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September , 2010
Wednesday
बाँर्तमान अन्तर्रर्रीय दृष्टिकोण के अनुसार संघीयता एक शंकास्पद विषय माना जाने लगा है । बहुत ...
तुलसीदास जी एवं उनके द्वारा रचित महान ग्रन्थ रामचरित मानस से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर ...
हर बच्चा अपने माता पिता की आखों का तारा होता हैं । यही वजह है ...
नेपाली भाषा में पुनः शपथ ग्रहण करने संबंधी नेपाल सरकार -मंत्रिपरिषद) के आग्रह को अस्वीकार करते ...
येष्ठ १४ की मध्य रात्रि को महत्वपर्तीन दलों ने जो तीन सूत्रीय समझौताकिया, उसे नेपाली ...
''जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'' कैसी महान, पवित्र और अनन्य भावनाओं से भरा है भगवान राम ...
नेपाली राजनीति के महानायक गिरिजाप्रसाद कोईराला की मृत्यु के परिणाम स्वरूप राष्ट्र ने एक अनुभवी ...
गंणतंत्र दिवस के मौके पर भारत सरकार तथा भारत की जनता को बधाई दी । ...
मारत के जम्मू-काश्मीर राज्य के जम्मू के निकट त्रिकूट पर्वत पर स्थित वैष्णो देवी मंदिर में प्रति ...
इस राजनीतिक संगठन की स्थापना मधेश-तर्राई समेत अन्य समुदाय में राज्य द्वारा किये जाने वाले ...
गोल्डेन आई फिल्म प्रा.लि. द्वारा निर्मित नवल खडका की प्रस्तुति दशगजा फिल्म का लक्ष्य नेपाल-भारत ...
अपना देश, वतन, अपनी मातृभूमि किसके लिये पावन और पवित्र नही होती - हरेक प्राणी ...
दश भर में विशेष सुरक्षा योजना लागू होने के बाद सशस्त्र संगठनों के बीच एकीकरण की प्रक्रिया ...
विराटनगर भारत-नेपाल दो देश । सीमाएं अलग-परतंु दिलों के बीच नहीं है कोई हद । दोनों ...
वह हौवा है या भगवान जो भी है अब उसके सामने चुनौती वह खुद ही ...
स्कृत नेपाल की ही नहीं अपितु सम्पर्ूण्ा विश्व की क्रान्तिचेता संास्कृतिक भाषा है । विश्व ...
नये साल की पर्व संध्या में शराब, शबाब और बत्तियों की झिलमिल से जगमगाता ठमेल ...
कृतिक संपदा से भरपूर भारत का तमिलनाडु राज्य अपने जादर्इ सौर्न्दर्य से सैलानियों को मुग्ध करने ...
-वीणा सिन्हा उच्च स्तरीय राजनीतिक संयन्त्र की कार्यप्रणाली, उद्देश्य एवं आचार-सीमाओं का निर्धारण होने के बावजूद ...
दुनियाँ अनोखी है । यहाँ रहने वाले अनोखें-अनोखें शौक भी पाला करते हैं । ...
मान्यवर, युगों से सुप्रसिद्ध इस आध्यात्मिक प्रागैतिहासिक नगरी जनकपुरधाम में सम्पर्ण् मधेशवादी, मधेश प्रेमी नेपाली ...
नागरिकता का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आया है । मधेशवादी नेता गजेन्द्र ...
नानीबाई रो मायरो कार्यक्रम भावभीनी कृष्ण-कर्तन के साथ सम्पन्न हुआ । इस कार्यक्रम के समापन-समारोह ...
बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जारी ल्रि्रहान आयोग रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में एक नया ...
नेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में ...
शान्ति क्षेत्र नेपाल जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ, वहाँ हर कोई द्वन्द एवं सेना ...
इतिहास में राजनैतिक उद्देश्य की परिपर्र्ति के लिए युद्ध को प्रथम अथवा अंतिम विकल्प के ...
बिहार ने विकास दर का जादुर्इ अंकडा छू लिया । किसी को यकीन नहीं । ...
में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है ...
मधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया ...
गतिशील समय के प्रभाव से प्रकृति की हरेक वस्तु परिवर्तन के रुप में दिखाई देना ...
यह तो शुरूआत हैं, आगे बहुत कुछ करना है’वीरगंज । विगत २७ और २९ फागुन ...
लीला बहादुर थापा की आंखें भर आयी जब उसे अपना दिवंगत साथी प्रेम का स्मरण ...
एक दशक से ज्यादा समय से भारत में 'महिला आरक्षण बिल पास करने के अथक ...

