे समय से तकरीबन ज्ञछ डिवीजन सेना -पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) तैनात कर रखी है । तिब्बत में तकरीबन तीन लाख चीनी सैनिक मौजूद है । तिब्बत को अपना स्वायत्त क्षेत्र घोषित करने के बाद चीन ने वहां सैनिक सुविधाओं का महाजाल बिछा रखा है । विगत सन्दर्भों को देखें तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की द्दण्ण्ठ की चीन यात्रा ने साझेदारी के उन पलों को आगे बढÞाया जो ज्ञढडड में दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गंाधी के चीन यात्रा के दौरान चीन-भारत रिश्ते सामान्य हुये थे । चीनी प्रधानमंत्री ने राजीव गांधी से कहा था कि चीन और भारत के विकास के बिना अगली सदी सेंचुरी आँफ एशिया नही कही जा सकेगी । विदेश मंत्रियों की बातचीत के जरिए सीमा विवाद हल करने के लिए साझा कार्य समूह भी गठित हुए लेकिन सीमा विवाद हल करने के मुद्दे पर हमेशा चीन का रवैया या तो टालमटोल का रहा है या दबाब डालने का रहा है । फिलवक्त देखा जाए तो भारत-चीन के बीच सामरिक संबंध बेहद पेचीदगियों और विरोधाभासों से परिपर्ूण्ा है । सोनिया गांधी की चीन यात्रा को खत्म हुए द्दद्ध घंटे भी नहीं बीते थे कि चीन की तरफ से खबर आयी थी कि मैंकमोहन लाइन को चीन स्वीकार नही करेगा और भारत प्रसिद्ध बौद्धस्थल तवांग को उसके हवाले कर दे । भारत और चीन के बीच पिछले द्दढ सालों में विभिन्न स्तरों पर दो दर्जन से अधिक बैठकें हर्ुइ है । इन सभी बैठकों में चीन तवांग को अपना हिस्सा बताता रहा है । वैसे भी कई ज्वलंत मसलों को हल करने में चीन की भूमिका को अहम भी माना जाता है । लिहाजा चीन ने भारत को समझा भी दिया कि वह सामरिक भागीदारी की रणनीति को इस गरज से भी आगे बढÞाने की इच्छा रखता है जिससे भारत अमेरिका के नजदीक न जा पाए ।
armyफिलवक्त इस समय भारत और चीन के आर्थिक संबंध काफी सशक्त है । दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार ठ अरब डाँलर को छूने वाला है । जिसमें चीन को ज्यादा लाभ है । इंडियन डिफेंस रिव्यू में यह भी कहा गया है कि चीन की आर्थिक, सामाजिक दर्ुदशा के चलते रोजगार के मुद्दे पर विफल चीन इन समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए भारत पर हमला कर सकता है । इसके अलावा यह भी कहा गया है कि लगातार उठते अलगाववादी आंदोलन भी चीन की चिन्ता के लिए सिर्रदर्द बन गये हैं । वास्तविकता यह है कि तिब्बत और सिकियांग को छोडÞकर चीन में कोई बडÞा अलगाववादी आन्दोलन आसानी से सफल हो नहीं सकती है क्योंकि वहां की ढघ प्रतिशत आबादी चीनी मूल की हान जाति है ।
हालांकि चीन की वक्रदृष्टि पडÞोसी देशों पर शुरु से है । यह किसी से छुपा भी नही है । नेपाल की सीमा से सटे अपने क्षेत्र में चीनी सैनिकों की हलचल इस ओर इशारा करती है कि नेपाल बेशक चीन के अपना मित्र माने लेकिन चीन ने कभी भी दिल से नेपाल को अपना मित्र माना ही नही । गौरतलब है कि चीन के हांगकांग में जहाँ नेपालियों के लिए रोजगार के अवसर है लेकिन नेपालियों के प्रवेश के लिए प्रतिबन्ध चीनी मानसिकता की दोगली नीति को उजागर करता है । चीन की नीति हमेशा से ही स्वार्थी प्रवृत्ति को दर्शाती है । चीन का पर्ूव सोवियत संघ से सीमा विवाद रहा तो वही चीन ने वियतनाम पर चढर्Þाई की तो दक्षिण कोरिया और ताइवान से चीन का विवाद ही रहा है । जापान से भी कई मसलों पर टकराव बना रहा है । चीन ने हमेशा ही भारत की उदारता का फायदा उठाने की कोशिश की है । भारत ने सुरक्षा परिषद में चीन के दावे का बिना शर्त र्समर्थन दिया । तिब्बत में भी चीन के दावे को र्समर्थन देकर राष्ट्रीय और अंतर्रर्ाा्रीय स्तर पर आलोचना बर्दास्त की है । ज्ञढटठ में चीन ने सिक्किम पर हमला बोला । भारत के मध्य और पर्ूर्वी इलाके के अलावा पश्चिमी इलाकों में भी चीन द्वारा लगातार सीमा उल्लंघन किया जाता रहा है । साल द्दण्ण्ड में ऐसे द्दठण् मामले सामने आए जबकि इस साल ऐसी घटनाओं की संख्या टण् से भी ज्यादा हो चुकी है । अरुणांचल प्रदेश के साथ चीन की ज्ञ,ण्घण् किलोमीटर लंबी खुली सीमा है । इसी बात का फायदा उठाते हुए चीन बार-बार ऐसी हरकतों को दोहराता है । और तो और चीन ने हमेशा भारत को घेरने की कोशिश ही की है । द्दण्ण्ड में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की बैठक में भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील में बाधा पहुँचाई । जब-जब सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्यता की कोशिशें हर्ुइ चीन-पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए अवरोध खडÞा करता रहा है । सीमा मुद्दे पर मतभेद के चलते चीन ने हाल में अरुणांचल प्रदेश में एक परियोजना के चलते ए.डी.बी. की मदद को रोकने का प्रयास किया था ।
बरहाल चीन का नेतृत्व उतना मर्ूख नही है कि वह भारत जैसे एक नाभिकीय क्षमता सम्पन्न देश पर हमला कर देगा । भारत दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक एवं सामरिक शक्ति के रुप में शुमार किया जाता है । भारत कोई छोटा-मोटा लुंज-पुंज देश नहीं है कि कोई भी उस पर हमला कर देगा । रक्षा मंत्रालय ने भी यह साफ कर दिया है कि वह चीन की गतिविधियों को लेकर पूरी तरह से र्सतर्क है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में चीन सीमा पर बढÞते खतरे के मद्देनजर रक्षाबलों की तैयारियों का जायजा तक लिया है । ज्ञढटद्द से द्दण्ण्ढ तक आमूल परिवर्तन हो चुके है और द्दण्ज्ञद्द तक भारत के लिए किसी प्रतिकूल की संभावना तो है ही नही । खैर जो भी हो भारत खामख्वाह किसी भी देश के साथ नाहक विवाद करने के मूड में नही है । पडÞोसी देशों के साथ तो कतई भी नही ।

रामलाल गोल्छा आँखा अस्पताल::वरुणमाला मिश्रा

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

barunmala jhaनेपालके अग्रणी औद्यागिक घराना गोल्छार् अर्गनाइजेशन देश के उद्योग व्यवसाय के साथ-साथ समाजसेवा का विविध कार्यक्रम में महत्वपर्ूण्ा योगदान प्रशंसनीय है । समाजसेवा का अपना अभियान में रामलाल गोल्छा आँखा अस्पताल प्रतिष्ठान संवेदनशील मानव अंग आँख का उपचार कर देश ही नही विदेश के नागरिकों में भी मानव सेवा में पहचान हासिल की है । स्थापना काल में उक्त अस्पताल में ज्ञड शैया लगाया गया था जो अब बढÞकर ज्ञण्ण् तक पहुँच गया है । विभिन्न चिकित्सकीय उपकरण के साथ ही मरीज हेतु कैंटीन, रेस्टरुम, वातानुकूल आधुनिक शल्य चिकित्सा कक्ष, एक साथ चार शल्य चिकित्स्ा करने की व्यवस्था तथा विश्व का र्सवश्रेष्ठ अपरेटिंग माइक्रोस्कोप, रेटिना रोगी के लिए अत्याधुनिक प्रविधि का उपकरण से मरीज का उपचार इस अस्पताल का बडÞी उपलब्धि है । पर्ूवांचल के विराटनगर में स्थापित उक्त अस्पताल में नेपाल के विभिन्न इलाकों के साथ-साथ पडÞोसी देश भारत से भी मोतियाबिंद सहित अन्य बिमारियों के रोगी पहुँच रहे हैं । जिसमें अधिकांश बिहार प्रांत के जिला अररिया, पूणिर्या, कटिहार, सररहा, मधेपूरा, सूर्योल, दरभंगा, मधुबनी आदि क्षेत्र से भारी तादाद में रोगी यहाँ उपचार के लिए पहुँचते हैं । अस्पताल के संचालन समिति के महासचिव सुरेन्द्र गोल्छा बताते हैं कि अस्पताल में लगभग ठण् प्रतिशत रोगी पडÞोसी देश भारत से पहुँचते हैं । कम खर्च में बेहतर चिकित्सा के कारण ही मरीजों के संख्या में इजाफा हो रही है ।hospital photo
विराटनगर स्थित उक्त अस्पताल का द्दण्घट साल में स्व. रामलाल गोल्छा के हाथों शिलान्यास कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था । तीन वर्षनिर्माण कार्य के उपरान्त द्दण्घढ साल में तत्कालीन बडामहारानी ऐश्वर्या राज्यलक्ष्मी देवी शाह द्वारा अस्पताल का उद्घाटन किया गया था जो लगातार द्दठ वर्षों से आँख उपचार के क्षेत्र में प्रभावकारी योगदान देता आ रहा है । अंधापन निवारणार्थ विभिन्न सेवा प्रदान करते आ रहा उक्त अस्पताल ने गत आर्थिक वर्षद्दण्टछरण्टट में डद्दण्ण्ण् आँख रोगी का जाँच किया । जिसमें ठण्,ण्ण्ण् बहिरंग सेवा में तो बाकी के ज्ञद्दण्ण्ण् मरीज का विभिन्न शिविर में । अस्पताल द्वारा इस अवधि में ढ हजार ड सौ मोतियाबिंद रोगी का सफलतापर्ूवक शल्यक्रिया किया गया जिसमें ठण्ण्ण् मरीज अस्पताल पहुँचे तथा बाकी के द्द हजार ड सय छण् मरीज अस्पताल द्वारा विभिन्न जगहों पर रखे शिविर में पहुँच कर आपरेशन कराया । अस्पताल के संचालन समिति के उपाध्यक्ष महेन्द्र गोल्छा ने बताया कि इस दौरान ट सौ छण् मरीज आँख के गंभीर रोग से ग्रस्त थे जिनका भी सफलतापर्ूवक आपरेशन किया गया । इस अवधि में अस्पताल द्वारा लायन्स क्लब, मारवाडÞी मित्र परिषद, महेश्वरी महिला मंच, चेतनशील मित्र परिषद आदि संस्था से मिलकर विभिन्न ठण् जगहों पर आँखा शिविर का सफलता पर्ूवक संचालन किया । जिसमें कई दर्ुगम ग्रामीण इलाका भी शामिल है । इसके अलावा अस्पताल द्वारा समय-समय पर जनचेतना जगाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार के झांकी निकाली । संचालन समिति के अध्यक्ष ज्ञानचन्द्र दुगड ने बताया कि विभिन्न अवसर पर अस्पताल निरीक्षण पर पहुँचे तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला, र्सर्ूय बहादुर थापा, मरिचमान श्रेष्ठ, मातृका प्रसाद कोईराला, नगेन्द्र प्रसाद रिजाल आदि विशिष्ट व्यक्ति द्वारा स्तरीय एवं सराहनीय सेवा का प्रशंसा के कारण बेहतर काम के लिए हौसला बढÞा और आज अस्पताल इस मुकाम पर है ।
अस्पताल संचालन समिति के सदस्यगण राज्यलक्ष्मी गोल्छा, राजकुमार गोल्छा ने बताया कि आँख का रोगी में दिन प्रतिदिन इजाफा को देखते हुए बेहतर इलाज हेतु अस्पताल को और भी सुव्यवस्थित, अत्याधुनिक यंत्रीकरण के साथ-साथ दक्ष सेवा प्रदान करने की हमारी योजना है । वर्तमान समय में उक्त अस्पताल में द्द अनुभवी चिकित्सक, द्दण् सहायक चिकित्सक सहित द्दड कर्मी है । इस नेत्र प्रठिष्ठान द्वारा नर्सरी, डाक्टरी का विद्यार्थी को इन्ट्रान्सिप प्रशिक्षण दिलाने का काम के साथ-साथ शैक्षिक विकास में भी महत्वपर्ूण्ा योगदान देने में सक्षम सावित हो रहा है । संचालन समित के कार्यकर्ताओं ने र्सवसाधारण से नेत्रदान का अपील की है । चिकित्सकों के अनुसार एक व्यक्ति द्वारा दान किये गये आँख से दो अंधा व्यक्ति का आँख का रोशनी लौटने का बात कही । डघ वर्षके उम्र में स्व. रामलाल गोल्छा द्वारा स्थापित उक्त अस्पताल आज उपचार से वंचित गरीब तबके के लोगों के बीच लाभ पहुँचा रहा है । पर्ूवज के द्वारा स्थापित नेत्र प्रतिष्ठान का देखरेख हेतु समस्त गोल्छा परिवार को सक्रिय देखा जा रहा है ।

