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September , 2010
Wednesday
नेपालगन्ज के वरिष्ठ समाजसेवी तथा उद्योगपति कृष्णगोपाल टंडन बूढे होकर भी जवानी के जोश में ...
माउण्ट एवरेस्टको नेपाल में सगरमाथा कहा जाता है । माउण्ट एवरेस्ट नेपाल का है यह विश्वव्यापी रुप ...
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी ...
बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जारी ल्रि्रहान आयोग रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में एक नया ...
जुली तूफान कातिल रहजन, किस-किस की तुम बात करोगे एक है जान और लाखों दुश्मन, ...
नेपाली राजनीति के तथाकथित तीन बडे स्तम्भ के द्वारार्ई दिनों तक पाँच सितारा होटलों में ...
इस आधुनिक युग की दौडÞ में किसी भी व्यक्ति के पास इतना समय नहीं ...
वह हौवा है या भगवान जो भी है अब उसके सामने चुनौती वह खुद ही ...
कृतिक संपदा से भरपूर भारत का तमिलनाडु राज्य अपने जादर्इ सौर्न्दर्य से सैलानियों को मुग्ध करने ...
टुँडिखेल में सात दिनों तक चला चर्चित एवं विख्यात भारतीय योग्य गुरु रामदेव का योग-शिविर ...
जनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की ...
एडवांस लेप्रोस्कोपी र्सजरी विधि से आँपरेशन को लेकर पर्वाचल के विराटनर में जुटे चार देशों ...
नवर्निमाण में छात्र-युवाओं की भूमिका महत्वपर्ण् होती है । इतिहास गवाह है कि युवाओं ने ...
में यह कहा जाता है कि इसे घटाया या बढाया नहीं जा सकता है ...
सिनेमा को एक कमाउ उद्योग के रूप में लिया जाता है । सिनेमा की ...
नेपाली राजनीति के महानायक गिरिजाप्रसाद कोईराला की मृत्यु के परिणाम स्वरूप राष्ट्र ने एक अनुभवी ...
एक दशक से ज्यादा समय से भारत में 'महिला आरक्षण बिल पास करने के अथक ...
'अति र्सवत्र वर्जयेत्' इस सिद्धान्त के आधार पर नेपाल की सडक क्रान्ति से नेपाली जनता ...
चीन विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश ...
चलचित्र प्राविधिक संघ द्वारा आयोजित 'फिल्म अवार्ड' कार्यक्रम में 'म तिमी बिना मरिहाल्छु' फिल्म ...
नेपाल और भारत के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और ...
काभ्रे जिला का पनौती-१२ वर्षपर लगा मकर मेला में स्नान-पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति ...
मुर्म्बईया हिन्दी फिल्मी जगत में फिल्म सौदागर से एक नयी प्रतिभावान अभिनेत्री का प्रवेश हुआ, ...
निया भर में मोस्ट वान्टेड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिन्दा है यह खुलासा एफ.बी.आई. द्वारा ...
मंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते ...
धर्म की दुकान पर इतनी भीड क्यों -, पशुपति मंदिर के मूल भट्ट के नियुक्ति ...
हम छोटे थे, शहर गली में गलियारें या किसी नुक्कड पर या हो सकता ...
काठमांडू बसन्तपुर क्षेत्र, डाक्टर, इन्जीनियर वकील, व्यवसायी, कलाकार, स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों तथा विभिन्न पेशाकर्मियों ...
साधारण किरदारों की विशेष कहानी करण जौहर ने अपने संरक्षित और सफल घेरे से बाहर निकलने ...
मानव समुदाय दो प्रकार का होता है- प्रथम सभ्य समाज, दूसरा असभ्य मानव समााज । ...
नेपाली राजनीतिज्ञ भले ही संविधान निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण में विफल हो रहे हों, लेकिन ...
नागरिकता का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आया है । मधेशवादी नेता गजेन्द्र ...
नेपाल में नया“ संविधान जारी होने का निर्धारित तिथि जितनी नजदीक आती जा रही है, ...
मधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया ...

Archive for January, 2010

उठता विवाद::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

binaमंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते समय कोई सवारी साधन नहीं मिल रहा था । पुछताछ करने पर पता चला की सभी सवारी साधन बारा जा रहे थे । बडी मुश्किल से एक बस में नवलपुर तक के लिए सीट मिल सकी । जब बस के अन्दर घुसी तो वहाँ नजारा ही कुछ और था । यात्रियों के साथ-साथ बस विविध पशु-पक्षियों से भरा हुआ था यहाँ तक की बस के डिकी में भी बकरियाँ ही बकरियाँ थी । एक सहयात्री से पूछने पर पता चला कि ये लोग गढी माई मेला में भाग लेने जा रह हैं और अपने साथ लेकर जा रहें पशु-पक्षियों को माता को बलि चढÞायेगें । यह दृश्य केवल नेपाल के एक जिले की नहीं, बलकि मंसिर ७-८ गते को तर्राई के सभी क्षेत्रों में खचाखच लोगों से भरे सवारी साधन में सवार होकर बेतहाशा बारा की ओर चले जा रहें हैं यहाँ तक की विदेशों भारत, बंगलादेश से भी बडी संख्या में भक्तजन गढीमाई के इस पंच वषर्य मेला में सहभागी हुए और अपनी मनौती पूरा होने के उपलक्ष्य में विविध जीव-जन्तुओं को बलि चढायें । एक अनुमान के अनुसार, इस प्रकार मेला में आने वाले भक्तजनों की संख्या ४५ लाख थी और लगभग ५ लाख पशु-पक्षियों को माता को बलि दी गयी ।

प्रत्येक पाँच वर्षों पर बारा जिले के प्रसिद्ध गढी माई मंदिर में एक महीना तक मेला का आयोजना किया जाता है । इस एक महीना तक चलने बाले मेला में दो-तीन दिन माता को बलि चढाने का दिन निर्धारित होता है जो कि इस बार मंसिर ९-१० गते को था । पाँच वर्षके भीतर माता के नाम पर अपनी इच्छा पर्ण् होने पर लोग माता को बलि चढाने की मनौती मानते हैं और मनौती पर्ूण्ा होने पर पाँच वर्षपश्चात लगने वाले मेला में जाकर बलि के लिए माने हुए पशु-पक्षियों को बलि चढÞा कर अपनी मनौती का पूर्ण्हुति करते हैं ।

गढी माई मंदिर के मूल पुजारी मंगल चौधरी के घर में तांत्रिक विधि-विधान से रात्रि काल में पूजा किया जाता है जिसके पश्चात गढÞी माई मंदिर के निकट स्थित बड्डस्थान में एकाएक दिया जल उठती है, उसके पश्चात बलि देने का कार्यक्रम शुरु होता है ।
परम्परा के अनुसार, सबसे पहले गढी माई को पंचबलि चर्ढाई जाती है । उस में भी र्सवप्रथम एक श्वेत चूहा -जंगली), उसको बाद क्रमशः कबूतर, सुअर, बकारा तथा भैंसा की बलि देने की परम्परा है । पंचबलि दिये जाने के बाद हाथों में तेज हथियार जैसे खड्ग, तलवार लिये लोग बलि के लिए लाये गये जनावरों के भीड में घुसकर अंधाधुन्ध उनकी बलि चढाने लगते हैं फलतः जानवरों में डर के मारे भगदड मच जाती हैं । यह दृश्य भी युद्ध भूमि के दृश्य से कम प्रतीत नहीं होता है । इस बार २५० व्यक्तियों को मेला समिति ने बलि के लिये लाये गये पशु-पक्षियों को काटने हेतु नियुक्त किया था ।

बलि चढाने के लिए २ किलो मीटर क्षेत्र में बधशाला का निर्माण किया गया था । बलि चढाये गये जानवरों के सिर को मंदिर के नजदीक स्थित बनाये गये गढे में डालने की व्यवस्था की गयी थी । बलि चढÞाये जाने के कारण वहाँ के आस-पास का क्षेत्र रक्त की नदी में तब्दील हो गयी थी ।
मेला में देश-विदेशों से आये लोगों द्वारा बलि चढाने के लिए तांता लगा हुआ था । भारत के बिहार राज्य के एक व्यक्ति ने तो १५० भैसा का बलि माता को चढाया । इस बार पिछली बार की तुलना में ज्यादा बलि चढाया गया ।

बलि चढाये गये जानवरों का मांस को देश के विभिन्न भागों में खाने के प्रयोजन के लिए भेजा जाता है । इसके लिए ठेका-व्यवस्था की जाती हैं । इस बार दलितों के विरोध के कारण राजधानी काठमांडू में भैंसा का मांस नहीं जा सका ।
गढÞी माई में विविध पशु-पक्षियों को धर्म के नाम पर बलि देने का कार्य संसार की सबसे बडी ‘र्सार्वजनिक बध’ की घटना है ।

वैसे केवल गढÞीमाई मंदिर में ही बलि नहीं दी जाती है बल्कि नेपाल के विभिन्न मठ मंदिरों में वर्षभर बलि दी जाती है । दक्षिण काली मंदिर में भी सालों भर मनौती के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि चढर्Þाई जाती है । दर्ुगा-काली आदि देवियों को ही नहीं विभिन्न भैरवों को भी रक्त चढÞाने की परम्परा देश के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है ।

नेपाल में पशु-पक्षियों की बलि केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं दी जाती हैं । मुस्लिम समुदाय में तो उनके धर्म ग्रन्थों के अनुसार, सच्चे मुसलमान के पाँच आवश्यक गुण में एक कर्ुबानी -बलि) को आवश्यक भी माना गया हैं । देश के अनेक आदिवासी जनजातियों तथा बुद्ध धर्मावलम्बियों में भी बलि प्रथा प्रचलित है । वैसे बुद्ध धर्म में अहिंसा पर जोर दिया गया है लेकिन तिब्बत के बुद्धिज्म तथा ब्रजयोगिनी बुद्ध देवियों को बलि चढÞाने की परम्परा है ।

हिन्दू धर्म में बलि प्रथा की शुरुआत कब-कैसे हर्ुइ स्पष्ट तौर पर कहा नहीं जा सकता । लेकिन वेद के पर््रवर्तक आर्य जाति एशिया विशेषकर कैस्पियन सागर के पर्ूव की ओर बढÞते हुए सिन्धु नदी तक पहुँच कर भारतीय उप महाद्वीप में आकर फैल गये । इस प्रकार ये जहाँ जहाँ फैले वहाँ वहाँ की धार्मिक मान्यता परम्प्ारा एवं प्रचलन को भी अपनाते गये । वेद में ‘जीव ही जीव का भोजन है’ की बात कही गयी हैं । हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ पुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी अश्वमेघ यज्ञ में ‘घोडा बलि’, ‘नागमेघ’ में र्सप बलि जैसे यज्ञों की चर्चा है । उसी प्रकार समय-समय पर राजा-महाराजाओं एवं ऋषि मुनियों द्वारा भी अपने अनुष्ठानों में बलि देने की परम्प्ारा का उल्लेख है । इतना ही नहीं हिन्दू धर्म ग्रन्थों में तो नरबलि का भी उल्लेख है । वरुणदेव द्वारा नरबलि चढÞाने का उल्लेख रामायण में सीता जी द्वारा वनवास जाने के समय सकुशल लौटने पर गंगा माँ को बलि की मनौती मानी गई थी । काठमांडू के नरदेवी मंदिर नरबलि के ऐतिहासिक प्रमाण हैं ।
भारत के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर एवं छिन्नमस्तिका मंदिर में भी र्सार्वजनिक रूप में वलि देने की परम्परा है वैसे भारत में र्सार्वजनिक बलि मंदिरों में देने पर कानूनी रोक लगा दी गयी है । जहाँ नेपाल में दर्ुगापूजा के अवसर पर हजारों जीव जन्तुओं को बलि दी जाती है वहीं भारत में दर्ुगार्जी की बडी-बडी प्रतिमाएँ बनाकर पूजा करने की परम्परा है । वैसे देवी काली जी के नाम पर भारत मंे भी बलि देने की प्रथा है लेकिन पश्चिम बंगाल के कलकत्ता के प्रसिद्ध दक्षिण काली मंदिर में बलि नही दी जाती हं ।

हिन्दू धर्म के शैव सम्प्रदाय जब तांत्रिक मंत्र में दीक्षित होता है तब शिव के भैरव रूप एवं काली रूप में पूजा करने पर पशु-पंक्षियों को बलि देने की परम्परा है । शाक्त सम्प्रदाय बल्रि्रथा पर जोर देता है, उनके धार्मिक विश्वास के अनुसार, जबतक देवी को रक्त नहीं चढÞाया जाता है तबतक उनकी पूजा पर्ूण्ा नहीं होती । वैसे कहा जाता है की शाक्त साम्प्रदाय में बलि को महत्व ज्यादा होने का प्रमुख कारण पूजा तंत्र पर आधारित है । तन्त्र में पंचमकार अनिवार्य है जिस के अर्न्तर्गत मांस एवं मछली चढÞाना ।

नेपाल के मंदिरों में बलि प्रथा प्रचलित होने के कारण पूजाविधि तंत्र शक्ति पर आधारित होना है । यही कारण हैं कि देश के अनेक मंदिरों में मांस, मछली, अण्डा तथा शराब वगैरह देवी-देवताओं को चढÞाया जाता है ।

परापर्ूवकाल में ही तांत्रिक पूजा विधान की परम्परा के अर्न्तर्गत बलि प्रथा चली आ रही है और इस सदियों पुरानी परम्परा का अचानक रोक पाना असम्भव है । यही कारण है कि इस बार के गढÞीमाई मेला में बलि पर रोक लगाने के राष्ट्रीय-अन्तर्रर्ाा्रीय सभी प्रयास बिफल हो गये लेकिन इसे पर्ूण्ा असफल भी नहीं माना जा सकता । इन प्रयासों ने जनता के भीतर एक सन्देश तो अवश्य ही छोडÞा है कि क्या अपनी इच्छापर्ूर्ति के लिए किसी और जीवों की हत्या करना कहाँ तक उचित है – सपना को आधार बनाकर देवी-देवताओं के नाम पर निरीह असहाय जानवरों को काटना प्रकृति के नियम ‘जीयो और जीनें दो’ को कहाँ चरितार्थ करता है – यह कैसे विश्वास करने योग्य बात हैं कि सृष्टिकर्ता भगवान अपनी सृष्टि के नाश से खुश होता होगा – सृष्टिकर्ता ने मानव का विकास मांसाहारी के रूप में नहीं बल्कि शाकाहारी के रूप में किया है । व्यक्ति के दाँत एवं उसकी पाचनक्रिया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ।

पंचवषर्ीय गढÞी माई मेला में र्सार्वजनिक बलि को रोकने के लिए डेढÞ-दो महीना पर्ूव से ही विभिन्न पशुकर्मी, विभिन्न संघ-संस्थायें, संत-महात्माओं जिसमें तपस्वी रामबहादुर बम्जन, नेपाल कृष्ण प्रणामी विश्व हिन्दू महासंघ, भारत के पशु अधिकारकर्मी मेनुका गाँधी प|mांसीसी अभिनेत्री ब्रिजिट बार्र्डोट तथा अन्य प्रबुद्ध समाज के लोगों ने सरकार तथा जनता से अपील की, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला । यद्यपि वाद-विवाद की स्थिति का सृजना अवश्य हुआ ।
यह सही है कि सदियांे से चली आ रही यह परम्परा या प्रथा एकाएक बन्द नहीं हो सकती । वैसे भी नेपाल की जनता का एक बहुत बडÞा वर्ग निरक्षर है उन में जनचेतना, जागृति की कमी है । वैसी स्थिति में युगांे-युगांे से चली आ रही धार्मिक परम्पराओं रीति-रिवाजों को एकाएक परिवर्तित करना या उनपर प्रतिबंध लगाना किसी भी सरकार या संघ-संस्थाओं के लिए अत्यन्त ही कठिन कार्य है । वैसे जो प्रयास इस दिशा में शुरू हुआ है वह स्वागत योग्य हंै और सही दिशा में सही लक्ष्य को लेकर किया गया कोई भी प्रयास कभी भी विफल नहीं होता । यह प्रयास निरन्तर जारी रहा तो एक दिन यह प्रयास इस दिशा में ‘मील का पत्थर’ साबित होगा ।

बलि-प्रथा पर रोक लगाने के सम्बंध में सबसे पहले सरकारी तौर पर एवं संघ-संस्थाओं के माध्यम से भी मठ-मंदिर के पुजारियों को शिक्षित करना होगा जिनकी बातों का सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण भोले-भाले जनता में होती है । इसके साथ ही, राजनीतिज्ञों, सामाजिककर्त्तर्ााें को भी अपने नीजी स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने सन्देशों, भाषणों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से बलि प्रथा के कारण उत्पन्न समस्याओं, दुष्परिणामों के प्रति जनता में जागृत्ति तथा चेतना फैलाना होगा । तभी असहाय, निरीह, अबोध पशु-पंक्षियोें के वध का सिलसिला रुक सकेगा ।

मांस खाने के नाम पर पशुओं को काटना एक अलग बात है लेकिन धर्म के नाम पर इस प्रकार का कृत्य कहाँ तक जायज हैं – मनौती माननी ही हैं तो फल-फूल-मिर्ठाई आदि सामग्रियाँ मानें, चढÞायें और प्रसाद ग्रहण करें । जिनका निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है उनका नाश करने का किसी को भी अधिकार नहीं हैं ।

भारतीय फिल्म निर्माता प्रकाश झा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

Prakash_Jha_Rajneetiभारतीय फिल्म निर्माता प्रकाश झा की कहानी किसी भी फिल्म से कम नहीं है । भारतीय राज्य बिहार के चम्पारण में जन्मे प्रकाश झा वर्त्तमान समय में एक सफल फिल्म निर्मात्ता के रुप में भारतीय फिल्म जगत में अपनी सफलता का परचम लहरा रहे हैं ।
पेंटर बनने का सपना देखने वाले प्रकाश झा को ‘धर्मा’ की शूटिंग ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया । इसके लिए उन्होने एफ. टी. आई. आई -पूणा) की राह ली । फिल्म ‘हिप हिप हर्र्रर्से बतौर निर्देशक के तौर पर करियर की शुरुआत करने वाले प्रकाश झा ने ‘दामुल’, ‘मृत्यु दण्ड’, ‘गंगाजल’ एवं ‘अपहरण’ जैसी फिल्में बनाकर दर्शकों की ही नहीं बल्कि समीक्षकों एवं आलोचकों की भी प्रशंसा बटोरी । इन दिनो अपनी भव्य मल्टी स्टार महत्वाकांक्षी फिल्म ‘राजनीति’ को लेकर प्रकाश झा चर्चा में हैं ।

एक सवाल के जबाव में वे कहते हैं मैं एक सामाजिक प्राणी हूँ, राजनीति से प्रेम करता हूँ । मुझे लगता है भारत के अलावा दुनिया में जितने भी देश हैं और वहाँ लोकतन्त्र है, राजनीति आम इंसान से लेकर खास तक सभी को प्रभावित करती आयी है । इसलिए मुझे लगा कि इसे समझना और इस पर बात करना जरुरी है । यही वजह है कि मैं ‘राजनीति’ जैसे विषय पर फिल्म बनाने को प्रेरित हुआ । लोग समझते हैं कि मैं सक्रिय राजनीति में हूँ और दो बार लोकसभा का चुनाव भी लड चुका हूँ तो इसलिए मैने ‘राजनीति’ फिल्म बनाने की बात सोची है, मगर ऐसी बात नहीं है । राजनीति में आने से पहले मै राजनीति के विभिन्न पहलुओं को समझता-देखता आया हूँ और यह बता दूँ कि मैं पहले फिल्मकार हूँ । राजनीति अलग पहलू है ।
फिल्म ‘राजनीति’ के विभिन्न किरदारों में आपको अनगिनत शेड्स देखने को मिलेंगे । साथ ही इस फिल्म का किसी भी जीवित या मृत राजनेता से कोई संबंध नहीं है । कई लोग कैटरिना कैफ के रोल की तुलना सोनिया गाँधी से कर रहे है पर यह सच नहीं है । हाँ, आपको कुछ घटनाएँ, चरित्र व रंग जरुर मिलते-जुलते नजर आयेंगे ।

प्रकाश झा फिल्म निर्माण में आनेवाली चुनौतियों पर कहते हैं यों तो मेरे लिए हर फिल्म बनाना चुनौती होती है मगर ‘राजनीति’ भी काफी चुनौतीपर्ूण्ा रही । यदि इसकी शूटिंग मैं निर्धारित -१०६ दिन) से एक दिन पहले अर्थात १०५ दिनों में कर पाया तो इसका श्रेय मैं अपने तमाम कलाकारों व तकनीशियनों को देना चाहूँगा । साथ ही सहयोग के लिए भोपाल के लोगों की दाद देना चाहंूँगा । मेरे तमाम कलाकारों यथा अजय, रणबीर, मनोज, नसीर जी, अर्जुन रामपाल का मैं शुक्रगुजार हूँ । सभी ने कडी मेहनत की है । अजय ने तो कमाल का काम किया है । जहाँ तक कैटरीना के रोल की बात है तो राजनेता के रोल के लिए शारीरिक हाव-भाव के अलावा सवांद अदायगी को परफैक्ट बनाने में उसने जी जान लगा दी है ।

हाँ, नाना पाटेकर के साथ गलत फहमियों व मिस कम्युनिकेशन के चलते थोडी सी अनबन हो गयी थी । मगर अब सब ठीक है । आप जब एक प्रोजेक्ट पर काम करते हैं तो छोटी-मोटी बातें हो जाना आम बात है । मगर नाना पाटेकर ने अपनी शूटिंग पुरी कर ली और अब किसी तरह की समस्या नहीं है ।

अपनी फिल्म ‘राजनीति’ के बारे में प्रकाश झा कहते हैं इस फिल्म को लेकर मैं काफी उत्साहित हूँ । क्योंकि अपने एनजीओ व युटीवी के कोलावरेसन के तहत हम मई में इसका प्रिमियर विश्व के १०-१२ देशों में करेंगे और उससे प्राप्त फंड से बिहार में एक बडÞा अस्पताल बनायेंगे । इसकी स्टार कास्ट में १०-१२ दिग्गज हैं । मई तक उन सभी ने प्रण लिया है कि वे इसके तमाम प्रिमियरों में भाग लेंगे ।
अपनी नयी फिल्म ‘राजनीति’ को लेकर निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा खासे उत्साहित हैं । चम्पारण के इस लाल ने दुनिया के पैमाने पर फिल्म निर्माण के क्षेत्र में एक नयाँ कर्ीर्तिमान स्थापित किया है । चम्पारण समेत सूबे बिहार व फिल्म उद्योग के विकास को लेकर समर्पित प्रकाश झा युवाओं को सीख देते हैं कि उन्हे सफलता प्राप्त करने के लिए पूरे उत्साह के साथ अपने कार्य को अजांम देना चाहिए । प्रत्येक युवा को चाहिए कि वे अपने लक्ष्य को निर्धारित कर काम करें सफलता तो उन्हे अवश्य मिलेगी । बिहार की धरती पर फिल्म उद्योग को स्थापित करने की मंशा पाल रहे श्री झा कहते हैं मेरी यह इच्छा है कि बिहार में फिल्मसिटी बने और उसमें बिहार तथा पडोसी देश नेपाल के नये-प्रतिभावान कलाकारों को काम मिले ।
-फिल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा से वार्ता पर आधारित)

फिल्म अवार्ड समारोह सम्पन्न

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

चलचित्र प्राविधिक संघ द्वारा आयोजित ‘फिल्म अवार्ड’ कार्यक्रम में ‘म तिमी बिना मरिहाल्छु’ फिल्म ने उत्कृष्ट फिल्म सहित विविध क्षेत्रों में नौ अवार्ड जीता । इस फिल्म में र्सवश्रेष्ठ अभिनय के लिए भुवन केसी को उत्कृष्ट अभिनेता तथा झरना थापा को र्सवश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवार्ड दिया गया ।
Rajesh-hamal__r1_c1म तिमी बिना मरिहाल्छु’ फिल्म में पटकथा के लिए विकास आचार्य और ब्रजेश खनाल को, द्वन्द्व निर्देशन के लिए राजेन्द्र खड्गी को, छायांकन के लिए शम्भू सापकोटा को, सम्पादन के लिए बनिश शाह को और गायन के लिए आनन्द कार्की को अवार्ड प्राप्त हुआ है ।

फिल्म ‘मिस्टर मंगल’ को जुरी अवार्ड मिला । र्सवश्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड ‘मिस्टर मंगल’ फिल्म के लिए ही किशोर राणा को दिया गया । इसी फिल्म के लिए युगेश रायमाझी को संवाद, दिवस उप्रेती को सह-अभिनेता, शक्ति पाण्डेय को हास्य कलाकार का महाराज थापा को पार्श्व संगीत तथा राकेश लामा को बाल-कलाकार का अवार्ड प्राप्त हुआ । ‘नशिव आप\mनो’ फिल्म के लिए फिल्म लेखक विकास आचार्य को नवनिर्देशक का अवार्ड दिया गया जबकि जीवन लर्ुइंटेल को नव-अभिनेता और फिल्म सन्देश के लिए रेजिना को सह-अभिनेत्री का अवार्ड मिला । सन्देश फिल्म के लिए ही शोभित सिम्खडाल को नव-अभिनेत्री का, सिलसिला फिल्म के लिए वसन्त सापकोटा को संगीत निर्देशक एवं अन्जु पन्त को गायिका का र्सवश्रेष्ठ अवार्ड मिला ।
नृत्य निर्देशन में गोविन्द र्राई को गिरफ्तार फिल्म के लिए तथा सुशील क्षेत्री को ‘विष’ फिल्म में खलनायक का र्सवश्रेष्ठ अवार्ड मिला ।
चरित्र अभिनेत्री का अवार्ड मिथिला शर्मा को फिल्म जय शिव शंकर के लिए दिया गया । कार्यक्रम में महानायक के रूप में सम्मानित हुए राजेश हमाल । राजेश हमाल बाबुराम दाहाल के रचना पर तैयार जीवनी झलकी में प्रस्तुत हुए ।

लेप्रोस्कोपी कार्यशाला सम्पन्न::वरुणमाला मिश्रा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

barunmalaएडवांस लेप्रोस्कोपी र्सजरी विधि से आँपरेशन को लेकर पर्वाचल के विराटनर में जुटे चार देशों के सैकडों र्सजनों ने गत दिनों विराट हास्पीटल एण्ड रिर्सच सेन्टर में अपने-अपने अनुभव बाँटे । दो-दिवसीय अन्तर्रररीय कार्यशाला में नेपाल, भारत, जर्मनी व कजाकिस्तान के सैकों चिकित्सकों ने भाग लिया । वर्कशाँप कार्यशाला में लेप्रोस्कोपी विधि से आँपरेशन कर रहे डाक्टरों ने शल्य चिकित्सा की विभिन्न विधि-तकनीक एवं अपने अनुभवों का आदान-प्रदान किया । इस मौके पर एक दर्जन माहिलाओं के बच्चेदानी का सफल आपरेशन का लाइव टेलीकास्ट दिखाया गया । इस मौके पर विशिष्ट अतिथि के रूप में जर्मनी के वरिष्ठ र्सजन डा. एच. आर. टेनर्ेवर्ग सहित कजिकिस्तान के डाक्टर रूसलमसुले एवं भारत के दर्जनों र्सजन के अलावा चिकित्सक ज्ञानेन्द्रमान सिंह कार्की द्वारा आँपरेशन करने की विधि को दिखाया गया । इस आयोजन के संयोजक विराट हास्पीटल के चेयरमैन तथा स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. ज्ञानेन्द्रमान सिंह कार्की ने बताया कि इस अन्तर्रर्रीय वर्कशाँप का उद्देश्य शेयरिंग आँफ इक्सपेरियन्स है । एडवांस लेप्रोस्कोपी विधि से १५ हजार आँपरेशन कर चुके डाक्टर कार्की ने बताया कि इस विधि को बढÞावा देने एवं इसके लिए लोगों को जागरुक करने के लिए जन-जागरण की आवश्यकता है । डा. कार्की ने यह भी बताया कि बिना चीर-फाडÞ के इस आँपरेशन के कई फायदे हैं । इसमें चीर-फाडÞ नहीं किया जाता जिससे घाव में दर्द कम होता है । दर्द कम होने के कारण दवा कम लगती है और मरीज जल्द डिस्चार्ज हो जाते हैं । जिसके कारण मरीजों के परिजनों पर आर्थिक बोझ भी कम पडÞता है । जर्मन में एक ट्रेनर के रूप मे काम कर चुके डा. कार्की ने बताया कि लेप्रोस्कोपी विधि से सबसे पहले १९८७ मे पस के चिकित्सक डा. फिलिप मोरे ने पहला सफल आँपरेशन किया था ।

नेपाल में पहली बार मेडिकल क्षेत्र में नयी तकनीक के प्रयोग हेतु आमन्त्रण पर पंहुचे जर्मनी के वरिष्ठ र्सजन डा. टेनर्ेवर्ग ने बताया कि यह विधि कैंसर रोगियों के इलाज में भी कारगर है । उन्होने कहा कि पडÞोसी देश भारत सहित अन्य विकासशील देशों में इस विधि को तेजी से अपनाया जा रहा है । जर्मनी के गायनी एंडोस्कोपिक सोसाइटी के अध्यक्ष ५९ वषर्ीय श्री टेनर्वर्ग ने बताया कि चीर-फाड नहीं होने के कारण कैंसर रोगियों के बीच लेप्रोस्कोपी र्सजरी विधि बहुत प्रभावकारी साहित हो रही है । वरिष्ठ चिकित्सक टेनर्ेवर्ग ने कहा कि वे भारत के कई महानगरों मे आयोजित अन्तर्रर्रीय वर्कशाँप में भाग ले चुके हं । नेपाल के चिकित्सक भी इस विधि का प्रयोग करें इस से वे नेपाल दौरे पर पहुँचे हैं । दो दिनों तक चले मेडिकल के नये तकनीकी के पर््रदर्शन में कई वरिष्ठ र्सजन जिसमे क्रमशः डा. लता वी खडÞका, डा. सुनील कुमार, डा. राहुल आर्वे, डा. राजेन्द्र वैद्य, डा. जयंत शर्मा, डा. अनिल कुमार सहित दर्जनों र्सजन मौजूद थें । दो दिवसीय इस वर्कशाप का उद्घाटन पर्ूवाञ्चल विश्विद्यालय के उपकुलपति प्रो. डा. रामअवतार यादव ने किया जबकि मंच संचालन
डा.आष्दीप शर्मा ने किया ।

जनकपुर का अस्तित्व संकट में::डी जे.मैथिल

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

janaki-mandirजनकपुर- धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध प्राचीन मिथिला की राजधानी जनकपुर को अब तक विश्वस्तरीय पहचान नहीं मिल सकी है । यहाँ का जानकी मन्दिर आकर्ष और विश्व-प्रसिद्ध होते हुए भी विश्व सम्पदा सूची में शामिल नहीं हो सका है जो हैरत की बात है । जबकि काठमांडू उपत्यिका का भक्तपुर दरबार विश्व-संपदा सूची में है । जनकपुर के राजनेता और बुद्धिजीवी अपने भाषण-सम्बोधन में जानकी मन्दिर की चर्चा करते नहीं थकते । वे इसे मिथिला की शान के रूप में प्रस्तुत करते हैं लेकिन जानकी मन्दिर को विश्व सम्पदा सूची में शामिल कराने में अब तक ये राजनेता एवं बुद्धिजीवी असफल ही रहे हैं । अत्यधिक राजस्व देने वाली यह पौराणिक नगरी आज भी उपेक्षित है । जनकपुरधाम ५२ तालाब सहित विभिन्न ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है । यहाँ का धनुष सागर, गंगा-सागर, विषहरा पोखर, गोड धोई पोखर, दशरथ तालाब, इन्द्र सरोवर, सीता कुण्ड, राम तालाब एवं जनक कुण्ड आदि अतिक्रमण के चपेट में हं । इन सभी तालाबों का नामों-निशान मिटता जा रहा है । लेकिन इन सभी धरोहरों पर किसी की ध्यान नहीं है । जनकपुर के राममन्दिर की हालत भी दिन-प्रतिदिन बिगडती जा रही है । राममन्दिर की छत कभी भी धराशायी हो सकती है । राममन्दिर के महंथ राम गिरि मन्दिर की स्थिति को लेकर काफी चिन्तित हैं । यहा के कर्मचारी सरकार से पैसा तो लेते हैं लेकिन अपने कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं हैं । यहा पचासों वर्षपुरानी नियमावली आज भी लागू है जो अनुचित है । वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र परिषद् की तरफ से राममन्दिर को पाँच लाख रूपये कुछ दिन पहले प्राप्त हुआ था लेकिन अब उसका कोई अता-पता नहीं है पूछे जाने पर महंथ राम गिरि कहते है कि मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं हैं ।

जनकपुर में रेलवे की भी स्थिति खराब है । हमेशा यहाँ रेल का डिब्बा पटरी से उतर जाता है जिससे यात्रियों में भय बना रहता है । नेपाल सरकार ने जनकपुर रेलवे का नाम तो बदलकर नेपाल रेलवे कम्पनी लिमिटेड कर दिया लेकिन रेलवे में विकास एवं सुधार की चिन्ता सरकार को नहीं है । रेलवे के अध्यक्ष तथा यातायात व्यवस्था कार्यालय जनकपुर के प्रमुख जमुना पंजियार आजकल सिर्फकर्र्सर्ंभालने में व्यस्त हैं । रेलवे की व्यवस्था व विकास के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि हम अकेले क्या-क्या करें – जनकपुर की सडÞक व्यवस्था भी जर्जर है । सडÞकों पर कूडेर्-कर्कट के ढेर लगे हैं । इन सडÞकों पर सवारियों की कौन कहें पैदल चलना मुश्किल है । नगरपालिकाकर्मियों को साफ-सफाई की चिन्ता नहीं है । विकास के नाम पर मौन, जिला विकास समिति भी सरकारी धन के बन्दरबाट में लगी है ।