Archive for December, 2009

भारत कि सुरक्षा को चीन की चुनौती::डाँ. राम तिवारी

Posted by Himalini On December - 2 - 2009 ADD COMMENTS

ram tiwariचीन विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। वर्तमान में इसकी
कुल जनसंख्या 1 अरब 27 करोड़ 31 लाख से अधिक है। इस देश की राजधानी बीजिंग (पुराना नाम पीकिंग) है तथा प्रमुख भाषा चीनी (मेंडारिन) है। इस देश का प्रमुख धर्म सरकारी स्तर पर अनीश्वरवादी है फिर भी ज्यादातर आबादी बौद्ध व ताओ धर्म की अनुयायी है तथा जातीय समूह हान चाइनीज है। यहाँ की मुद्रा युआन है।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार ईसा पूर्व 1500 में चीन में शांग राजवंश का शासन स्थापित था। सन् 1911 ई0 में एक जनक्रांति के द्वारा मांचू राजंवश का तख्ता पलट करने के बाद डॉ0 सन-यात सेन ने औपचारिक तौर पर 1 जनवरी 1912 ई0 को गणतंत्र की स्थापना की। कुओमितांग पार्टी के संस्थापक डॉ0 सन-यात सेन ने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में चीन की प्रगति के लिए अनेक कदम उठाए, किन्तु पराजित हुई राजशाही के कृत्यों के चलते यह देश एक बार पुनः गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। इस घटना के बाद चीनी राजनीतिक पटल पर सबसे शक्तिशाली व्यक्त्वि के रूप में माओत्सेतंुग का पदार्पण हुआ जिन्हें माओजिडांग के नाम से भी जाना जाता है। इन्होनें राजशाही समर्थकों व कुओमितांग पार्टी के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया। 1 अक्टूबर 1949 ई0 को माओत्सेतुंग के नेतृत्व में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की स्थापना हुई। माओत्सेतंुग के कार्यकाल में देश की प्रगति के लिए ‘महान अग्रगामी उछाल नीति (दि ग्रेट लीप फारवर्ड 1958-60) और सांस्कृतिक क्रांति (1965-68) का सूत्रपात हुआ। चीन में सांस्कृतिक क्रांति का दौर भारी उथल-पुथल का था। माओत्सेतंुग ने बुजुर्वा (जमीदारों व पूँजीपति मानसिकता) वर्ग के समापन के लिए नृशंस कदम उठाए और सरकारी आतंंक के चलते अनेक बुद्धिजीवियों, शिक्षकों व व्यापारियों को उत्पीड़ित किया गया।

9 सितम्बर, 1976 ई0 को माओत्सेतुंग की मृत्यु के पश्चात् डेंग शियाओपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी की बागडोर संभाली। डेंग के आगमन से चीन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। 1980 ई0 से डेंग ने चीन मे नव आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किये जो साम्यवाद (कम्युनिज्म) की मूलभूत मान्यताओं से मेल नहीं खाते थे। डेंग के इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को चीन के वर्तमान शासक जारी रखे हुए है।

चीन आर्थिक नीतियों के सन्दर्भ में तो पूँजीवाद की राह पर चल निकला है, पर इस देश में राजनीतिक व्यवस्था के रूप में साम्यवाद वर्तमान में भी कायम है। प्रशासनिक व्यवस्था के लिहाज से चीन को 22 प्रांतों में विभक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त 5 स्वायत्तशासी क्षेत्र और विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (हांगकांग व मकाओ) है।

चीन की सेना को ‘जनमुक्ति सेना’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

मुक्ति आन्दोलन के दौरान अस्तित्व में आई जनमुक्ति सेना (लाल सेना) की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैः-

1. जन सेना होने के कारण यह जनता के विभिन्न कार्यों व उत्पादन में उनकी सहायता करती है।

2. सेना का मुख्य कार्य साम्राज्यवादी आक्रमण से देश की रक्षा करना व देश के निर्माण को संरक्षित रखना है।

3. सेना में राजनीतिक कार्य तत्वतः सेना में दल का कार्य है और दल के कार्यकारी संगठन ही राजनैतिक अंग है। राजनीतिक अंगों के माध्यम से दल सारी सेना की वैचारिक शिक्षा को निर्देशित करता है।

