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September , 2010
Wednesday
पाकिस्तान के बारे में आज सबसे बडा सच यह है कि "बोया बीज बबूल का तो आम ...
कई पत्नियों के साथ रहने के लिए चर्चित दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति जैकब ज़ूमा ने ...
जनक-जानकी की पवित्र भूमि, जो कभी हिमालय की तरह शान्त-स्वच्छ और बुद्ध के अहिंसावादी उपदेशों ...
नेपाली भाषा में पुनः शपथ ग्रहण करने संबंधी नेपाल सरकार -मंत्रिपरिषद) के आग्रह को अस्वीकार करते ...
विगत दिनां भारत-नेपाल के जोगवनी सीमा पर दोनों देशों के सैकड नागरिक एक दूसरे को ...
येष्ठ १४ की मध्य रात्रि को महत्वपर्तीन दलों ने जो तीन सूत्रीय समझौताकिया, उसे नेपाली ...
में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है ...
मना का संपादकीय लिखा जा चुका है । मराठी में लिखा गया बाल ठाकरे का ...
टुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर ...
अनेकता में एकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध अपना देश भारतवर्तमान समय में संकट के ...
माउण्ट एवरेस्टको नेपाल में सगरमाथा कहा जाता है । माउण्ट एवरेस्ट नेपाल का है यह विश्वव्यापी रुप ...
अमेरिका की तरफ से की गयी पहल और मंर्बई हमले के करीब १४ महीने बाद ...
स्लीवलेस परिधानों की कशिश नारी मन में हमेशा से रही है फैशन आते जाते रहे, ...
भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण ...
हित्यकार का व्यक्तित्व अपने ही अनुरुपविशिष्ट शैली, माध्यम और उपकरण का चयन करता है । अतएव ...
नेपाल में नया“ संविधान जारी होने का निर्धारित तिथि जितनी नजदीक आती जा रही है, ...
आउटलुक पत्रिका के पिछले अंक में अरुधती राँय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है जिसे ...
नेपाल से प्रकाशित एक मात्र हिन्दी पत्रिका हिमालिनी की संस्थापक संपादक एवं पद्मकन्या काँलेज में ...
काठमाडौ, चैत्र ९ - दोषी सुरक्षा अधिकारीमाथि कारवाहीको मांग राख्दै सोमबार तेश्रो दिनपनि जनकपुर विहानैदेखि ...
भारत-नेपाल के बीच का सम्बन्ध बहुत पुराना है जिसका गवाह हमारा इतिहास है दोनों देशों ...
हर बच्चा अपने माता पिता की आखों का तारा होता हैं । यही वजह है ...
जेठ १४ गते संविधान जारी करने का निर्धारित तिथि जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही हैं ...
नेपाल में सफेद कारोबार की आड में काला धंधा करने वाले बदनाम लोगों की जान ...
नवर्निमाण में छात्र-युवाओं की भूमिका महत्वपर्ण् होती है । इतिहास गवाह है कि युवाओं ने ...
गोरखालैण्ड आन्दोलन पश्चिम बंगाल में लगातार तेज होता जा रहा है । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ...
मल्लिका बोल रही हिस्स.
ईश्वर ने नारी को बडी उदारता के साथ सौर्ंदर्य का वरदान दिया है उसमें जुल्फों ...
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हमेशा से यह कहते हुए केंद्र पर अनदेखी का आरोप ...
ईन फ्लू की तरह हैपेर्टाईटिस-बी का भी भारी आतंक अनेक वर्षो तक फैलाकर अरबों रूपया ...
ल ही में भारत आये अपनी व्यक्तिगत यात्रा लेकिन विभिन्न राजनीतिक नेताओं से मिले मधेशी जनाधिकार फोरम ...
निया भर में मोस्ट वान्टेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिन्दा है यह खुलासा एफ.बी.आई. द्वारा ...
राजनीति’ में राजनीतिज्ञ बनी हैं। उनका ‍जो लुक है, उसे देखकर कहा जा रहा है ...
एक नजदीकी मित्र ने बहुत दूर से फोन किया, एक नई पत्रिका का विमोचन ...
महीने तक पद पर काम करने से महरुम नेपाल के उपराष्ट्रपति परमानन्द झा फिर ...

Archive for November, 2009

गजल::डाँ. कृष्णावतार त्रिपाठी राही’

Posted by Himalini On November - 30 - 2009 2 COMMENTS

इस कदर आदमी आज रोने लगा
दाग सारे बिना पानी धोने लगा ।

रात सोये तो सोये न परवाह है
आदमी तब तो दिन में भी सोने लगा ।

मौत को कंधा देना जरुरी है पर
आदमी जिन्दगी को भी ढोने लगा ।

घर हो, मंदिर या मस्जिद गुरुद्वारा हो
गंदगी हर जगह जाके बोने लगा ।

जो दिया बन के जलते रहे रात भर
उनके भी राह में कांटे बोने लगा ।

‘राही’ जिनके लिए रोज मरता रहा
उनका व्यवहार दुश्मन सा होने लगा ।

::-डाँ. कृष्णावतार त्रिपाठी ँराही’
कुंवरगंज, ज्ञानपुर, उत्तरप्रदेश

खिसकती जमीन::पिताम्बर दाहाल

Posted by Himalini On November - 30 - 2009 ADD COMMENTS

नेपाली कांग्रेस महासमिति की बैठक काठमाण्डू में सम्पन्न हई । आयोजक केन्द्रीय समिति ने तीन दिन की कार्यतालिका निर्धारण किया था । लेकिन बैठक चार दिन तक चला । नेपाल के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस सबसे पुरानी पार्टी है। इसने कई बार नेपाल में सरकार का नेतृत्व किया । वर्तमान सत्ता समीकरण में भी कांग्रेस ही प्रमुख घटक है । कांग्रेस महासमिति की बैठक सिर्फउसके लिए ही नही बल्कि नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में भी बडा महत्व रखता है । कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला महासमिति बैठक के पक्ष में नहीं थे । उन्होंने बैठक न बुलाने का निर्देश भी दिया था । उनके मना करने के बावजूद भी बैठक का आयोजन किया गया । Gp Koiralaइससे साफ जाहिर होता है या तो सभापति कोइराला पार्टी में साफ कमजोर पड गये हैं या उन्हें मनाने में दूसरे नम्बर के नेतागण कामयाब हो गए । अनेक आशंकाओं के बीच बैठक प्रारंभ हर्इ । अन्ततोगत्वा सभापति कोइराला ने ही बैठक का उद्घाटन करके इसको वैधानिकता प्रदान कर दिया । देशभर से ज्ञद्द सय छट में से करीबन ज्ञज्ञ सय सदस्यों ने इस बैठक में हिस्सा लिया । इसबार सदस्यों की संख्या कांग्रेस के टद्ध वर्षके इतिहास में सबसे बडा है । विधान के मुताबिक प्रत्येक साल महासमिति बैठक होना है । लेकिन कांग्रेस विधान से नही बल्कि नेताओं से चलने वाली पार्टीने के कारण उनकी इच्छा अनुसार बैठक बुलाया जाता था । पार्टीकीकरण को वैधानिकता देने के लिए दो साल पहले महासमिति की बैठक काठमाण्डू में हर्इ थी । उस बैठक में नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला और प्रजातांत्रिक कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउवा ने दोनों पार्टी के एकीकरण के दस्तावेजों में हस्ताक्षर करके पार्टी एकीकृत किया था । ऐलान किया गया था कि दोनो पार्टी एक हो गए । लेकिन आजतक कांग्रेस में आपसी विश्वास, एकता और आत्मीयता का विकास नही हो पाया है । यान्त्रिक रुप से पार्टीकीकृत हो तो गयी । लेकिन गुटगत भावना आजतक बरकरार है । इसी बजह से संगठन के भीतर अनुशासनहीनता पनप रही है । कांग्रेस महासमिति सदस्यों ने इस बारे में चिन्ता जतायी और आगे की यात्रा सहज बनाने के लिए अपना-अपना सुझाव भी दिया ।
संविधानसभा निर्वाचन में कांग्रेस पूरी तरह पराजित हो गयी । ज्ञ सय ज्ञद्ध निर्वाचन क्षेत्र में मजबूत पकड रखने वाली पार्टीवल घठ स्थान में ही सिमट कर रह गई । इस करारी हार की वजह क्या है – इस बारे में पार्टी उच्च नेतागण क्यों मौन है – क्यों किसी ने पराजय की नैतिक जिम्मेवारी नही ली – निर्वाचन परिणाम को लेकर हर पार्टी समीक्षा की जाती है । लेकिन कांग्रेस के नेतागण चुप्पी साधे बैठे रहे । इस सर्न्दर्भ में सहभागी सदस्यों ने कांग्रेस नेतृत्व को जमकर आलोचना की । राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों की उद्दण्डता एवं हरकत सामाजिक सहिष्णुता को चुनौती दे रहे है । दण्डहीनता उपस्थित होने से अराजकता पनप रही है । अधिकार प्राप्ति के बहाने लोगों को आतंकित किया जा रहे है । शान्ति और सुरक्षा लोगों से दूर भागते जा रह हं । ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस को क्या करना चाहिए – राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ दलीय सहमति में इन समस्याओं को निपटाने का सुझाव बैठक में प्रस्तुत किया गया ।
कांग्रेस का पकड तर्राई-मधेश में मजबूत था । यहाँ के लोगों ने कांग्रेस का हमेशा साथ दिया । लोग उसकी महिमा गाते थे । कांग्रेस का जनाधार तर्राई-मधेश था । लेकिन इसबार लोगों ने कांग्रेस को पीठ दिखा दिया । जिन लोगों का परिचय और पहचान ही कांग्रेस था वे क्यों कांग्रेस से दूर होना चाहते हैं – उनका दर्द क्या है – इस बारे में गंभीर और भावपर्ण् विचार विमर्श महासमिति बैठक में हुआ । मधेश आन्दोलन में कांग्रेस नेताओं की अदूरदर्शी नीतियों के कारण यहाँ के लोग कांग्रेस से नाराज हो गए हैं । उन लोगों की भावना का सम्मान करते हुए जनसंख्या के आधार पर राज्य के निर्ण्यक तह में समावेशीकरण की नीति अपनाने का महत्वपर्ण् सुझाव महासमिति बैठक ने दिया । राज्य पुनःसंरचना के प्रस्ताव भी बैठक में केन्द्रित रहा । मधेशवादी पार्टीियों ने समस्त मधेश एक प्रदेश का नारा दिया है । मेची से महाकाली तक का इतना बडÞा भू-भाग कैसे एक प्रदेश बन सकता
है – प्रदेश रचना का मतलब विभाजन नहीं है । केन्द्रीकृत राज्य के असीमित अधिकारों को प्रदेशों में स्थापित करना है । इसमें पहचान का आग्रह भी दबाब के रुप में बढÞता जा रहा है । इसलिए कांग्रेस ने ज्ञठ प्रदेश की रचना का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था । प्रदेशों का निर्माण राजनीतिक सहमति से होना चाहिए । अधिकांश महासमिति सदस्यों का सुझाव था – ‘आर्थिक सम्भाव्यता, भौगोलिक अनुकूलता, प्राकृतिक स्रोत और साधन का उपभोग पर विशेष सावधानी अपना कर प्रदेशों का निर्माण होना चाहिए । हमारी परम्परा, संस्कृति, अपनी-अपनी मातृभाषा को संवैधानिक मान्यता प्रदान करके उनकी आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहिए । मुद्रा प्रणाली, परराष्ट्र संबन्ध, रक्षा, अंतर्रर्रीय सम्झौते, कुटनीतिक नियुक्ति, राष्ट्रीय राजमार्ग, रेल विभाग केन्द्र सरकार के अधिनस्थ होना चाहिए । इसके अलावा सम्पर्ूण्ा अधिकार प्रदेशों में होना चाहिए ।’
नेपाली कांग्रेस देश की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक पार्टी है । इसके संस्थापक नेताओं ने भारत और नेपाल दोनों देशों में अधिकार प्राप्ति के लिए संर्घष्ा किया । कांग्रेस लोकतांत्रिक पार्टीर्ीीोकर भी उसके आन्तरिक जीवन में लोकतांत्रीकरण की पद्धति का निषेध था । कांग्रेस सभापतीय पद्धति से संचालित होती आ रही थी । अर्थात् र्सवाधिकार सम्पन्न सभापति होते थे । द्दण्द्धड से पहले कांग्रेस महाधिवेशन में सिर्फसभापति चुने जाते थे । धीरे-धीरे छण् प्रतिशत केन्द्रीय सदस्यों को चुनाव से आने की अनुमति मिली । फिर भी पदाधिकारी समेत छण् प्रतिशत सदस्यों का मनोनयन सभापति अपनी मर्जी से करते थे । कांग्रेस नेतागण जनता के प्रति उत्तरदायी न होकर अपने सभापति को खुश रखने में लगे रहते थे । अर्थात् कांग्रेस ‘हाई कमान’ तक पहुँचने का मार्ग सभापति की इच्छा से निर्धारित होता था । लोकतांत्रिक पार्टीर्ीीे भीतर अलोकतांत्रिक पद्धति पनपता था । सभापति के र्इदगिर्द रहने वाले सब ‘पार्लियामेन्ट’ टिकट से लेकर अन्य राजनीतिक नियुक्तियाँ हथियाने में कामयाब होने लगे । जनता के बीच लोकप्रिय रहनेवालेे नेताएं कार्यकर्ता पीछे रह गए । इससे देश भर के कांग्रेस जनसभापतीय पद्धति से नाराज थे । उसे बदलने का इरादा रखे हुए थे ।
सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला ने अपने उद्घाटन भाषण में मौजुदा विधान को न बदलने का आग्रह करते हुए महासमिति सदस्यों से कहा, ‘कांग्रेस का परिचय और पहचान सभापतीय पद्धति है, इसको बदलने से कांग्रेस का इतिहास मिट जाएगा । कांग्रेस की पहचान गुम जाएगी’ । सभापति महोदय के इस कथन से सहभागी सदस्य हैरान हो गए । उनके बीच एक प्रकारका सन्नाटा छा गया । विधान परिवर्तन का विषय और गम्भीर हो गया । इसलिए बैठक की दो तिहाई अवधि विधान संशोधन बहस में ही बीत गयी ।
सबको बराबरी का अधिकार देना, समावेशी भागीदारी के आदर्शों को कांग्रेस विधान में सुनिश्चित करना और वर्तमान की चुनौतियों का सामना करने के लिए पार्टी सम्पर्ण् पदों में चुनाव होना जरुरी हो गया था । पार्टी नयी सोच तथा नयी ऊर्जा को स्थापित करना और जरुरी हो गया था । लोकप्रिय व्यक्तित्व का चयन निर्वाचन के माध्यम से ही हो पाता है । लोकतंत्र की आत्मा तो निर्वाचन है । इस प्रणाली से कोई भी पार्टी कोमजोर नही होती । इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । कांग्रेस का आन्तरिक जीवन नीरस बनता जा रहा था । महासमिति सदस्यों का मानना है कि संशोधित विधान ने कार्यकर्ताओं में नया ऊर्जा भर दिया है । पार्टी पर्ण् रुप से कार्यकर्ता की हाथों में सौंप दिया गया है । इस प्रकार से घ दिन तक बहस चलता रहा । अन्त में बहुमतीय प्रणाली पास हो गयी । नये संशोधित विधान के मुताबिक कांग्रेस के हर तह में पदाधिकारी सहित ठछ प्रतिशत सदस्यों का चुनाव होगा । बाकी द्दछ प्रतिशत मनोनयन के लिए सभापति हाउस में प्रस्ताव करेंगे और कार्यसमिति उनके प्रस्ताव पर अमल करके अनुमोदन करेगी । मुझे लगता है कि अब कांग्रेस एक गतिशील पार्टी जाएगी । युवा पुस्ताओं को कांग्रेस में समाहित होने का अवसर आसानी से प्राप्त होगा । पार्टीलोकतांत्रिक छवि जनता को आकषिर्त करने में कामयाब होगी, और अब पार्टीता से नही नीति से चलेगी ।
कांग्रेस पार्टी कमान युवा हाथों में सौंपने की आवाज तेज होती दिखाई दी । सहभागियों का मानना है कि पार्टी सुधार करना-कराना बडे नेताओं का काम है । युवाओं को आगे लाए बगैर पार्टीकायाकल्प नहीं हो सकता । अब सिर्फकाठमाण्डू में बैठकर सत्ता नहीं मिल सकती । संगठन मजबूत करने के लिए नेताओं को हर गाँव के कोने कोने तक पहुँचना होगा । जो शिक्षित और ऊर्जावान युवाओं से ही संभव है । उन्हें नेतृत्व की कमान सौंपने का मतलब यह नही है कि हम बडे-बुजुर्गों का अपमान कर दें । कांग्रेस को उनकी भी जरुरत है, मार्गदर्शक के रुप में ।

कैटरीना और सोनिया में कोई समानता नहीं

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

img1091129027_1_1राजनीति’ में राजनीतिज्ञ बनी हैं। उनका ‍जो लुक है, उसे देखकर कहा जा रहा है कि उनकी भूमिका सोनिया गाँधी से प्रेरित है। इस तरह की कुछ खबरें भी प्रकाशित हुई हैं।

इस बारे में फिल्म के निर्देशक प्रकाश झा ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस तरह की खबरें आधार‍हीन हैं और कैटरीना तो क्या उनकी फिल्म के किसी भी किरदार का कोई भी नेता से कोई लेना-देना नहीं है।

इस फिल्म में कैटरीना के अलावा रणबीर कपूर, अजय देवगनऋजभअपऔर नाना पाटेकर ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाई हैं। कैटरीना की भूमिका ग्लैमर डॉल से हटकर है और वे अपने करियर में पहली बार सशक्त भूमिका निभा रही हैं।