कुल मिला कर जगत जननी माता सीता की पवित्र जन्मस्थली पौराणिक मिथिला राज्य की राजधानी जनकपुरधाम समस्याओं के मकड जाल में उलझकर रह गयी है । जनकपुर की स्थिति को देखकर यह लगता है कि राम-जानकी स्वयंवर का प्रत्यक्ष गवाह बना यह पौराणिक शहर अब किसी सरकार या प्रशासन के भरोसे नहीं बल्कि भगवान श्रीराम एवं माता जानकी की प्रतिक्षा में है कि कभी न कभी श्रीराम यहाँ पहुँच कर इस पौराणिक नगरी का उद्धार जरूर करेंगे ।

नेपाली फिल्म और सेन्सर बोर्ड::आर.सी. यादव

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

सिनेमा को एक कमाउ उद्योग के रूप में लिया जाता है । सिनेमा की कमाई से ही आज कई देश सम्पन्न हैं । सिनेमा के विकास के लिए वे देश सिनेमा उद्योग को महत्वपर्ण् योगदान करते आ रहे है । लेकिन नेपाली सिनेमा उद्योग के विकास से नेपाली सेन्सर बोर्ड भी बेखबर लगता है ।

आज नेपाल में एक तरह से देखा जाए तो सिनेमा बनाने बाले और इससे जुडे हुए लोग सन्तुष्ट नहीं लगते हैं । कारण एक ही है कि उनको कोई सहयोग नहीं करता । यदि नेपाली सिनेमा को जाँच-पास करने वाली संस्था सेन्सर बोर्ड की बात करते है तो उसे मालुम होना चाहिए कि सिनेमा की Category क्या होनी चाहिए – आज जो सिनेमा बन रही हैं वे किस वर्ग, कौन से बनभ गु्रप और किस मकसद से बनायी जा रही हैं ।

विश्व बजार में जो सिनेमा बनती है उन सबकी एक ऋबतभनयचथ होती है । जिसे सिनेमा बनाने वाले उन्हें पहले ही सूचित करते हैं । सिनेमा बन जाने के बाद ऋबतभनयचथ के तहत उन्हें र्सर्टिफिकेट भी वे प्रदान करते हैं और जो उपयुक्त दर्शक होते हैं, उन्ही को वह सिनेमा दिखाई जाती है । सेन्सर बोर्ड के झमेलों में उन्हें कभी नहीं खींचा जाता है । लेकिन नेपाली सेन्सर बोर्ड को इस से कोई मतलब ही नहीं है । वे जिसको जैसा चाहे वैसा ही र्सर्टिफिकेट थमा देते है । इससे दोनों को घाटा होता है । दर्शक ऋबतभनयचथ देखते हैं तो सिनेमा बनानेवाले इस से होने वाली कमाई ।
सिनेमा बनाने वाले खास करके सिनेमा के माध्यम से निर्माता लोग दर्शकों को दो तरीकों से सिनेमा के प्रति आकषिर्त करना चाहते हैं । एक विशुद्ध मनोरंजन और दूसरा प्यार और सेक्स के जरिए । लेकिन कभी-कभी दोनों को मिश्रति कर के भी सिनेमा बनाई जाती हंै । जैसे भारतीय सिनेमा उद्योग में सिनेमा को A, B, C Category के तहत र्सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता है । लेकिन नेपाली फिल्म में सेन्सर ऐसा कुछ नहीं करता । हालांकि कुछ महिने से सेन्सर बोर्ड ने सिनेमा को ९ब्मगति० ब्। ऋबतभनयचथ का र्सर्टिफिकेट देने का काम किया है । जबकि उसे सिनेमा में ब्मगति टाइप का कोई सीन ही नहीं है । १८ साल से कम उम्रवालों को वर्जित कर के ही कोई सेन्सर वोर्ड Adult का र्सर्टिफिकेट देता है । जिस में देखा जाए तो सेक्स को प्राथमिकता दी जाती है । एक तरीके से देखा जाए तो सेक्स को प्राकृतिक स्वभाविक शारीरिक आवश्यकता भी माना जाता है ।

हम बात कर रहे हैं नेपाली फिल्म की, इनमें से कुछ फिल्मों का नाम भी लिखना चाहूंगा, फैसला, युग देखी युग सम्म और ‘पल पल मा’ इनको Adult का र्सर्टिफिकेट दिया गया है । लेकिन इनमें सेक्स से सम्बन्धित कोई भी खुला दृश्य नहीं है । सिर्फदर्शकों को भ्रम में रखने की कोशिश की गई है । इसमें किसी को ड्रेस के कारण, किसी को उत्तेजक गीत के कारण, तथा किसी को चुम्बन दृश्य को लेकर ऐसा र्सर्टिफिकेट दिया गया है । लेकिन फिल्म कुसुमे रूमाल को कोई छाप नहीं लगाया गया जबकि इस सिनेमा में सेन्सर करनेवाली बहुत से संवाद और दृश्य थे ।

आज चोरी छिपे नेपाल में बहुत सी ब्लू फिल्में बन रही है । इस से समाज और युवा वर्ग दोनों पर नकारात्मक असर पड रहा है । एड्स जैसी खतरनाक बीमारियों का शिकार भी लोगों को होना पड रहा है । अगर ब्मगति सिनेमा का छाप लग ही रहा है तो हम चाहेंगे कि नेपाली सिनेमा उद्योग में भी ब्मगति सिनेमा बने जो सीमित वर्ग और ब्नभ गु्रप के लिए हो और सकारात्मक संदेश देकर सोंच का विकास करं । मुझे लगता है कि ब्मगति सिनेमा आज के युवा और नेपाली समाज दोनों की आवश्यकता है । अगर ये नहीं है तो अन्य देशों के ब्मगति सिनेमा का नेपाली बजार में कारोबार बन्द करें । साथ हीं नेपाली फिल्म को Adult र्सर्टिर्फिकेट देने पर भी रोक लगे ।
अन्त में हम नेपाली फिल्म को सेन्सर कर रहे सेन्सर बोर्ड और सिनेमा बनाने वाले दोनो से कहना चाहेंगे कि आप आम दर्शकों को भ्रम में न रखे । ब्मगति सिनेमा बनाना ही है तो उस सिनेमा में खुलम खुला दृश्य दें और सेन्सर करना ही है तो अबतभनयचथ देकर निःस्वार्थ मन से सेन्सर बोर्ड सेन्सर करें । जिससे आम दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन हो सके । आनेवाले दिनों में नेपाली फिल्म की categoryअन्य देशों के सिनेमा की तरह ही हो । हम इसकी आशा रखते हैं । जिससे नेपाली फिल्म भी विश्व फिल्म उद्योग में अपनी खास पहचान बना सकें ।

इस बारे में सेन्सर, बोर्ड निर्माता-निर्देशकों के साथ-साथ सिने उद्योग से जुडे सभी संघ-संस्थाओं एवं व्यक्ति द्वारा सामूहिक तथा र्सार्थक प्रयास किया जाना जरूरी है ।

कडवा सच

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 4 COMMENTS

भारत विरोध कब तक
खों लोगों के बीच मंच सजा हुआ और उस पर आसीन है मधेश के मुक्तिदाता नेतागण । अचानक सभा स्थल के पीछे से एक जूता मंच की ओर फेंका जाता है । उसके साथ ही, आमसभा में आये लोगों के बीच भागदौड मच जाती है । मंच पर बैठे नेता गण भौच्चक है- यह क्या – यह वही मधेश है – क्या यह वही मधेशी जनता है – जिनकी मुक्ति के लिए वे लम्बे-लम्बे भाषण करते नहीं थक रहे हैं । आज यह स्थिति कैसे उत्पन्न हो गयी कि जिस उपेन्द्र यादव को इसी मधेश की जनता अपना सिरमौर बनाये हर्इ थी उसी उपेन्द्र यादव पर जूता फेंका जा रहा है । इस बदली हर्इ परिदृश्य के पीछे मुड कर देखा जाये तो कारण स्पष्ट झलकने लगता है । मधेश की जनता को उपेन्द्र यादव मं यदुवंशी कृष्ण का अवतार की झलक दीख रही थी जिसने मथुरा से द्वारिका जा कर कंस से उत्पीडित जनता को मुक्ति दिलाई थी । उसी प्रकार उपेन्द्र यादव मधेश से काठमांडू जा कर मधेश के असहाय, उत्पीडित-शोषित जनता को उनके दर्भाग्यों से मुक्ति दिलायेंगे । लेकिन उन्हे क्या पता था कि उपेन्द्र यादव भी सिंहदरबार पहुँच कर मधेश की आम जनता के आशाओं एवं विश्वासों पर कुठाराघात कर खस शासकों के उत्तराधिकारी शासकों के दरवार के एक दरबारी मात्र बन कर अपना दिन सँवारने में लग जायेंगे । विदेश भ्रमण के शुभ अवसर को छोडकर मधेश दर्शन भला वे क्यों करे – सत्ता के नशे मं वे ऐसे चूर हो गये कि अपनों को भूल गये । लेकिन उसका नशा तब टूटा जबकि पार्टी टुटकर दो भागों मं बँट गयी । अधिकांश सभासद एवं केन्द्रीय सदस्य जो कि उपेन्द्र यादव में एक बडी सभावनायें देखते थे छोड कर चले गए । तब जाकर उपेन्द्र यादव को होश आयी । तब आयी उन्हें अपने घर -मधेश) की याद । इस दौरान उपेन्द्र यादव ने भारत जो कि नेपाल का सबसे निकट चाहे वह आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या व्यापारिक क्षेत्रों के साथ सम्बधों को प्रगाढ करने के बजाय उस पर कभी अपने वक्तव्यों तो कभी अपने कृत्यों से uendra yadavचोट पहुँचानें का भरसक प्रयास किया यह सभी को पता है कि भारत के साथ नेपाल का एक पडोसी का ही नहीं एक बडे भाई, संरक्षक, हितैषी तथा बेटी-रोटी का संबन्ध सदियों से चला आ रहा है और आज भी भारत हर मुसीबत में नेपाल को हर संभव सहायता करने हेतु तत्पर है । उसके बावजूद अपने कम्युनिस्ट माइंड के कारण उपेन्द्र यादव इस हकीकत को भूल कर चीनी नीति ‘फूट डालो राज करो’ की भूल-भुलैया में अटके रहे । उन्होंने जान बूझ कर इस यथार्थ को नकारने की कोशिश की और आज भी उनके वक्तव्यों से भारत के प्रति द्वेष की भावना स्पष्ट उजागर होती है ।

आज फिर उपेन्द्र यादव मधेश की जनता के बीच अपनी मौजूदगी का एहसास कराने के उनके दुःखर्-दर्द तथा समस्याओं से मुक्ति के वायदे कर रहे हैं । इसके लिए अपनी पार्टी तीसरे मधेश जन आन्दोलन का आह्वान भी कर रहें हैं लेकिन इसके साथ-ही-साथ उन्हें यह भी समझना होगा कि वे चीनी नीति को लेकर मधेश में टिक नहीं सकते । उन्हें भारत के साथ मधेशी जनता की भावनाओं का कद्र करना ही होगा । अगर उपेन्द्र यादव को मधेश में एक सही अर्थों में मधेशी जनता के संरक्षक, पालनहार बनना है तो उन्हें अपने कर्म वचन को ऐसा बनना होगा जिससे मधेशी जनता को टूटे विश्वास पुनः जुड सकें । उन्हें जनता अपने आप में आत्मसात कर सके इसके लिए भारत को कोसने या पहाडी शासकों को खरी खोटी सुनाने से नहीं होगा बल्कि उन्हें देखना होगा कि मधेश की जनता का सबसे बडा शुभचिन्तक कौन है – भारत के साथ सम्बध बिगाड कर मधेश का हित नहीं हो सकता । यह बात पूरा देश जानता हैं और उपेन्द्र यादव का भी इस कडवे सच को स्वीकार कर अमल करना होगा । आज इस बात को समझने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है कि मधेश का शुभचितंक कौन है- मीलों दूर चीन या कोसों दूर भारत -

पूर्ण अधिकार से वंचित मधेशी::लक्ष्मीनारायण चौधरी

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

laxmi narayan chauमधेश का जन्म कोई मधेशी नहीं बल्कि सरकार ने ही किया है । अर्थात जहानिया राणा शासक द्वारा पहाडÞ के लिए पहाडÞ माल-सवाल तथा मधेश के लिए मधेश माल-सवाल नामक दो कानून बनाकर एकीकृत नेपाल को दो भाग पहाड और मधेश के नाम से विभाजित कर देने के कारण मधेश के वस्तुतः कानूनी रुप में ही आ जाने की वजह से मधेश में रहनेवालों को मधेशी कहना कोई नई बात नहीं हैं । नेपाल को पहाड और मधेश दो नामाकरण करने के बावजूद पहाड के निवासियों जैसा व्यवहार मधेश के लोगों के साथ नहीं किया गया सिर्फमधेस माल-सवाल जैसा कानून मधेश के जगह जमीन तक ही सीमित रखा गया । पृथ्वी नारायण शाह ने भी नेपाल में ३६ जात की फूलवारी है यह कहकर उद्घोषण किया परन्तु राजा के दरबार में कभी भी मधेशी को स्थान नहीं दिया । यहाँ तक कि अपने को महान् प्रजातान्त्रिक बताने वाले राजा महेन्द्र ने तो मधेश का जंगल काटकर पहाडी लोगों को तर्राई में बसाया और उसका एकमात्र उद्देश्य तर्राईवासी को अल्पसंख्यक करना तथा भविष्य में मधेशी के बढते वर्चस्व को रोकना था । यहाँ तक कि उत्तरी सीमा से दक्षिण सीमा को जोडकर मधेशी राजनीतिक भविष्य को खत्म करने के उद्देश्य से राज्य को १४ अंचल तथा ५ विकास क्षेत्र में विभाजित किया गया । इतिहास गवाह है कि जहानिया राणा शासन के अन्त का आन्दोलन भी मधेस से ही उग्ररुप लिया और प्रजातन्त्र की स्थापना हर्इ । परन्तु मधेशी का स्थान दूसरे दर्जे का ही रहा । तर्राई की राजनीति में भी तर्राई में निवास करने वाले पहाडी मूल के व्यक्ति का वर्चस्व रहा । उस वर्चस्वशाली व्यक्ति के बीच कहीं लाचारीवश एक-आध मधेशी को समावेश किया भी तो वह अपवाद में ही हं और उस अपवादित व्यक्ति का स्थान भी सम्बन्धित क्षेत्र में दूसरे दर्जा का ही रहा हैं ।

२०४६ साल के जनआन्दोलन के द्वारा प्रजातन्त्र की पुनर्स्थापना हरुइ वह भी मधेश के कारण फिर भी मधेशी की समस्या के ऊपर तत्कालीन पार्टर् भी ध्यान नहीं दिया । संपर्ण् मधेशवादी दल भी शासन सत्ता के कारण मधेशी समस्या को ओझल में रख दिये । इतने सारे मधेशी दल होने के बावजूद मधेशी के सही विचार और अवधारणा का प्रतिनिधित्व नही हो पा रहा है । ऐसा देखा गया है कि मधेश और मधेशी को स्वार्थ सिद्धि का विषय बनाया गया है । तर्सथ मधेशी के लिए नहीं मधेशी पर राजनीति किया जा रहा है । यहाँ तक कि मधेश और मधेशी के बारे में गैर-मधेशी वादीपार्टर् उच्च आवाज उठाने में पीछे नहीं है । जबकि गैर-मधेशी दल का उद्देश्य बिलकुल स्वार्थ परक है । गैर-मधेशी दल में समाहित मधेशी नेता भी अपने दल में मधशी के विचार और भावना को सहीरूप से रखने में र्समर्थ नहीं हैं और यह समस्या ज्यों का त्यों रहा । इस बीच माओवादी पार्टर् मुल्क को आतंकित अवस्था में पहुँचाया । आतंकित करने के उद्देश्य से माओवादी ने विभिन्न क्षेत्र, क्षेत्रीयता, सम्प्रदाय, विभिन्न जाति के विकास को नारा बनाया । माओवादी ने भले ही अपने उद्देश्य पर्र्ति के लिए नारा लगाया परन्तु यह किसी न किसी रूप में वर्ग-सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता को संगठित होने मे सहायक ही रहा । जब माओ के उद्देश्य के विपरीत दूसरे संगठन को उभरते देखा परिणामतः माओवादी ने उसके वर्चस्व को खत्म करने के लिए अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया । फलस्वरुप तर्राई में माओवादी और मधेशी के बीच भीडÞन्त हुइ । मधेशी ने अपना वर्चस्व जमाया उस आन्दोलन में किसी पार्टर्वशेष का सहयोग नहीं था । वह मधेशी का स्वतःस्फर्ूत आन्दोलन था । वह आन्दोलन अपने अस्तित्व और स्वामित्व का आन्दोलन था । मधेशी समुदाय के स्वतःस्फर्ूत आन्दोलन का लाभ उठाने हेतु विभिन्न दल और उनसे सम्बन्धित कुछ लोग जैसे तमलोपा -महन्थ ठाकुर), मधेशी जनअधिकार फोरम -उपेन्द्र यादव) ने अपना नेतृत्व स्थापित करने का प्रयास किया । आर्थिक लाभ उठाकर मधशी पार्टर् गैर-मधेशी लोगों को स्थान देकर मधेशी आवाज को विफल बनाया गया । यह संकेत किसकी ओर है वह कहने की बात नही हं । इसके बावजूद भी मधेशी की पहचान, प्रतिनिधित्व और स्वामित्व सुनिश्चित करने के लिए संविधान बनाने की ओर अग्रसर होने की जगह अन्य पार्टर् तरह अपने को मधेश का मसीहा कहते नहीं थकने वाले नेता भी सत्ता-संर्घष् में अपने आप को समर्पित कर चुके हैं । विगत के इतिहास का हम मनन करें तो तर्राईवासी के हक-हित का जडÞ गहरायी तक पहुँचाने के लिए संविधान में जड जमाना होगा । संविधान में मधेशी का हक सुरक्षित होने के बाद मधेशी का भविष्य सदा के लिए उज्जवल हो जाएगा । यह समझने के लिए हमें सात समुन्द्र पार नहीं जाना पडेगा । अपने पडÞोशी देश भारत जहाँ आज दलित तथा निचले वर्ग के लोग भी बडे से बडे पद पर हैं, क्योंकि उनका हक संविधान में सुनिश्चित है । मधेश और मधेशी के हक-हित के बारे में आवाज उठाने या संर्घष् करने का अर्थ पहाड और पहाडी का विरोध करना नहीं हैं । अपना हक खोजने का अर्थ दूसरे की हकमारी है यह नहीं समझना चाहिये । हम अपनी भाषा के स्थान के लिए आवाज उठाते हैं तो इसका अर्थ यह नही हैं कि हम दूसरे की भाषा का अपमान करना चाहते हैं । हम उनकी भाषा-संस्कृति का सम्मान करते हैं, अपनी भाषा संस्कृति का विकास करना कोई गुनाह नहीं है । क्योंकि भाषा के कारण ही उपराष्ट्रपति को बरखास्त किया गया । कहा गया हमलोगों का अस्तित्व और स्वतन्त्रता !

यह सब तभी सम्भव है, जब हम एक हो । हमारी पहचान जात, धर्म वर्ग से न होकर मधेश से हो । साथ ही यह स्थापित करने के लिए मधेशी को हक-अधिकार, राज्य संचालन तथा नीति-निर्माण के हरेक अंग, तह और निकाय में ५० प्रतिशत मधेशी का समावेश करना होगा ।

बाल तेरा क्या कहना :फेशन

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

ईश्वर ने नारी को बडी उदारता के साथ सौर्ंदर्य का वरदान दिया है उसमें जुल्फों की अदा का क्या कहना….। जुल्फे खूबसूरती और तारीफ का पैमाना ही नहीं होती बल्कि ये व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान भी होती   है । बाल व्यक्ति के विचार, स्वभाव, व्यक्तित्व और उनकी जीवनशैली का आईना भी होते है ।
Short_Prom_Hai
आइए जानंे कि किस प्रकार बाल व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व को दर्शाते है -
घुंघराले बाल- घुंघरे बालो बांली महिलायें कलाकार स्वभाव की होती है । साहित्य-संगीत से उन्हंे बहुत लगाव होता हंै, ये ज्यादातर कल्पना के आकाश में उडÞान भरती रहती है । उन्हें मेहमाननवाजी का शौक होता है । औरो की तुलना में वे दो कदम आगे रहती हैं । इस प्रकार की महिलाये ‘जियो और जीनें दो’ के सिद्धात पर बहुत भरोसा करतीं हैं ।

लम्बें बाल- लम्बें बाल वाली महिलायें यर्थाथ के धरातल पर जीती है । कल्पना की दुनिया के बजाय यथार्थ अर्थात ठोस परिणाम वाले कार्य करना वे ज्यादा पसंद करती हंै । ये अपने कार्य में बिना शोर-गुल किये लगी रहती हैं । बातें कम और काम ज्यादा उनके जीवन का मूलमंत्र होता  है । परिस्थितियों पर विचार करके बोलना ये अच्छी तरह जानती है । पैसे की कीमत समझती हैं इसलिए हर चीज में किफायत करना उन्हें आता है । साथ ही ये बहुत व्यवहारिक भी होती हैं ।

पतले एवं कम बाल- ऐसे बालों वाली महिलायं मेहनत एवर्ंर् इमानदारी की रोटी पर पर्ण्तः भरोसा करती है । उनका मूलमंत्र है जो मिल गया उसी को किस्मत समझो जो खो गया उसपर पछतावा न करों । ये मुखर नहीं होती । ऐसे बालों वाली महिलायें कम रोमांटिक होती हैं और प्यार में अक्सर धोखा खाती है स्वभाव से शर्मीली ये बहुत सारे राज अपने सीने में दफन कर लेती हैं । उनका जीवन शांतिमय व्यत होता हैं ।

छोटे बाल- छोटे बालांे की स्वामिनी महिलायें बहुत मेहनती होती हैं कडे अनुशासन में रहना उनकी आदत होती है । उनका व्यक्तित्व कई बार दोहरा नजर आता है । प्यार और नफरत उनके भीतर बराबर विद्यमान रहता है । ये धोखेबाज नहीं होती । ये महिलाये स्पष्टवादी होती है फलतः लोग उन्हे घमंडी समझते हंै । ये थोडÞी स्वार्थी लेकिन अति-महत्वकांक्षी भी होती होती हैं । ये अपने हित के लिए हमेशा परेशान रहती है । पार्टर्हफिल उनके शौक में शामिल हैं । दोस्त बनाने में चुजी होती हैं ।

एक रोमांचकारी यात्रा- कनाडा की::पुष्पा ठाकुर

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

pushpa thakuकनाडा का वेन्क्युवर टोरेन्टो एवं मोनट्रेल के बाद तीसरा सबसे बडा शहर है । वेन्क्युवर २०१० के विंटर ओलम्पिक का मेजबान शहर है । इस शहर को मुझे देखने का मौका मिला तो अपार खुशी हर्इ ।

मै १९ घंटे के लम्बी हवाई यात्रा के पश्चात् वेनक्युवर पहुँची । यहाँ हमलोगों के रहने का इंतजाम टाइमस्क्वाइर सुइट में था । जो कि समुद्र के किनारे को बाँध कर बनाया गया है । यहाँ से वेनक्युवर शहर का अवलोकन आसानी से किया जा सकता है । किराये पर र्साईकिल लेकर या पैसेन्जर फेरी द्वारा भी वाल का चक्कर लगाया जा सकता है ।

वेनक्युवर में मैने स्काई ट्रेन में सवारी की जो कि अति तीव्र गति की थी और जिसमें २५० डालर में २ घण्टे की अवधि तक अपनी आवश्यकता एवं इच्छा अनुकूल सवारी की जा सकती है । इस शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में सी बस र्टर्मिनल, वाटर-पन्ट सेन्टर, वेनक्यूवर आर्ट गैलरी, गेस्ट टाउन, डाउन टाउन, चाइना टाउन, ग्रेन विल आइलैण्ड वेनक्यूवर ऐक्यूरियम तथा स्टेनली पार्क दर्शनीय है । इसके साथ हीं विभिन्न जाति-प्रजाति के पेडÞ-पौधों के साथ होल वृक्ष तथा एक हजार वर्षपुराना वृक्ष भी देखने योग्य है । वेनक्यूवर शापिंग माँल के लिए भी प्रसिद्ध हैं जहाँ विश्व के नामी ब्राण्ड वाली चीजें उचित मूल्य पर उपलब्ध है । कनाडा का तीसरा सबसे उँचा फाँल सेनामा है जिसे देखने हमलोग कोच से पहुँचें । उस सं आगे चलने पर स्नोफाँल शुरू हो गया और सडके बर्फसे ढक गई ।

स्नोकटर से सडको पर पडी बर्फको काटा जा रहा था उसके पश्चात् हमलोग स्की के लिए व्हीसलर के महशूर क्षेत्र में पहुँचें । हिम से अच्छादित इस क्षेत्र के मनमोहक दृश्यों को देखकर हमलोग मंत्रमुग्ध हो गये । यहाँ सैकडों सैलानी इस प्रकृति के मनोरम दृश्य को देखने में मग्न थे । काफी लोग स्की का अभ्यास भी कर रहे थे ।

अगले दिन हमलोग विक्टोरिया बी.सी. देखने के लिए फेरी पर सवार हुए । यह फेरी इतना बडÞा था कि इसमें २००० बस-ट्रक तथा कार एवं ४००० यात्री सवारी कर सकते है । छह मंजिला इस फेरी से डेढÞ घंटे की समुद्र की रोमांच भरी यात्रा हमने की । इसके पश्चात् बुचारट गार्डर्जिसे रोबट पिम बुचारट दम्पत्ति ने खुली लाइन स्टोन खान की सुन्दरता को उभारने के लिए बनाया था । इसमें बुचारट दम्पत्ति ने अपनी विश्व
यात्रा के दौरान इकट्ठा किये गये दर्बल झाडियों तथा पेड-पौधों के मिलन से निर्माण किया है जिसे ‘सन किन बाग’ के नाम से जाना जाता है । इस गार्डर्में रोज गार्डन जापानी गार्डन, इटालियन गार्डन तथा स्टार पौण्ड का निर्माण किया गया हैं । इस् बुचारट गार्डर्में रेस्टुरेन्ट एवं बाग तथा उपहार केन्द्र भी हैं । यहाँ प्रति दिन सैकडों सैलानियों का आगमन गार्डर्की सुन्दरता को देखने के लिए होता है । विक्टोरिया शहर रात के रोशनी में और भी आर्कषक लगता है । रोशनी में जगमगाता विक्टोरिया बी.सी. का पार्लियामेन्ट हाउस बहुत ही सुन्दर लग रहा था । यहाँ भारतीय खाना के शौकिन लोगों के लिए भारतीय रेस्टोरेन्ट भी है । विक्टोरिया में विश्व प्रसिद्ध वैक्स म्यूजियम भी है जहाँ विश्व के प्रमुख व्यक्तियों जैसे क्वीन विक्टोरिया, एलिजाबेथ, आब्राहम लिंकन, महात्मा गाँधी, पोप जान पाल कोलम्बस, बुद्ध, मार्टिन लुथर आदि महान हस्तियों की मूतियाँ है जो कि देखने में जीवंत प्रतीत होती है । म्यूजियम के पास ही ‘सी वर्ल्ड’ है और कुछ ही दूरी पर ब्रिटिश म्यूजियम भी है । हमलोगो ने यहाँ के थियेटर में फिल्म भी देखा । थियेटर का स्कीन ७० फीट ऊँचा और इतना ही चौडा भी था । पास स्थित म्यूजिम में कनाडा की सभ्यता को झलकाती तथा उसके विकास-क्रम को बडÞे ही चरणबद्ध ढंग से दर्शाया गया है ।canada

वषर्ा एवं समुद्री तूफान की आशंका से हमें उस दिन वेन्क्युवर जाने का कार्यक्रम रद्द करना पडÞा । अगले दिन सुबह ४ बजे ही हमलोग वेन्क्युवर के लिए चल पडंेÞ क्योंकि अब समुद्र शांत था । वेन्क्युवर से हाँगकाँग होते हुए हमलोग काठमांडू वापसी के यात्रा पर निकल पडÞें । इस अद्भुत रोमांचकारी यात्रा के अनुभव से यह अवगत हुआ कि किसी भी देश को पर्यटकों के अनुकूल बनाने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था करना अत्यन्त जरुरी है । जहाँ तक हमारे देश नेपाल की बात हैं तो २०१र्१र् इ. को पर्यटक वर्षके रुप में मनाने की तैयारी चल रही है लेकिन अभी तक हम उन बातों पर गंभीर नहीं है जो कि पर्यटकों के लिए अत्यन्त जरूरी है । जैसेः-
१. पर्यटन स्थलों को स्वच्छ, सुरक्षित एवं सुविधायुक्त बनाने की व्यवस्था ।
२. सेवामुखी ट्रेंड गाइड ।
३. उचित मूल्यों पर सुरक्षित पैकेज ।
४. देशी-विदेशी व्यंजनों वाले उचित मूल्य के रेस्टोरेन्ट की व्यवस्था ।
५.गृह उत्पादक वस्तुओं की अच्छी बाजार व्यवस्था ।
६. सभी क्षेत्रों में शौचालय की व्यवस्था ।
७. पर्यटकों के प्रति सम्मान भाव ।

इन आवश्यक बातों पर ध्यान देकर इनकी उचित व्यवस्था की जाये तो नेपाल भी विश्व के एक
प्रमुख पर्यटकीय देश के रूप में विश्व मानचित्र में जाना जायेगा और यह विदेशी मुद्रा आर्जित करने की स्रोत भी बन सकेंगा । साथ ही साथ इससे घरेलु पर्यटन को भी बढावा मिलेगा ।

गोरखालैण्ड और वाम राजनीति::करुणा झा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

गोरखालैण्ड आन्दोलन पश्चिम बंगाल में लगातार तेज होता जा रहा है । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने अब आमने-सामने की कारवाई शरु कर दी है । वैसे तो, मोर्चा ने हिंसक आन्दोलन से परहेज करने का भरोसा दिया था, लेकिन उसका आन्दोलन अब हिंसात्मक रुप ले चुकी है । सीधी कारवाई के तहत दार्जिलिंग सहित कुछ हिस्सों के सभी गाडियाँ सरकारी दफ्तरों व थानों में वेस्ट बंगाल हटाकर वहाँ गोरखालैण्ड लिखा जाना शुरु हो गया है । पहाडों और पहाडी शहरों मे गोरखालैण्ड की मातृभूमि का गीत गुंजायमान हो रहा है, जिससे यह आन्दोलन और भी जोशीला होता जा रहा है ।

दार्जिलिंग जिले में यह आन्दोलन इतना ज्यादा जोर पकड लिया है कि सीपीएम सहित तमाम दूसरे दलों का फिलहाल वहाँ नामोनिशान मिट चुका है । जीएनएलएफ का भी लगभग सफाया हो चुका है । काँग्रेस की पकड थोडी बहुत जरुर दिखाई देती है लेकिन काँग्रेस को लोग यहाँ पसन्द नही करते । इसकी वजह यह है कि दूसरा नेतृत्व बांगला भाषियों के हाथो में हैं ।

तृणमूल काँग्रेस, एसयूसीआई जैसी पार्टियों का भी यहाँ जनाधार नहीं रहा । क्योंकि गोरखालैण्ड अलग राज्य की मांग के खिलाफ विधानसभा में इन दलों ने भी प्रस्ताव पारित करने में सरकार की मदद की थी । भाजपा ने इस आन्दोलन को र्समर्थन दिया था, पर राज्य की भाजपा इस मामले में ज्यादा कुछ खास नही कर सकीं । कहा जा सकता है कि सीपीआई झारखण्ड मुक्ति मोर्चा जैसे कुछ छोटे दलो को छोडकर तमाम दल गोरखालैण्ड अलग राज्य के खिलाफ थे । गौरतलब है कि, बंगाल बाम मोर्चा के सभी घटक दल गोरखालैण्ड के खिलाफ है, वही देश के अन्य हिस्सों मे सीपीआई आरएसपी फार्रवर्ड ब्लाँक नये राज्यो के निर्माण के पक्ष में हैं । झारखण्ड में वाममोर्चा की सभी पार्टियोंका अस्तित्व है । क्योंकि अलग राज्य बनाने के आन्दोलन मंे सीपीएम को छोड लगभग तमाम वाम दल क्रियाशील थे । सीपीआई ने तो उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ के निर्माण का भी पूरा र्समर्थन किया था । सीपीआई विदर्भ तेलांगना आदि राज्यों के गठन का भी हिमायती रहा है मगर वही सीपीआई बंगाल विभाजन का पूरजोर विरोध कर रही है । इसकी बडी वजह सीपीआई “बंगालीबाद” है ।

तेलांगना पर सीपीएम के रूख से यह भ्रम और भी बढा है क्योंकि यह पार्टर्ीीेश में नये एवं छोटे राज्यों के गठन का जमकर विरोध करती है । झारखण्ड आन्दोलन को उसने एक साजिश करार दिया था । अब वही सीपीएम राष्ट्रीय दबाब में हो या राजनीतिक मजबूरी के कारण तेलांगना अलग राज्य को र्समर्थन देने लगी है ।