बच के रहना भोले बाबा ::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

veenaji इधर-उधर भाग रहे हैं इस भीडÞ में प्रहरी भी अपनी शक्ति पर््रदर्शन करने में जुटे हुए हैं लेकिन पीटाने वाले को बचाने के लिए नहीं बल्कि पीटने वाले को साथ देने में । आर्श्चर्य यहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाये तो स्थिति कैसी होगी – यह दृश्य किसी पर््रदर्शन, जुलूस का नहीं है यह दृश्य विश्व विख्यात हिन्दू धर्मावलम्बियों के आस्था का केन्द्र काठमांडू के पशुपतिनाथ का मंदिर है । पशुपतिनाथ मंदिर न केवल नेपाल के हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बल्कि विश्वभर के हिन्दूओं के विश्वास तथा आस्था का केन्द्र है । यहाँ प्रति वर्षहजारों हिन्दू धर्मावलम्बी विश्व के विभिन्न देशों से भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करने हेतु आते हैं और अपनी मनोवांछित इच्छाओं की प्राप्ति करते हैं । इस विख्यात मंदिर को आजकल राजनीतिक षडयंत्र का अखाडÞा बना दिया गया है । नेपाल में गणतंत्र क्या आया, लोकतंत्र के नाम पर देश में अराजकता-अव्यवस्था का साम्राज्य छा गया । आज देश के आर्थिक-राजनीतिक, सामाजिक हो या धार्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्र ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहाँ देश के तथाकथित राष्ट्रभक्त एवं शुभचिंतक मानने वालो विविध राजनीतिक दल देश का सबसे बडÞा अखाडÞा बनाकर अपना हित साधने हेतु मल्लयुद्ध न कर रहे हों ।pashupatinath
पशुपतिनाथ मंदिर में विवाद की यह कोई पहली घटना नहीं है । आज से ढ महीना पहले भी माओवादियों की सरकार ने सदियों से चली आ रही परम्परा के आधार पर नियुक्त दक्षिण भारतीय पुजारियों को हटाने का अभियान चलाया था । प्रारम्भ में सन्यासी और ब्राहृमण पुजारियों द्वारा पशुपतिनाथ जी की पूजा अर्चना की जाती थी लेकिन मल्लकाल में आदि शंकराचार्य ने दक्षिण ब्राहृमण को मूल भट्ट के रुप में नियुक्ति की परम्परा आरम्भ की । उन्हें पूजार्-अर्चना करने का लालपर्ूजा भी दिया गया । कारण बताया गया कि उत्तरी भारत के विभिन्न समयों में हिन्दूओं पर अन्य धर्मों का प्रभाव पडÞा फलतः उनमें शुद्धता नहीं रही, जबकि दक्षिण भारत के ब्राहृमणों में धार्मिक अभ्यास के लिए अटूट रुप से शुद्ध ब्राहृमण बरकरार रहा इन्हीं तथ्यों के आधार पर इस परम्परा को निरन्तरता दी जाती रही है ।
विगत पुस महीना में माओवादी सरकार ने इस परम्परा का अन्त करते हुए अपने पार्टर्ीीे करीबी व्यक्ति माने जाने वाले डाँ. विष्णु प्रसाद दहाल और शाल्रि्राम ढकाल को नया पुजारी नियुक्त कर दिया । सरकार के इस निर्ण्र्ााके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा भी दायर हुआ और सर्वोच्च ने सरकार के निर्ण्र्ाापर रोक लगा दी । माओवादी सरकार ने सर्वोच्च के आदेश का अवहेलना कर नवनियुक्त नेपाली पुजारियों को घोर विरोध के बावजूद पुलिसिया संरक्षण में मन्दिर प्रवेश करवाया तथा जबरदस्ती पूजा अर्चना करवानी शुरु की । माओवादी सरकार के इस जोर-जबरदस्ती की राजनीति वह भी धर्म तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप तथा अपने आस्था के केन्द्र पशुपतिनाथ जी को भी विवाद का विषय बनाने पर आम जनता में तीव्र आक्रोश व्याप्त हो गया ।
जनता के मनोभाव को भाँपते हुए देश के प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने धर्म के आग में अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का उपयुक्त अवसर के रुप में लिया । अब क्या था मन्दिर परिषद में राजनीतिक खेल खेला जाने लगा । एक पक्ष मन्दिर में तालाबन्दी करता है तो दूसरा पक्ष ताला खोलवाने हेतु धरना, जुलूस, पर््रदर्शन का सहारा लेता है । राजनीतिक दलों के इस आधिपत्य लडर्Þाई में बेचारे भोले पशुपतिनाथ की याद किसी को नही । लगातार आठ दिनों तक पशुपतिनाथ जी को भूखा-प्यासा रखा गया क्योंकि उनके दरवाजे पर ताला लगाकर उनकी पूजार्-अर्चना रोक दी गयी थी । अंततः दबाबों एवं चौतर्फी आलोचना के पश्चात् तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल को पीछे हटना पडÞा और नेपाली पुजारियों को वापस बुलाकर पुराने मूलभट्ट महाबालेश्वर की पुनः बहाली की गयी । इसके पश्चात् सम्पर्ूण्ा शिवभक्तों ने इन सियासदों की लडर्Þाई से राहत की साँस भी । अभी न्यायालय में मुकदमा लम्बित ही है इन पुजारियों के नियुक्ति को लेकर ।
देश में समस्याओं एवं विवादों की क्या कमी है । यहाँ आये दिन ऐसे-ऐसे विषयों को लेकर “फसाद” राजनीतिक दलों द्वारा खडÞा किया जा रहा है जो कि नेपाली जनता के आस्था एवं विश्वास को चोट पहुँचाता है । जनता के प्रत्यक्ष सरोकारवाली विषयों पर इन राजनीतिक दलों का ध्यान शायद ही जाता हो – महँगाई आसमान छू रही है, खाद्यान्नों को अभाव से जनता त्रस्त है, बीमारी, गन्दगी तथा अपराधों के महाजाल में देश जकडÞा जा रहा है लेकिन इन्हें दूर करने हेतु देश में तालाबन्दी नही की जाती है क्या सबसे निरीह पशुपतिनाथ जी ही नजर आते हैं कि बार-बार उनके द्वार पर ताला बन्दी की जाती है । इस बार पुनः विवाद का कारण मुख्य पुजारी के रिक्त पद पर भारत के कर्नाटक राज्य के बुलाये गये दो पुजारियों की नियुक्ति को लेकर है । मन्दिर के उत्तरी द्वार के रमाकान्त भट्ट और बासुकीनाथ के केपी रामचन्द्र ने पुस महीने में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था । परम्परा अनुसार एक महीना पर्ूव मूलभट्ट महाबलेश्वर रावल के संयोजकत्व एवं सिफारिश पर गिरिश भट्ट और राघवेन्द्र भट्ट का चयन किया गया । गिरिश ने मन्दिर के उत्तर द्वार और राघवेन्द्र ने बासुकीनाथ मन्दिर के पूजा की जिम्मेदारी सम्भाली । जब इसकी जानकारी पशुपतिनाथ में भारतीय पुजारी नियुक्ति के विरुद्ध गठित संर्घष्ा समिति को लगी तो उसने पशुपति क्षेत्र के विकास कोष के प्रशासनिक और आर्थिक विभाग में अनिश्चितकालीन तालाबन्दी कर दी है । यह संर्घष्ा समिति माओवादी निकट है । इन लोगों ने माँग रखी है कि नेपाली पुजारियों को क्षमता के आधार पर प्रतिस्पर्धा को माध्यम से पुजारी नियुक्ति की जाये, भारत के पुजारी आयात रोकी जाये तथा भट्ट, भण्डारियों के लिए वेतन की व्यवस्था की जाये ताकि पशुपति विकास कोष में आर्थिक अपारदर्शिता का अन्त हो सके । जबतक मांगें मानी नही जायेगी तब तक तालाबन्दी बनी रहेगी – संर्घष्ा समिति ने घोषणा की है । पिछले कई दिनों से पशुपति क्षेत्र में पर््रदर्शनों, धरनाओं का दौर चल रहा है । इस संबंध में संसदीय व्यवस्था संघीय मामला संविधानसभा तथा संस्कृतिमंत्री डाँ. मीनेन्द्र रिजाल का आरोप है कि माओवादी धर्म के आड में राजनीतिक खेल खेल रहे हैं । उनका कहना था कि सरकार ने मौजुदा नियम के अनुसार ही दो भारतीय भट्टों को पशुपतिनाथ के पुजारी के रुप में नियुक्ति की है । इन नव नियुक्त पुजारियों का गुप्तवास प्रशिक्षण के दौरान चल रहा था इस बीच शुक्रवार को ज्ञण्ण् व्यक्तियों का समूह वहाँ पहुँच कर इन पुजारियों को घसीटते हुए बाहर निकाल कर उनके साथ मारपीट करने लगे । मंदिर को अहाते में उपस्थित भक्तजनों ने उन अताताईयों से पुजारियों की रक्षा की । इस घटना को भारत सरकार ने बडÞी गंभीरता से ली है । भारत के विदेश मंत्री ने इस संबंध में नेपाल स्थित भारतीय राजदूत से पूरी जानकारी ली । उनके निर्देशन पर भारतीय राजदूत तथा नेपाल के संस्कृति मंत्री डाँ. मीनेन्द्र रिजाल मंदिर पहुँचकर घायल पुजारियों से भेंट कर घटना की जानकारी ली । संस्कृति मंत्री ने अपनी सरकार की ओर से इस घटना के प्रति क्षमा भी पुजारियों से मांगी । इस घटना के प्रति प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए भविष्य में पुनः ऐसी घटना घटने नही दी जायेगी कि प्रतिबद्धता व्यक्त की है । माओवादियों के संलग्नता के बार-बार आरोप लगने पर माओवादी प्रवक्ता कृष्णा बहादुर मोहरा ने अपनी पार्टर्ीीे कार्यकर्ताओं को इसमें संलग्नता से इन्कार किया है ।
स्पष्ट है ऐसी घटनायें देश को ही नही वैदेशिक नीति को भी प्रभावित करती है । भारत के साथ नेपाल का सदियों से रोटी-बेटी का संबंध रहा है । भारतीय नेताओं ने इस ओर इंगित भी किया है कि भारत के बनारस के विश्वनाथ मंदिर, केदारनाथ-बद्रीनाथ सहित अनेकों मठ-मंदिरों में नेपाली पुजारी नियुक्त हैं उसके बावजूद ऐसी घृणित घटनायें घट रही है जो कि दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर सकती है ।