तीथयात्रा में चुनेगए कुछ मोती::मुकुन्द आचार्य

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

mukunda acharya_r1_c1सृष्टि में केवल मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसे प्रभु ने विवेक, बुद्धि, ज्ञान, विश्लेषणात्मक क्षमता, कल्पना शक्ति जैसे अनेक अतुलनीय गुणों से सम्पन्न करते हुए र्सवश्रेष्ठ प्राणी का सरताज पहनाया है । मानव मात्र पर प्रभु की यह असीम अनुकम्पा है । तर्सथ इस देव दर्ुलभ मानव जन्म की महिमा संतों ने खुलकर गाई है । यथा ‘कबहुँक करी करुना नर देही, देश इस चिनु हेतु सनेही ।’ संत तुलसीदास कहते हैं, अकारण करुणा वरुणालय प्रभु कृपा करके जीव को मानव देह प्रदान करते हैं ।
माता पिता के स्वर्गारोहण पश्चात् बारम्बार एक भावना आती थी – मैं भी बद्री केदार आदि तर्ीथस्थलों में जाकर पितरों को पिण्डदान दूँ, तिलाञ्जलि दूँ । दैव योग से काठमांडू निवास के पर्ूवार्द्ध में ही तर्ीथ यात्रा का सुअवसर प्राप्त हुआ । नौ तर्ीथयात्रियों का समूह तयार हुआ । तर्ीथयात्रा के लिए भी भगवत्कृपा की आवश्यकता होती है । मैं वर्षौं से इसके लिए सपना सँजोए हुए था, परन्तु सपना साकार हुआ यहाँ काठमांडू में आकर । यद्यपि मेरा साठ वर्षों से अधिक का जीवन तर्राई -कलैया-वीरगंज) में यापन हुआ है । भगवदिच्छा का एक प्रत्यक्ष प्रमाण ऐसा भी रहा । हम नौ यात्रियों में दो यात्री ऐन मौके पर नहीं जा सके । उसी दम्पत्ति की सत्प्रेरणा से हम सात लोग तर्ीथयात्री बने थे । सेना के उच्च पदस्थ अधिकारी होने के नाते उन्हें तर्ीथयात्रा में जाने की अनुमति मिलने पर भी, प्रस्थान की घडÞी से ठीक एक दिन पहले कार्यालयीय घटना चक्रव्यूह में वे बुरी तरह फँस गए और हम सात तर्ीथयात्री उनके सत्संग से वञ्चित रह गए । इसी को दैवयोग माना जाता है । र्’इश्वरेच्छा बलीयसी’ कहते हुए हम सात, जिनमें तीन महिला और चार पुरुष थे, वीरगंज-रक्सौल होते हुए पटना पहुँचे । हमारे दल का नेतृत्व कर रहे थे, नेपाल के एक प्राचीन संस्था के आदरणीय वन्धु श्री अग्नि प्रसाद पोखरेल । खाया पीया भव्य व्यक्तित्व, असीम सहनशीलता, प्रबन्धन कुशलता एवं व्यावहारिक चतुर्राई से सम्पन्न सहृदय आध्यात्मिक आस्थावान श्री पोखरेल जी के अगुवाई में हम लोग पुनपुन और गयाजी -दोनो जगह भारत के झारखण्ड प्रदेश में अवस्थित) में पिण्डदान से पितरों को तृप्त करते हुए, पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए तर्ीथयात्रा में आगे बढÞते चले गए ।
हम लोगों के कैप्टेन पोखरेलजी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए गया से हरिद्वार तक के लिए रेलवे रिजर्वेशन -आरक्षण) काठमांडू में ही करा लिए थे । पुनपुन और गयाजी में पितृश्राद्ध करके हम लोगों ने वर्षों की साध पूरी की, मगर वहाँ के पण्डा पुरोहित और अनेक बहानेबाजी करके यात्रियों की जेब हल्की करने वाले सज्जनों की अर्थलोलुपता को देखते हुए लगता था वासमती चावल के साथ कंकडÞ पत्थर भी खा रहे हैं । यहाँ एक और सीख मिली – परम्परागत पण्डों के पास न जाकर हमें स्वतंत्र रुप से गेष्ट हाउस आदि में ठहरना चाहिए । पण्डों के ब्रहृमजाल में फँस भी गए तो खूब मोलतोल -वार्गेनिंग) के सहारे ब्रहृमजाल से मुक्त हो जाना चाहिए । वैसे बेचारे पंडे पुरोहित भी क्या करें । पुश्तैनी पेशा जो ठहरा ! आजीविका के लिए, पापी पेट का सवाल जहाँ पैदा हो जाता हो, आदमी क्रमशः निष्ठुर होता चला जाता है । संस्कृत में कहा गया है ः ‘क्षीणा नराः निष्करुणा भवन्ति ।’ तथापि गयाजी में हम लोगों ने एक पुरोहित को ठेक्का में प्राप्त किया, श्राद्ध तर्पणादि करके कृतकृत्य हुए । पितृलोक मंे विराजमान पितरगण भी अवश्य सुतृप्त हुए होंगे । फिर भी ‘नेपाली पंडा’ के नाम से जो महोदय वहाँ मिले, उनके चेहरे में हमने कभी हँसी नही देखी । ले देकर हम लोगों ने भी अपनी पीठ पंडाजी से थपथपा ली । विष्णुपाद और अक्षय वटका दर्शन र्स्पर्शन स्मरणीय रहा ।
हरिद्वार तक रेल के डिब्बे में आराम से सोते, बतियाते, झपकियाँ लेते और एक मिनट के अन्दर दश फेरीवालों के दर्शन करते यात्रा सम्पन्न हर्ुइ । शरीर कुछ थका-थका सा था मगर उत्साह की ऊष्मा से हम सभी तरोताजा थे । एक वयोवृद्ध सिन्धी या पंजाबी के गेष्ट हाउस में हम लोगों ने डेरा डाल दिया । हर तर्ीथस्थल में शास्त्रीय नियमानुसार हम लोग प्रायः आराम से ठहरते, दो चार रोज जमकर बैठते और जहाँ तक बन पडÞता हर मंदिर में मत्था टेकते । यहाँ श्री गंगा मैया का बहाव देखते ही बनता है । गंगा की उत्ताल तरंग को देखते हुए श्रद्धा के साथ-साथ कुछ-कुछ भय भी होता था । वैसे तो मैं भी भूतपर्ूव भंगसेवी होने के नाते ‘गंगा से उँची तरंग उठे जब अंग में आवत भंग जवानी ।’ इस पंक्ति को स्मरण करके भंग के नशे में की हर्ुइ बेतुकी बातें और उलजलूल हरकतें याद कर-करके थोडÞी देर अतीत में खो जाता । हरिद्वार का सबसे बडÞा आकर्षा के केन्द्र रहा गंगातट की संध्याकालीन आरती । दो तीन रोज विना नागा हम लोगों ने आरती का आनन्द लिया । हरिद्वार से ही एक गाडÞी में नौ रोज के लिए हमलोग बद्री-केदार-गंगोत्री-यमुनोत्री तथा अन्य विविध छोटे मोटे दर्शनीय स्थल देखने के लिए प्रस्थान किए थे । साथ में बलिया या छपरा क्षेत्र के कुछ और तर्ीथयात्री थे वे भी भोजपुरी भाषी थे । हम लोगों में खूब रंग जमता था । बहुत जल्दी सब घुलमिल गए । बाद में उनलोगांे से बिछडÞते समय मैंने एक हिन्दी कविता भी हिन्दुस्तानी भाइयों को सुनाई ।
भारतभूमि में यदाकदा भ्रमण करते समय मैंने पढÞा था – ‘सावधानी गई दर्ुघटना हर्ुइ’ । शायद मैं इसे भूल् गया । इस्लिये हरिद्वार में मेरे साथ एक आर्थिक दर्ुघटना हर्ुइ । किसी स्थानीय सज्जन ने मेरा बटुआ साफ कर दिया । मैंने खुद को समझाया, संभव है पर्ूव के किसी जन्म में मैं उसका कर्जदार रहा होऊँ । उसका बाँकी बक्यौता इस रुप में प्रभु ने मुझ से भुक्तान करवा दिया । उसका पावना उसे मिल गया । अंटी से पैसा लेकर घूमते समय सारा ध्यान पैसे की सुरक्षा में ही केन्द्रित रहता था । अब मैं निश्चिन्त होकर फकीरी अन्दाज में घूमता था । किसी सूप|mी सन्त की पंक्ति – ‘वाह वाह रे मौज फकीरा दी !’ बार-बार मानस में कौंध जाती । वैसे टोलीनेता अग्निजी ने तुरन्त हमें आश्वस्त किया – पैसे की चिन्ता बिल्कुल न करें । मैं हूँ ना ! इसी तरह से एक दूसरे सहयात्री श्री अच्युतम पोखरेल जिन्हें हम लोग प्रेम से ‘माहिला दाइ’ कहते थे, उन्होंने भी आडे वक्त में बहुत उदारता दिखलाई । मेरे आर्थिक नुकसान से दुःखी होते हुए सजल नयन से माहिला दाइ ने कहा था, आप निसंकोच जितना चाहिए हम से लेलीजिए और अपनी सुविधानुसार लौटा दें । संकट की घडÞी में ऐसे मीठे बैन बोलनेवाले विरले ही होते हैं । आज मंै माता सरस्वती को साक्षी रखते हुए लिखित प्रतिबद्धता व्यक्त करता हूँ – र्सवश्री अग्निजी और अच्युतमजी का आभारी मैं जीवनभर रहुँगा । भगवान करें हर टोली में ऐसे सहृदयी-सहयोगी सभ्य शिष्टजन बहुसंख्यक रुप में रहें । जिनकी उपस्थिति में बाकी के अन्य सदस्य अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें ।
यात्रा कैसी भी क्यों न हो, श्री अच्युतम पोखरेल जैसे जिन्दादिल सहयात्री हों तो यात्रा सुगमता से कट जाती है । लम्बा छरहरा वदन, आँखों में मोटे ऐनक, उमर जो हो चाल में मस्ती, खाने के शौकीन, बोझ उठाकर दौडÞने में बडÞे-बडÞे कुल्ली उनके सामने पानी भरें और हृदय गंगाजल की तरह पवित्र । माहिला दाइ वास्तव में इस सफर में ‘म्यान अफ द सिरिज’ थे । भावावेश में मैंने माहिला दाइ की कुछ ज्यादा ही प्रशंसा तो नहीं कर दी । नहीं, नहीं, वे वास्तव में प्रशंसा के योग्य हैं । उनके सामान जिन्दादिल और जवाँ दिल इन्सान चिराग लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलेगा । वे कहते थे, भरपेट खाओ, आर खूब काम करो । ऊँची ऊँची पहाडÞी चढर्Þाई में भी वे माल असबाव के साथ सबसे आगे रहते । आश्रमों में ठिकाना ढूँढते समय वे किराए के मामले में अडÞ जाते और इस तरह सामूहिक आर्थिक लाभ भी करवाते थे ।
तर्ीथयात्री दल की एक सदस्या की चर्चा भी मैं आदर और स्नेहपर्ूवक करना चाहता हूँ । हमारे प्यारे माहिला दाइ की धर्मपत्नी श्रीमती शान्तिदेवी पोखरेल, अपने नाम को र्सार्थक करते हुए शान्त भाव से यथाशक्ति सबकी सेवा करती थी । मुझे लगता है तर्ीथयात्रा का सबसे ज्यादा पुण्य उन्हें मिलेगा । हमेसा हँसमुख रहना, किसी पर क्रोध नहीं करना, हो सके तो सबकी सहायता करना – इन सब विशेषताओं के चलते शान्तिजी को शायद ही कोई भुला जाएगा । विशेषकर जब वे जान बूझकर नेपाली और हिन्दी दोनों भाषा को मिलाकर बोलती थी, उस समय टोली के सभी सदस्य उन्मुक्त हास्य से थकावट दूर करते थे । नीरसता से बचने बचाने के लिए ऐसे सरस संग्रहों की आवश्यकता सब महसूस करते हैं ।
हरिद्वार में मन्सादेवी के दर्शन के लिए जाते हुए पहाडÞ की ऊँचाई पर केबुलकार की व्यवस्था है । केबुलकार को वहाँ ‘उडन खटोला’ नाम दिया गया है । हरिद्वार से गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ की यात्रा अपेक्षाकृत कष्टकर रही । क्योंकि गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ में पहाडÞी चढÞने उतरने में लोगों की जान निकल जाती थी । अशक्त लोग किराए पर घोडी की सवारी लेते थे । ‘डोक्रो’ और पाल्की में भी श्रद्धालु भक्तजन दर्शन के लिए जाते थे । यह देखकर नेपाली साहित्य के महाकवि स्व. लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा की ‘यात्री’ कविता की पंक्तियाँ ः
कुन मन्दिरमा जान्छौ यात्री -
कुन मन्दिरमा जाने हो -
कुन सामग्री पूजा गर्ने -
साथ कसोरी लाने हो -
मानिसहरुको काँच चढी
कुन देवपुरीमा जाने हो -
मानस में बार-बार कौंध जाती थी । जो स्वयं नहीं चल सकते, दूसरों के कन्धों पर बैठकर तुम किस मन्दिर में जाओगे यात्री – और कौन से देवता की पूजा करोगे – कहकर देवकोटा तर्ीथयात्री से प्रश्न पूछते हैं । अर्थात् मानव मेर्ंर् इश्वर का निवास है, और तूँ उसी मानव के कन्धे पर सवार होकर किस भगवान को ढूंढने कहाँ जा रहे हो – अर्थात् आत्मस्थ परमेश्वर को पहचानो, बाबरे !
भारत का उत्तरांचल प्रदेश अर्न्तर्गत जिला रुद्रप्रयाग में केदारनाथ और जिला चमौली में बद्रीनाथ विराजमान है । हम लोगों की यात्रा में प्रायः सभी देवमंदिरों में दर्शन सहज ढंग से, शांतिपर्ूवक हुए । हरिद्वार वास्तव में हरि का द्वार है । क्योंकि यहीं से तर्ीथयात्री उत्तुङ्ग हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर विराजमान केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शनार्थ प्रस्थान करता है । यानि हरि के द्वार -हरिद्वार) में प्रवेश करता है । केदारनाथ की चढर्Þाई में, जब में थककर चूर-चूर हो गया, एक कदम भी आगे बढÞा नहीं गया तो मुझे भगवान शिव पर कुछ क्रोध हुआ और मैं उनसे झगड पडÞा । प्रभु ने तुरन्त मेरी सुन ली और मुझे कष्ट से मुक्ति मिली । बाद में मुझे पश्चाताप भी हुआ – क्यों मैं नाहक अपने प्रभु से तूँ तूँ मैं मैं कर बैठा – बद्रीनाथ तक पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं है, चूँकि वहाँ तक गाडी जाती है । बद्री में गर्म पानी के कुण्ड में स्नान करने के बाद हम लोगों ने ब्रहृमकपाली श्राद्ध सम्पन्न किया । पचासों श्राद्धकर्ता को एक ही बार में निपटते हुए पण्डाजी ने घोषणा कर दी अब आगे सिर्फतर्पण करना, पिण्डदान नहीं करना ।
मथुरा-वृन्दावन में, भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूीम और लीलाभूमि में, अतुल आनन्द प्राप्त हुआ । जहाँ जाइए, राधे-राधे की आवाज कानों में मिश्री घोलती थी । पितृपक्ष होने से स्वर्गीय पितरों की स्मृति में यमुनातट पर मैंने पुनः तीलांजलि अर्पण की । मन मुदित हुआ । प्राचीन कृष्ण मंदिर में प्रभु प्रसाद में माखनमिश्री खाने को मिला । जीवन धन्य हो गया । वृन्दावन से कुरुक्षेत्र-दिल्ली होते हुए भगवान शिव की नगरी वाराणसी में चार पाँच रोज गंगास्नान और विश्वनाथ दर्शन करते हुए हम लोग पुनः आरक्षित सिट में सकुशल रक्सौल लौट आए । दिल्ली का रखरखाब स्वच्छ और सुन्दर लगा । केदार की चर्ढाई में भगवान शिव की प्रत्यक्ष कृपा, वृन्दावन में इस्काँन मंदिर में सरस कृष्ण भजन, हरिद्वार की गंगा आरती, वाराणसी में विश्वनाथ बाबा का दर्शन, जगह-जगह में नेपाली छात्र, मजदूर आदि से भेटवार्ता, प्रायः हरेक तर्ीथस्थल में बंगालियों का भारत सेवाश्रम संघ और उन्मुक्त-स्वच्छन्द भ्रमण का आनन्द, कदापि इन संस्मरणों को भुलाया नहीं जा सकता । तर्ीथयात्रा के अनेक लाभ है । इससे हमारी कूप-मंडूकल जाती है, प्रभु चरणों की भक्ति बढती है, व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है, आदमी को पहचानने का अवसर मिलता है, विविध समुदाय के लोगों से मिलने पर समझदारी और सहिष्णुता बढती है । संभवतः इसलिए भी हमारे समझदार पर्ूवजों ने तर्ीथयात्रा को धार्मिक अनुष्ठान में स्थान दे दिया हो ।
तीर्थों को तर्ीथ बनानेवाले -तर्ीर्थी कर्ुवन्तितर्ीथानी) साधुसंत, तपस्वी, महात्मा आदि पुण्यात्मा के दर्शन न हो सके, इसका मलाल रह गया ‘बिनु हरिकृपा मिलहिं नहीं संता’ इसको आत्मसात् करते हुए इस तर्ीथयात्रा प्रकरण को यहीं विराम देता हूँ । राधे ! राधे !!

विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत संगम::मनीषा मिश्र

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

manisha mishra_r1_c1सिर्फआसन प्रणायाम करनेवाले योगी नहीं, वे सिर्फकथावाचक नहीं, वे सिर्फआचार्य नहीं, वे एक उपदेशक नहीं बल्कि वे तो पृथ्वी पर प्रत्येक धर्म के मूल पुरुष के प्रेम प्राप्त सबके सामने एक साक्षात उदाहरण है । यदि किसी हिन्दू को अपने शास्त्रों पर शंका हो तो वह उनसे मिल सकता है क्योंकि शास्त्रों के रचयिता महषिर् वेदव्या;m महषिर् भारद्वाज, महषिर् दर्ुवाशा के साथ उन्होनें बैठक की है ।
यदि किसी मुसलमान को कुरान समझना है तो वह उनसे मिल सकता है क्योंकि बाबाजी पैगम्बर साहब का सान्निध्य पा चुके है । यदि किसर्ीर् इर्साई कोर् इसा मसीह पर संदेह है तो बाबाजर्ीर् इसामसीह से मिल कर आए हैं और उनके सुविचारों से अवगत कराएंगे । यदि किसी सिक्ख को नानकजी का स्वरुप पूछना है तो वह बाबाजी से मिल सकता है, क्योकि बाबजी नानक देवजी का पे्रम पा चुके है ।
पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं, मत नहीं, संप्रदाय नहीं जिसके मूल स्रोत महापुरुष का बाबाजी को दर्शन, साक्षात्कार नहीं । वे प्रत्येक धर्म का, सत्य का, परम शक्ति का, तपस्या का, जीवित प्रमाण बनकर समाज मे घूम रहे हं ।
जन्म – उनका जन्म भारत के विहार राज्य के रोहतास जिल्ला सासाराम के राजघराने में हुआ था ।
अध्ययन – उनका अध्ययन दार्जिलिङ सेन्टपाल मंे हुआ था और अन्तिम शिक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से आर्ग्यानिक केमेस्ट्री मे एम.एस.सी. ।
वो एक प्रसिद्ध जेट फाइटर प्लेन चालक, वीर एवं देशभक्त है । इसी कारण उनका नाम पाइलट बाबा पडा । उनका नाम गिनिज बुक मे ीयधभकत ँष्निजत ज्ष्भच के नामसे रर्ेकर्ड किया गया है ।
वे विश्व के एकमात्र अति उच्चकोटि के क्रियायोगी है, जो निर्विकल्प समाधि लगाते है । वे बहुत बार हिम समाधि, थल समाधि और जल समाधि लगा चुके हैं ।
बाबाजी को नेपाल से बहुत पे्रम है, क्योंकि नेपाल उनकी गुरुभूमि है । नेपाल के नारायणी नदी के किनारे मकवानपुर, भैंसेके त्रिखण्डी कुटी मे परम् पूजनीय हरिबाबाजी और गुरु गोरखनाथ द्वारा वे दीक्षा प्राप्त किये । उन्होनें महाअवतार बाबा से क्रिया योग की दीक्षा प्राप्त की है ।
नेपाल के राजसी परिवार की बहू सर्ूयापति के मर जाने के बाद प्रतारित होकर पुरुष जाति से तिरस्कृत होकर मरना चाहती थी । तभी एक कपालिक आघोर निमाईनाथ के सम्मोहन में सर्ूया घिरती चली गई, वह पर्ूण्ा योगिनी बन गयी ।
लेकिन वह अघोरियों के बन्धन मे बंधकर छटपटा रही थी । बाबाजी ने उसे सभी अतृप्त आत्माओं अघोरों और तान्त्रिकों से उसे मुक्त कराया ।
हरिबाबा बचपन से ही बाबाजी को हरेक दर्ुघटनाओं से बचाते आ रहे थे । एक बार जब जे नेफा की घाटियों के उपर फ्लाइट से उड रहे थे तो अचानक विमान में गडवडी महसूस हर्ुइ । ए.टी.सी. से सम्बन्ध टूट गया । सब प्रयास बेकार जा रहे थे । वे पैराशूट से कूदकर मौत को चकमा दे सकते थे लेकिन वो राष्ट्रकी सम्पत्ति की सुरक्षा कर रहे थे अपने जीवन को दांव पर लगाकर । जिन्दगी और मौत के बीच पलक झपकने से भी कम समय रह गया था । तभी विमान में झटका लगा और वो तेजी से उपर उठने लगा और सभी सर्म्पर्क सूत्र कार्य करने लगे । अब विमान को कपिल नहीं हरि बाबा बडे आराम से चला रहे थे । आज फिर उन्होनें कपिल को मौत के हाथों से छिन लिया । विमान जमीन र्स्पर्श कर जैसे ही दौडा हरिबाबा गायब हो गए । कपिल सोचने लगे – हरिबाबा की क्षमताओं की सीमा क्या है – और वे मुझसे क्या पाना चाहते है जो ऐसी सुरक्षा देते हैं -
इन्ही घटनाओं के बाद उनमे बैराग्य आ गया और वे सबकुछ छोड कर वर्षों हरिबाबा को खोजते रहे पर हरिबाबा कहीं मिलही नहीं रहे थे । वे हरिबाबा हर संकट में संकट मोचन बनकर स्वयं ही प्रकट हो जाते थे । वे अबतक झलक को दिखाने को भी तैयार नहीं थे ।
बाबाजी काठमाण्डू मे पुनः हरिबाबा की खोज में लग गये । शिवरात्री के मेला के समय पशुपतिनाथ मंदिर का दर्शन करने के बाद हरिबाबा को निकलते देखा, दौडकर उनतक पहुँचना चाहा तो वे भीड मे खो गये । बाबाजी सोच रहे थे कि महलों से निकाल कर सडÞक पर धक्के खाने के लिए छोड दिया अब मेरी तरफ ध्यान न देकर मुझे तडÞपा रहे हैं ।
तभी एक साधु गा रहा था -जो मै ऐसा जानता,
पे्रम करे दुख होय ।
नगर ढिढोंडा पीटता,
पे्रम करे नय ।
बाबाजी को अपने हृदय की हालत का चित्रण इस भजन में मिल गया । फिर एक ट्रक पर थोडÞी दूर चलने के बाद नारायणी नदी के किनारे उतर कर पैदल चलने लगे । नारायणी नदी पार करके बीहड जंगल मे प्रवेश कर गये । पूरी तरह से थक कर जब एक पत्थर पर बैठ गये तब हरिबाबा हाथ में कुल्हाडी लिए और कन्धों पर लकडी का एक गठ्ठर लिये हुए आये । हरिबाबा का र्स्पर्श होते ही कपिल के शरीर की थकान मिट गई । जहाँ से उन्होनें हाथ पकडा था वहाँ से बिजली तरंग की तरह वस्तु तरंगित होकर दौडने लगी । हरिबाबा उन्हे खींचते हुए गोरखनाथबाबा के पास लेकर आये । गोरखनाथबाबा बोले – आओ पथिक । तुम्हारे लिए हम एक युग से प्रतीक्षा कर रहे थे । वे दोनों महात्मा उन्हे त्रिखंडी के महादेव मन्दिर मे ले गये । वहाँ उन के लिए पहले से आसन तैयार था ।
गोरखनाथबाबा गुफा के एक किनारे बैठकर अपने शरीर छोडकर कपिल के शरीर में प्रवेश कर गये । कपिल सूक्ष्म शरीर से सब देखरहे थे । पर वे शक्ति शून्य बन गये थे । अब वे मात्र एक दर्शक थे, हरिबाबा और गोरखनाथबाबाजी की चमत्कारपर्ूण्ा कार्यशैली का ।
अब गोरखनाथबाबाजी ने हजारों मील दूर आकाश मार्ग से पलभर में ही तय कर ली । पहुंच गये कपिल के गांव उनकी माँ से खीचडÞी की भिक्षा मांगने ।
सब वहाँ बिलखकर पूछ रहे थे – “तूने ये क्या किया -”
योगी कर्ेर् इ नहीं थे । पर कपिल के सब अपने थे । देह धारण करने वाला अडिग भिक्षा के लिये अलख जगा रहा था । मां ममता नियन्त्रितकर भीतर जाती है और आंचल मे भरकर चावल-दाल लेकर आती है । योगी के उपर थोडा अक्षत फेंककर आशर्ीवाद देती है । “युग-युग जीओ मेरे लाल” फिर योगी की परिक्रमा कर के उस के खप्पड में खिचडÞी डाल देती है ।
माँ ने कहा – योगी मै तुझे पहचान गयी हूँ, तुम वह नहीं हो जिसे मैने पैदा किया है । योगी जाओ उसे कह देना ममता सदैव पे्ररणा देती है, जीव शरीर देता है, साधक साधना देता है वह बन्धन में नहीं रखता है ।
धन्य है वह माता, उनकी जयजयकार है । जो संयमित रह कर जीवन बिताती है और योग्य संतान को जन्म देकर महान त्याग करने में हिचकिताती नहीं, विश्व उन का ऋणी है हिमालय उनका एहसानमंद है ।
बाबाजी कहते हैं पर्ूव जन्म अन्धविश्वास नहीं है, तथ्य है । आत्मा और पर्ुनर्जन्म के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता । आधुनिक वैज्ञानिक भी समस्त दृश्य और अदृश्य जगत मानते हैं । सूक्ष्म तरंगों से बना प्रमाणित कर रहे हंै । इन तरंगों में तीन मुख्य तत्व हैं – जीवाणु, ऊर्जा और विचार । आत्मा इन तीनों का बिशिष्ट स्वरुप है ।
प्रसूति विज्ञान का एक ही महत्वपर्ूण्ा सूत्र है – सेन्टोजनी रिपीट्स फैलोजनी अर्थात माँ के गर्भाशय में मानव शिशु के पर्ूण्ाता से पहले विन्दु -र्स्पर्म) के रुप मे स्थापित जीव सम्पर्ूण्ा चौरासी लाख योनियों का रुपाकार बदलते-बदलते मनुष्य आकृति प्राप्त करता है । विन्दु रुप बीज एक तरह का अमीबा जैसा जीव होता है, जो अपने ही प्लाज्मा मे से एक से दूसरा ष ९अभिि० पैदा करके दो बनजाता है । सृष्टिमे दोषों वाले जीवको “डायटम” कहते है । दो से चार, चार से आठ, आठ से सोलह, इस क्रममे कोशिका का विस्तार सृष्टि के अनेक जीवों की सक्ल लेता हुआ विकसित होता है । कभी मछली कभी मेंढक जैसा बनता है तो कभी बकरी और बैल जैसा । प्रकृति के यह रहस्यमय लीला प्रभु के अतिरिक्त भला कौन समझ पायेगा – पर इस सत्य से पर्दा पूरी तरह उठने लगा है और विज्ञान भी अध्यात्म की राह पकडÞने के लिए बेताव है ।
अष्टांग योग भी कुछ ऐसा ही विज्ञान है जिस मे जड तथा चेतन दोनों ही प्रकार के परमाणुओं का इस तरह विकास होता है कि प्रकृति के पांचो तत्व पुथ्वी, जल, पवन, अग्नि तथा आकाश भी पर्ूण्ाता मिले, ताकि पांच प्रकार के प्राणो -प्राण-अपान, समान, उदान तथा ब्यान भी अपनी पर्ूण्ाता प्राप्त करे । यह पर्ूण्ाता ही अणु विभु लघु विराट बनाकर “यत्ब्रहृमाण्ड तत्पिण्डे” पिंड -शरीर) मे ही विराट ब्रहृमाण्ड का बोध करा देती है । बिन्दु से ब्रहृमाण्ड तक की इस यात्रा का नाम ही अष्टांग योग है ।
अध्यात्म विज्ञान, आत्मा के अनुसंधान के लिए कहता है । इस पांचभौतिक शरीर के पांचो तत्वों की लघुता और प्रभुता की खोज कर लेने पर्रर् इ भी मानव आत्मविज्ञानी बनकर ब्रहृमाण्ड की खोज कर सकता है । तब आज के विज्ञान को इतना भटकना नहीं पडÞेगा ।
हमारी सुषुम्ना -स्पाइनल कार्ड) के अन्दर क्या है – विज्ञान को वहाँ पहुँचने का प्रयास करना चाहिये । जहाँ विज्ञान समाप्त होता है वहाँ से योग प्रारम्भ हो जाता है । विज्ञान बाहर की ओर कार्यरत है तो योग अन्दर की ओर । दोनों की प्रक्रिया एक तरह की है । मेरुदण्ड, स्पाइनल कार्ड के दोनो ओर घनात्मक और ऋणात्मक विद्युत प्रवाह अनवरत चलता रहता है जिसे ‘पिंगला’ और ‘इडÞा’ नारी कहते है । सांइन्स उसे प्रोटोन और इलेक्ट्रोन कहते हंै । स्पाइनल कार्डए के अन्दर सुषुम्ना का प्रवाह है, जिसे न्युट्रोन कहा जाता है । सुषुम्ना के अन्दर ब्रहृम रंघ्र है, जिस पर संघात होने से अनुभूतियों का अलौकिक संसार दृष्टिगोचर होने लगता है, जिसमंे मनुष्य स्वयं की पराकाष्ठा और आत्मीय पराभाव जानकर ब्रहृमाण्ड के मायावी लोक-लोकान्तरों का अवलोकन इच्छानुसार कर सकता है ।
इतना ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्म जाननें वाले हमारे बाबाजी बहुत ही सरल हृदय है, वो सभी को अपना शिष्य बनाते है । उन की दीक्षा की प्रक्रिया बहुत ही अनोखी है । वो दीक्षा के दौरान एक रुद्राक्ष देते है जिसमंे वो संकल्प करके रखते है कि जब तक यह रुद्राक्ष गले में रहेगा तब तक उस शिष्य की आकस्मिक दर्ुघटना से मृत्यु नहीं होगी ।
वैसे तो विश्व के ज्ञटण् देशों में लगभग द्द करोडÞ तक उनके शिष्य है । मैने भारत और नेपाल के सभी उच्च पदस्थ नेता और कर्मचारी को उनके सामने समर्पित होकर शिष्य बनते हुए देखा है ।
ऐसे संत सद्गुरु पाइलट बाबाजी -कपिल अद्वैत) के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है ।