दरअसल, राष्ट्रिय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने के लिए सीपीएम के पास दलों का अकाल सा पडÞ गया है । तेलांगना की टीआरएस के साथ समझौता करने के लिए सीपीएम पैंतरा बदला और तेलांगना अलग राज्य को रणनीतिक र्समर्थन दे दिया ।
सीपीएम समेत वाममोर्चा के घटक दल इस प्रचार में लगे हुए हैं कि गोरखालैण्ड अलग राज्य बन जाने से भारत की स्थिति कमजोर पड जायेगी और देश में विरोधी ताकत को बल मिलेगा । इस प्रचार में कई विपक्षी दल भी शामिल है । इस तरफ के आधार पर कि दार्जिलिंग के चारों तरफ चार पडोसी देश नेपाल, चीन, भूटान, बंगलादेश है । चीन की सीमा से सीधे भले ही दार्जिलिंग न लगी हो, लेकिन सिक्किम तो मिलती है, फिर सिक्किम और दार्जिलिंग में दूरी ही कितनी है ।

दार्जिलिंग और आस पास के क्षेत्र से लगे भूटान, बंगलादेश और नेपाल में आतंकवादियों ने पहले से ही अपना डेरा जमा चुके हैं ।

कामतापुरी और गोरखामुक्ति मोर्चा के बीच साठगांठ की खबर तो आती ही रहती है । कामतापुरी के उगवादी संगठन के एल ओ और असम के उल्फा के बीच भी संबन्ध जगजाहिर है, और इन संगठनों के हुजी और आईएसआई के साथ भी घनिष्ठ संबन्ध बताये जाते हैं । हालाकि जनमुक्ति मोर्चाके नेता विमल गुरुंग कहते है कि भारतीय गोरखाओं की भारत भक्ति विश्वप्रसिद्ध है । नेपाल में माओवादीओं के सत्ता में आने के बावजूद दार्जिलिंग के गोरखाओं का माओवाद से कुछ लेना देना नहीं । लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि नेपाल का माओवादी भारत विरोधी है और नेपाली मूल के गोरखाओं का भारत में एक अलग राज्य बनाने से भारत विरोधी कारवाई बढÞ सकती है दार्जिलिंग की वह पतली सी पट्टी वाली भूभाग, जो पूर्वोत्तर भारत को मुख्य भारत से जोडती है । भारत की कमजोर कडी हंै । बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के ठीक उत्तर की ओर दार्जिलिंग जिला है । दार्जिलिंग जिले के दक्षिण तरफ की ओर नक्सलवादी से लेकर फांसीदेवा तक कुछ किलोमीटर तक पतली पट्टी के दोनों ओर नेपाल और बांगलादेश है । एक समय में नेपाल और बांगलादेश ने इस क्षेत्र पर एक स्वतंत्र हाइवे की मांग की थी, ताकि दोनो देश के बीच बेरोकटोक आयात निर्यात हो सकंे, पर भारत सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया था । लेकिन नेपाल और बंगलादेश अभी भी यह सपना देख रहा है । गोरखालैण्ड विरोधी दलांे का यह कहना है कि दार्जिलिंग के अलग राज्य बन जाने से कानूनी तौर पर न सही, मगर गैर कानूनी तरीके से नेपाल और बांगलादेश के बीच तस्करी को बढावा मिलेगा साथ ही भारत विरोधी गतिविधि को भी बल मिलेगा ।

नए राज्यों के गठन के र्समर्थक दल इन तर्को को खारिज करते है । उनका कहना है कि अभी पश्च्िाम बंगाल खुद ही आतंकवादियों का सबसे बडÞा आश्रयस्थल बना हुआ है, इसमें दार्जिलिंग के गोरखाओं को भारत के अन्दर एक अलग राज्य दिया जा रहा है । अलग देश नहीं । वे लोग कश्मीरियों की तरह पाकिस्तान जिन्दावाद नही बल्कि हिन्दुस्तान जिंदावाद के नारे लगायेंगे ।

असम को तोडकर कुछ नये प्रदेश बनाये गये । लेकिन उन राज्यों मंे कभी भारत विरोधी ताकत को पनपने नही दिया गया, जिससे भारत की अखण्डता पर कोई खतरा पैदा हो जाये । लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश चीन से सटे होने के बाबजूद वहाँ कोई बडी साजिश का जन्म नही हुआ नव दार्जिलिंग में ये कैसे संभव है ।

गोरखालैण्ड के र्समर्थकों का कहना है कि दार्जिलिंग के गोरखे भारत के प्रति पूरी तरह वफादार हैं, उन्हें सिर्फबंगलाभाषियों से नफरत है । इस नफरत की वजह है कि आजादी के बाद से ही बंगलाभाषियों ने दार्जिलिंग का सिर्फदोहन किया है । जैसे अंग्रेजो ने किया था । गोरखाओं का कुली, मजदुर, रिक्शावाला बहादुर से ज्यादा कुछ नही समझा गया । पहाडों पर बंगालियों सहित अन्य धनपतियों के बंगले, चायबगान पर्यटन स्थल बनें मगर गोरखाओं की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती चली गई ।

जीएनएलएफ के आन्दोलन के कारण गोरखाओं की हालत में थोडा बहुत सुधार जरुर आया, लेकिन सुभाष घिसिंग के पतन के बाद सारे किये धरे पर पानी फिर गया । दार्जिलिंग के स्थानीय लोगों का कुछ खास विकास नही हो पाया । यहाँ तक कि गोरखाली भाषा को भी खत्म करने की कोशिश की गई थी मगर गोरखाओं के आन्दोलन और केन्द्र सरकार के दबाब के कारण गोरखाली भाषा को संविधान मंे मान्यता मिली । फिलहाल, गोरखालैण्ड का आन्दोलन तेज से तेज होता जा रहा है । उधर आन्दोलन के विरुद्ध सीपीएम संगठनों ने जबाबी आन्दोलन शुरु कर दिया है । पहाडों पर गाडियों को जाने से रोका जा रहा है । सिलिगुडी में भी बन्द का आह्वान किया जा रहा है “आमरा बंगाली” और “बंगला भाषा बचाओ समिति” सांप्रादायिकता फैलाने में लगी है ।

यह आन्दोलन उग्र रुप ले चुका है । पर्यटन पर आश्रति अर्थव्यवस्था चरमरा जाये और वे लोग आत्मर्समर्पण को तैयार हो जायंे, पर इससे तो हालात और भी बिगडेंगा । गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंगठ का कहना है कि राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी के अनुरोध पर फिलहाल दफ्तरो, गाडी, के र्साईन बोर्ड पर गोरखालैण्ड लिखा जाना बंद कर दिया जाए पर आन्दोलन जारी है । दूसरी तरफ, पश्च्िम बंगाल सरकार मौन धारण किये हुये है । ज्योति, बसु के कार्यकाल में इस आन्दोलन के खिलाफ जमकर कारवाई हर्ुइ थी, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हर्ुइ और हजारों की संख्या में लोग घायल हुये थे । लेकिन इस समय वाममोर्चा की सरकार बैकफूट पर आ चुकी है । उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है । विभिन्न आन्दोलन और पुलिसिया कारवाई के कारण वाममोर्चा सरकार रसातल में पहँुच गई है ।

लेकिन इस बार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अलग राज्य के अलावा और कुछ नही चाहती । ऐसी स्थिति में अगर इस आन्दोलन को रोका गया तो यह आग और भडक सकती हंै । इसमंे कोई शक नही । नेपाली भाषा और नेपालीपन के आधार पर गोरखालैण्ड की मांग हो रही है । वैसे भी गोरखाओं की पहचान नेपाल से ही है । गोरखा से ही नेपाल के एकीकरण का अभियान संचालन हुआ था । अब जबकि नेपाल के बाहर गोरखालैण्ड नेपाली भाषा, नेपालीपनकी मान्यता की बात हो तो नेपाल सरकार की भूमिका महत्वपर्ूण्ा समझी जा सकती है । पर नेपाल राज्य में रुपान्तरण हो या न हो भारत सरकार की रवैया तेलांगना के मामले में स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है । फिलहाल गोरखालैण्ड की मान्यता इतनी आसान से मिल पाएगी यह दिखाता नहीं है ।

शौक साहेब नेपालगंज की शान::खगेन्द्र गिरि

Posted by Himalini On January - 9 - 2010 ADD COMMENTS

जुली तूफान कातिल रहजन, किस-किस की तुम बात करोगे एक है जान और लाखों दुश्मन, किस-किस की तुम बात करोगे मन को मायाजाल ने मारा तन को रोटी दाल ने मारा सौ जख्मों से चूर है जीवन, किस-किस की तुम बात करोगे ।

इस श्रुतिमधुर व कर्ण्र्रय गजल के दो शेर नेपालगंज के नामी उर्दू शायर अब्दुल लतीफ शौक द्वारा रचित हैं । उन का नाम नेपालगंज के गजल महफिल ही नहीं वरन उर्दू गजल साहित्य में उच्च सम्मान के साथ लिया जाता है ।

अब्दुल लतीफ शौक नेपालगंज के गजल परम्प्रा के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । विगत चार दशक से भी लम्बे समय से वे इस परम्परा को आगे बढा रहे हैं । वे मनोरंजन अथवा प्यार मुहब्बत के लिए गजल कहते हंै। वे आदमी के जज्बाती बातों को शब्दों मे उतारते हं । वे एक पर्ण्तः साहित्यिक गजलकार हं और उनका मकसद सामाजिक चेतना, मानवतावाद व सामाजिक सद्भाव ही है । ऊपर लिखे गए दो अर्थपर्ण् व तर्कपर्ण् शेरों से उन की काव्यिक क्षमता की स्पष्ट झलक भी मिलती है ।DSC_3759

नेपालगंज के गजल साहित्य का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है । भारत के उर्दू गजल साहित्य की बात करने पर लखनऊ की गजल परम्परा का अपना एक अलग ही रुतबा और एक अलग ही शान दिखलाई देता है । नेपालगंज के तकरीबन सभी गजल गायको-शायरो के गजल का अन्दाज व शैली भी लखनऊ की गजल परम्परा से ही रुबरु है । इसीलिए नेपालगंज के उर्दू गजलकारां द्वारा रचित गजलों मं एक विशिष्ट रचना शैली, एक अलग अन्दाजेबयाँ व शब्दो को पकडने का एक अलग ही नजरिया मिलता है । नेपालगंज के पुराने ऊर्दू गजल साहित्य के पन्ने पलटने पर कई अच्छे और नामी-गिरामी गजल शायर के नाम वा योगदान देखने को मिलते हैं । इन में अब्दुल हमिद हामी, मौलवी गुलाम वारीश गौर, अब्दुस्सलाम असलम, मङ्गलु सहर, अनवर अली अनवर, नसिरुद्दिन नासिर, अमिर मोहम्मद र्राई, मुन्सी असगर अली सहर, फारुक अहमद आरिफ, गुलाम अली मोमिन, नन्हे कुरैसी कैफ, गुलाम जिलानी राही, मास्टर सैदा भारती, श्यामलाल श्याम, मुरलीलाल मुरली, और मौलबी अमिरुल्लाह असअदी आदि का नाम आता है । नेपालगंज के उर्दू गजल साहित्य के इतिहास का और व्यापक तौर पर खोज एवं अनुसन्धान करने पर और भी ज्यादा अच्छे शायरों के बारे मे भी जानकारियं हमारे सामने आ सकती हैं ।

अभी इन दिनों ऊर्दू भाषा में गजल लिख कर साहित्य की सेवा में लगे हुए ऊर्दूर् शायरो में अब्दुल लतीफ शौक, रसूल मोहम्मद आरजु, मोहम्मद अमिन खयाली, मोहम्मद युनुस अदिब, प्रकाश राजापुरी, मोहम्मद उमर आदिल फारुखी, मोहम्मद उमर असर, मौलाना नुर आलम, मोहम्मद हासीम अंजुम, शौकत अली शौकत व मोहम्मद मुस्तफा अहसन आदि का नाम आता है ।

इन नामें मे से अपने आप को एक अलग ढंग से परिचित कराने मे सक्षम रहे सिद्धहस्त शायर अब्दुल लतीफ शौक का जन्म विक्रम सम्बत् १९९५ साल में नेपालगंज नगरपालिका के वार्ड नं. १५ भट्टटिोल में हुआ था । उनके पिता का नाम कुरवान जसगर व माता का नाम आमना जसगर है । शौक साहेब का वास्तविक नाम लतीफ जसगर है परन्तु साहित्य की दुनिया मं लोग उन्हें अब्दुल लतीफ शौक के नाम से जानते हैं । नेपालगंज स्थित मदरसा फैजन्नबी में उर्दू भाषा की प्राथमिक तक का अध्ययन करके अपने पैतृक व्यवसाय में लगे लतीफ जसगर ने अपने जमाने के नामी शायर फारुख अहमद आरिफ की प्रेरणा व प्रोत्साहन से गजल लिखना प्रारम्भ किया था । उन्हांेने पहली बार २०२७ साल में गजल-मुशायरा में अपनी गजल को प्रस्तुत किया था तब से उन्होने कभी भी पीछे मुड कर नही देखा । उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने के बावजूद उन्हें साहित्य का बखूबी ज्ञान   है । स्वअध्ययन से उन्होने साहित्य, जीवन-जगत व दर्शन का गहरा अध्ययन किया है । इसिलिए उनके रचनाओं में उच्च स्तर की तार्किकता व कवितात्मकता का मीठा स्वाद मिलता है । बडं बडं विद्वान भी उनकी क्षमता वा काबिलियत को मानते हैं । लम्बं समय तक वे नेपालगंज के ऊर्दूर् शायरो की संस्था नेपाल बज्म-ए-अदब से जुड कर क्रियाशील रहे । बाद में लम्बे समय तक गुलजार-ए-अदब से भी जुडे रहे । फिलहाल वे मध्यपश्चिमांचल गजल प्रतिष्ठान के अध्यक्ष व भेरी साहित्य समाज के उपाध्यक्ष के तौर पर साहित्य की सेवा मं दिलोंजान से लगे हुए हैं ।

नेपाल में उन को अभी तक केवल युनेस्को बाँके ने सम्मानित किया है और पडोसी देश भारत के गोण्डा शहर में कुछ वर्षपर्व सम्पन्न हर्इ जश्न-ए-वासिफ कार्यक्रम में भी सम्मानित किया गया था । परन्तु उन का जितना मूल्यांकन होना चाहिए था नेपाल मं, सरकारी स्तर पर व नागरिक स्तर पर भी उतना मूल्यांकन नही हो पाया हैं ।

उन्होने अब तक करीब तीन सौ से ज्यादा गजलां की रचना करके गजल साहित्य के भण्डार को जीवन्त बनाया हैं । कुछ सालों से तो वे नेपाली भाषा में भी गजल लिखते हैं । उनकी नेपाली भाषा में लिखी गई कुछ गजल इस प्रकार हैं-
कण कणमा म खोजिरहेछु दाई मेरो नेपाल कता छ -
गाउँ शहरमा हेरिरहेछु दाई मेरो नेपाल कता    छ -

मानवता में प्यार व ममता की भाव बढाने के उद्देश्य से लिखे उनके कुछ शेरो को देखे-
काश नजदीक तुम आओ तो कोई बात बनं
फासले दिल के मिटाओ तो कोई बात बनं
अश्क भी दिल का लहू हैं, इसे पानी न कहां
इसको दामन पे सजाओ तो कोई बात बनें-

शौक साहेब इसी पुस महिने में अपने जीवन के ७० साल पूरे करके ७१ वें साल में प्रवेश कर गये हैं । उन्हें शतायु मिलं और उनसे अच्छे-अच्छे गजलों की रचना हो यह समस्त गजल प्रेमीओं की कामना है ।

काठमांडू में कबीर महोत्सव सम्पन्न::आभा झा

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

काठमांडू में ४ से ६ दिसम्बर २००९ तक भारतीय राजदूतावास और बी.पी. कोइराला भारत-नेपाल प्रतिष्ठान द्वारा तीन दिवसीय कबीर महोत्सव का आयोजन किया गया । इस कबीर महोत्सव का उद्घाटन भारतीय राजदूत महामहिम राकेश सूद के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ । अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने निर्गुण साधक महान् संत कबीर के जीवनी पर प्रकाश डाला ।

१५ वीं शताब्दी के निर्गुण निराकार मतानुयायी, रहस्यवादी एवं फकीर कवि कबीर के बिचारों में तादात्म्य स्थापित करने का महान अवसर नेपालवासियों को मिला । तादात्म्य स्थापित करने के कुछ दृश्य और श्रव्य साधन थे, श्रृंखलाबद्ध कबीर से संबन्धित फिल्म पर््रदर्शनी, भारत से आये लोक गीत गायकों द्वारा उदात्त एवं जीवंत सांगीतिक प्रस्तुति और विभिन्न विद्वानों द्वारा समूहगत परिचर्चा गोष्ठी प्रमुख रहे । कबीर के साखियों एवं बीजकों पर आधारित फिल्मों की पर््रदर्शनी, भारत से पधारे अतिथि लोक गीत गायकों की जीवन्त प्रस्तुति तथा समूहगत परिचर्चा के माध्यम से दर्शक, श्रोता, वक्ता, टिप्पणीकर्ता और ज्ञानी जिज्ञासु सभी के द्वारा युग परिवर्तनकारी कवि कबीर के उदात्त विचारों में समीक्षात्मक डुबकी लगाने की कोशिश की गई ।
कबीर के बीजक साखी जैसी कविताओं में छिपी वैचारिक क्रांति लाने की शक्ति के
साथ-साथ भारतीय गायक मण्डली द्वारा गाये गये गीतों में दर्शकों एवं श्रोताओं को आनन्दानुभव करने का मौका प्राप्त हुआ । महेश राय और कालूराम बमनिया के दो सांस्कृतिक दलों ने अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए । महेश राम रातभर चलने वाले जागरणों तथा सत्संगों की मौखिक एवं पारम्परिक माध्यमों से कबीर के लोकगीत शैली के प्रतिनिधि गायक हैं तो कालूराम बमनिया देवास, गोरखनाथ, कबीर, मीरा जैसे संत कवियों की कविताएँ सुनाकर लोगों का मन मन्त्रमुग्ध करते हैं । उक्त दोनों सांस्कृतिक दलों की गायन प्रस्तुति को देखने-सुनने वाले दर्शक और श्रोतागण कुछ क्षण के लिए कबीर के निर्गुण निराकार में विलीन हो गए थे ।

फिल्म पर््रदर्शन और सांगीतिक कार्यक्रमों के अतिरिक्त इस अवसर पर दो समूहगत परिचर्चाएँ भी आयाजित की गई थी ।
परिचर्चा गोष्ठी वाले सत्र में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने कार्यपत्र
प्रस्तुत किये । कार्यपत्र प्रस्तुत करने वालों में प्रो. अभि सुदेवी, डा. विष्णुराज आत्रेय, डा. अरुण गुप्तो और डा. गंगाप्रसाद अकेला सामिल थे । परिचर्चा गोष्ठी सत्र के अन्त में कबीर शब्द की व्युत्पत्ति, अर्थ, जाति आदि विषय पर टीका टिप्पणी भी की गई । प्रो. अभि सुवेदी ने कबीर और नेपाल के जोसमनी फकीर लोगों के बारे में चर्चा की । अन्त में सुश्री शबनम विरमानी के साथ अर्न्तक्रिया कार्यक्रम सत्र आयोजित किया गया था ।

कबीर महोत्सव के शुभ अवसर पर चार फिल्म दिखाई गई थी । इनमें- हद अनहद ः राम और कबीर के साथ यात्रा, कबीरा खडा बजार में ः पवित्र और धर्म निरपेक्ष कबीर के साथ यात्रा, कोई सुनता है ः कुमार और कबीर के समथ यात्रा एवं चलो हमारा देश ः कबीर और साथियों के साथ । इस दौरान कबीर परियोजना की संयोजक तथा यात्रा के निर्देशक सुश्री शबनम विरमानी भी उपस्थित थीं । कबीर महोत्सव के अवसर पर देशी-विदेशी विद्वानों तथा प्रबुद्धजनों की उपस्थिति उत्साहजनक रही ।

उक्त त्रिदिवसीय कबीर महोत्सव समारोह के सफलतम आयोजन के लिए रात-दिन परिश्रम करनेवाली भारतीय राजदूतावास की प्रथम
सचिव अपर्ूवा श्रीवास्तव का प्रयास काफी सराहनीय रहा । प्रथम सचिव के सहयोगियों के रुप में भारतीय राजदूतावास के अत्तासे डा. शंकर कुमार एवं धीरज बर्मा का योगदान समारोह को सफल बनाने में महत्वपर्ूण्ा रहा ।
इस महोत्सव को लोगों ने खूब सराहा है तथा संचार माध्यमों नें इस महोत्सव को विशेष महत्व देने के साथ ही वृहत्तर स्थान प्रदान किया है ।

कबीर के साथ यात्रा, कबीरा खडा बजार में ः पवित्र और धर्म निरपेक्ष कबीर के साथ यात्रा, कोई सुनता है ः कुमार और कबीर के समथ यात्रा एवं चलो हमारा देश ः कबीर और साथियों के साथ । इस दौरान कबीर परियोजना की संयोजक तथा यात्रा के निर्देशक सुश्री शबनम विरमानी भी उपस्थित थीं । कबीर महोत्सव के अवसर पर देशी-विदेशी विद्वानों तथा प्रबुद्धजनों की उपस्थिति उत्साहजनक रही ।

उक्त त्रिदिवसीय कबीर महोत्सव समारोह के सफलतम आयोजन के लिए रात-दिन परिश्रम करनेवाली भारतीय राजदूतावास की प्रथम सचिव अपर्ूवा श्रीवास्तव का प्रयास काफी सराहनीय रहा । प्रथम सचिव के सहयोगियों के रुप में भारतीय राजदूतावास के अत्तासे डा. शंकर कुमार एवं धीरज बर्मा का योगदान समारोह को सफल बनाने में महत्वपर्ूण्ा रहा ।

इस महोत्सव को लोगों ने खूब सराहा है तथा संचार माध्यमों नें इस महोत्सव को विशेष महत्व देने के साथ ही वृहत्तर स्थान प्रदान किया है ।

विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी का महाप्रयाण

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नेपाल भारत समेत दुनिया के ५० से अधिक देशो में योग का परचम लहराने वाले विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी अब दुनिया में नहीं रहे । ८७ वषर्ीय स्वामी जी भारतीय राज्य झारखण्ड के देवघर स्थित रखिया पीठ आश्रम मे गत ५ दिसंबर की मध्य रात्रि ध्यानस्थ हुए और महाप्रयाण पर चले गये । देवघर समेत पूरे विश्व मे उनके चाहने वालो ने जहाँ भी यह खबर सुनी उन्हे सहज विश्वास ही नही हुआ । महा-प्रयाण के दिन ही शाम ६ बने उन्होंने रखिया पीठ मे महा-समाधि ली थी । उस समय हजारों की संख्या मंे भक्तगण मौजूद थे इससे पर्ूव दो दिसंबर को उत्सव के मौके पर भक्तों को स्वामी जी के दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ था उस दिन स्वामी जी प्रसन्न चित मुद्रा मे दिखे थे ।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती का जन्म भारतीय राज्य उत्तरप्रदेश -अब उत्तराखंड) के अल्मोड मे सन् १९२३ में हुआ था । सन् १९४३ मे ऋषिकेश मे उन्हे स्वामी शिवानन्द का दर्शन हुआ और उसी समय उन्होने दशनामी सन्यास पद्धति अपना ली । सन् १९५५ में स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने पर्रि्राजक रुप मे भ्रमण करने के लिए गुरु आश्रम को छोड दिया । स्वामी जी ने सन् १९६३ मे अर्न्तराष्ट्रीय योग मित्र मण्डल एवं सन् १९६४ मे बिहार योग विद्यालय की स्थापना की । अगले २० वर्षो तक वे योग के अग्रणी प्रवक्ता के रुप मे विश्व भ्रमण करते रहे । ८० से अधिक ग्रन्थों के प्रणेता स्वामी जी थे । ग्राम्य-विकास की भावना से सन् १९८७ मे दातव्य संस्था -शिवानन्द मठ)

एवं योग शोध संस्थान की स्थापना की । १९८८ मे स्वामी जी ने अपने मिशन से अवकाश ले लिया तत्पश्चात क्षेत्र सन्यास अपना कर उन्होने र्सार्वभौम दृष्टि से परमहंस सन्यासी का जीवन अपना लिया ।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती योग क्षेत्र मे अग्रणी थे उनके तरीके में नवीनता और निरालापन था । अजपाजप अंतमौन, पवनमुक्तासन, क्रियायोग एवं प्राणविया जैसे अभ्यासो को उन्होने विधिपर्ूवक व सरलतम तरीके से बताया है । इस बहुमूल्य और अबतक के अगम्य विज्ञान को स्वामी जी ने जनसाधारण के लिए सुगम बनाने का काम बखूबी किया । स्वामी जी ने तन्त्र की न्यास पद्धति पर शोध कर योग न्रि्रा का अविष्कार किया । अपनी गहरी अर्ंतदृष्टि से उन्होने ध्यान के इस अभ्यास की प्रभावशीलता को देख कर उसे इस तरह प्रस्तुत किया कि अभी तक केवल उपासना की एक पर्वपेक्षित क्रिया के रुप मे प्रयुक्त होने वाला यह अभ्यास सभी के लिए व्यावहारिक योग का एक अभ्यास बन गया । योग न्रि्रा प्राचीन पद्धतियांे मंे स्वामी जी की अर्ंतभेदी दृष्टि और गहरी समझ का एक उदाहरण मात्र है ।

स्वामी जी का दुष्टिकोण प्रेरणाप्रद एंव उद्धारक होने के साथ-साथ गहरा और मर्मस्पर्शी था । फिर भी उनकी भाषा और व्याख्या सदा सरल रही है । स्वामी जी द्धारा रचित ८०० से अघिक पुस्तको को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों एवं विद्यालयांने पाठ पुस्तक के रुप मे स्वीकार किया है । स्वामी जी द्धारा लिखित पुस्तकों का इटालियन, जर्मन, स्पेनिश, रशियन, चीनी, पन्च, ग्रीक, इरानी, युगोस्लावियन समेत विश्व की प्रमुख भाषाआंे में अनुवाद किया जा चुका है । लोगांे ने स्वामी जी के विचारांे को अपनाया तथा सभी आस्थाआं एवं राष्ट्रां के आध्यात्मिक जिज्ञासु उनकी ओर उमङÞ पडे । स्वामी जी ने हजारांे लोगांे को मन्त्र और सन्यास-दीक्षा दी तथा उनमे दिव्य जीवन के बीज डाले । उन्होने योग के प्रकाश को फैलाने मे दर्र्जेय उत्साह और शक्ति का पर्रदर्शन किया । स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने बीस वर्षों के अल्पकाल मंे ही अपने गुरु के मिशन को पूरा कर दिया ।

स्वामी जी की प्रेरणादायी उक्तिः
योग विद्या भारत वर्षकी सबसे प्राचीन संस्कृति और जीवन-पद्धति है । इसी विद्या के बल पर
भारतवासी प्राचीनकाल में सुखी, स्वस्थ तथा समृद्ध जीवन व्यतित करते थे । जब से भारत मे योग विद्या का ह्रास हुआ तभी से देशवासी गरीब, दुःखी और अस्वस्थ हं। पूजा पाठ, धर्मर्-कर्म से शान्ति मिलती है और योग्भ्यास से धन-धान्य, समृद्धि और स्वास्थ्य । स्वामी जी ने दुनिया भर के लोगों को सुख, शान्ति, समृद्धि एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए योगाभ्यास को अपने जीवन मं शामिल करने का मूलमन्त्र दिया है ।

धन्य है भारतवर्षकी भूमि जहाँ पैदा हुए विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने दुनिया भर में योग का परचम लहरा दिया साथ ही दुनिया भर के देशों को यह राह दिखायी कि बैगर योग के मानव जीवन परूण् नही है । महाप्रयाण को प्रस्थान कर चुके स्वामी जी की महान् आत्मा को हम सभी नेपालवासी शत्-शत् नमन करते है ।

क्या आप भावनाआं से संचालित होते हैं ::अमित भटनागर

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

रेश एक अच्छी कम्पनी में नौकरी करता था । उसका बाँस और वह पिछले पाँच सालों से साथ काम कर रहे थे और उसका बाँस उसके काम से संतुष्ट था । अचानक नरेश के बाँस को कंपनी ने प्रमोशन दे कर, दूसरी बडी ब्रांच में भेज दिया और नरेश की ब्रांच में उसका दूसरा बाँस आ गया ।

यही से नरेश के लिए मुश्किलें शुरू हो गई, नए बाँस की कार्य करने की पद्धति पुराने बाँस से अलग थी । नया बाँस उम्र में भी अपेक्षाकृत युवा था । नरेश परेशान रहने लगा और इसका असर उसके काम पर भी पडÞने लगा । नरेश का अक्सर मन होता कि वह नौकरी छोड कर कहीं भाग जाए, पर वह यह सोच कर रह जाता कि बिना नौकरी के वह करेगा क्या -

एक तरफ नौकरी के बदले हुए हालत और दूसरी तरफ नौकरी करने की मजबूरी उसकी परेशानी को और बढा देते थे । इसी उधेडÞबुन और परेशानी में कई महीने गुजर गए । एक दिन नरेश की कंपनी ने उसके कार्य से असंतुष्ट हो कर उसे नौकरी से निकाल दिया । नरेश की परेशानी और बढ गयी । वह दुखी रहने लगा । जरूरतों के कारण उसे अपनी योग्यता से कमतर वाली नौकरी करनी पडÞी ।

हम अपने आस-पास इस तरह के या इससे मिलते जुलते घटनाक्रमों को अनुभव करते रहते हैं । हम अपनी स्वयं की जिन्दगी में भी तनाव, परेशानियाँ और दुखों को पहले से कहीं अधिक बढÞा हुआ पाते हैं ।

अगर गहर्राई में जा कर देखें तो पाएंगे कि इन सभी के पीछे कहीं न कहीं हमारी भावनाऐं हैं । जरा सोचिये इस लेख के शर्ीष्ाक ‘क्या आप भावनाओं से संचालित होते हैं’ का अर्थ आप के लिए क्या है -

हममें से कई लोग अत्यन्त भावुक होते हैं । भावनाओं में बह कर अपने कार्य करते हैं और अक्सर बाद में पछताते हैं । वहीं दूसरे प्रकार के लोग भी हैं, जो भावनाओं का होना और उन्हें अभिव्यक्त करना अच्छा नहीं मानते हैं । ऐसे लोग अक्सर गुस्से और आन्तरिक असन्तोष के शिकार पाए जाते है ।

सही मायने में देखा जाये तो हम पाएंगे की भावनाओं में बहना या उन्हें नकारना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि दोनों ही तरह से जो परिणाम मिलते हैं, वह हमारी दूरगामी खुशी और सफलता के लिए हानिकारक होते है ।
आइये देखें कि हमारी जिन्दगी में भावनाओं का अस्तित्व क्यों है – शायद आप को पता होगा कि हमारे मस्तिष्क में दो अलग-अलग केन्द्र होते हैं- एक केन्द्र भावनाओं को संचालित करता है और दूसरा हमारे विचारो को । हमारे विचार और भावनाएँ अलग-अलग हैं, विचार मस्तिष्क में उपजते हैं और भावनाएँ हम शरीर में महसूस करते हैं । हमारी भावनाएँ हमारे विचारों से सौ करोडÞ साल पुरानी है ।

भावनाएँ प्रकृति का अद्भुत उपहार है । यह हमें आंतरिक संदेश देती है कि हम जिस स्थिति में है या हम जो कर रहे हैं वो हमारे विश्वास, हमारी मान्यताओं और हमारी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के अनुरूप है या नहीं ।

हम अच्छी भावनाओं को महसूस करते हैं, जब हम अपने अनुकूल कार्य कर रहे होते हैं और यदि हम अपने प्रतिकूल होते हैं तो हम बुरी भावनाएँ महसूस करते है ।

हम इसे कुछ इस तरह समझ सकते हैं, हम एक ऐसे क्षेत्र में रहते है जहाँ अक्सर आग लगती रहती है और वहाँ भावनाएँ हमारे घर में लगे फायर अलार्म की तरह है, इसे यदि हम बंद कर देंगे तो घर जल कर खाक भी हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ इसके अत्यधिक संवेदनशील होने पर हमें बार-बार बजने वाले अलार्म मिलेंगे, यह हर छोटी-मोटी बातों पर बजता रहेगा और हम सुचारू रूप से कोई काम नहीं कर पाएंगे ।
जरूरत इस बात कि है हम इस फायर अलार्म की कार्य प्रणाली को समझ कर इसका संयोजन इस प्रकार करंे कि यह हमें न सिर्फविपत्तियों से बचाए बल्कि हमें सुचारू रूप से कार्य करने में भी मदद करंे ।

बुरी भावनाओं से निपटने का सबसे आसान उपाय है उन्हें समझना, न कि उन्हें नकारना या उनके साथ बह जाना । सबसे पहले हम अपने आप से यह पूछंे कि हम जो भावना महसूस कर रहे है, वह क्या है, कैसी महसूस हो रही हैं और वह हमें क्या बताना चाहता है – उसके बाद हम उपलब्ध विकल्पों को देखें और उन में से ऐसे विकल्पों को चुने जिससे हमारी दूरगामी खुशियाँ भी सुनिश्चित होती हों । हम यह भी देखें कि हम अच्छा महसूस करने के लिए क्या कर सकते हैं । बेहतर होगा हम उन उपायों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे जो हमारे बस में हों । ऐसा करने पर हमें धीरे-धीरे न सिर्फअपनी बुरी भावनाओं से निपटने का अभ्यास होगा बल्कि हम सही दिशा में अपने प्रयासों का उपयोग कर पाएंगे और अधिक सफल भी बन पाएंगे ।

नरेश के उदाहरण को यदि हम देखें तो पाएंगे कि परेशानी, दुःख और नौकरी न रहने पर होने वाली तकलीफ के भय ने नरेश को इस तरह जकडÞ लिया कि उसकी कार्य करने की क्षमता और कम हो गई । नरेश की तरह हम सभी भी यही गलती करते हैं, और बुरी भावनाओं के अस्तित्व को ही स्वीकार करना नहीं चाहते हैं । यह र्सवविदित तथ्य है कि जिस बात का हम प्रतिरोध करते हैं, वही बात हम पर हावी हो जाती हंै ।