भारत और चीन के मध्य विवाद के प्रमुख बिंदु :-

1. मैकमोहन लाइनः- ब्रिटेन और तिब्बत के बीच हुए सन् 1914 ई0 के शिमला समझौते के तहत जो लाइन ब्रिटिश भारत और तिब्बत की सीमा रेखा के तौर पर खींची गयी थी उसे ही मैकमोहन लाइन कहते है। इस लाइन को सर हेनरी मैकमोहन जो इस समझौते के मुख्य समन्वयक व उस वक्त भारत में ब्रिटेन के विदेश सचिव थे, के नाम पर मैकमोहन लाइन कहा जाता है। 550 मील की यह लाइन भूटान से हिमालय के सहारे ब्रह्मपुत्र नदी के महान मोड़ तक जाती है। यह लाइन लगभग उतनी ही लम्बी है जितनी भारत नियंत्रित क्षेत्र और चीन अधिकृत क्षेत्र के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा। इस लाइन को भारत अपनी स्थायी सीमा रेखा मानता है जबकि चीन इसे एक अस्थायी नियंत्रण रेखा मानता है। इसके अलावा चीन मैकमोहन लाइन के दक्षिण में स्थिति अरूणाचल प्रदेश पर भी अधिकार जताता है।

2. अरूणाचल प्रदेश :- भारत का यह सुदूर पूर्वी राज्य भारत और चीन के मध्य विवाद का एक मुख्य विषय बना हुआ है। मैकमोहन लाइन के दक्षिण में स्थित इस विवादित क्षेत्र को भारत ने सन् 1954 ई0 में पूर्वोत्तर सीमा एजेंसी (छवतजी म्ंेज थ्तवदजपमत ।हमदबल. छम्थ्।) नाम दिया और 1972 ई0 में इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया। सन् 1987 ई0 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया। सन् 1937 ई0 में सर्वे ऑफ इंडिया ने प्रथम बार अपने नक्शे में मैकमोहन लाइन को आधिकारिक सीमा रेखा के रूप में दर्शाया था और इस विवादित क्षेत्र को भारतीय हिस्सा माना था। इसके बाद सन् 1938 ई0 में ब्रिटेन द्वारा अधिकारिक तौर पर शिमला समझौते के प्रकाशन के बाद इस क्षेत्र पर भारतीय अधिकार सिद्ध हो गया था। लेकिन सन् 1949 ई0 में चीनी क्रांति के बाद स्थापित साम्यवादी सरकार ने इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया और तब से लेकर वर्तमान तक यह दोनों देशों के मध्य विवाद का बिंदु बना है।

3. अक्साई चिन – जम्मू-कश्मीर के पूर्वी क्षेत्र में स्थित अक्साई चिन का रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्व है। इस पर फिलहाल चीन का कब्जा है, जबकि भारत सदैव से ही इस पर अपना दावा जताता रहा है। अक्साई चिन उइगुर भाषा का शब्द है और इसका अर्थ चिन का सफेद पत्थरों वाला रेगिस्तान होता है (यहाँ चिन का अर्थ क्विंग वंश से है) 5,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित तिब्बती पठार के इस हिस्से को सोडा मैदान भी कहा जाता है। यहाँ बारिश बहुत ही कम होती है। इस हिस्से में आबादी न के बराबर है (चीनी सैनिकों को छोड़कर)।

अक्साई चिन 19वीं शताब्दी तक लद्दाख साम्राज्य का अभिन्न हिस्सा था। इसके बाद जब लद्दाख पर ‘कश्मीर’ का नियंत्रण हो गया तो ‘अक्साई चिन’ भी कश्मीर साम्राज्य का हिस्सा बन गया। सन् 1950 ई0 के दशक में अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर लिया और इस क्षेत्र में होते हुए उसने तिब्बत तक एक सड़क ‘चीन राष्ट्रीय राजमार्ग-219′ का निर्माण शुरू कर दिया। इसी सड़क के निर्माण को लेकर भारत-चीन के सम्बन्ध इस स्तर तक बिगड़े की इसकी परिणति 1962 ई0 के भारत-चीन युद्ध में हुई। अक्साई चिन का दायरा लगभग 38,000 वर्ग किमी0 है। चीन के लिए अक्साई चिन चीन राजमार्ग जिक्यिाँग एवं तिब्बत को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करता है और उसके लिए यह मार्ग सामरिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। स्त्रातजीय दृष्टि से भारत के लिए भी इस क्षेत्र का अधिक महत्व है क्योंकि यह एक ऐसा स्थल बिन्दु है जहाँ रूसी गणराज्य (तजाकिस्तान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत व चीन के भू-भाग मिलते है।