तुलसी की दृष्टि में आतंक::डाँ. बद्रीनारायण तिवारी

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

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तुलसीदास जी एवं उनके द्वारा रचित महान ग्रन्थ रामचरित मानस से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर भारत वर्षतथा विदेशोे के अनेक इतिहासकारों तथा स्वतन्त्र वक्ताओं ने अपनी लेखनी के माध्यम से बुद्धिजीवियों, जिज्ञासु पाठक गणों तथा सामान्यजनों का ध्यान आकषिर्त किया है । परन्तु इस महान ग्रन्थ का आतंकवाद निवारण में कैसे योगदान हो इस तथ्य को ‘तुलसीदास’ की दृष्टि से अध्ययन करने का केन्द्र विन्दु बहुत कम विद्वानों ने ही बनाया है । डाँ. बद्रीनारायण तिवारी जी उनमें से एक है । जिस समय पूरा विश्व आतंकवाद से ग्रसित होकर इस समस्या का निदान खोज रहा है । ऐसी स्थिति में प्रकाशित यह पुस्तक निश्चित रुप से सहायक होगी तथा सम्बन्धित विषय के पाठकों के ज्ञानवर्धन एवं दृष्टिकोण को नवीनता प्रदान करेगी । सम्पर्ूण्ा पुस्तक पच्चीस अध्यायों की अपने विस्तार क्रम में समाहित किये हुये है । तुलसीदास जी के रचित दोहों को श्री तिवारी जी ने प्रत्येक अध्याय में उल्लेखित किया है और उन दोहों के अर्थों पर अध्यायों के शर्ीष्ाक को विश्लेषित किया है ।
प्रथम अध्याय में श्री तिवारी जी ने आतंकवाद एवं आतंकवादी कृत्यों को तुलसीदास जी ने रामायण में निसाचर कृत्यों एवं निसाचरी को कई स्थानों पर प्रस्तुत किया है जो की आतंकवादी कृत्यों की व्याख्या करती है । आतंकवाद के कृत्यों में धर्म को कभी शामिल नही किया जा सकता है क्योंकि कोई भी धर्म निर्वल एवं निर्दोषजन को कष्ट नही देने की बात सदैव करता है ।
दूसरे अध्याय में समाज एवं राष्ट्र को रामराज्य की कल्पना पर आधारित रखते हुए श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी के ममता एवं समतापर्ूण्ा राज्य दर्शन को प्रस्तुत किया है ।
तृतीय अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास के लेखन के प्रति विदेशी लेखकों के विचारों का सजीव चित्रण किया है ।
चतर्ुथ अध्याय में श्री तिवारी जी ने रामचरित मानस के लोकमंगल के पक्ष को तार्किक ढंग से प्रस्तुत कर आतंकवाद की समस्या का समाधान बताया है । क्योंकि जब तक सबके प्रति हित चिन्तन का भाव नही होगा तब तक विश्व-शान्ति की स्थापना सम्भव नही हो सकती है । पाश्चात्य विद्वान जे. एन. कारपेन्टर की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘थियालाजी आँफ तुलसीदास’ एवं डगलस पी. हित की पुस्तक दि होली लेक आँफ दि एक्ट्स आँफ राम में तुलसीदास जी के विश्व बन्धुत्व का उल्लेख है । इन विंदुओं का इस पुस्तक में उल्लेख कर लेखक के रामचरित मानस की आतंकवाद निवारण में विश्व स्वीकार्यता को नया आयाम दिया है ।
पंचम अध्याय में श्री तिवारी जी ने श्रद्धेय तुलसीदास के यस पक्ष को उल्लेखित किया है जो आम आदमी को जाने एवं विकास करने की कला सिखाता है ।
“गीत तुलसी ने लिखे तो आरती सबकी उतारी
राम का तो नाम है गाथा कहानी है हमारी ।”
छठे अध्याय में श्री तिवारी जी ने गोस्वामी तुलसीदास की अमर रचना रामचरित मानस पर विश्व में सबसे ज्यादा हुए शोधों का उदाहरण समेत वर्ण्र्ााकिया है ।
सातवें अध्याय में मुस्लिम कलमकारों द्वारा तुलसीदास जी के रामायण पर की गयी अभिव्यक्तियों का मौलिक वर्ण्र्ााहै । जैसे – उर्दू शायर ‘नजीर बनारसी’ की हृदयस्पर्शी तुलसी को सम्बोधित करती हर्ुइ पंक्तियां -
“संसार को राम ने संवारा लेकिन
संसार के राम को संवारा तुमने ।
जिस राम को बनवास दिया दशरथ ने
उस राम को पहुँचा दिया घर-घर तुमने ।।
इसी प्रकार डाँ. मलिक मोहम्मद, डाँ. जलाल अहमद खाँ, श्री नशूर वाहिदी, मोहम्मद फैयाजुद्दीन अहमद खान, आसिया खातून सिद्दकी, अब्बास अली खाँ, शम्सुद्दीन, हसीब अहमद राही दीन मोहम्मद ‘दीन’ आदि की तुलसी एवं रामायण पर अभिव्यक्ति को संकलित कर श्री तिवारी जी ने पुस्तक को कालजयी बना दिया है ।
आठवें, नवें, दसवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें तथा चौदहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी के बहुरंगी अभिव्यक्तियों को अपने उदाहरणों, उल्लेखों एवं संस्मरणों के आधार पर प्रस्तुत किया है ।
पन्द्रहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने ‘काशी’ में व्याप्त राम नाम की महत्ता एवं काशी में शव यात्रा के प्रस्थान के समय उच्चारित होने वाली ध्वनि ‘राम नाम सत्य है’ को भावुकतापर्ूण्ा अर्थों में प्रस्तुत कर अद्भुत आयाम स्थापित किया है -
जीवन में सत्य का ठिकाना मिलता नही
सत्य, सत्य, सत्य तो तुम्हारा राम नाम है ।
सोलहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण के सर्न्दर्भ में पर्ूव में लिखे लेखकों एवं वाल्मीकि जी की रचित रामायण से अलग किस प्रकार तुलसीदास जी ने अलग अभिव्यक्ति की तथा आम जनमानस के निकट पहुँचाया इसको बहुत से उदाहरणों द्वारा अद्भुत रुप में प्रस्तुत किया है, तथा संसार के आतंकवादियों जिन्हें तुलसीदास जी निसिचर कहते है । उस सर्न्दर्भ में उनकी रचित निम्नांकित महत्वपर्ूण्ा लाइन को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है ।
अस्थि समूह देखि रघुराया । पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ।।
सत्तरहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने भारतीय जनमानस के अमर ग्रन्थ राम-चरित मानस के सम्बन्ध में विदेशी लेखकों के हृदयस्पर्शी पे्रमभाव को उदाहरणों द्वारा भावपर्ूण्ा रुप से प्रस्तुत किया है जैसे रुसी भाषा के विद्वान अलेकर्सइ वारान्निकोव के समाधि स्थल पर देवनागरी लिपी में लिखे तुलसी का दोहा -
भलो भलाइहि पै लहइ-लहइ निचाइहि नीचु
सुधा सराहिअ अमरतों गरल सराहिअ मीचु ।।
अठ्ठारहवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने, तुलसीदास जी द्वारा रचित रामायण की महत्ता एवं अयोध्या परिक्षेत्र की महत्ता को उचित उदाहरणों द्वारा स्थापित किया है ।
उन्ननीसवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने तुलसीदास जी के गंगा महिमा के वर्ण्र्ााको भावपर्ूण्ा अभिव्यक्तियों द्वारा उल्लेखित कर मानव संस्कृति की रक्षा में तुलसीदास जी की पर्ूव दूरदर्शिता का उल्लेख किया है ।
बीसवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने राम मे लंका पर विजय का चित्रण मुस्लिम साहित्यकारों द्वारा किस प्रकार प्रस्तुत किया गया इसको उदाहरण सहित अभूतपर्ूव रुप में प्रस्तुत किया है ।
इक्कीसवीं अध्याय में श्री तिवारी जी ने दूर्रदर्शन दिल्ली केन्द्र से राष्ट्रीय प्रसारण में ‘निर्बल के बल राम’ के संस्मरण का उल्लेख किया है जो अविस्मरणीय है ।
बाइसवें, तेइसवें एवं चौबीसवें अध्याय में श्री तिवारी जी ने आधुनिक लेखकों में दिनकर जी एवं महादेवी वर्मा, यशपाल जी इत्यादि के मानस रामायण एवं तुलसी चरित्र पर विश्लेषण को तर्कपर्ूण्ा रुप से प्रस्तुत किया है । इसके अलावा इन अध्यायों में तुलसी की रचना रामायण किस प्रकार आम जन मानस में चेतना जगा दी है इसका भी वर्ण्र्ााविस्तृत रुप में दर्शित होता है ।
पच्चीसवें अध्याय में आतंकवाद श्री राम और तुलसी की दृष्टि में श्री तिवारी जी ने पुस्तक के सार संक्षेप को प्रस्तुत किया है ।
इस अध्याय में आतंकवाद नीति को किस प्रकार हतोत्साहित किया जाय इसका चित्रण मानस के चौपाइयों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है जिसमें मानव कल्याण की स्थापना में श्री राम के सफल प्रयासों का वर्ण्र्ााहै । अतः डाँ. बद्रीनारायण तिवारी जी की पुस्तक आतंक ः तुलसी की दृष्टि में पुस्तक के गहन अध्ययन के उपरान्त निश्चित रुप से इस तथ्य को स्थापित किया जा सकता है कि ‘आतंक’ के निवारण में श्री राम जैसी संकल्पबद्धता, श्री हनुमान जी जैसी दृढÞता, सीता जी जैसी शुचिता, श्री दशरथ जी जैसी ममता, कौशल्या जी जैसी समता, श्री लक्ष्मण जी की आक्रोशित ही सहायक हो सकती है ।
यह पुस्तक प्रबुद्धजनों, प्रज्ञाविदो, रक्षाविदों, शोधार्थियों एवं आम नागरिकों का ध्यान निश्चित रुप से अपनी ओर आकषिर्त करेगाी । तथा सम्पर्ूण्ा भारतवर्षमे गवेषणा एवं चिन्तन आधार स्तम्भ के अर्न्तर्गत प्रमुख पुस्तक के रुप में जानी एवं पढÞी जायेगी ऐसा मेरा अटल विश्वास है ।
अंत में डाँ. बद्रीनारायण जी के लेखन के प्रति संकल्पबद्धता को शत्-शत् नमन करते हुए उनसे अन्य नये लेखन मानको की अपेक्षा है ।
प्रस्तुतिः डाँ. आर तिवारी

विज्ञान::डाँ.र्इशान गौतम

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

dr ishan_r1_c1डा. दयानन्द वज्राचार्य, डा. खुमनारायण पौडेल और डा.र्इशान गौतम कृत पुस्तक “नेपालमा विज्ञान तथा प्रविधि” के मुताबिक बीसवीं सदी के मध्य तक अधिकतर व्याख्यानों पर आधारित जीव विज्ञान की सीमा अणु से भी सूक्ष्म स्तर से भूमंडलीय स्तर तक व्यापक हो रही है । जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान एवं भौतिकी के दरमियान सीमा अब मिट गईं हैं । दरअसल विगत के पाँच दशकों में जैव प्रक्रिया के विषय में सीमातीत ज्ञान प्राप्त हो रहा है और जीव विज्ञान प्राकृतिक विज्ञान के अन्य विषयों से अधिक रुचिकर और व्यापक रूप में परिवर्तन कारक हुआ है । इस विषय मे हो रहे विश्वव्यापी वाजिब पूँजी निवेश और मानव संसाधन के विकास से समाज में आधुनिक जीव विज्ञान की महत्ता में और ज्यादा बढोतरी हर्इ हं । इसलिए इक्कीसवी सदी को जीवविज्ञान की सदी होने का अनुमान किया गया है । सन ज्ञढछघ में जेम्स वाटसन और क्रिक का आणविक स्तर में डिएनए ९म्ल्ब्० संरचना की खोज से आधुनिक जीव विज्ञान का बीजारोपण हुआ । डिएनए आणविक -मोलिक्यूलर) संरचना की खोज भौतिकी मेंं परमाणु की बनावटका खोज सरीखा ही महत्वपर्ण् है । इस घटना से जीव विज्ञान के क्षेत्र मे क्रान्ति के साथसाथ दूरगामी प्रभाव भी उत्पन्न हुए ।
पृथ्वी के सभी सजीव प्राणी जीवित इकाई से निर्मित हैं कोशिका । मानव शरीर मे सौ लाख करोड कोशिकाएं होती है । प्रत्येक कोशिका के अन्दर एक केन्द्रक होता है । उक्त केन्द्रक के अन्दर पाई जाने वाली धागेनुमा संरचनाओं को गुणसूत्र कहा जाता है । मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में ४६ गुणसूत्र होते हैं, जिन में से २३ गुणसूत्र माँ के डिंब के जरीये आते हैं । शुक्राणु द्वारा डिम्ब को निषेचित किए जाने के बाद गुणसूत्रों की संख्या ४६ हो जाती है । एक थ् गुणसूत्र केवल पुरुष में ही पाया जाता है । जब यह मौजूद रहता है, तब भ्रूण पुरुष के रूप में विकसित होता है और जब मौजूद नही रहता है तो भ्रूण एक स्त्री के रूप में विकसित होता है । आणविक स्तर पर हर गुणसूत्र की संरचना प्रोटीन एवं न्यूक्लिक एसिड से मिलकर बनी होती है । यह न्यूक्लिक एसिड डिअक्सिराइबो न्यूक्लिक एसिड ९म्ल्ब् है । इसी डिएनए की संरचना की खोज सन् ज्ञढछघ में जेम्स वाटसन और प|mान्सिस क्रिक ने किया था जिस से आधुनिक जीवविज्ञान का बीजारोपण हुआ । दरअसल डिएनए एक द्वि तन्तु सीढीनुमा संरचना होती है, जिसका आधार स्तंभ शर्करा एवं फस्फेट से बने होते है ं। ये दोनों तन्तु चार मूल इकाइयों के बेस से बने होते हैं । एडिनीन ९ब्०, गुआनीन ९न्०, थायमीन ९त्० और साइटोसीन ९ऋ० । एक तन्तु का ए बेस दूसरे तन्त का टी बेस के साथ और इसी प्रकार जी बेस सी बेस के साथ मिलकर हाइड्रोजन बण्ड बनाता है । ब्, न् या ऋ के साथ त्, न् या ऋ के साथ मिलकर हाइड्रोजन बण्ड नहीं बनाते । यही वजह है कि यदि किसी डिएनए के एक तंतु का क्रम जानने से दूसरे पूरक तंतुओं में निहित बेसों के क्रम का अंदाजा लगाया जा सकता है । इसलिए डिएनए के उस खंडकों, जो संदेशवाहक आरएनए या नन-कोडिंग आरएनए के जरिये कोशिका को कार्य संपादन करने का आदेश देता है, जीन कहा जाता है । जीन की लंबाई सौ बेस से कई हजार किलो बेस तक हो सकते है । डिएनए को हजारों, लाखों साल पुराने जीवावशेषों से भी प्राप्त किया जा सकता है । इसी तथ्य पर आधारित होकर कुछ साल पहले हलिवुड के मशहूर निर्देशक स्टिवन स्पीलबर्ग ने अत्यंत लोकप्रिय साइंस फिक्शन फिल्म जुरासिक पार्क भी बनाया था ।
चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्घान्त प्रतिपादित किया और व्याख्या किया कि चिम्पैंजी और आधुनिक मानव एक ही पर्ूवज के वंशज हैं, मनुष्य की रचनार् इश्वर ने नहीं बल्कि आधुनिक मानव की उत्पत्ति विकासक्रम में हुआ है । चिम्पैंजी और आधुनिक मानव अलग-अलग विकसित होनें लगे । डार्विन ने सब से पहले यह भी व्यक्त किया था कि डिएनए के अवयवों के अति सूक्ष्म गति मे होते परिवर्तन से ही जीवों का विकास सम्भव होता है । मिसाल के तौर पर पचास लाख साल पहले चिम्पैंजी से मनुष्य का विकासक्रम की शाखाएं विभाजित होने पर भी चिम्पैंजी और मनुष्य के डिएनए मे अमूमन दो फिसदी ही असमानता दिखीं । दूसरे शब्दों में मनुष्य और चिम्पैंजी के दरमियान अठ्ठान्वे फीसदी समान जीन विद्यमान हैं । इस पहलू पर गौर करना भी जरूरी है कि जब बंदर से मनुष्य मे तब्दील होने के लिए केवल दो फीसदी जीन मे परिवर्तन ही काफी है तो दो मानव के बीच दूरी क्यों -
असम्बद्घ प्रजातियों के बीच जीनों के आदान-प्रदान प्राकृतिक अवरोधों से निषिद्घ होते हंै । इस से विकास प्रक्रिया भी मन्द होती है । करोडों साल से प्रकृति मेंं विद्यमान इस किस्म के अवरोध सन ज्ञढठद्ध में अमेरिकी जीव रसायन वैज्ञानिकों स्टैन्ले कोहैन और हर्बट बोयेर द्वारा मेंढक से बैक्टेरीया मे डिएनए प्रतिस्थापित करने के बाद समाप्त हुए । उनके प्रयोग मेंं मेंडक से बैक्टेरिया में स्थानान्तरित डिएनए सबल और क्रियाशील पाए गए । सन ज्ञढडण् मेंं दूसरे वैज्ञानिकों ने मानव डिएनए को बैक्टेरिया मे सफल प्रतिस्थापित किया । उस के पश्चात् एक जाति से दूसरी जाति के जीवों में डिएनए प्रतिस्थापन प्रक्रिया सामान्य होती चले गई और इसी से आनुवंशिक अभियांत्रिकी अर्थात् जेनेटिक इन्जीनियरिंग का प्रादर्ुभाव हुआ । जैविक विकासक्रम को प्राकृतिक रूप में लाखों साल लगने वाली प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने निश्चित समय सीमा में बाँधने और प्राकृतिक अवरोधों को अपने यत्न से तोडने में सफलता हासिल कीं । इस से ये कहना पडेगा कि किसी भी प्राणी के शरीर में होने वाले प्राकृतिक विकास की जैविक प्रक्रियाओं को मानव दूसरे दिशा में मोडÞ सकने मेंं कामयाब हुआ है । अप्राकृतिक स्तर पर जीवों के उत्पादन और जैविक विकास की नईर्-नई किरणों को प्रकृति की गर्भ से खोजने में मनुष्य कामयाबी की सीढियाँ चढता गया है ।
प्रजनन और सन्तानोत्पत्ति जीवों की जमीनी विशेषता हैं । डिएनए अणु में स्वविभाजन का गुण होता है । डिएनए को परखनली में स्वविभाजन करने में वैज्ञानिकों ने अब तक तो कामयाबी हासिल नहीं कीं हंै, मगर वैज्ञानिक जीवन को संचालित करने हेतु अति आवश्यक कम से कम डिएनए की संख्या की खोज करने में जुटे हैं । अगर वो इस कार्य में सफल हुए तो रासायनिक प्रक्रिया द्वारा वो परखनली में डिएनए का उत्पादन कर सकेंगे । इस क्षेत्र में बडी छलांग लगाने के बावजूद इससे जुडे नैतिक मूल्यों के कारण प्रयोगशाला में जीवन का निर्माण करने में उनको झझिक हो रही है । लेकिन इक्कीसवीं सदी में साधारण रसायनों के प्रयोग से परखनली में जीवन-सृजन के मजबूत आसार नजर आते हैं ।
सन ज्ञढढण् में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने हृयुमन जिनोम प्रोजेक्ट शुरु किया था । उस परियोजना का लक्ष था, मानव डिएनए के बनावट और स्थितियों का पता लगाना एवं उक्त डिएनए द्वारा उत्पन्न भौतिक और मानसिक विशेषताओं का अध्ययन करना । विषय और जटिलता के आधार पर हृयुमन जिनोम प्रोजेक्ट को अणुबम निर्माण करने वाली मैनहटन प्रोजेक्ट अथवा चाँद पर मानव अवतरण परियोजना के स्तरों में शुमार किया जाता है । हृयुमन जिनोम प्रोजेक्ट से मानव डिएनए के प्रकृति के विषयों में काफी जानकारींंयां भी हासिल हर्इं हैं ।
मनुष्य के विकासक्रम की दर्ीघकालिक यात्रा में उत्परिवर्तर्नों को समेटने वाला एक आनुवंशिकीय जैव रसायनिक पदार्थ है डिएनए । मनुष्य के संपर्ूण्ा जिनोम में विद्यमान डिएनए का आधा-आधा सेट माता और पिता से आता है । वंशजों में उन में निहित गुण-दोष स्थानान्तरित होते जाते हैं, जिस में आनुवंशिक रोग भी शामिल होते हैं । आनुवंशिक रोगों को व्यक्ति की जीनोम की संरचना को विश्लेषण करके जानेे जा सकते हैं । कभी-कभार अचानक होने वाले उत्परिवर्तर्नों ९ःगतबतष्यलक० या जीनों मे प्राकृतिक हेरफेर एवं हिरोशिमा और नागासाकी जैसे दर्ुघटनाओं से उत्पन्न रेडियोधर्मी विकिरणों के कारण भी जीनों में विकृति पैदा हो जाते हैंं । उक्त परिवर्तर्नों को परीक्षण विधि के तहत जीनवेत्ताओं ने विश्व के मानव आबादियों के डिएनए में पाए जाने वाले विशेष जीन चिहृनकों को पहचान कर वर्गीकृत किया है । इसेे ही जीनोग्रैफिक परियोजना कहते हैं, जो सन द्दण्ण्छ मंे शुरु हुआ था । इस परियोजना के तहत ये पता लगा कि विभिन्न मनुष्यों डिएनए मं एक फीसदी से भी कम का र्फक है । इतना ही नहीं जीनोग्रैफिक परियोजना के नतीजों से मनुष्यों का उद्गम स्थल अप्रिmका महाद्वीप से विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में पलायन के दौरान प्रयोग किए गए प्रवास-मार्गों और हमारे पर्ूवजों के विषय मे सूचना उपलब्ध होने के साथ विभिन्न वंशों के प्राचीन आनुवंशिक इतिहास का भी मुकम्मल ज्ञान हासिल भी किया जा सकता है । लिहाजा मानव-यत्न से डिएनए के माध्यम से विज्ञान को नई दिशाएं प्राप्त हर्ुइं और मानव शरीर रहस्यों के गर्त से बाहर आ रहा है ।
कम्प्यूटरविज्ञान एवं आणविक जीवविज्ञान के क्षेत्र में हो रहे तीव्र विकास के कारण जैव प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी भी समाहित होने का अनुमान वैज्ञानिकों ने किया है । डिएनए अणु में विद्युत तरंग प्रसारित करने के गुण विद्यमानता का तथ्य सामने आया है । मानव शरीर के बाल से ज्ञद्धद्धण्ण् गुणा कम व्यास के डिएनए अणु के प्रयोग से भविष्य में अति सूक्ष्म और तीव्र विद्युतीय उपकरणों मसलन, कम्प्यूटर चिप्स, ट्रांजिस्टर आदि के निर्माण होने लगेंगे । सन द्दण्द्दण् तक सिलिकन चिप्स के बजाय प्रयोगशालाओं में डिएनए अणुओं के प्रयोग होने की प्रबल सम्भावना है । डिएनए अणुओं प्रयुक्त कम्प्यूटर अति तेज होंगेें और गणित के दुरुह समस्याओं के समाधान भी कुछ ही घंटों में किए जा सकते हैं । डिएनए में आधारित माइक्रोप्रोसेसरों शल्यक्रिया में प्रयोग होने की उतनी ही सम्भावना है । किसी दिन इस तकनीक को विकसित कर के इंटरनेट में प्रयोग से एक मानव मस्तिष्क से दूसरे मानव मस्तिष्क तक विद्युतीय संकेतों के प्रसार में भी प्रयोग किया जा सकता है । यदि इस तकनीक को सफलता मिली तो मनुष्य सोच कर ही संवाद स्थापित कर सकेगा । दूसरे शब्दों में कहें तो टेलिपैथी का वैज्ञानिक रूप प्रकट हो सकता है ।

चेर्न्नई ::दिलों का धडकन बढाने वाला शहर

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

chennai-city-tourist-visiting-places_r1_c1कृतिक संपदा से भरपूर भारत का तमिलनाडु राज्य अपने जादर्इ सौर्न्दर्य से सैलानियों को मुग्ध करने वाला है । यहाँ आकर सैलानियों को सब कुछ देखने को मिलता है यानि दिलों की धडÞकनों को बढाने वाले समुद्र तट, बादलों से मिलने को आतुर पहाडियाँ और उन पहाडियों से गिरते झरने । वन्यजीवों का रोमांच क्या कम है – इसी तमिलनाडु की राजधानी है चेर्न्नई । जिसे दक्षिण का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है । केवल घछण् सालों में ही चेर्न्नई भारत के द्ध प्रमुख महानगरों में से एक के रुप में स्थापित हो गया है ।1693 इस्ट इंडिया कम्पनी के एजेंट डे और एन्ड्रयू ने विजयनगर के राजा से समुद्र के किनारे की कुछ जमीन लेकर कम्पनी के कार्य के लिए एक महल बनाया था । तब उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनके सपनों का शहर शोहरत के बुलंदियों को छु पायेगा ।
द्दण्ण् वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह शहर बंगाल की खाडी के दक्षिणी तट पर स्थित है और अन्य महानगरों से बिल्कुल अलग प्रतीत होता है । पहले इसे मद्रास के नाम से पुकारा जाता था पर ज्ञढढट में इसका नाम बदलकर चेर्न्नई कर दिया गया । यहाँ दक्षिण भारतीय कला संस्कृति, प्राचीन रीति रिवाजों एवं परम्पराओं के सहज दर्शन होते हैं क्योंकि यहाँ के लोगों का अपनी भाषा और संस्कृति से बहुत गहरा लगाव है । 4a32273002cd8f5e753c0026a
कैसे पहुँचे नेपाल से सबसे सुगम मार्ग है गोरखपुर से चेर्न्नई जाने वाली सुपरफास्ट ट्रेन । जिससे घट घंटा में आराम से चेर्न्नई पहुँचा जा सकता है । वैसे सडक मार्ग से भी चेर्न्नई भारत के सभी प्रमुख नगरों से जुडा है । वायुमार्ग से भी जाया जा सकता है ।
चेर्न्नई में खाने-पीने रहने की अच्छी व्यवस्था है । खाने-पीने की सामग्रियों में इडली-डोसा की प्रमुखता रहती है । साथ ही प्रत्येक खाने की थाली में केले का पत्ता बिछाना और नारियल की चटनी परोसना आम प्रचलन है । चेर्न्नई में अनेक दर्शनीय स्थल है जिसका दीदार किया जा सकता है ।
सेंट जार्ज किला सागर तट पर ज्ञटघढ-द्धण् में बना यह किला शहर के जन्म के रुप में भी माना जाता है । यह भव्य किला अंग्रेजों का दक्षिण भारत का मुख्यालय था । इसका नाम इंग्लैण्ड के महशूर संत सेंट जार्ज के नाम पर रखा गया है । यह किला औरंगजेब, मराठों और हैदरअली के अनेकों आक्रमणों को झेलते हुए आज भी शान से खडा है । इस किले में औजार, शस्त्र, सिक्के, कथई बौडल आदि संग्रहीत है । यहाँ सेंट मेरी चर्च भी है जो कि में बनाया गया था ।
मरीना बीच विश्व के दूसरे सबसे लम्बा समुद्र तट मरीना बीच है । बीच के रेतीले तट पर्यटकों को अपनी ओर खींचते है । बीच के साथ बनी पर्व मुख्यमंत्री एम.जी. आर और अन्नादुर्राई की समाधियाँ भी पर्यटकों के लिए आकर्षा का केन्द्र है । यहाँ स्वीमिंग के अलावा घुडसवारी, एक्वेरियम का आनंद लिया जा सकता है ।
इलियट बीजः चेर्न्नई के इस दूसरे खूबसूरत पर्यटन स्थल पर पर्यटक सुकून के कुछ पल गुजार सकते हैं । इसके एक ओर बेलकनी चर्च है और दूसरी ओर आस्थालक्ष्मी मंदिर, जिस की शिल्पकला अनूठी है । यहाँ दक्षिण भारतीय व्यंजनों का स्वाद लिया जा सकता है ।
एमजी एम डिजी वर्ल्ड यहाँ कई तरह के राइड्स बडों तथा बच्चों सभी के लिए उपलब्ध रहता है । मैरी लैण्ड में बच्चे अपने पसंदीदा कार्टर्चरित्रों से मिलते हैं ।
एमजी आर फिल्मसिटी तमिलनाडू सरकार द्वारा बनवाई गई फिल्मसिटी थोडÞे ही समय में चेर्न्नई आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षा का केन्द्र बन गई है । यहाँ पर फिल्मों की शुटिंग के अलावा कई स्थायी सेट और खूबसूरत लोकेशन है ।
वल्लुवर कोटरम यह प्रसिद्ध तमिल कवि और संत तिरुवल्लूवर की याद में बना यह स्मारक एक रथ की तरह बनाया गया है जिस का आकार मंदिर की तरह है । घघ मीटर लंबे रथ में संत तिरुवल्लुबर की प्रतिमा स्थापित है । कवि द्वारा रचित ग्रन्थ के ज्ञघघ अध्यायों का चित्रण भी प्रतिमा के नीचे देखने को मिलता है ।
क्रोकोडायल बैंक चेर्न्नई से महाबलीपुरम जाते हुए कोवलांग बीच भी पर्यटकों को भाता है । यहाँ से कुछ आगे क्रोकोडाइल बैंक भी घुमा जा सकता है । यहाँ द्ध हजार क्रोकोडायल को सुरक्षित रखा गया है ।
कपालीश्वर मंदिर यह मंदिर ड वीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजाओं द्वारा बनवाया गया था । यह मन्दिर गोपुरम द्रविडÞ वास्तुकला का नायाब नमूना है । इस मन्दिर में कई सुन्दर कलाकृतियाँ है जिसमें टघ न्यानमार संतो की कास्य प्रतिमाएँ देखने योग्य है ।
पैथियोन कांप्लेक्स इस कांप्लेक्स में गवर्नमेंट म्यूजियम, नेशनल आर्ट गैलरी और कनेमारा पुस्तकालय है । यहाँ के संग्रहालय में दक्षिण भारतीय शैली में बनी कास्य प्रतिमाओं का दर्ुलभ संग्रह है । नेशनल आर्ट गैलरी में ज्ञट वीं और ज्ञड वीं शताब्दी की राजस्थानी और मुगल शैली के चित्र आदि देखा जा सकता है ।
बिडला तारामंडल कोटटपुरम स्थित यह तारामंडल देश का सबसे आधुनिक तारामंडल है । यहाँ पर पर्ूण्ातः कंप्यूटरीकृत एक प्रोजेक्ट है जिसके द्वारा एक गोलार्द्ध में बने गुंबद में आकाश का नजारा देखा जा सकता है ।

