मधेश के पिछडेपन का कारण राजनीतिक अस्थिरता::रामभरोस कापडि भ्रमर
Print This News
पतिदिन राजनीतिक दलों की बैठक, धमकी, आग्रह और आन्दोलन से फिर नेपाली जनता परेशान हो रही है । कहीं कोई निकास नहीं दिखता है । सत्ता के गलियारे में पायदान के खोज में भटक रहे राजनेता गण नेपाली जनता के नखरों से दूर होने का स्वतः स्फूर्त कवायद में व्यस्त है । सत्य बात एक ही है- नेपाल में यदि राजनीतिक उपलब्धि को संस्थागत करने कार् इमानदार प्रयास यदि कोई दल कर रहा है तो वह एकीकृत नेकपा माओवादी है । उसका अपना एजेण्डा तय है । जनयुद्ध की समाप्ति और १२ बुँदे सहमति के बाद संविधान सभा का निर्वाचन, संसद में धमाकेदार उपस्थिति की रणनीति और फिर सत्ता पर काबिज हो नीति निर्माण से लेकर जनयुद्ध के लडाकुओं का सेना में समायोजन उनका लक्षित उद्देश्य रहा है और इसके लिये पाटी के सभी नेतागण, आपसी असहमति व असन्तुष्टि के बाबजूद भी, ऐक्यबद्ध होकर अपने लक्ष्य प्राप्ति में लगे हैं । नागरिक सर्वोच्चता का स्थापन, राष्ट्रपति क कदम का विरोध, संसद अवरोध व अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की कवायद, मैं समझता हूँ सब एक सोची समझी रणनीति के अर्न्तर्गत किया जा रहा है । और उस खेल में नेपाली काँग्रेस लगायत के दल उलझ कर रह गये हैं ।
संसद सर्वोच्च है, पर निकास दे सकने में कोई भी सक्षम नहीं हो पा रहा है । सडक आन्दोलन में माओवादी पाटी आ चुकी है । दोनो तरफ से वाद-विवाद चल रहा है । नेपाल के उपप्रधानमन्त्री विजयकुमार गच्छेदार ने विराटनगर में पत्रकारों से बातचित करते हुए कहा कि – सदन में अल्पमत के मांग को तरजीह देने वाले सभामुखको अब बहुमत के स्वर का भी सम्बोधन करना होगा । अर्थात् उनका कथन स्पष्ट है जब अल्पमत के एनेकपा माओवादी के हल्ला व नारेवाजी से सदन रोका जा सकता है तो सदन के बहुमत सदस्य की भावनाओं को सभामुख क्यो ‘नोटिस’ नहीं करेंगे – मतलब साफ है- सदन चलाना होगा, वह चाहे मार्सल के प्रयोग करके हो, अथवा बहुमत के आधार पर बजट पास करके हो ।
संसद अवरुद्ध की धूरी में घूम रहा अबका नेपाल व उसके राजनेतागण पर्ूण्ातः भूल गये कि अब जल्दी ही संविधान निर्माण नहीं हुआ तो सचमूच की दर्ुघटना हो सकती है । समय कम है और संसदीय समिति में हो रहा छलफल व विमर्श के अतिरिक्त सरकारी स्तर पर कहीं भी सर्वोच्च नागरिक को यह जानकारी नहीं दे पा रहे हैं कि हम कहाँ है ! हम क्यों निर्धारित समय पर संविधान बना पाने में अर्समर्थ हैं । इस से एक अनिश्चितता बढÞती है, लोग दिन प्रति दिन निराश हो रहे हैं । बहुत से लोग पर्ूव के दिनों का स्मरण कर वर्तमान से कटा-कटा सा महसूस करने लगे हैं । यह लोकतन्त्र, गणतन्त्र के लिय अच्छा सन्देश नहीं है ।
जन आन्दोलन करने वाले लोकतन्त्र व गणतन्त्र की उपलब्धि को भले ही समेट न सकें हों, मधेश आन्दोलन के नीतिकार लोग अभी भी उपलब्धि की प्रतीक्षा कर रहे हैं । कुछेक लोगों का मन्त्रीमण्डल में जाना, न जाना समग्र उद्देश्य प्राप्ति के लिय कोई मायने नहीं रखता । उपलब्धि तो तब होगी जब नयाँ संविधान बने और उसमें संघीय राज्य संरचना मर्ूत रूप ले । मधेश आन्दोलन का एक मात्र निर्धारित लक्ष्य था- संघीय लोकतान्त्रिक राज्य के रूप में नेपालका नयाँ स्वरूप । और वह तभी संभव हो सकता है, जब नयाँ संविधान बन सकेगा । जिसका अभी कोई अता-पता नहीं है ।