4. ब्रह्मपुत्र को मोड़ने की योजना :- चीन वर्तमान में एक ऐसी योजना को अंजाम देने की कोशिश कर रहा है। जिससे भारत की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। चीन की मंशा है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी से सलााना दो सौ अरब घन मी0, पानी येलो नदी में डाल दें। ब्रह्मपुत्र नदी से पानी लेने की योजना पर चीन पिछले कई वर्षों से कार्य कर रहा है। यह चीन की विशाल ‘साउथ नोर्थ वाटर लिंक’ योजना का हिस्सा है। चीन के इस कोशिश को नदी में ‘पानी की डकैती के रूप में देखा जा सकता है। भारत और बांग्लादेश के लिए ब्रह्मपुत्र पानी के बड़ी स्त्रोतों में से एक है। यदि चीन इस योजना में सफल हो जाता है तो इससे भारत के लिए जल-विज्ञान और भू-विज्ञान सम्बन्धी खतरे पैदा हो जाएंगे। चीन शूमाटन प्वाइंट पर प्रस्तावित बाँध के लिए ब्रह्मपुत्र नदी से पानी लेने की योजना बना रहा है। यह जगह चीन के हिमालय क्षेत्र मे है। यह वह जगह है जहाँ भारतीय और यूरेशियन प्लेटें मिलती है जिसकी वजह से भारतीय क्षेत्र में भूस्खलन या भूकम्प जैसी गतिविधियाँ होने की आशंका ज्यादा रहती है।

5. हिमालय पर चीन का खतरा :- चीन सतलुज और उसकी सहायक नदियों पर तिब्बत में कई बिजली परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है। इसके कारण बरसात के मौसम मंे यह नदियाँ हिमाचल प्रदेश में तबाही ला सकती है। दूसरी ओर गर्मियों में इनके कारण पानी का अकाल पड़ सकता है। जानकारी बाँटने के लिए भारत के साथ किये गये समझौते का पालन भी चीन नहीं कर रहा है।

6. तिब्बत का बिन्दु :- चीन के कब्जे में आने से पहले तिब्बत की भूमिका ब्रिटिश भारत और उत्तर-पूर्वी एशियाई देशों के बीच एक ‘बफर स्टेट’ के रूप में थी। उस समय बाहरी विश्व से तिब्बत का जो भी व्यापारिक या सांस्कृतिक सम्पर्क होता था वो भारत के जरिए होता था। सन् 1949 ई0 की चीनी क्रांति से पहले तिब्बत की राजधानी ल्हासा में भारत और चीन के दूतावास स्थापित थे।

सन् 1892 ई0 में तिब्बत को लेकर चीन ने दावे करने शुरू कर दिए और सन् 1913 ई0 तक उसने कई बार तिब्बत पर कब्जा करने के असफल प्रयास किये। सन् 1913 ई0 में तिब्बत ने स्वतन्त्रता की घोषण कर दी और सन् 1914 ई0 में इस मुद्दे को लेकर शिमला में बैठक हुई। ब्रिटेन, तिब्बत और चीन के बीच हुई इस बैठक में तिब्बत ने संप्रभुता की माँग रखी जिसे चीन ने मानने से इन्कार कर दिया। इसके बाद तिब्बत को आतंरिक व बाहरी तिब्बत में बाँटने का निश्चय किया गया। इसमें से बाहरी तिब्बत पर स्वायत्तता के साथ चीन की सर्वोच्चता स्थापित करने की बात कही गई। लेकिन चीन और आंतरिक तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण को लेकर बात बिगड़ गई और चीन इस बैठक से बाहर हो गया। बाद में तिब्बत ने ‘लोचन शात्रा शात्रा’ के नेतृत्व में और ब्रिटेन ने सर हैनरी मैकमिलन के नेतृत्व में द्विपक्षीय ‘शिमला समझौता’ किया और मैकमोहन लाइन अस्तित्व में आई। इस समझौता मे तिब्बत को एक स्वतंत्र राष्ट्र माना गया था न कि चीन का प्रांत। तब से लेकर अब तक चीन मैकमोहन लाइन को नकारता आ रहा है।

सन् 1949 ई0 में जब चीन में साम्यवादी सरकार बनी तब तिब्बत ने चीन से ल्हासा स्थित चीनी दूतावास छोड़ देने को कहा। इससे चीन और तिब्बत के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए। सन् 1950 ई0 की शुरूआत में चीन ने तिब्बत से शांतिपूर्वक विलय की बात कही और तिब्बत के पूर्व में स्थिति ‘चामदो’ शहर में अपनी सेना इकट्ठी कर ली। 7 अक्टूबर, 1950 ई0 को जब तिब्बती प्रतिनिधि मंडल चीन से वार्ता करने वाला था उसी समय चीन के 80,000 सैनिकों ने तिब्बत पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया और विश्व में प्रचारित किया कि हमने तिब्बतियों को साम्राज्यवादी शक्तियों (भारत) के शिकंजे से मुक्त कर दिया। इसके बाद 23 मई 1951 ई0 के दिन चीन ने दलाईलामा से 17 सूत्री समझौते पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करवा लिए और तिब्बत पर चीन का अधिकारिक कब्जा हो गया। इस घटना के बाद से दलाईलामा ने भारत में बहुत से तिब्बती लोगों के साथ शरण ले रखी है।