अपने ही लगाये आग में जल रहा पाकिस्तान::रुचि सिंह

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

Ruchi Singhपाकिस्तान के बारे में आज सबसे बडा सच यह है कि “बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होय” । पाकिस्तान के कभी लाहौर कभी कराची, पेशावर, राजधानी इस्लामावाद आतंकी कार्यवाही से दहक रहा है । गोरिल्ला हमले और आत्मघाती बमों के धमाकों से अफरा-तफरी का माहौल बन गया है । दर्दात बेतुल्लाह मेहसूद के मारे जाने के बाद जो सेना खुश हो रही थी, वही इन लगातार हमलों से दबाब में आ गई दीख रही है । सच तो यह है कि पाकिस्तान की वही सेना जिसने दहशतगर्दों की फौज खडी की थी, आज खुद अपने निशाने पर है । आज उसी का परिणाम सामने आ रहा है कि पाकिस्तान को अपनी ही सरहदों के अंदर संपर्ण् युद्ध छेडना पडा है । पाकिस्तान की स्थापना का आंदोलन चलाते समय मोहम्मद अली जिन्ना यह भूल गए थे कि कौमें मुल्क से बनती है मजहब से नही । मजहब की आड में खेला गया खेल आखिर ऐसी ही परिणति में बदलता है । एक कथा है कि भगवान शंकर ने भस्मासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर वर दिया कि “जा जिसके सर पर तुम हाथ रखोगे वह भस्म हो जाएगा” भस्मासुर ऐसा वरदान पाकर निरंकुश हो गया और भगवान शंकर को ही भस्म करने दौड पडा ।

यह कथा आज पाकिस्तान के आतंकवादियों पर बखूबी लागू होती है । एक समय पाकिस्तान के फौजी अफसरानों ने फौजी ट्रेनिंग देकर आतंकवादियों को खडा किया था कश्मीर के नाम पर । लेकिन आज हालात यह है कि उन्हीं आतंकवादियों से घबडर्ई फौज को लोहा लेना पडÞ रहा है । साफ तौर पर कहा जा सकता है कि दहशतगर्दी से लहूलुहान पाकिस्तान आतंकवाद की आखिरी धूरी साबित हो रहा है ।
गौरतलब है कि कभी इसी पाकिस्तान ने अमेरिका के इशारे पर अफगानिस्तान से सोवियत सेना खदेडने के लिए तालिबान की मदद की थी । अमेरिका ने अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए को अफगानिस्तान में इस्लाम परस्त तत्वों की रुपए-पैसे हथियारों से मदद करने का वचन दिया था । सीआईए ने विश्व के विभिन्न देशों से हजारों सोवियत फौजों से लडने के लिए पाक-अफगान सीमा पर भेज दिए । बीसवीं सदी के सबसे बडे जिहाद के लिए ट्रांजिट पावर बन कर पाकिस्तान उभरा । 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं की वापसी के बाद खुद को इस क्षेत्र से अलग कर लिया । पाकिस्तानी मदरसों से जो जेहादी गए थे वही बाद में तालिबान सरकार की रीढÞ की हड्डी बने । पाकिस्तान को लेकर जो आशंकाएं थी वही सब एक-एक करके सामने आ रही है । आतंकियों के रोज ब रोज के हमलों ने पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवाल खडा करना शुरु कर दिया है ।
काबिलेगौर है कि पाकिस्तान वर्षों से इस्लामी उग्रवाद को पालता-पोसता आ रहा है । कश्मीर के लिए कश्मीर में आतंकवाद को पाकिस्तान ने हर तरह से मदद की । अमेरिकी रणनीतिज्ञो का मानना है कि इस्लामी उग्रवाद की जडें पाकिस्तान में ही है जब तक इन्हें जड से ध्वस्त नही कर दिया जाता, अफगानिस्तान में विजय हासिल करना नामुमकिन है । आज तालिबान सिर पर सवार है और इस्लामी निजाम के लिए सत्ता छोडÞने को कह रहा है । अफसोस यह है कि पाक बखूबी इन आतंकियों की चाल समझता है और उन्हें पालने की गहरी कीमत चुका रहा है । पेशावर में अब तक का सबसे बडा धमाका आतंकी कार्रवाई की तेरहवी घटना है । पेशावर की इस घटना के कुछ घंटे पहले ही अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पाक की “अत्यन्त महत्वपर्ण्” यात्रा पर रावलपिंडी पहुँची थी । सवाल यह पैदा हो चुका है कि क्या चरमपंथी अपने नामुराद कृत्य से अमेरिका को भी कोई सबक देना चाहते है – अमेरिका बेशक आधिकारिक तौर पर भले ही कभी मानने तो कभी खारिज करने के अपने शब्दों का जाल क्यों न बुनता रहे पर पाकिस्तान शुरु से ही अमेरिका की भारी मदद का उपयोग केवल आतंकवादी कार्रवाइयों को बढावा देने के लिए ही करता आया है । फिलवक्त तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ वजीरिस्तान में शुरु हुआ सैन्य अभियान जारी है । कडे प्रतिरोध के बावजूद पाक सेना का आँपरेशन “राह-ए-निजात” जारी है । पाकिस्तानी सेना तालिबान को तीन दिशाओं से घेरने के लिए बेशक आगे जरुर बढ रही है लेकिन आतंकवादियों द्वारा पांच अगस्त को अपने नेता बैतुल्लाह महसूद के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने का बदला लेने के लिए पाक में हमले पर हमले करवाए जा रहे हैं । दक्षिणी वजीरिस्तान में ज्ञछण्ण् विदेशी लडाकों समेत करीब दस हजार तालिबान लडाके मौजूद हैं । समझा जाता है कि पाक में हुए डण् फीसदी आतंकवादी हमलों में इसी क्षेत्र के उग्रवादियों का हाथ है । अच्छी बात यह है कि दहशतगर्दों को कुचलते हुए सेना आगे बढ रही है ।
गौरतलब है कि अमेरिका ने पाकिस्तानी जमीन पर सीधे हमलों की चेतावनी तक दे डाली थी । पाकिस्तानी जमीन पर अमेरिका के विशेष सैनिक दस्ते अघोषित रुप से हमले करते रहे हैं । चालकविहीन ड्रोन विमानों की बमबारी निरंतर चलती रही है । अमेरिका ने साफ शब्दों में कह दिया था कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर उग्रवादी गढों को समाप्त करने के लिए खुद कार्रवाई करें या अमेरिकी आक्रमण झेलने के लिए तैयार रहें । अमेरिकी हमलों से पाकिस्तान का दर्जा एक पराधीन देश से अधिक कुछ नही होता । लिहाजा उसके पास सैनिक अभियान छेडने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नही बचा था । सैनिक अभियान के उपरांत उग्रवादी पूरे पाकिस्तान में बिखर गये है या बीहड पहाडों में शरण ले बैठे हैं । आज पूरा पाकिस्तान आतंकवादी हमलों से जल रहा है । पाक सरकार इसे रोक पाने में अर्समर्थ और लाचार नजर आ रही है, पाकिस्तानी सैनिक प्रतिष्ठानों में भी कई ऐसे है जिन्हें उग्रवाद के साथ हमदर्दी है । पाक और अफगानिस्तान के जमीन पर तमाम तरह के आतंकवादी संगठन एकजुट हो गए हैं जो पूरे विश्व के लिए खतरा बनते जा रहे हंै । भारत, इराक, अफगानिस्तान और चीन के एक प्रांत में भी इस्लामी उग्रवाद की कडिया किसी न किसी रुप में पाक से जुडी होती है इरान पर आतंकवादी हमला करने वाला बलूय संगठन भी तालिबान से मिल गया है साथ ही चीन के इस्लामी उग्रवाद भी तालिबान के गले लग चुके हैं । पाकिस्तान के पंजाबी आतंकवादी संगठन जिनमे कश्मीर में आतंक फैलाने वाले संगठन भी शामिल है वह भी अपना तालमेल तालिबान के साथ मिला बैठे है । “अलकायदा और तालिबान अपने भर्ती के आधार का यूरोप और अमेरिका में विस्तार कर रहे हैं” इस लाईन की सूचना से दुनिया का बौखलाना स्वाभाविक है और चेत जाने के लिए खबरदार भी कर रही है । अलकायदा और तालिबान के जहरीले नाखून और पैने हो चुके है । अलकायदा ने जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका में सिर्फअपने अड्डे ही नही बनाए हं बल्कि वहाँ से युवकों को बरगला कर आतंकी प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान भी भेज रहा है ।
शिकागो निवासी डेविड कोलमैन हेडली और कनार्डाई नागरिक राणा की एफबीआई द्वारा गिरफ्तारी से यह तो साबित हो गया है कि दोनो पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम कर रहे थे । बहरहाल अमेरिका का आकलन है कि अगर अफगानिस्तान में कोई ढील बरती गई तो तालिबान को सत्ता में आने से रोकना मुश्किल हो जाएगा । पाकिस्तान भी इस्लामी उग्रवाद से नही बच पायेगा । इसके बावजूद भी कुछ ना-ना करते भी पाकिस्तान को दी जाने वाली द्द।घ अरब डाँलर की सैन्य सहायता को हरी झंडी दे डाली है । राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने पाकिस्तान को अरबों डाँलर की मदद करने वाले केरी लूगर विधेयक पर बिना किसी बदलाव के हस्ताक्षर कर दिए हैं । क्या अब अमेरिका विचार करेगा कि पाक के घरेलू हालात के लिए कौन, किस हद तक जिम्मेदार है – क्या खुद पाकिस्तान या अमेरिकी नीति – आतंकवाद के इस ढेर में उठती इस्लामी उग्रवाद से यह गंभीर प्रश्न भी उठता है कि पाकिस्तान के नाभिकीय हथियारों के नियंत्रण का क्या होगा – नाभिकीय हथियार भी पाकिस्तान के लिए बहुत भारी सावित हो रहे है । आतंकी हमले ऐसे ही चलते रहे तो पाक की फौज का मनोबल ना टूट जाए । दहशतगर्दों ने अपने जंग में अलकायदा, तालिबान, जैश ए मोहम्मद, लश्कर ए झांगवी जैसे दहशतगर्दों से हाथ मिला लिया है । इन जेहादियों का एक ही सपना है इस्लामावाद पर कब्जा और एटमी ताकत हथियाना ।
फिलवक्त हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं जिनके चलते भारत को चिंतित होना भी स्वाभाविक है । पाकिस्तान का टूटना एक एटमी ताकत का टूटना होगा । आतंकियों के हाथ पहुँचने पर पूरी दुनिया खतरें में पड जाएगी । उधर दहशतगर्दों ने तो घोषणा कर दी है कि पाक की सत्ता काबिज करने के बाद उनका अगला निशाना भारत है । भारत ने पाकिस्तान की गंभीर हालात को समझा है । पहली बार सेना और सरकार ने प्रकारांतर से तालिबान के खतरे को स्वीकारा है । रक्षामंत्री ए.के. एंटनी और थलसेना प्रमुख दीपक कपूर ने कहा कि यदि तालिबान ने भारत में विध्वंसक कार्रवाई की तो उसका मूँह तोड जवाब दिया जाएगा । लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि पूरे विश्व में एक बडी ताकत के रुप में उभर चुके अलकायदा और तालिबान से क्या अकेले निपटा जा सकेगा – आतंकवाद के इस गठजोड को पराजित करने के लिए अमेरिका और पाकिस्तान के सैनिक अभियान नाकाफी साबित होंगे । इनके खात्में के लिए एक साझा अंतर्रर्रीय अभियान अवश्यंभावी हो गया है । लिहाजा इस मिशन में देर करना उचित नही है । सभी देशों को मिलकर अलकायदा और तालिबान पर हमला बोलना ही होगा क्योंकि अपने ही पैदा किये संकट में फंसा पाकिस्तान पडोसी देशों के लिए भी खतरा पैदा कर चुका है । इसके मद्देनजर भारत के साथ-साथ अन्य पडोसी देशों को भी र्सतर्क ही नही बल्कि अपनी “समग्र सुरक्षा नीति” का पुनर्निर्माण करना होगा ।
बहरहाल यह तभी संभव होगा जब हम सूचनाएँ और आतंक निरोधी तकनीकों को साझा करके ही आदमखोर आतंकवाद से निजात पा सकेंगे वरना दायित्व में चूक से कही बहुत बडा खामियाजा पुनः भारत या अन्य पडÞोसी मुल्कों को उठाना न पड जाए । देखना होगा पाकिस्तान किस हद तक अपने इस जंग में खरा उतरता है – अब तो जरदारी की कार्यशैली का इम्तहान है कि वह अपने मुल्क को आतंकवाद से छुटकारा दिला पाते हैं या मकडे की जाल में उलझा कर रखते हैं ।

बढता क्षेत्रवाद भारत के लिए गंभीर खतरा::एम.के. प्रियदर्शी

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 2 COMMENTS

mk priya_r1_c1अनेकता में एकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध अपना देश भारतवर्तमान समय में संकट के दौर से गुजर रहा है । फिलहाल जो संकट देश के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने यक्ष प्रश्न बनकर खडा है उसके लिए भारत के पडोसी राष्ट्र या उन राष्ट्रों के शासक जिम्मेवार नहीं है । हाँ कुछ समस्याएँ पडोसी राष्ट्रों से भी है जैसे बंगलादेशी घूसपैठ, जाली नोटों की तस्करी, सीमा पार से चल रही आतंकी कारवायी एवं भारत-चीन सीमा पर चीन द्वारा हाल ही में उत्पन्न की गयी नई विवाद बगैरह ।
अभी जिस संकट के दौर से भारत गुजर रहा है वह है क्षेत्रवाद । देश में बढता क्षेत्रवाद अखण्ड भारत की परिकल्पना को खण्डित करता नजर आ रहा है । देश की आजादी के बाद भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने अथक प्रयास एवं सहयोगी भारतीय नेताओं के सहयोग से देश की करीब छह सौ से अधिक देशी रियासतों का विलय भरातीय संघ में कराया था । सरदार पटेल के मेहनत का ही परिणाम है कि आज भारत एक मजबूत राष्ट्र बना हुआ है । देशी रियासतों के विलय के बाद ही सरदर वल्लभभाई पटेल को “लौह पुरुष” की उपाधि दी गयी थी । एक वो जमाना था जब हमारे नेता देश की एकता-अखण्डता व सुरक्षा के लिए जान की बाजी लगा देते थे । पराधीन भारत को अंग्रेजों के चंगूल से मुक्त कराने के लिए न जाने कितने भारतीय वीरों ने देश हित में अपनी जान कर्ुबान कर दी थी फलतः आज हम एक आजाद पंक्षी की तरह आजाद भारत में एक आजाद नागरिक की हैसियत से रह रहे हैं । हमें जो आज आधिकार प्राप्त है वह हमारे पर्वजों के बनाये संविधान के कारण ही प्राप्त है । आज के नेताओं को तो अपने देश, समाज, जनता एवं शासन की कोई चिन्ता नही है । वोट की राजनीति में मशगूल हमारे नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए कब किस करवट बैठंगे इसका सहज अंदाजा लगाना मुश्किल है । आज दुनियाभर के सभी देश अपने आंतरिक संसाधनों को शसक्त कर सबल राष्ट्र बनने की होड में लगे हुए हैं । वही हमारे देश में हमारे कर्ण्र्ाार देश व देश के लोगों की चिन्ता छोडकर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाने में व्यस्त हैं ।
भारत देश के कश्मीर में कभी अलग राज्य की मांग होती है तो कभी पूर्वोत्तर के राज्य असम में कोई संगठन विभाजन की बात उठाता है । हमारे देश में राजनीतिक सोच का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि अब हमारे नेता राष्ट्रवाद के बदले क्षेत्रवाद को तरजीह दे रहे हैं । करीब एक वर्षपर्व से क्षेत्रवाद की बयार जरुरत से ज्यादा तेज हो गयी है । कभी मुर्ंबई में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा देने गये बिहारी छात्रों की पिर्टाई की जाती है तो कभी मराठी को मुद्दा बनाकर शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता बिहारियों एवं अन्य प्रदेश के वासियों के साथ बदसलूकी करते हैं । क्षेत्रवाद की आग में जल रहे इन्ही मराठी के ठेकेदारों ने पिछले महिनों एक बिहारी होनहार छात्र की हत्या कर दी थी । महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव मराठी के मुद्दे पर ही लडा था । महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा लगा था कि क्षेत्रवाद का मुद्दा अब ठंडा पड जाएगा । लेकिन महाराष्ट्र विधानसभा में हिन्दी में शपथ लेने पर मनसे विधायकों द्वारा हाल ही में सपा विधायक अबू आजमी पर जो हमला किया गया वह क्षेत्रवाद र्समर्थक नेताओं के बढते मनोबल का परिचायक है । क्षेत्रवाद की आग को भडकाने वाले नेताओं का मनोबल अगर यूँ ही बढÞता गया तो राष्ट्रवाद पर गंभीर संकट का बादल छा जाएगा । हम तारीफ करते हैं क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की जिन्होंने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए मुर्ंबई में हाल ही आयोजित पत्रकार सम्मेलन में यह जोर देकर कहा है कि हम मराठी जरुर हैं लेकिन सबसे पहले भारतीय हैं । हमे भारतीय होने पर गर्व है । सचिन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब मुर्ंबई में सपा विधायक के हिन्दी में शपथ लेने का मुद्दा शबाब पर है । हालांकि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सचिन तेंदुलकर के बयान का विरोध करते हुए शिवसेना के मुख्यपत्र सामना में लिखा है कि तेंदुलकर के बयान से मराठियों को दुःख पहुँचा है । हालांकि देश की सत्ताधारी कांग्रेस पाटी और मुख्य विपक्षी भाजपा ने सचिन के सूर में सूर मिलाया है ।
उधर पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने प्रदेश में एक सिमेन्ट कारखाना के उद्घाटन के क्रम में बिहारियों पर जो तीखे शब्दवाण छोडÞे उसने क्षेत्रवाद की आग में घी का काम किया । हाँ इतना जरुर हुआ कि विपक्ष में बैठे हमारे नेताओं को बोलने का एक नया बहाना मिल गया लेकिन देश की प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पाटी चुप्पी साधे रही क्योंकि मध्यप्रदेश में वह सत्ता में है । पाटी ने अपने वक्तव्य में घूमा-फिरा कर अपने ही मुख्यमंत्री का पक्ष लिया और कहा कि चौहान के वक्तव्य को तोड-मरोड कर पेश किया गया है । मुख्यमंत्री चौहान द्वारा बिहारियों के विरुद्ध की गयी टिप्पणी को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गंभीरता से लिया । उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि वे बिहारियों को काम नहीं देने की बात कर रहे हैं हम अगर मध्यप्रदेश निर्मित वस्तुओं की बिहार में बिक्री पर प्रतिबंध लगा दें तो किसका भला होगा । राजद नेता पर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव व लोजपा अध्यक्ष पर्व केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने भी चौहान के विरुद्ध कारवायी की मांग की । खैर इन नेताओं ने अलग-अलग बयान देकर अपने कर्तव्यों की इतीश्री कर ली ।
यहाँ सबसे बडी बात यह है कि केन्द्र सरकार और उस सरकार में बैठे लोग इस क्षेत्रवाद के मुद्दे पर कितने गंभीर हैं । इस मामले में ठोस पहल न तो प्रधानमंत्री डाँ. मनमोहन सिंह कर रहे हैं और न भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व जिसकी मध्यप्रदेश में सरकार है । आज जरुरत है क्षेत्रवाद को बढावा देने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता को समाप्त करने की । यह काम तो चुनाव आयोग का है क्योंकि राजनीतिक दलों को चुनाव लडने की मान्यता वही प्रदान करता है । हाँ वैसे नेता जो अपने वक्तव्यों के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रवाद का जहर घोल रहे हैं उनके चुनाव लडने पर भी प्रतिबंध लगाना होगा । यहाँ सुप्रीम कोर्ट की भी भूमिका महत्वपर्ण् हो जाती है । क्षेत्रवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना होगा । वैसे नेताओं को कटघरे में खडा करना होगा । अन्यथा क्षेत्रवाद की तेज आग में हमारा अखण्ड देश भारत धू-धू कर जल उठेगा और एक ही देश के नागरिक होकर हम एक दूसरे भाषा-भाषी और प्रदेशों में रहनेवाले लोगों के दुश्मन बन जायेंगे ।

