मधेश और इसके मुद्दे के गुमने-गुमाने का खतरा बरकरार::कुमार सच्चिदानन्द
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मधेश की जनभावना को राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता का हवाला देकर नकारने कीजो प्रवृत्ति नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में विशेषतः सत्ता में सहभागी दो प्रमुख दलों में देखी जा रही है उसे राष्ट्रहित में अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता । किसी न किसी रुप में यह एक द्वन्द्व को निमंत्रण दे रहा है और उसका खामियाजा देश के आम लोगों को भुगतना ही पडÞेगा । यह सच है कि मधेश आन्दोलन के बाद देश में निवास कर रहे दोनों वर्गों के मनोविज्ञान में परिवर्तन आया है, दोनों ही वर्गों में शत्तिः और सीमाओं का एहसास होने लगा है लेकिन चरम स्वीकार्यता के भाव का अभाव देखा जा रहा है । जिन भावनाओं को तर्राई आन्दोलन ने आवाज दी थी वह कहीं न कहीं गुम होती दिखलाई दे रही है और इसका कारण मधेशी दलों की दिशाहीन राजनीति है । अपनी डफली अपना राग की राह पर चलते हुए इन लोगों ने अपने आदमी की निराशा को जिस हद तक पहुँचाया है उसका सही अन्दाजा तो निर्वाचन या सडÞक आन्दोलन के समय में ही होगा लेकिन अभी लौटने का अवसर है ।
मधेश के मुद्दे पर नेपाल की राजनैतिक शक्तियाँ दो भाग में विभाजित है । एक बात पर यहाँ लोकपरम्परावादी राजनैतिक शक्तियाँ है जिसमें नेपाली कांग्रेस के साथ-साथ एमाले और अन्य छोटी-बडी पार्टियाँ है जो मधेश के संरचनात्मक वैशिष्ट्य को स्वीकार करने तथा देश में समानता के आधार पर अधिकार सम्पन्न करने की सोच मात्र से विदकते हैं । दूसरी ओर नेकपा माओवादी के साथ अनेकानेक मधेशी दल हैं जो मधेश प्रदेश के निर्माण के साथ-साथ मधेशियों की मुक्ति का राग अलाप रहे हैं । लेकिन इन सारे दलों में कहीं न कहीं भावगत इमानदारी का अभाव है । इसलिए उनमें से किसी भी राजनैतिक दल के प्रति आम मधेशियों की सोच सकारात्मक नहीं है और उन्हें इस बात का एहसास होने लगा है कि वे इन राजनैतिक पार्टियों द्वारा उपयोग किये जा रहे हैं । वस्तुतः अब तक की इनकी नीतियों और कार्यक्रमों ने आम लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाया है । इसका एक अन्य महत्वपर्ूण्ा कारण उनमें परस्पर छींटाकसी भी है ।
माओवादियों की यह सोच है कि मधेश आन्दोलन के बाद यहाँ उनका जनाधार घटा है । कांग्रेस और नेकपा एमाले जैसे प्रबल प्रतिद्वन्द्वियों के साथ-साथ मधेश मे नव मधेशवादी दल अपनी भग्न अवस्था के बावजूद उन्हें शिकस्त देने की स्थिति में है । इसलिए उन्होंने अपने भातृ संगठन मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का महाधिवेशन किया और अपने दल के परिचित चेहरों के साथ-साथ दूसरी पार्टियों से आये नये चेहरे को नेतृत्व पंक्ति में लाया । निश्चित ही तर्राई में अभी संगठन विस्तार उनके राजनैतिक चिंतन का प्रमुख आधार है । इस महाधिवेशन के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए माओवादी सुप्रीमो प्रचण्ड ने जहाँ नव मधेशवादी दलों को कुकुरमुत्ता और पानी का बुलबुला कहा वहीं अपनी पार्टियाँ मधेशियों का सच्चा हितैषी कहा और स्वयं को पहाडी होते हुए भी पहाडीवाद का विरोधी घोषित किया । उनके इस बात में कितनी सच्चाई है, यह बात अलग है लेकिन इतना तो बेबाकी से कहा जा सकता है कि मधेश के सर्न्दर्भ में उनकी नीतियाँ गैर मधेशी पार्टियों से अधिक गतिशील है । लेकिन उनकी इन नीतियों में बौद्धिकता का पक्ष अधिक प्रबल है । यही कारण है कि मधेश आन्दोलन का र्सवाधिक आक्रामक विरोध माओवादियों ने ही किया था । गोईत, ज्वाला और मातृका सब उनके ही कारतूस थे, किन्तु समयक्रम में अपने रास्ते अलग किये । इसलिए उनसे यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि मधेश सम्बन्धी अपनी नीतियों में थोडी सी भावनात्मक का सम्मिश्रण और जनता को हथियार न बनाकर उन्हें संवेदनात्मक र्स्पर्श भी दें ।