मजफो का प्रशिक्षण कार्यक्रम

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 1 COMMENT

opendraji कालैया का एवरेस्ट होटल का ‘सभा कक्ष’ लोगों से खचाखच भरा हुआ । लोग उमस भरी गर्मी में भी बडÞी तन्मयता से बैठे हुए आनन्द का अनुभव कर रहे थे – यहाँ किसी योगी बाबा का प्रवचन नहीं चल रहा था । यहाँ चल रहा था मधेशी जनाधिकार फोरम का स्रि्रौणगढ प्रशिक्षण कार्यक्रम और लोगों को पार्टर्ीीे वैचारिक एवं सैद्धान्तिक तथा व्यवहारिक स्तर उठाने हेतु पार्टर्ीीे नीति तथा कार्यक्रम, पार्टर्ीीे कार्यपद्धति, पार्टर्ीीे राष्ट्रीय एवं अन्तर्रर्ाा्रीय दृष्टिकोण के सम्बन्ध में पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेतागण तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र यादव जानकारियां दे रहे थे । इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन सम्पर्ूण्ा देश को छह भागों में बाँट कर प्रत्येक क्षेत्र में घ दिवसीय कार्यक्रम का आयोजना किया गया था ।
मधेशी जनाधिकार फोरम के दो टुकडÞे में विघटन के पश्चात् अध्यक्ष उपेन्द्र यादव का काठमांडू से मोह भंग हो गया है । अब वे अपना अधिकांश समय तर्राई-मधेश दौरा में ही बिता रहे हैं । देर से ही सही इतनी तो उन्हें समझ आ ही गई है कि जनता ही जनार्दन है अतः उसके शरण में ही रहना बुद्धिमानी है । यही कारण है कि अपनी पार्टर्ीीो टूट-फुट के पश्चात् वे पुनः एक कुशल कारीगर की तरह उसके मरम्मत में जुट गये है । इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में पार्टर्ीीो पर्ुनजीवित करने का प्रयास किया जा रहा है । अपने विचारों एवं तर्कों के माध्यम से जनता को विश्वस्त करने का प्रयास किया जा रहा है कि मधेश की मुक्ति मधेशी जनाधिकार फोरम नेपाल ही दिला सकती है । इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का एक उद्देश्य अपने कार्यकर्ताओं को आगामी आन्दोलन हेतु संगठित एवं आन्दोलन हेतु तैयार करना भी है । फोरम नेताओं द्वारा इन कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टर्ीीे टूटने के कारणों पर प्रकाश डालकर पार्टर्ीीूटने के दर्द को जनता के बीच बाँटकर उसे हल्का करने का प्रयास भी किया जा रहा है । इन कार्यक्रमों में भारी भीडÞ देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि उपेन्द्र यादव के प्रति लोगों में आस्था बरकरार है और जनता बडÞी धर्ैय एवं गंभीरता से उनकी बातों को सुन रही है एवं र्समर्थन कर रही है । इन कार्यक्रमों में पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेताओं ने यह स्वीकार किया कि विगत में उनसे कई गलतियाँ हर्ुइ हैं उसी को सुधारने-परिमार्जित करने में लगे हुए हैं वे लोग । साथ ही उन लोगों ने प्रतिबद्धता जाहिर की कि जब तक मधेश को उसका हक एवं अधिकार नही दिलवायेंगे तब तक सत्ता के कर्ुर्सर्ीीौडÞ में शामिल नही होंगे । लेकिन मधेश की जनता उनपर कितना भरोसा करती है यह तो समय ही बतलायेगा वैसे हिन्दी र्समर्थन के प्रश्न पर मधेशी जनता उपेन्द्र यादव के र्समर्थन में आज भी उनके साथ खडÞी दिखी ।

चार संगठनों का एकीकरण

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

दश भर में विशेष सुरक्षा योजना लागू होने के बाद सशस्त्र संगठनों के बीच एकीकरण की प्रक्रिया तीव्र हो गयी है । तर्राई के सशस्त्र संगठनों में भी एकीकरण प्रक्रिया शुरु हो गयी है । जयकृष्ण गोईत के नेतृत्व में चार संगठनों के एकीकरण ने तर्राई में सरकार को नयी चुनौतियाँ खडÞी कर दी है । गोईत के नेतृत्व में अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा में राष्ट्रीय तर्राई मुक्ति मोर्चा, तर्राई जनतांत्रिक पार्टर्ीीौर अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा -अमिताभ) का एकीकरण हुआ है ।
goitjiचार पार्टियों के एकीकरण के बाद मोर्चा के अध्यक्ष जयकृष्ण गोईत ही होंगे । एकीकरण पत्र पर अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा की ओर से जयकृष्ण गोईत, राष्ट्रीय तर्राई मुक्ति सेना की ओर से पृथ्वी सिंह, तर्राई जनतांत्रिक पार्टर्ीीी ओर से खुदीराम तथा अमिताभ के हस्ताक्षर है । गौरतलब है कि पहले इन सभी पार्टियों के अध्यक्ष जनतांत्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा में जयकृष्ण गोईत के साथ ही थे पर पिछले एक-आध वर्षों से अलग पार्टियाँ खोल रखी थी । एकीकरण के बाद अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा पहले से काफी शक्तिशाली बन कर उभर सकता है जो निश्चय ही नेपाल सरकार के लिए नया सिर्रदर्द साबित हो सकता है । एकीकरण के बाद जारी बयान में अखिल तर्राई मुक्ति मोर्चा के संयोजक जयकृष्ण गोईत ने कहा कि अन्य संगठनों से वार्ता चल रही है । शीघ्र ही तर्राई में संर्घष्ारत अधिकांश सशस्त्र संगठन एक होकर नेपाल सरकार के विरुद्ध तर्राई की स्वतंत्रता के लिए संग्राम छेडÞ देंगे । गोईत ने कहा कि फर्जी मुठभेडÞ के नाम पर तर्राई के क्रांतिकारियों की हत्या का बदला शीघ्र नेपाली राज्य सत्ता से लिया जायेगा ।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय तर्राई मुक्ति मोर्चा के सैन्य कमांडर आकाश त्यागी को पुलिस ने हाल ही में मुठभेडÞ में उडÞा दिया था । इससे पहले जनतांत्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा -राजन मुक्ति) के भी एक वरिष्ठ नेता को प्रहरी ने मार गिराया था । तर्राई में विशेष सुरक्षा योजना लागू होने के बाद तर्राई में सक्रिय भूमिगत सशस्त्र संगठनों के कई वरिष्ठ नेताओं को प्रहरी ने मुठभेडÞ में उडÞा दिया था ।

कठिन समय का साथी:: भिूपाल सिंह र्राई

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

gurkहिमालय की चोटियों से लेकर हिन्द महासागर के विशाल तटों तक सम्पर्ूण्ा भूखण्ड की जीवन धाराएँ एक है भले ही समय की बहती धाराओं से, राजनीतिक उतार-चढÞाव के कारण इन जीवों का राजनीतिक परिचय बदल जायें लेकिन अन्य समानताएँ नहीं बदल सकती । सत्ता के खेल में किसी भी देश की राजनीतिक परिचय बनते-बिगडÞते हैं लेकिन इससे वहाँ निवास करने वाले व्यक्तियों का परिचय बदल नहीं सकता । इस सच की भूमि के आधार पर पनपा है, नेपाल भारत की मैत्री एवं सद्भाव । दोनों ही देशों के जनस्तर पर अपनी गहरी पैठ बनाये हुए मैत्री संबंध किसी राजनीतिक सत्ता का गुलाम नहीं हो सकता । राजनीतिक सत्तायें तो बदलती रहती है लेकिन इसका असर दोनों देशों की जनता के संबंधों पर न पडÞे, दोनों देशों की दोस्ती हमेशा बनी रहे, आगे बढÞती रहे, यही संदेश देते हुए भारत ने हमेशा कठिन समय में नेपाल का हाथ दृढता से थामें रहा है । रामायण-महाभारत काल से चली आ रही यह दोस्ती की नीव भारत के विकास के आधारभूत संरचनाओं के लिए राजमार्ग निर्माण करने की थी । अपने परायों का पहचान संकट के क्षणों में होता है । जिस वक्त नेपाल को समुद्र तक का सफर तय करना कठिन था उस वक्त भारत ने राजमार्ग बनाकर घाटी से निकलने का रास्ता बनाने में सहयोग किया था । आज नेपाल के भौगोलिक निकटता ही नही भाषिक, सांस्कृतिक विविधताएं भी भारत में आसानी से देखी जा सकती है । हिमालय की चोटियों से निकलने वाली जलधारा का समुद्र तक पहुँचते-पहुँचते अनेक नामक बन जाता है उसी प्रकार इन नदियों के किनारे बसने वाली जीवों जनसमुदाय अनेक नामों में विभाजित होते गये है । आज अपने पडÞोसी देशों में जाने के लिए उनके सुख-दुःख में शामिल होने के लिए भीषा-पासपोर्ट का मोहताज होना पडÞता है पर नेपाल-भारत के बीच जो सदियों से मैत्रीपर्ूण्ा संबंध हैं उसमें ऐसी नौबत अभी तक नही आई है ।
जहाँ तक नेपाल को भारत द्वारा किये गये सहयोग की बात है उससे तथ्यांकों में अंकित करना सूरज को दिया दिखाने जैसी बात होगी । मोटे तौर पर कहा जायें तो नेपाल को आधुनिक युग में लाने और अधिक स्वावलम्बी बनाने हेतु भारत ने नेपाल को जो सहयोग एवं सहायता पहुँचायी है या पहुँचा रहा है उसकी कोई सीमा नही है । त्रिभुवन राजपथ, महेन्द्र राजमार्ग, जगह-जगह पुलें, स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठान, अस्पताल, औद्योगिक क्षेत्रों में प्रचुर सहयोग इतना ही नहीं विद्युत, दूर संचार, कृषि, पशु विज्ञान, मानव विज्ञान आदि क्षेत्रों में भारत का सहयोग नेपाल के लिए ‘मील का पत्थर’ साबित हो रहा है । जिसे विस्मरण करना असंभव है । भारत के राजकुमार श्री रामचन्द्र ने नेपाल की राजकुमारी सीता के साथ वैवाहिक संबंध और भगवान बुद्ध जो कि नेपाल के थे । भारत में बोधिसत्व प्राप्त कर शांति अभियान संचालन से कायम नेपाल-भारत मैत्री के अतिरिक्त हजारों की तादाद में नेपाली जवानों का, आज के विश्वव्यापी बेरोजगारी की समस्या झेलती युवाओं को गोरखा भर्ती के नाम पर भारतीय सशस्त्र सेना में भर्ती कर उन्हें रोजगार मुहैया कराकर उन्हें जो इज्जत एवं सम्मान दिया, साथ ही उससे नेपाल के अर्थतन्त्र के विकास को एक मजबूत आधार प्रदान किया उसका कोई मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ।
गोरखा भर्ती का इतिहास दो सौ पचास वर्षपुराना है । बाद में ज्ञढद्धठ को भारत, ब्रिटेन और नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद्म शमशेर राणा के बीच हुए त्रिपक्षीय संधि ने इस भर्ती को कानूनी वैधता मिला है । ब्रिटिश साम्राज्य के क्रम में सन् ज्ञडछड से ज्ञढटछ के बीच युद्धों में लडÞने वाले गोरखा सैनिकों में से ज्ञघ सैनिकों ने युद्ध के सर्वोच्च पदक विक्टोरिया क्रास जीत चुके हैं । गोरखा सैनिकों ने बहादुरी की जो मिसाल कायम की है वह काबिले तारीफ है । उन्होंने विश्व रंगमंच में अपने बहादुरी और साहस का पर््रदर्शन कर नेपाल और नेपाली की जो पहचान बनायी, इज्जत बढÞायी है । सन् ज्ञढद्धठ में अंग्रेजों ने भारत छोडÞते समय घ हजार ठ सौ गोरखा लडÞाकू सेना को साथ लेकर ब्रिटेन गये थे, जो अभी घ हजार द्ध सौ में सीमित है । भारत में गांधी जी द्वारा किये जा रहे स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में सहभागी सैकडÞों आम नेपाली ने अपने प्राण की आहुति देकर अपना नाम अमर लोगों में शामिल करवाया । देश के आन्तरिक और बाहरी सुरक्षा में गोरखा सैनिकों का उल्लेखनीय योगदान रहा है । इन्ही योगदानों और उनके साहस पराक्रम और्रर् इमानदारियों का उच्च कदर करते हुए काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के पदाधिकारियों ने विभिन्न कल्याणकारी योजना संचालित करके नेपाल के विभिन्न क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा, एम्बुलेन्स और बसें उपहार स्वरुप, शिक्षा सहायता, विद्यालय निर्माण, पीने का पानी और ग्रामीण, सौर्य ऊर्जा विद्युतीकरण आदि सहयोग करते आया है ।
इसी क्रम में सुपेअ कप्तान भूपाल सिंह र्राई की सक्रियता और संरक्षण में नाखोल्याण्ड गाविस ताप्लेजुंग में एक करोडÞ द्दछ लाख के लागत से सौर्य विद्युतीकरण सम्पन्न हुआ है । जहाँ विद्यालय में कम्प्यूटर के लिए पावर की व्यवस्था, स्वास्थ्य चौकी में रेबिज के विरुद्ध वैक्सिन रख रखाव के लिए रेप|mीजेरेटर संचालन जैसी व्यवस्था किया गया है । स्वचालित छ सडÞक, सौर्य बत्ती और द्दद्धढ घरों में ठछ वाट के सौर्य बत्ती की व्यवस्था भारतीय दूतावास के सहयोग से किया गया है । इस तरह नेपाल भारत के मैत्री संबंधों को सशक्त और मजबूत बनाने का काम निरन्तर चलते रहे आज आम नेपाली का हार्दिक इच्छा है ।
लेखक, सु.मे.उ. कप्तान -रिटायर्ड) हैं ।

