एवरेस्ट पर चीन का कसता शिकंजा::श्रीमन नारायण
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माउण्ट एवरेस्टको नेपाल में सगरमाथा कहा जाता है । माउण्ट एवरेस्ट नेपाल का है यह विश्वव्यापी रुप में स्थापित सत्य है । चीन का मानना है कि एवरेस्ट का उत्तरी हिस्सा पहले चीन का था लिहाज इसे चीन के अधीन ही होना चाहिए । इसी मान्यता के तहत चीन माउण्ट एवरेस्ट पर कब्जा भी जमा रहा है । एवरेस्ट की चोटी पर मौसम सूचना केन्द्र की स्थापना के लिए चीन ने वहाँ संयन्त्र स्थापित करने का निर्ण्र्ाालिया है । यह चीन के विस्तारवादी नजरिये का द्योतक है और एवरेस्ट चीन का ही है इस मानसिकता को भी बल दे रहा है । नेपाल में अब तक इसका विरोध नहीं हुआ है । न तो सरकारी स्तर से इसका विरोध हुआ है और न ही नेपाल के किसी राजनीतिक दल और किसी राष्ट्रवादी नेपाली नेता ने ही इसका विरोध करने का जहमत किया है । चीन की इस विस्तारवादी नीति का अगर विरोध नहीं हो रहा है तो नेपाल की भावी पीढÞी कल यह जरुर जानना चाहेगी कि आखिर कब और कैसे एवरेस्ट चीन का हिस्सा हो गया -
राजधानी काठमांडू से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित नेपाली साप्ताहिक “पुनर्जागरण” के घ नवम्बर के अंक में सगरमाथा के अतिक्रमण पर खामोशी क्यों – शर्ीष्ाक से एक सनसनी खेज समाचार प्रकाशित हुआ है । पत्रिका ने ब्रिटेन से प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रिका “दि इकोनोमिस्ट” अक्टुबर के अंक के हवाले से एक तस्वीर प्रकाशित किया है जिसमें माउण्ट एवरेस्ट की चोटी पर चीन का झण्डा फहरा रहा है । एवरेस्ट की चोटी पर चीन का झण्डा लहराना यह सावित करता है कि चीन की नजरों में एवरेस्ट पर उसके सिवाय किसी दूसरे का हक ही नही बनता । चीन ने जिस तरह तिब्बत पर कब्जा जमाया उसी तरह एवरेस्ट के आधा हिस्सा पर भी कब्जा जमा रहा है । एवरेस्ट नेपाल का है तो उस पर पूरा नियंत्रण भी नेपाल का ही होना चाहिए । एवरेस्ट के चारों मोहडा पर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण पर भी नेपाल का ही नियंत्रण होना चाहिए । अगर सर -माथा) नेपाल का है तो बाकी शरीर भी नेपाल का ही होना चाहिए । सर नेपाल का और बाकी देह चीन का यह कैसे हो सकता है – चीन ने इस बार नेपाल पर आक्रमण किया है एवरेस्ट पर मौसम तथा भूकम्प मनिटर करने के बहाने जासूसी संयन्त्र स्थापना करके । चीन विरोधी गतिविधि अर्थात् तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए संर्घष्ा कर रहे तिब्बतियों की गतिविधि के नियंत्रण एवं निगरानी के नाम पर भले ही यह संयन्त्र स्थापित किया गया हो परन्तु इसका असली मकसद तो एवरेस्ट की उँचाई से नेपाल, भारत और अमेरिकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखना है । संयन्त्र की स्थापना नेपाल के लिए खास मायना नहीं रखती है परन्तु एवरेस्ट के ऊपर संयन्त्र क्यों लगाया गया – नेपाल के लिए यह विषय काफी अहम है । एवरेस्ट की चोटी पर मौसम सूचना केन्द्र स्थापित करने का निर्ण्र्ााचीन ने अकेले ही किया है । इस बावत नेपाल को कोई जानकारी नहीं है । इसका विरोध नेपाल की सरकार की ओर से होनी चाहिए परन्तु अब तक ऐसा नहीं हुआ है । नेपाल के दक्षिणी पडÞोसी भारत ने इसका विरोध किया है परन्तु नेपाल अभी खामोश है । लगता है चीन के हस्तक्षेप पर विरोध न करने की एक अघोषित नीति सी बन चुकी है । चीन के प्रति नेपाल के सभी वामपंथी दल उदार हैं लिहाजा वे चीन का विरोध करेंगे ही
