सृष्टि में केवल मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसे प्रभु ने विवेक, बुद्धि, ज्ञान, विश्लेषणात्मक क्षमता, कल्पना शक्ति जैसे अनेक अतुलनीय गुणों से सम्पन्न करते हुए र्सवश्रेष्ठ प्राणी का सरताज पहनाया है । मानव मात्र पर प्रभु की यह असीम अनुकम्पा है । तर्सथ इस देव दर्ुलभ मानव जन्म की महिमा संतों ने खुलकर गाई है । यथा ‘कबहुँक करी करुना नर देही, देश इस चिनु हेतु सनेही ।’ संत तुलसीदास कहते हैं, अकारण करुणा वरुणालय प्रभु कृपा करके जीव को मानव देह प्रदान करते हैं ।
माता पिता के स्वर्गारोहण पश्चात् बारम्बार एक भावना आती थी – मैं भी बद्री केदार आदि तर्ीथस्थलों में जाकर पितरों को पिण्डदान दूँ, तिलाञ्जलि दूँ । दैव योग से काठमांडू निवास के पर्ूवार्द्ध में ही तर्ीथ यात्रा का सुअवसर प्राप्त हुआ । नौ तर्ीथयात्रियों का समूह तयार हुआ । तर्ीथयात्रा के लिए भी भगवत्कृपा की आवश्यकता होती है । मैं वर्षौं से इसके लिए सपना सँजोए हुए था, परन्तु सपना साकार हुआ यहाँ काठमांडू में आकर । यद्यपि मेरा साठ वर्षों से अधिक का जीवन तर्राई -कलैया-वीरगंज) में यापन हुआ है । भगवदिच्छा का एक प्रत्यक्ष प्रमाण ऐसा भी रहा । हम नौ यात्रियों में दो यात्री ऐन मौके पर नहीं जा सके । उसी दम्पत्ति की सत्प्रेरणा से हम सात लोग तर्ीथयात्री बने थे । सेना के उच्च पदस्थ अधिकारी होने के नाते उन्हें तर्ीथयात्रा में जाने की अनुमति मिलने पर भी, प्रस्थान की घडÞी से ठीक एक दिन पहले कार्यालयीय घटना चक्रव्यूह में वे बुरी तरह फँस गए और हम सात तर्ीथयात्री उनके सत्संग से वञ्चित रह गए । इसी को दैवयोग माना जाता है । र्’इश्वरेच्छा बलीयसी’ कहते हुए हम सात, जिनमें तीन महिला और चार पुरुष थे, वीरगंज-रक्सौल होते हुए पटना पहुँचे । हमारे दल का नेतृत्व कर रहे थे, नेपाल के एक प्राचीन संस्था के आदरणीय वन्धु श्री अग्नि प्रसाद पोखरेल । खाया पीया भव्य व्यक्तित्व, असीम सहनशीलता, प्रबन्धन कुशलता एवं व्यावहारिक चतुर्राई से सम्पन्न सहृदय आध्यात्मिक आस्थावान श्री पोखरेल जी के अगुवाई में हम लोग पुनपुन और गयाजी -दोनो जगह भारत के झारखण्ड प्रदेश में अवस्थित) में पिण्डदान से पितरों को तृप्त करते हुए, पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए तर्ीथयात्रा में आगे बढÞते चले गए ।
हम लोगों के कैप्टेन पोखरेलजी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए गया से हरिद्वार तक के लिए रेलवे रिजर्वेशन -आरक्षण) काठमांडू में ही करा लिए थे । पुनपुन और गयाजी में पितृश्राद्ध करके हम लोगों ने वर्षों की साध पूरी की, मगर वहाँ के पण्डा पुरोहित और अनेक बहानेबाजी करके यात्रियों की जेब हल्की करने वाले सज्जनों की अर्थलोलुपता को देखते हुए लगता था वासमती चावल के साथ कंकडÞ पत्थर भी खा रहे हैं । यहाँ एक और सीख मिली – परम्परागत पण्डों के पास न जाकर हमें स्वतंत्र रुप से गेष्ट हाउस आदि में ठहरना चाहिए । पण्डों के ब्रहृमजाल में फँस भी गए तो खूब मोलतोल -वार्गेनिंग) के सहारे ब्रहृमजाल से मुक्त हो जाना चाहिए । वैसे बेचारे पंडे पुरोहित भी क्या करें । पुश्तैनी पेशा जो ठहरा ! आजीविका के लिए, पापी पेट का सवाल जहाँ पैदा हो जाता हो, आदमी क्रमशः निष्ठुर होता चला जाता है । संस्कृत में कहा गया है ः ‘क्षीणा नराः निष्करुणा भवन्ति ।’ तथापि गयाजी में हम लोगों ने एक पुरोहित को ठेक्का में प्राप्त किया, श्राद्ध तर्पणादि करके कृतकृत्य हुए । पितृलोक मंे विराजमान पितरगण भी अवश्य सुतृप्त हुए होंगे । फिर भी ‘नेपाली पंडा’ के नाम से जो महोदय वहाँ मिले, उनके चेहरे में हमने कभी हँसी नही देखी । ले देकर हम लोगों ने भी अपनी पीठ पंडाजी से थपथपा ली । विष्णुपाद और अक्षय वटका दर्शन र्स्पर्शन स्मरणीय रहा ।