कोइराला बोले तो काङ्रेस::विनय लाल दास कर्ण्र्ाा

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

महाभारत में वैसे तो कई पात्र हैलेकिन उसमें एक पात्र ऐसा था जिसने पुत्र मोह के कारण सब कुछ बर्बाद कर दिया । नीति-नियम सिद्धांतों की अवहेलना कर धृतराष्ट्र ने जिस प्रकार अपने पुत्र दुर्योधन को बढÞाया उससे कुरु कुल का नाश हो गया । इतिहास में धृतराष्ट्र को पुत्र मोह का पर्यायवाची शब्द मान लिया गया । उसके सलाहकारों ने उसे इससे बचने के लिए काफी समझाया पर अंधा धृतराष्ट्र नही माना । संयोगवश नेपाली राजनीति के वयोवृद्ध पुरोधा गिरिजा प्रसाद कोईराला अभी अपनी पार्टर्ीीें धृतराष्ट्र की भूमिका में आ चुके हैं । महाभारत की कथा और नेपाली कांग्रेस की कथा में थोडÞा सा र्फक है । वहां पुत्र मोह था तो यहां पुत्री मोह । धृतराष्ट्र पाखंड करते थे वही गिरिजा प्रसाद कोईराला खुलेआम पुत्री के लिए प्रयास करते हैं । उनके कुल -नेपाली कांग्रेस) में इसको लेकर भारी मतभेद है परंतु कोईराला के विशाल वटवृक्ष जैसे व्यक्तित्व के सामने सभी नतमस्तक नजर आते है । नेपाली कांग्रेस वस्तुतः कोईराला परिवार के ही कब्जे में रहा है । एकाध अपवाद हुये परंतु ज्यादा दिन तक इस परिवार के नियंत्रण से पार्टर्ीीूर नही रही । ताजा विवाद की शुरुआत सुजाता कोईराला के भारत भ्रमण में नही जाने से उत्पन्न हुआ । बीमारी की वजह से सुजाता ने प्रधानमंत्री के साथ भारत भ्रमण कार्यक्रम को रद्द कर दिया, पर पर्दे के पीछे की कहानी अलग थी । सुजाता को गिरिजा प्रसाद कोईराला उपप्रधानमंत्री के रुप में भारत भेजना चाह रहे थे । इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री माधव नेपाल पर दबाब बनाया था । माधव नेपाल ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और कहा कि जल्दीबाजी में ऐसा करने से लोगों के बीच गलत संदेश जायेगा । इसके बाद ही सुजाता ने बीमारी के बहाने भारत दौरा रद्द कर दिया । सुजाता के इस कदम के बाद नेपाली कांग्रेस पार्टर्ीीें काफी तीव्र प्रतिक्रिया हर्ुइ । सभी वरिष्ठ नेताओं ने सुजाता को सरकार से वापस बुलाने के लिए कह दिया । अर्जुननरसिंह केसी, नरहरि आचार्य, गगन थापा जैसे वरिष्ठ नेता सुजाता को तुरंत सरकार से वापस बुलाने की मांग करने लगे । पार्टर्ीीें सुजाता को लेकर भीषण अर्ंतद्वंद्व शुरु हो गया । सुजाता से उपस्थित होकर सफाई देने के लिए कहा गया तो उन्होंने लिखा-लिखाया जबाव भेज दिया । इसके बाद कांग्रेसी और भडÞक गये । इधर सारे घटनाक्रमों से अविचलित कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोईराला ने अपने निवास में चाय-पान कार्यक्रम पार्टर्ीीधिकारियों और सभासदों के लिए रखा । चाय-पान कार्यक्रम में लगभग डांटने के अंदाज में सुजाता के बारे में किसी तरह की चर्चा न करने की हिदायत गिरिजा प्रसाद कोईराला ने दी । सभापति की फटकार सुनकर सभी भीगी बिल्ली बन गये । कुछ दिनों के बाद संसदीय दल में उपस्थित होकर सुजाता ने सफाई दी जिसके बाद मामला रफा-दफा हो गया ।girija
पुत्री को बचाने के लिए स्वयं कोईराला खुलकर सामने आये यह कोई पहला मामला नहीं है । इससे पहले भी कई बार कोईराला सुजाता के लिए सामने आकर लडÞ चुके हैं । संविधान सभा चुनाव में भयंकर पराजय का सामना कर चुकी सुजाता को मंत्री बनाने के लिए गिरिजा प्रसाद कोईराला खुलकर सामने आये थे । सुजाता के नेतृत्व में सरकार में जाने का फैसला भी कोईराला ने ही सुनाया था । उस समय सभापति के इस फैसले का भयंकर विरोध सुशील कोईराला, रामचन्द्र पौडेल आदि ने किया था । सुशील कोईराला ने तो अपने पद से इस्तीफे की भी धमकी दी थी पर सभापति की घुडÞकी पडÞते ही सुशील कोईराला ही नही पार्टर्ीीे सभी असंतुष्ट शांत हो गये । इससे पहले अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री काल में गिरिजा प्रसाद कोईराला ने सुजाता को बिना विभाग का मंत्री बना दिया था । अभी हाल ही में उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र का संयोजक सुजाता को बनाने की बात कहकर राजनीतिक वृत्त में अपने पुत्री मोह को र्सार्वजनिक कर दिया । उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र तीन बडÞे दलों का बनना है । कायदे से इसके संयोजक का पद कोईराला को सबसे बडÞे दल माओवादियों को आँफर करना चाहिए था परंतु उन्होंने ऐसा नही किया । नतीजा कोईराला की मंशा भांप कर सभी प्रमुख दल उच्चस्तरीय संयन्त्र से कन्नी काट रहे हैं ।
दरअसल में कोईराला के नेतृत्व की चुनौती देने वाले व्यक्तित्व का नेपाली कांग्रेस में नितांत अभाव है । उम्र के अंतिम पडÞाव पर पहुंच चुके कोईराला हर हाल में मरने से पहले सुजाता को पार्टर्ीीें स्थापित करना चाहते है । इसके लिए वे किसी नीति-नियम, सिद्धांत आदि का सहारा नही ले रहे है । पार्टर्ीीें उनके विरुद्ध आवाजे तो उठती है परंतु कोईराला के सामने में बोलने का साहस तक किसी में नही है । बाहर गगनचुंबी बयान देने वाले लोग कोईराला के सामने आज्ञापालक की तर्ज पर खडÞे रहते है । नेपाली कांग्रेस के एक नेता के अनुसार उनके सम्मान की वजह उनकी उम्र और व्यक्तित्व भी है । उम्र के इस पडÞाव में पहुंच चुके कोईराला को कोई दुख न हो इसके लिए भी वे लोग चुप रहते है । इसका मतलब यह है कि कोईराला के बाद नेपाली कांग्रेस में भयानक शक्ति संर्घष्ा शुरु होगा । दूसरी पंक्ति में महत्वाकांक्षी नेताओं की भारी फौज है जो अपने-अपने स्वाथोर्ं की पर्ूर्ति के लिए आपस में महाभारत करेंगे । ऐसी स्थिति में पार्टर्ीीा बेडÞा गर्क होना तय है । महाभारत काल में धृतराष्ट्र ने अपने कुल का विनाश अपनी ही जिन्दगी में देखा था परंतु कोईराला शायद खुशनसीब है । पार्टर्ीीें जो भी विवाद या टूट-फूट होगी कम से कम उनके जीवन में नही होगी ।