मधेशवादी दलों की राजनीति का अपना मिजाज है उनके क्रियाकलापों से मधेश के क्षेत्रीय हितों का जितना संरक्षण हो पाया है उससे अधिक तथाकथित राष्ट्रीय हितों का संरक्षण हो रहा है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आज मधेश की राजनीति यथास्थितिवादी या अवसरवादी प्रवाह में अग्रसर है जबकि सदियों से शोषित मधेश की जनता व्रि्रोही बातों में अधिक सुकून मानती है । एक तरह से देखें तो तर्राई मधेश की सम्पर्ूण्ा राजनैतिक शक्तियाँ जो मध्यम मार्ग पर चलने का दावा करती है वे सत्ता के भीतर है और जो बाहर है वे भी दरवाजे पर दस्तक दे रही है । निश्चित है कि संविधान निर्माण आज की प्रमुख राजनैतिक आवश्यकता है और इसके लिए सहभाव और सहकार्य आवश्यक है और सरकार में शामिल होने के उनके निर्ण्र्ााको भी अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । लेकिन सवाल उठता है कि दलगत स्वार्थ की साधना के लिए आपस में कबड्डी खेल रहे ये राजनैतिक दल मधेश मे मुद्दे पर परस्पर सहमत होकर एक चर्टाई पर बैठने का प्रयास करेंगे -
आज मधेश के मुद्दों के प्रति सबसे बडÞी विडम्बना यह घटित हर्इ है कि कुछ मधेशी दल ऐसे हैं जिनमें नेतृत्व को मधेश की संवेदना का ज्ञान ही नहीं है, कुछ ऐसे हैं जिन्हें संवेदना के साथ-साथ जमीनी सच्चाई की भी पहचान है किन्तु हस्तिनापुर के प्रति अतिशय प्रतिबद्धता के कारण भीष्म पितामह सधरैय धारण किए हुए हैं । आज स्थिति यह है कि मधेश के मुद्दे पर सत्ता में सहभागी दलों ने एक ओर जहाँ अपने प्रति आम लोगों का विश्वास खोया है तो दूसरी ओर अन्तर्ररा्रीय स्तर पर विशेषतः भारतीय कूटनीति से भी अपन पक्ष बनाने में असक्षम रहे हैं मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के एक पदाधिकारी उस स्थिति को रेखांकित करते हुए यह दावा करते हैं कि मधेशियों का सच्चा हितैषी नेकपा माओवादी और उनका भातृ संगठन मरामुमो है । इस बात से पर्ूण्ातया असहमति भी नहीं जतलायी जा सकती लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि मधेश के मुद्दा उनके लिए साधन रहा है । अतीत में मधेशियों से हुए संर्घष्ा और मरामुमो के विभिन्न नेताओं का इससे निकलना इसका प्रमाण है । एक बात तो निर्विवाद है कि आज हर वह मधेशी दल जो सत्ता में सहभागिता दे रहे हैं, मानसिक कुण्ठा का शिकार है और जो बाहर है उनकी आवाजें मुखर होकर निकल रही है लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें भी सत्ता में सहभागी होने के लिए विवश कर रही है । यद्यपि उनकी अपनी शर्तें हैं और उन शर्तों को अगर सरकार मान भी लेती है तो उन्हें कार्यान्वित कराने में सरकार में शामिल होने के बाद वे कितना सक्षम हो पाते हैं यह बात समय ही बतलाएगा क्योंकि इस दृष्टि से विगत के राजनीतिक अभ्यासों में ये असफल रहे हैं । विगत में हुए ज्ञद्द सूत्रीय और ड सूत्रीय समझौतों का क्या हश्र हुआ है उसे सभी जानते हैं, वस्तुतः समझौतों के विरुद्ध समझौते करना लोकतांत्रिक नवनेपाल के सरकारों की प्रमुख विशेषता रही है । संगठित होकर भी मधेशी दल जहाँ इन समझौतों को कार्यान्वित नहीं कर पाए तो आज विखरी हर्ुइ अवस्था में कितनी सफलता हासिल कर पाएँगे कहना कठिन है ।