यदि कोई आपसे कहे कि आपको लाल मुंह वाले बंदर के बारे में नहीं सोचना है तो सबसे पहले आपके दिमाग में लाल मुंह के बंदर का ही ख्याल आएगा । हमारा मस्तिष्क इसी तरह काम करता हैं । उसे यदि आप निर्देश देंगे कि यह काम नहीं करना है तो उसे पहले उस काम के बारे में सोचना पडेगा जो नहीं करना है । बस यही कारण है कि हम बुरी भावनाओं को नकारते हैं तो वह हम पर और ज्यादा हावी हो जाती हैं ।
यदि नरेश ने बजाय भावनाओं से पीछा छुडÞाने के, भावनाओं के पीछे छुपे संदेश को समझा होता तो बजाय परेशान होने के वह अपनी कार्यपद्धति को बदल कर न सिर्फअपनी नौकरी बचा पाता बल्कि बदलाव का सकारात्मक उपयोग कर अपने को और अधिक प्रभावशाली भी बना पाता । तो आइये संकल्प करं कि हम बजाय भावनाओं में बहने या उन्हें नकारने के, उन्हें समझने की कोशिश करें और अपनी भावनाओं एवं विचारों के बेहतर तालमेल से अपने लिए एक सुखी और सफल जिन्दगी की रचना करें ।

-लेखक अमोघ फाँउण्डेशन के चेयर्रपर्शन और इमोशनल इन्टलिजेन्स के गुरू है)

डुग डुग डुग, ले लो जी, यह रामवाण पुडिया !!::राजेन्द्र थापा

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

हम छोटे थे, शहर गली में गलियारें या किसी नुक्कड पर या हो सकता है किसी सडÞक की किसी छोर पर या मेंलें के दिन, या हाटों मे, कहीं भी भीड देखते थे, घुस जाते थे, बीच में सें, बडों के पैरों को जरा हटाकर, और धीरे धीरे आगे पहुंचकर, चुपचाप पालथी मार के बैठ जाते थे, और खुद को उस मजमंे का एक हिस्सा बन कर बडी राहत महसूस भी करते थे ।

उस मजमंे में एक उस्ताद और एक जमूरे तमाशा दिखला रहे होते थे । उस्ताद डुग डुग डुग करके बजा रह होता था, शायद डुगडुगी या ढोलक या डमरू भी । और जमूरे कभी कलाबाजी, कभी कोई कसरत या कभी उस्ताद की हां में हां का तुक्कबाजी या छन्दमय सुर और ताल में ताल मिलाकर, और करतवें दिखा दिखाकर हम लोगों को भरपूर मनोरंजन करता था ।

और जब उन के खेल पर उन के मीठी बातों पर पुरे तमाशाई सम्मोहित हो जाते थे, खेल का दूसरे दृश्य के रूप में, उसी बीच अचानक एक पुडिÞया कहीं से निकाला जाता था । और, उस पुडिÞया की महत्ता का बखान शुरू किया जाता था । यह पुडिया दवाई नहीं है, ये तो संजीवनी है, हनुमानजी का लाया हुआ, लखन भइया के खातिर पूरे सुमेरू पर्वत को उठाकर एक हाथों पर । इसीलिए यह

एक रामवाण है हर बीमारी के लिए, दाद हो या खुजली, गुरदंका, या फेफडा का या पेट और शरीर के अन्दरूनी या बाहरी, स्त्री रोग का या पुरूष के धातु बहना रूकना या नपुंसकता महसूस करना, शादी से कतराना या बीबी के कमरे में जाने से घबराना, दिमागी बीमारी, भूख ना लगना, या भूख ज्यादा लगना, या अपच, वायु, कफ, ठण्र्डाई, सुगर अल्काई पाइल्ज फटंहोंठ कटे घाव, हर पीडा हर रोग आदि इत्यादि हर मसला का, हर बीमारी का इलाज, यही है यही है भाइयों बहनों, अरे बहनें तो है ही नही यहां पर, खैर आप के घर में तो है न । हां उनके लिए भी आप के लिए भी बूढी मां के लिए भी दादा-दादी, पोता-पोती हरेक के लिए, हर दर्द का दवा, हर मरीज का इलाज, यही पुडिया एक रामवाण है ।

हां इसी तरह नौंटंकी करके, मजमा जमा-जमा के, हर रोग का एक रामवाण कहकर, और लोगो को बेवकूफ बनाकर जेब और दिमाग दोनां को बुरी तरह लुटा जाता था । जेबों को लुटने के बाद उस्ताद और जमूरे की वह चण्डाल चौकडी के लिए हम तमाशाईयों का काम खत्म हो जाता था और गाली कर कर के हम लोगों को भगा दिया जाता था, खेल खतम पैसा हजम ।

और आज इस देश में राजनीति के उस्ताद लोग और बुद्धिजीवी तथा कानूनगो नाम के जमूरों के इसी तरह के मजमें हमलोग हर राह हर मोड पर देखते रहते आ रहे हैं, कभी प्रजातन्त्र, कभी लोकतन्त्र, कभी गणतन्त्र के नाम पर, कभी जनता, कभी सामनता का अन्त, कभी संसद पुनर्स्थापन, कभी जातीय, कभी क्षेत्रीय, कभी पीडित उन्मुक्ति, कभी क्या कभी क्या – और हर बार बेचारे तमाशाई उसी को लखनजी के लिए हनुमानजी का लाया हुआ रामवाण का पुडिÞया समझकर उस पर निछावर हो जाते हं, और जान भी अर्पित कर देते है । और तमाशा खतम होते ही तमाशाईयों को अगले तमाशा तक के लिए भगा दिया जाता है ।

याद होगा, कभी-कभी सापों की एक पिटारा भी सब के सामने जमीन पर एक लाल कपडे से

ऊपर ढक कर रखा जाता था और कहा जाता था, इस में एकर् इच्छाधारी नागीन बन्द है । उस नागिन को पकडÞने के लिए हमारे परमपूज्य गुरू तान्त्रिक बडÞबडÞानन्द षडमुख बाबा ने हिमालय से कन्याकुमारी तक, जम्बुद्वीप से लंका द्वीप तक, इर्सर् इच्छाधारी नागिन को वश में करने के लिए, सात साल, सात महीने सात दिन सात मिनट और सात सेकेण्ड तक निराहार निर्जल, आंख पूरा बन्द कर के, एक पैर पर यात्रा किया था, और अब अन्त में हार मान कर गुरू के बस में आई हर्ुइ यह नागिन आजकल हमारे पास हमारे बन्धन मंे हैं । यह नागिन सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरत, मणी माणिक, कुबेर के खजाना सब दे सकती है चुटकी भर में हमें । पर गुरू महाराज ने हम से खुद के लिए लेने से मना किया है, जब समय आएगी हम इस नागिन को उपयोग करके सारे गरीबों का उद्धार करेंगे । और आज हम आप को इस खेल के अन्त में इर्सर् इच्छाधारी नागिन की छोटी झलक का दर्शन कराएंगे, अब दिल में भक्ति है तो फेंकिए इस के ऊपर पैसा । और जब पैसों की बौछार होती थी कथिन नागिन का पिटारा के आस-पास तो खुस आवाज मंे उस्ताद कहते थे, बैठिए बैठिए, दिल थाम के, सम्हाल के बैठिए, इस खेल के अन्त तक । हम तो बच्चे ही थे, बैठेंगे ही, बडे बडे भी सचमूच दिल थाम के, सारे काम-धाम छोडÞ के उर्सर् इच्छाधारी नागिन को देखने कि मनसुबा ले के घन्टों बैठे रह जाते थे, पुडिÞया खरीदते थे, पैसे फेकतंे थे अर्थात उस्ताद की हर बातों पर विश्वस्त थे, जमूरे की हर कलाबाजी पर आश्वस्त थे । और अन्त में खेल खतम और पैसा हजम ।
और इसी तरह आज भी हमारे उस्ताद लोग हमारे सामने उसी तरह का एक पिटारा रख के लाल कपडे से ढक कर जमूरों के कलाबाजियां दिखाकर, बातों के जालों मे फंसा कर, देश के लिए, जनता के लिए विकास, प्रगति, सुख शान्ति वैभव, समृद्धि, समानता, सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार जैसे हीरे जवाहरात चाँदी सोना, मणि माणिक देनेवालर्ीर् इच्छाधारी नागिन को दिखाने की आशा में हरबार हमारी बलि ले लेते है । और मीठी भाषाओं में बोलेंगे, अब एक दिन इस नागिन से जनता की सारी आकांक्षाएँ, सारर्र् इच्छाएँ, हम पूरा करेंगे, और यह देश खुशहाल होगा, वगैरह वगैरह ।
और हर क्रान्ति के बाद, हर परिवर्तन के बाद, हर बलिदान के बाद, झटपट खेल खतम पैसा हजम किया जाता है ठीक उसी मजमंे वाला उस्ताद की तरह । और उर्सर् इच्छाधारी नागिन का पिटारा कहा गया लाल वस्त्र से ढÞका हुआ आशा की पोटली बन्द का बन्द ही रह जाता है । और नेता

लोग अपने जमूरे के साथ जनता के जेब से लुटा हुआ माल कन्धे पर उठा के चुपचाप चलते जाते हं, लुट का माल किसी कोने में अपने परिवारजनों के साथ बांटने के लिए । खेल तो इस बार के लिए भी पिछले हर परिवर्तन की तरह खत्म हुआ । पर इस बार राजसंस्था की दर्दनाक मौत से, पूरी खजाना पर अचानक पर्ण् नियन्त्रण आने के कारण, यह खजाना देख कर मन विक्षिप्त हो गया, और खेल खत्म होने के इतने समय के बाद भी पैसा हजम होना मुश्किल हुआ । और इसी वजह उस्तादों और जमूरों में तमाशाइयों की जेब का लूटा हुआ माल के साथ मिली जनता की अमानत नामक राजा की इस खजानें की बंटवारे पर हडकम्प मची हर्इ है । हर कोई दूसरे के माल का झपटकर हडपने की धुन में पागल हो रहा है । निरंकुश कह-कह के राजतन्त्र को हजम कर चुके हं, जनयुद्ध के नाम पर भी हजारों आम गरीब लोगों की जान की भी खपत हो चुकी है । मधेश आन्दोलन के नाम पर भी आम गरीब मधेशियों की बलि चढÞाकर उन की कफन की चादर ओढÞ के सोने की गद्दी पर मधेशी महाराज लोग भी विराजमान हो कर, उतर कर, उतार कर ऊपर नीचे ऊपर भी हो चुके हैं । एक से दो, दो से तीन, कभी इधर कभी उधर -

अब बाकी जब ऐसी पुडिÞया ना रही तो झपट पडे, सारे उस्ताद उसी सत्ता की हड्डी पर जिसे कभी निरंकुश राजसत्ता, कभी सामन्ती व्यवस्था, कभी सामाजिक शोषण का स्रोत के नाम पर हम जैसे लोगों को मरवाया गया, भाइयों में लडÞवाया गया, गोलियों की बौछारो मं शहीद और वीर का भ्रमित नाम दे-दे कर बार-बार देश के लिए, प्रजातन्त्र के लिए खून का कतरा-कतरा मांगा गया और गरीब जनता इस अग्निशिखा पर कुद पडंÞे थे, निर्दोष और भ्रमित पतंगो की तरह । पतंगे जलने के लिए ही हैं सो जल रहें हैं, और शमा का काम जलाना है जला रहें हं ।

उस्तादों और जमूरों की नये तरीके की हिंस्रक और निषेधात्मक गैरप्रजातांत्रिक राज्यलक्ष्मी के अस्मिता के ऊपर की छीनाझपटी में जनमत के बदले नेतामत का नयाँ लोकतान्त्रिक नेतातन्त्र का जन्म हुआ । सहमति का डुग्ाडुगी बजाकर मजमा जमा किया गया और उस के बाद हर्ुइ तमाशा और नौटंकी में बेशर्मी तथा बेहइया का इतना नग्न ताण्डव दिखाया गया की कोई भी सभ्य समाज इसे देखे और छी.. ना कहे, संभव नही । पर करे क्या, जो करे वह करने में मस्त, जो देखे वह लज्जा ग्रस्त । डुग डुग डुग खेल खतम, पैसा हजम । हे जमूरे – हां उस्ताद ! ये लोग क्या कुछ देखते है जमुरे – नहीं उस्ताद ! क्यों नही देखते है, यह लोग, जमूरे – क्यांे कि उस्ताद इनकी दृष्टि तो हम लोग छीन चुके है, हर रोज मिडिया पर एक नईर्-नई झूठ बोल बोल के । डुग-डुग- डुग । हे जमूरे – हां उस्ताद ! हां पाठकवृन्द, आज का सच यही है, पर कडवा है ! खतरनाक है ! भयावह है ! पर सच है !!

भारतीय छात्रराजनीति के ६० वर्ष::एम. के. प्रियदर्शी

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नवर्निमाण में छात्र-युवाओं की भूमिका महत्वपर्ण् होती है । इतिहास गवाह है कि युवाओं ने समय-समय पर आंदोलन करके देश व समाज की दशा-दिशा को बदलने का काम किया है ।
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कई छात्र-युवा संगठनों का निर्माण हुआ । लेकिन स्वतन्त्र भारत के अधिकतर छात्र-युवा संगठन या तो किसी राजनीतिक दल के सहयोगी संगठन के रुप में कार्यरत रह कर दल की नीतियों पर चलने लगे या स्थापना के कुछेक वर्षवाद उनका पतन हो गया । लेकिन स्वाधीनता के पश्चात भारत की हजारों वर्षो की गौरवशाली परम्प्राओं को ध्यान में रखकर उसे पुनः आधुनिक, विकसित एवं परिस्थितिजन्य दोषों से मुक्त करने का सपना जब सारा देश देख रहा था उस समय कुछ भारतीय युवाओं ने इन सपनों को साकार करने के लिए देश के महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय परिसरों में गतिविधियाँ प्रारम्भ की । इन्ही गतिविधियों का देशव्यापी खुला मंच ९ जुलाई १९४९ को विधिवत स्थापित हुआ । जिसका नाम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् है ।abvp_rally
छात्रों द्वारा छात्र-युवाओं, देश व समाज के लिए हित के लिए कुछ कर गुजरने हेतु गठित इस छात्र संगठन ने वर्ष२००९ में ६० वर्षपूरे कर लिये हैं । छात्रों द्वारा प्रारम्भ यह सुधारवादी प्रक्रिया रुकी नहीं बल्कि निरतंर जारी रही । हाँ, अनंत बाधाएँ जरुर आयी, समय बदली परन्तु संगठन का कार्य जारी रहा । अभाविप भारत का ऐसा छात्र-युवा संगठन है जिसने ‘वन्दे मातरम’ एवं ‘भारत माता की जय’ के नारे को प्रत्यक्ष सक्रियता में बदल दिया है । जम्मू-कश्मीर से केरल तक तथा पूर्वोत्तर के मणिपुर, अरुणाचल से लेकर गुजरात तक परिषद् अपना पैर जमा चुकी है । देश का ऐसा कोई भी छोटा-बडÞा शहर नहीं है जहाँ अभाविप सक्रिय नहीं है ।
भारत में विभिन्न प्रकार के विचारों से प्रेरित छात्र संगठन काम करते हैं लेकिन अभाविप ही एक मात्र ऐसा छात्र-संगठन है जो सत्ता एवं दलगत राजनीति से अलग रहकर छात्र व समाज के हित में राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर रचनात्मक-संगठनात्मक एवं आंदोलनात्मक काम करता है ।
भारत के पर्ुनर्निमाण के लिए युवकों का आंदोलन हो या शिक्षा में सुधार के लिए आंदोलन परिषद ने सब में बढ चढ कर अपनी भूमिका निभायी
है । आतंकवाद- नक्सलवाद के विरूद्ध आंदोलन, राष्ट्रविरोधी शक्तियों से संर्घष्, पर्यावरण बचाओं आंदोलन, परिसर बचाओ आंदोलन, पश्चिम के अंधानुकरण का विरोध, श्रीनगर में तिरंगे के अपमान के विरोध में हुआ आंदोलन बंगला देशी घूसपैठ के विरुद्ध चलो चिकन नेक आंदोलन एवं समय-समय पर आनेवाली राष्ट्रव्यापी समस्यांओं के समाधान को लेकर संर्घष्ा कर व उन संर्घष् में सफलता प्राप्त कर परिषद् ने यह साबित कर दिया है कि वह राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए सदैव प्रयासरत रहने वाला छात्र संगठन है । इतना ही नही विद्यार्थी परिषद देश के महापुरुषों की जयन्ती पर रक्तदान, स्वच्छता एवं सामाजिक समरसता से जुडÞे कार्यक्रम भी आयोजित करती रही है । परिषद् के छात्रों ने बाढÞ, महामारी एवं भूकम्प के समय भी अपना महत्वपर्ण् सहयोग देकर देशवासियों को अपने राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से अवगत कराया है ।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के ६० वर्षपूरे होने पर संगठन के राष्ट्रीय मंत्री रमाशंकर सिन्हा कहते है कि एक
विकसित भारत के निर्माण का सपना परिषद् ने देखा है जिसे पूरा करने का संकल्प लेकर हम सक्रिय है । संगठन के बिहार प्रान्त के संगठन मंत्री गोपाल शर्मा के अनुसार संगठन का कार्य आज पूरे देश में फैल गया है इसका सबसे बडा कारण समस्याओं के त्वरित सामाधान हेतु परिषद् के छात्रों द्वारा किया जाने वाला सशक्त आंदोलन ही है । वहीं परिषद् के पर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डा. रामनरेश सिंह के शब्दों में ६० वर्षो में विद्यार्थी परिषद् ने जो सफर तय किया है उस साकारात्मक सफर ने आज परिषद् को देश ही नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बडा छात्र-संगठन बना दिया है । आज यह संगठन दुनिया भर में विश्व विद्यार्थी युवा संघ ९ध्इक्थ्० के नाम से काम कर रहा है । बिहार प्रान्त के पर्ूव प्रदेश सहमंत्री बसन्तकुमार मिश्रा का मानना है कि अ.भा.वि.प. के ६० साल में सबसे बडी उपलब्धि यह है कि अपनी कार्यशैली से तो परिषद् राष्ट्रव्यापी बन हीं गया, साथ ही भारत का यह पहला छात्र संगठन है जिसमें कभी विभाजन नहीं हुआ । जो परिषद् के लिए गौरव की बात है । इसी संगठन से जुडे शिक्षक नेता प्रो. प्रियारंजन चौबे उर्फगुड्डू चौवे का कहना है कि प्राचीन काल में भारत में जो गुरु-शिष्य परम्प्रा थी उसे विद्यार्थी परिषद् ने वर्तमान समय में जीवंत रखा है । इसी कारण देश के हजारों शिक्षक आज परिषद् से जुडे हैं ।
कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि भारत की आजादी के बाद देश में गौरवशाली सभ्यता-संस्कृति की स्थापना और उस में छात्र-युवा शक्ति की सहभागिता अगर कोई छात्र-युवा संगठन सुनिश्चित करा रहा है तो वह अभाविप हीं हैं इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । तभी तो सन् १९७४ के भारतीय छात्र आंदोलन के महान योद्धा लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने छात्रों का आह्वान करते हुए कहा था कि- ‘सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी बागी हैं ।’
सन् १९७४ के भारतीय छात्र आंदोलन में अ.भा.वि.प. द्वारा दिया गया नारा ‘जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है, तलवारों की धारों पर इतिहास हमारा बनता है’ आज भी छात्रों-युवाओं में जोश भरने का काम कर रहा है ।
-लेखक विगत कई वर्षों से भारतीय छात्र राजनीति का अध्ययन कर रहे हैं)

ल्रि्रहान रिपोर्ट पर राजनीतिक बावेला::अवधेश कुमार

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जारी ल्रि्रहान आयोग रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है । राष्टीय स्वयंसेवक संघ परिवार एवं भाजपा विरोधी इसमें दोषी माने गए नेताओं और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं । दूसरी ओर भाजपा ने इस रिपोर्ट को एक सिरे से ही नकार दिया है । भारतीय संसद के दोनों सदनों में इस पर बहस हो चुकी है और गृह मंत्री पीं चिदम्बरम बहसों के जवाब में सरकार का पक्ष भी रख चुके हैं । यह बात तो बिल्कुल साफ है कि केन्द्र सरकार ल्रि्रहान आयोग की रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखने के लिए अभी तैयार नहीं थी । एक समाचार पत्र ने ल्रि्राहन अयोग की रिपोर्ट लीक होने का दावा नहीं किया होता और उसे आधार बनाकर संसद में सम्पर्ण् विपक्ष ने एक स्वर से उसे पेश करने की मांग न की होती तो सरकार इसे पेश करने में कुछ समय और लगाती । ३० जून को न्यायमर्र्ति ल्रि्रहान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रिपोर्ट पेश की और कायदे से इसे संसद में रखने के लिए सरकार के पास छः महीने का समय था । संसद मे गृहमन्त्री पी. चिदम्बरम ने कहा भी था कि सरकार कार्रवाई रिपोर्ट के साथ इसी सत्र में ल्रि्रहान रिपोर्ट पेश करेगी । संसद के सत्र के बीच यदि पूरी रिपोर्ट या उसके कुछ अंश बाहर आ गए तो यह यकीनन संसदीय विशेषाधिकार पर आघात है । जो अंश प्रकाशित हुए वे मूल रिपोर्ट में भी हैं । जाहिर है, कहीं न कहीं से रिपोर्ट के कुछ अंश अवश्य बाहर आए । गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि आयोग के रिपोर्ट की एक ही काँपी गृहमंत्रालय के पास है । उन्होंने यह बयान संसद में दिया, इसलिए इस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । अगर ऐसा है तो फिर वहां से लीक होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए । न्यायमर्र्ति ल्रि्रहान ने भी कहा कि उनका नैतिक पतन इतना नहीं हुआ कि वे रिपोर्ट लीक कर दें ।

लेकिन आरंभ में भले रिपोर्ट का लीक होना मुद्दा था, अब यह गौण हो गया है । आगे क्या होगा कहना कठिन है, पर यह बात साफ है कि कहीं न कहीं इस रिपोर्ट को लीक कराने के पीछे राजनीतिक रणनीति रही है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टर्जस प्रकार अपने खोए हुए जनाधार को पाने
के लिए छटपटा रही है उसमें यह आशंका स्वभाविक तौर पर बलवती होती है कि मुसलमानों का र्समर्थन पाने के लिए उसने ऐसा किया हो । जाहिर है, अयोध्या एवं ल्रि्रहान रिपोर्ट पर राजनीतिक कवायद हमें आगे भी देखने को मिलेंगे । किंतु प्रश्न है कि क्या वाकई इस समय ल्रि्रहान रिपोर्ट के सामने आने से बाबरी विध्वंस मामले में काई गुणात्मक अंतर आएगा – क्या १७ वर्षबाद आए ऐसे रिपोर्ट का किसी भी दृष्टिकोण से कोई औचित्य भी हैं – बाबारी विध्वंस से संबंधित ऐसे कौन से तथ्य देश के सामने पहले से उपलब्ध नहीं है जो ल्रि्रहान रिपोर्ट के कारण उजागर हुआ है – ल्रि्रहान रिपोर्ट में जिन ६८ नेताओं का नामोल्लेख किया गया है वे सारे पहले से ज्ञात हैं । वास्तव में थोडे शब्दों में कहा जाए तो न्यायमरूरत मनमोहन सिंह ल्रि्राहन की बाबरी विध्वंस संबंधी जांच रिपोर्ट आज के लिए अप्रासंगिक बेमानी तो है ही बाबरी विध्वंस के मूल कारणों की गहर्राई से छानबीन करने की जगह केवल अपने विचार को स्थापित करन वाले अत्यंत ही सतही तर्को और कई बार बेतुके और हास्यास्पद निष्कषार्ंर्ेेे भरे हुए हैं । १७ वर्ष ३९९ बैठकें, १०० गवाहों के बयान, ४८ बार विस्तार से ल्रि्रहान आयोग ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं लाया है जिनसे मामले पर नई रोशनी पडे ।
इस रिपोर्ट में १०२९ पृष्ठ और १६ अध्याय है ।
इसके बाद गवाहों की सूची और नक्शा है । रिपोर्ट पढने से साफ हो जाता है कि बाबरी विध्वंस से संबंधित उन्होंने अपना जो विचार निर्धारीत किया उसे ही आरंभ से अंत तक साबित किया है । परिचय -इंट्रोडक्शन) और निष्कर्ष-कन्क्लूजन) वाले अध्याय को पढÞ लीजिए । परिचय के आरंभ पैरा १.१ में वे कहते हैं कि कुछ के लिए सत्ता सर्वोपरि है और सत्ता पाने की प्रक्रिया में देश, समाज, व्यक्ति कुछ भी मायने नहीं रखता है । वस्तुपूरकता, बौद्धिकर् इमानदारी एवं तार्किकता आदि सब इसमें खो जाते हैं । अपना राजनीतिक लक्ष्य पाने के लिए संविधान, कानून, लिखित-अलिखित मोरल इथिक्स.. आदि की निंदाजनक अनदेखी -क्नटेम्ट्यूअसली इग्नोर्ड) की जाती है । पैरा १.२ में वे लिखते हैं कि संघ, भाजपा, विहिप, शिवसेना के नेता विध्वंस के समय सक्रिय या निष्त्रिmय सहयोग कर रहे थे । यह सारी प्रक्रिया राजनीतिक सत्ता पाने और इस प्रकार अपना इच्छित राजनीतिक परिणाम हासिल करने की ओर लक्षित था । १.३ में उन्होंने लिखा है कि भारत एवं हिन्दू धर्म के इतिहास में यह सबसे घृणित धार्मिक असहिष्णुता का वाकया था । पृष्ठ संख्या ९४१ म् प्स्यूटो मोडरेट आफ द परिवार नाम के शर्ीष्ाक में वाजपेयी, आडवाणी, जोशी सभी की तीखी आलोचना की है । उनके चरित्र को नकली उदारवादी साबित करने के लिए ल्रि्रहान ने पूरी ऊर्जा लगाई है । संतुलन बिठाने के लिए ९४५ पृष्ठ पर मुस्लिम आर्ँगनाइजेशन नामक शर्ष्क से कुछ मुसलमान नेताओं को सांप्रदायिक कहते हुए उनके रवैये की भी आलोचना की है । वे कहते हैं कि मुसलमान नेताओं की विफलता अपने आप में ६ दिसंबर की घटना के लिए उत्तरदायी नहीं है । लेकिन उनका ठीक से काम न करने का जो आरोप है उससे संघ परिवार
का काम आसान हो गया । आयोग अपने लोगों के पक्ष को प्रभावी रूप से न उठाने के लिए और एक प्रभावी लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका अदा करने में विफलता के लिए केवल टेरटियरी लेवेल पर ही मुस्लिम संगठनों एवं नेताओं को दोषी मानता है ।

पूरी रिपोर्ट में ल्रि्रहान इस बात को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि अयोध्या आंदोलन जनता का आंदोलन कभी था ही नहीं, जन भावना उससे कभी जुडÞी ही नहीं, बस, भाजपा एवं विहिप के निहित स्वार्थी नेताओं द्वारा भावनाएं भडकाने के कारण अति सीमित संख्या में आम आदमी बहकावे में आ गए । पृष्ठ संख्या ९३१ के पैरा १५८.२ में ल्रि्रहान लिखते हैं, ‘अतिशयोक्तियों के अलावा अयोध्या अभियान को -कैम्पेन शब्द प्रयोग किया गया है, मूवमेंट नहीं ।) आम आदमी यहां तक की औसत हिन्दू की इच्छा या स्वैच्छिक र्समर्थन हासिल नहीं था । हालांकि यह अभियान उन सबको चुप कराने एवं यह सुनिश्चित करने में सफल हो गया कि यदि उन्होंने अभियान के नेताओं के निंदात्मक भाषणों का विरोध किया या स्थिति का तार्किक मूल्यांकन किया तो उन्हें नास्तिक या हिन्दू विरोधी या गैर देशभक्त करार दे दिया जाएगा ।’ आगे पैरा १५८.३ में वे लिखते हैं, ‘इस प्रकार हालांकि इस रिपोर्ट में मूवमेंट शब्द का बार-बार प्रयोग है, किंतु अयोध्या में मंदिर की मांग शब्द के सच्चे अर्थ में कभी जनआंदोलन -पब्लिक मूवमेंट) नहीं हो पाया । परंपरागत रूप से मूवमेंट या आंदोलन शब्द का प्रयोग किसी विशेष परिणाम के लिए लोगों की सामूहिक चाहत को निर्दिष्ट करता है, अयोध्या अभियान कभी उस स्तर के समानुपात को भी छू नहीं पाया । …..’