पर्यटन एवं पुण्य का संगम ः वैष्णो देवी ::अनुष्का

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

मारत के जम्मू-काश्मीर राज्य के जम्मू के निकट त्रिकूट पर्वत पर स्थित वैष्णो देवी मंदिर में प्रति वर्षठछ से डण् लाख लोग दर्शन हेतु पहुँचते हैं । इस धार्मिक केन्द्र की स्थापना कब हर्ुइ तथा यह कितने समय से देश-विदेश के लोगों के लिए आकर्षा का केन्द्र बना हुआ है यह पर्ूण्ातः स्पष्ट नहीं है । लेकिन अब यह स्थल पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ पर्यटन का भी मुख्य केन्द्र बन गया है ।
जम्मु से छद्द किलोमीटर दूर टण्ण्ण् फुट की ऊँचाई पर वैष्णो देवी के मन्दिर का वातावरण ही कुछ ऐसा है कि वहां जाकर एक आध्यात्मिक पवित्रता का अनुभव होता है । इस भागदौडÞ और तनाव भरे मशीनी जिन्दगी में भी इस स्थान में आकर अदभूत शांति मिलती है । माता के भक्तों की संख्या में प्रति दिन वृद्धि के कारण माता वैष्णो देवी द्वारा अपने भक्तों की जाने वाली असीम कृपा है । माता वैष्णों देवी के लाखों भक्त इस बात के प्रमाण है कि माता के दरबार में हाजिर होकर श्रद्धाभक्ति निष्ठा और विश्वास से जो भी मांगा उन्हें माता के प्रसाद के रुप में अवश्य मिला ।
काठमांडू से दिल्ली होते हुए वहाँ पहुँचा जा सकता है । जम्मु से बस एवं टैक्सी के माध्यम से कटरा डेढ-दो घंटे में पहुँचा जाता है । कटरा बस स्टैण्ड पर टूरिस्ट सेन्टर से यात्री पर्ची प्राप्त की जाती है जहाँ प्रत्येक यात्री को अपना नाम पंजीकरण करवाना पडÞता है । उसके पश्चात् माता के दरबार की ज्ञद्ध किलोमीटर की लम्बी यात्रा शुरु होती है । वैसे घोडÞा तथा डोली की भी व्यवस्था है । जिन लोगों को पैदल चढÞने में कठिनाई होती है वे इन सवारी साधनों का उपयोग करते हैं । आजकल भारतीय सेना की ओर से हाथीमत्था तक हेलिकाँप्टर सुविधा तथा टैम्पो की भी व्यवस्था की गयी है । कटरा से लगभग तीन किलोमीटर की यात्रा के पश्ाचत् वाणगंगा के दर्शन होते है । यहाँ पहाडÞों के बीच स्वच्छ नदी की धारा बहती रहती है । वाणगंगा से माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा तक पहुँचने के लिए दो रास्ते है एक सीढिÞयों वाला और दूसरी सीधी चढर्Þाई वाला ।
वाणगंगा के पश्चात् ‘चरण पादुका’ का स्थान आता है । इस स्थान पर माता अपने गन्तव्य स्थान जाते समय कुछ समय के लिए रुकी थी । जिस वजह से इस स्थान पर माता के चरण चिन्ह बने हुए हैं । इसी वजह से इस स्थान को चरण पादुका कहा जाता है । वाणगंगा से यह स्थान डेढÞ किलोमीटर दूर स्थित है ।र्
अर्द्धकुमारी ः चरण पादुका से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है आदि कुमारी का गर्भ गृह । वैष्णोदेवी का आदि कुमारी में मंदिर है यहाँ अनेक धर्मशालायें हैं जहाँ यात्री गण ठहरते है विश्राम हेतु । यही गर्भ गुफा में माता नौमास तक ठहरी हर्ुइ थी ।
हाथी मत्था ः गर्भ गुफा के पश्चात् हाथी मत्था नामक स्थान है जहाँ से दो किलोमीटर चलने पर साझी छत नामक स्थान है यहीं से भैरवदेव जाने के भी रास्ते हैं । एक रास्ता हाथी मत्था से नये रास्ते जो दिल्ली वाली छबीला की ओर से सीधे माता के गुफा की ओर जाता है ।
माता का गुफा ः त्रिकुट पर्वत पर माता वैष्णो देवी का दरबार एक अविस्मरणीय तथा अद्भूत दरबार है जहाँ तक पहुँचने हेतु इन उपरोक्त रास्तों को तय करने के पश्चात् मन्दिर परिसर में पहुँचा जाता है । वहाँ कटरा से प्राप्त पर्ची दिखाकर टोकन प्राप्त किया जाता है । पवित्र गुफा में प्रवेश के लिए कतार में खडÞे होने हेतु सभी यात्रियों को यह टोकन लेना अनिवार्य है । इन टोकन में अंकित यात्री संख्या के अनुसार ही यात्रियों को दर्शन की अनुमति मिलती है । गुफा का द्वार संकरा है । आगे बढÞने पर चरण गंगा की धारा के बायें भाग में एक प्राकृतिक शिलाखण्ड है । जिस पर सबसे पहले पाण्डवों के प्रतीक पाँच पिण्डियों और सप्तषिर्यों के प्रतीक सात पिण्डियां है और एक प्राकृतिक खम्बा है जिसे प्रल्हाद का तप स्तम्भ कहते हैं । आगे शेर का पन्जा और मुख बना हुआ है । यही गुफा का द्वार है । गुफा के छत पर शेषनाग की प्राकृतिक मर्ूर्ति और छोटे-छोटे सांपों की आकृतियाँ बनी हर्ुइ है । इसी गुफा में विश्व विख्यात माता वैष्णोंदेवी तीन पिण्डियों के रुप में विराजमान है ।
प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु अपने ज्ञान दृष्टि से अनुभव किये की महिषासुर का अन्त एक नारी शक्ति के द्वारा होगा । अतः जब महिषासुर के आतंक और अन्याय से त्रस्त इन्द्र और देवता ब्रहृमा-शिव के नेतृत्व में भगवान विष्णु से इस संकट से छुटकारा के लिए गुहार की तो भगवान ने जिस नारी की उत्पत्ति की वही वैष्णों कहलायी । बहृमा के अंश से महासरस्वती, विष्णु के अंश से महालक्ष्मी और शिव के अंश से महाकाली रुपी देवियों की उत्पत्ति इन्ही तीनो पिण्डियों के रुप में हर्ुइ । यही सम्मिलित रुप से वैष्णवी कहलायी । गुफा के अन्दर की शोभा अविस्मरणीय है । यह क्षण अनुभव का है जिन्हें दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है वही जान पाता है । गुफा के अन्दर माता के दर्शन के पश्चात् प्रसाद लेकर भक्तालुओं को भैरवनाथ दर्शन करने जाना होता है जो कि वहाँ से डेढÞ किलोमीटर की सीधी चढर्Þाई है । प्रचलित कथा अनुसार माता के हाथों भैरवनाथ नामक दुष्ट का सिर काट दिया गया जो इस स्थान पर गिरा वही उसकी मन्दिर है । भैरवनाथ के गिडÞगिडÞाने पर माता ने उसे आश्वासन दिया कि जो भी भक्त मेरा दर्शन करने आयेगें वे जब तक तुम्हारा दर्शन नही करेंगे मेरा आशर्ीवाद उन्हें फलदायी नही होगा । यही कारण है कि माता वैष्णों के दर्शन करने के पश्चात् भक्तगण भैरवनाथ का दर्शन हेतु पहुँचते हैं तभी माता वैष्णों देवी के दर्शन यात्रा पर्ूण्ा होती है ।
vaishno devi

खतरनाक रोग:: सिंदीप तिवारी

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और इसके आका भारत से कितने मोर्चों पर एक साथ युद्ध कर सकते हैं इस बात की गंभीरता का अंदाजा उन्हें हो या नहीं हो लेकिन भारत को इसका अंदाजा अवश्य हो जाना चाहिए । भारत को जिन मोर्चों पर पाकिस्तानी हमलों का सामना करना पडÞ रहा है वे थोडÞे बहुत नहीं है बल्कि इनके अधिक है कि इन्हें रोकने में सरकार और इसकी सभी एजेंसियाँ भी असहाय नजर आती हैं ।note group
इतना ही नहीं, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की करतूतों से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर असम तक आम भारतवासी प्रभावित है, वह केवल सीधा या छद्म हमला नहीं वरन ऐसी लडर्Þाई है जिनमें से कुछ ने तो आम भारतवासियों की जान ही सांसत में डाल रखी है । देश में जाली नोटों का प्रचलन एक ऐसी ही लडर्Þाई है जिससे हरेक भारतवासी को दो-चार होना पडÞ रहा है ।
इसलिए अगर आम नागरिक के सामने सौ, पाँच सौ या एक हजार रुपए मूल्य का नोट सामने आ जाता है तो उसके माथे पर पसीने के बूँदें नजर आने लग जाती है । उसकी समझ में नहीं आता कि उसके पास जो नोट है, वह असली है भी या नही । स्थिति यहाँ तक पहुँच गई हे कि अब एटीएम और बैंकों से भी जाली नोट निकल रहे हैं ।
देश में जाली नोटों का प्रचलन इतना अधिक हो गया है कि अधिकारी भी मानने लगे हैं कि रिजर्व बैंक, भारत के गृह मन्त्रालय और खुफिया एजेंसियों की सक्रियता के बावजूद देश में करीब एक लाख टढ हजार करोडÞ की जाली मुद्रा प्रचलन में हैं हालाँकि रिजर्व बैंक ऐसा नही मानता है । फिर भी समस्या का चिंताजनक पहलू यह है कि यह लगातार बढÞती जा रही है । जाली मुद्रा पर गठित नाईक समिति का कहना है कि देश में बडÞी मात्रा में जाली मुद्रा हैं और हम केवल करीब टघ करोडÞ की जाली मुद्रा ही पकडÞ पाते हैं । आम लोगों की हात यह है कि जब वे बैंक कर्मियों, दुकानदारों, व्यापारियों तथा पेट्रोल पम्प पर खडÞे होते हैं तो उन्हें डर सताता रहता है कि कहं िउनके नोट जाली न निकलें । इस डर के मारे लेन-देन में भी परेशानी होने लगी है ।
जाली नोट भी कितने असली दिख सकते हैं इस बात का अंदाजा इसी जानकारी से लगाया जा सकता है कि कुछ महीनें पहले महाराष्ट्र क्राइम ब्रांच और आतंकवाद रोधी दल के जासूसों ने ढ लाख से अधिक के नकली नोट बरामद किए । वे खुद यह तय नहीं कर पाए कि उन नोटों में से कितने असली और कितने नकली है ।
असली और नकली नोटों में ढछ फीसदी तक समानताएँ होती हैं और जो बहुत कम अंतर होते हैं, उन्हें बैंक कर्मी और अधिकारी तक नहीं भाँप पाते हैं । विभिन्न स्तरों पर जाली नोटों की पहचान करने की कोशिश की जाती रही है लेकिन इनका कागज और छपाई इतनी अच्छी होती है कि खुफिया अधिकारियों के लिए भी इनकी पहचान करना दुष्कर काम हो गया है । जाँच एजेंसियाँ मानती हैं कि इन जाली नोटों की छपाई कराची के मलीर छावनी स्थित सिक्यूरिटी प्रेस, क्वेटा के सरकारी प्रिंटिंग प्रेस और अन्य स्थानों पर होता है । यह भी पता है कि जाली मुद्रा का रैकेट चलाने वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश में बैठकर अपने काम को अंजाम देते हैं । वर्षद्दण्ण्ट में बांग्लादेश में भारतीय करंसी मिटिंग मशीन जब्त की गई थी । अब तो सीबीआई भी मानने लगी है कि भारत में करंसी नोट छापने के जो गोपनीय टेम्पलेट इस्तेमाल किए जाते हैं उनकी नकलें भारत के जरिये पाक या बांग्लादेश पहुँच गई हैं । सीबीआई के निदेशक अश्विनी कुमार का कहना है कि वर्षद्दण्ण्छ में नोटों की छपाई के लिए प्रयुक्त टेम्पलेट दुश्मन देशों में पहुँच चुका है और इस बात की संभावना से इनकार नही किया जा सकता है कि हम आज भी उसी टेम्पलेट से नोट छापे जा रहे हैं । यह कहना गलत न होगा कि नोटों के उत्पादन में जो स्याही, कागज और अनिवार्य वस्तुएँ लगती हैं, उनकी नकल या हूबहू काँपी उनके पास मौजूद है । नोट छापने का कागज और स्याही भारत विदेशों से मँगाता है और आईएसआई के आका भी इन चीजों का उन्हीं बिक्रेताओं से खरीदते होंगे ।
आरबीआई, आईबी, डीआरआईर्,र् इडी, सीबीआई, कस्टम्स और अर्धसैनिक बलों के बडÞे अधिकारियों ने ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के सामने यह मामला उठाया है । पर इसके साथ ही चिंता की बात यह भी है कि नोटों की छपाई से संबंधित जो सुरक्षा उपाय किए जाते हैं जैसे नोटों का सिरीज कोड, वह भी जाली नोट छापने वालों तक पहुँच जाता है । इसमें संदेह होता हे कि जाली नोट छापने वालों के एजेंट बैंकों के भीतर तक पहुँच गए हैं ।
सीबीआई नकली नोटों का नेशनल डाटा बैंक भी बना रही है ताकि इससे कुछ मदद मिल सके कि नकली नोटों का स्रोत कहाँ है और इन्हें किन क्षेत्रों में प्रसारित किया जाता है । देश में सबसे ज्यादा छण्ण् रुपए मूल्य के नोट नकली पाए गए हैं और इसे देखते हुए सरकार ने इन्हें छापने में लगने वाले विशेष कागज का देश में भी उत्पादन करने का फैसला किया है । मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में स्थित सिक्यूरिटी पेपर मिल को इस तरह का कागज उत्पादित करने की मंजूरी मिल चुकी है ।
समस्या केवल पाँच सौ और एक हजार मूल्य के नोटों की ही नहीं है । द्दण्ण्ट से पर््रवर्तन एजेंसियों ने पाँच सौ के नोटों की तुलना में सौ रुपए मूल्य के जाली नोट ज्यादा पकडÞे हैं । राज्यसभा में प्रश्नोत्तर के दौरान जानकारी दी गई थी कि देश में घज्ञ मई, द्दण्ण्ढ तक पाँच सौ और हजार रुपए मूल्य के इतने नोट पकडÞे गए कि जिनकी कीमत क्रमशः छ।ठट लाख और ज्ञ।ण्ढ लाख रुपए है । इसका एक अर्थ यह भी है कि इनकी तुलना में सौ रुपए मूल्य के कितने नकली नोट चल रहे हैं इसका पता ही नहीं है । आम तौर पर पाँच सौ और हजार के नोटों पर लोगों का ध्यान जाता है जबकि सौ रुपए को लेकर ज्यादा जाँच परख नहीं की जाती है । सरकार ने भी राज्यसभा में माना था कि द्दण्ण्ट से लेकर ण्ढ तक ठ।घद्ध लाख रुपए मूल्य से अधिक के सौ रुपए के नकली नोट कपडÞे गए हैं । वही पर््रवर्तन एजेंसियों का कहना है कि बैंकिंग चैनलों के जरिये वर्षद्दण्ण्ठ, ण्ड और ण्ढ में क्रमशः ज्ञण्।छद्ध करोडÞ, द्दज्ञ।द्धछ करोडÞ और द्ध।ण्ढ करोडÞ की जाली मुद्रा पकडÞी जा चुकी है । एजेंसियों ने इस मामलों में बडÞी संख्या में लोगों को पकडÞा लेकिन ये सभी नोटों को फैलाने वाले एजेंट ही साबित हुए । इनमें से कोई भी ऐसा नही था जो कि जाली नोटों के इस नेर्टवर्क के बारे में गोपनीय जानकारी दे सके ।
हालाँकि खुफिया अधिकारियों का मानना है कि जाली भारतीय मुद्रा का आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने में भी इस्तेमाल होता है । अभी तक जो जाँच से सामने आया है उसके अनुसार नेपाल में आरिफ बटकी नामक एक आईर्एर्सइ एजेंट है जो कि रक्सौल की सीमा के जरिए बिहार और उप्र में जाली नोटों की सप्लाई कराता है ।
बटकी सीधे आईएसआई के सर्म्पर्क में है और बिहार में पकडÞे गए उसके कुछ एजेंटों का कहना है कि बटकी पचास फीसदी कमीशन पर नकली नोट नेपाल में आईएसआई से हासिल करता है और चालीस फीसदी कमीशन पर अपने नेर्टवर्क से जुडÞे लोगों को बेच देता है । जाँच में यह बात भी सामने आई है कि आम लोगों के लिए कमीशन की दर बीस फीसदी तक हो सकती है । कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के एक बैंक में जाली नोट पाए गए थे जिससे यह बात भी साबित हर्ुइ थी कि इस तरह से जाली नोटों को फैलाने में एक बैंक कर्मी का भी हाथ था जो कि खुद कमीशन के लालच में यह काम करता था । देश में मुख्य रुप से तीन मार्गों से जाली नोटों और ड्रग्स्ा की तस्करी की जाती है । राजस्थान और पंजाब की सीमा से, बंगाल में बांग्लादेश की सीमा से और उप्र और बिहार में नेपाल की सीमा से इनकी तस्करी की जाती है । इस हमारी सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि हाल ही में बाघा सीमा से पाकिस्तान से एक गुड्स वैगन भारत आ गया था जिसमें से डायरेक्ट्रेट आँफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस के लोगों ने आठ करोडÞ की हेरोइन बरामद की थी ।
राजस्थान से तस्कर सीमा पार कर पास्कितान चले जाते हैं और वहाँ से करोडÞों रुपए की हेरोइन लेकर भारत आ जाते हैं । बाद में इन्हें पकडÞा भी जाता है लेकिन ज्यादातर मौकों पर ये सुरक्षा बलों, अर्धसैनिक बलों या अन्य अधिकारियों की मिलीभगत से सीमा पार कर जाते हैं । इसी तरह से जाली नोट भी देश में प्रवेश कर जाते हैं । जाली नोटों को चलाने में स्थानीय लोग भी लालच में शामिल होते हें उन्हें भी नोटों के चलाने पर कमीशन मिलता है । साथ ही इन लोगों को घर बैठे ही नकली नोटों की खेप मिलती है सो पकडÞे जाने का भी डर नहीं ।