राक्षसी प्रवृत्ति और कोपेन हेगन::योगेन्द्र प्रसाद साह

Posted by Himalini On November - 29 - 2009 ADD COMMENTS

yogen_r1_c1नवम्बर 5, 2009 को अमेरिका में एक हादसा हो गया । 9/11 की घटना के बाद अमेरिकनों को इस हादसा ने झकझोर कर रख दिया है । मनोरोग चिकित्सक मेजर मिडाल मल्लिक हसन ने 12 गोरे अमेरिकन सैनिकों को बन्दूक की गोलियों से छलनी कर दिया और 20 सैनिक घायल हैं । टेक्सास राज्य की पोर्ट हुड की इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, “जल्दबाजी में हम कोई निष्कर्षनिकालकर अपनी राय व्यक्त न करें । जाँच से निष्कर्षनिकाल कर हम आगे की सोचेंगे ।”
अमेरिकी सरकार की विश्व की जनता के प्रति मालिकाना अन्दाज और घृणा के व्यवहार से उपजी यह घटना इराकी और अफगानी जंग की वैधता पर सवाल उठाने की गरज से भी हो सकती है या धार्मिक कट्टरपंथ को जायज मान कर भी हो सकतीहै । अगर मेजर मिडाल मल्लिक हसन ने मानसिक रोगी के रुप में भी इस घटना को अन्जाम दिया है, तब भी यह विचारणीय विषय होगा कि अफगानिस्तान में बरात में शामिल होने वाले बरातियों के नरसंहार जैसे अनेक हत्याकांडों से विक्षिप्त बनकर मेजर हसन ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया है अथवा यह अन्य कारणों से सचमुच में मानसिक रोगी था । अगर मेजर सचमुच में मानसिक रोगी था तब वह कार्यरत क्यों रखा गया था -
जिस दिन अमेरिकी सरकार ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम का प्रहार करके पलक झपकते ही लाखों लोगों का नर संहार किया था उसी दिन से अमेरिकी जनता पर राक्षसी दम्भ की शुरुआत हुयी थी । हिरोशिमा और नागासाकी महाविनाश में अपनी गलती का एहसास करने की बात तो दूर रही उल्टे एटम बम बनाकर देनेवाली यहूदी वैज्ञानिक ओपेन डियर द्वारा नरसंहार का विरोध करने पर उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया था । हिटलर से प्राण रक्षा के लिये भागे हुए जर्मन यहूदी वैज्ञानिकों ने अगर रुस को अणुबम बनाकर नहीं दिया होता तब विश्व की जनता अमेरिकी कैदखानों से कभी फर्ुसत नहीं पा सकती थी । 1945 के कुछ वर्षों बाद अणुबम के नाम पर ही रुस ने साम्यवाद फैलाने की हडकते तेज कर दी थी वहीं अमेरिका ने प्रजातंत्र की दुहाई देकर तीसरी दुनियाँ के देशों में जबरन तानाशाही हुकुमतों को प्रतिस्थापित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोडी । हिन्दू कट्टरपंथी धर्म के चलते मुसलमान और अंग्रेज भारत को कुचलने में सफल रहे – उसी प्रकार के इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण अमेरिका मुस्लिम जगत को रौंदने में सफल रहा है । अंग्रेज निर्मित पाकिस्तान के जियो-पोलिटिकल अस्तित्व के कारण आज भारत, चीन, मध्य एशिया के देश, अफगानिस्तान और इरान अमेरिकी सेनाओं से घिरते जा रहे हैं । अगर इराक और अफगानिस्तान में मानवीय क्षति और त्रासदी देखकर मेजर निडाल मल्लिक हसन ने यह बरदात किया है तब इतिहास उनके पक्ष में जायेगा । किन्तु इस्लाम धर्म के चौदह सौ वर्षपहले के धार्मिक प्रसार के विध्वंस पर गौरव गाथा लिखने की कोशिश होगी तब इस पृथ्वी ग्रह की मुसीबतें बढती जायेगी ।
विश्व धर्म एक है । बाकी धर्म सम्प्रदाय है । इसी शब्द से साम्प्रदायिकता का विकास होकर मनुष्य जाति नरक लोक का र्सगर्व निर्माण करती रही है । धर्म का उदय मनुष्य के सामाजिक आचार संहिता के प्राकृतिक रुप में उद्भव से सम्बन्धित प्रश्न रहा है । चेतनशील युक्त मनुष्य जगत ने अपने मानवीय गुणों का संयोजन करते हुए, मृत्युलोक के दुःखों से निजात पाने के लिए, आपसी सहयोग की भावना, त्याग, तप, प्रेम और भाईचारा का सिद्धान्त गढा है । निराशा और कुंठा को आशा में बदलने हेतु आध्यात्मिक आधार की कल्पना करकर्र् इश्वर की सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया है । सुखी जीवन के लिए प्राणदायिनी आधार स्तम्भ के रुप में स्थापितर् इश्वर को हमने अपने अनियंत्रित इच्छा आकांक्षाओं की लगाम उन के हाथों में थमा दिया है । साम्प्रदायिकता से अभ्रि्रेरित धर्म भटकाव और टकराव की राहें खोलता रहा है । मनुवादी धर्म की तेजधार अब मोथडा हो चुकी है । किन्त इर्साई धर्म और इस्लाम धर्म की राजनीतिकरण से इनके बीच विध्वंसपर्ण् झगडों का आकार ग्रहण करता रहा है ।र्इर्साई धर्म की अगुवाई अमेरिका करता रहा है । इस्लामिक जेहादी सउदी अरब की अगुवाई में पनपा है । एटम बम का अधिकारी होने के बाद पाकिस्तान इस्लामिक विश्व के नेता के रुप में स्थापित होने के लिए संर्घष्रत है । दर्भाग्य से एक ठिकेदार सबसे धनी और शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका है, दूसरा भीखमंगा राष्ट्र पाकिस्तान है । अमेरिकी प्रभर्ुर् इसा का अनुयायी होने के बावजूद अपने पर्ूवजों को नहीं भूले हैं । अपनी संस्कृति, रहन सहन, भाषा को यथावत रखते हुर्एर् इर्साई धर्मावलम्बी धर्म का प्रयोग अपने अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक हितों में करते रहे हैं । वहीं इस्लामिक कट्टरपंथी अमेरिकी छत्रछायाँ में पलकर चौदहर सौ वर्षपहले की अरबी संरचना का विश्व के इस्लामिक देशों पर हिंसा और धार्मिक सत्ता के बल पर लादने के प्रयास में, अपने समुदाय को भीषण द्वन्द्व की स्थिति में रखने की राह का सृजन कर रहे हैं । विदेशी भाषा और संस्कृति लादने की जेहादी हरकतों से अलकायदा ने इस्लाम धर्म के भीतर ही महाभारत की रचना कर दी है । पाकिस्तान के पर्व राष्ट्रपति परवेज मर्शर्रफ ने अपने शासनकाल में इस्लामावाद की 200 उल्लेमाओं की मीटिंग में कहा था – 18 वर्षों के उम्र के बाद ही धर्म की शिक्षा देनी चाहिए ताकि धर्म का अर्थ समझ में आ सके । उन्होंने दृढतापर्ूवक कहा था – विदेशी भाषा और संस्कृति को हम धर्म के नाम पर पाकिस्तान पर नहीं लाद सकते ।
विश्व धर्म अविभाज्य है । इसमें विभाजन आते ही मनुष्य के दुःखों का जो सिलसिला शुरु हुआ था वह आजतक निरंतर जारी है । सम्प्रदाय से साम्प्रदायिकता और अन्त में जातीय सोच में अटककर या भटककर ही जर्मनी ने जातीय उन्माद की तुष्टि के लिये दो विश्ययुद्धों को जन्म दिया था । मनुवादी जातीय संरचना के कारण भारत दो हजार वर्षों तक पराधिन रहा । नेपाल में उच्चजातीय दम्भ के कारण ही पर्यावरण विनाश के साथ वंश विनाश की स्थिति है । मुसलमान आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान और भारतीय कच्छ क्षेत्रों का जंगल विनाश करके मरुभूमि में परिणत कर दिया था । जब हिंसा का सहारा लेकर धर्म या जातीय दम्भ प्रकट होता है तब कालान्तर में जाकर हिंसक समाज का निर्माण हो जाता है । हिंसक समाज की सोच राक्षसी प्रवृत्ति की हो जाती है । पाकिस्तानी पहले आतंकवादी बनकर काश्मिर और अफगानिस्तान में लडते रहे और अब अपने ही घर में गृहयुद्ध में संलग्न होकर गर्व महसूस कर रहे हैं । नेपाल का खसवादी दम्भ गृहयुद्ध का आकार लेकर अपने घर की बर्बादी में जुटा है । वसुधैवः कुटुम्बकम् की सोच के अभाव में अमेरिकी कांग्रेस के बहुमत सदस्यों की धारणा है कि पृथ्वी लोक रहे न रहे – वे लोग अपने इण्डस्ट्रीज की कीमत पर पर्यावरण की रक्षा में योगदान नहीं देंगे । अभी हाल में ही भारत दौरे पर आए स्वीडीस प्रधानमंत्री ने इस राज को खोला है कि कोपेन गेहन बैठक को निष्प्रभावी बनाने का खेल अमेरिका शुरु कर चुका है ।
नेपाल में वन विनाश तेजी से जारी है । इसी कारण यहाँ का प्राकृतिक संतुलन बिगड चुका है । नेपाल सरकार बन विनाश की चर्चा भी सुनना नहीं चाहती है – वह तो एवरेस्ट पर बर्फन होने का रोना रोने के पर्ूवाभ्यास में लगी है ताकि कोपेन हेगन में चीख-चीख कर रोये और एवरेस्ट पर बर्फजमने के बहाने डाँलर मांगने में सफल हो सके । पृथ्वी कही जल रही है – कही बाढ में डुबी है और कहीं आँधी की विनाशलीला झेल रही है । किन्तु पृथ्वी को बचाने वाले सत्ताधारियों की सोच पर राक्षसी प्रवृत्ति इस कदर हावी है कि पृथ्वी रहे न रहे उनकी भोगवादी व्यवस्था पर अंकुश न लगे । हम रोज मन्दिर, मस्जिद और चर्च में जाते हैं । किन्तु हमर् इश्वर की संरचना पृथ्वीलोक को समाप्त करने में लगे है । क्या यहर् इश्वर भक्ति है – क्या सारी दुनिया नास्तिक और राक्षसी प्रवृत्ति की हो चुकी है । पृथ्वी नहीं रहेगी तब जीवधारी कहाँ रहेंगे – कलकारखाने कहाँ चलेंगे – कट्टरपंथी धर्म कहाँ रहेगा – जातीय दम्भ कहाँ प्रकट होगा – निर्ण्र्कोपेन हेगन में होगा ।

मधेश तर्राई फोरम का उदयः लक्ष्मीनारायण चौधरी

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

laxmi narayan chau_r1_c1इस राजनीतिक संगठन की स्थापना मधेश-तर्राई समेत अन्य समुदाय में राज्य द्वारा किये जाने वाले विभेद के विरुद्ध अधिकार प्राप्ति और मधेश-पहाड-हिमाल को एकसूत्र में बाँधर सियासी मतभेद मिटाते हुए नयाँ नेपाल, जो सम्पर्ण् नेपाली का हो, की अभिभारा लेते हुए किया गया है । अभीतक मधेशी, आदिवासी, जनजाति, मुसलमान, दलित, पिछड वर्ग समेत सम्पर्ूण्ा समुदाय और पेशागत संघ संगठन ने देश में आमूल परिवर्तन के लिए जनआन्दोलन करने के बावजूद आन्दोलन का सम्झौता और संशोधन के रुप में यहाँ के प्रमुख राजनीतिक पार्टर्ीीे रुपान्तरण करके अपनी निजी स्वार्थ पर्र्ति के लिए खसवादी जातीय बाहुल्यता का संविधान बार-बार निर्माण किया । मधेश जनव्रि्रोह के बाद वर्षों से आन्तरिक गुलामी कर रहे मधेश और पहाड के आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं दलित अधिकार मिलने की आशा करते थे, लेकिन मधेशी दल चाहे वह मधेश जनव्रि्रोह का पथ पर््रदर्शक मधेशी जनअधिकार फोरम हो या तर्राई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर् सद्भावना । सब मधेशी मतों और मधेशवाद का दोहन करके शहीद के शहादत का उपहास करके संविधानसभा में पहुँच तो गए मगर जिस मुद्दा को लेकर जनता की आवाज बनकर आए थे, उसी को सत्ता के लोभ और भ्रष्टाचार में डूबा गए ।
न्यायप्रेमी जनता और सम्पर्ण् शहीदों के कुरबानी का स्मरण करते हुए “मधेश तर्राई फोरम” का स्थापना किया गया ताकि जो विश्वास मधेशी दल खो दिये है, उस विश्वास को फिर से मधेशी जनता में जगाया जाए । देश में आत्म निर्ण्र्का अधिकार सहित मधेशी का राष्ट्रीय पहाचन, स्वायत्त प्रदेश की स्थापना, भाविक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता देश के सम्पर्ूण्ा अंग में चाहे वह सेना हो या प्रशासनिक या न्यायिक जनसंख्या के आधार पर संलग्नता संवैधानिक जनगणना, देश में जारी सामाजिक उत्पीडन, आर्थिक असमानता और विभेद का अन्त करते हुए सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित सब के लिए समान अधिकार, अवसर सहित विभेद रहित सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना इस संगठन का लक्ष्य है । जो अभी मधेशी दल सत्ता के प्रभुत्व को स्वीकारते हुए आपस में फुटकर जनता के सपनों का, विश्वास और मधेश की पहचान ही मिटाने में लगे हुए हैं । इस परिवेश में मधेश तर्राई फोरम एक होकर मधेशी जनता का विश्वास हासिल कर एक मजबूत शक्ति के रुप में उभर रहा है । हमारा लडर्Þाई सिर्फसमान हक, अधिकार, भाषिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता, पहचान और स्वाभिमान के लिए है । इसके लिए हम चरणवद्ध रुपमें अहिंसात्मक, बन्द रहित आन्दोलन करेंगे और इसका श्री गणेश किया गया है ।

विद्यापति त्यौहार के नाम पर::डी.जे. मैथिल

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

dj maithil_r1_c1र्तिक धवल त्रयोदसी से ही मिथिला विभूति महाकवि विद्यापति ठाकुर के संस्मरण में ‘विद्यापति त्यौहार’ पर नेपाल-भारत समेत अन्य राष्ट्रों में भी समारोह आयोजित होती है । हालांकि उनके जन्मतिथि पर विद्वानों में मतभेद है, शायद इसीलिए उनकी देहावसान तिथि ही मनाने की परम्परा रही है । हर साल यह त्यौहार बडे धूमधाम से मनाया जाता है । इस साल भी 31 अक्टुबर और 12नवम्बर अर्थात् कार्तिक 15,16 और 17 गते विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रमों का आयोजन हुआ । इसमें जनकपुर, दरभंगा और पटना के आयोजनों को देखने का अवसर भी मिला । इसी त्यौहार पर गणतंत्र नेपाल के प्रथम उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने भी अपनी मनोभावना और कथा व्यथा जनता के सामने खुलकर व्यक्त किया । नेपाल के सर्वोच्च अदालत के पर्वाग्रही निर्ण्र्को उन्होंने चुनौती भी दिया है । उन्होंने यह भी कहा कि सरकार में इतना दम है तो महाभियोग लगाकर देखें । निर्वाचित उपराष्ट्रपति ‘हिन्दी भाषा में शपथ ग्रहण’ को दलीय स्वार्थ के जाल में फँसकर सर्वोच्च न्यायालय के विश्वसनीयता पर कीचड फेंकने का आरोप भी उन्होंने लगाया ।
विद्यापति राधाकृष्ण युवा समिति जनकपुरधाम द्वारा आयोजित विद्यापति त्यौहार के अवसर पर उपराष्ट्रपति ने खुलकर अपनी बात जनता के सामने रखा । इसी अवसर पर उनका युवा समिति विद्यापति चौक, जनकपुर बौद्धिक वर्ग समाज द्वारा अभिनन्दन भी किया गया । जनकपुर में उपराष्ट्रपति के स्वागत और अभिनन्दन समारोह में जनमानस को भारी सख्या में उपस्थिति देखकर नेपाल सरकार को घबराहट हो गयी । उपराष्ट्रपति नेपाल राष्ट्र बैंक के गेष्ट हाउस में ठहरे हुये थे । वे पत्रकार सम्मेलन करना चाहते थे पर दर्ुभाग्य पत्रकार सम्मेलन को भी सरकार ने प्रतिबन्ध लगाकर अपनी निरंकुश प्रवृत्ति का उजागर कर दिया । स्मरणीय है, विद्यापति सिर्फकवि ही नही वे र्सवगुण सम्पन्न देवरुपी महामानव थे । गीत संगीत, नाट्य, राजनीति, कूटनीति, धर्म-संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान थे । इनके भक्तिभाव से प्रभावित होकर भगवान महादेव ने भी ‘ऊगना’ नाम के मानव वेश में इनके घर में नौकर बनकर काम किया था । इनके भक्तिभाव से प्रभावित होकर गंगा नदी भी इनके घर के समीप से ही बहने लगी ।
संस्कृत, मैथिली, भोजपुरी, हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली समेत दर्जनों भाषा में इनकी दर्जनों कृतियाँ प्रकाशित और अप्रकाशित है । इन्ही की ‘पुरुष परीक्षा’ नामक पुस्तक पढÞकर राजा शिवासिंह अपना राज्य चलाते थे । एक बार राजा शिवासिंह किसी दूसरे राज्य के शासक द्वारा बन्धक बनाये गये थे तो विद्यापति ने ही अपनी कवित्व शक्ति से उन्हें मुक्त कराया था । महाकवि विद्यापति की अद्भुत प्रतिभा और कृति पर अभी भी अन्तर्रर्ाा्रीय जगत में खोज जारी है । काठमांडू के अभिलेखालय तथा अमेरिका के एक पुस्तकालय में अभी भी उनकी महत्वपर्ूण्ा कृतियाँ विद्यमान है । विद्यापति त्यौहार के पावन अवसर पर विद्यापति सेवा संस्थान दरभंगा और चेतना समिति पटना ने भी समारोह का आयोजन किया था । उक्त दोनों संस्थानों द्वारा दरभंगा स्थित लक्ष्मीश्वर सिंह मेमोरियल महाविद्यालय परिसर में त्रिदिवसीय समारोह आयोजन हुआ था । संस्थान के अध्यक्ष पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमर की अध्यक्षता तथा महासचिव डाँ. वैद्यनाथ चौधरी ‘वैजू’ के विशेष व्यवस्थापन में कवि गोष्ठी, विचार गोष्ठी और रंगारंग कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । विद्यानाथ झा विनीत की अध्यक्षता में सम्पन्न कवि गोष्ठी में भारत से आर.के. रमण, रामलोचन ठाकुर, डाँ. भीमनाथ झा, चन्दे्रश, प्रा. चन्द्रमोहन झा, जयप्रकाश जनक, अर्जुन कविराज, शैलेन्द्र आनन्द, फूलचन्द्र झा प्रवीण, वुचरु पासवान और नेपाल से डाँ. रेवतीरमण लाल, डी.जे. मैथिल ने कविता वाचन किया ।
इसी तरह चेतना समिति पटना द्वारा भी त्रिदिवसीय समारोह आयोजित किया गया जिसका उद्घाटन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया । कविगोष्ठी और विचारगोष्ठी में नेपाल से आए डाँ. पशुपति नाथ झा और साहित्यकार रामभरोस कापडिÞ भ्रमर की विशेष सहभागिता रही ।

मधेश और मधेशी पत्रकार::आर.सी. यादव

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

rc yadavचार और संचार जगत, पत्रिका और पत्रकार जगत, इन दोनों को मिलाकर इन दोनों जगहों पर काम करने वालों को मूल रुप में पत्रकार कहा गया है । पत्रकार का सम्बन्ध देखा जाए तो विशेष करके आम जनता से जुडा होता है । वे जनता को कभी सूचित करते हैं तो कभी सचेत कराते हैं । इनका काम एक संवेदनशील काम होता है । आम जनता इन्ही पर विश्वास करती है । लेकिन आजकल पत्रकारिता एक तरह से ऐसे दलदल में फंसती जा रही है कि उसको उस जगह से निकलना काफी मुश्किल हो जाएगा । पत्रकार और पत्रिका दोनों को लोग शंका की दृष्टि से देखने लगे हैं । कारण आजकल ऐसे बहुत से पत्रकार हैं जो नाम के लिए पत्रकार हैं । उनका मूल रुप से किसी पत्रिका से संबंध है न मूल रुप से किसी संचार क्षेत्र से । है भी तो न उनका इस विषय से कोई सम्बन्ध है न कोई उस जगह पर पहुँचने की हैसियत । फिर भी वे पत्रकार हैं । आप सोच रहे होंगे ऐसे लोग कैसे पत्रकार हैं और कहां है – तो आपको कहीं दूर जाने की जरुरत नही है । नेपाल के अन्दर ही ऐसे पत्रकारों से आप मिल सकते हैं । मधेश और मधेशियों के लिए काम का नही ऐसे ही पत्रकार लोग ढेÞर सारे आपको मिल जाएंगे । उनका अपना अलग-अलग संघ और संगठन भी है पत्रपत्रिका भी चलाते हैं । हम आपके साथ हैं, कहने के लिए प्रेस विज्ञप्ति भी कभी-कभी जारी करते हैं, दिखावा के लिए भले ही कोई और संचार जगत पत्रकारिता उसे बोले या ना बोले छापे या ना छापे फिर भी वे आपके लिए काम करते हैं । समझ ही गए होंगे – जी हाँ मैं आपसे यह कहना चाहुँगा कि उनको दूसरे संवेदनशील पत्रकार पर ना कभी विश्वास हुआ ना कभी उनकी बातों को वे माने न कभी उन्हें अपने साथ रखा । तो आप पर अन्य मीडिया कैसे विश्वास करेगा – बहुत बार यह आवाज आम जनता से आती है । यह पत्रकार, यह पत्रिका इस राजनीतिक दल के पिछलग्गू है तो कभी-कभी यह आरोप लग जाता है कि यह इस राजनीतिक दल का भातृ संगठन है । जब ऐसे है मधेश और मधेश के पत्रकार तो, उनपर आम जनता कैसे विश्वास करे ।
इनमें से कुछ ऐसे मधेशी पत्रकार भी हंै जो अपने समाज और देश के लिए कुछ भी कर रहे हैं और फिर भी संघ-संगठन चलाने वाले पत्रकार लोग इन पर विश्वास नही करते । इनसे दूर भागना चाहते हैं, कारण एक ही हो सकता है वे इनका भण्डाफोड ना कर दें । मधेश और मधेशी पत्रकार के रुप में इनकी हैसियत क्या है – सारी बात आम जनता के सामने आ जाएगी । कुछ ऐसे पत्रकारों का कहना है कि वे लोग हमारे संगठन में आकर भी कुछ काम नहीं करते, मैं उन पत्रकारों से एक सवाल करना चाहूँगा कि राजनीतिक दल के पीछे-पीछे चलना उनसे पैसे लेकर उनका चमचागिरी करना ही पत्रकारिता है तो ऐसे मधेशी पत्रकार बनकर रहने से अच्छा है कि हम स्वतंत्र पत्रकार ही रहें । आपको कुछ काम मधेश के लिए करना है तो उनकी आवश्यकता के उपर आप सदैव बहस करें । कलम चलाएँ, इसके बाद ही आपको एक सच्चा मधेशी पत्रकार माना जाएगा । आज मधेश और मधेशी पत्रकार के रुप में विभिन्न राजनीतिक दल से जुडा एक जमात खडा है । वे कहने के लिए पत्रिका चलाते हैं । संगठन भी चलाते हैं । लेकिन न वे कुछ मधेश के लिए करते हैं न कुछ मधेशियों लिए वे करते हैं तो वे सिर्फराजनीतिक दल के लिए काम करते हैं । हम उनसे आग्रह करना चाहेंगे कि आप अपने दिल पर हाथ रखकर सोचें और सच्चे मधेशी पत्रकार बनने की कोशिश करें । नहीं तो आने वाले दिनों में आपकी हैसियत आम जनता के समक्ष आ जाएगी । आप का नकाब उतर जाएगा । एक कहावत है, ‘धोबी का कुत्ता न घर का, न घाट का’ । ऐसा समय नही आए । यही मेरर्ीर् इश्वर से पर््रार्थना रहेगी ।