तो इस प्रकार उनकी रिपोर्ट में इस बात पर
निरंतरता है कि अयोध्या आंदोलन नामक कोई आंदेलान नहीं था, इसे संघ परिवार के नेताओं ने केवल सत्ता पाने के लिए हथियार बनाया और वे इसे आंदोलन साबित करने के लिए कर्ुतर्क देते रहे । इसे ही उन्होंने बाबरी विध्वंस को साजिश साबित करने का भी आधार बना दिया है । उन्होंने कहा है कि किसी दृष्टिकोण से साबित नहीं होता कि उपस्थित कारसेवकों द्वारा स्वतःस्फर्ूत तरीके से ध्वंस को अंजाम दिया गया । भाजपा सहित संघ परिवार के सभी प्रमुख नेताओं को किसी न किसी तरह इसके लिए दोषी करार दिया गया है । संघ परिवार और उससे जुडÞे दूसरे संगठनों की भूमिका पर भी आयोग ने प्रकाश डाला है । इस रिपोर्ट के अनुसार भाजपा, संघ, विहिप के सभी प्रमुख नेताओं ने काफी बुद्धिमता से बाबरी ढांचा ध्वंस करने की योजना को तय समय पर क्रियान्वित किया एवं वहां आनन-फानन में एक अस्थायी मंदिर भी बना दिया गया । लेकिन पूरी रिपोर्ट में वे साजिश को साबित करने के लिए कोइ तथ्य नहीं देते । जहाँ तक अटलबिहारी वाजपेयी का प्रश्न है तो इन्हंे सीधे बाबरी विध्वंश से न जाडÞकर भडÞकाऊ भाषण देने का दोषी पाया गया है । आयोग ने वाजपेयी को गवाही के लिए बुलाना तक मुनासिब नहीं समझा । यही बात शंकरसिंह बाघेला के साथ भी है । इन दोनों से पूछताछ किए और उनको अपनी बात रखने का मौका दिए बिना आयोग कैसे उनको दोषी मानने के निष्कर्षपर पहंुच गया – कई दूसरे नेताओं और अधिकारियों के बारे में भी ऐसा ही है । देखा जाए तो उस समय केन्द्र एवं राज्य सरकार में जो भी संबंधित विभागों से जुडेÞ मंत्री या अधिकारी थे उन सबको किसी न किसी तरह बाबरी ध्वसं का दोषी माना है । वास्तव में इन करणों से यह अत्यंत ही साधारण दर्जे की रिपोर्ट बन गई है ।
कोई अयोध्या के विवादित स्थल पर श्रीरामजन्म
भूमि मंदिर निर्माण को लेकर चले आंदोलन का र्समर्थक हो या विरोधी, कोई भर्र् इमानदार पर्यवेक्षक इस निष्कर्षको स्वीकार नहीं कर सकता कि उस आंदोलन से जनता का जुडÞाव था ही नहीं या वह आंदोलन ही नहीं था । सच यह है कि आजादी के बाद भारत में दो ही बडे आंदोलन हुए जिनका देशव्यापी असर था, १. आपातकाल विरोधी आंदोलन एवं २, अयोध्या आंदोेलन । अगर यह आंदोलन इतना ही जनविहिन था तो फिर केन्द्र से लेकर राज्यों में कांग्रेस की सरकारें उसके सामने क्यों झूकती रहीं – शिलान्यास की अनुमति तो भाजपा की सरकार ने नहीं दी । ल्रि्रहान एवं उनके सुर में ताल मिलाने वाले नेता यह क्यों भूल जाते हैं कि अयोध्या आंदोलन से उत्पन्न ज्वार ने ही भाजपा को संसद के दो स्थानों से १९८९ में ८९ एवं १९९१ में ११९ तक पहुंचा दिया । स्वयं राजीव गांधी ने १९८९ का चुनाव अभियान अयोध्या से आंरभ किया एवं रामराज्य निर्माण की बात की । यह अयोध्या आंदोलन के जनता पर असर का ही परिणाम था । तो इस प्रकार जो रिपोर्ट अपना सैद्धांधिक आधार ही गलत कायम कर रहा हो उसकी अन्य व्यावस्थाओं को कैसे स्वीकार किया जा सकता है -

मजे की बात देखिए कि ल्रि्रहान स्वयं सच तक नहीं पहुंच पाने में अपनी विवशता भी दर्शाते हैं । पृष्ठ संख्या ६-७ के पैरा ३.५ में ल्रि्रहान कहते हैं कि उनका आयोग डिटेक्टिव एजेंसी नहीं है, इसलिए उसे जो खंडित, बिखरी हर्इ सूचनाएं या गलत सूचनाएं -पग्मेंटेड इन्प‘र्मेशन) दिया गया उसके साथ अपना काम करने लिए विवश था । वे लिखते हैं कि उनकी जांच का जो दायरा था उसमें वे राज्य सरकार, केन्द्र सरकार एवं नीजी व्यक्तियों के सहयोग पर निर्भर थे । उन्होंने राज्य एवं केन्द्र की एजेंसियों पर महत्वपर्ण् तथ्य
छिपाने का भी आरोप लगाया है । अध्याय आफ्टरवार्ड्स में ल्रि्रहान रोना रोते हैं कि क्यों देर हो गई । हमारे पास कर्मचारी स्थायी नहीं थे । कम कर्मचारी रहें । कोई कर्मचारी जब तक कमीशन का काम समझता तब तक उसका स्थानांतरण हो जाता । हमें बाहर से स्टेनोग्राफर लाना पडा । कोई आयोग छानबीन एजेंसी नहीं होता । सबकी सीमाएं होतीं हैं, लेकिन ल्रि्रहान अपने निष्कर्षों को ऐसे लिखते हैं मानो असुविधा, असहयोग और छानबीन एजेंसी न होने के बावजूद उन्होंने सच क पता लगा ही लिया । १९८३ से १९८७ तक कांग्रेस या संयुक्त मोर्चा की सरकार थी । ल्रि्रहान लिखते हैं कि लगातार विज्ञापन देने के बावजूद कोई भी साक्ष्य या किसी प्रकार की सूचना लेकर हमारे पास नहीं आया । जाहिर है, यदि आयोग को असहयोगात्मक रवैये का सामना करना पडा तो इसके लिए केवल भाजपा दोषी नहीं थी, स्वयं इस रिपोर्ट से ही यह साबित होता है कि सभी पार्टियों का रवैया असहयोगात्मक था ।

अब आइए अनुशंसाओं पर । पृष्ठ संख्या ९६३ से ९८१ यानी १८ पृष्ठों पर अनुशंसाएं हैं । इसमें दंगो को रोकने से लेकर, अपराध, न्याय प्रणाली में सुधार, पुलिस सुधार, सिविल सेवा सुधार जाने क्या-क्या नहीं है । वास्तव में यहंा ल्रि्रहान आजादी के बाद भारत में व्यवस्था के स्तर पर सबसे बडे परिवर्तनवादी बन जाते हैं । सच कहा जाए तो यह भानुमति का पिटारा है । ऐसा लगता है जैसे १७ सालोंकी कसर पूरी करने के लिए उन्होंने अनुशंसाओं को १८ पृष्ठों तक फैला दिया है । इसमें तो भारत की चुनाव प्रणाली से लेकर, राजनीति, न्याय प्रणाली, धार्मिक संस्थाओं की प्रकृति आदि सभी को बदल देने का सुझाव उन्होंने दे दिया है । वैसे भारत सरकार ने कहा है कि उसने रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है । किंतु १३ पृष्ठों की कार्रवाई रिपोर्ट में रिपोर्ट के आधार पर नए सिरे से मुकद्दमंके बारे में कुछ नहीं कहा है । किसी नेता या अधिकारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का संकेत इसमें नहीं है । केवल यह कहा गया है कि बाबरी ध्वंस से संबंधित न्यायालयों मंे चल रहे मुदकमों की गति तेज की जाएगी । प्रश्न है कि इसके लिए ल्रि्रहान रिपोर्ट की कोई आवश्यकता थी क्या – कार्रवाई रिपोर्ट में ल्रि्रहान आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर जो अन्य बातें कहीं गई हैं वे भी ऐसी ही है । मसलन, राष्ट्रीय एकता परिषद को वैधानिक अधिकार देना, आपराधिक न्याय आयोग की स्थापना, दंगों के क्षेत्र को कब्जे में लेने का केन्द्र सरकार को अधिकार देने के लिए कानून बनाना सरकारी अधिकारीयों के लिए धार्मिक संस्थाओं मे पद लेने का निषेध
आदि । सांप्रदायिक दंगा होने पर संबंधित क्षेत्र को केन्द्र सरकार द्वारा नियंत्रण में लेने संबंधी विधेयक भी सामने आ चुका है । कार्रवाई रिपोर्ट में राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के समाधान के लिए राजनीतिज्ञों के बजाय विशेषज्ञों की समिति बनाने की बात कही गई है । कह सकते हंै कि श्ाायद ल्रि्रहान रिपोर्ट नहीं आता तो सरकार इन दिशाओं में शायद ही विचार करती । वैसे कार्रवाई रिपोर्ट मं शामिल होने का अर्थ उनका अमल में आना नहीं है । कार्रवाई रिपोर्ट का स्वरूप भी अनुशंसात्मक ही होता है । इनमें कुछ बातें तो राज्यों के अधिकार क्षेत्र की हैं, केन्द्र किसी राज्य के दंगाग्रस्त क्षेत्र को अपने अधिकार म,ें ले इस पर राज्यों की सहमति आसानी से नहीं हो सकती ।

अब आए मुकदमों के पहलू पर । सीबीआई को रिपोर्ट सौंपने का कानूनी महत्व न के बराबर है । जहां तक इसके आपराधिक मुकदमे का पहलू है तोे महत्व केवल सीबीआई के आरोप पत्र का ही है, ल्रि्रहान रिपोर्ट का कोई कानूनी महत्व तभी हो सकता है जब इसके आधार पर मुकदमा दर्ज हो । मुकदमा दर्ज होने के बाद भी पुलिस को छानबीन करनी होगी और न्यायालय में उसका
आरोप पत्र ही मान्य होगा । यह ध्यान रखना जरूरी है कि बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई छानबीन कर काफी कुछ पहले से हीं सामने ला चुकी है ६ दिसम्बर १९९२ के बाबरी विध्वंश के बाद स्थानीय थाना मंे मुकदमा नं. १९७/९२ कारसेवकों के विरूद्ध एवं १९८/९२ नेताओं के खिलाफ दायर हुआ । २७ फरवरी १९९३ को सी.आइ.डी. ने ललितपुर के विशेष न्यायालय मं आरोप पत्र दायर कर दिया । ८ जुलाई को रायबरेली में विशेष न्यायालय बना । एवं २५ अगस्त १९८३ को सी.बी.आई. को मामला सौंप दिया गया । ८ सितम्बर १९८३ को लखनऊ में विशेष न्यायालय बना जहाँ सी.बी.आई. ने ४९ लोगों

के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया । सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर १९८/९२ के आरोपियों को भी लखनऊ न्यायालय में मुकदमा चलाने की बात कहीं । इसे बाद में उच्च न्यायालय ने अवैध करार दिया । इस समय इनके खिलाफ रायबरेली में मुकदमा चल रहा है । अन्य ४७ मामले लखनऊ के विशेष न्यायालय में चल ही रहा है ।

तेलंगाना को लेकर गरमायी राजनीति

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण को लेकर हुए आंदोलनों ने कई वार भारत सरकार को झुकने पर मजबूर भी किया है । इन्ही आंदोलनों का परिणाम है कि भारत में छतीसगढ, उत्तराखण्ड और झारखण्ड जैसे प्रदेश अपने-अपने मूल्य राज्यों से अलग होकर बने है ।

अभी हाल के दिनां में टी.आर. एस. प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव ने अलग तेलंगाना प्रदेश की माँग को लेकार आन्ध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद में आमरण अनशन शुरू किया था । ग्यारह दिनों के अनशन से केन्द्र की कांग्रेस सरकार और उसके प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इतने घबरा गये कि सरकार ने आनन-फानन में अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी । तेलंगाना राज्य निर्माण की मांग कोई नयी नहीं है । के. चन्द्रशेखर राव के पार्टर्लंगाना राष्ट्र समिति का गठन अलग तेलंगाना राज्य निर्माण की माँग को केन्द्र बिन्दु बना कर ही किया गया था । अपने स्थापना काल से हीं टी. आर. एस. अलग राज्य की माँग करता आ रहा है । वर्ष२००४ के लोकसभा चुनाव के बाद टी. आर. एस. को ऐसा लगा था कि उसने केन्द्र की काँग्रेस यू पीए सरकार को अगर र्समर्थन किया तो अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण अवश्य हो जाएगा । फलतः टी.आर.एस. ने सरकार को अपना र्समथन भी दिया । इतना ही नही टी.आर.एस. प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव उक्त सरकार में मन्त्री भी बने । लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल पूरे होने में जब कुछ ही दिन शेष थे तो चन्द्रशेखर राव को लगा कि सरकार तो अब उनके साथ धोखा कर रही है अतः उन्होने मंत्रीपरिषद से इस्तीफा देकर सरकार से र्समथन वापस ले लिया । सरकार से बाहर आने के बाद अलग राज्य की माँग को उन्होंने जोर-शेार से उठाया । एक प्रकार से आंदोलनों का दौर चल पडा और टी.आर.एस. प्रमुख के अनशन से घबरायी केन्द्र सरकार ने तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा कर डाली ।
केन्द्र द्वारा अलग तेलंगाना राज्य की घोषणा के साथ हीं पूरे आन्ध्रप्रदेश में राजनीतिक खेमाबन्दी का दौर शुरु हो गया । आन्ध्र की राजनीति इस मुद्दे पर दो भाग में बँट गई है । एक तरफ टी.आर.एस. अपनी माँग पूरी होने पर जश्न मना रहा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस का एक तबका समेत चन्द्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टर् फिल्म अभिनेता चिरंजीवी के नेतृत्व वाली प्रजा राज्यम् पार्टर् संयुक्त आन्ध्र प्रदेश को लेकर वृहत जनआन्दोलन छेड दिया है । तेलंगाना के पक्ष और विपक्ष में शुरू हुआ यह आन्दोलन आन्ध्रप्रदेश तक ही सीमित नहीं है । अब यू पी की मुख्यमंत्री मायावती देश के सबसे बडे राज्य यू पी को तीन भागों में बाँटने की माँग कर रही है तो दार्जलिंग में गोरखालैण्ड की पुरानी माँग अब नये सिरे से उठने लगी है । महाराष्ट्र में विदर्भ और बिहार में अलग मिथिलाचंल राज्य की माँग भी अब जोर-शोर से की जा रही है । पूरे देश में अलग राज्य की माँग को लेकर एक आँधी सी चल पडी है जो रूकने के लिए फिलहाल तैयार नही है । इधर आन्ध्रप्रदेश में अलग तेलंगाना और अखण्ड आन्ध्रप्रदेश को लेकर तटीय एवं राँयल सीमा क्षेत्र में चल रहे जोरदार आन्दोलनों और राज्य मन्त्रिमण्डल के मन्त्रियों, विधायकों के त्यागपत्र एवं अपने हीं पार्टर्नेताओं द्वारा जारी व्रि्रोह से घबरा कर केन्द्र सरकार ने अब पैतरा बदलना शरू कर दिया है । सरकार का यह ताजा बयान कि तेलंगाना पर फैसला सभी पक्षों को विश्वास में लेकर किया जायेगा, ने पुनः अन्ध्रा की राजनीति में नया आग लगा दिया है ।

यहाँ सबसे तथ्यपरक बात यह है कि क्या के. चन्द्रशेखर राव के ग्यारह दिनों के आमरण-अनशन से घबरा कर केन्द्र सरकार को अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा करनी चाहिए थी या फिर टी.आर.एस. समेत देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों और आन्ध्रप्रदेश में कार्यरत क्षेत्रीय दलों के साथ मिल बैठ कर तेलंगाना मुद्दे का हल निकाला जाना चाहिए था । राजनीतिक पंडितो का ऐसा मानना है कि केन्द्र सरकार ने जल्दबाजी में निर्ण्र्लिया है । सरकार को बेहतर राजनीतिक माहौल में होशियारी पर्वक इस समस्या का सामाधान करना चाहिए था जो नहीं हो सका । भारत सरकार अगर सूझ-बुझ से काम ली होती तो आज आन्ध्रप्रदेश के अलावें अन्य राज्यों में अलग राज्य की माँग का जो सिलसिला शुरू हो गया है वह शुरू नहीं होता ।

देश की आजादी के बाद भारतीय संघ को मजबूत करने तथा भारत को एक सूत्र में बाँधने के लिए स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृहमन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने ६०० देशी रियासतों का विलय भारतीय परिसंघ में कराया था । सरदार पटेल ने अपने जीवन में कभी यह नहीं सोचा होगा कि जिस भारत को वे इतनी मजबूती प्रदान कर रहे हैं उसे हमारे हीं देश के नेता अपनी-अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाने के लिए अलग-अलग राज्यों में विभाजित कर देगें । खैर अभी भी समय है भारत सरकार गंभीरता पर्ूवक विचार करे । अलग राज्य का निर्माण विकास का मुख्य पैमाना नहीं हो सकता । उदाहरण के लिए हम बिहार से अलग हुए झारखण्ड को हीं देखें । अलग झारखण्ड निर्माण के बाद वहाँ शुरु राजनीतिक अस्थिरता और नक्सली गतिविधियाँ रुकने का नाम हीं नही ले रही है । अभी झारखण्ड में विकास का मुद्दा गौण हो गया है । अतः भारत सरकार और देश में कार्यरत सभी छोटे-बडÞे राजनीतिक दलों को अपने-अपने स्वार्थ-सत्ता से ऊपर उठकर देश की एकता-अखण्डता एवं विकास के लिए काम करना चाहिए । इसी में देश, सरकार एवं राजनीतिक दलों की भलाई है ।

हलचल::श्याम सुन्दर शशि

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

karimaकषि तथा सहकारी राज्यमंत्री करीना बेगम ने पर्सर् प्रमुख जिला अधिकारी -सिडिओ) के गाल पर चार थप्पड जड दिये । पहाडी राजसत्ता के मुख्तार दर्गाप्रसाद भण्डारी के गाल पर जडंे गए यह थप्पड की आवाज महीना बीतने के बाद भी नेपाली राजनीति में गुंज रही है । इसकी गुंज अभी भी राजनीतिक गलियारे में सुनी जा सकती है ।

यू तो राजनीति की कठपुलती नेपाली नौकरशाही पर पहली बार आक्रमण नहीं हुआ है । पंचायतकाल से नौकरशाही पर राजनीति का दबदबा चला आ रहा है । यहाँ के प्रशासक लोग समय-समय पर राजनीतिज्ञों का थप्पडÞ खाते और उसे खुशी-खुशी सहते भी रहे हैं । संविधान सभा के निर्वाचन के पश्चात् नेपाली राजनीति और भी अराजक हो गयी है । बन्दूक के सहारे स्थापित माओवादी सत्ता ने आम जनता को यह आभास कराया है कि बन्दूक सत्ता प्राप्ति का एक सुलभ माध्यम हो सकती है । मधेश आन्दोलन से आम मधेशियों का मनोबल बढा है । राजनीतिक अस्थिरता तथा बढÞती हत्या, अपहरण तथा लूट जैसी घटनाओं ने आम नेपाली जनमानस को त्रस्त बनाया है । कर्तव्य के बिना ही अधिकार प्राप्ति के मनोविज्ञान में भी इजाफा हुआ है । नेपाली जनता को अधिकार तो चाहिए परन्तु कोई अपना कर्तव्य करने को तैयार नहीं हैं ।

करीना बेगम के इतिहास पर नजर डाला जाये तो वह शीघ्र ही अपना धर्ैय खोने वाली महिला रही है । अपने क्रोध में आकर वे क्या से क्या कर जाती है उसका शायद उन्हें भी पता नही रहता । मधेशी जनाधिकार फोरम के वीरगंज अधिवेशन के दौरान एक सभासद जैसे गरिमामय पद पर रहते हुए भी उन्होंने जो गतिविधियां की उससे उनकी प्रतिष्ठा में आघात ही पहुँचा । अपने दम्भ में आकर पार्टरीध्यक्ष पर अनर्गल आरोप लगाने से लेकर खुलेआम सडÞक पर अन्य पार्टर्र्यकर्ताओं से मारपीट करना करीना की पुरानी आदतों में शुमार है । जो यह स्पष्ट करता है कि करीना पर जब गुस्सा चढÞता है तो वह कही भी कुछ कर सकती है । अतः ऐसे व्यक्ति को चाहे वह देश का उच्च सम्मानित मंत्री जैसै पद पर ही क्यों न आसीन हो उसे सजा अवश्य मिलनी चाहिए । करीना बेगम इसकी अपवाद नहीं हो सकती ।

लेकिन यह भी सच हैं कि करीना शार्ँट टर्र्म्पड महिला तो है लेकिन पागल नहीं हैं । अगर वह पागल होती तो रास्ते चलते किसी को भी मारपीट कर सकती थी । अपने ड्राइवर, पिउन को गाली देती, परन्तु ऐसी बाते सुनने को नहीं मिली है । वैसे भी वह वीरगंज जैसे मधेश के सबसे जागरूक क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित होकर संविधान सभा में पहुँची है । अर्थात् वीरगंज की जनता ने उनपर पर्ण् विश्वास किया है ।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि करीना बेगम ने जिले के प्रमुख प्रशासक को ही थप्पडÞ क्यों मारीं । उनको यह अच्छी तरह पता था कि उनके इस हरकत से पार्टर् प्रतिष्ठा पर आँच आएगी और उनका मंत्री पद भी जा सकता है । फिर भी उन्होंने ऐसा क्यांे किया । अभी तक यह देखा गया है कि मधेशी नेताओं का अंतिम लक्ष्य मंत्रीपद प्राप्त करना रहता आया है । करीना का भी अंतिम लक्ष्य अगर मंत्री बनना ही हो लेकिन मंत्री पद प्राप्त करने के पश्चात् उसे बरकरार रखने के बजाय उन्होंने उसे जोखिम में डालने की जर्ुरत क्यों की । चमचमाती नयी गाडÞी नहीं मिलने के कारण कोई भी मंत्री जिला प्रमुख को गाली दे सकता है लेकिन थप्पडÞ नहीं मार सकता ।

राज्य मंत्री ने पर्सर्ााे प्रमुख जिला अधिकारी पर बार-बार अपमानित करने का आरोप लगया हैं । करीना के ये आरोप मधेशी मूल के सभी मंत्रियों का प्रतिनिधित्व करता हैं । सरकार के जिला प्रशासक का अपने ही सम्मानित मंत्री के साथ अपमानजनक व्यवहार करना सम्बद्ध मंत्री से भी अधिक सरकार के लिए लज्जा का विषय है । ऐसे प्रशासकों पर सरकार की ओर से कारवाई की जानी चाहिए लेकिन आजतक ऐसा नहीं हुआ । नेपाली भाषी प्रशासकों द्वारा मधेशी मूल के मंत्री और सदासदों के साथ किया गया यह अपमान देश की कोई पहली घटना नहीं है । मधेशी मूल के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रियों-सभासदों पर नेपाली नौकर शाहियों का अपमानपर्ूण्ा व्यवहार जारी हैं । वैसे झन्डावाली गाडÞी तथा अकूत सम्पत्ति कमाने के लोभ में फँसे मधेश् मंत्रियों को कहाँ अपने अपमान एवं अवहेलना की चिंता है । परन्तु समानता के लिए अपने को कर्ुबान करने वाली मधेशी जनता इस प्रकार के अपमान को सहने के लिए अब बिलकूल तैयार नहीं है ।

सबको मालूम है कि करीना एक मुस्लिम महिला है और मधेशी भी । जहाँ पर देश का द्वितीय नागरिक के रूप में मधेशी जनता के साथ व्यवहार किया जाता है वहाँ मधेशी मंत्री एवं सभासदों के साथ उन लोगों का व्यवहार कैसे समानतापर्ण् रहेगा । हमने अपनी आंखो से देखा कि जब बिना विभागीय मंत्री लक्ष्मण लाल कर्ण्र jनकपुर आए तो उनके स्वागत में न धनुषा के प्रमुख जिला अधिकारी आए और न ही जिला प्रहरी प्रमुख -एस.पी.) । निष्त्रिय उप-राष्ट्रपति परमानन्द झा की बात ही छोड दें, परन्तु जब एमाले नेता बामदेव गौतम, केपी शर्मा ओली एवं पर्व प्रधानमंत्री र्सर्यबहादुर थापा जनकपुर आए तो उनको सैल्युट करने जिला के सभी प्रशासनिक पदाधिकारी दिन मे दो बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुँचे । जबकि ओली एवं गौतम आज की तारीख में देश
के सभासद भी नहीं है ।
करीना बेगम का थप्पड यदि किसी अपमान का बदला है तो इसे अस्वभाविक नहीं कहा जा सकता और यदि नयी गाडी उपलब्ध नहीं कराने का प्रतिफल है तो इस से घटिया हरकत और दूसरा नहीं हो सकता । आज के गणतान्त्रिक नेपाल में जाति, धर्म, क्षेत्र या वर्ग के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ विभेद नहीं किया जा सकता इस बात को अंतरिम संविधान ने भी स्वीकार किया है ।
करीना बेगम का थप्पडÞ नेपाली ब्यूरोक्रेसी तथा मिडिया के लिए एक बहुत बडा मसाला बना और चुनौती भी । इस घटना के विरोध मं कई दिनों तक सरकारी कार्यालय बन्द रहे । सरकारी कर्मचारियों की हत्या होने पर इन्हीं सीडीओ साहबांे का कडÞा निर्देश रहता है कि कार्यालय किसी भी हालत में बन्द नहीं होनी चाहिए लेकिन अपने ऊपर पडे मामूली थप्पड के कारण कई दिनों तक सरकारी कार्यालायों में तालाबन्दी जरूरी है -

मंत्रियों के अपमान की घटना संचार माध्यम की सर्ुर्खिया नहीं बनती लेकिन करीना द्वारा जडÞा गया थप्पडÞ नेपाली मिडिया के लिए हाँट केक बन गया । करीना के ऊपर अनेक घिनौने आरोप लगाये गये, मिडिया ने भी उसे महत्वपर्ण् स्थान दिया । कोई पत्रकार या लेखक करीना के दिल की पीडÞा उजागर करने को तैयार नहीं हुआ । इस घटना ने प्रेस के सही चेहरे को सामने ला दिया ।

स्पष्ट है कि देश के नौकरशाही पर राजनीतिकों का हस्तक्षेप जब तक रहेगा तब तक दर्ुगा प्रसाद भण्डारी जैसे प्रशासक ऐसे ही थप्पड खाते रहेगें । देश की राजनीति में करीना जैसी गुसैल और अराजक नेताओं का बोल-बाला रहेगा तब तक देश में विधि का शासन कायम नहीं हो सकता । इतना ही नहीं समानता के हक एवं अधिकार की प्राप्ति आम जनता को नहीं हो सकती है । साथ ही तब तक देश में स्थायी शांति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है ।

मधेशी नेताओं पर भारी है पहाड मूल के हवलदार भी -संजय साह

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

sanjayभौतिक एवं योजना तथा निर्माण राज्य मन्त्री संजय साह आज मधेश के एक कर्मठ एवं उत्साही युवा नेता के रूप मे उभर रहे हैं अदम्य साहस एवं निडरता के कारण अपने क्षेत्र में खास स्थान बनाये हुए हैं । उनकी यह छवि उसी समय से बनने लगी थी जब वे अपने छात्र जीवन मं अपने आस-पास लोगों पर अन्याय अत्याचार होते देखते थे ।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से संजय साह काफी प्रभावित हैं । इस के अध्ययन से उनमें सामाजिक चेतना जागृत हर्इ और उन्हें अहसास होने लगा कि शासक वर्ग की ओर से मधेशियों एवं पहाडियों के बीच काफी विभेद किया जाता है । जो अवसर एवं सुविधा पहाडियों को प्राप्त है या होता है वह मधेशियों को क्यों नहीं, इस जातीय क्षेत्रीय विभेद के विरूद्ध संर्घष् करने की भावना उनमें हिलारे- लेने लगा ।

अपने राजनीति में आने एवं वर्तमान तथा भविष्य में अपने राजनीति क्रियाकलापों को सम्बंध मे संजय साह ने हिमालिनी प्रतिनिधि से बातचीत की । उसी बातचीत का प्रमुख अंश-

प्र.सक्रिय राजनीति में आपका प्रवेश कैसे हुआ -
उ. परिवार के सदस्यों का सद्भावन पार्टर् प्रति झुकाव था, उस कारण से मै भी राजनीति में दिलचस्पी लेने लगा परिणामस्वरूप शाही काल में मधेशी मुक्ति मोर्चा में संलग्नता का आरोप लगा कर पुलिस ने सात दिनों तक मुझे हिरासत में रखकर यातना दी, इस दौरान मेरी पत्नी का प्रथम गर्भपात हो गया इस घटना ने मुझे काफी मार्माहत किया । मै ने राजनीति में सक्रिय होकर कार्य करने का निश्चय कर लिया ।
प्र.मधेशी जनाअिधकार फोरम मे झुकाव कैसे हुआ -
उ.मै किसी पार्टर्वशेष से जुडना नहीं चाहता था लेकिन मधश आन्दोलन के पश्चात फोरम नेताओं के विशेष आग्रह पर संविधान सभा का टिकट मुझे दिया गया और जनता के विश्वास एवं सहयोग के बल पर मैं चुनाव जीत भी गया ।
प्र. देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में मधेश का भविष्य कितना सुरक्षित है -
उ.देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति से मैं पर्ण्तः निराश हूँ । आज जो स्थिति बन रही है उसमंे मधेश का भविष्य कहीं भी उज्ज्वल नहीं दिख रहा है ।
प्र.मधेशवादी दल सत्ता में सहभागी हैं उनके सम्बन्ध में आपका क्या कहना है -
उ.सत्ता में सहभागी दल, विशेष कर मधेश के हित में कार्य करने वाले दलों को सत्ता में सहभागी नहीं होना चाहिए । अधिकार के लिए लडÞने वालों की इससे आवाज एवं माँग दोनों कमजोर पडÞ जाती हैं और यही स्थिति आज मधेशवादी दलों की हो गयी है ।
प्र.मधेशी दलों के भीतर असंतोष का क्या कारण है -
उ.मधेशी दलों के अध्यक्षों का रूप, कार्यप्रणाली राजाओं जैसा है । उनके खिलाफ पार्टर् भीतर तथा बाहर दोनों जगहों पर संर्घष् एवं विरोध करना युवा नेताओं को जरूरी हैं ।
प्र. खस शासकों के विभेद नीति के सम्बंध मंे आपका क्या कहना हैं ।
उ. खस शासकों की विभेद नीति विशेष कर मधेश के प्रति में अभी भी कोई अन्तर नहीं आया हैं । पहाडी मूल के हवलदार भी मधेशी नेताओं को नहीं टेरतं ।
प्र. निर्माणाधीन संविधान के माध्यम से मधेश भी समस्या का समाधान हो सकेगा -
उ. नहीं, बिल्कुल नहीं यह तो मधेशी जनता के आँखो में फिर एक बार धूल झोंकने का प्रयास हैं । मधेशी युवाआं को मधेश मुक्ति के अंतिम लर्डाई के लिए संर्घष् एवं बलिदान करने हेतु पुनः तैयार रहना होगा । यह संविधान धोखा एवं षडयंत्र का पुलिंदा मात्र है ।

दिशाहीन होती नेपाली राजनीति::पिताम्बर दाहाल

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

देश की राजनीति दिशाहीन होती जा रही है । संविधान निर्माण प्रक्रिया दिशाहीन राजनीति की वजह से अबरुद्ध हो गयी है । हमारे नेतागण शान्ति प्रक्रिया को निर्ण्यक बिन्दु पर पहुचानें का भाषण देते हैं, लेकिन उन्हीं नेताओं के जिद के कारण पूरा राष्ट्र अशांत होते जा रहा है जब देश की राजनीति गतिशील नहीं हो तो राष्ट्र कमजोर होता है । आज हमारा देश इतिहास में सब से कमजोर अवस्था से गुजर रहा है । हमारी राष्ट्रियता कमजोर हो रही है । हमारी सभ्य संस्कृति निर्रथक होती जा रही है । हमारा अपनापन खोता जा रहा हैं । हमारी अपनी पहचान लुप्त की संभावना दिखाई दे रही है ।

हमारें यहाँ संवैधानिक व्यवस्था अपनाने का अनोखा सिस्टम स्थापित हो रहा है । बाहुबल के माध्यम से अपनी चाहत को प्राप्त करने की दिशा में लोग लग गए हैं । सडक दर्घटना में अगर किसी की मौत हो जाती है तो आगजनी तोडफोड और चक्का जाम करना तो सामान्य बात हो गयी है । दर्घटना में मरे व्यक्ति को शहीद घोषणा करवाने की माँग भी होने लगी है । हमारी सभ्यताएँ, हमारी जीवनशैलियाँ और हमारी दैनिकी किस ओर जा रही है – दूसरे देशो के लोगो की नजर में हम कैसे दिखने लगे है – दुनियाँ के सामने हमारा क्रियाकलाप एक अनोखा कार्टर्बनता जा रहा है । हमारी राजनीति किस ओर जा रही है – हमारे नेता किसी अखबार में छपे कार्टर्जैसे होने लगे हैं । बोलते हैं कुछ करते हैं और कुछ । इसी वजह से राजनीति गतिहीन होती जा रही है । राजनीतिक मर्यादा और नैतिकता स्खलन होते जा रहा है । अराजकता पनप रही है, और दण्डहनिता र्सवव्यापी हो गयी है । नेताओं ने संबैधानिक व्यवस्था को और कमजोर किया हो ।

हम सब कहते है कि समझदारी से सहकार्य करें । हमारे नेतागण भी यही कहते हैं । लेकिन सहमति का सदैव अभाव रहा है । अपनी-अपनी जिद में अडेÞ रहने से कैसे समाधान हो पाएगा – संविधान निर्माण राष्ट्र का प्रमुख एजेण्डा है । संघीय लोकतांत्रिक गणतन्त्र हमारी पद्धति और संकल्प है । राजनीतिक p नेतागण राष्ट्र निर्माण के इस अभियान में समाहित क्यों नही होते हैं – ऐतिहासिक जन-आन्दोलन से हमें जो उपलब्धियाँ प्राप्त हर्इ है उसे सुनिश्चित करने के लिए भी राजनीतिक बृत्त में सहमत होना आवश्यक है । हम मानते है कि राजनीतिक दलों का अपना-अपना सिद्धान्त होता है । पृथक पृथक नीतियाँ होती हैं, लेकिन एजेण्डा तो सबका एक ही है- “संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र, प्रदेशों का निर्माण नयाँ संविधान सुनिश्चित करना” अगर हम अपनी-अपनी जिद पर अडे रहे तो क्या संविधान निमार्ण्र् पाएगा – क्या अकेले कोई एक p देश की रचना कर पाएगी – इन तमाम प्रश्नों का उत्तर है- “नहीं । इसीलिए कहीं न कहीं हमें समझौता करना ही है । नहीं तो आप सब इतिहास में सबसे बडा निकम्मा और बर्इमान साबित होगें ।

हम जानते है कि संविधान सभा में एकीकृत माओवादी सबसे बडी p । हम यह भी जानते हैं वह इतना बडा भी नहीं हैं कि अकेले वह संविधान निमार्ण्र्र सके । ये भी सच है कि माओवादी सहमत न होने से संविधान निमार्ण्र्र्य असंभव है । जनता ने संविधान सभा का प्रारूप इस प्रकार से गठन कर दिया है कि संविधान निर्माण के महान कार्य में सम्पर्णा राजनीतिक शक्तियों को समझौता करना ही होगा । इस में हठ और जिद की कोई गुन्जाइश नहीं है । माओवादी नेताओं को समझना चाहिए कि उन्हे सत्ता से बेदखल किसी ने नहीं किया है । माओवादी नेतृत्व की सरकार को स्वयं उन्ही नें गिराया था । गठबन्धन सरकार होते हुए भी अकेले अनेक निर्ण्र्लेने का जो रास्ता प्रचण्ड ने अपनाया उसी के फलस्वरूप । लेकिन अब वे नागरिक सर्वोच्चता का सवाल उठाकर आन्दोलन कर रहे हैं । आखिर नागरिक सर्वोच्चता का अर्थ क्या है – क्या माओवादी का र्सवसत्ताबाद को स्वीकार करना नागरिक सर्वोच्चता है -

हम संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र को स्वीकार कर चुके हैं । संघीय राज्य का सीमांकन राजनीतिक सहमति से होना है । प्रदेशों के नाम में भी हम सब को सहमति जताना है । लेकिन आर्श्चर्य की बात है कि माओवादी अकेले संघीय राज्य का सीमांकन सडÞक से करता रहा है । शासक माओवादियों के इस रबैये से लोकतंत्र जनता के जीवन तक नही पहुँच पाएगा । संविधान निर्माण कार्य और कठिन होगा । क्या सडक, चौक चौराहे पर भीड इक करके घोषणा करने से प्रदेशों का निर्माण होता है – माओवादी इतर पार्टियों ने भी अपने अपने अलग अलग प्रकार से प्रदेश का निमार्ण्र्रने लगे तो क्या होगा – क्या इस प्रक्रिया से संविधान बन पाएगा – माओवादियों ने जिस प्रक्रिया को अपनाया है वह अनुत्तरदायी प्रक्रिया है ।

हमें एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए । निषेध की राजनीति अब नेपाल मंे कामयाब नहीं होगी । नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, एकीकृत नेकपा माओवादी, मधेशी जनअधिकार फोरम और संविधान सभा मंे उपस्थित पार्टियों की शर्ीष्ा नेतागण सम्मिलित एक राजनीतिक संयन्त्र के भीतर राष्ट्रिय एजेण्डा पर बहस करके नयाँ निर्ण्र्ाालिया जाना चाहिए । प्रदेशों का निर्माण सडÞक से नहीं बल्कि उच्च राजनीतिक संयन्त्र के भीतर किया जाना चाहिए नेताओं से जनता की यही अपेक्षा है ।