संविधान की अवमानना::अरुण ठकुरी

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

arun thakuriनेपाली भाषा में पुनः शपथ ग्रहण करने संबंधी नेपाल सरकार -मंत्रिपरिषद) के आग्रह को अस्वीकार करते हुए नेपाल के प्रथम निर्वाचित उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने पुनः नेपाली में शपथ लेने से इंकार कर दिया है । उपराष्ट्रपति सम्बद्ध सूत्रों के अनुसार वे न तो नेपाली भाषा में शपथ लेंगे और न ही वे उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देंगे ।
विकसित हो रही परिस्थिति एवं प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के बयानों से लग रहा है कि नेपाली में शपथ न लेने की अवस्था में उपराष्ट्रपति झा को उनके पदीय दायित्व के साथ-साथ उपराष्ट्रपति रुप में प्राप्त होने वाली सुविधाओं से वंचित कर दिया गया है । यद्यपि अन्तरिम संविधान वर्तमान विवाद के बारे में मौन है तथा संविधान द्दण्टघ के अनुसार राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति को पदमुक्त करने का एक मात्र उपाय संसद से महाभियोग प्रस्ताव स्वीकृत होना ही है । अन्तरिम संविधान के अनुसार निर्वाचित उपराष्ट्रपति को पद से मुक्त किए बिना किस आधार पर उनके कर्तव्य, अधिकार एवं राज्य से प्राप्त होने वाली सुविधाओं से वंचित करना यह एक जटिल संवैधानिक प्रश्न के रुप में सामने आया है ।
दशकों से नेपाल के तर्राई क्षेत्र में हिन्दी भाषा को मान्यता देने की आवाज उठती रही है । प्रथम जन निर्वाचित प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोईराला ने अपने कार्यकाल में हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता दिलवाने का जबरजस्त प्रयास किया था । नेपाली जनता के रुप में नेपाल के पहले प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोईराला ने भी नेपाल में हिन्दी भाषा की आवश्यकता के बारे में सकारात्मक विचार व्यक्त किए थे । वास्तव में हिन्दी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप मंे मान्यता दिलवाने के पक्ष में हुए प्रयास के बावजूद भाषा की आवश्यकता के नाम पर की जाने वाली सत्ता राजनीति ने हिन्दी भाषा की आवश्यकता की आवाज को कमजोर कर दिया है ।
र् दर्जनों जटिल संवैधानिक विवादों में फंसी वर्तमान नेपाली राजनीति में उपराष्ट्रपति के शपथ प्रकरण के कारण समस्या में वृद्धि करने का काम किया है । सर्वोच्च अदालत के पर्ूव न्यायाधीश रहे उपराष्ट्रपति ने अपनी पदीय गरिमा का खयाल न करते हुए खुद को उपराष्ट्रपति होने के साथ-साथ मधेशी के रुप में प्रस्तुत किया है जो बात उनके बयानों से साफ-साफ महसूस की जा सकती है । निश्चय ही दूसरे जनआन्दोलन और मधेश आन्दोलन के बाद सम्पर्ूण्ा तर्राई मधेश में हिन्दी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता देने की आवाज बुलंदी को छूने लगी । नेपाल के संविधान सभा चुनाव मे विजयी प्रतिनिधियों द्वारा हिन्दी और मातृभाषा में शपथ लेने की घटनाएँ देखी सुनी गयी । शायद मधेशी जनता की भावनाओं को आत्मसात करके उपराष्ट्रपति झा ने राष्ट्रपति द्वारा पढÞे गए नेपाली भाषा के शपथ को हिन्दी भाषा में अनुवाद करके शपथ ग्रहण किया । यदि मधेशी जनता की भावना के चश्मे से उपराष्ट्रपति के शपथ प्रकरण को देखा जाए तो निश्चय ही यह सही था, लेकिन किसी भी राष्ट्र का संविधान सबसे बडÞा कानून है और उस राष्ट्र की जनता द्वारा संविधान एवं प्रचलित कानून मानना यदि राज्य की कानूनी व्यवस्था का आधार माना जाता है तो उपराष्ट्रपति द्वारा मधेशी जनता की भावना के नाम पर नेपाल के संविधान का घोर उल्लंघन किया है ।
उपराष्ट्रपति के असंवैधानिक कदम के पक्ष में मधेशवादी राजनीतिक दल भाषिक अधिकार के नाम पर आन्दोलन की तैयारी कर रहे है । जबकि हिन्दी भाषा को वैकल्पिक राष्ट्रभाषा की मान्यता देने की आवाज, संसद संविधान सभा में हिन्दी में भाषण करने के अलावा लगभग द्दण्ण् की संख्या में वर्तमान संविधान सभा व्यवस्थापिका में अपनी जीविका निर्वाह कर रहे मधेशी प्रतिनिधियों द्वारा आजतक हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता दिलवाने के संवैधानिक अभ्यास अर्थात् निर्धारित प्रक्रिया के लिए कोई भी प्रस्ताव संसद में प्रस्तुत नहीं किया है ।
र् वर्तमान सत्ता गठबंधन में शामिल बाईस राजनीतिक दलों जिसमें मधेशी जनअधिकार फोरम के अलावा बाकी सभी मधेशवादी दल शामिल है और सबसे बडÞी बात वर्तमान सरकार में शामिल मजफो -लोकतांत्रिक), तमलोपा, सदभावना पार्टर्ीीे उपस्थिति के बावजूद मन्त्री परिषद से उपराष्ट्रपति को नेपाली में पुनः शपथ लेने का आग्रह संबंधी निर्ण्र्ााबिना अवरोध कैसे र्सवसम्मत पारित हो गया – जिन-जिन दलों के नेता मंत्रीपरिषद के उक्त निर्ण्र्ाामें शामिल थे वे दल आज मधेशी जनता के सामने हिन्दी भाषा का मान्यता दिलवाने का भाषण कर रहे हैं । ऐसे दोहरे चरित्र के नेता कैसे मधेशी जनता के अधिकारों की रक्षा कर पाएंगे यह वर्तमान राजनीतिक कालखंड का सबसे बडÞा यक्ष प्रश्न है । मधेशी जनता इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना नहीं चाहेगी -

माधव नेपाल की भारत यात्रा::डाँ. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

nain mishra
प्रधानमंत्री नेपाल की भारत यात्रा को दो दृष्टिकोणों के तहत आंका जा रहा है । अपनी भारत यात्रा की समाप्ति के बाद त्रिभुवन विमान स्थल पर पत्रकारों से बातचीत में प्रधानमंत्री नेपाल ने अपनी यात्रा को पर्ूण्ा सफल बताया, जबकि प्रचण्ड प्रधानमंत्री की इस यात्रा को पर्ूण्ातः विफल मान रहे हैं । वास्तविकता यह है कि इस यात्रा को हम अर्ध सफल मान सकते हैं । व्यापार संधि पर दोनों देशों के द्वारा किए गए प्रारंभिक हस्ताक्षर, भारत द्वारा नेपाल को दिए गए दो हजार करोडÞ रुपए की आर्थिक सहायता को इस भ्रमण का सकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है जबकि प्रधानमंत्री का भारत में गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं होना, इनकी भ्रमण टोली में परराष्ट्र मंत्री सुजाता कोइराला का शामिल नहीं होना, इस भ्रमण का नकारात्मक पक्ष है ।madhav
इस यात्रा के दौरान भारत ने नेपाली भूमि में तीसरे देशों की बढÞती हर्ुइ अवांछित गतिविधियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उस पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए नेपाल से अनुरोध किया । प्रतिउत्तर में प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने अपनी भूमि का दुरुपयोग किसी भी देश के विरुद्ध नहीं होने देने का आश्वासन दिलाया । द्विपक्षीय वार्ता में भारतीय पक्ष ने नेपाली भूमि द्वारा भारत में आतंकवादी घुसपैठ बढÞने, तर्राई के मदरसाओं में भारत विरोधी अवांछित गतिविधियाँ होने तथा नेपाल के रास्ते नकली भारतीय रुपयों की तस्करी होने की बात पर चिन्ता व्यक्त की । भारत का मानना है कि इन गतिविधियों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है । प्रत्युत्तर में प्रधानमंत्री नेपाल का कहना था कि नेपाल में इस प्रकार की आईएसआई की गतिविधियों के विषय में हमें कोई जानकारी नहीं है लेकिन उन्होंने आश्वस्त किया कि नेपाली भूमि का दुरुपयोग किसी भी आतंकवादी गतिविधि के लिए नहीं करने दिया जाएगा । इस बार की बातचीत मुख्यतः नेपाल में पाकिस्तानी और चीनी गतिविधि, सेना समायोजन, माओवादी, मधेश आदि विषयों पर केन्द्रित था ।
नेपाल में चीन की रुचि बढÞने के सर्ंदर्भ में भारतीय पत्रकारों द्वारा पुछे गए प्रश्नों के जबाव में प्रधानमंत्री नेपाल का कहना था कि मुझे नहीं लगता कि चीन नेपाली राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है । चीन और भारत दोनों ही नेपाल के मित्रराष्ट्र हैं तथा नेपाल दोनों ही से आर्थिक सहायता का आकांक्षी है । प्रधानमंत्री नेपाल का कहना था कि नई दिल्ली की यह मान्यता है कि पिछली माओवादी सरकार ने भारत के विरुद्ध चीनी कार्ड का इस्तेमाल किया लेकिन वर्तमान सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है । हम भारत की सुरक्षा व्यवस्था के प्रति सचेत हैं । तथा भारत भी हमारी संवेदनशील्ता को समझेगा, ऐसा मुझे विश्वास है ।
प्रधानमंत्री नेपाल ने भारत के समक्ष मधेश में क्रियाशील सशस्त्र समूहों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए भी भारत से सहयोग की अपेक्षा की । उनका कहना था कि राजनीतिक आवरण में आपराधिक कार्य करने वालों पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक है । सीमा अपराध नियंत्रण तथा सुरक्षा निकायों के सुदृढÞीकरण के लिए भी प्रधानमंत्री नेपाल ने भारत से सहयोग मांगा है । इस पर भारत द्वारा पुलिस के भौतिक पर्ूवाधार तथा अन्य आवश्यकताओं की पर्ूर्ति का आश्वासन दिया गया । नेपाल में संक्रमणकालीन अवस्था से उभरने के लिए राजनीतिक स्थिरता तथा उच्च नेतृत्व बीच की आम सहमति पर भी भारतीय पक्ष द्वारा बल दिया गया । तीन दिनों के लम्बे विचार विमर्श के पश्चात् ज्ञढढट के नेपाल-भारत व्यापार संधि के संशोधित स्वरुप पर दोनों देशों द्वारा प्रारंभिक हस्ताक्षर सम्पन्न हो पाया ।
भारत में नेपाली प्रधानमंत्री के स्वागत में जो एक उदासीनता देखने को मिली, उसका एक प्रमुख कारण नेपाल में कुछ दलों द्वारा भारत विरोधी वक्तव्य है जो समय-समय पर आते रहता है और इन वक्तव्यों में भारत को विस्तारवादी और साम्राज्यवादी तक की संज्ञा दी गई । हालाँकि नेपाल में भारत विरोधी भावना अपने विशेष स्वार्थ पर्ूर्ति के लिए किसी विशेष गुट द्वारा ही उठाया जाता रहा है । नेपाल में पाकिस्तान या बांग्लादेश की तरह राष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी भावना कभी भी नहीं पनपी है । दूसरा महत्वपर्ूण्ा मुद्दा है नेपाली राजनीति में भारतीय हस्तक्षेप की । यह मुद्दा भी कभी किसी राष्ट्रीय मसले को लेकर नहीं उठा है, बल्कि जब किसी विशेष दल के पक्ष में भारत सहायता प्रदान नहीं करता है तो वह दल विशेष भारत विरोधी बयान देना शुरु करता है । उदाहरण के लिए जब प्रचण्ड सरकार पर संकट उत्पन्न हुआ था, उस समय उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि उन्होंने भारतीय राजदूत से आग्रह किया था कि वे सुलह सफाई के लिए किसी भारतीय राजनीतिज्ञ को यहाँ बुला दें । भारत में चुनाव की व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं है, ऐसा भारतीय पक्ष का कहना था । इसके बाद से ही भारत को इंगित करके कहा जाने लगा कि हमारी सरकार गिराने या फिर माधव नेपाल की सरकार बनाने में प्रभु का हाथ है ।
इतिहास, भूगोल, धर्म और संस्कृति की दृष्टियों से इतने घनिष्ठ होते हुए भी नेपाल और भारत के संबंध बकौल डाँ. एस.के. झा के बेचैन साझीदारों -अनइजी पार्टनरस) की तरह रहे हैं । इस संबंध में न तो निर्बाध रुप से सौहार्द सहयोग की सरिता बही है और न दोनों पडÞोसियों के बीच तनाव इस सीमा तक पहुँचा है कि कूटनीतिक संबंध विच्छेद की नौबत आई हो । हाँ, इस संबंधों में उतार-चढÞाव अवश्य आये हैं, जो कई प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक, कूटनीतिक कारणों से आए हैं । इन कारणों का फिर दोनों देशों की आन्तरिक राजनीति, राजनीतिक गतिविधि, क्षेत्रीय स्तर पर राष्ट्रों के समीकरण, अन्तर्रर्ाा्रीय राजनीति के नित्य बदलते समीकरण-घटनाओं से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध रहा है ।