असफल हो रहा संयुक्त राष्ट्र संघ::अरुण ठकुरी

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

arun thakuri वास्तविकता आर्श्चर्य पैदा करती है कि ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ जिसे प्रारम्भिक दौर में संयुक्त राष्ट्र या लीग अफ नेशन्स के नाम से जाना जाता था उसकी परिकल्पना र्सवप्रथम पस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने की थी । जब वह और उसके सैनिक एक-एक करके यूरोप के राष्ट्रों को रौंद रहे थे तब नेपोलियन कहता था – यूरोप एक राज्य है, एक इकाई है जहा“ एक ही कानून और सरकार होनी चाहिए और मैं यूरोप के सभी राष्ट्रों को मिलाकर एक कर दू“गा ।’ सत्ता को अपनी रखैल समझने वाले पस के कोर्सिका टापू के निवासी नेपोलियन सन् ज्ञडज्ञद्द में रुस पर चढर्ई करने के निर्ण्र्के बाद अलोकप्रिय होने लगा और सन् ज्ञडज्ञद्ध में तंग आकर उसने प|स की गद्दी छोड दी । बाद में घटित घटनाक्रम के आधार पर उसे ‘यूरोप का कैदी’ मानकर सेन्ट हेलेना द्वीप में कैद कर लिया गया । विजय के दिनों में ‘यदि आकाश गिरा तो हम उसे भालों की नोक पर रोक लेंगे’ कहने वाले नेपोलियन का सेन्ट हेलेना की निर्जन कैद में दिमाग ठिकाने पर आया तो वह विचार उसके दिमाग में अधिक विशाल रुप में पैदा हुआ – कभी न कभी घटनाचक्र के बल पर यह मेल -राष्ट्रसंघ का) होगा, पहला धक्का लग चुका है और मुझे लगता है कि मेरी प्रणाली का अन्त होने के बाद यूरोप में सन्तुलन कायम करने का कोई रास्ता है तो वह राष्ट्रों के संघ द्वारा है ।’ नेपोलियन के युद्धों के बाद नेपोलियन की परिकल्पना को रुस के जार एलेक्जेण्डर प्रथम ने अलग ढंग से प्रस्तुत किया । अलेक्जेण्डर प्रथम ने बाद मेर्ंर् इसाइ शक्तियों के बीच पवित्र मैत्री संगठन की योजना प्रस्तुत की थी ।
राष्ट्रसंघ की आधारभूत परिकल्पना करीब दो शताब्दी लम्बी यात्रा तय करने जा रही है । बीते दो सौ सालों में संयुक्त राष्ट्रसंघ की आवश्यकता और इसके पवित्र एवं न्यायपर्ूण्ा उद्देश्यों की सफलता के लिए सम्पर्ूण्ा मानवता जितनी आशा एवं शुभेच्छा रखती है, उसकी सोच पर संयुक्त राष्ट्रसंघ आज तक खरा नहीं उतर पाया है । इस संस्था का इतिहास कितना विवादास्पद रहा है इसका अनुमान फिलिप स्नाउडन -जो बाद में इंग्लैण्ड का मंत्री भी बना) की टिप्पणी से लिया जा सकता है । अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के दिमाग की उपज जिसे विल्सन ने ‘वार्सर्ाान्धि’ द्वारा दुनिया के पेश किया, के बारे में स्नाउडन लिखते हैं -
ँयह सन्धि -वार्सर्न्धि) लुटेरों, साम्राज्यवादियों एवं फौजी पेशा लोगों को राजी कर देगी लेकिन जो इस इन्तजार में थे कि युद्ध का अन्त होने पर अमन चैन कायम होगा, उनकी आशाओं का इस सन्धि ने गला घोंट दिया है । यह अमन की सन्धि न होकर दूसरे युद्ध की घोषणा है । यह लोकतंत्र और युद्ध के शहीदों के साथ विश्वासघात है, इस सन्धि ने मित्र राष्ट्रों की असली नियत को उघाडÞ कर रख दिया है ।’
अन्ततः ज्ञज्ञ नवम्बर ज्ञढज्ञड के दिन ‘विल्सोनियन थ्यौरी’ के आधार पर प्रथम महायुद्ध का अन्त हो गया । लेकिन ‘चौदह शतोर्ं’ वाली उक्त सन्धि को शक्तिशाली राष्ट्रों ने ताक पर रख दिया । और फिलिप स्नाउडन के अनुसार दूसरे महायुद्ध की तैयारियाँ होने लगी । संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘विल्सोनियन थ्यौरी’ न तो दूसरे महायुद्ध को रोक पाई न आज तक यह शक्तिशाली राष्ट्रों की स्वार्थ की रोटी बनने से मुक्त हो पाई है । संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रथम महासचिव ली के मुताबिक – ँसंयुक्त राष्ट्रसंघ महान शक्ति के विवादों को सुलझाने में अर्समर्थ है ।’
संयुक्त राष्ट्रसंघ की वर्तमान संरचना सन् ज्ञढघढ अगस्त में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल एवं अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट की न्यू फाउण्डलैण्ड दीप के नजदीक अटलाण्टिक महासागर में जलपोत में हर्ुइ मुलाकात में तय हर्ुइ परिणाम स्वरुप ‘अटलाण्टिक अधिकार पत्र’ निकला जिसमें आठ सिद्धांत थे । कुछ समय बाद अर्थात् ज्ञढद्धद्द में द्दट राष्ट्रों ने वाशिंगटन में संयुक्त राष्ट्रसंघ की उद्घोषण पर दस्तखत किए । आज संयुक्त राष्ट्रसंघ के झण्डे के नीचे ज्ञढद्द राष्ट्र हैं लेकिन ज्ञज्ञ राष्ट्र अभी भी संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य नही है जिनमें स्वीटजरलैंड भी है ।
संयुक्त राष्ट्रसंघ का इतिहास जितना विवादास्पद रहा है, आधारभूत रुप में उसका आधुनिक कालखंड भी उस विवाद से मुक्त नही हो सका है । महान शक्तियों के स्वार्थ के आगे दीन-हीन भाव प्रस्तुत करने वाला संयुक्त राष्ट्रसंघ आज सुरक्षा परिषद एवं सेना की व्यवस्था के साथ सम्पन्न दिखता है लेकिन तीव्र असहमति के बावजूद इराक पर आक्रमण करने के अमेरिकी निर्ण्र्ााऔर अमेरिका निर्ण्र्का साथ देने वाली शक्तिशाली सेना के आगे संयुक्त राष्ट्रसंघ निरीह दिखा । अमेरिकी द्वारा अफगानिस्तान में छेडÞे गए आतंकवाद विरुद्ध की लडर्ई में हो रहे मानव अधिकार विरुद्ध की घटनाओं के प्रति संयुक्त राष्ट्रसंघ उदासीन बैठा है । वास्तव में स्थिति सन् ज्ञढघछ के समय की जैसी ही है जब पचास से अधिक राष्ट्रों की असहमति के बावजूद इटली ने अवीसीनिया पर आक्रमण कर दिया । एक तरफ रोम-वर्लिन-टोकियो एलायन्स और दूसरी तरफ इंग्लैण्ड-प|mान्स-रुस सहमति पर मित्रराष्ट्र की मान्यता का जन्म हो गया तो दूसरे युद्ध का आधार साफ-साफ नजर आने लगा यह ऐसा समय खण्ड था जब संयुक्त राष्ट्रसंघ को दीवालिया समझा जाने लगा ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभव और ‘एटलाण्टिक घोषणा पत्र’ ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को अभूतपर्ूव रुप में सुदृढÞ तो कर दिया लेकिन कुछ ही वर्षों में महान शक्तियों के बीच बढÞती असहमति एवं शक्ति के ध्रुवीकरण की अवस्था में अपने हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से असंलग्न आन्दोलन का गठन हो गया । अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच उत्पन्न शीतयुद्ध से खुद को दूर रखने का असंलग्न आन्दोलन का प्रयास संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुँह पर तमाचा था । लेकिन सोवियत विघटन के बाद एक ध्रुवीय संरचना में असंलग्न आन्दोलन कमजोर हुआ तो संयुक्त राष्ट्रसंघ भी अपने उद्देश्यों से इतर विश्व में उत्पन्न हो रहे आन्तरिक द्वन्द्व, व्रि्रोह जैसे किसी देश के नितान्त आन्तरिक मामलों में टाँग अडÞाकर अपने अस्तित्व को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है । लेकिन इस मामले में संयुक्त राष्ट्रसंघ के पास किसी भी प्रकार की नीति एवं कार्ययोजना का नितान्त अभाव है । फलस्वरुप द्वन्द्व और व्रि्रोह के आन्तरिक मामलों में संयुक्त राष्ट्रसंघ का शान्ति प्रयास पर्ूण्ातः असफल रहा है ।
लैटिन अमेरिका एवं अप|mीका में शान्ति प्रयासों की असफलता के बावजूद नेपाल में मूलधार के राजनीतिक दलों एवं माओवादी व्रि्रोही के बीच राजनीतिक सहमति के बावजूद संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा अनमिन के नाम पर मध्यस्थकर्ता की भूमिका के साथ नेपाल के आन्तरिम मामले में टांग अडÞाना गलत था इसका प्रमाण अनमिन के क्रियाकलाप के कारण उत्पन्न हो रहे विवादों से लिया जा सकता है । माओवादी लडाकू के साढÞे तीन हजार हथियारों की संख्या के आंकडÞों पर विश्वास कर उतनी ही संख्या में नेपाली सेना के हथियारों को कन्टेनर में बन्द करके उसका खर्चीला अनुगमन करने का अनमिन का निर्ण्र्हास्यास्पद है । यह वास्तव में अनमिन की क्षमता ही नही उसकी नियत के ऊपर प्रश्नचिन्ह है कि अनमिन शान्ति प्रक्रिया को सकारात्मक निष्कर्षमें पहुँचाना चाहता है अथवा नेपाल के माओवादी द्वन्द्व के साथ-साथ अन्य मुद्दों जैसे जातीय, जनजाति, भाषिक को उठाकर उलझे वातावरण में अपनी वृत्ति एवं सुविधा की रक्षा करना चाहता है – सबसे अहम प्रश्न यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के आवासीय प्रतिनिधि एवं आधारभूत सुविधा से सम्पन्न कार्यालय की उपस्थिति के बावजूद किन विशेष कारणों से अममिन को नेपाल भेजा गया -
स्थापना के शुरुआती दिनों से ही अनमिन की भूमिका विवादास्पद रही है । पर्ूव अनमिन प्रमुख इयान मार्टिन ने अपने व्यक्तिगत विचारों और आस्था को नेपाल के आन्तरिक मामले में घुसाने का प्रयास किया । अनमिन अपनेे प्राप्त मेन्डेट से बाहर जाकर इयान मार्टिन मधेशी, सीमान्तकृत, दलित एवं जाति-जनजाति के मामलों मे संलग्न दिखा । यह बड आर्श्चर्य की बात है कि इयान मार्टिन के नेतृत्व वाला अनमिन एच.आई.भी. एड्स जैसे विषय को नेपाल की शान्ति प्रक्रिया के साथ कैसे जोडÞ सकता है – लेकिन अनमिन एच.आई.भी. एड्स जैसे विषय पर कार्यरत दिखा । मार्टिन की उत्तराधिकारी करीन लेनग्रेन के कार्यकाल में तो संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा नेपाल की सरकार कैसी होनी चाहिए कौन-कौन दल सरकार में होने चाहिए जैसे निर्देश दिए जाने लगे है । हालांकि नेपाल सरकार के विरोध के बाद घुमावरे शब्दों में महासचिव मुन द्वारा क्षमा-याचना की गई ।
यह तो स्पष्ट है कि नेपाल के मामलों में संयुक्त राष्ट्रसंघ अनमिन की नजरों से देखता है और उसके पास अनमिन की रिपोर्ट पढÞने और उसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नही है । क्योंकि आन्तरिक द्वन्द्व के मामलों में न तो संयुक्त राष्ट्रसंघ की कोई स्पष्ट नीति है न कोई सुदृढÞ कार्ययोजना और अनुभव ही । वास्तव में न तो यह संयुक्त राष्ट्रसंघ का वास्तविक कार्य क्षेत्र ही है । लेकिन इसका अर्थ क्या यह है कि अपनी वृत्ति और सुविधा के पक्ष में कोई सनकी व्यक्ति अनमिन प्रमुख बनकर संयुक्त राष्ट्रसंघ को रिपोर्ट भेजता है तो उसकी सनकपर्ण् आस्था वाली रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्रसंघ की नीति बनेगी – पर्ूव अनमिन प्रमुख मार्टिन समाजवादी मान्यता में विश्वास रखता था और उसका विद्यार्थी जीवन ‘आइरिश रिपब्लिकन आर्मी’ के साथ सम्बद्ध था यही कारण था कि मार्टिन के कार्यकाल में नेपाल के कम्युनिष्टों को आवश्यकता से अधिक शंका का लाभ दिया गया । यद्यपि इसके पीछे यूरोप के सुदृढÞ हो रहे समाजवादी पक्ष का प्रत्यक्ष योगदान है । और वर्तमान कालखंड का संयुक्त राष्ट्रसंघ आजतक मित्रशक्ति एवर्ंर् इसाइ शक्ति के बीच पवित्र गठबन्धन के एलेक्जेण्डर प्रथम की मान्यता से मुक्त नही हो पाया है ।
यूरोप का संयुक्त राष्ट्रसंघ में वर्चस्व एवं यूरोप की समाजवादी तुष्टि के कारण नेपाल ही नहीं विश्व में समाजवाद हावी हो रहा है । चूँकि समाजवाद साम्यवाद का प्रवेश मार्ग है इसलिए संयुक्त राष्ट्र में चीन एवं यूरोप के बीच मुद्दों में सहमति दिखती है । यूरोप का यह व्यवहार उसकी अपनी आवश्यकता है क्योंकि दुनिया को तकनीकी बेचने वाला यूरोप आगामी द्दछ वर्षों में एशिया से पीछे पडÞने वाला है । तब के लिए यूरोप को सहयोगी की चिन्ता है जो उसे चीन के नजदीक ला रही है । यूरोपियन यूनियन एवं विश्व बैंक के आर्थिक सहयोग पर चलने वाली संस्था ‘इन्टरनेशनल क्राइसिस ग्रुप’ की नेपाल रिपोर्ट में माओवादियों को करो या मरो कहकर उकसाने का काम और नेपाली सेना के उच्च अधिकारी के पारिवारिक मामलों को रिपोर्ट बनाकर राज्यपक्ष को नीचा दिखाने का काम कहीं न कहीं मित्रराष्ट्र के स्वार्थ की रक्षा कर रहा है ।
रुस के जार एलेक्जेण्डर प्रथम कर्ीर् इसाइ शक्ति के बीच पवित्र गठबन्धन की अवधारणा एवं फिलिप स्नाउडन की टिप्पणी के रास्ते पर चल रहा संयुक्त राष्ट्रसंघ विश्व के सबसे बडÞे साम्यवादी चीन के साथ जो पेंगें बढÞा रहा है उसका कारण सवा अरब चीन की जनसंख्या है जिन्हें आसानी से क्रिश्चियन बनाया जा सकता है जबकि यह सम्भावना एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले विश्व के सबसे बडÞे लोकतांत्रिक राष्ट्र में बिल्कुल नहीं है । शायद यही कारण है कि नेपाल कोर् इसाइयत का प्रवेश मार्ग बनाया गया है । संयुक्त राष्ट्रसंघ का सेकुलरिज्म यूरोपियन क्रिश्चियन द्वारा फैलाए जा रहे ‘क्रिश्चियन सेकुलरिज्म’ का ही षडयन्त्र है । नेपाल का हो या कहीं का हो आन्तरिक द्वन्द्व तो सिर्फबहाना है । वास्तव में संयुक्त राष्ट्रसंघ नेपोलियन बोनापार्ट एवं एलेक्जेण्डर प्रथम की परिकल्पना का ही पालन करता है । निर्धन-कमजोर राष्ट्र तो संयुक्त राष्ट्रसंघ के दर्शक मात्र है । क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद् का गठन न्यायोचित है – भाषा एवं वीटो पावर का प्रावधान किस लोकतान्त्रिक मान्यता पर आधारित है -

मधेश के पिछडेपन का कारण राजनीतिक अस्थिरता::रामभरोस कापडि भ्रमर

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

ramvarosपतिदिन राजनीतिक दलों की बैठक, धमकी, आग्रह और आन्दोलन से फिर नेपाली जनता परेशान हो रही है । कहीं कोई निकास नहीं दिखता है । सत्ता के गलियारे में पायदान के खोज में भटक रहे राजनेता गण नेपाली जनता के नखरों से दूर होने का स्वतः स्फूर्त कवायद में व्यस्त है । सत्य बात एक ही है- नेपाल में यदि राजनीतिक उपलब्धि को संस्थागत करने कार् इमानदार प्रयास यदि कोई दल कर रहा है तो वह एकीकृत नेकपा माओवादी है । उसका अपना एजेण्डा तय है । जनयुद्ध की समाप्ति और १२ बुँदे सहमति के बाद संविधान सभा का निर्वाचन, संसद में धमाकेदार उपस्थिति की रणनीति और फिर सत्ता पर काबिज हो नीति निर्माण से लेकर जनयुद्ध के लडाकुओं का सेना में समायोजन उनका लक्षित उद्देश्य रहा है और इसके लिये पाटी के सभी नेतागण, आपसी असहमति व असन्तुष्टि के बाबजूद भी, ऐक्यबद्ध होकर अपने लक्ष्य प्राप्ति में लगे हैं । नागरिक सर्वोच्चता का स्थापन, राष्ट्रपति क कदम का विरोध, संसद अवरोध व अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की कवायद, मैं समझता हूँ सब एक सोची समझी रणनीति के अर्न्तर्गत किया जा रहा है । और उस खेल में नेपाली काँग्रेस लगायत के दल उलझ कर रह गये हैं ।
संसद सर्वोच्च है, पर निकास दे सकने में कोई भी सक्षम नहीं हो पा रहा है । सडक आन्दोलन में माओवादी पाटी आ चुकी है । दोनो तरफ से वाद-विवाद चल रहा है । नेपाल के उपप्रधानमन्त्री विजयकुमार गच्छेदार ने विराटनगर में पत्रकारों से बातचित करते हुए कहा कि – सदन में अल्पमत के मांग को तरजीह देने वाले सभामुखको अब बहुमत के स्वर का भी सम्बोधन करना होगा । अर्थात् उनका कथन स्पष्ट है जब अल्पमत के एनेकपा माओवादी के हल्ला व नारेवाजी से सदन रोका जा सकता है तो सदन के बहुमत सदस्य की भावनाओं को सभामुख क्यो ‘नोटिस’ नहीं करेंगे – मतलब साफ है- सदन चलाना होगा, वह चाहे मार्सल के प्रयोग करके हो, अथवा बहुमत के आधार पर बजट पास करके हो ।
संसद अवरुद्ध की धूरी में घूम रहा अबका नेपाल व उसके राजनेतागण पर्ूण्ातः भूल गये कि अब जल्दी ही संविधान निर्माण नहीं हुआ तो सचमूच की दर्ुघटना हो सकती है । समय कम है और संसदीय समिति में हो रहा छलफल व विमर्श के अतिरिक्त सरकारी स्तर पर कहीं भी सर्वोच्च नागरिक को यह जानकारी नहीं दे पा रहे हैं कि हम कहाँ है ! हम क्यों निर्धारित समय पर संविधान बना पाने में अर्समर्थ हैं । इस से एक अनिश्चितता बढÞती है, लोग दिन प्रति दिन निराश हो रहे हैं । बहुत से लोग पर्ूव के दिनों का स्मरण कर वर्तमान से कटा-कटा सा महसूस करने लगे हैं । यह लोकतन्त्र, गणतन्त्र के लिय अच्छा सन्देश नहीं है ।
जन आन्दोलन करने वाले लोकतन्त्र व गणतन्त्र की उपलब्धि को भले ही समेट न सकें हों, मधेश आन्दोलन के नीतिकार लोग अभी भी उपलब्धि की प्रतीक्षा कर रहे हैं । कुछेक लोगों का मन्त्रीमण्डल में जाना, न जाना समग्र उद्देश्य प्राप्ति के लिय कोई मायने नहीं रखता । उपलब्धि तो तब होगी जब नयाँ संविधान बने और उसमें संघीय राज्य संरचना मर्ूत रूप ले । मधेश आन्दोलन का एक मात्र निर्धारित लक्ष्य था- संघीय लोकतान्त्रिक राज्य के रूप में नेपालका नयाँ स्वरूप । और वह तभी संभव हो सकता है, जब नयाँ संविधान बन सकेगा । जिसका अभी कोई अता-पता नहीं है ।
एमाओवादी लडाकुओं का तत्क्षण समायोजन व पुनर्स्थापन नहीं किया गया तो न संविधान बनेगा न मधेशी अपना अधिकार ही पा सकते हैं । नेपाली कांग्रेस जैसी लोकतान्त्रिक पाटी भी अभी चूक रही है । बैठक में राष्ट्रपति के कदम के विरुद्ध एक अनुच्छेद तक सहमति पत्र में नहीं रखने का अडान लेती आ रही है, पर उसी बात को आम जनता के बीच पहुँचाने में हिचक रही है । यदि एकीकृत नेकपा माओवादी का अडान गलत है तो उसके गलतियों को जनता के सामने रखने में हर्ज क्या है – अनावश्यक रूप से राष्ट्रपति को मानसिक तनाव में रखने का क्या वजह हो सकता है । २२ दल अपनी भूमिका को संसदीय समिति तक क्यो संकुचित कर आत्मसुख की अनुभूति कर रहे हैं । यदि उसने राष्ट्रपति को प्रधानसेनापति हटाने का तत्कालीन सरकार के निर्ण्र्को तत्काल रोकने का सुझाव दिया था, तो उसके र्समर्थन में नेपाली जनता के बीच जाकर कहने में कोताही क्यों – संसद अवरुद्ध की इस दुखद अवस्था के निराकरण के प्रति राजनेता गम्भीर क्यों नहीं हो पा रहे हैं !
जब तक स्थिति ऐसी बनी रहेगी तो न समय पर संविधान बनेगा और न मधेशी जनता अपना ही अधिकार प्राप्त कर सकेगी । संघीय नेपाल के प्रान्तीय संरचना का सभी माँडल महज कागज में लिखे रह जायेंगे, हम फिर से उन्हीं परम्परावादी सोच वालों के थपेडÞे सहते रहने पर विवश हो जायेंगे । तब हम खुद से प्रश्न करेंगे इतने संघर्षों के वाद भी हमें क्या मिला ! क्या हमें फिर से माघ घ की तरफ लौटना पड सकता है – यदि ऐसा हुआ तो यह किसी के लिये भी सहज नहीं हो सकता । हमें इस पर गम्भीरता से सोचने की जरुरत है ।
राजनेता अभी भी सोचें । एकीकृत नेकपा माओवादी द्वारा संचालित आन्दोलन महज सत्ता प्राप्ति के लिये नहीं है, बल्कि लक्ष्य की तरफ बढÞने से आयी रुकावट को दूर करने के लिये है, जो मैं समझता हूँ पार्टर्ीीहत में सकारात्मक कदम है । हां, यह अन्य दलों के लिये, समय सीमा में बंधा संविधान निर्माण प्रक्रिया के हित में नहीं भी हो सकता है । इसका खामियाजा हमे भुगतना है । आन्दोलनों का दौर महज कुछेक नये चेहरे को रंगमंच पर लाने के सिवा कुछ और होता नजर नहीं आता । मन्त्रीपरिषद की बैठक और उसमें सुरक्षा के तीनों निकायों को र्सतर्क रहने की हिदायत का समाचार बाहर आने पर देश का एक बडा वर्ग जहां प्रसन्नता व्यक्त करने लगा है, वहीं इसे लोकतन्त्र, गणतन्त्र व संघीय संरचना के साथ नयाँ संविधान के स्वास्थ्य के लिय कदापि उचित नहीं माना जा सकता । इन महारथियों को डरना चाहिये । सहमति के साथ नयाँ संविधान बनाने में जुट जाना चाहिये । विगत के असहमतियों को शब्दों के जाल में न लपेटकर सीधे तरीके से आपसी वार्ता द्वारा निराकरण कर संसद को सुचारु करें, बजट पारित करें और अन्य राजनीतिक मुद्दों को निपटाकर जनभावनाओं को पूणता प्रदान करने की कोशिश करें ।

सुर्सा के मुह के भाती बेरोजगारी::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 1 COMMENT

veenajiदेश अजीबो-गरीब भंवर जाल मेंफँसा हुआ है । राजतंत्र की बिदाई और गणतंत्र की स्थापना के पश्चात् देश में अमन चैन स्थापित होने का सपना दिवास्वप्न बनता जा रहा है । र्सवत्र अशांति और अराजकता का बोलवाला घटने के बजाय बढÞता ही जा रहा है । देश की इस राजनीतिक अस्थिरता ने देश के श्रमशक्ति पलायन को और भी तीव्र कर दिया है । न्यून आर्थिक वृद्धिदर और उच्च जनसंख्या वृद्धि नेपाली अर्थतंत्र की विशेषता बन गयी है । इस वजह से देश में रोजगार पाना आम नेपाली के लिए मृगतृष्णा जैसी होती जा रही है । जीने के लिए रोजगार अपरिहार्य है और रोजगार सृजन करने तथा देश में बेरोजगारी दर घटाने की प्रवृत्ति न तो विगत की सरकारों में देखने को मिली और न ही वर्तमान सरकार में ।
नेपाल में रोजगार में रहनेवाले व्यक्तियों की संख्या आर्थिक वर्ष 2055-56 में 94 लाख हजार 63 थी वही नौ साल वाद2064-65में श्रम शक्ति र्सर्वेक्षण तथ्यांक के अनुसार एक करोड 17 लाख 79 हजार हो गयी । 15 वर्षया उससे ऊपर के जनसंख्या के रोजगार का अनुपात डद्ध।घ से घटकर डज्ञ।ठ हो गया । एक सप्ताह में एक घंटा भी काम नहीं करने वाले ज्ञछ वर्षसे ऊपर के व्यक्तियों की जनसंख्या दो लाख छघ हजार है जबकि पिछले र्सर्वेक्षण में यह संख्या एक लाख ठड हजार मात्र थी । नौ वर्षकी अवधि में ज्ञ।ड प्रतिशत बेरोजगारी दर से द्द।ज्ञ प्रतिशत पहुँच गयी है । जबकि ड।ज्ञ प्रतिशत काम करने के पश्चात् पर्याप्त कमा नहीं पाते है । ज्ञघ।द्द प्रतिशत लोग शिक्षा तथा दक्षता के बावजूद काम नहीं पाते है ।
शहरी क्षेत्र में श्रम का अल्प उपयोग दर उच्च है । एक र्सर्वेक्षण के अनुसार शहरी क्षेत्र में करीब छण् प्रतिशत काम करने के बावजूद श्रम का अल्प उपयोग ही कर पाता है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह दर द्दठ प्रतिशत है । श्रम का अल्प उपयोग दर महिला से ज्यादा पुरुषों में है । रोजगार महिलाओं में से द्दघ प्रतिशत का ही अल्प श्रम उपयोग होता है जबकि पुरुषों में यह दर घड प्रतिशत है । अर्थतंत्र में इसे ‘छिपा बेरोजगार’ कहा जाता है जिसे अर्थतंत्र में अच्छा नही माना जाता है । नेपाली युवा श्रम “दरिया के पानी” जैसा है । जो एक बार बह गया तो फिर वापस नहीं आता । युवाओं में ‘छिपी बेरोजगारी’ का दर उच्च है । द्दण् से द्दद्ध वर्षकी उम्र श्रमशक्ति की दृष्टि से सबसे उर्वर मानी जाती है । उस उम्र में हमारे देश के युवाओं के श्रमशक्ति का अल्प उपयोग ही हो पा रहा है । इसका प्रतिशत द्धट है । जबकि उम्र बढने के साथ ही कार्यक्षमता भी घटती जाती है । द्दछ से द्दढ वर्षके श्रम उपयोग का दर घढ प्रतिशत और घण् से घद्ध वर्षमें यह दर घज्ञ प्रतिशत है । ऐसी स्थिति में आर्थिक दृष्टि से एक मजबूत एवं सबल राष्ट्र का सपना सपना ही रह जायेगा ।
वर्ष 2050-56 में जहाँ नेपाल में कृषि पर ठट प्रतिशत व्यक्ति निर्भर थे वही नौ वर्षबाद ठघ।ढ प्रतिशत व्यक्ति की निर्भरता कृषि कार्यों में है जबकि गैर कृषि क्षेत्र में इस समय द्दद्ध प्रतिशत व्यक्ति निर्भर है जबकि पिछले र्सर्वेक्षण में यह द्दट।ज्ञ प्रतिशत था । अमेरिका में मात्र द्ध प्रतिशत व्यक्तियों की कृषि पर निर्भरता है । कृषि पर निर्भरता का कम होना एक अच्छा संकेत है लेकिन इसके साथ ही गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार का दायरा भी बढÞता तो बेहतर होता लेकिन द्दण्टछ-टट के र्सर्वेक्षण के अनुसार औपचारिक गैर कृषि क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तियों की प्रतिशत ठघ से घटकर ठण् हो गयी है ।
किसी भी देश के आर्थिक-सामाजिक विकास के लिए महिला तथा पुरुषों की सहभागिता समान रुप से होना जरुरी है । लेकिन हमारासमाज पुरुष प्रधान समाज है । घर-परिवार तथा समाज की जिम्मेदारी पुरुषों के कंधों पर ही रहनी चाहिए यह आम धारणा है । महिलाओं की स्थिति काफी खराब रही है । उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता रहा है । घर के चार दीवारी के भीतर ही कार्य करने और अपना सारा जीवन बिताना पडÞ रहा है लेकिन र्सर्वेक्षण बतलाते हैं कि नौ वर्षके अवधि में नेपाल में इसमें काफी परिवर्तन आया है । जहाँ आर्थिक वर्षद्दण्छछ-छट में मात्र ज्ञद्ध प्रतिशत परिवार में महिला घर की पर्ूण्ा जिम्मेदारी सम्भाली थी वहीं द्दण्टछ-टट में द्दद्द प्रतिशत महिला सम्भाल रही है । लेकिन इसका कारण द्वन्द्व और अन्य बजहों से पुरुष सदस्यों द्वारा घर छोडÞने के कारण यह जिम्मेदारी उन पर आ पडÞी है । दस वर्षके द्वन्द्व एवं अशांति ने हजारों पुरुषों की जान ली है और इसी प्रकार बडÞी संख्या में पुरुषों का देश से पलायन भी हुआ है उसी के परिणाम स्वरुप यह आंकडÞा सामने आया है ।
र्सर्वेक्षण के अनुसार करीब घघ प्रतिशत व्यक्ति अपने रहने का स्थान छोडÞकर अन्य जगहों पर अर्थात् गाविस में रहता है तो नगरपालिका में और नगरपालिका में रहता है तो विदेश जरुर जाता है । इसमें ठट प्रतिशत गाँवों में शहर में, ज्ञघ प्रतिशत शहर से दूसरे शहर में और ज्ञज्ञ प्रतिशत देश से बाहर जाते हैं । यह आँकडÞा देश की जटिल एवं विषम होती स्थिति का संकेत कराती है । बेरोजगारी एक संवेदनशील विषय है । गरीबों का जीने का आधार ही रोजगार है इतना ही नही उत्पादन का महत्वपर्ूण्ा साधन भी श्रम ही है इसको संजोये बिना किसी भी राष्ट्र का कल्याण नहीं है । आज देश की बहुत बडÞी युवा श्रमशक्ति रोजगार के अभाव में वैदेशिक रोजगार की ओर भाग रही है । घर छोडÞने वालों में से छज्ञ प्रतिशत विदेश में, द्धड प्रतिशत स्वदेश में और एक प्रतिशत की स्थिति अज्ञात है । देश की युवा श्रमशक्ति को अपना और अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी की जुगाडÞ करने के लिए विदेश की ओर पलायन करना पडÞ रहा है । यद्यपि आर्थिक वर्षद्दण्टछ-टट की शुरुआती महीनों में औसत मासिक ज्ञछ अरब ठद्द करोडÞ रुपया सप्ताह में घ अरब टघ करोडÞ और दैनिक छद्द करोडÞ रुपया व्रि्रेषण नेपाल के अन्दर आ रहा है । यह सही है कि विदेशी रोजगार के माध्यम से विदेशी मुद्रा देश में आती रही है लेकिन यह बेरोजगारी का दर्ीघकालीन समाधान नहीं है । विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने वैदेशिक रोजगार को भी प्रभावित किया है । आए दिन विदेशों से नेपाली कामदारों के ठगी, मृत्यु आदि की खबरें आ रही है फिर भी देश की बिगडÞी हर्ुइ राजनीतिक आर्थिक स्थिति के कारण विदेश पलायन कम होने के बजाय तीव्र ही हो रहा है ।
प्रश्न उठता है कि नीति निर्माण तह में बैठे अफसरशाहियों में कब अक्ल आयेगी कि “सुरसा की मुँह की भाँति” बढÞती बेरोजगारी की समस्या को वे गंभीरतापर्ूवक लेंगे और प्राथमिकता के आधार पर इस समस्या के समाधान का उपाय निकालेंगे ।
उत्पादन का महत्वपर्ूण्ा साधन श्रम है, विकास के लिए भी काम जरुरी है और विनाश के लिए भी । रोजगारी का अपना आर्थिक एवं सामाजिक महत्व है । रोजगार के माध्यम से एक व्यक्ति सहजपर्ूवक अपना एवं अपने पर निर्भर परिवार का जीवन निर्वाह कर समाज में सम्मानपर्ूवक एवं मर्यादापर्ूवक जीवन बिता सकता है । विदेशों में अशिक्षित एवं शिक्षित दोनों ही प्रकार के युवा श्रम शक्ति को पलायन से रोकने के लिए दर्ीघकालीन ठोस रोजगार की योजनाओं का निर्माण करना अत्यन्त जरुरी है । कहावत है, ‘खाली दिमाग शैतान का घर” होता है । अगर व्यक्ति के पास करने को कोई कार्य नही रहेगा तो वह अपने श्रमशक्ति को विनाश की ओर लगायेगा । अशांति, अस्थिरता और अराजकता की स्थिति आज जो देश के राजनीतिक सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त है उसके मूल में भी मुख्य बेरोजगारी की समस्या ही है । विभिन्न राजनीतिक दल एवं आपराधिक समूह, अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु इन बेरोजगार युवकों को पथभ्रमित कर अराजक एवं अपराधिक कार्यों में संलग्न कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं । अपहरण, जुलूस, धरना, बन्द के बहाने इन युवा श्रमशक्ति को आए दिन सडकों पर उतारा जा रहा है और देश की शांति एवं सुव्यवस्था की स्थिति जटिल से जटिलतम बनती जा रहा है ।
आज देश में बेरोजगारी तथा अल्प बेरोजगारी की चुनौती भी है और अवसर भी । आज जरुरत है कि देश में उद्योगधंधों की संख्या बढÞाकर देश के भीतर रोजगार सृजन किया जाए, इसके लिए सरकारी तथा गैर सरकारी दोनों क्षेत्रों मेर्ंर् इमानदारी पर्ूवक पहल करने की आवश्यकता है । नेपाली अप्रवासियों तथा विदेशी उद्योगपतियों को देश के भीतर रोजगार सृजन करने हेतु उपयुक्त वातावरण तथा जगह दिया जायें साथ ही देश में उपलब्ध संसाधनों के उचित इस्तेमाल हेतु राष्ट्रीय नीति तैयार की जाये तभी इस विकराल होती समस्या का समाधान सम्भव हो सकेगा ।