आज दिल्ली को नेपाली राजनीति का मक्का-मदीना कहा जा रहा है और मधेशी दलों को हज के प्रति अधिक संवेदनशील मानना यहाँ की राष्ट्रीय सोच है । लेकिन मधेश के नेतृत्व वर्ग की एक विफलता यह भी है कि यहाँ के उलेमाओं की दृष्टि में वे अपनी प्राथमिकताओं का सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं और उनके अब तक के प्रश्न-चिन्हों से जिन प्राथमिकताओं का संदेश जगजाहिर होता है इनका मार्ग कभी सरकार बचाने के नाम पर और कभी संविधान निर्माण की गम्भीरता के नाम पर प्रशस्त किया जा रहा है और इस पथ पर जब वे चल पडÞते हैं तो कहीं न कहीं मधेश की माँगंे कमजोर होती है । यह नीतिगत सिद्धान्त है कि एक लक्ष्य के अन्वेषी परस्पर मित्र होते हैं । निश्चित ही सारे मधेशी दलों का लक्ष्य अन्ततः मधेश को देश के स्तरपर उसकी पहचान की प्रतिष्ठा के साथ-साथ भेदभाव से मुक्त समानता के धरातल पर उसे स्थापित करना है । लेकिन चुनावी गणित एवं सत्ता के समीकरणों ने उन्हें परस्पर विरोधी बना दिया है । वास्तव में अगर वे मधेश की मुक्ति के सच्चे साधक है तो उन्हें परस्पर एकताबद्ध होकर तथाकथित आकाओं से यह गुहार तो करनी ही चाहिए कि उनकी प्राथमिकता मधेश की सदियों से शोषित-पीडित जनता की मुक्ति है और उनकी इस मानवीय कामना को राजनीति या कूटनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए ।
आज मधेश की राजनीति की एक प्रमुख आवश्यकता विखरी हइ राजनैतिक शक्तियों को समेटने का प्रयास है । निश्चित ही अवसर और महत्व की छोटी सी अवधि में जितना विभाजन और विखराव मधेशी दलों का हुआ है वह अप्रत्याशित है । ऐसी शक्तियों में मजफो और नेपाल सद्भावना पार्टर्ीीे विभिन्न घटक है । निश्चित है कि उनकी आवाजें अभी मुखर रुप से नहीं सुनाई दे रही या उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा कारण विखराव इतना अधिक है कि आम लोग उसे पागलपन तक की संज्ञा देने लगे हैं । वस्तुतः मधेशी नेतृत्व चाहे पर्दे के बाहर का हो या भीतर का, थोडा सा महत्व प्राप्त होते ही उनकी सोच इतना व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है कि वे अपनी पार्टर् तो टूटते ही है, समान विचारधारा वाली दूसरी पार्टियों में भी सहभागी नहीं होते और अपनी-अपनी दुकान खोलकर बैठ जाते हैं । इसलिए आज जितने नेता उतने दल की स्थिति मधेशी राजनीति में बनती जा रही है । इन विखरी हर्इ शक्तियों को संगठित कर लेना मधेशी राजनीति की महत्वपर्ण् घटना होगी ।
कुल मिलाकर अब तक की परिस्थितियाँ बहुत अधिक सकारात्मक नहीं मानी जा सकती । टूट-फूट और घात-प्रतिघात के दौर से मधेशी राजनीति गुजर रही है । अपनी आवाज को कमजोर करने के खेल में ये मधेशी दल जाने-अनजाने खुद ही अधिक सक्रिय हैं और देश की तथाकथित राष्ट्रवादी शक्तियाँ लीपापोती की मनःस्थिति में है । यह सच है कि बदली हर्इ परिस्थिति में मधेश मं भी राजनैतिक तौर पर चर्चे बटोरे हैं । इसलिए इसमें अन्तर्ररा्रीय कूटनीति का भी सरोकार बढा है । इनके हाथों की कठपुतली या उनके अन्तःसंर्घष् में मधेश और इसके मुद्दे के गुमने-गुमाने का खतरा बरकरार है । इसलिए सम्यक् मार्ग की साधना हमारे नेतृत्व वर्ग के लिए अपरिहार्य है ।