मल्लिका बोल रही हिस्स…

Posted by admin On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

malikaमल्लिका बोल रही हिस्स.mallika-sherawat

अर्डर अर्डर नो हिन्दी::योगेन्द्र प्रसाद साह

Posted by admin On September - 14 - 2009 2 COMMENTS

yogendra Prasad shah2066-04-09 साल में सर्वोच्च अदालत ने एक धमाकेदार फैसला सुना दिया – जिसके चलते सुलझती शांति और नया संविधान निर्माण प्रक्रिया की तेजी में नये सिरे से दर्ुर्दिन के काले बादलों का अन्देशा पैदा होने लगा है । लोकहित में सत्य भडÞकाऊ खबरों को कायदे से ही संचार मीडिया छापता है । प्रधान न्यायाधीश मीन बहादुर रायमाझी के इजलास ने, उपराष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी भाषा में शपथ लेने को, राजा महेन्द्र शैली में अवैध घोषित करते हुए पुनः खस नेपाली भाषा में शपथ लेने का आदेश जारी कर दिया है ।
अन्तरिम संविधान काम चलाऊ है । नया संविधान बनने का सिलसिला तीव्र गति में जनप्रतिनिधियों द्वारा जारी है । इसीलिए अन्तरिम संविधान की व्याख्या करके राजनीतिक मुद्दों जिसे सुलझाने के लिये कसरत चल रहा हैं – उस पर पानी फेरना इन्साफ का तकाजा नहीं माना जा सकता है । न्यायालय का मूल उद्देश्य इन्साफ देना होता है । राजनीति करना या दुराचारी शासकों की सन्तुष्टि का आधार बनाना नहीं होता है । पाकिस्तानी पर्ूव न्यायाधीश इफि्तयार खान चौधरी ने राष्ट्रपति मर्ुशर्रफ के तानाशाही संविधान के खिलाफ फैसला सुनाकर वहाँ लोकतंत्र की स्थापना करवा दी है । न्यायाधीश अगर परिवारवादी, जातिवादी, अवसरवादी और पजेरोवादी बन जाय तब उस देश की दर्ुगति निश्चित है । थाईलैण्ड के राजा भूमिबोल सैनिक कू द्वारा भ्रष्ट प्रधानमंत्री थाक्सीन सिनेवात्रा को पदच्युत करके पुनः चुनाव द्वारा लोकतंत्र की स्थापना करवा चुके हैं । इसके विपरीत राजा महेन्द्र ने स्वार्थवश इन्साफ की परम्परा को तिलांजली देते हुए तस्करी को व्यापार घोषित किया । जनतंत्र को बन्दी बनाया, भूमिसुधार को मधेशियों को उजाडÞने का हथकंडा बनाया । न्याय प्रणाली को दरबार का दास समझा – उसका नतीजा यह निकला कि राजा महेन्द्र के परिवार से नशीली औषधी के कारोबारी निकले, कोई अफीम सेवन करने लगा, कोई राह चलते नागरिक की हत्या करने लगा और अन्त में राजा वीरेन्द्र के वंशनाश के साथ राजतंत्र समाप्त हो गया ।
भारत के रंगा-बिल्ला केस में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था । किन्तु इन्साफकर्ता को अच्छी तरह मालूम था कि हत्यारे वे दोनों ही थे । अतः सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा दे दी । सही इन्साफ उसे कहते हैं जो दोषी आत्मा से स्वीकार कर ले । इसके लिए न्यायाधीशों की आत्मा में निष्पक्ष, चरित्रवान और इन्साफ तक पहुँचने की ललक होनी चाहिए । दर्ुर्नियत वाला इन्साफ देश, समाज और आदर्श को बर्बाद करके मृत्युलोक को नरक में तब्दील कर देता है । अमेरिकी अदालत ने गलत फैसला देकर बुश को राष्ट्रपति बनवा दिया और चुनाव में जीत हासिल करने वाले अलगोर हार गए थे । इसी फैसले के नतीजे में इराक जंग आई, अमेरिकनों की मौत आई और अन्त में भारी मन्दी की मार लगी । साठ की दशक में कुछ अमेरिकन लडÞकियाँ स्लिमलेस ब्लाउज लगाकर सडÞकों पर घूमने लगी । शरीफ औरतों ने इसका पुरजोर विरोध किया । मामला अदालत में गया । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा श्रृंगार प्रसाधनों के विज्ञापन के लिए नंगीर्-अर्धनंगी लडÞकियों की जरुरत थी । बस हो गया फैसला स्लिमलेस के पक्ष में । आज स्थिति यह है कि हर तीन सेकेण्ड में एक बलात्कार की घटना घटती है । द्दछ हजार किशोर, किशोरियों से बलात्कार करके कनाडा में मार कर बर्फमें दफना दिया गया । दुश्चरित्र मां-बाप का जीन बच्चों में जाकर स्कूलों में किशोर बच्चे नरसंहार कर रहे हैं ।
भारत के दो न्यायाधीशों अरिजीत पसायत और मुकंदकम शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था – धाराओं में चिपकने से इन्साफ करने में बाधा हो रही हो तब धाराओं से चिपके रहना इन्साफ को धोखा देना है । समलिंगियों को अधिकार सृजित करने के लिए न संविधान में जगह खोजी गई न कानूनी धाराओं में । न्यायाधिशों ने तत्सम्बन्धी कानून बनाने का निर्देश दे दिया है । किसी के अधिकार को हनन से बचाने के लिए संविधान आडÞे नहीं आना चाहिए । उपराष्ट्रपति के हिन्दी शपथ प्रकरण में सर्वोच्च अदालत ने अगर संविधान संशोधन करके ज्ञट वें स्थान वाला मातृभाषा हिन्दी को प्रतिस्थापित करने का निर्देश दे दिया होता तब एक झटके में भर्ूइंफूटा वर्ग -शासकों) में दहशत फैल जाती और नया लोकतांत्रिक संविधान शीघ्र ही सही आकार ग्रहण कर लेता । यही मौका था जातिवादी, परिवारवादी और पजेरोवादी कुसंस्कार छुडÞवाने का । न्यायालय चाहे जितनी हिन्दी की उपेक्षा कर ले अंग्रेजी और हिन्दी विश्व भाषा बनी रहेगी । कार्यकारिणी की तर्ज पर नेपाली खस भाषा में उपराष्ट्रपति को सात दिनों के भीतर शपथ ग्रहण का अल्टीमेटम जैसा अदालत ने फैसला सुनाया है । वह सामाजिक सद्भाव में दरार पैदा कर सकता है । इस बात को सभी जानते है कि प्रथम फैसले से उत्पन्न द्वन्द्व की स्थिति टालने के लिए प्रधानमंत्री माधव नेपाल काफी सक्रिय थे । किन्तु न्यायाधीशों को उनका पहल रास नही आया । वे लोग जबरदस्ती पर उतर आए । इस दर्ुर्नियत वाले फैसले से लोकतंत्र का बहुत नुकसान हुआ है । प्रथम फैसले के बाद ही अपनी तीखी प्रतिक्रिया में उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने इसे दर्ुर्नियतपर्ूण्ा, दुराशययुक्त और पर्ूवाग्रही कहा है । इसी भाषा को तमलोपा, सद्भावना ओर दोनो फोरम पार्टियों ने दुहराया है । यह स्थिति की गंभीरता को उजागर करता है । उपराष्ट्रपति परमानन्द झा अगर नेपाली भाषा में शपथ लेंगे तब ही यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है । शपथ बहिष्कार के बाद सजा के भागीदार अगर वे बनाए जायेंगे तब मधेशी व्रि्रोह खुलकर सामने आ जायेगा ।
अन्तरिम संविधान का पालन क्या सिर्फमधेशी और जनजातियों को ही करना चाहिए – अब तक संविधान का आठ बार उल्लंघन हो चुका है । इन उल्लघंनों के लिए सर्वोच्च मौन क्यों है – नमूना जरा देखें । पहलीबार जेठ द्दण्टद्ध साल में संविधान सभा का चुनाव सम्पन्न करना था – नहीं हुआ । फिर अगहन द्दण्टद्ध साल में तय तिथि पर चुनाव न होकर चैत्र द्दड गते द्दण्टद्ध साल में दूसरा संविधान संशोधन द्वारा संविधान सभा का चुनाव हुआ था । दुसरा समावेशीकरण का मजाक उडÞाते हुए द्दट मनोनित सभासदों का तीन बडÞे दलों की राय से सात दलों और माओावदी ने भागबंडा कर लिया । वंचित समुदायों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो गया ।
तीसरा सभी तरह की नियुक्तियों में अंतरिम संविधान के खिलाफ निर्ण्र्ााहोता रहा है । और चौथा उपराष्ट्रपति परमानन्द झा, विजय गच्छदार, उपेन्द्र यादव, महंथ ठाकुर, राजेन्द्र महतो और हृदयेश त्रिपाठी सहित सभी मधेशी सभासदों ने हिन्दी में शपथ लिया है । पाँचवा पर्ूव प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने संविधान द्वारा निर्धारित शपथ पत्र अनुसार शपथ न लेकर जनता के नाम पर शपथ लिया था । और छठा प्रधानमंत्री माधव नेपाल ने प्रधानमंत्री के रुप मेर्ंर् इश्वर और अन्य नाम पर चुपी साधते हुए शपथ लिया था । सातवां पर्ूव प्रधानमंत्री बिना संवैधानिक हैसियत के प्रधान सेनापति रुक्मांगत कटवाल को अपने नौकर की तरह बर्खास्त कर दिया था और राष्ट्रपति ने गैर संवैधानिक तरीके से प्रधान सेनापति की पर्ुनबहाली कर दी ।