ना ना अभी नही ?:: रुचि सिंह

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

ल ही में भारत आये अपनी व्यक्तिगत यात्रा लेकिन विभिन्न राजनीतिक नेताओं से मिले मधेशी जनाधिकार फोरम के नेता उपेन्द्र यादव का कहना है कि नेपाल का वही नेता सबसे ज्यादा मजे करता है जो भारत को सबसे ज्यादा गालियाँ देता है । यह परंपरा राजा के जमाने से ही चली आ रही है । खुद को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए ही भारत के खिलाफ बोला जाता है । उपेन्द्र यादव के अलावा सत्तारुढ दल एमाले नेता झलनाथ खनाल भी दिल्ली में डेरा डाले हुए थे । इनकी भारत में सरकार तथा अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ nov_11_09_Jhalnath_Airport_b_r1_c1मुलाकातें हर्इ है । उपेन्द्र यादव ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह, जेडीयू के शरद यादव के अलावा विदेश मंत्री एम. एम. कृष्णा, विदेश सचिव निरुपमा राव से मुलाकात की । मुलाकात का हवाला देते हुए उपेन्द्र यादव ने बताया कि उन्होंने जिन-जिन नेताओं से मुलाकात की है सबने उन्हें सलाह दी है कि वह मौजूदा सरकार में शामिल हो जाए लेकिन उन्होंने स्पष्ट रुप से मना कर दिया है कि वह इस वक्त सरकार में शामिल होना नहीं चाहेंगे सो उन्होंने सभी को ना कह दिया है । एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने भी सरकार और राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकात की है । इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मुलाकात की है । चीनी मानसिकता की पहल करने वाले झलनाथ खनाल को भारत के महत्व का पता चल गया है । वह समझ गए हैं कि भारत से दूरी बनाए रखना एमाले के नेताओं के लिए शायद उचित न हो । हालाँकि नेपाल के मौजूदा हालात में भारत की भूमिका पर यादव ने कहा कि भारत को नेपाल का मामला नौकरशाहों के जिम्मे छोडÞने के बजाय नेपाल के नेताओं के साथ राजनीतिक संवाद बढना चाहिए ।
नई दिल्ली से रुचि सिंह

एवरेस्ट पर चीन का कसता शिकंजा::श्रीमन नारायण

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

srimannarayanमाउण्ट एवरेस्टको नेपाल में सगरमाथा कहा जाता है । माउण्ट एवरेस्ट नेपाल का है यह विश्वव्यापी रुप में स्थापित सत्य है । चीन का मानना है कि एवरेस्ट का उत्तरी हिस्सा पहले चीन का था लिहाज इसे चीन के अधीन ही होना चाहिए । इसी मान्यता के तहत चीन माउण्ट एवरेस्ट पर कब्जा भी जमा रहा है । एवरेस्ट की चोटी पर मौसम सूचना केन्द्र की स्थापना के लिए चीन ने वहाँ संयन्त्र स्थापित करने का निर्ण्र्ाालिया है । यह चीन के विस्तारवादी नजरिये का द्योतक है और एवरेस्ट चीन का ही है इस मानसिकता को भी बल दे रहा है । नेपाल में अब तक इसका विरोध नहीं हुआ है । न तो सरकारी स्तर से इसका विरोध हुआ है और न ही नेपाल के किसी राजनीतिक दल और किसी राष्ट्रवादी नेपाली नेता ने ही इसका विरोध करने का जहमत किया है । चीन की इस विस्तारवादी नीति का अगर विरोध नहीं हो रहा है तो नेपाल की भावी पीढÞी कल यह जरुर जानना चाहेगी कि आखिर कब और कैसे एवरेस्ट चीन का हिस्सा हो गया -
राजधानी काठमांडू से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित नेपाली साप्ताहिक “पुनर्जागरण” के घ नवम्बर के अंक में सगरमाथा के अतिक्रमण पर खामोशी क्यों – शर्ीष्ाक से एक सनसनी खेज समाचार प्रकाशित हुआ है । पत्रिका ने ब्रिटेन से प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रिका “दि इकोनोमिस्ट” अक्टुबर के अंक के हवाले से एक तस्वीर प्रकाशित किया है जिसमें माउण्ट एवरेस्ट की चोटी पर चीन का झण्डा फहरा रहा है । एवरेस्ट की चोटी पर चीन का झण्डा लहराना यह सावित करता है कि चीन की नजरों में एवरेस्ट पर उसके सिवाय किसी दूसरे का हक ही नही बनता । चीन ने जिस तरह तिब्बत पर कब्जा जमाया उसी तरह एवरेस्ट के आधा हिस्सा पर भी कब्जा जमा रहा है । एवरेस्ट नेपाल का है तो उस पर पूरा नियंत्रण भी नेपाल का ही होना चाहिए । एवरेस्ट के चारों मोहडा पर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण पर भी नेपाल का ही नियंत्रण होना चाहिए । अगर सर -माथा) नेपाल का है तो बाकी शरीर भी नेपाल का ही होना चाहिए । सर नेपाल का और बाकी देह चीन का यह कैसे हो सकता है – चीन ने इस बार नेपाल पर आक्रमण किया है एवरेस्ट पर मौसम तथा भूकम्प मनिटर करने के बहाने जासूसी संयन्त्र स्थापना करके । चीन विरोधी गतिविधि अर्थात् तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए संर्घष्ा कर रहे तिब्बतियों की गतिविधि के नियंत्रण एवं निगरानी के नाम पर भले ही यह संयन्त्र स्थापित किया गया हो परन्तु इसका असली मकसद तो एवरेस्ट की उँचाई से नेपाल, भारत और अमेरिकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखना है । संयन्त्र की स्थापना नेपाल के लिए खास मायना नहीं रखती है परन्तु एवरेस्ट के ऊपर संयन्त्र क्यों लगाया गया – नेपाल के लिए यह विषय काफी अहम है । एवरेस्ट की चोटी पर मौसम सूचना केन्द्र स्थापित करने का निर्ण्र्ााचीन ने अकेले ही किया है । इस बावत नेपाल को कोई जानकारी नहीं है । इसका विरोध नेपाल की सरकार की ओर से होनी चाहिए परन्तु अब तक ऐसा नहीं हुआ है । नेपाल के दक्षिणी पडÞोसी भारत ने इसका विरोध किया है परन्तु नेपाल अभी खामोश है । लगता है चीन के हस्तक्षेप पर विरोध न करने की एक अघोषित नीति सी बन चुकी है । चीन के प्रति नेपाल के सभी वामपंथी दल उदार हैं लिहाजा वे चीन का विरोध करेंगे ही
नही – जो दक्षिणपंथी है, राजावादी है, राजतंत्र के र्समर्थक रहे हैं वे इसलिए चीन का विरोध नहीं करेंगे कि स्वर्गीय नरेश महेन्द्र ने अपने शासन को टिकाने के लिए एवरेस्ट का हिस्सा चीन को उपहार के रुप में दिया था । नेपाली कांग्रेस इस लिए विरोध नहीं करना चाहेगा कि उसके उपर भारत मुखी होने का आरोप लग जाएगा । वैसे नेपाली कांग्रेस भी चीन को एक विकल्प के रुप में रखना चाहता है ताकि भारत के साथ अगर अच्छा समन्वय नहीं रहे तो मन बहलाने के लिए ही सही, ड्रागन का दर्शन हो जाय तो क्या बुरा – मधेशवादी दल तो चुरिया पहाडÞ तक आते-आते ही थक कर हाँफने लगते हैं और सर पकडÞ कर बैठ जाते हैं । एवरेस्ट की उचाई पर चढÞना इनका बूतें से बाहर की चीज है । नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति की समझ नेपाली नेताओं में नहीं है या फिर वे समझना नही चाहते हैं । विवाद की वजह यह है कि सन् ज्ञढछज्ञ में जब चीन ने तिब्बत के उपर कब्जा जमाया उसी समय से एवरेस्ट की चोटी पर चीन की गिद्ध नजर टिकी है । सन् ज्ञढटण् में जब वी.पी. कोईराला प्रधानमंत्री की हैसियत से चीन गए तो उनके समक्ष चीन ने प्रस्ताव लाया कि एवरेस्ट का उत्तरी हिस्सा चीन का है लिहाजा आप इसका र्समर्थन कर दें । नेपाल ने उस समय कडÞा विरोध किया और एवरेस्ट सिर्फऔर सिर्फनेपाल का ही है कह के अपना प्रमाण चीन के समक्ष रखा । परन्तु चीन ने इसे मानने से इन्कार कर दिया । सन् ज्ञढटद्द में जब तात्कालीन नरेश महेन्द्र ने नेपाल में लोकतंत्र की गला रेत दी तो चीन ने उनके इस कदम पर र्समर्थन जताया । इस र्समर्थन के बदले में नेपाल नरेश ने पुरस्कार स्वरुप चीन को एवरेस्ट का उत्तरी हिस्सा ही दे दिया ।
नेपाल के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं वरिष्ठ राजनीतिज्ञ डायमन शमशेर की जीवनी पर आधारित एक किताब प्रकाशित हर्ुइ है “सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट से लेकर नक्खु जेल तक” । इस किताब के लेखक हैं हेमांगराज गिरी । इस किताब के पृष्ठ द्दद्धण् में डायमन शमशेर के कथन को उद्धृत किया गया है कि नेपाल में अब चीन का कोई स्वार्थ नहीं रह गया है । माओत्सेतुंग के समय में ही नरेश महेन्द्र के जरिए यह स्वार्थ पूरा हो चुका है । नरेश ने एवरेस्ट के पिछवाडÞे का हिस्सा सहित अन्दर तक की ज्ञछ मील नेपाली भूमि चीन को दे दिया है । एवज में चीन ने नेपाल में नरशे की पंचायती शासन को टिकाने का आश्वासन भी दे रखा था । चीन का स्वार्थ पूरा हो चुका है लिहाजा नेपाल में उसको और अधिक हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता ही नही है । इस बात की पुष्टि तो तीन वर्षपर्ूव नेपाल के तत्कालीन परराष्ट्र मंत्री ने अन्तरिम संसद के कृषि तथा सहकारी समिति की बैठक में भी कर दी । फिर भी नेपाल में किसी ने इसका विरोध नहीं किया । दक्षिणी पर एक फीट जमीन के लिए पूरे देश में हाय तौयबा मचाने वाले ऋतिक रोशन की टिप्पणी -जिसकी पुष्टी नहीं हो सकी) पर देश में तोडÞफोडÞ करनेवाले हिंसा और आगजनी करनेवाले, एक स्वतंत्र लेखक के विचार -गौतम बुद्ध का जन्म भारत में हुआ) पर पत्रिका के प्रकाशन पर प्रतिबंध की मांग करने वाले गोरखाली मूल के कथित राष्ट्रवादी यहाँ की मीडिया, राजनीतिज्ञ और नागरिक समाज माउण्ट एवरेस्ट पर चीन के झण्डा लहराने के बावजूद खामोश क्यों हैं -
राजधानी से प्रकाशित देश के र्सवाधिक लोकप्रिय दैनिक एक समाचार के अनुसार दोलखा के लामाबगर स्थित उत्तरी सीमा स्तम्भ नं. छठ के करीब चीन के साथ सीमा का विवाद देखा गया है और वह स्तम्भ ही गायब है । नेपाली टोली के अनुसार चीन ने जानबुझ कर यह सीमा स्तम्भ गायब किया है और इस भूभाग को अपने कब्जे में ले लिया है । कुछ महिना पहले नेपाल के नापी अधिकारी को संखुवासभा के किमाथांका क्षेत्र में सीमा का नापी ही नहीं करने दिया । मानसरोवर झील का अवलोकन करने गए नेपाली को वहाँ से विना कारण मारपीट कर खदेडÞ दिया । कुछ महिना पहले नेपाल के भू-भाग में ही घुमने गए नेपाली को रसुवा में अपमानित कर चीन के सैनिकों ने खदेडÞ कर भगा दिया । नेपाल के उत्तरी क्षेत्र के नागरिकों के साथ सीमा पर तैनात चीन के सुरक्षाकर्मियों का व्यवहार असहनीय है बावजूद इसे आसानी से पचाया जा रहा है । चीन के बढÞते कदम को अगर रोकने का प्रयास नहीं हुआ तो वह दिन दूर नही जब चीन काफी करीब आ जाएगा और हम हाथ मलते रह जाएँगे ।

सत्ता के बदलते समीकरण::प्रो.डाँ. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी आन्तरिक कलह से उबर नहीं पाई है । कांग्रेस में सभापति गिरिजा प्रसाद कोईराला द्वारा वंशानुगत प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास तथा उसके विरुद्ध निर्मित ध्रुवीकरण के बीच संर्घष्ा जारी है । इसी प्रकार एमाले के भीतर भी कार्यनीति के प्रश्न पर निरन्तर संर्घष्ा जारी है । माओवादी के अभ्युदय के पश्चात् इन दोनों दलों के आगे अस्तित्व के लिए संर्घष्ा तथा सामयिक रुपान्तरण की अनिवार्य अवस्था उपस्थित हो गई है । ये दिनों-दिन असान्दर्भिक तथा कमजोर हो रहे हैं । ये दोनों दल अगर समय की आवश्यकता तथा परिवर्तन को आत्मसात नहीं कर पाते हैं तो इनका विस्थापन अवश्यमभावी है । सत्ता से पदच्युत होने के बाद माओवादी संसद से लेकर सडÞक तक आन्दोलन कर अपनी शक्ति प्रदर्शित करने में लगे हैं । ऐसी स्थिति में किसी भी राजनीतिक दल का उद्देश्य मात्र सत्ता पर काबिज होना है तो स्वाभाविक है कि उनके लिए संविधान निर्माण कार्य सेकेण्ड्री कार्य हो गया है ।
सिद्धान्ततः सभी प्रमुख राजनीतिज्ञ राष्ट्रीय सहमति की वकालत करते नहीं थकते हैं लेकिन व्यवहार में उनका आचरण ठीक इसके विपरीत है । अपने प्रतिद्वन्द्वी दलों के साथ सहमति की बात तो छोडिए प्रधानमन्त्री या उपप्रधानमंत्री पद प्राप्त करने के लोभ में नेता अपनी पाटी से भी व्रि्रोह करने से परहेज नहीं करते हैं । सत्ता प्राप्ति के लिए वही नेता जो कभी भारत तथा ज्ञढछण् की संधि के आलोचक थे, आज भारत सरकार का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए आतुर हैं । नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला सहमति तथा सहकार्य के महत्व की व्याख्या करते नहीं थकते हैं । एकीकृत नेपाल कम्युनिष्ट पाटी माओवादी के अध्यक्ष तथा पर्ूव प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल भी चीन भ्रमण के पश्चात् सहमति की बात करने लगे हैं । वर्तमान प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल भी अपनी कर्ुर्सर्ीीचाने के उद्देश्य से सहमति तथा सहकार्य की वकालत कर रहे हैं । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टर्ीीकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी के पिछले महाधिवेशन में अध्यक्ष पद प्राप्त करने में विफल केपी शर्मा ओली भी सहमति के पक्ष में अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं । एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल सहमति की खोज में दिल्ली पहुँच गए । कांग्रेस संसदीय दल के नेता रामचन्द्र पौडेल सहमति को लोकतन्त्र का आधार मानते हैं । लेकिन मुख से सहमति का जितना भी गुणगान किया गया हो, व्यवहार में इसका रति भर भी प्रयोग नहीं हो रहा । असहमति लोकतन्त्र की विशेषता है लेकिन लोकतन्त्र में निरपेक्ष सहमति के लिए कोई स्थान नहीं होता । लोकतन्त्र में असहमति को व्यवस्थित करने के लिए उपकरण का होना अनिवार्य होता है । आवश्यकता अनुसार सहमति बनने और बिगडÞने का सिलसिला निरन्तर जारी रहता है । ज्ञद्द सूत्रीय समझौता से लेकर आज तक की नेपाली राजनीति विभिन्न उतार चढÞावों की राजनीति है, जिसने देश में अस्थिरता को जन्म दिया है । इसके परिणाम स्वरुप वृहत् शान्ति समझौता तथा अन्तरिम संविधान के औचित्यता पर गम्भीर प्रश्न उपस्थित हो गया है । सत्ता के संसदीय खेल में संविधानसभा विलुप्त सी हो गयी है । राजनीतिक दल गणतंत्र तथा गणतांत्रिक पद्धति की आधारभूत मान्यता से भी विमुख हो गए दिखते है ।
र् वर्तमान माओवादी आन्दोलन जिस रुक्मांगत कटवाल प्रकरण पर आधारित है, वो तो कब का अवकाश प्राप्त कर चुके हैं । अब किस प्रकार उनकी पर्ुनबहाली और फिर उन्हें पदमुक्त किया जाएगा या फिर किस प्रकार राष्ट्रपति के कदम -माओवादी के अनुसार जो असंवैधानिक कदम) को संवैधानिक बनाया जाएगा, यह बात भी समझ में नही आती है । माओवादी आन्दोलन का उद्देश्य नागरिक सर्वोच्चता कायम करना है या फिर कुछ और यह समझ पाना मुश्किल है । विगत में अगर किसी से भी कोई गलती हर्ुइ है, तो उसे भविष्य में फिर नहीं दुहराए जाने की र्सतर्कता अनिवार्य है लेकिन इसके लिए आन्दोलन के नाम पर जनता को त्रसित करना कहाँ तक न्यायोचित है, यह एक विचारणीय प्रश्न है । निर्वाचन के पश्चात् माओवादी देश के सबसे बडÞे दल के रुप में उभर कर सामने आए हैं । अतः आवश्यक है कि वे तत्परता के साथ नए संविधान निर्माण प्रक्रिया में आगे बढÞें और संविधान में नागरिक सर्वोच्चता को स्थापित करने का प्रयास करें, जिसके लिए वे र्समर्थ भी हैं और सक्षम भी । इस प्रकार के आन्दोलनों से जनता त्रस्त हो चुकी है और सम्बन्धित दलों की छवि इससे जनता में सुधरने की बजाए और बिगडेगी । चाहे यह आन्दोलन माओवादियों का हो या फिर किसी और का । देश में बंद, हडÞताल के बदले आवश्यकता है शांति, सुरक्षा की जिससे कि आम नागरिक का जीवन यापन सामान्य हो सके ।
देश की राजनीति में माओवादी पार्टर्ीीे योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता है । एक दशक के लंबे सशस्त्र संर्घष्ा के पश्चात् संविधान सभा चुनाव के परिणाम स्वरुप देश में सबसे बडÞे दल के रुप में स्थापित होना बहुत बडÞी बात है । लेकिन क्यों आज उन्हें ही विरोध का झण्डा ढोना पडÞ रहा है, यह विचारणीय प्रश्न है । कल तक जो देश की सभी समस्याओं का समाधान संविधान सभा और नए संविधान में खोज रहे थे आज संविधान सभा की बैठक अवरुद्ध करके नए संविधान निर्माण की राह में सबसे बडÞा रोडÞा बन कर खडÞे हैं । एक बार लोकतांत्रिक पद्धति में प्रवेश के पश्चात् उन्हें इस पद्धति को संस्थागत करते हुए जनता के पक्ष में पद्धति के अन्दर ही सभी समस्याओं का हल ढुँढना होगा और यही उनके तथा जनता के पक्ष में होगा । वास्तव में माओवादियों में यह बोध होना आवश्यक है कि वे भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रमुख अंग हैं और उन्हें जनमत की शक्ति तथा उसमें अन्तरनिहित सामर्थ्य को पद्धतिगत रुप में स्थापित तथा प्रयोग करना होगा । माओवादियों को यह समझना होगा कि सबसे बडÞे दल होने के नाते उनकी जिम्मेवारी भी सबसे अधिक है । उन्हें किसी भी समस्या का सविवेक समाधान खोजना होगा, यही उनके, जनता के और देश के हित में होगा, अन्यथा देश में किसी दर्ुघटना की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता ।
सत्ताधारी नेकपा एमाले भी समस्या विहीन नहीं दिखाई देता है । पार्टर्ीीध्यक्ष झलनाथ खनाल खुद प्रधानमंत्री पद का सपना संजोए सत्ता के नए समीकरण की खोज में लगे हुए हैं, जबकि मधेशी जनअधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव वर्तमान सरकार में शामिल होने का संकेत दे रहे हैं । उल्लेखनीय है कि अभी दोनों ही नेता भारत भ्रमण से लौटे हैं । खनाल के भारत भ्रमण तथा भ्रमण काल में हर्ुइ विभिन्न भारतीय राजनीतिक हस्तियों से उनकी मुलाकात को नेपाली राजनीति में नए ध्रुवीकरण के संकेत के रुप में देखा जा रहा है । जबकि दूसरी धारणा यह है कि वर्तमान सरकार के प्रति खनाल के विरोधी तेवर को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें बुलाकर इसकी तीव्रता को कम करने का प्रयास किया है । माना जाता है कि खनाल ने भारत सरकार को इस बात से अवगत कराया कि उनके प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में राष्ट्रीय सरकार गठन हो सकेगा, जिसमें माओवादी पार्टर्ीीे भी शामिल होने की संभावना होगी । लेकिन भारत सरकार खनाल के विचार से सहमत नहीं दिखाई देती है और वर्तमान सरकार को ही मजबूत बनाने के पक्ष में है । कहा जाता है कि भारत सरकार ने उपेन्द्र यादव को भी वर्तमान सरकार का ही र्समर्थन करने का सुझाव दिया है ।
अध्यक्ष खनाल कार्तिक ज्ञढ गते के दिन भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा तथा गृहमंत्री पी. चिदम्बरम, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे महासचिव ए.बी. बर्धन, मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे महासचिव प्रकाश करात आदि नेताओं से मिले थे । इसके एक दिन पर्ूव उनकी मुलाकात अर्थमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश सचिव निरुपमा राव तथा विपक्षी नेता लालकृष्ण आडवाणी आदि नेताओं से हर्ुइ थी । मूलतः सभी नेताओं ने खनाल को सहमति तथा समझदारी अपनाने की सलाह देकर शांति प्रक्रिया को स्थापित करने का सुझाव दिया, ऐसा माना जा रहा है ।
दूसरी ओर जब से प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने वार्ता के लिए फोरम को औपचारिक पत्र भेजा है, तभी से फोरम की सरकार में सहभागिता की संभावना बढÞ गई है । कहा जाता है कि अपने को उपप्रधानमंत्री बनाए जाने की शर्त पर उपेन्द्र यादव सरकार में शामिल हो सकते हैं । लेकिन दूसरी तरफ पार्टर्ीीेता जयप्रकाश गुप्ता भी उपप्रधानमंत्री बनने की कतार में खडÞे हैं । कार्तिक ज्ञठ गते जिस समय उपेन्द्र यादव दिल्ली पहुँचे थे, उसी समय प्रधानमंत्री नेपाल ने फोरम को औपचारिक पत्र भेजा था जिसमें उनसे सरकार में शामिल होने का आग्रह किया गया था । फोरम अध्यक्ष यादव ने सहमति कायम होने की स्थिति में सरकार में शामिल होने के संकेत दिये हैं । भारत की भी इच्छा है कि फोरम सरकार में शामिल हो और माओवादी दल से उसकी दूरी बढÞे, ऐसी आशंका जताई जा रही है । सरकार में सहभागिता के प्रश्न पर फोरम नेतृत्व तथा प्रधानमंत्री के बीच अनेकों बार वार्ता हो चुकी है । दिल्ली प्रस्थान के पर्ूव भी फोरम अध्यक्ष यादव और प्रधानमंत्री नेपाल के बीच बातचीत हर्ुइ थी । जिसमें उन्होंने -अध्यक्ष यादव ने) अपने लिए वरिष्ठ उपप्रधानमंत्री पद की पेशकश की थी । लेकिन प्रधानमंत्री नेपाल की दुविधा यह है कि ऐसी स्थिति में वर्तमान उपप्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदार का क्या किया जाए – इन बातों का निष्कर्षजो भी निकले, इतना तो तय है कि सरकार के प्रति फोरम का रुख नरम दिखाई देता है ।
राजनीतिक दलों के बदलते समीकरण के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मुन द्वारा कार्तिक ज्ञघ गते के दिन प्रस्तुत नेपाल सम्बन्धी प्रतिवेदन में राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन की बात कह कर एक नए विवाद को जन्म दे दिया है । उनके इस वक्तव्य को जहाँ एक ओर माओवादी और उनके पक्षधर देश की अनिवार्य आवश्यकता बताते हैं वहीं उनके विरोधी राष्ट्रसंघ महासचिव पर एकपक्षीय बयान देने का आरोप लगा रहे हैं । नेपाल के प्रति मुन का यह पहला बयान नहीं है । इससे पहले भी वे आषाढÞ द्दज्ञ गते के दिन सुरक्षा परिषद में जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किये थे, उसमें समयावधि के भीतर संविधान निर्माण नहीं होने की शंका जताई थी । माओवादी नेतृत्व की सरकार के समय भी राष्ट्रसंघीय नेपाल मिशन अनमिन ने राष्ट्रीय सरकार गठन की आवश्यकता पर बल दिया था । माओवादी तथा मधेशी जनअधिकार फोरम को सरकार में सम्मिलित कराने के लिए चल रहे प्रयास के समय मुन का सुझाव आने से वर्तमान सरकार में सहभागी दलों के बीच शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है । यही कारण है कि उनकी दृष्टि में यह संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप है । कार्तिक ज्ञढ गते के दिन सरकार में सहभागी द्दद्द दलों द्वारा इस पर आपत्ति जताई गई है । इन घटनाओं के परिणाम स्वरुप जनमानस में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ वर्तमान सरकार के विकल्प की खोज में है – माओवादियों द्वारा अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार गठन करने की मांग को लेकर चलाए जा रहे जनआन्दोलन के समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव द्वारा दिए गए इस बयान से उन पर माओवादियों का पक्षधर होने का आरोप लगाया जा रहा है । लेकिन अनमिन के वरिष्ठ संचार अधिकारी कसमस विश्वकर्मा का मानना है कि मुन का बयान नेपाल के राष्ट्रीय हित में है और इसे आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता । महासचिव मुन की प्रतिक्रिया के विषय में माओवादी नेताओं का दृष्टिकोण अलग है । कार्तिक ज्ञढ गते के दिन इलाम में माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ने मुन की अभिव्यक्ति को सही ठहराते हुए कहा कि देश में राष्ट्रीय सरकार के अलावा दूसरा और कोई विकल्प नहीं है । इस तरह सरकार गठन के लिए जोडÞतोडÞ जारी है । अब देखना है कि उँट किस करवट बैठता है ।