एमाओवादी लडाकुओं का तत्क्षण समायोजन व पुनर्स्थापन नहीं किया गया तो न संविधान बनेगा न मधेशी अपना अधिकार ही पा सकते हैं । नेपाली कांग्रेस जैसी लोकतान्त्रिक पाटी भी अभी चूक रही है । बैठक में राष्ट्रपति के कदम के विरुद्ध एक अनुच्छेद तक सहमति पत्र में नहीं रखने का अडान लेती आ रही है, पर उसी बात को आम जनता के बीच पहुँचाने में हिचक रही है । यदि एकीकृत नेकपा माओवादी का अडान गलत है तो उसके गलतियों को जनता के सामने रखने में हर्ज क्या है – अनावश्यक रूप से राष्ट्रपति को मानसिक तनाव में रखने का क्या वजह हो सकता है । २२ दल अपनी भूमिका को संसदीय समिति तक क्यो संकुचित कर आत्मसुख की अनुभूति कर रहे हैं । यदि उसने राष्ट्रपति को प्रधानसेनापति हटाने का तत्कालीन सरकार के निर्ण्र्को तत्काल रोकने का सुझाव दिया था, तो उसके र्समर्थन में नेपाली जनता के बीच जाकर कहने में कोताही क्यों – संसद अवरुद्ध की इस दुखद अवस्था के निराकरण के प्रति राजनेता गम्भीर क्यों नहीं हो पा रहे हैं !
जब तक स्थिति ऐसी बनी रहेगी तो न समय पर संविधान बनेगा और न मधेशी जनता अपना ही अधिकार प्राप्त कर सकेगी । संघीय नेपाल के प्रान्तीय संरचना का सभी माँडल महज कागज में लिखे रह जायेंगे, हम फिर से उन्हीं परम्परावादी सोच वालों के थपेडÞे सहते रहने पर विवश हो जायेंगे । तब हम खुद से प्रश्न करेंगे इतने संघर्षों के वाद भी हमें क्या मिला ! क्या हमें फिर से माघ घ की तरफ लौटना पड सकता है – यदि ऐसा हुआ तो यह किसी के लिये भी सहज नहीं हो सकता । हमें इस पर गम्भीरता से सोचने की जरुरत है ।
राजनेता अभी भी सोचें । एकीकृत नेकपा माओवादी द्वारा संचालित आन्दोलन महज सत्ता प्राप्ति के लिये नहीं है, बल्कि लक्ष्य की तरफ बढÞने से आयी रुकावट को दूर करने के लिये है, जो मैं समझता हूँ पार्टर्ीीहत में सकारात्मक कदम है । हां, यह अन्य दलों के लिये, समय सीमा में बंधा संविधान निर्माण प्रक्रिया के हित में नहीं भी हो सकता है । इसका खामियाजा हमे भुगतना है । आन्दोलनों का दौर महज कुछेक नये चेहरे को रंगमंच पर लाने के सिवा कुछ और होता नजर नहीं आता । मन्त्रीपरिषद की बैठक और उसमें सुरक्षा के तीनों निकायों को र्सतर्क रहने की हिदायत का समाचार बाहर आने पर देश का एक बडा वर्ग जहां प्रसन्नता व्यक्त करने लगा है, वहीं इसे लोकतन्त्र, गणतन्त्र व संघीय संरचना के साथ नयाँ संविधान के स्वास्थ्य के लिय कदापि उचित नहीं माना जा सकता । इन महारथियों को डरना चाहिये । सहमति के साथ नयाँ संविधान बनाने में जुट जाना चाहिये । विगत के असहमतियों को शब्दों के जाल में न लपेटकर सीधे तरीके से आपसी वार्ता द्वारा निराकरण कर संसद को सुचारु करें, बजट पारित करें और अन्य राजनीतिक मुद्दों को निपटाकर जनभावनाओं को पूणता प्रदान करने की कोशिश करें ।