क्या अन्तरिम संविधान के धाराओं के पालन की जिम्मेवारी सिर्फमधेशवादी दलों की ही है – गिरिजा प्रसाद कोईराला ने अपने उपर लगे भ्रष्टाचार मुद्दे में सर्वोच्च अदालत के आदेश के अनुसार उपस्थित होकर बयान देने से इन्कार कर दिया था । इस पर उन पर अदालत की अवमानना का मुद्दा चल गया । किन्तु ज्यों ही गिरिजा प्रसाद प्रधानमत्री की कर्ुर्सर्ीीर बैठे सारे मुद्दे कब गायब हो गये – जनता को आज तक पता नही है । द्दण्छद्द साल भाद्र ज्ञद्द गते तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश विश्वनाथ उपाध्याय ने संविधान का अपव्याख्या करके एमाले के प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी की सरकार को गिरवा दी थी । सात वर्षों के अपने काठमांडू प्रवास के बाद लौटे समाजसेवी विद्वान जाँन फादर ने मनमोहन जी की सरकार गिरने के बाद कहा था – अगर उनकी सरकार टिक गई होती तब नेपाल प्रगति की राह पकडÞ लेता । यानि जानबूझकर संवैधानिक ट्रैक से बाहर जाकर भी खस ब्राहृमणवादी सोच, इस देश से नियोजित रुप में गरीबी नहीं हटने दे रही है । आदिवासियों के हक हित सम्बन्धी मुद्दों में सर्वोच्च अदालत ने राजनीतिक तौर पर सुलझाने का फैसला दिया था । क्या हिन्दी राजनैतिक मुद्दा नहीं है – क्या खस ब्राहृमण भगोडÞे भारतीय नहीं है – तब उनकी भाषा नेपाली कैसे हो गई – असल में र्राई, गुरुंग, कच्छारी, राउटे, शर्ेपा, लिम्बु भाषा इत्यादि ही नेपाली भाषा है । हिन्दी तर्राई की शुद्ध नेपाली भाषा है । क्या लोकगीत रचयिता कवि विद्यापति नेपाली थे – जिनके नाम पर ज्ञ करोडÞ रुपये की राशि बजट में दिया गया है – मैथिली, भोजपुरी और अवधी भी भारत में नहीं बोली जाती है -
शांति सेना में खटने वाले जवानों के वेतन और सुविधा का हिसाब सर्वोच्च अदालत मांगते रह गया – किन्तु मिला नहीं । तब सर्वोच्च अदालत की अवमानना नहीं हर्ुइ थी – विदेशों से डाँलर में प्राप्त अनुदान, कर्ज और सहयोग राशियों को जाँचने का अधिकार महा लेखापाल को नहीं दिया गया है । पहाडÞी उच्चवर्ग इस राशि को हडÞप लेता है और कर्ज चढÞता है मधेशियों, जनजातियों और दलितों पर । इस पर सर्वोच्च अदालत मौन क्यों है – संसार जानता है कि नेपाल भ्रष्ट देशों में ख्याति प्राप्त देश है । ट्रान्सपरेंसी इन्टरनेशनल ने अपनी सूची में इस देश को ज्ञद्धद्द वें स्थान पर रखा है । किन्तु एक भी प्रधानमंत्री, मंत्री, सिंह दरबार के सचिव, वरिष्ठ कर्मचारी नेता दंडित नहीं हो सका है । सर्वोच्च अदालत ही बताए कि इस देश में भ्रष्टाचारी कौन है – ठद्दण् पक्की पुल द्दण् वर्षों मी जर्ीण्ा अवस्था में पहुँच चुके हैं – इनका जिम्मेवार कौन है – जब कि पुरानी प्रविधि से बना बैरगनियाँ-ढेंग -भारत) बीच का रेल पुल ज्ञण्ण् वर्षों से आज भी कायम है । इस पर सरपट रेलगाडÞी दौड रही है । अभी कुछ दिनों पहले ही केन्द्रीय बार एशोसिएसन ने न्यायाधिशों पर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया था । इस पर बार के केन्द्रीय अध्यक्ष पर मानहानी का मुद्दा भी सर्वोच्च अदालत में दायर हुआ था । जब वकील अडÞ गये तब एक समझौता के तहत मामले को रफादफा न्यायाधीशों ने कर दिया था । कई राजनीतिक मुद्दें अदालत में काफी दिनों से विचाराधीन है – जैसे प्रधान सेनापति बर्खास्तगी प्रकरण । किन्तु जल्दीबाजी में हिन्दी प्रकरण ही क्यों सूझा -
हिन्दी भाषा वाला फैसला देशहित में नही है । इस फैसला से देश में अशान्ति फैलने का खतरा उपस्थित हो गया है । जरुरत है संविधान संशोधन करके हिन्दी को राष्ट्रभाषा में स्वीकार कर लेने की । नेपाली भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में ज्ञद्द वें स्थान पर है । भारतीय नेपाली जनजातियों में र्राई, गुरुंग, लिम्बु, लेप्चा, शर्ेपा इत्यादि मातृभाषाएं बोली जाती है । किन्तु विदेशी भाषा नेपाली को इन लोगों ने सर्म्पर्क भाषा के लिए चुन लिया है । नेपाल से हमेशा ही खस नेपाली भाषा के विद्वान भारत के दार्जिलिंग में जाकर बहुत पहले से सहयोग करते रहे हैं । इसी सिलसिले में ज्ञढद्दर्द्धर् इ. में दार्जिलिंग जाकर धरणीधर कोइराला ने एक कविता पढÞी थी – तर आफ्नो भाषा न पाई अक्क बक्क पर्छन् । चार दिन में जान्ने कुरा वर्षदिन मा सिक्छन् । -आभाष कांतिपुर द्दछ अगस्त ण्ढ) क्या यही सिद्धान्त हिन्दी पर लागू नहीं होता है – हिन्दी भाषी -तर्राई में बसने वाले) विद्वान कभी नेपाली भाषा का पुरस्कार प्राप्त करने में सफल रहे
है – नेपाली उच्च वर्ग से एक लेखक की उक्ति देखिए – खास गरी दार्जिलिंग, सिक्किम, भूटान अझ भनौं सम्पर्ूण्ा उत्तर पर्ूर्वी भारतमा रहेका विभिन्न जात र थरका नेपालीले किन नेपाली भाषा नै अपनाएका होलान् – -आभास कांतिपुर द्दछ अगस्त ण्ढ) ।
इसी तज पर मैथिली, अवधि और भोजपुरी भाषी जमात सर्म्पर्क भाषा के रुप में हिन्दी बोलता है तब अपराध कैसे हो गया – आर्श्चर्य तो यह है कि यही लेखक हिन्दी सर्म्पर्क भाषा के खिलाफ जहर उगलने से नहीं चूकते । राष्ट्रीय पोशाक और नेपाली भाषा में शपथ लेकर भी राष्ट्र के साथ राष्ट्रघात करने वालों की सूची कम नहीं है । यह देश की जनता से छिपी बात नहीं है । दबाब में राष्ट्र के हित के लिये शपथ खाने वाले का आचरण कैसा होगा – असल में हिन्दी भाषा का प्रश्न उलझाना मधेशियों के शोषण करने का हथकण्डा मात्र है । भाषा सम्बन्धी प्रश्न सर्वोच्च अदालत द्वारा संविधान सभा में सौंपा जाना चाहिए था । इस देश में रंगे हाथों पकडÞे गए नशीली औषधि के तस्करों की रिहाई हो जाती है । नाम में र्फक पडÞ जाने से जघन्य अपराधी छोडÞ दिए जाते हैं । काग के साथ पकडÞे गए और जेल सजा काट रहे अपराधियों को आम माफी मिलती है । मधेश में भूमि विवाद बढÞाने के लिए न्यायिक सहारा दिया जाता है । किस संविधान के तहत सिर्फपहाडÞी समुदाय को सुकुम्बासी मानकर तर्राई के जंगलों को उजाडÞा जा रहा है – क्या सर्वोच्च अदालत को इसका इन्साफ नहीं करना चाहिए – सुनसरी में टछ हजार निवेदनों में से ठ हजार पहाडÞी सुकुम्बासियों को लालपर्ुजा मिल चुका है । हाथियों को आवाजाही में रुकावटे आ रही है । अब सरकार ने बाली क्षतिपर्ूर्ति के रुप में ज्ञ लाख रुपये बांटने का एलान कर दिया है । यह पुरस्कार पहाडÞी सुकुम्बासियों को जंगल विनाश के लिए दिया जाने वाला है । क्या उन ठ हजार लालपर्ुजा धारियों में कच्छारी, हरिजन, थारु और मधेशी भीखमंगों से एक भी नाम सम्मिलित है -
पाँच न्यायाधीशों द्वारा अल्टीमेटम वाला हिन्दी भाषा में शपथ ग्रहण वाला फैसला मानने से उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने इन्कार कर दिया है । उनका कहना है कि – शपथ ग्रहण की भाषा मेरी होगी । सर्वोच्च अदालत को उपराष्ट्रपति पद से हटाने का संवैधानिक अधिकार नही है । तमलोपा, दोनों फोरम, सद्भावना पार्टर्ीीे साथ ही माओवादी संगठन ने हिन्दी शपथ ग्रहण को जायज माना है । न्याय समिति के माओवादी सभापति प्रभु साह की अगुवाई में द्दड सभासदों ने एक विज्ञप्ति द्वारा उपराष्ट्रपति परमानन्द के कदम का र्समर्थन किया है । भारत से जोडÞकर मधेशियों को दबाने की की कोशिशें हुयी तब दुष्परिणाम चीन, भारत और नेपाल तीनों देशों को भोगने होंगे । देखें प्रधानमंत्री माधव नेपाल परिस्थिति को गंभीरता से समझते हैं कि नहीं ।

गांव है । गांव में मुखिया है

Posted by admin On September - 14 - 2009 ADD COMMENTS

गांव है । गांव में मुखिया है । गांव में दुखिया है । गांव में ओझा है । गुणी है । मंतरिया -भक्ता) है । डायन है । कुल्टा है । गांव में भूत-प्रेत है । गांव में सरपन्च है । गांव में प्रपंच है । गांव में किसान है । मजदूर है, चोर है, सिपाही है । गांव में विरह है । गांव में प्रेम है । गांव में आल्हा है । गांव में लौंडा का नाच है । कोयल की कूक है । कुत्ते की भूंक है । चूडिÞयों की खनक है । पायल की छन-छन है । गोरी की तडÞपन है । पुरबा बयार है । गांव में रस की फुहार है । गांव में पहाडÞी है । गांव में मधेशी है । गांव में सुकुम्बासी है । गांव में कांग्रेस है । गांव में माओवादी है । गांव में खाओवादी है । गांव में एमाले है । गांव में तमलोपा है । गांव में फोरम है । गांव में सदभावना है । गांव में जनतांत्रिक है । गांव में साधु है । गांव में शैतान है । गांव अब गांव नही है । गांव राजनीति का अखाडÞा बन गया है । गांव जल रही है । गांव में निराशा है । गांव में अमेरिका है । गांव में भारत है । गांव में एन.जी.ओ. है । गांव में आई.एन.जी.ओ. है । गांव में नींबूपानी गायब हो गया है । गांव में अब पेप्सी, कोक है । गांव में मल्टीनेशनल है । गांव अब “ग्लोबल विलेज” बन गया है । गांव से ही आशा है । इसलिए हे कामरेड तू ग

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