अन्तरिम संविधान के मुताबिक २०६७ जेष्ठ महीना १४ गते तक नयाँ संविधान जारी होना ही है । अगर समय सीमा के भीतर संविधान नहीं बन पाया तो क्या होगा – क्या वर्तमान संविधान सभा बरकरार रह पाएगी – विघटन संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाएगा – वैधानिकता प्राप्ति के लिए जनमत संग्रह का रास्ता अपना पडÞेगा । देश को लम्बे समय तक संक्रमण काल से गुजरना होगा । अगर समय पर जनता को हम ने संविधान नहीं दिया तो संविधानसभा, व्यवस्थापिका संसद और सरकार एक ही बार विघटित हो जाएगी । ऐसी अवस्था में प्रधानमंत्री के कार्यकारी अधिकार स्वतः राष्ट्रपति महोदय में निहित हो जाएंगे । लोकतंत्र के स्थायित्व के सवाल पर ऐसा होना दर्ुभाग्यपर्ूण्ा है । संविधान बनाने के लिए संविधानसभा का निर्वाचन हुआ है । जिस प्रयोजन के लिए जनता ने जिन्हें अपना अभिमत दिया है उन्हें अपने कर्तव्यों को निभाना ही पडेगा । इसलिए छोटे-मोटे मतभेदों को त्याग करके समय की पावन्दी को महसूस करते हुए संविधान निर्माण मंे संलग्न होने का विकल्प नहीं है ।

संघीयता पर लगता सवालिया निशान::अरुण ठकुरी

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

बाँर्तमान अन्तर्रर्रीय दृष्टिकोण के अनुसार संघीयता एक शंकास्पद विषय माना जाने लगा है । बहुत गहरे अर्थों में संघीयता से अलगाववाद की बू आती है’- श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपाक्षे का उक्त बयान तमिल स्वायत्तता के विषय में उठाए गए सवाल का जवाब था । राष्ट्रपति राजपाक्षे ने कहा था कि उसे संघीयता के पक्षमें किसी प्रकारका जनादेश प्राप्त नहीं है ।

श्रीलंका के विपरीत नेपाल के मामले में वर्तमान संविधान सभा में राष्ट्रीय जनमोर्चा को छोडकर बाँकी तेइस राजनीतिक दल संघीयता को चुनावी प्रतिबद्धता बनाकर संविधान सभा में निर्वाचित हुए हैं । नेपाली जनता संघीयता चाहती है । यह बात संविधान सभा निर्वाचन के परिणाम से स्पष्ट है, लेकिन नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य में संघीयता का विषय इतना विवादास्पद बन गया है कि इस विषय के कारण शान्ति-प्रक्रिया के साथ-साथ संविधान निर्माण भी अनिश्चित होता जा रहा है ।

संघीयता एक विषय है जो राष्ट्रों को जोडÞने वाले मामले से जुडा हुआ है । इस बात का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है कि संघीयता के अभाव में कोई देश निर्धन एवं कमजोर है, अथवा संघीयता होने के कारण ही कोई देश समृद्ध और सुदृढ हुआ है । जहाँ तक नेपाल का मामला है, नेपाल-एकीकरण के बाद केन्द्रीय सत्ता पर जातीय, क्षेत्रीय एवं भौगोलिक भेदभाव का आरोप लगता आया है । गणतंत्र स्थापना के साथ संघीयता का मुद्दा सम्पर्ण् नेपाल में मुखरित हुआ । लेकिन, संघीयता को सही अर्थों में संस्थागत करके श्रोत के उचित परिचालन, समानता एवं समान अवसर प्रदान कर राष्ट्रीय विकास में सहभागी कराने की बजाय यह विषय राजनीतिक एवं सत्ता प्राप्ति के स्वार्थ्र् जुडने के कारण इतना प्रदूषित हो गया है कि संघीयता का विषय विखंडन के भाव से जोडकर देखा जाने लगा है ।

करीब ६०० रियासतों को मिलाकर सुदृढ भारत का निर्माण करने वाले प्रथम भारतीय गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल यदि आज जीवित होते तो तेलंगाना विवाद के कारण भारत में मच रही संघीयता की हडकम्प को देखकर निश्चय ही असन्तुष्ट होते । स्वतंत्रता के सिपाही एवं भारत निर्माण के अभियन्ता स्व. पटेल का योगदान सिर्फ११ दिन अनसन बैठ कर राजनीति करने वाले टी. चन्द्र शेखर राव के नाटक के सामने भुला दिया गया – नेपाल एकीकरण करने वाले श्री ५ पृथ्वी नारायण शाह ने क्या इसीलिए नेपाल का एकीकरण किया था कि नेपाल राजनीतिक बन्दरबाँट की वस्तु बने -
असमानता, अ-समावेशी करण, शक्ति एवं स्रोत के केन्द्रीय करण के विपक्ष में आवाज उठना जितना स्वाभाविक था उससे बहुत अधिक अस्वाभाविक तरीके से संघीयता का मामला उठाया गया । शक्ति और स्रोत पर कुण्डली जमाए रखने का दो सौ पचास साल पुराना जो चरित्र नेपाली राजनीति मंे अभी भी व्याप्त है, क्या संघीय-संरचना में प्रवेश करते ही वह चरित्र स्वतः तिरोहित हो जाएगा – स्वयं को परिवर्तन के संवाहक के रूप में प्रस्तुत करने बाले जिन राजनीतिक दलों की प्रवृत्ति पर्ण् विकेन्द्रीकरण के पक्ष में नहीं दिखाई देती है ऐसे राजनीतिक नेतृत्व से संघीय संरचना कैसे सफल होगी यह बात स्पष्ट होनी जरुरी है ।

चीन के नेता माओत्सेतुङ की राजनीति से प्रभावित होकर नेपाल में चीनी माँडल की व्यूह रचना करने वाले माओवादी आज अपने राजनीतिक हितांे के आधारपर संघीयता का मामला उठा रहे है । वास्तविक मामला नेपाल अधिराज्य के संविधान-२०४७ के अस्तित्व में आते ही शुरू होने लगा था । कतिपय अ-प्रजातान्त्रिक मान्यताएं उक्त संविधान के प्रति असन्तुष्ट थी । कालान्तर में यह असन्तुष्टि माओवादी व्रि्रोह के रूप में अभिव्यक्त हर्इ । यह अलग बात है कि माओवादी व्रि्रोह के उत्तर्रार्द्ध में माओवादियों को राज्यसत्ता के मूलधार मं लाने के प्रयास हुए, जिन में दिल्ली में तत्कालीन आठ राजनीतिक दलों को बीच बारह सूत्रीय समझौते के तहत नेपाली राजनीति ने नयाँ मोड लिया । नेपाल सरकार और माओवादी व्रि्रोहियों के बीच वृहत् शान्ति समझौता एवं संविधान सभा निर्वाचन को अत्यन्त सकारात्मक घटना के रुप में महसूस किया गया । बारह सूत्रीय समझौता एवं तत्पश्चात किए गए राजनीतिक अनुबन्धांे में लोकतान्त्रिक पद्धति को आधार माना गया था । लेकिन, जिन मुद्दांे से माओवादियों के पृथक होने की कल्पना की गयी थी वह कल्पना यथार्थ के उलट एक स्वप्निल कल्पना मात्र थी । जिस बात की पुष्टि माओवादी क्रियाकलाप के द्वारा स्पष्ट होती जा रही है ।

गणतंत्र, जन-गणतंत्र, संघीयता एवं आत्म-निर्ण्र्का अधिकार जैसे शब्दों का उच्चारण एवं उक्त चीजों का अभ्यास ‘पाण्डोरा बाँक्स’ खुलने जैसा बन गया । एक ही मिट्टी के बने नेपाल के माओवादी यहि गणतान्त्रिक व्यवस्था प्राप्ति से सन्तुष्ट होते तो गणतंत्र स्थापना के लगभग ६ दशक के अभ्यास एवं सफल कार्यान्वयन के बावजूद भारतीय लोकतंत्र के लिए माओवादी व्रि्रोह चुनौती के रूप में सामने नहीं आता । नेपाल को अर्द्ध-र्सार्वभौम एवं अर्द्ध-औपनिवेशिक राज्य मानने वाले नेपाली माओवादियों की बात और भारत में द्वन्दरत
माओवादियों द्वारा भारत के लिए भी अर्द्ध-र्सार्वभौम एवं अर्द्ध-औपनिवेशिक राज्य के रुप में अभिव्यक्त करने के तार क्यों जुडÞ रहे हैं – कम्पोसा एवं रेड-कँारीडोर के प्रतिपादक ने.क.पा. माओवादियों द्वारा राज्य सत्ता के मूलधार में आने के बावजूद उक्त मान्यता को भारतीय माओवादी उठा रहे हैं – क्या दक्षिण एशिया में जातीय संर्घष्ा एवं इन्हीं अथार्ंर विखण्डन का प्रवेश मार्ग ही नहीं कतिपय अर्थों मंे उक्त षडयन्त्र का सफलतम अभ्यास नेपाली भूमि के अन्दर तो नहीं रचा जा रहा है -

यदि श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपाक्षे की संघीयता सम्बन्धी मान्यता को सही ठहराया जाता है तो गणतंत्र, जातीय-भाषिक संघीयता-आत्मनिर्ण्र्के अधिकार जैसे मुद्दों की निरन्तरता एवं क्रमिकता दक्षिण एशिया के लिए कठिन चुनौती बनना निश्चित है । प्रश्न संघीयता के खराब या अच्छी व्यवस्था होने का नही है, बल्कि इस मान्यता के अन्दर छिपे षडयन्त्र को ठीक से पहचान करने से सम्बन्धित है । नेपाल के राजनीतिक परिदृष्य में माओवादियों की मान्यता के मुताबिक जातीय-भाषिक माँडल की संघीयता पर सहमति बनने के आसार नही दिखते । जिस बात को एकीकृत ने.क.पा. माओवादी भी अच्छी तरह जानते है । संविधान सभा में सबसे बडा दल एकीकृत ने.क.पा. माओवादी की स्थिति निर्ण्यक है । क्योंकि माओवादी र्समर्थन के बिना किसी भी प्रकार के संवैधानिक प्रावधान तय नहीं किए जा सकते । लेकिन अंकगणितीय रूप में अल्पमत मंरहे माओवादी भी संविधान सभा में अपनी मान्यता को अकेले स्थापित नहीं कर सकते हैं । नेपाली राजनीति की उक्त अवस्था को आत्मसात करके सहमति के द्वारा संवैधानिक निकास देने के उलट एकीकृत ने.क.पा. माओवादी नेपाल के अन्दर जातीय आधार पर गणराज्य की घोषणा कर रहे हैं । हालांकि माओवादी नेतृत्व द्वारा उक्त घोषणा को प्रचारात्मक घोषणा के रूप में लिए जाने की बात कही गयी है । लेकिन, प्रश्न यह है कि संविधान सभा के सबसे बडे और निर्ण्यक दल की हैसियत प्राप्त एकीकृत नेकपा माओवादियों का गणराज्य घोषणा कार्यक्रम स्वयं को समानान्तर राज्य के रूप में प्रस्तुत करने की मान्यता से नहीं जुडÞा है – माओवादियों की मान्यता एवं उनके क्रियाकलाप शान्ति-प्रक्रिया, संवैधानिक एवं राजनैतिक निकास के पक्ष में नहीं हं । जिसका परिणाम भावी दिनों में दिखाई पडने के संकेत आने लगे है । दक्षिण एशिया की छोटी सी इकाई के रूप में स्थित नेपाल में हो रहे राजनीतिक षडयन्त्र के अभ्यास दक्षिण एशिया के मानचित्र के लिए अनुभव एवं अवलम्बन बनने के आसार के प्रति समय में सचेत होना जरूरी है ।

एक बात तो तय है कि बारह सूत्रीय सहमति एवं उसके बाद नेपाल में हुए राजनीतिक परिवर्तन में कही-न-कही त्रुटि रही है । हालांकि उक्त त्रुटि के बावजूद कतिपय सकारात्मक घटनाक्रमों से इन्कार नही किया जा सकता । लेकिन सभी सकारात्मक शुभेक्षाओं के बावजूद नेपाल की राजनीति में जिस तरह के दर्भाग्यपर्ण् भविष्य के संकेत दिख रहे हैं और पर्दे के पीछे से जो षडयन्त्र की छाया दिखाई देने लगी है उस दर्भाग्य एवं षडयन्त्र को पराजित करने के लिए बारह सूत्रीय सहमति एवं तत्पश्चात के राजनीतिक विकासक्रम का ठीक से पुनरावलोकन करना जरूरी हो गया है । ‘बफर विद इन द बफर’ वाली संघीयता किसके पक्ष में है – अप्रिल-क्रान्ति के बाद मधेश में एकजूट हर्इ लोकतान्त्रिक शक्ति को विभाजित करके माओवादी प्रभाव बढाने के पीछे क्यांे साम्यवादी सहयोग मिल रहा है – दक्षिण एशिया में जारी द्वन्द्व को समाधान करने के लिए अमेरिका द्वारा चीन को निर्देश देने का क्या अर्थ है – जातीय विखंडन के सूत्र किससे जुडे हैं – आत्मनिर्ण्र्के अधिकार का नेपाल के बाद कहाँ अभ्यास होना है – अपने ही दर्शन को नेपाल में स्थापित करने वाले माओवादियों के मुद्दां के कारण जो विखण्डन के हालात उत्पन्न हो रहे है उसी के लिए नेपाल में चीनी सेना उतारने की धम्की का क्या अभ्रि्राय है – उपरोक्त सारे सवाल का सवाल यदि एक ही टोकरी में रख कर देखा जाय तो स्थिति अत्यन्त गंभीर एवं चुनौतीपर्ूण्ा नजर आती है । क्या इस षडÞयन्त्र को परास्त करने के लिए विगत की त्रुटियों की स्वीकारोक्ति एवं पुनर्-समीक्षा के द्वारा सुदृढ संयन्त्र का निर्माण करके सहज निकास की ओर बढने का माद्दा दक्षिण एशियायी समुदाय के पास है -

शिविर में रह रहे माओवादी लडाकुओं को नेपाली सेना में समायोजन करने के मामले में भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर की जो धारणा आई है वह धारणा नेपाल में अतिवादी व्यवस्था के पक्षधरों के मंुह पर तमाचा है । भारतीय सेना की सही और दूरगामी मान्यता के साथ-साथ नेपाल एवं दक्षिण एशिया में लाल साम्राज्य फैलाने की साजिश को रोकने के लिए जिस प्रकार की भारतीय र्समर्थन एवं सकारात्मक राजनीतिक सहयोग एवं पहल की आवश्यकता को महसूस किया जा रहा है, उस में विलम्ब करने का परिणाम लोकतन्त्र के प्रतिबद्धता के विपरीत है ।

तख्ता पलट की सम्भावनाःकितना सच कितना झूठ::योगेन्द्र प्रसाद साह

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

जंगली जीवन से निकल कर मनुष्य ने अपनी अविवेकपर्ण् स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता पर प्राकृतिक रूप में आचार संहिता का निर्माण करते हुए, अपनी सोच को परिष्कृत करके समाज बनाना शुरु कर दिया था । समाज बनाने का अर्थ ही अपने अन्तहीन स्वार्थो पर अंकुश लगाते हुए प्राकृतिक, वास्तविक और व्यावहारिक सुखों को निरंतर रूप में प्राप्त करते रहना किन्तु क्या यह शत् प्रतिशत सम्भव हो सका – क्षुद्र स्वाथार्ं पर्र्ति हेतु शक्तिशाली मनुष्य आज भी दर्घटनाओं को जन्म देकर मनुष्य जाति को असीम पीडा पहुचाने में न तो देरी करता है और न संकोच । इसी मनोविज्ञान की राजनीति ने नेपाली पीडित जनता को करुण क्रन्दन करने की ओर अग्रसर करने का अभियान ही चला रखा है ।

कबीलों के सरदार से लेकर राजा-महाराजा और सम्राट बनने के अप्राकृतिक अभ्यास और इस मनोरोग के विस्तार से सम्बन्धित विश्व इतिहास का पुलिन्दा हमारे सामने है । असल में राज्य विस्तार के साथ ही संघीय संरचना का स्वरूप भी इतिहास में कायम होते देखा गया है । भारत का मौर्यकालीन साम्राज्य हो या मुगलकालीन साम्राज्य अथवा ब्रिटिशकालीन साम्राज्य हो- संघीयता का इतिहास समेटे हुए है । उनकी संघीयता जन-कल्याणकारी न होकर साम्राज्य को स्थिर और बलशाली बनाने के लिए होती थी । आज की संघीयता लोकतन्त्र को मजबूत करने, जन कल्याणकारी कायार्ंर् अन्जाम तक पहुँचाने और राष्ट्र को समृद्धि की ओर ले जाने के अभ्रि्राय के साथ गठित की जाती है । सम्राटकालीन संघीयता यथास्थितिवाद और कठोर केन्द्रीयता के भार से दब कर बिखरने में देरी नहीं करती थी । मुगलकालीन संघीयता में नबाबों के व्रि्रोह के कारण हीं अंग्रेज आसानी से चढÞ बैठे । नेपाल नामक भूगोल को, राजा पृथ्वी नारायण शाह नें २४ राज्यों सहित मधेश को युद्ध द्वारा जीत कर, गढा था । इन सभी राज्यों की अपनी भाषा, संस्कृति और जातीय पहचान थी । हार के बाद जब इनकी पहचान धुँधली बन गई तब शोषित अवस्था में जीने के सिवाय कुछ भी आधार नहीं बचा । राज्य राजा की नीजी सम्पत्ति मानी जाती थी । अतः जनता पर एक भाषा, एक वेष लादने की कोशिशें शुरू से जारी रही । जनता को गुलाम बनाकर उनका शोषण करना वैध माना गया । अब हालात बदल चुके हैं । राजशाही का अन्त हो चुका है । छोटा
देश होते हुए भी नेपाल के विशिष्ट जातीय पहचान वाले लोग अपनी-अपनी भाषा संस्कृति की उन्नति के लिए आत्म-निर्ण्र्के अधिकार के साथ स्वायत् प्रदेश की संरचना चाहते हैं । यह जनता की र्सवस्वीकृत माँग है और संयुक्त राष्ट्रसंघ इसका अनुमोदन भी करता है । जन आन्दोलन-२ और मधेश आन्दोलन द्वारा संघीयता की मांग की भी पुष्टि हो चुकी है ।

नेपाल मे चार अवधारणाओं पर आधारित संघीयता की अपरिहार्यता देखी जा रही है । भाषिक, सांस्कृतिक, जातीय उद्भव, भूगोल और प्राकृतिक स्रोत के आधार पर सबल प्रदेश की संरचना से हीं राष्ट्र की मजबूती सम्भव है । आत्मनिर्ण्र्के अधिकार सहित स्वायत् प्रदेश की कल्पना तभी की जा सकती है जब उस प्रदेश के पास अपने पैरो पर खडा होने की क्षमता हो । तर्राई क्षेत्र का सम्पर्ण् भू-बनावट और प्राकृतिक स्रोत एक जैसा है । मूल रूप मं संस्कृति एक है । बोली की विविधता में हिन्दी सर्म्पर्क भाषा के रूप में र्सव स्वीकार है । प्राकृतिक साधन स्रोत में नदी, नाला और जंगल से परिपर्ण् हैं । जैसे शरीर के सारे अंग दुरुस्त रहने पर हीं शरीर स्वस्थ और बलशाली होता है वैसे हीं आर्थिक आधार पाकर ही प्रदेश समृद्धि की राह पर जा सकेगा । लूल्हा-लंगडा राज्य संरचना करके राष्ट्र को खुशहाल नहीं बनाया जा सकता है । पाँच विकास क्षेत्रों में हिमाल, पहाड और तर्राई का सम्मिश्रण पूरी तरह असफल हो चुका है । जनता की संविधान सभा नयाँ नेपाल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है । किन्तु सच्चाई यह भी है कि जातीय प्रभुत्व स्थापित करने का षड्यंत्र भी
लगातार जारी है ।
माओवादी संगठन ने १३ राज्यों का खाका संविधान सभा राज्य पुनसंरचना समिति में पेश कर दिया है । १३ राज्यो में ११ जातीय आधार पर और दो क्षेत्रीय अवधारणा पर आधारित है । मधेश को तीन प्रदेशो में बाँटा गया है । किन्तु माओवादी संगठन के भीतर इस पर विवाद कायम है । कोचिला -झापा, मोरंग, सुनसरी जिला) को मधेश प्रदेश में ही मिलाने की मांग हो रही है । माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड की उपस्थिति में १४ गते अगहन को लाजिम्पाट स्थित होटल में सम्पन्न बैठक में जातीय और क्षेत्रीय मोर्चा के इन्चाजार्ंर्र प्रमुखांे ने अपने-अपने प्रदेश की सीमा रेखांकन के बारे में अडान लेकर विवाद पैदा कर दिया है । इस बैठक में नेवा, ताम्सालिंग, लिम्बुवान, किरांत, थारुवान और सेती-महाकाली प्रदेश के प्रतिनिधि उपस्थित थे । यहाँ दिलचस्प बात यह है कि इस बैठक में मधेश प्रदेश की उपस्थिति की आवश्यकता नहीं समझी गई ।
अपनी पार्टीबगैर आपसी बातचीत के एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल नें अपनी पार्टीओर से १५ राज्यों का खाका राज्य पर्नर्संरचना समिति में पेश किया है । झलनाथ खनाल के उग्र और स्वार्थी स्वभाव से दल में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो गई है । एमालेपार्टीमधेसी बन्धुआँ मजदूर की तरह इस्तेमाल होते आये है । जो भी हो- एमाले का प्रगतिशील तबका १५ राज्यांकी अवधारणा मानने को तैयार नहीं है । मधेश प्रदेश को पाँच भागो में बांट कर एमाले pलोकतांत्रिक पार्टी पायेगा और न कम्युनिस्ट ।

नेपाली कांग्रेस केन्द्रीय समिति द्वारा गठित राज्य पर्नःसंरचना समिति के संयोजक गोपालमान श्रेष्ठ ने सात राज्यांे का प्रस्ताव अपने दल में पेश किया था । इस प्रस्ताव में मधेश को दो प्रदेशो मे बांटा गया है । इस प्रस्ताव पर कांग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला का जातीय खेमा इस कदर भडÞका की अब गोपाल मान श्रेष्ठ की बोलती बन्द हो चुकी है । पार्टी केन्द्रीय उपाध्यक्ष गोपालमान श्रेष्ठ का जब यह हश्र है तो मधेशियों की हालत उस दल में क्या होगी – चर्चानुसार गिरिजा बाबू का खेमा १६ राज्यों की कल्पना में है । कांग्रेस सभापति और पर्ूव प्रधानमंत्री ने र्सार्वजनिक रूप से बयान देकर कहा था कि देश में उचित संघीयता देने से उनका जातीय प्रभुत्व वाला अध्याय समाप्त हो जायेगा । उन्होंने खुलकर माओवादी और एमाले के शरीषा ब्राह्मण नेताओं को सचेत किया था । जातीय हेकडी के नाम पर पारिवारिक बर्चस्व लादने का खेल अब समाप्ति की तरफ पहुँच रहा है । अपने ही दल में उनकी साख गिरती जा रही है ।

एक फूल से माला नहीं बन सकती है । एक व्यक्ति को समाज नहीं कह सकते हैं । माला की सुन्दरता प्रत्येक फूल की सुन्दरता से निखरती है । व्यक्ति के सम्पर्ण् विकास से सुन्दर समाज का निर्माण होता है । विभेद रहित और समता मूलक समाज से ही सबल, सुन्दर और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण सम्भव है । इन तथ्यांे को खस ब्राह्मणवादी नेतृत्व पंक्ति नीति और उद्गारो में स्वीकार करते नहीं थकते । किन्तु नियत में खोट रखकर व्यवहार में षड्यंत्र रचने से भी वे बाज नहीं आते । जातिवादी नेताआंे को अपनी जाति का कल्याण करने में कोई रुचि नहीं है । जिस देश के नेता सत्ता को सम्पत्ति अर्जन का माध्यम समझते हैं उस देश का उजड जाना निश्चित है । अपका महादेश के देशों की बर्बादी इसी कारण से हर्ुइ है । दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और नेपाल की दयनीय स्थिति नेताओं के भ्रष्टाचारी आचरण के वजह से ही है ।
विश्व से अनेक संविधानविद् नेपाल आकर अपना-अपना सुझाव प्रस्तुत करते रहे हैं । दक्षिण अप|mीका के एक संविधान निर्माता और संविधानविद् ने नेपाल आकर कहा था- “संघीय इकाई आत्मनिर्भर रुप में हो, आकार मे विशाल भी न हो न एक दम छोटी हीं हो ।”
नेपाल स्थित कार्टर सेन्टर का निरीक्षण कर स्वदेश वापसी से पहले पर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर ने मधेशी, जनजाति और दलितों को सावधान करते हुए कहा था- “चाहे जिस दल से चुनाव जीत कर आओ अपना हक-अधिकार कभी नहीं छोडÞना ।”

अंग्रेज काल की नकली संघीयता के कारण ही पाकिस्तान को गृह-युद्ध से कभी फर्ुसत नहीं मिल पा रही है । पंजाबी मुसलमानांके लिए शोषण का आधार बना पाकिस्तान कभी भीखमंगी से उबर नही सका । नकली संघीयता की कमजोर कडÞी का फायदा उठाकर ही वहाँ तख्ता पलट की घटनाएं बार-बार होती रही है । इसका खमियाजा पाकिस्तान की जनता भोग रही है । खसवादी नेपाली मानसिकता भी यहाँ नकली संघीयता की रचना चाह रही है । जैसे पाकिस्तान में सिन्ध, स्वात, वजिरिस्तान इत्यादि । उपराष्ट्रपति परमानन्द झा के हिन्दी प्रकरण में माओवादी नेता प्रभु साह के अगुवाई में २३ मधेशी सभासदों ने एक विज्ञप्ति द्वारा उपराष्ट्रपति का साथ दिया था । गत विश्व आदिवासी दिवस पर थारुओं ने -जनजातीयों पहाडी) के साथ एकजुटता दिखाकर एमाले भक्त महेश चौधरी और राजकुमार लेखी को सावधान कर दिया था । मैथिल ब्राह्मणों ने एक मधेश- एक प्रदेश पर मुहर लगाकर एमाले भक्त रामचन्द्र झा की पैदाइश को र्व्यर्थ बना दिया है । अनेक लोभ लालच और कमजोर मानसिकता के बाबजूद मधेसी जनजाति और दलित सभासदो की एकता और सहकार्य देखकर खसवादी नेतृत्व घबरा उठी है । उग्र जातिवादी नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला का उच्च स्तरीय संयन्त्र के निर्माण का भागीरथ प्रयत्न एक प्रकार से तख्ता पलट हीं है । संविधान सभा को गिरफ्तार कर के लोक तांत्रिक कल्याणकारी गणतंत्रात्मक प्रजातंत्र को पाकिस्तानी जम्हुरियत में ले जाने का प्रयास है । इन्हीं जातिवादी श्रेष्ठता की आड में छत्रमान सिंह गुरुंग के प्रधान सेनापति बनने से ‘सैनिक कू’ की सम्भावना नहीं है । ८०० सौ परिवारां का उच्चवर्गीय संयन्त्र कभी भी एक गुरुंग की सत्ता पसन्द नहीं करेगा । उच्चस्तरीय संयन्त्र की सफलता शंकास्पद होने से सिंगापुरी ७ बुन्दे सहमति की गई है । राष्ट्रपति को इसके लिए तैयार करने की कोशिशें तेज हो गई हैं । राष्ट्रपति ने भी प्रचण्ड और नारायणकाजी श्रेष्ठ को तीन बडे दलां के नेताओं की सहमति को शिरोधार्य करने का वचन दे दिया है । मधेस में राष्ट्रपति को हटाने के खिलाफ पर्रदर्शन हो रहे हैं और राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव, गिरिजा बाबू के आदेश को पालन करने के मूड में हैं । पाकिस्तान में भी जम्हुरियत आते-जाते रहा है और नेपाल में भी ऐसा हीं होता रहा है । इसलिए सत्ता और सम्पत्ति के लोभ में कब तख्ता पलट हो जाय कोई नहीं कह सकता है । एक खुशी का बात यह है कि तख्ता पलट का विरोध तीन बडे दलों में अवश्य हो रहा है । माओवादी नेता बाबूराम भट्टर्राई ने ठीक ही कहा हैं कि नेपाल का सिक्किमीकरण न होकर अफगानिस्तानीकरण होने का खतरा है । देखना है जीत जनता की होती है या यथास्थितिवादियों की ।

वीरगंज विश्वविद्यालय अन्तरक्रिया कार्यक्रम सम्पन्न::प्रमोद जयसवाल

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

काठमांडू- राजधानी के त्रिपुरेश्वर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर हाँल में २४ दिसंबर को ‘प्रस्तावित वीरगंज विश्वविद्यालय का औचित्य और भूमिका’ विषय पर अन्तरक्रिया कार्यक्रम का आयोजन किया गया ।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए वीरगंज विश्वविद्यालय अध्ययन कार्यदल के संयोजक प्रो. डा. लोकनारायण झा ने कहा कि २०५९ साल से अभी तक हमलोग प्रस्तावित वीरगंज विश्वविद्यालय को लेकर विभिन्न चरणों में अन्तरक्रिया कार्यक्रम का आयोजन करते आ रहे है । इस दौरान कहीं से कोई दूसरा प्रस्ताव नहीं आया बल्कि अब वीरगंज से नया एवं दूसरे नाम का प्रस्ताव आ रहा है । लेकिन हम लोगों का कार्यदल जब भी अन्तरक्रिया कार्यक्रमों का प्रतिवेदन सरकार को सौंपेगा तो वह प्रस्तावित वीरगंज विश्वविद्यालय के पक्ष में ही होगा । यहाँ बता दें कि वर्ष२०५९ में ही वीरगन्ज विश्वविद्यालय का शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में भी प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था । डा. झा ने जोर देकर कहा कि यू.जी.सी. में इस अन्तरक्रिया कार्यक्रम का विचार विमर्श कर जल्द से जल्द हमलोगों का कार्यदल का प्रतिवेदन शिक्षा मंत्रालय में भेजा जाएगा ताकि आगे की कारवाई में विलम्ब न हो । क्योंकि इस कार्यदल की बढायी हर्इ समय सीमा -१४ दिन) भी समाप्त हो रही है । कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए नेपाल सरकार के बिना विभागीय मंत्री लक्ष्मणलाल कर्ण्र् कहा कि दूसरे देश के शहरों के गली-गली में जब विश्वविद्यालयों हो सकते है तो हमारे देश के प्रमुख शहर वीरगंज में विश्वविद्यालय क्यों नहीं हो सकता है । लेकिन हम चाहते ह कि वीरगंज समेत देश के प्रमुख शहरों में विश्वविद्यालय खुले ताकि अपने यहाँ उच्च शिक्षा का समग्र विकास हो सके । उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के लिए वर्तमान सरकार ने बजट में एक करोड रुपये का विनियोजन किया है । लेकिन बजट का प्रस्तावित रकम उसी विश्वविद्यालय के निर्माण में खर्च होना चाहिए । यदि वीरगंज स्थित ठाकुर राम बहुमुखी कैम्पस को भी विश्वविद्यालयका दर्जा दिया जाता है तो सरकार उस में भी सहयोग करें, हम यही चाहते हैं ।

प्रस्तावित वीरगन्ज विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो.डा. भगवानप्रसाद यादव ने कहा कि वीरगंज विश्वविद्यालय के लिए रौतहट, बारा और पर्सर् सम्पर्ण् जिलावासियों ने आर्थिक सहयोग दिया है । जनता से प्राप्त करीब २ करोडÞ २५ लाख की राशि कुमारी बैंक में जमा है। प्रस्तावित विश्वविद्यालय के लिए वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ, पर्सर् २० बिगहा तथा अन्य लोगों ने भी अपनी भूमि देने की बात कही है । अन्त में डा. यादव ने जोर देकर कहा कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय का निर्माण छात्र-हित में अतिआवश्यक है । मौके पर विभिन्न दलों के सभासद एवं नेतागण उपस्थित थे । उपस्थित गण्यमान्य लोगों में गोपाल ठाकुर, रामसहाय यादव, अजय चौरसिया, अजय द्विवेदी, रामचन्द्र प्यासी, रमेश रिजाल, अब्दुल कलाम, शशि कपूर खान, निजामुद्दीन अंसारी, गोपाल केडिया, उदय कर्ण्र्ाारामचन्द्र साह, शम्भू हाजरा, बबन सिंह, वीरगंज विश्वविद्यालय अध्ययन कार्यदल के सदस्य डा. गोपिन्द्र पौडेल, रामप्रसाद दवाडी एवं सदस्य सचिव डम्बरलाल श्रेष्ठ भी थे । कार्यक्रम की अध्यक्षता कार्यदल के संयोजक प्रो.डा. लोकनारायण झा ने की जबकि संचालन उदयराज तिवारी ने किया ।

शिक्षा::गोपाल ‘अश्क’

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

gapal copy की राजनीति तो समझ में आती है, किन्तु शिक्षा में राजनीति समझ में नहीं आती । शिक्षा और राजनीति दोनों एक सामाजिक क्रियाकलाप है । दोनों का उद्देश्य समाज को अग्र दिशा की ओर उन्मुख करना है । अपने नागरिकों को शिक्षित करना राज्य का प्रमुख धर्म है, दायित्व है । अपने इस दायित्व से राज्य विमुख नहीं हो सकता । क्योंकि उसे मालूम है कि बगैर शिक्षित नागरिक के समाज या राज्य विकसित नहीं हो सकता । राज्य को सही ढंग से संचालित करने के लिए विभिन्न राजनैतिक शक्तियों का निर्माण किया जाता है । राजनैतिक पार्टियों की शक्ल-सूरत में । शिक्षा के विकास के लिए भी राज्य द्वारा शैक्षिक नीति, नियमों आदि का निर्माण और कार्यान्वयन किया जाता है । इसी को शिक्षा की राजनीति कहते हैं । यहाँ तक तो ठीक है, परन्तु जब योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाये जाते हैं और बगुलों को हंस का प्रमाणपत्र दिया जाने लगता है, तब शिक्षा में राजनीति होने लगती है । अपने दलगत स्वार्थसिद्धि हेतु शिक्षा का प्रयोग किया जाने लगता है तब अच्छे-बुरे की पहचान नहीं रह जाती । हकीकत यह है कि शिक्षा एक सफल व्यक्तित्व का नहीं असल व्यक्तित्व का निर्माण करती है । शिक्षा के शब्दकोश में सफलता-असफलता की बात नहीं होती, ज्योति की बात होती हैं, ज्ञान की बात होती है ।