भारत के पड़ोसी देशों को चीन अपने प्रभाव में लेकर वहाँ भारत विरोध की जमीन तैयार कर रहा है यह स्थिति भारत के लिए खतरनाक होती जा रही है। पहले पाकिस्तान की बात करे तो चीन भारत के खिलाफ पाकिस्तान की नफरत का इस्तेमाल कर रहा है। नेपाल के माओवादी चीन से प्रशिक्षित है, वही से उनको हथियार और पैसा आ रहा है। भारत के खिलाफ साजिश रचने में चीन माओवादियों की भरपूर मदद कर रहा है। बांग्लादेश में चीन भारी मात्रा में पैसो का निवेश कर रहा है जिससे कि वह आगे चलकर भारत के विरूद्ध उसके बंदरगाह का प्रयोग कर सके। श्रीलंका में अनबटोटा में नौसेना का बंदरगाह चीन के सहयोग से बनाया जा रहा है। यह स्थिति भारत के लिए सामरिक दृष्टि से उचित नहीं है। सिक्किम के उत्तरी हिस्से में फिंगर टिप पर अगस्त 2009 के दूसरे पखवाड़े में चीन ने 1966 ई0 के द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन करते हुए गोलाबारी की जिससे दो जवान गम्भीर रूप से घायल हो गये। इस घटना से कुछ ही समय पहले ही 31 जुलाई, 2009 को लद्दाख में चीनी सैनिको ने घुसपैठ की और भारतीय सीमा के अंदर लाल झंडे लगाकर पत्थरों पर अपनी भाषा में चीन लिखने की हरकत की। चीन ढाई सौ से ज्यादा बार भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर चुका है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भारत को चीन के विरूद्ध ठोस कदम उठाने होंगे। क्योंकि चीन सिर्फ शक्ति की भाषा ही समझता है और अगर हम यह समझते है कि हमारी दोस्ती की भाषा से चीन प्रसन्न हो जाएगा तो ये हमारी सबसे बड़ी भूल होगी।

रक्षा विशेषज्ञ एवं प्रवक्ता

डाँ. संजीता सद्भावना में

Posted by Himalini On December - 2 - 2009 ADD COMMENTS

Sampadakiya
नेपाल से प्रकाशित एक मात्र हिन्दी पत्रिका हिमालिनी की संस्थापक संपादक एवं पद्मकन्या काँलेज में हिन्दी की उपप्राध्यापक डाँ. संजीता वर्मा नेपाल सद्भावना पार्टीमें शामिल हो गई हैं । कार्तिक 22 गते सद्भावना पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय में आयोजित भव्य मिलन समारोह में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा नेपाल सरकार के वाणिज्य तथा आपर्र्तिमंत्री राजेन्द्र महतो ने उन्हें सदस्यता प्रदान की । पत्रकारिता एवं हिन्दी के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में अनवरत सक्रिय रहने वाली डाँ. वर्मा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत सद्भावना पार्टी से की है । आशा ही नही अपितु विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि डाँ. वर्मा नेपाल की राजनीति में अपनी संगठन क्षमता का परिचय देते हुए एक सफल महिला राजनेत्री के रुप में उभरेगी । भव्य मिलन सदस्यता ग्रहण समारोह में पार्टी सहअध्यक्ष व नेपाल सरकार के मंत्री लक्ष्मणलाल कर्ण्र्था महासचिव अनिलकुमार झा के साथ-साथ अन्य लोगों की भी उपस्थिति थी ।
अपने संस्थापक संपादक डाँ. संजीता वर्मा द्वारा राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश का हिमालिनी परिवार स्वागत करते हुए उनके उत्तरोत्तर प्रगति की कामना करती है ।

सत्ता के बदलते समीकरण::प्रो.डाँ. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On December - 1 - 2009 ADD COMMENTS

विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी आन्तरिक कलह से उबर नहीं पाई है । कांग्रेस में सभापति गिरिजा प्रसाद कोईराला द्वारा वंशानुगत प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास तथा उसके विरुद्ध निर्मित ध्रुवीकरण के बीच संर्घष्ा जारी है । इसी प्रकार एमाले के भीतर भी कार्यनीति के प्रश्न पर निरन्तर संर्घष्ा जारी है । माओवादी के अभ्युदय के पश्चात् इन दोनों दलों के आगे अस्तित्व के लिए संर्घष्ा तथा सामयिक रुपान्तरण की अनिवार्य अवस्था उपस्थित हो गई है । ये दिनों-दिन असान्दर्भिक तथा कमजोर हो रहे हैं । ये दोनों दल अगर समय की आवश्यकता तथा परिवर्तन को आत्मसात नहीं कर पाते हैं तो इनका विस्थापन अवश्यमभावी है । सत्ता से पदच्युत होने के बाद माओवादी संसद से लेकर सडÞक तक आन्दोलन कर अपनी शक्ति प्रदर्शित करने में लगे हैं । ऐसी स्थिति में किसी भी राजनीतिक दल का उद्देश्य मात्र सत्ता पर काबिज होना है तो स्वाभाविक है कि उनके लिए संविधान निर्माण कार्य सेकेण्ड्री कार्य हो गया है ।
सिद्धान्ततः सभी प्रमुख राजनीतिज्ञ राष्ट्रीय सहमति की वकालत करते नहीं थकते हैं लेकिन व्यवहार में उनका आचरण ठीक इसके विपरीत है । अपने प्रतिद्वन्द्वी दलों के साथ सहमति की बात तो छोडिए प्रधानमन्त्री या उपप्रधानमंत्री पद प्राप्त करने के लोभ में नेता अपनी पाटी से भी व्रि्रोह करने से परहेज नहीं करते हैं । सत्ता प्राप्ति के लिए वही नेता जो कभी भारत तथा ज्ञढछण् की संधि के आलोचक थे, आज भारत सरकार का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए आतुर हैं । नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला सहमति तथा सहकार्य के महत्व की व्याख्या करते नहीं थकते हैं । एकीकृत नेपाल कम्युनिष्ट पाटी माओवादी के अध्यक्ष तथा पर्ूव प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल भी चीन भ्रमण के पश्चात् सहमति की बात करने लगे हैं । वर्तमान प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल भी अपनी कर्ुर्सर्ीीचाने के उद्देश्य से सहमति तथा सहकार्य की वकालत कर रहे हैं । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टर्ीीकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी के पिछले महाधिवेशन में अध्यक्ष पद प्राप्त करने में विफल केपी शर्मा ओली भी सहमति के पक्ष में अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं । एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल सहमति की खोज में दिल्ली पहुँच गए । कांग्रेस संसदीय दल के नेता रामचन्द्र पौडेल सहमति को लोकतन्त्र का आधार मानते हैं । लेकिन मुख से सहमति का जितना भी गुणगान किया गया हो, व्यवहार में इसका रति भर भी प्रयोग नहीं हो रहा । असहमति लोकतन्त्र की विशेषता है लेकिन लोकतन्त्र में निरपेक्ष सहमति के लिए कोई स्थान नहीं होता । लोकतन्त्र में असहमति को व्यवस्थित करने के लिए उपकरण का होना अनिवार्य होता है । आवश्यकता अनुसार सहमति बनने और बिगडÞने का सिलसिला निरन्तर जारी रहता है । ज्ञद्द सूत्रीय समझौता से लेकर आज तक की नेपाली राजनीति विभिन्न उतार चढÞावों की राजनीति है, जिसने देश में अस्थिरता को जन्म दिया है । इसके परिणाम स्वरुप वृहत् शान्ति समझौता तथा अन्तरिम संविधान के औचित्यता पर गम्भीर प्रश्न उपस्थित हो गया है । सत्ता के संसदीय खेल में संविधानसभा विलुप्त सी हो गयी है । राजनीतिक दल गणतंत्र तथा गणतांत्रिक पद्धति की आधारभूत मान्यता से भी विमुख हो गए दिखते है ।