हरिद्वार तक रेल के डिब्बे में आराम से सोते, बतियाते, झपकियाँ लेते और एक मिनट के अन्दर दश फेरीवालों के दर्शन करते यात्रा सम्पन्न हर्ुइ । शरीर कुछ थका-थका सा था मगर उत्साह की ऊष्मा से हम सभी तरोताजा थे । एक वयोवृद्ध सिन्धी या पंजाबी के गेष्ट हाउस में हम लोगों ने डेरा डाल दिया । हर तर्ीथस्थल में शास्त्रीय नियमानुसार हम लोग प्रायः आराम से ठहरते, दो चार रोज जमकर बैठते और जहाँ तक बन पडÞता हर मंदिर में मत्था टेकते । यहाँ श्री गंगा मैया का बहाव देखते ही बनता है । गंगा की उत्ताल तरंग को देखते हुए श्रद्धा के साथ-साथ कुछ-कुछ भय भी होता था । वैसे तो मैं भी भूतपर्ूव भंगसेवी होने के नाते ‘गंगा से उँची तरंग उठे जब अंग में आवत भंग जवानी ।’ इस पंक्ति को स्मरण करके भंग के नशे में की हर्ुइ बेतुकी बातें और उलजलूल हरकतें याद कर-करके थोडÞी देर अतीत में खो जाता । हरिद्वार का सबसे बडÞा आकर्षा के केन्द्र रहा गंगातट की संध्याकालीन आरती । दो तीन रोज विना नागा हम लोगों ने आरती का आनन्द लिया । हरिद्वार से ही एक गाडÞी में नौ रोज के लिए हमलोग बद्री-केदार-गंगोत्री-यमुनोत्री तथा अन्य विविध छोटे मोटे दर्शनीय स्थल देखने के लिए प्रस्थान किए थे । साथ में बलिया या छपरा क्षेत्र के कुछ और तर्ीथयात्री थे वे भी भोजपुरी भाषी थे । हम लोगों में खूब रंग जमता था । बहुत जल्दी सब घुलमिल गए । बाद में उनलोगांे से बिछडÞते समय मैंने एक हिन्दी कविता भी हिन्दुस्तानी भाइयों को सुनाई ।
भारतभूमि में यदाकदा भ्रमण करते समय मैंने पढÞा था – ‘सावधानी गई दर्ुघटना हर्ुइ’ । शायद मैं इसे भूल् गया । इस्लिये हरिद्वार में मेरे साथ एक आर्थिक दर्ुघटना हर्ुइ । किसी स्थानीय सज्जन ने मेरा बटुआ साफ कर दिया । मैंने खुद को समझाया, संभव है पर्ूव के किसी जन्म में मैं उसका कर्जदार रहा होऊँ । उसका बाँकी बक्यौता इस रुप में प्रभु ने मुझ से भुक्तान करवा दिया । उसका पावना उसे मिल गया । अंटी से पैसा लेकर घूमते समय सारा ध्यान पैसे की सुरक्षा में ही केन्द्रित रहता था । अब मैं निश्चिन्त होकर फकीरी अन्दाज में घूमता था । किसी सूप|mी सन्त की पंक्ति – ‘वाह वाह रे मौज फकीरा दी !’ बार-बार मानस में कौंध जाती । वैसे टोलीनेता अग्निजी ने तुरन्त हमें आश्वस्त किया – पैसे की चिन्ता बिल्कुल न करें । मैं हूँ ना ! इसी तरह से एक दूसरे सहयात्री श्री अच्युतम पोखरेल जिन्हें हम लोग प्रेम से ‘माहिला दाइ’ कहते थे, उन्होंने भी आडे वक्त में बहुत उदारता दिखलाई । मेरे आर्थिक नुकसान से दुःखी होते हुए सजल नयन से माहिला दाइ ने कहा था, आप निसंकोच जितना चाहिए हम से लेलीजिए और अपनी सुविधानुसार लौटा दें । संकट की घडÞी में ऐसे मीठे बैन बोलनेवाले विरले ही होते हैं । आज मंै माता सरस्वती को साक्षी रखते हुए लिखित प्रतिबद्धता व्यक्त करता हूँ – र्सवश्री अग्निजी और अच्युतमजी का आभारी मैं जीवनभर रहुँगा । भगवान करें हर टोली में ऐसे सहृदयी-सहयोगी सभ्य शिष्टजन बहुसंख्यक रुप में रहें । जिनकी उपस्थिति में बाकी के अन्य सदस्य अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें ।