पोलिटेक्निक का उद्घाटन::वरुणमाला मिश्रा

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

barunmalaभारत सरकार के सहयोग से पर्वांचल के मोरंग स्थित नेमूवा में नवनिर्मित मनमोहन स्मृति पोलिटेक्निक का विधिवत उद्घाटन गत दिनों प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के हाथांे सम्पन्न हुआ । कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए नेपाल ने विकास के लिए भारतीय सहयोग की सराहना की तथा और भी सहयोग का आग्रह किया । इस मौके पर नेपाल ने स्पष्ट किया कि माओवादी अगर सरकार बनाना चाहते हैं तो संसद में बहुमत लाए । माओवादी आन्दोलन कर द्वन्द्व, मुठभेड, अशांति लाना चाहते है जो उचित नहीं है । माओवादियों को सहमति के साथ आगे बढÞने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं । उन्होंने कहा कि संविधान लेखन तथा शांति सुरक्षा प्रदान करना सरकार की पहली प्राथमिकता हैं । प्रधानमन्त्री ने माओवादी लडाकू का हथियार व्यवस्थापन नहीं होने तक संविधान लेखन कार्य में बाधा आते रहने की बात कही । उन्हों्रने सख्त लहजे में कहा कि माओवादी के आन्दोलन से सरकार हिलने वाली नहीं न ही वे खुद ।
इस समारोह में सहभागी हुए एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल ने माओवादियों से राष्ट्रीय सहमति कायम कर एकता के आधार पर सहकार्य करने का आग्रह किया ताकि संविधान लेखन कार्य को पुरा किया जा सके । कार्यक्रम में मौजूद उपप्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदार ने कहा कि अगर माओवादी आन्दोलन त्याग सरकार में शामिल होते हंै तो मांग अनुसार मंत्रालय देने को सरकार भी तैयार है । मंच पर आसीन मंत्रीद्वय रामचन्द्र कुशवाहा एवं महेन्द्र यादव ने भी वर्तमान सरकार के किसी सूरत में नहीं गिरने की बात कही ।
इस मौके पर भारतीय राजदूत राकेश सूद ने कहा कि भारत सरकार नेपाल में हमेशा शांति चाहती है । पडोस में अशांति हो तो अपने देश मं भी सुख शान्ति में ग्रहण लग जाता है । भारत चाहता है कि नेपाल में संविधान निर्माण कार्य जल्द से जल्द सम्पन्न हो ताकि यहाँ की जनता शान्ति और अमन-चैन से रह सके ।

मधेश और इसके मुद्दे के गुमने-गुमाने का खतरा बरकरार::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 ADD COMMENTS

kumarमधेश की जनभावना को राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का हवाला देकर नकारने कीजो प्रवृत्ति नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में विशेषतः सत्ता में सहभागी दो प्रमुख दलों में देखी जा रही है उसे राष्ट्रहित में अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता । किसी न किसी रुप में यह एक द्वन्द्व को निमंत्रण दे रहा है और उसका खामियाजा देश के आम लोगों को भुगतना ही पडÞेगा । यह सच है कि मधेश आन्दोलन के बाद देश में निवास कर रहे दोनों वर्गों के मनोविज्ञान में परिवर्तन आया है, दोनों ही वर्गों में शत्तिः और सीमाओं का एहसास होने लगा है लेकिन चरम स्वीकार्यता के भाव का अभाव देखा जा रहा है । जिन भावनाओं को तर्राई आन्दोलन ने आवाज दी थी वह कहीं न कहीं गुम होती दिखलाई दे रही है और इसका कारण मधेशी दलों की दिशाहीन राजनीति है । अपनी डफली अपना राग की राह पर चलते हुए इन लोगों ने अपने आदमी की निराशा को जिस हद तक पहुँचाया है उसका सही अन्दाजा तो निर्वाचन या सडÞक आन्दोलन के समय में ही होगा लेकिन अभी लौटने का अवसर है ।
मधेश के मुद्दे पर नेपाल की राजनैतिक शक्तियाँ दो भाग में विभाजित है । एक बात पर यहाँ लोकपरम्परावादी राजनैतिक शक्तियाँ है जिसमें नेपाली कांग्रेस के साथ-साथ एमाले और अन्य छोटी-बडी पार्टियाँ है जो मधेश के संरचनात्मक वैशिष्ट्य को स्वीकार करने तथा देश में समानता के आधार पर अधिकार सम्पन्न करने की सोच मात्र से विदकते हैं । दूसरी ओर नेकपा माओवादी के साथ अनेकानेक मधेशी दल हैं जो मधेश प्रदेश के निर्माण के साथ-साथ मधेशियों की मुक्ति का राग अलाप रहे हैं । लेकिन इन सारे दलों में कहीं न कहीं भावगत इमानदारी का अभाव है । इसलिए उनमें से किसी भी राजनैतिक दल के प्रति आम मधेशियों की सोच सकारात्मक नहीं है और उन्हें इस बात का एहसास होने लगा है कि वे इन राजनैतिक पार्टियों द्वारा उपयोग किये जा रहे हैं । वस्तुतः अब तक की इनकी नीतियों और कार्यक्रमों ने आम लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाया है । इसका एक अन्य महत्वपर्ूण्ा कारण उनमें परस्पर छींटाकसी भी है ।
माओवादियों की यह सोच है कि मधेश आन्दोलन के बाद यहाँ उनका जनाधार घटा है । कांग्रेस और नेकपा एमाले जैसे प्रबल प्रतिद्वन्द्वियों के साथ-साथ मधेश मे नव मधेशवादी दल अपनी भग्न अवस्था के बावजूद उन्हें शिकस्त देने की स्थिति में है । इसलिए उन्होंने अपने भातृ संगठन मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का महाधिवेशन किया और अपने दल के परिचित चेहरों के साथ-साथ दूसरी पार्टियों से आये नये चेहरे को नेतृत्व पंक्ति में लाया । निश्चित ही तर्राई में अभी संगठन विस्तार उनके राजनैतिक चिंतन का प्रमुख आधार है । इस महाधिवेशन के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए माओवादी सुप्रीमो प्रचण्ड ने जहाँ नव मधेशवादी दलों को कुकुरमुत्ता और पानी का बुलबुला कहा वहीं अपनी पार्टियाँ मधेशियों का सच्चा हितैषी कहा और स्वयं को पहाडी होते हुए भी पहाडीवाद का विरोधी घोषित किया । उनके इस बात में कितनी सच्चाई है, यह बात अलग है लेकिन इतना तो बेबाकी से कहा जा सकता है कि मधेश के सर्न्दर्भ में उनकी नीतियाँ गैर मधेशी पार्टियों से अधिक गतिशील है । लेकिन उनकी इन नीतियों में बौद्धिकता का पक्ष अधिक प्रबल है । यही कारण है कि मधेश आन्दोलन का र्सवाधिक आक्रामक विरोध माओवादियों ने ही किया था । गोईत, ज्वाला और मातृका सब उनके ही कारतूस थे, किन्तु समयक्रम में अपने रास्ते अलग किये । इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि मधेश सम्बन्धी अपनी नीतियों में थोडी सी भावनात्मक का सम्मिश्रण और जनता को हथियार न बनाकर उन्हें संवेदनात्मक र्स्पर्श भी दें ।
मधेशवादी दलों की राजनीति का अपना मिजाज है उनके क्रियाकलापों से मधेश के क्षेत्रीय हितों का जितना संरक्षण हो पाया है उससे अधिक तथाकथित राष्ट्रीय हितों का संरक्षण हो रहा है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आज मधेश की राजनीति यथास्थितिवादी या अवसरवादी प्रवाह में अग्रसर है जबकि सदियों से शोषित मधेश की जनता व्रि्रोही बातों में अधिक सुकून मानती है । एक तरह से देखें तो तर्राई मधेश की सम्पर्ूण्ा राजनैतिक शक्तियाँ जो मध्यम मार्ग पर चलने का दावा करती है वे सत्ता के भीतर है और जो बाहर है वे भी दरवाजे पर दस्तक दे रही है । निश्चित है कि संविधान निर्माण आज की प्रमुख राजनैतिक आवश्यकता है और इसके लिए सहभाव और सहकार्य आवश्यक है और सरकार में शामिल होने के उनके निर्ण्र्ााको भी अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । लेकिन सवाल उठता है कि दलगत स्वार्थ की साधना के लिए आपस में कबड्डी खेल रहे ये राजनैतिक दल मधेश मे मुद्दे पर परस्पर सहमत होकर एक चर्टाई पर बैठने का प्रयास करेंगे -
आज मधेश के मुद्दों के प्रति सबसे बडÞी विडम्बना यह घटित हर्इ है कि कुछ मधेशी दल ऐसे हैं जिनमें नेतृत्व को मधेश की संवेदना का ज्ञान ही नहीं है, कुछ ऐसे हैं जिन्हें संवेदना के साथ-साथ जमीनी सच्चाई की भी पहचान है किन्तु हस्तिनापुर के प्रति अतिशय प्रतिबद्धता के कारण भीष्म पितामह सधरैय धारण किए हुए हैं । आज स्थिति यह है कि मधेश के मुद्दे पर सत्ता में सहभागी दलों ने एक ओर जहाँ अपने प्रति आम लोगों का विश्वास खोया है तो दूसरी ओर अन्तर्ररा्रीय स्तर पर विशेषतः भारतीय कूटनीति से भी अपन पक्ष बनाने में असक्षम रहे हैं मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के एक पदाधिकारी उस स्थिति को रेखांकित करते हुए यह दावा करते हैं कि मधेशियों का सच्चा हितैषी नेकपा माओवादी और उनका भातृ संगठन मरामुमो है । इस बात से पर्ूण्ातया असहमति भी नहीं जतलायी जा सकती लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि मधेश के मुद्दा उनके लिए साधन रहा है । अतीत में मधेशियों से हुए संर्घष्ा और मरामुमो के विभिन्न नेताओं का इससे निकलना इसका प्रमाण है । एक बात तो निर्विवाद है कि आज हर वह मधेशी दल जो सत्ता में सहभागिता दे रहे हैं, मानसिक कुण्ठा का शिकार है और जो बाहर है उनकी आवाजें मुखर होकर निकल रही है लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें भी सत्ता में सहभागी होने के लिए विवश कर रही है । यद्यपि उनकी अपनी शर्तें हैं और उन शर्तों को अगर सरकार मान भी लेती है तो उन्हें कार्यान्वित कराने में सरकार में शामिल होने के बाद वे कितना सक्षम हो पाते हैं यह बात समय ही बतलाएगा क्योंकि इस दृष्टि से विगत के राजनीतिक अभ्यासों में ये असफल रहे हैं । विगत में हुए ज्ञद्द सूत्रीय और ड सूत्रीय समझौतों का क्या हश्र हुआ है उसे सभी जानते हैं, वस्तुतः समझौतों के विरुद्ध समझौते करना लोकतांत्रिक नवनेपाल के सरकारों की प्रमुख विशेषता रही है । संगठित होकर भी मधेशी दल जहाँ इन समझौतों को कार्यान्वित नहीं कर पाए तो आज विखरी हर्ुइ अवस्था में कितनी सफलता हासिल कर पाएँगे कहना कठिन है ।
आज दिल्ली को नेपाली राजनीति का मक्का-मदीना कहा जा रहा है और मधेशी दलों को हज के प्रति अधिक संवेदनशील मानना यहाँ की राष्ट्रीय सोच है । लेकिन मधेश के नेतृत्व वर्ग की एक विफलता यह भी है कि यहाँ के उलेमाओं की दृष्टि में वे अपनी प्राथमिकताओं का सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं और उनके अब तक के प्रश्न-चिन्हों से जिन प्राथमिकताओं का संदेश जगजाहिर होता है इनका मार्ग कभी सरकार बचाने के नाम पर और कभी संविधान निर्माण की गम्भीरता के नाम पर प्रशस्त किया जा रहा है और इस पथ पर जब वे चल पडÞते हैं तो कहीं न कहीं मधेश की माँगंे कमजोर होती है । यह नीतिगत सिद्धान्त है कि एक लक्ष्य के अन्वेषी परस्पर मित्र होते हैं । निश्चित ही सारे मधेशी दलों का लक्ष्य अन्ततः मधेश को देश के स्तरपर उसकी पहचान की प्रतिष्ठा के साथ-साथ भेदभाव से मुक्त समानता के धरातल पर उसे स्थापित करना है । लेकिन चुनावी गणित एवं सत्ता के समीकरणों ने उन्हें परस्पर विरोधी बना दिया है । वास्तव में अगर वे मधेश की मुक्ति के सच्चे साधक है तो उन्हें परस्पर एकताबद्ध होकर तथाकथित आकाओं से यह गुहार तो करनी ही चाहिए कि उनकी प्राथमिकता मधेश की सदियों से शोषित-पीडित जनता की मुक्ति है और उनकी इस मानवीय कामना को राजनीति या कूटनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए ।
आज मधेश की राजनीति की एक प्रमुख आवश्यकता विखरी हइ राजनैतिक शक्तियों को समेटने का प्रयास है । निश्चित ही अवसर और महत्व की छोटी सी अवधि में जितना विभाजन और विखराव मधेशी दलों का हुआ है वह अप्रत्याशित है । ऐसी शक्तियों में मजफो और नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीे विभिन्न घटक है । निश्चित है कि उनकी आवाजें अभी मुखर रुप से नहीं सुनाई दे रही या उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा कारण विखराव इतना अधिक है कि आम लोग उसे पागलपन तक की संज्ञा देने लगे हैं । वस्तुतः मधेशी नेतृत्व चाहे पर्दे के बाहर का हो या भीतर का, थोडा सा महत्व प्राप्त होते ही उनकी सोच इतना व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है कि वे अपनी पार्टर् तो टूटते ही है, समान विचारधारा वाली दूसरी पार्टियों में भी सहभागी नहीं होते और अपनी-अपनी दुकान खोलकर बैठ जाते हैं । इसलिए आज जितने नेता उतने दल की स्थिति मधेशी राजनीति में बनती जा रही है । इन विखरी हर्इ शक्तियों को संगठित कर लेना मधेशी राजनीति की महत्वपर्ण् घटना होगी ।
कुल मिलाकर अब तक की परिस्थितियाँ बहुत अधिक सकारात्मक नहीं मानी जा सकती । टूट-फूट और घात-प्रतिघात के दौर से मधेशी राजनीति गुजर रही है । अपनी आवाज को कमजोर करने के खेल में ये मधेशी दल जाने-अनजाने खुद ही अधिक सक्रिय हैं और देश की तथाकथित राष्ट्रवादी शक्तियाँ लीपापोती की मनःस्थिति में है । यह सच है कि बदली हर्इ परिस्थिति में मधेश मं भी राजनैतिक तौर पर चर्चे बटोरे हैं । इसलिए इसमें अन्तर्ररा्रीय कूटनीति का भी सरोकार बढा है । इनके हाथों की कठपुतली या उनके अन्तःसंर्घष् में मधेश और इसके मुद्दे के गुमने-गुमाने का खतरा बरकरार है । इसलिए सम्यक् मार्ग की साधना हमारे नेतृत्व वर्ग के लिए अपरिहार्य है ।

सम्पादक की कलम से…….

Posted by Himalini On November - 27 - 2009 5 COMMENTS

DSC01982_r1_c1गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना स्वाभाविक ही नहीं मानवीय अपेक्षा भी होती है । इसी गतिशीलता के क्रम में बारह वर्षों से निकलती आ रही हिमालिनी पत्रिका का स्वरुप साहित्यिक से राजनीतिक तक आ चुका है । नेपाल से निकलने वाली पत्रिकाओं में से यह हिमालिनी अपने लक्ष्य एवं अपनी पूणता की ओर बढ रही है ऐसा आकलन पाठकों का है । समय की प्रवाह की तरह व्यक्ति का आना जाना तो लगा ही रहता है परन्तु जिस लक्ष्य को केन्द्रित कर हम चले हैं उस राह में आने वाली तमाम बाधाओं को पार करते हुए हमें अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचना है । ऐसे में हम सुधि पाठकों से उत्तरोत्तर सहयोग की अपेक्षा रखते हैं ।
दुनिया भर में सुख-शांति, समृद्धि और पर्वतीय सुषमा के लिए जग-प्रसिद्ध पहाड का देश नेपाल वर्तमान में चतुदिक समस्याओं और उलझनों में उलझकर रह गया है । राजसत्ता की समाप्ति के उपरान्त गणतन्त्र को स्थापित हुए करीब दो वर्षहो गए परन्तु नेपाल में गणतन्त्र की अवधारणा अब तक स्पष्ट नहीं हो पाई है । अगर इसे यूँ कहा जाय कि नेपाल में अभी गणतन्त्र की चिरप्रतीक्षित नई पौध उगी ही नहीं है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
परिवर्तन के संकेत के रुप में ही नेपाल के राजनैतिक इतिहास में नेपाली कांग्रेस पाटी के महासमिति की बैठक को लिया जा सकता है । नेपाली राजनीति के इतिहास में नेपाली कांग्रेस सबसे पुरानी पाटी है जो समय-समय पर अनेक बार नेपाल में सरकार का नेतृत्व किया है । अभी भी वर्तमान सत्ता समीकरण में सहभागी है । नेपाल में नेपाली कांग्रेस पाटी हमेशा से व्यक्तिवादी नेताओं से चलने वाली पाटी है । इसलिए उनकी इच्छानुसार बैठक बुलायी जाती है । विगत कुछ वर्षों में तो नेपाली कांग्रेस पाटी एक व्यक्ति कर् इर्दगिद घूमने लगी । परिणाम स्वरुप ने.कां. पाटी बनाम कोइराला और कोइराला बनाम ने.कां पाटी समझी जाने लगी । इसकी पुष्टि ने कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा महासमिति बैठक न बुलाने के पक्ष से होती है । उन्होंने पाटी को महासमिति बैठक न बुलाने को निर्देश भी दिया । पर समयचक्र ऐसा घूमा कि उनके मना करने पर भी महासमिति की बैठक बुलाई गई । इस बैठक को बुलाने से अन्ततोगत्वा यह जगजाहिर हो गया है कि गिरिजा बाबू की पाटी पर पकडÞ ढीली पडÞती जा रही है । या यों कहें कि पाटी में वे कमजोर पडÞ गये हैं, गलत नहीं होगा । अब लगता है कि ने.कां पाटी की कमान युवाओं के हाथ में जानी चाहिए तभी ने.कां. पाटी की स्थिति सुधरेगी ।
समयचक्र के परिणाम स्वरुप ही आज तर्राई में मधेशी पार्टियो का उदय हुआ है ऐसा कहना कोई गलत नही होगा । मधेश आन्दोलन के पश्चात् ही मधेशी जनता अपना हक और अधिकार लेने के लिए अग्रसर हर्ुइ, जो मधेशियों के लिए शुभ संकेत है । इस प्रसग में मुझे हिन्दी के कवि दिनकर की यह पंक्ति याद आती है जिसमें व्यक्ति को अधिकार लेने के लिए कहा गया है – “अधिकार खोकर बैठ रहना यह महादुष्कर्म है, न्यायार्थ अपने बान्धवों को दण्ड देना धर्म है ।”
मधेशी जनता जो अपने अधिकार लेने के लिए आगे तो बढ है पर दुःख की बात तो यह है कि मधेशी जनता अपना नेतृत्व जिन-जिन पाटी के नेताओं को दी वे नेता लोग सत्ता स्वार्थ के कारण तर्राई आन्दोलन की आवाज को दरकिनार कर सत्ता के र्इदगिर्द घूम रहे हैं, वह बहुत बडी चिन्ता का विषय है । मधेशी पार्टिया और इनके स्वनामधन्य नेतागण समय रहते सचेत नहीं हुए और मधेशी जनआन्दोलन के लक्ष्य को आत्मसात नहीं किए तो वह दिन दूर नहीं जब जनता दुत्कार कर खाली हाथ उन्हें लौटा देगी तब नेताओं को हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं मिलेगा । अतः आवश्यकता है सभी पार्टियो और नेताओं को आपसी मतभेद भुलाकर मधेश जन-आकांक्षाओं एवं लक्ष्यों के प्रति एकजूट होकर सकारात्मक भूमिका का निर्वाह करें । मधेशी नेता लोग और मधेशी पार्टियाँ कुछ ऐसे रचनात्मक कार्य करें और भविष्य में तर्राई के हित में र्सार्थक कार्य करते रहें जिससे मधेशी जनता विश्वस्त हो सकें कि उनकी संवेदनाओं से खिलवाÞ नहीं हो रही है, तथा उनके लक्ष्यों को अनदेखा नहीं किया जा रहा है । राष्ट्र और राष्ट्रीय एकता परस्पर बरकरार रहे ऐसा आभास होना चाहिए ।
समसामयिक विषयों पर आधारित आलेख प्रस्तुत अंक में दिया गया है जिसको पढÞकर पाठक वर्ग र्सार्थक प्रतिक्रिया एवं रचनात्मक सुझाव प्रेषित करेंगे जिसकी हमें प्रतीक्षा रहेगी । इसी आशा एवं विश्वास के साथ हिमालिनी का यह अंक आपके हाथों में…

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