र् वर्तमान माओवादी आन्दोलन जिस रुक्मांगत कटवाल प्रकरण पर आधारित है, वो तो कब का अवकाश प्राप्त कर चुके हैं । अब किस प्रकार उनकी पर्ुनबहाली और फिर उन्हें पदमुक्त किया जाएगा या फिर किस प्रकार राष्ट्रपति के कदम -माओवादी के अनुसार जो असंवैधानिक कदम) को संवैधानिक बनाया जाएगा, यह बात भी समझ में नही आती है । माओवादी आन्दोलन का उद्देश्य नागरिक सर्वोच्चता कायम करना है या फिर कुछ और यह समझ पाना मुश्किल है । विगत में अगर किसी से भी कोई गलती हर्ुइ है, तो उसे भविष्य में फिर नहीं दुहराए जाने की र्सतर्कता अनिवार्य है लेकिन इसके लिए आन्दोलन के नाम पर जनता को त्रसित करना कहाँ तक न्यायोचित है, यह एक विचारणीय प्रश्न है । निर्वाचन के पश्चात् माओवादी देश के सबसे बडÞे दल के रुप में उभर कर सामने आए हैं । अतः आवश्यक है कि वे तत्परता के साथ नए संविधान निर्माण प्रक्रिया में आगे बढÞें और संविधान में नागरिक सर्वोच्चता को स्थापित करने का प्रयास करें, जिसके लिए वे र्समर्थ भी हैं और सक्षम भी । इस प्रकार के आन्दोलनों से जनता त्रस्त हो चुकी है और सम्बन्धित दलों की छवि इससे जनता में सुधरने की बजाए और बिगडेगी । चाहे यह आन्दोलन माओवादियों का हो या फिर किसी और का । देश में बंद, हडÞताल के बदले आवश्यकता है शांति, सुरक्षा की जिससे कि आम नागरिक का जीवन यापन सामान्य हो सके ।
देश की राजनीति में माओवादी पार्टर्ीीे योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता है । एक दशक के लंबे सशस्त्र संर्घष्ा के पश्चात् संविधान सभा चुनाव के परिणाम स्वरुप देश में सबसे बडÞे दल के रुप में स्थापित होना बहुत बडÞी बात है । लेकिन क्यों आज उन्हें ही विरोध का झण्डा ढोना पडÞ रहा है, यह विचारणीय प्रश्न है । कल तक जो देश की सभी समस्याओं का समाधान संविधान सभा और नए संविधान में खोज रहे थे आज संविधान सभा की बैठक अवरुद्ध करके नए संविधान निर्माण की राह में सबसे बडÞा रोडÞा बन कर खडÞे हैं । एक बार लोकतांत्रिक पद्धति में प्रवेश के पश्चात् उन्हें इस पद्धति को संस्थागत करते हुए जनता के पक्ष में पद्धति के अन्दर ही सभी समस्याओं का हल ढुँढना होगा और यही उनके तथा जनता के पक्ष में होगा । वास्तव में माओवादियों में यह बोध होना आवश्यक है कि वे भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रमुख अंग हैं और उन्हें जनमत की शक्ति तथा उसमें अन्तरनिहित सामर्थ्य को पद्धतिगत रुप में स्थापित तथा प्रयोग करना होगा । माओवादियों को यह समझना होगा कि सबसे बडÞे दल होने के नाते उनकी जिम्मेवारी भी सबसे अधिक है । उन्हें किसी भी समस्या का सविवेक समाधान खोजना होगा, यही उनके, जनता के और देश के हित में होगा, अन्यथा देश में किसी दर्ुघटना की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता ।
सत्ताधारी नेकपा एमाले भी समस्या विहीन नहीं दिखाई देता है । पार्टर्ीीध्यक्ष झलनाथ खनाल खुद प्रधानमंत्री पद का सपना संजोए सत्ता के नए समीकरण की खोज में लगे हुए हैं, जबकि मधेशी जनअधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव वर्तमान सरकार में शामिल होने का संकेत दे रहे हैं । उल्लेखनीय है कि अभी दोनों ही नेता भारत भ्रमण से लौटे हैं । खनाल के भारत भ्रमण तथा भ्रमण काल में हर्ुइ विभिन्न भारतीय राजनीतिक हस्तियों से उनकी मुलाकात को नेपाली राजनीति में नए ध्रुवीकरण के संकेत के रुप में देखा जा रहा है । जबकि दूसरी धारणा यह है कि वर्तमान सरकार के प्रति खनाल के विरोधी तेवर को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें बुलाकर इसकी तीव्रता को कम करने का प्रयास किया है । माना जाता है कि खनाल ने भारत सरकार को इस बात से अवगत कराया कि उनके प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में राष्ट्रीय सरकार गठन हो सकेगा, जिसमें माओवादी पार्टर्ीीे भी शामिल होने की संभावना होगी । लेकिन भारत सरकार खनाल के विचार से सहमत नहीं दिखाई देती है और वर्तमान सरकार को ही मजबूत बनाने के पक्ष में है । कहा जाता है कि भारत सरकार ने उपेन्द्र यादव को भी वर्तमान सरकार का ही र्समर्थन करने का सुझाव दिया है ।
अध्यक्ष खनाल कार्तिक ज्ञढ गते के दिन भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा तथा गृहमंत्री पी. चिदम्बरम, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे महासचिव ए.बी. बर्धन, मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे महासचिव प्रकाश करात आदि नेताओं से मिले थे । इसके एक दिन पर्ूव उनकी मुलाकात अर्थमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश सचिव निरुपमा राव तथा विपक्षी नेता लालकृष्ण आडवाणी आदि नेताओं से हर्ुइ थी । मूलतः सभी नेताओं ने खनाल को सहमति तथा समझदारी अपनाने की सलाह देकर शांति प्रक्रिया को स्थापित करने का सुझाव दिया, ऐसा माना जा रहा है ।