आज नेपाल में शिक्षा बहस के चौराहे पर खडी है । चारां तरफ शिक्षा पर चर्चा होती रहती हैं, बातें होती रहती हैं । कई बार सुना, नेपाल की शिक्षा राजनैतिक हस्तक्षेपों का शिकार है । एक तरह से बर्बाद हो चला है शिक्षा जगत् । विद्यार्थी-शिक्षक, शिक्षक-शिक्षक या अभिभावक-शिक्षक के बीच अन्तर्विरोध है । सम्बन्धों में मिठास नहीं है । अब तो प्रधानाध्यापक अपने शिक्षकों से डरते हैं- जाने कब क्या हो जाए – अर्थात् अनुशासन-हीनता चरमोत्कर्षपर है ।

‘शिक्षा में राजनीति’ निश्चित रुप में एक मुकम्मल विषय है शोध प्रबन्ध का । किन्तु मैने इसे पृष्ठभूमि के रूप में ही व्यक्त करने की कोशिश की है । आप चाहें तो भले ही इसे किसी बडे कैनवास पर उतार लें । यथार्थ के धरातल पर खडे होकर कुछ कह पाना एक जटिल कार्य है । हकीकत यह है कि दक्षिण एशिया में सत्ता परिवर्तन होते ही शैक्षिक नीति-नियमों में परिवर्तन हो जाता है । यही तो है शिक्षा में राजनीति । नेपाल में शिक्षा अपनी प्रारम्भिक अवस्थाओं से ही राजनैतिक सोच का शिकार होती आई है । नेपाल में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत वि.सं. १९१० में हर्ुइ । अपनी सन्तान को अंग्रेजी शिक्षा दिलाने के मकसद सें दरबार में ही स्कुल का संचालन करवाया गया था । आम नेपाली जनता कोसो दूर थी शिक्षा की ज्योति से । इसके बाद चन्द्र शमशेर ने वि.सं. १९७५ भाद्र २७ को इन्टरमिडिएट कालेज के रूप में त्रिचन्द्र कालेज की स्थापना की । उद्घाटन समारोह में दिये गये भाषण से उनकी शिक्षा के प्रति की सोच उजागर होती है- मैं अपने पैंरों पर खुद ही कुल्हाडी मार रहा हूँ । इतना ही नहीं पद्म शमशेर को शिक्षा के प्रति अधिक उदारता के कारण ही उन्हें स्वंय पदच्युत पडा । राणाकाल में शिक्षा का औपचारिक प्रारम्भ हुआ । किन्तु, आम नेपाली जनता की पहुँच नहीं थी । उसके बाद वि.सं. २००७ में नेपाल में प्रजातन्त्र की स्थापना हर्इ । वि.सं. २००७ से २०४७ के काल में शैक्षिक, नीति-नियम, कार्य-योजना में कई बार परिवर्तन हुआ । राजा महेन्द्र ने तो पंचायती शासन का गुणगान करने वाली शैक्षिक नीतियों का निर्माण किया । उनकी सोच के मुताबिक नेपाल में एक ही शासन विचार चला- एउटै राजा एउटै देश, एउटै भाषा एउटै भेष । -अर्थात् एक ही राजा एक ही देश, एक ही भाषा एक ही भेष) इस से पंचायतकालीन शिक्षा में राजनैतिक हस्तक्षेप अक्षरशः प्रमाणित हो जाता हैं ।

अब बात आती है आज की । आज की शैक्षिक नीति तो स्वयं रोगग्रस्त है । राज्य अनुत्तरदायी हो गया है । ऊपर से नीचे तक की व्यवस्था अस्तव्यस्त है । आज पूरा शिक्षाक्षेत्र राजनैतिक हस्तक्षेपों से आक्रान्त है । नीजी स्रोत, दरबन्दी और राहत कोटा के साथ-साथ अन्य कई शर्ष्क में शैक्षिक जनशक्ति की बहाली होती है । हरेक शर्ष्क का एक निर्धारित मूल्य अंकित है । शिक्षा जगत् के व्यक्तियों से यह बात छुपी हर्इ नहीं है । निर्धारित रकम भेंट कीजिये, शिक्षक बनियें यह है आज की शैक्षिक नीति । एक तरफ भ्रष्टाचारियों का तांडव ह,ै तो दूसरी तरफ राजनैतिक विसंगतियों का नंगा नाच । आये दिन किसी न किसी बहाने विद्यालय बन्द होते रहते हैं । बच्चे पढ नहीं पातेर्,र् इमानदार शिक्षक पढा नहीं पाते । बर्ेइमानों की तो बात ही क्या करें – एक आँकडां के अनुसार तर्राई के कतिपय विद्यालयों में ८० दिन भी पढर्ई नहीं होती । शिक्षाविद् केदारभक्त माथेमा के अनुसार- “वर्षमें कम से कम १८० दिन विद्यालय खुलने चाहिये, किन्तु हमारे यहाँ कई ऐसे विद्यालय हैं जो ८० दिन भी नहीं खुलते ।” -शिक्षक सं. वसन्त थापा, फागुन २०६४) आखिर ऐसा क्यों होता है – इस प्रश्न का जबाव रोगंटे खडा कर देता है । सही बात तो यह है कि हमारे शिक्षकों की मानसिकता ही बिगड गई है । वे विद्यालय में शिक्षक से अधिक किसी राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत होते हैं । अपनी राजनैतिक आस्था के कारण वे लोकप्रिय-अलोकप्रिय होते हैं, और बात यहाँ तक आ जाती है कि विद्यालयों में पर्ढाई कम छुट्टयिाँ अधिक होती नजर आती है । लगता है संसार में एकदम कम पढर्Þाई होने वाला देश नेपाल ही हैं । भोजपुरी लोकोक्ति ‘परुवा बैल के हेव के आसरा’ चरितार्थ है शैक्षिक जगत में । शिक्षक तैयार रहते हैं कि कोई बहाना मिल जाय, विद्यालय बन्द कर देने का ।

नेपाल की शिक्षा विसंगतियों की मारी है । सरोकार वाला भले ही लाभान्वित न हो, लेकिन बाहरी तत्व लाभान्वित होता है । नेपाल की शिक्षा में अनावश्यक ढंग से बाहरी लोगों का हस्तक्षेप है । पढे-लिखे लोगों पर मूर्खों का शासन चलता है । आज कक्षा ९ से १२ तक को माध्यमिक मानने की बात चली है । ± २ तक की शिक्षा देने का मतलब स्नातकोत्तर तक की उपाधि हासिल की हर्इ जनशक्ति की आवश्यकता । विद्यालय को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिये विद्यालय व्यवस्थापन समिति का गठन किया जाता है । जिसमे अभिभावक, सम्वधित विद्यालय का प्रधानाध्यापक तथा जिला शिक्षा कार्यालय का प्रतिनिधि स्रोत व्यक्ति की महत्वपर्ूण्ा भूमिका होती है ।

जब विद्यालय व्यवस्थापन समिति के पदाधिकारियों का चुनाव होता है तो किसी संसदीय चुनाव से कम नही होता । वही वोट की राजनीति, वही साम-दाम, दण्ड-भेद की नीति । समझ में नहीं आता विद्यालय में शिक्षा की हालत सुधारने के लिये किया जाने वाले समिति के चुनाव में ऐसा क्या है जिसको पाने के लिये लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं – शायद सहयोग में मिलने वाली अन्तर्रर्रीय राशि की बन्दरबाट के लिये या फिर अपनी राजनैतिक मान्यताओं को अन्जाम देने के लिये । नेपाल में जनवादी शिक्षा के लिये ने.क.पा. माओवादी -एकीकृत) ने जनवादी स्कूल का संचालन करके विद्यार्थियों को राजनीतिक शिक्षा देना प्रारम्भ किया । सैन्य शिक्षा का प्रस्ताव रखा । नागरिकों के हाथ में बन्दूक देकर नागरिक सर्वोच्तता की दुहाई दी । वाह रे नेपाली राजनीतिक और वाह रे शिक्षा, हम जानते है कि शिक्षा का एक अपना दर्शन होता है । न वह सामन्तवादी होती है न वह व्यक्तिवादी होती है औ न वह जनवादी होती है । हमें समय रहते शिक्षा को राजनैतिक प्रभावों से मुक्त कराना होगा । वरना वह दिन दूर नहीं जब नेपाली शिक्षा त्रासदी का शिकार होगी । अंधयुग का उदय होगा और हम अपनी पीढियों के आरोपों से व्यथित होंगे । पर्ूव शिक्षामंत्री रेणु यादव की इस अभिव्यक्ति पर ध्यान दें कि शिक्षक नेताओं ने युनियन को पेशागत हक-हित के बदले राजनीति करने के माध्यम के रूप में प्रयोग किया है । -कान्तिपुर बुधबार २९ माघ २०६५) अतः शिक्षालयों को ‘ज्ञान का मंदिर’ ही बनाये रखें, राजनीति का क्रीडास्थल नहीं ।

उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्रः ढाक के तीन पात::प्रो.डा. नवीन मिश्रा

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नेपाली राजनीतिज्ञ भले ही संविधान निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण में विफल हो रहे हों, लेकिन एक काम उन्होंने बखूबी किया है और वह है नए-नए राजनीतिक शब्दावलियों का आविष्कार । परंपरावादी राजनीति शास्त्री अरस्तू, प्लेटो से लेकर आधुनिक राजनीति शास्त्री आण्ड तथा पोल ने भी इतने नए राजनीतिक शब्दावलियों का आवष्किार नहीं किया जितना नेपाली राजनीतिज्ञों ने । इसी सर्ंदर्भ में नेपाली राजनीति राष्ट्रीय सहमति से अपना सफर प्रारंभ कर सहभागी प्रजातंत्र, बेबी किंग, नागरिक सर्वोच्चता होते हुए उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्र तक पहुँच गई लेकिन विगत की तरह यह इस बार भी ढाक के तीन पात ही साबित हु । जो कुछ हुआ वह किसी फार्मूला हिन्दी सिनेमा की कहानी से कम नहीं था । हुआ यों कि पहले वयोवृद्ध नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला अपने इलाज के सर्ंदर्भ में और फिर माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल अघोषित उद्देश्य से सिंगापुर जाते हैं । घटना के नायक यही दोनों हैं । गिरिजा बाबु की सुपुत्री तथा विदेश मंत्री सुजाता कोइराला तथा पुष्प कमल दहाल के सहयोगी महरा इस घटना के सह नायक हैं । इस घटना क्रम में अतिथि कलाकार के रुप में पारस और एस.डी मुनि का भी आगमन होता है । समाचार आया कि देश के प्रमुख दो दलों के शर्ष् नेताओं के बीच राजनीतिक गतिरोध समाप्त करने के लिए मध्यम मार्ग अपनाने की सहमति बन गई है । नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला तथा एकीकृत नेकपा माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड के बीच सिंगापुर के ग्लेनिगल्स अस्पताल तथा मेडिकल सेंटर में यह सहमति हर्इ, यह समाचार प्रकाशित हुआ था । भेंटवार्ता में सहभागी उपप्रधानमन्त्री सुजाता कोइराला के अनुसार तीन महिनो से अवरुद्ध व्यवस्थापिका संसद को सुचारु रुप से संचालित करने के लिए ही दोनों नेताओं के बीच सहमति बनी है । प्रचण्ड सिंगापुर से लौटने के बाद बहुत ही विश्वस्त और प्रफुल्लित नजर आ रहे थे और उनका मानना था कि मंसिर छ गते तक मध्यम मार्ग अपनाने के परिणामस्वरुप सभी गतिरोध समाप्त हो जाएंगे । यह भी कहा गया कि संविधान निर्माण तथा शान्ति प्रक्रिया को र्सार्थक निष्कर्षतह पहुंचाने के लिए ही यह सहमति बनी है । दोनों ही नेताओं द्वारा सहमति तथा सहकार्य पर जो दिया गया है । इसी सर्ंदर्भ में यह भी कहा गया कि दोनों ही नेताओं के बीच शान्ति प्रक्रिया तथा संविधान लेखन प्रक्रिया को आगे बढाने के लिए गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व में उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्र बनाने का निर्ण्र्लिया गया है । एकीकृत नेकपा माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड सत्ता समीकरण के लिए नव-गठबन्धन निर्माण की आशा लेकर सिंगापुर से लौटे थे । त्रिभुवन अन्तराष्ट्रीय विमानस्थल पर प्रचण्ड ने कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला के स्वदेश आने के बाद मध्यमार्ग निकाल कर राजनीतिक गतिरोध दूर करने की बात कही थी । ‘इस बीच में जो अप्राकृतिक खेल खेला गया उसका जल्द ही अंत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है’ । यह प्रचण्ड का कहना था । उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान गठबन्धन को तोडÞकर नव गठबन्धन का निर्माण किया जायगा । यह कब और कैसे होगा, यह गिरिजा प्रसाद के आने के बाद तय होगा । प्रचण्ड का मानना था कि माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में गठित गठबन्धन अप्राकृतिक, अस्वभाविक तथा कृत्रिम है । प्रचण्ड की अभिव्यक्ति से यह साफ झलक रहा था कि गिरिजा प्रसाद कोइराला के आने के बाद वर्तमान सरकार बर्खास्त हो जाएगी और एक नव-नेतृत्व में नयी सरकार का गठन होगा, जिसका स्वरुप राष्ट्रीय होगा और इस सरकार में माओवादी दल भी शामिल होंगे । इतने दिनों से त्रस्त नेपाली जनता के मन में भी एक आशा जागृत हर्इ कि शायद अब निराशा के दिन समाप्त हो जाएंगे और देश का शासन सुचारु रुप से संचालित होने लगेगा । मिडिया में इस बात भी अटकलें लगाई जाने लगी कि किसके नेतृत्व में सरकार का गठन होगा । कुछ लोगों का मानना था कि नई सरकार पुनः माओवादी नेतृत्व में गठित होगी, जबकि प्रधानमन्त्री पद के लिए कुछ लोग सुजाता कोइराला की ओर इशारा कर रहे थे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । गिरिजा प्रसाद कोइराला के स्वदेश आते ही पासा पलट गया । उन्होंने आते हीं यह घोषणा कर दी कि वर्तमान सरकार को परिवर्तित करने का कोई प्रश्न ही नहीं पैदा होता है, बल्कि उसे और भी मजबूती प्रदान की जाएगी । विगत में अपनी तीव्रता, मौलिकता तथा उपलब्धियों के दृष्टिकोण से चिन्ता तथा आकर्षा का केन्द्र नेपाल की शान्ति-प्रक्रिया ओझल में पड गई है । संविधान, शान्ति-प्रक्रिया तथा सामाजिक-आर्थिक रुपान्तरण आदि विषय पीछे छूट गया है तथा इस समय सरकार निर्माण मुख्य विषय बना हुआ है । अपने ही द्वारा निर्मित संविधान भी अनदेखी कर तथा सरकार परिवर्तन के वैद्य रास्ते को ठुकरा कर सडÞक आन्दोलन के द्वारा सरकार गिराने की मुहिम तेज है । परिणामस्वरुप एक बार फिर शुरू है बंद और हडताल का दौर । जनता त्रस्त और लाचार होकर मूक दर्शक बनी हर्इ है । संसद अवरोध के परिणामस्वरुप बजट पारित होने में विलंब के कारण देश को कितनी त्रासदी भोगनी पडÞी यह सबके सामने है । कारागार में बंदियो को खाना नहीं मिल रहा था, अस्पताल में रोगियों को खाद्यान्न नहीं मिल रहा था । लेकिन इन सब बातों की चिन्ता किसी को नहीं थी । चिन्ता थी तो बस इतनी, कैसे सत्ता को प्राप्त किया जाए । सत्ता प्राप्ति के लिए कोई भारत जा रहा है तो कोई सिंगापुर । संविधान निर्माण के लिए अब मात्र ९ महीने ही बाकी हैं । संघीयता, राज्य के शासकीय स्वरुप तथा प्राकृतिक स्रोत के बंटवारे सम्बन्धी जटिल विषयों के निर्धारण के तरफ किसी का ध्यान नहीं है । शान्ति प्रक्रिया भी शिथिलता के साथ ही अनिश्चित भविष्य के मन से शिविर के अन्दर बंद लडाकुओं में अकुलाहट होना स्वाभाविक है । नेपाली सेना मे बढÞ रही हीनता बोध, गायब तथा विस्थापित परिवारों की समस्या, द्वन्द्व-पीडितों की व्यथा आदि समस्याओं का समाधान खोजा जाना बाकी है । राज नेताओं के ऊपर से इनका विश्वास उठता जा रहा है । इतना ही नहीं देश में फैल रहा जातीय, क्षेत्रीय तथा साम्प्रदायिकता का जहर हमें किस मोड पर लाकर खडा करेगा, यह सोच कर भी डर लगता है । संक्रमणकाल की अवस्था ज्यादा ही संवेदनशील, जटिल तथा उत्तरदायित्वपर्ण् होती है । इस बात को समझना आवश्यक है । वरना जब तक हम संभलेंगे, बहुत देर हो चुकी होगी । जल्द से जल्द इन समस्याओं का समाधान अति आवश्यक है । यह सत्ताधारी दलो तथा विरोधी दलो, दोनों ही की जिम्मेदारी है । समझौता के परिणामस्वरुप आन्दोलन की उपलब्धिअयों को संस्थागत करने के लिए आन्दोलनकारी शक्तियों के साथ लंबी अवधि तक सहकार्य, विश्वास तथा समझदारी अनिवार्य है । उपलब्धियों को संस्थागत नहीं होने की स्थिति में संभव है कि देश १२ वर्षपीछे जैसे द्वन्द्व में एक बार फिर उलझ कर रह जाए । इसी लिए हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए । दूसरे नव शब्दजालों में जनता को बहुत दिनों तक भरमाया नहीं जा सकता है । इसका ज्वलन्त उदाहरण है भारत का पिछला लोकसभा चुनाव, जहाँ जनता ने न तो जाति और न धर्म के नाम पर अपने मतों का प्रयोग किया, बल्कि विकास के नाम पर वोट दिया । यहाँ के नेताओं को भी यह समझना चाहिए कि वह दिन दूर नहीं जब जनता इन्हें दर-किनार कर देगी । इसी प्रकार दक्षिण अप्रिका के समकालीन इतिहास में सफल द्वन्द्व व्यवस्थापन का उत्कृष्ट उदाहरण है । मृत्यु के दृष्टिकोण में, समाज के विभाजन की दृष्टि में, उत्पीडन की पीडा भी सघनता की दृष्टि में तथा तत्कालीन अन्तरष्ट्रीय परिवेश की दृष्टि में उनकी समस्याएँ बहुत ही जटिल थी, लेकिन उन्होंने इसे व्यवस्थित किया । तुलनात्मक दृष्टिकोण से हमारी समस्याएँ उतनी जटिल नहीं है, फिर हम क्यों नहीं इसे व्यवस्थित कर सकते हैं । सत्ता से पदच्युत होने के बाद आज जो माओवादी दल राष्ट्रीय सरकार की वकालत कर रहे हं, अगर चुनाव के बाद उन्ही के नेतृत्व में अगर राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया होता, तो शायद देश की स्थिति ऐसी नहीं होती । लगता है कि देश का चिंतन गंभीरता से दूर होता जा रहा है । नेतृत्व चाहे किसी भी दल का हो उसके अंदर कोई ज्वाला नजर नहीं आती । ऐसा लगता है कि इस देश में कहीं कुछ हो नहीं रहा है । जो हो रहा है वह र्सार्थक कम, निर्रथक अधिक है । जीवन जीने और देश को सही राह दिखलाने की आकांक्षा में हम कहीं घिसटते चले जा रहे है । आज की राजनीति सियासत की राजनीति है । कुर्सी राजनीति है । सिद्धान्तों से अधिक व्यवहारों की राजनीति है । वर्तमान राजनीति में कुर्सी जितने दावेदार आज दिखाई दे रहे हैं उतने शायद पहले कभी नहीं दिखे । हर दल और हर व्यक्ति का उद्देश्य एक ही है- सत्ता की प्राप्ति । k भी चाहिए जो यह कह रहे हैं कि मैं कुर्सी पीछे नहीं हूँ और कुर्सी भी चाहिए जो सत्ता का सुख एक बार भोग चुके हैं । राजनीति कुर्सी सिमटती जा रही है । उस कुर्सीलिए निश्चय हीं कुछ जोड-तोड करना पडता है, दाव-पेंच दिखलाना होता है, दिल्ली से सिंगापुर की यात्रा करनी होती है तथा जनता को भ्रमजाल में फंसाना भी पडता है ।

व्यंग्य::मुकुन्द आचार्य

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

mukunda acharyaदुनियाँ अनोखी है । यहाँ रहने वाले अनोखें-अनोखें शौक भी पाला करते हैं । कितने सज्जन मूँछ को मर्दानगी का प्रतीक मानते हैं और फलस्वरुप उजले केश पर श्यामवर्ण्र् मेंहदी का रंग चढा लेते हैं । मगर मूँछ को श्वेत धवल छोड देते हैं अपनी बुजर्र्गी प्रदर्शित करने के लिए ।

कोई-कोई तो पाँच दस मीटर लम्बी मूँछ के मालिक बनकर गिनिज बुक में अपनी वीरता को दर्ज कराते हैं । कोई हनुमान जी के वंशज उसी मूँछ से गाडी तक खींचलेते हैं । अजीब-अजीब तमाशा और करतब मूँछ से करने वाले लोग धन्य हैं । उन्हें नमन करने को जी चाहता है । आजकल पचहत्तर प्रतिशत विज्ञापन में महिला के बाल और गाल कैसे सुन्दर बनाये जा सकते हैं- यही सब दर्शकों को परोसा जाता हैं । तो इस होडबाजी में मर्द क्यों पीछे रहे – उसे भी पूरा-पूरा हक है, अपनी मूँछं को बढावें, घटावें, अनेक आकर्ष रंगों में सजाएँ जो चाहे, करें । मियाँ जी दाढी-रखें चाहे उतार फेकें ।

ऐसे ही मुच्छड लोगों की एक मंडली जिसे हमलोग शिष्ट मंडल भी कह सकते हैं, नेपाल के जम्बो मंत्रीमंडल की तरह एक जम्बो जेट में सवार होकर विधाता ब्रड्ड जी से मिलने पहुँचीं । ब्रड्डजी का
मूड खराब था । उनकी सृष्टि को कोई अच्छा नहीं कह रहा था । सब कहते- ब्रड्ड जी अब सठिया गए है । इनसे अब अच्छी सृष्टि नहीं हो सकती । ब्रड्ड जी को अब स्वैच्छिक अवकाश लेकर घर बैठ जाना चाहिए और नई पीढी को सृजनात्मक दायित्व देना चाहिए । बूढे साँढ की तरह बेकार बीच चौक में खडे हैं, और ट्राफिक जाम !

खैर मुच्छडÞ मंडली वहाँ पहुँची । लम्बी दाढी वाले ब्रड्ड जी बडी-बडी मूछों को देखकर घबरा गए । डरते-डरते बोले-कहिए कैसे आना हुआ – आज का मानव तो पिता को नहीं मानता, फिर इस बूढे परपितामह से कौन सा काम आ पडा – मृत्युलोक में आप लोग जैसे निसंकोच भ्रष्टाचार करते हैं उसी तरह यहाँ पर बेझिझक होकर अपना दुखडा रो सकते हैं । हम अभी ‘कमर्सियल ब्रेक’ में हैं, आपकी बात सुन सकते हैं ।

बाबा ब्रड्ड जी की बात सुनकर मुच्छड मंडली के जोश में जो उफान था उसमें कुछ ठंडी छिटे पडÞ गई । फिर भी शिष्टमण्डल के नेता ने बनावटी विनम्रता के साथ कहा- हे आदि रचनाकार ! हम सभी के लकड-दादा ! आप देख ही रहे हैं, हम सभी मूँछवाले हैं । लेकिन अब हमे पूँछ वाले बनना चाहते हैं । ब्रड्डजी मूच्छड मंडली पर बमक पडे- छि छि छि ! मर्द होकर ऐसी बातें ! धिक्कार है इस कलियुगी मर्द को ! एक मुच्छड सजल नयन होकर फूट पडा- बाबा ! घर में बीबी तक मर्द नहीं मानती ! लानत है इस मूँछ पर !

गिनिज बुक में स्थान पानेवाला दूसरा मुच्छड बोला- ‘प्रभो ! मूँछवालों को गन्दा कहते हैं आजकल के क्लीन शेव्ड लोग ।

दूसरे सज्जन ने सुनाया मूँछ के बदले पूँछ मिलती तो हम सभी आज सफल होतें । बाँस के सामने कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते तो जल्दी जल्दी प्रमोशन मिलता । बीबी भी तो पूँछ हिलानेवाले कुत्ते को अपने घरवाले ज्यादा से प्यार करती है । मेरे हिस्से का दूध भी कुत्ते को पिला देती हैं ! मक्कार औरत !

दूसरे दुखी मुच्छड ने मुँह बनते हुए कहा, हमारा टाँमी दिनभर में पचासों बार बीबी को चाट लेता है, मगर मुझे बीबी साहिबा पास में फटकने नहीं देतीं । आखिर मेरे सब्र की भी तो कोई सीमा है ! मुझे कहती हैं आपकी मूँछे पुराने टूथब्रश की तरह नरम अंगों को कुरेदती हैं ! लानत है ऐसी मर्दानगी पर ! ऐसी मूँछ से तो पूँछ लाख गुना बेहतर ! किसी से कोई काम पटाना हो तो मूँछ दिखाने से नहीं पूँछ हिलाने से काम बन जाता है । पहले हर आफिस में मूँछ वाले तेरा जबाव नहीं !! कहा जाता था अब तो यही बात पूँछ वाले को कहा करते हैं । ‘पूछ वाला तेरा जबाव नही ।’ भगवान राम-कृष्ण भी तो मूँछ नहीं रखते थे ।

पीछे वाला मुच्छड भी टपक पडा, मूँछ के बदले पूँछ होती तो मजा ही मजा होता । किसी भी बडे आदमी से हाथ मिलाइए और साथ ही साथ पूँछ हिलाइए । मजाल है वह साला बडा आदमी आपका काम न करे – औरतों को पटाने में भी कितनी आसानी होती । लाखों का हार देने कें बदले बीबी के सामने दो मिनट पूँछ हीं हिला देते ! इस महँगाई में पूँछ हिलाकर किसी को पटाना बहुत ही सस्ता और नायाब तरीका माना जायगा ! पितामह श्री !

मंडली के नेता ने जोडा, अभी नेपाल में जो राजनैतिक तरलता है उसे जमाकर ठोस बनाने में पूँछ से बहुत मदद मिलती । लोग विपक्षी से हाथ तो मिलाते हैं, मगर पूँछ नहीं हिला पाते । होती तो हिलाते ! इघर पूँछ हिली उधर ‘पाँलिटीकल डेडलक’ खुली ! हे लकडÞ दादा श्री । अब मानव को मूँछ से मुक्ति दीजिए और एक लम्बी सी पूँछ प्रदान कीजिए ! ब्रड्डजी बेमन से हीं सही ‘तथास्तु’ कहकर अर्न्तध्यान हो गए ।

कोपेनहेगेन::कुमार सच्चिदानन्द

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

kumarतपती धरती बदला मौसम और चिन्तित सारा विश्व । वातावरण के बदलते इस स्वरुप में अगर अपने सम्राट द्वारा अभिशापित यक्ष अपनी नवविवाहिता से दूर गंध मादन पर्वत पर निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा होता तो उसे अपनी प्रियतमा तक संदेश प्रेषित करने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस के काले-काले मेघ न मिलते । हाँ, उसके हाथ में सौर ऊर्जा से चालित सेलफोन या मोबाइल की परिकल्पना तो हम कर ही सकते हैं । लेकिन काले कजरारे मेघ से मोबाइल तक की इस महायात्रा में हमने भू-संशाधनों का इतना अधिक दोहन किया है कि धरती तो गर्म होने ही लगी है सदियों से हिमाच्छादित शैल-शिखर भी नग्न होने लगे हैं, बर्फा महासागर पिघलने लगा है और सागर का जलस्तर बढÞने लगा है जिससे विभिन्न देशों को तटवर्ती शहरों पर तो खतरा मँडरा ही रहा है, अनेक ऐसे देश जिसके भौगोलिक व्यक्तित्व का निर्धारण सागर की लहरे करती है, के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडराने लगे हैं । यही कारण है कि मालदीव जैसे देश ने अपने अस्तित्व के खतरे की ओर दुनिया को आकषिर्त करने के लिए सागर तल के भीतर कैबिनेट की बैठक की और नेपाल जैसे पर्वतीय देश नें हिमालय की पर्वत श्रृंखला पर । इसी समस्या का समाधान तलाशने और हमारी सुन्दर धरती को तपन और विनाश से बचाने के लिए डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन मे ७ से १८ दिसम्बर तक १९२ देशों का महाकुंभ आयोजित किया गया ।

बाढ और सूखे की समस्या मात्र हमारी नियति बन गई है । एक ही देश के हिस्से में बाढÞ तांडव नृत्य करती है और दूसरे हिस्से में सुखाड की विभीषिका होती है । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संबाहन -इसरो) नें ३ दिसम्बर २००९ को चेतावनी के लहजे में कहा कि गंगोत्री का ग्लेशियर ३० वर्षों में १.५ किलोमीटर घट गया है । हिन्दू मान्यताओं में बेहद पवित्र माने जानेवाले इस ग्लेशियर की रक्षा की जिम्मेवारी निश्चित तौर पर भारत सरकार की है लेकिन प्रकारान्तर से उसे वैश्विक स्तर पर पर्यावरण में सन्तुलन स्थापित कर के ही इस लक्ष्य को पाया जा सकता है । गत २ वर्षों में चीन में भी सूखे और बाढ की समस्या बडे पैमाने पर देखने को मिली है । इसलिए ग्लोवल वार्मिङ्ग चीन में भी बडा मुद्दा है । धरती और उसके जलवायु के चिन्ता आज सारें विश्व में देखी जा रही है । इससे पर्व सन् १९९२ में ब्राजील में हुए रियो पृथ्वी सम्मेलन
में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे युनाइटेड नेशन्स पम वर्क कन्वेन्शन अँन क्लाइमेट चेंज कहते हैं । कोपेनहेगेन में इसमें शामिल पक्षों का १५ वाँ सम्मेलन सम्पन्न हुआ है । इस बीच १९९७ में जापान में क्योटो और २००७ में इण्डोनेशिया कें बाली में हुए जलवायु सम्मेलन में अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ग्लोवल वार्मिङ को नियन्त्रित करने के प्रभावी उपायों को लागू करने पर जोड दिया गया । यह सम्मेलन उसी अभियान को आगे बढाने का विश्व स्तरीय प्रयास है । डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में ७ से १३ दिसम्बर तक चली क्लाइमेट चेन्ज कान्प|mेन्स में जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए एक अर्न्तराष्ट्रीय राजनीतिक समझौता होना    था । उस बैठक का एजेण्डा यह था कि विकसित और औद्योगिक राष्ट्र सन् २०२० तक ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्र्सजन में भारी कटौती लाने की घोषणा करें तथा विकासशील और गरीब देशों को इन खतरों से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद देने का ऐलान करें । इस बैठक में कई मुख्य लक्ष्य थे जिस में प्रमुख है कि सन् २०१२ के बाद से एक ग्लोवल क्लाइमेट एग्रिमेन्ट बनाना क्योंकि तबतक क्योटो प्रोटोकाँल खत्म हो जाएगा । इस सम्मेलन में क्लामेट पेमवर्क पर शामिल होने वाले १९२ देशों द्वारा मुहर लगाना था । इस राजनैतिक समझौते को २०१० में एक अर्न्तराष्ट्रीय संधि का रूप दिया जाना था जिसमें इसके प्रावधानों को मानना सभी राष्ट्रों के लिए कानूनी बाध्यता   होगी । इस समझौते से पृथ्वी को ग्रीन हाउस गैसों के खतरे से बचाने की जो मुहिम १९९७ के क्योटो प्रोटोकाँल से शुरु हर्इ थी उसे ठोस कार्यात्मक कदमों के साथ आगे बढाये जाने की संभावना  थी ।
लेकिन इस सम्मेलन के प्रारम्भ से ही विभिन्न खेमों में आबद्ध देशों के स्वार्थ इस रुप में टकराने लगे कि इस महासम्मेलन के परिणामों पर प्रारम्भ में हीं प्रश्न चिन्ह लगने लगा था । इस सम्मेलन में, शामिल देश तीन खेमों में बँटे हुए थे । एक ओर विभिन्न द्वीपीय देश थे जो समुंद्र तल से महज दो मीटर तक की उँचाई पर अपने अस्तित्व और जीवन का परचम लहरा रहे थे और समुंद्र के बढÞते जलस्तर से वे अपने अस्तित्व पर संकट के बादल मडÞराते हुए देख रहे थे । स्वभावतः वे इस सम्मेलन में पर्यावरण के सम्बन्ध में किसी कठोर संधि की आशा कर रहे थे जो विश्व के सभी देशों के लिए कल्याणकारी हो । दूसरी ओर वे विकसित देश थे जिन्होंने एक ओर अपने विकास यात्रा में तो पर्याप्त मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उर्त्र्सजन किया था और वर्तमान समय में भी अपने नागरिकों के ऐशो आराम की जीवन शैली के कारण कार्बन उर्त्र्सजन में महत्वपर्ण् भूमिका निभा रहे थे । ये देश विकासशील देशों को इस मुद्दो पर घेर कर पर्यावरण को अपने द्वारा पहुँचायी जा रही हानि की भरपाई करना चाहते थे । इन दोनों खेमों के देश आपस में संगठन की मुद्रा में थे । तीसरी ओर वे विकासशील देश थे जो कार्बन उर्त्र्सजन के मुद्दे पर किसी बाध्यकारी संधि के विरोध में थे और इसका अधिकतम दायित्व लेने के लिए विकसित देशों पर दबाव बनाने की मनःस्थिति मे थे और उस मुद्दे में भविष्य में होनेवाले खर्च के मद्देनजर इन देशों से दर्घकालीन स्तर पर आर्थिक सहायता की अपेक्षा कर रहे थे ।