नही – जो दक्षिणपंथी है, राजावादी है, राजतंत्र के र्समर्थक रहे हैं वे इसलिए चीन का विरोध नहीं करेंगे कि स्वर्गीय नरेश महेन्द्र ने अपने शासन को टिकाने के लिए एवरेस्ट का हिस्सा चीन को उपहार के रुप में दिया था । नेपाली कांग्रेस इस लिए विरोध नहीं करना चाहेगा कि उसके उपर भारत मुखी होने का आरोप लग जाएगा । वैसे नेपाली कांग्रेस भी चीन को एक विकल्प के रुप में रखना चाहता है ताकि भारत के साथ अगर अच्छा समन्वय नहीं रहे तो मन बहलाने के लिए ही सही, ड्रागन का दर्शन हो जाय तो क्या बुरा – मधेशवादी दल तो चुरिया पहाडÞ तक आते-आते ही थक कर हाँफने लगते हैं और सर पकडÞ कर बैठ जाते हैं । एवरेस्ट की उचाई पर चढÞना इनका बूतें से बाहर की चीज है । नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति की समझ नेपाली नेताओं में नहीं है या फिर वे समझना नही चाहते हैं । विवाद की वजह यह है कि सन् ज्ञढछज्ञ में जब चीन ने तिब्बत के उपर कब्जा जमाया उसी समय से एवरेस्ट की चोटी पर चीन की गिद्ध नजर टिकी है । सन् ज्ञढटण् में जब वी.पी. कोईराला प्रधानमंत्री की हैसियत से चीन गए तो उनके समक्ष चीन ने प्रस्ताव लाया कि एवरेस्ट का उत्तरी हिस्सा चीन का है लिहाजा आप इसका र्समर्थन कर दें । नेपाल ने उस समय कडÞा विरोध किया और एवरेस्ट सिर्फऔर सिर्फनेपाल का ही है कह के अपना प्रमाण चीन के समक्ष रखा । परन्तु चीन ने इसे मानने से इन्कार कर दिया । सन् ज्ञढटद्द में जब तात्कालीन नरेश महेन्द्र ने नेपाल में लोकतंत्र की गला रेत दी तो चीन ने उनके इस कदम पर र्समर्थन जताया । इस र्समर्थन के बदले में नेपाल नरेश ने पुरस्कार स्वरुप चीन को एवरेस्ट का उत्तरी हिस्सा ही दे दिया ।
नेपाल के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं वरिष्ठ राजनीतिज्ञ डायमन शमशेर की जीवनी पर आधारित एक किताब प्रकाशित हर्ुइ है “सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट से लेकर नक्खु जेल तक” । इस किताब के लेखक हैं हेमांगराज गिरी । इस किताब के पृष्ठ द्दद्धण् में डायमन शमशेर के कथन को उद्धृत किया गया है कि नेपाल में अब चीन का कोई स्वार्थ नहीं रह गया है । माओत्सेतुंग के समय में ही नरेश महेन्द्र के जरिए यह स्वार्थ पूरा हो चुका है । नरेश ने एवरेस्ट के पिछवाडÞे का हिस्सा सहित अन्दर तक की ज्ञछ मील नेपाली भूमि चीन को दे दिया है । एवज में चीन ने नेपाल में नरशे की पंचायती शासन को टिकाने का आश्वासन भी दे रखा था । चीन का स्वार्थ पूरा हो चुका है लिहाजा नेपाल में उसको और अधिक हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता ही नही है । इस बात की पुष्टि तो तीन वर्षपर्ूव नेपाल के तत्कालीन परराष्ट्र मंत्री ने अन्तरिम संसद के कृषि तथा सहकारी समिति की बैठक में भी कर दी । फिर भी नेपाल में किसी ने इसका विरोध नहीं किया । दक्षिणी पर एक फीट जमीन के लिए पूरे देश में हाय तौयबा मचाने वाले ऋतिक रोशन की टिप्पणी -जिसकी पुष्टी नहीं हो सकी) पर देश में तोडÞफोडÞ करनेवाले हिंसा और आगजनी करनेवाले, एक स्वतंत्र लेखक के विचार -गौतम बुद्ध का जन्म भारत में हुआ) पर पत्रिका के प्रकाशन पर प्रतिबंध की मांग करने वाले गोरखाली मूल के कथित राष्ट्रवादी यहाँ की मीडिया, राजनीतिज्ञ और नागरिक समाज माउण्ट एवरेस्ट पर चीन के झण्डा लहराने के बावजूद खामोश क्यों हैं -
राजधानी से प्रकाशित देश के र्सवाधिक लोकप्रिय दैनिक एक समाचार के अनुसार दोलखा के लामाबगर स्थित उत्तरी सीमा स्तम्भ नं. छठ के करीब चीन के साथ सीमा का विवाद देखा गया है और वह स्तम्भ ही गायब है । नेपाली टोली के अनुसार चीन ने जानबुझ कर यह सीमा स्तम्भ गायब किया है और इस भूभाग को अपने कब्जे में ले लिया है । कुछ महिना पहले नेपाल के नापी अधिकारी को संखुवासभा के किमाथांका क्षेत्र में सीमा का नापी ही नहीं करने दिया । मानसरोवर झील का अवलोकन करने गए नेपाली को वहाँ से विना कारण मारपीट कर खदेडÞ दिया । कुछ महिना पहले नेपाल के भू-भाग में ही घुमने गए नेपाली को रसुवा में अपमानित कर चीन के सैनिकों ने खदेडÞ कर भगा दिया । नेपाल के उत्तरी क्षेत्र के नागरिकों के साथ सीमा पर तैनात चीन के सुरक्षाकर्मियों का व्यवहार असहनीय है बावजूद इसे आसानी से पचाया जा रहा है । चीन के बढÞते कदम को अगर रोकने का प्रयास नहीं हुआ तो वह दिन दूर नही जब चीन काफी करीब आ जाएगा और हम हाथ मलते रह जाएँगे ।