यात्रा कैसी भी क्यों न हो, श्री अच्युतम पोखरेल जैसे जिन्दादिल सहयात्री हों तो यात्रा सुगमता से कट जाती है । लम्बा छरहरा वदन, आँखों में मोटे ऐनक, उमर जो हो चाल में मस्ती, खाने के शौकीन, बोझ उठाकर दौडÞने में बडÞे-बडÞे कुल्ली उनके सामने पानी भरें और हृदय गंगाजल की तरह पवित्र । माहिला दाइ वास्तव में इस सफर में ‘म्यान अफ द सिरिज’ थे । भावावेश में मैंने माहिला दाइ की कुछ ज्यादा ही प्रशंसा तो नहीं कर दी । नहीं, नहीं, वे वास्तव में प्रशंसा के योग्य हैं । उनके सामान जिन्दादिल और जवाँ दिल इन्सान चिराग लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलेगा । वे कहते थे, भरपेट खाओ, आर खूब काम करो । ऊँची ऊँची पहाडÞी चढर्Þाई में भी वे माल असबाव के साथ सबसे आगे रहते । आश्रमों में ठिकाना ढूँढते समय वे किराए के मामले में अडÞ जाते और इस तरह सामूहिक आर्थिक लाभ भी करवाते थे ।
तर्ीथयात्री दल की एक सदस्या की चर्चा भी मैं आदर और स्नेहपर्ूवक करना चाहता हूँ । हमारे प्यारे माहिला दाइ की धर्मपत्नी श्रीमती शान्तिदेवी पोखरेल, अपने नाम को र्सार्थक करते हुए शान्त भाव से यथाशक्ति सबकी सेवा करती थी । मुझे लगता है तर्ीथयात्रा का सबसे ज्यादा पुण्य उन्हें मिलेगा । हमेसा हँसमुख रहना, किसी पर क्रोध नहीं करना, हो सके तो सबकी सहायता करना – इन सब विशेषताओं के चलते शान्तिजी को शायद ही कोई भुला जाएगा । विशेषकर जब वे जान बूझकर नेपाली और हिन्दी दोनों भाषा को मिलाकर बोलती थी, उस समय टोली के सभी सदस्य उन्मुक्त हास्य से थकावट दूर करते थे । नीरसता से बचने बचाने के लिए ऐसे सरस संग्रहों की आवश्यकता सब महसूस करते हैं ।
हरिद्वार में मन्सादेवी के दर्शन के लिए जाते हुए पहाडÞ की ऊँचाई पर केबुलकार की व्यवस्था है । केबुलकार को वहाँ ‘उडन खटोला’ नाम दिया गया है । हरिद्वार से गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ की यात्रा अपेक्षाकृत कष्टकर रही । क्योंकि गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ में पहाडÞी चढÞने उतरने में लोगों की जान निकल जाती थी । अशक्त लोग किराए पर घोडी की सवारी लेते थे । ‘डोक्रो’ और पाल्की में भी श्रद्धालु भक्तजन दर्शन के लिए जाते थे । यह देखकर नेपाली साहित्य के महाकवि स्व. लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा की ‘यात्री’ कविता की पंक्तियाँ ः
कुन मन्दिरमा जान्छौ यात्री -
कुन मन्दिरमा जाने हो -
कुन सामग्री पूजा गर्ने -
साथ कसोरी लाने हो -
मानिसहरुको काँच चढी
कुन देवपुरीमा जाने हो -
मानस में बार-बार कौंध जाती थी । जो स्वयं नहीं चल सकते, दूसरों के कन्धों पर बैठकर तुम किस मन्दिर में जाओगे यात्री – और कौन से देवता की पूजा करोगे – कहकर देवकोटा तर्ीथयात्री से प्रश्न पूछते हैं । अर्थात् मानव मेर्ंर् इश्वर का निवास है, और तूँ उसी मानव के कन्धे पर सवार होकर किस भगवान को ढूंढने कहाँ जा रहे हो – अर्थात् आत्मस्थ परमेश्वर को पहचानो, बाबरे !