युरोपीय संघ द्वारा विकासशील देशों पर उर्त्र्सजन में कटौती की अधिक जिम्मेदारी डालने वाला और क्योटो संधि से अधिक व्यापक प्रस्ताव पेश किया गया । लेकिन तीव्र विकास वाले विकासशील देश विशेषतः चीन, भारत, ब्राजील तथा सउदी अरब जैसे तेल उत्पादक देशों ने इस आधार पर इस का विरोध किया कि क्योटो प्रोटोकाँल से कोई भटकाव नहीं होना चाहिए जो अमेरिका को छोडÞकर अन्य औद्योगिक देशों पर कानूनी बाध्यकारी प्रतिबन्ध थोपती है । उन देशों को संदेह था की नये प्रोटोकाँल की यूरोपीय संघ का र्समर्थन क्योटो प्रोटोकाँल को कमजोर करने की साजिश भी हो सकती है । लेकिन छोटे द्वीपीय देशों के गठबन्धन का कहना था कि कोपेनहेगेन सम्मेलन में एक दस्तावेज तैयार किये जाने कि जरुरत है जो क्योटो प्रोटोकाँल से अधिक मजबूत  हो । स्वीडेन जैसे देशों का यह कथन था कि यदि हम ऐसे सम्ाझौतंे पर पहुँचते हैं जिसमें केवल क्योटो प्रोटोकाँल ही कानून बाध्यकारी होगा तो वे अपने उस मकसद को हासिल नहीं कर पायेंगे जिसकी उन्हें जरुरत   है । गौरतलब है कि सम्मेलन का महत्वपर्ूण्ा मकसद क्योटो प्रोटोकाँल को सन् २०१३ से शुरु हो रहे दूसरे प्रतिबद्धता चरण में ले जाना  था ।

इस सम्मेलन की समाप्ति एक दिन पर्व तक विश्वभर से आए वार्त्तरार विभिन्न समूहों में बँटकर समझौते का र्सवमान्य हल तलाशनें का प्रयास करते रहे लेकिन परिणाम शिफर   रहा । मुद्दा था विकसित देशों को कार्बन उर्त्र्सजन में कितने प्रतिशत की कटौती का लक्ष्य दिया  जाय । विकसित देश सन् २०२० इस्वी तक अपने कार्बन उर्त्र्सजन की दर में २० प्रतिशत तक कटौती करने के प्रति सहमत थे लेकिन विकासशील देश उस से सन्तुष्ट नहीं थे और उनकी अपेक्षा ४० प्रतिशत कटौती की थी । विकसित देशों का यह भी दृष्टिकोण था कि भारत और चीन जैसे तीव्र विकास दर वाले देशों को भी इस कटौती की सीमा में लाया जाना चाहिए । क्योंकि चीन वर्तमान समय में र्सवाधिक कार्बन उर्त्र्सजन करने वाला देश है । लेकिन ये दोनों देश उस सीमा में आना नही चहते थे क्योंकि इन्हे लम्बी विकास यात्रा तय करनी थी । इसके अतिरिक्त विकासशील देशों की यह भी अपेक्षा थी कि पर्यावरण की रक्षा एवं इससे उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए विकासशील देशों द्वारा खर्च की जानेवाली धनराशि सहायता स्वरुप दर्ीघकालीन स्तर पर उपलब्ध कर्राई जाय । इसके लिए विकसित देश सन् २०१० से अगले ३ वर्षों तक १० अरब डाँलर देने को सहमत तो थे किन्तु दर्घकालीन स्तर पर उनकी कोई ठोस योजना नहीं थी । इसपर संयुक्त राष्ट्र महासचिव वान की मून ने कहा कि विकासशील देशों को यह अपेक्षा छोडÞ देनी चाहिए कि विकसित राष्ट्र दर्घकालीन स्तर पर तत्काल कोई सहयोग की प्रतिबद्धता व्यक्त कर पाएँगे ।
पृथ्वी को हरा रखने ताकि सुन्दर श्वेत हिमालय की रक्षा हो सके का सपना लेकर कोपेनहेगेन सम्मेलन में नेपाल का प्रतिनिधित्व कर रहे नेपाल के प्रधानमन्त्री माधव कुमार नेपाल ने एक महत्वाकांक्षी और कानूनी रुप से सब के लिए बाध्यकारी होने वाले क्योटो प्रोटोकाँल सम्बन्धी समझौते को प्रस्तावित किया उन्होंने पृथ्वी के भविष्य के प्रति विश्व के ध्यानाकर्षा के साथ-साथ अल्प विकसित तथा जलवायु के कारण र्सवाधिक जोखिम में पडÞने वाले देशों पर विशेष ध्यान देने का प्रस्ताव भी विश्व के समक्ष रखा । प्रधानमन्त्री ने जोखिमग्रस्त अल्पविकसित देशों को विकसित देशों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर क्षमता अभिवृद्धि के लिए प्रविधि हस्तान्तरण और विकास में सहायता की बात कही । जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की ओर विश्व का ध्यान आकृष्ट कराने के लिए नेपाल द्वारा माउण्ट एवरेस्ट के आधार शिविर कालापत्थर -५५४२ मीटर उँचाई) पर मन्त्रिपरिषद की बैठक करने और जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी १० सूत्रीय ‘सागरमाथा घोषणा-पत्र’ जारी किये जाने की बात का भी उल्लेख किया । विश्व के बढते औसत तापमान का उल्लेख करते हुऐ श्री नेपाल ने कहा कि यह वृद्धि दर नेपाल में अधिक है और यह आगामी दिनों में इस क्षेत्र के सम्पर्ण् जल विज्ञान को प्रभावित करेगा ।

जलवायु परिवर्तन पर किसी मसौदे को अन्तिम रुप दिये जाने की जद्दो-जहद के बीच भारतीय प्रधानमन्त्री डाँ. मनमोहन सिंह ने शिखर सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारतवर्षसन् २०२० तक कार्बन उर्त्र्सजन में वर्ष२००५ की तुलना में करीब २० प्रतिशत की कटौती करने के अपने स्वेच्छिक घोषणा को हर हाल में पूरा करने के लिए वचनबद्ध है । उन्होंने कहा कि क्योटो प्रोटोकाँल के सभी पक्षों को प्रदूषणकारी तत्वों के उर्त्र्सजन में कटौती के अपने संकल्प पर अमल करना चाहिए । उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना सबसे कठिन है । डाँ. सिंह ने आगे कहा कि अगर र्समर्थनकारी वैश्विक जलवायु सन्धि हो जाए तो हम कहीं ज्यादा काम कर सकते है । भारतीय प्रधानमन्त्री के इस स्वेच्छिक कार्वन उर्त्र्सजन सम्बन्धी प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने सराहना की । ओबामा ने कहा कि भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अपका ने पहली बार बेहद महत्वपर्ण् कटौती प्रयासों को घोषित किया है और मैं इसका श्रेय उन्हे देने चाहुँगा ।

विश्वभर से आए वार्ताकारों द्वारा सहमति की बिन्दु तलाशने में विफलता, अमेरिका, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर अल्प विकसित और विकासशील देशों की असहमति पर लोगों की उम्मीदें अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा से थी लेकिन उन्होंने जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध में प्रभावित एवं निर्ण्यक कदम उठाने की बात पर अपनी ओर से कोई ठोस वचनबद्धता जाहिर नहीं की । उन्होंने स्वीकार किया कि कानूनी तौर पर बाध्यकारी संधि अनिवार्य है किन्तु इसे अन्तिम रुप देना बहुत कठिन है ।

जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगेन, परिणामों कि दृष्टि से बिल्कुल विफल रहा । इसके बावजुद भारत सहित तीन अन्य उभरती ताकतों और अमेरिका के बीच उर्त्र्सजन कटौती पर गैरबाध्यकारी सम्झौता हुआ लेकिन अधिकांश विकासशील देशों ने समझौते को आत्मघाती करार देते हुए खारिज कर दिया । वैसे कोपेनहेगेन में जो कुछ भी हुआ वह अप्रत्याशित नहीं था । क्योंकि कोपेनहेगेन वार्ता के अध्यक्ष डेनमार्क और दूसरे कई देशों ने पहले ही कह दिया था कि यहाँ कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता नहीं होगा । विकसित देश किसी भी कानूनी बाध्यता के खिलाफ थे । भारत और चीन जैसे देश इसलिए खिलाफ थे क्योंकि विकसित देश इसका बोझ उनके सिर पर डालने की मनःस्थिति में थे । इस सम्मेलन के दौरान विकसित और विकासशील देशों के रवैये ने सिद्ध कर दिया कि कोई भी अन्तर्रर्ााट्रय समझौता या संगठन तभी सफल हो सकता है जब वह कम से कम बाध्यकारी और ज्यादा से ज्यादा लचिला हो ।

यह सच है कि कोपेनहेगन सम्मेलन असफल   रहा । विकसित देशों की आरामतलबी की जिन्दगी और विकासशील देशों की विकास की सम्भावनाओं के स्वार्थ पर यह सम्मेलन असफल रहा लेकिन धरती का तापक्रम जिस रफ्तार से बढ रहा है तो इसे नियन्त्रित करने का कोई ठोस प्रयास विश्व के देशों द्वारा नहीं होगा तो उसका खामियाजा मनुष्य जाति को भुगतना हीं पडेगा । निश्चय हीं विश्व स्तर पर कानूनन् बाध्यकारी समझौता नहीं हो पाया है लेकिन हमें इस दिशा में अपना प्रयास बन्द नहीं करना चाहिए । साथ ही अपने स्तर पर पर्यावरण रक्षा की चेतना के प्रसार का प्रयास करना चाहिए अन्यथा धरती का कोप किसी भी
क्षण हमारे भविष्य को निगल सकता है ।

वैवाहिक रिश्तों पर आँच::मञ्चला झा

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 2 COMMENTS

किसी भी राज्य में रहनेवाले व्यक्ति की हैसियत तथा उसके राज्य के साथ का सम्बन्ध नागरिकता के अधिकार के आधार पर निर्धारित होता हैं । नागरिकता व्यक्ति की राष्ट्रीय पहचान का माध्यम हैं । किसी भी देश के नागरिक का यह मौलिक अधिकार है, जिसे पाकर ही व्यक्ति कानूनी तौर पर उस देश का नागरिक कहला सकता हैं । नेपाल में नागरिकता का इतिहास देखने से यह स्पष्ट होता है, कि यहाँ नागरिकता का मुद्दा वर्षों से विभेदपर्ण् होने के कारण विवादित रहा है । आने वाले दिनों में यह मुद्दा फिर से विवाद का विषय न बनं, संविधान सभा से आम नेपाली जनता की यही अपेक्षा है । परंतु, संविधानसभा मौलिक हक तथा राज्य निदेशक सिद्धान्त समिति ने गत माह जो नागरिकता सम्बन्धी प्रतिवेदन पेश किया है वह और भी जटिल और विभेदपर्ण् दिखता हैं । मसौदा के ४ -१) की धारा में, उल्लेखित है कि कोई भी नेपाली नागरिक विदेशी से शादी करने पर उस विदेशी पुरुष या महिला को नेपाली नागरिकता प्राप्त करने के लिए कानूनी तौर पर १५ वर्षतक नेपाल का निवासी बनकर रहना होगा । इस प्रावधान को पढकर यह स्पष्ट हो गया है कि आनेवाले दिनों में कोई भी नेपाली नागरिक यदि विदेशी के साथ शादी करं तो, उस विदेशी नागरिक को नेपाली राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए १५ वषां तक की लंबी प्रतीक्षा करनी होगी । इस दरमियान, उस विदेशी महिला या पुरुष को अपने देश की नागरिकता त्यागना होगा । उसके बाद ही वे नेपाल के अंगीकृत नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी हो सकते हैं । नागरिकता सम्बन्धी इस जटिल मसौदा ने आनवाले दिनों में वैवाहिक स्वतंत्रता पर ही पाबंदी लगा दी है । जो मानवीय मौलिक अधिकार के विरुद्ध हैं । जाहिर है कि इस प्रावधान से आने वाले दिनों में आम नेपालियों को विदेशियों से शादी करने के लिए सोचना होगा साथ ही इस से वैवाहिक रिश्तों पर भी प्रभाव पडेगा । एक ओर तो संविधान में वैवाहिक स्वतन्त्रता का उल्लेख होना चाहिए इस बात की वकालत हमारी महिला अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ कर रही हं, परन्तु दूसरी ओर नागरिकता सम्बन्धी इस जटिल प्रावधान को लाने का बहस भी चल रहा है, इससे सबसे ज्यादा मार में महिला हीं रहेगी । अन्तरिम संविधान २०६३ की धारा ८ -६) में उल्लेखित नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान में इस बात की जिक्र की गई है कि कोई भी नेपाली महिला विदेशी पुरुष के साथ शादी करे तो वैवाहिक सम्बन्ध के आधार पर विदेशी पुरुष को नेपाली नागरिकता प्राप्त नहीं हो सकती । किन्तु, नेपाली पुरुष अगर विदेशी महिला से शादी करे,rama_sita तो विदेशी महिला को अंगीकृत नागरिकता प्राप्त हो सकती हैं । महिला के सम्बन्ध में उल्लेखित इस विभेदकारी प्रावधान को लेकर महिला अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ तीव्र विरोध करते हुए इस कानूनी व्यवस्था को तत्काल खारिज करने की माँग करती आ रही हैं । नये संविधान में वैवाहिक सम्बन्ध के आधार पर विदेशी पुरुष को भी नेपाली नागरिकता मिलनी चाहिए यही उनकी माँग है । परंतु, अधिकार खोजने की इस भाग दौड में स्वयं महिलाओं का ही अधिकार फिर से खो न जाए । इस के लिए महिलाओं को सजग रहने की आवश्यकता है । संख्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो विदेशी पुरुषों से शादी करने वाली नेपाली महिलाओं की तुलना में कई गुणा ज्यादा पुरुष हैं और कोई महिला जब नेपाल में बहू बनकर आएगी तो कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से उसका अपना घर नेपाल होगा किन्तु अपने ही घरों में वह १५ सालों तक राष्ट्रीय पहचान के वगैर रहे यह कैसा कानून – इस मसले पर अगर गौर से विचार किया जाए तो यह प्रावधान पहले की तुलना में और भी अधिक विभेदपर्ण् और संकरीण् दिखता है । इसके साथ ही विवाहित विदेशी महिला के नाम पर न जमीन खरीदी जा सकती है और न तो वह पति की सम्पति पर अधिकार जता सकती हैं । इस तरह तो वह महिला आर्थिक रूप से वर्षों तक कमजोर ही रहेगी । नागरिकता वगैर वह सरकारी नौकरी भी नहीं कर सकती । १५ सालों के बाद जब उसकी सरकारी नौकरी की उम्र ही गुजर जाएगी तो वह नागरिकता उसके लिए कितने मायने रख सकती है – विचारणीय हैंै ।

बहरहाल, यह मसौदा अभी बहस का विषय बना हुआ है । इस मसौदे को लेकर मधेशी सभासद के साथ ही अधिकारकर्मी, कानूनविद महिलाएँ प्रतिवेदन के विरुद्ध में आवाज उठा रहीं हैं । जाहिर है कि इस प्रावधान से आनेवाले दिनों में सबसे ज्यादा मधेशी जनता ही प्रभावित होगी । क्योंकि भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में रहनेवाले तर्राई मधेश की जनता और भारतीयों के बीच सदियों से जो बेटी-रोटी का रिश्ता रहा है, उसपर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पडेÞगा । नेपाल और भारत के बीच कुटनीतिक और राजनीतिक सम्बन्धों की बुनियाद को मजबूत बनाने में वैवाहिक रिश्ता सेतु का काम कर रही है । इस बात को जानकर भी कुछ लोग इस नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान का खुलकर र्समर्थन कर रहे हैं । उनका मानना है कि नागरिकता में दी गई ढिलाई के कारण ही २०६३ साल में २५ लाख लोंगो ने इसका नजायज फायदा उठाया । गृह मंत्रालय के अभिलेख के अनुसार करीब पाँच लाख भारतीयों ने इस दरमियान नागरिकता प्राप्त की है । ‘नव नागरिकों’ के आगमन से अभी तर्राई मधेश की जमीन का भाव दुगुणा हो जाना, भारतीय नम्बर प्लेट की गाडियाँ खुलेआम सीमावर्ती क्षेत्रों में दिखाई देना इसका सांकेतिक उदाहरण है । सीमावर्ती भारतीय क्षेत्र से अधिक नेपाल में अवसर सहज होने के कारण नेपाली नागरिकता के प्रति भारतीयों का विशेष आकर्षा रहा है । अतः आने वाले दिनों में नागरिकता प्रमाण पत्र लेने के लिए आधार प्रमाणपत्र जुटाने की अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए । इसके लिए मधेशवादी दलों के साथ ही मधेश के पुराने निवासियों को भी चिन्तन करना होगा । जाहिर है, सीमा पार से आने वाले अथाह जनसागर का पहला दबाव मधेशियों पर ही पडेगा । यह एक अलग बहस का विषय है, जिस पर आम मधेशियों को विचार करना ही होगा । किन्तु इस वजह से वैवाहिक रिश्तों पर जो कुठराघात किया जा रहा है, वह र्सवथा अनुचित हैं ।

इतिहास साक्षी है नेपाल और भारत के बीच का वैवाहिक रिश्ता सदियों से चला आ रहा हैं । त्रेतायुग में मिथिला नरेश राजषिर् जनक की सुपुत्री जानकी का विवाह अयोध्या नरेश राम से होना इसका ज्वलंत उदाहरण है । इसी तरह नेपाल के लिच्छवीकालीन राजा नरेन्द्र देव के सुपुत्र शिवदेव द्वितीय का विवाह मौखरी राजा भोग वर्मा की सुपुत्री वत्सदेवी के साथ हुआ था । जयदेव द्वितीय के पशुपति अभिलेख इं. सं. ७३३ में जयदेव द्वितीय का विवाह कलिंग आसाम और कौशल के राजा हर्षेव की सुपुत्री के साथ होने की बात का उल्लेख हैं । भारत के सम्राट अशोक ने अपनी सुपुत्री चारुमति का विवाह नेपाल के क्षत्रीय देवपाल के साथ करवा कर दो मुल्कों के बीच वैवाहिक सम्बन्धों को और भी प्रगाढ बनाया था । नेपाल के तर्राई-मधेश में रहनेवाले मधेशी ही नहीं आसाम, दार्जिलिंग, सिक्किम तथा भूटान से भारी संख्या में आए नेपाली भाषियों का वैवाहिक सम्बन्ध भी भारत के साथ रहा है । साथ ही नेपाल के राणा और राज घराना परिवार का वैवाहिक सम्बन्ध भी चलता आ रहा है । किन्तु, संविधान सभा के मौलिक हक तथा राज्यनिदेशक सिद्धान्त समिति में नागरिकता के सम्बन्ध में धारा ४ -१) में जोे प्रावधान रखा गया है, उससे आने वाले दिनों में नेपाल और भारत के बीच वैवाहिक रिश्तों में आँच पहुँचने की पूरी सम्भावना दिखती है । साथ ही इससे भारत और नेपाल के बीच परम्परा से चलती आ रही वैवाहिक रिश्ते की बुनियाद डगमगा न जाए । इस के लिए सचेत रहना होगा ।

विवादों के घेरे में नागरिकता::श्रीमननारायण

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

नागरिकता का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आया है । मधेशवादी नेता गजेन्द्र नारायण सिंह और उनकी पार्टि नेपाल सद्भावना पार्टर् इस मुद्दे को दो दशक तक अनवरत रूप से उठाया । जनआन्दोलन २ की सफलता के पश्चात् इसके समाधान कर्र् इमानदार प्रयास भी हुए । तकरीबन २८ लाख लोगों को नागरिकता भी मिली । इनमें अधिकांश गैर मधेशी ही हैं । माना जा रहा था कि नागरिकता के समस्या का बहुत हद तक समाधान हो चुका है परन्तु नेपाल के गैर मधेशवादी दल के नेताओं की दकियानुसी सोच ने एक बार फिर से इसे जटिल समस्या बना दिया है । संविधान सभा की मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धान्त समिति ने जो प्रतिवेदन तैयार किया है, उसमें नागरिकता प्राप्ति की प्रक्रिया को काफी जटिल बना दिया है ।

प्रतिवेदन के अनुसार नये संविधान के प्रारम्भ होने के बाद नेपाली नागरिक से विवाह करने वाले विदेशी नागरिको को विदेश की नागरिकता त्याग करने और लगातार १५ वर्षतक नेपाल में निवास करने पर ही अंगीकृत नागरिकता प्रदान किया जा सकता है । अब तक यह व्यवस्था रही है कि नेपाली नागरिक से विवाह करने वाली विदेशी महिला अपने पुराने देश की नागरिकता त्याग करने की लिखित सूचना स्थानीय अधिकारी को देती है तो वह नेपाल की नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी मानी जाऐंगी । पहले किसी विदेशी महिला को नेपाल की नागरिकता प्राप्त करना काफी सहज था । बनाए जा रहें प्रावधान के अनुसार किसी विदेशी लडकी की शादी अगर किसी नेपाली लडके से होती है तो नेपाल की नागरिकता पाने के लिए उसे १५ वर्षतक इन्तजार करना होगा । जाहिर है इन १५ वर्षों में न तो उनके नाम से नेपाल में जमीन की खरीद-बिक्री हो सकेगी और ना ही नेपाल के बैंकों में उनका खाता ही खुल सकेंगा । अगर उनके श्रीमान पाँच या दस वर्षके लिए विदेश जाऐंगे तो उनके बच्चं का नामांकन भी स्कूलां में नहीं हो सकेगा । जाहिर है १५ वर्षतक उन्हें अनागरिक होकर ही समय बिताना होगा । नेपाल एवं भारत के बीच परम्परागत बहुआयामिक सम्बन्ध है दोनों देशों का सांस्कृतिक सम्बन्ध काफी मजबूत है । वैवाहिक सम्बन्ध की शुरुआत त्रेताकाल से है । अयोध्या के राजकुमार राम की शादी जनकपुर की राजकुमारी सीता से हर्इ थी तब से लेकर आज तक लाखों-करोडों नेपाली भारतीयों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध हो चुके हं । यह सम्बन्ध साधारण परिवार से लेकर राजपरिवार तक हैं । फिर भी नये प्रावधान लागू करने का प्रयास हो रहा है तो इस के पीछे अवश्य ही किसी बडे षडयन्त्र की आशंका है । नयें प्रावधान के तहत जिन्हं नेपाल की नागरिकता नही होगी वे मताधिकार से भी वंचित होंगे, नेपाल में उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार नहीं होगा और किसी भी तरह का र्सार्वजनिक पद धारण करने के योग्य भी वे नहीं माने जाऐंगे । पहले ऐसा नही था । जिन्हें नागरिकता नहीं होती थी वे भी अपने मताधिकार का प्रयोग कर पाते थे ।

कहने के लिए नेपाल मं लोकतंत्र है, गणतन्त्र है नये कानून से जनता को मतदान करने का अधिकार भी प्राप्त नही होगा । नेपाल की तीनो बडी पार्टिया नेपाली कांग्रेस, एमाले एवं माओवादी जिनका नेतृत्व गैर मधेशवादी करते हैं ये काफी साम्प्रदायिक, संकर्ण् एवं असहिष्णु प्रवृति के हैं । नारा या भाषण में तो ये लोग काफी उदार एवं खुला दिल के दिखते हैं परन्तु व्यवहार मे नहीं । विगत मंे भी ये तीनों दल नागरिकता-समस्या का समाधान नही चाहते थे परन्तु नेपाल सद्भावना पाटी -आनन्दी) के भारी दबाव के कारण इनहें झुकना पडा था । सन् २००७ मे जब नागरिकता-समस्या का बहुत हद तक समाधान हुआ तो मधेशी विरोधियों ने यह शिगुफा निकाला कि नेपाल अब फिजी बन जाएगा तथा नेपाली भाषी लोग अल्पमत में पड जाऐंगे । कुछ कम्युनिस्टों ने तो यहा तक कहा कि ४० लाख भारतीयों को नागरिकता मिली है । जब कि यथार्थ मं २८ लाख नागरिकता ही दिये गए और उस में ६० प्रतिशत से अधिक गैर मधेशी अर्थात् नेपाली भाषी ही लाभान्वित हुए । मधेशियों को नागरिकता मिली भी तो उनकी नागरिकता समाप्ति के लिए सैकडों शिकायत पत्र भी गृह मन्त्रालय मं भेजे गये । विगत मं नागरिकता प्राप्त लोगों की भी नागरिकता अगर समाप्त कर दी जाये तो आर्श्चर्य नहीं, क्योंकि सरकार के नए प्रावधान मंे इसकी भी गुन्जाइश है । जिन्हें नागरिकता मिल चुका है उन्हें नागरिकता से वंचित करने और भविष्य में अन्य लोगों का नागरिकता नहीं देने की मुकम्मल तैयारी सरकार ने कर ली हं । कल अगर कोई भारतीय नेपाल में अपने लडकी या लडके की शादी ही न करें तो इसमें आर्श्चर्य नहीं । इस प्रावधान के कारण नेपाल एवं भारत का वर्षो पुराना सांस्कृतिक सम्बन्ध प्रभावित होगा । शायद नेपाल के गोरखाली शासकांे को लगा हो कि मधेशी का भारत के साथ सम्बन्ध अच्छा न रहें इस के लिए जरूरी है कि सांस्कृतिक सम्बन्ध पर ही हमला बोल दिया जाय ।
नागरिकता के सम्बन्ध में आए नए प्रतिवेदन से मधेशवादी दल भौचक्का रह गए है । एक ओर नये संविधान मंे अपना अधिकार सुनिश्चित कराने के लिए ये लोग कसरत कर रहे हैं तो दूसरी ओर नागरिकता सम्बन्धी नये प्रतिवेदन से पुरानी उपलब्धियों को भी खो जाने का डर हं । सरकार मं शामिल मधेशवादी दल या सरकार से बाहर के मधेशवादी दल भी लाख उछलकुद कर लें परन्तु नेपाली कांग्रेस, एमाले एव माओवादी के परर्छाई से दूर ये नही जा सकतं । काठमांडू की सत्ता सदैव उपरोक्त तीन दलां के र्इदगिर्द ही घुमती रहेगी लिहाजा मधेशवादी दल भी इन दलों से बगावत करना नही चाहेगं । नेपाल के संविधान सभा में माओवादी, एमाले एवं कांग्रेस के सदस्यो की संख्या जोडकर साढे चार सौ आंकडा पार कर जाती हैं । जो कि संविधान सभा के कुल सदस्य संख्या के तीन चौथाई के करीब है । उपरोक्त तीन दलां के सहयोग एवं र्समर्थन के बिना संविधान नहीं बन सकता है । संघीयता, नागरिकता अन्य विषय भी उपरोक्त तीन दल के मर्जी पर ही निर्भर है । नागरिकता प्राप्ति प्रक्रिया को जटिल बनाने का प्रयास काफी सोची समझी एवं गहरी साजिश का हिस्सा है ।

सम्पादक की कलम से …

Posted by Himalini On January - 8 - 2010 ADD COMMENTS

DSC01982_r1_c1नेपाल और भारत के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध त्रेता युग के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और आद्या शक्ति माँ जानकी के वैवाहिक सम्बन्ध से स्थापित है । उसी समय से इन दोनों देशों के बीच अटूट रुप से उक्त सम्बन्ध अद्यावधि प्रगाढÞ होता आ रहा है । इस सम्बन्ध को प्रगाढ करने का काम केवल नेपाल और भारत के सीमान्त प्रदेशों में रहने वाली तर्राई वासी जनता ही नहीं अपितु इन दोनों देशों के राजा-महाराजा भी वैवाहिक सम्बन्ध परम्परा की कडी को मजबूत करते आ रहे हैं । इन दोनों देशों के बीच मात्र यही सम्बन्ध नहीं है । दोनों के बीच भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, भाषिक, सामरिक और आर्थिक सम्बन्ध भी अटूट हैं । इन्हीं सब कारणों से नेपाल-भारत के बीच बेटी-रोटी का रिश्ता है । जिसे तोड पाना किसी भी प्रतिवेदन के वश की बात नहीं है । फिर भी नेपाल में पंचायत काल से आज तक शासन करते आ रहे पर्वतीय मूल के अदूरदर्शी राजनेता लोग अपने संकरीण् विचारों के आधार पर इसे तोडने की कोशिश करते आ रहे हैं । उसी कोशिश को शख्त और अधिक बाधक बनाने के लिए संसद में संविधान सभा की मौलिक अधिकार तथा निर्देशक सिद्धान्त समिति के द्वारा जो प्रतिवेदन लाया जा रहा है वह निश्चय ही मधेशी जनता को अधिकारहीन बनाने के साथ-साथ तर्राईवासियों का सम्बन्ध भारत के साथ अच्छा न रहे इसके लिए सोची समझी कूटनीति है । क्योंकि भारत के साथ तर्राईवासियों का सदियों पुराना सांस्कृतिक सम्बन्ध प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित होगा । ऐसा होने से भारत के प्रति तर्राईवासियों के मन में व्याप्त भावनात्मक निकटता खण्डित होगी । दोनों देशों के बीच विद्यमान सुसम्बन्ध स्थापित नहीं रह पाएगा, यह उक्ति पर्ण्तः चरितार्थ होगी कि, न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । लेकिन गोर्खाली शासकों को समझना होगा कि तर्राई की जनता भी २१ वीं सदी की जनता है । वहं की जनता भी जागरुक हो गई है और अधिकार प्राप्त करने की शक्ति को समझने लगी है ऐसी स्थिति में खस् शासकों द्वारा लाये गए नागरिकता प्रतिवेदन को भविष्य में पारित कराने की कोशिश की गयी तो परिणाम त्रासदीपर्ण् हो सकते हैं जिसके लिए मुख्य रुप से राज करते आ रहे खस् शासक ही जिम्मेबार समझे जाएंगे ।

कोई भी देश, समाज या रिश्ता तभी जीवित रहेगा, जब हमारी धरती सुरक्षित रहेगी । किन्तु पर्यावरण की सुरक्षा एवं जलवायु परिवर्तन से हो रहे दुष्परिणामों की चिंता न करते हुए अमीर एवं विकासशील देश साफ तौर पर दो भागों में बंट गए । और उनके औद्योगिक कारोबारी उद्देश्य अहम् बन गए ऐसी स्थिति में न हमारी धरती बचेगी और धरती के नहीं बचने पर देश, समाज, रिश्तों के बचने की कल्पना कैसे की जा सकती है । हाल ही में जलवायु परिवर्त्तन पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में सम्पन्न महासम्मेलन में जुटे १९२ देशों की बहस किसी गंभीर मसले पर न होकर अपने क्षुद्र राजनीति की झलक पेश करती है । महासम्मेलन में ग्रीन हाऊस गैंसों के उर्त्र्सजन में कटौती तथा जलवायु परिवर्त्तन से उत्पन्न होनेवाले खतरों से निपटने के लिए एक कारगर रणनीति बनने एवं उसपर र्सार्थक सामूहिक कार्यान्वयन होने की पूरी उम्मीद थी, परन्तु दर्ुभाग्वश ऐसा नहीं हो सका । इस ज्वलन्त मुद्दे पर नेपाल सरकार भी कम चिन्तित नहीं है, इसी चिन्ता को दुनिया के सामने लाने के लिए नेपाल सरकार ने सर्वोच्च सगरमाथा के आधार शिविर -काला पत्थर) पर पहुँचकर मन्त्रिपरिषद की ऐतिहासिक बैठक की । इस बैठक के माध्यम से नेपाल ने कोपेनहेगेन में होने वाले जलवायु परिवर्त्तन सम्बन्धी सम्मेलन का ध्यान अपनी ओर खींचा । साथ ही इस कालापत्थर बैठक ने विश्व का ध्यानाकर्षा किया है कि बडे-बडे औद्योगिक देशों के द्वारा किये जा रहे हरित गृह गैंस उर्त्र्सजन से होने वाले जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाली क्षेत्र भी दुष्प्रभावित हो रहा है । अतः यह नेपाल जैसे प्रभावित और निर्धन देश के प्रति भी औद्यागिक बडे देशों को जिम्मेवार बनने का संकेत देता है । प्रधानमंत्री माधवकुमार नेपाल ने विश्व स्तरीय कोपेनहेगेन सम्मेलन में हरित गृह गैस कटौती का जो महत्वाकांक्षा प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, अगर सम्मेलन सफल होता और माधवकुमार नेपाल द्वारा सुझाए गए प्रस्ताव को अमली जामा पहनाया गया होता तो जलवायु परिवर्त्तन के खतरों को कापी हद तक कम किया जा सकता था । प्रधानमंत्री अपने इस उद्देश्य को विश्व समुदाय के समक्ष रखने मे सफल रहे कि नेपाल जैसे छोटे देश को भी जलवायु परिवर्त्तन के दुष्परिणामस्वरुप उत्पन्न होने वाले भावी खतरों की विशेष चिन्ता है । खैर बहुचर्चित कोपेनहेगेन सम्मेलन तो सफल नहीं रहा, इसका मतलब यह नहीं कि विश्व के हम सभी नागरिक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें ।

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