दूसरी ओर जब से प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने वार्ता के लिए फोरम को औपचारिक पत्र भेजा है, तभी से फोरम की सरकार में सहभागिता की संभावना बढÞ गई है । कहा जाता है कि अपने को उपप्रधानमंत्री बनाए जाने की शर्त पर उपेन्द्र यादव सरकार में शामिल हो सकते हैं । लेकिन दूसरी तरफ पार्टर्ीीेता जयप्रकाश गुप्ता भी उपप्रधानमंत्री बनने की कतार में खडÞे हैं । कार्तिक ज्ञठ गते जिस समय उपेन्द्र यादव दिल्ली पहुँचे थे, उसी समय प्रधानमंत्री नेपाल ने फोरम को औपचारिक पत्र भेजा था जिसमें उनसे सरकार में शामिल होने का आग्रह किया गया था । फोरम अध्यक्ष यादव ने सहमति कायम होने की स्थिति में सरकार में शामिल होने के संकेत दिये हैं । भारत की भी इच्छा है कि फोरम सरकार में शामिल हो और माओवादी दल से उसकी दूरी बढÞे, ऐसी आशंका जताई जा रही है । सरकार में सहभागिता के प्रश्न पर फोरम नेतृत्व तथा प्रधानमंत्री के बीच अनेकों बार वार्ता हो चुकी है । दिल्ली प्रस्थान के पर्ूव भी फोरम अध्यक्ष यादव और प्रधानमंत्री नेपाल के बीच बातचीत हर्ुइ थी । जिसमें उन्होंने -अध्यक्ष यादव ने) अपने लिए वरिष्ठ उपप्रधानमंत्री पद की पेशकश की थी । लेकिन प्रधानमंत्री नेपाल की दुविधा यह है कि ऐसी स्थिति में वर्तमान उपप्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदार का क्या किया जाए – इन बातों का निष्कर्षजो भी निकले, इतना तो तय है कि सरकार के प्रति फोरम का रुख नरम दिखाई देता है ।
राजनीतिक दलों के बदलते समीकरण के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मुन द्वारा कार्तिक ज्ञघ गते के दिन प्रस्तुत नेपाल सम्बन्धी प्रतिवेदन में राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन की बात कह कर एक नए विवाद को जन्म दे दिया है । उनके इस वक्तव्य को जहाँ एक ओर माओवादी और उनके पक्षधर देश की अनिवार्य आवश्यकता बताते हैं वहीं उनके विरोधी राष्ट्रसंघ महासचिव पर एकपक्षीय बयान देने का आरोप लगा रहे हैं । नेपाल के प्रति मुन का यह पहला बयान नहीं है । इससे पहले भी वे आषाढÞ द्दज्ञ गते के दिन सुरक्षा परिषद में जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किये थे, उसमें समयावधि के भीतर संविधान निर्माण नहीं होने की शंका जताई थी । माओवादी नेतृत्व की सरकार के समय भी राष्ट्रसंघीय नेपाल मिशन अनमिन ने राष्ट्रीय सरकार गठन की आवश्यकता पर बल दिया था । माओवादी तथा मधेशी जनअधिकार फोरम को सरकार में सम्मिलित कराने के लिए चल रहे प्रयास के समय मुन का सुझाव आने से वर्तमान सरकार में सहभागी दलों के बीच शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है । यही कारण है कि उनकी दृष्टि में यह संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप है । कार्तिक ज्ञढ गते के दिन सरकार में सहभागी द्दद्द दलों द्वारा इस पर आपत्ति जताई गई है । इन घटनाओं के परिणाम स्वरुप जनमानस में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ वर्तमान सरकार के विकल्प की खोज में है – माओवादियों द्वारा अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार गठन करने की मांग को लेकर चलाए जा रहे जनआन्दोलन के समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव द्वारा दिए गए इस बयान से उन पर माओवादियों का पक्षधर होने का आरोप लगाया जा रहा है । लेकिन अनमिन के वरिष्ठ संचार अधिकारी कसमस विश्वकर्मा का मानना है कि मुन का बयान नेपाल के राष्ट्रीय हित में है और इसे आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता । महासचिव मुन की प्रतिक्रिया के विषय में माओवादी नेताओं का दृष्टिकोण अलग है । कार्तिक ज्ञढ गते के दिन इलाम में माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ने मुन की अभिव्यक्ति को सही ठहराते हुए कहा कि देश में राष्ट्रीय सरकार के अलावा दूसरा और कोई विकल्प नहीं है । इस तरह सरकार गठन के लिए जोडÞतोडÞ जारी है । अब देखना है कि उँट किस करवट बैठता है ।

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