भारत का उत्तरांचल प्रदेश अर्न्तर्गत जिला रुद्रप्रयाग में केदारनाथ और जिला चमौली में बद्रीनाथ विराजमान है । हम लोगों की यात्रा में प्रायः सभी देवमंदिरों में दर्शन सहज ढंग से, शांतिपर्ूवक हुए । हरिद्वार वास्तव में हरि का द्वार है । क्योंकि यहीं से तर्ीथयात्री उत्तुङ्ग हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर विराजमान केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शनार्थ प्रस्थान करता है । यानि हरि के द्वार -हरिद्वार) में प्रवेश करता है । केदारनाथ की चढर्Þाई में, जब में थककर चूर-चूर हो गया, एक कदम भी आगे बढÞा नहीं गया तो मुझे भगवान शिव पर कुछ क्रोध हुआ और मैं उनसे झगड पडÞा । प्रभु ने तुरन्त मेरी सुन ली और मुझे कष्ट से मुक्ति मिली । बाद में मुझे पश्चाताप भी हुआ – क्यों मैं नाहक अपने प्रभु से तूँ तूँ मैं मैं कर बैठा – बद्रीनाथ तक पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं है, चूँकि वहाँ तक गाडी जाती है । बद्री में गर्म पानी के कुण्ड में स्नान करने के बाद हम लोगों ने ब्रहृमकपाली श्राद्ध सम्पन्न किया । पचासों श्राद्धकर्ता को एक ही बार में निपटते हुए पण्डाजी ने घोषणा कर दी अब आगे सिर्फतर्पण करना, पिण्डदान नहीं करना ।
मथुरा-वृन्दावन में, भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूीम और लीलाभूमि में, अतुल आनन्द प्राप्त हुआ । जहाँ जाइए, राधे-राधे की आवाज कानों में मिश्री घोलती थी । पितृपक्ष होने से स्वर्गीय पितरों की स्मृति में यमुनातट पर मैंने पुनः तीलांजलि अर्पण की । मन मुदित हुआ । प्राचीन कृष्ण मंदिर में प्रभु प्रसाद में माखनमिश्री खाने को मिला । जीवन धन्य हो गया । वृन्दावन से कुरुक्षेत्र-दिल्ली होते हुए भगवान शिव की नगरी वाराणसी में चार पाँच रोज गंगास्नान और विश्वनाथ दर्शन करते हुए हम लोग पुनः आरक्षित सिट में सकुशल रक्सौल लौट आए । दिल्ली का रखरखाब स्वच्छ और सुन्दर लगा । केदार की चर्ढाई में भगवान शिव की प्रत्यक्ष कृपा, वृन्दावन में इस्काँन मंदिर में सरस कृष्ण भजन, हरिद्वार की गंगा आरती, वाराणसी में विश्वनाथ बाबा का दर्शन, जगह-जगह में नेपाली छात्र, मजदूर आदि से भेटवार्ता, प्रायः हरेक तर्ीथस्थल में बंगालियों का भारत सेवाश्रम संघ और उन्मुक्त-स्वच्छन्द भ्रमण का आनन्द, कदापि इन संस्मरणों को भुलाया नहीं जा सकता । तर्ीथयात्रा के अनेक लाभ है । इससे हमारी कूप-मंडूकल जाती है, प्रभु चरणों की भक्ति बढती है, व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है, आदमी को पहचानने का अवसर मिलता है, विविध समुदाय के लोगों से मिलने पर समझदारी और सहिष्णुता बढती है । संभवतः इसलिए भी हमारे समझदार पर्ूवजों ने तर्ीथयात्रा को धार्मिक अनुष्ठान में स्थान दे दिया हो ।
तीर्थों को तर्ीथ बनानेवाले -तर्ीर्थी कर्ुवन्तितर्ीथानी) साधुसंत, तपस्वी, महात्मा आदि पुण्यात्मा के दर्शन न हो सके, इसका मलाल रह गया ‘बिनु हरिकृपा मिलहिं नहीं संता’ इसको आत्मसात् करते हुए इस तर्ीथयात्रा प्रकरण को यहीं विराम देता हूँ । राधे ! राधे !!