असफल हो रहा संयुक्त राष्ट्र संघ::अरुण ठकुरी
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वास्तविकता आर्श्चर्य पैदा करती है कि ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ जिसे प्रारम्भिक दौर में संयुक्त राष्ट्र या लीग अफ नेशन्स के नाम से जाना जाता था उसकी परिकल्पना र्सवप्रथम पस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने की थी । जब वह और उसके सैनिक एक-एक करके यूरोप के राष्ट्रों को रौंद रहे थे तब नेपोलियन कहता था – यूरोप एक राज्य है, एक इकाई है जहा“ एक ही कानून और सरकार होनी चाहिए और मैं यूरोप के सभी राष्ट्रों को मिलाकर एक कर दू“गा ।’ सत्ता को अपनी रखैल समझने वाले पस के कोर्सिका टापू के निवासी नेपोलियन सन् ज्ञडज्ञद्द में रुस पर चढर्ई करने के निर्ण्र्के बाद अलोकप्रिय होने लगा और सन् ज्ञडज्ञद्ध में तंग आकर उसने प|स की गद्दी छोड दी । बाद में घटित घटनाक्रम के आधार पर उसे ‘यूरोप का कैदी’ मानकर सेन्ट हेलेना द्वीप में कैद कर लिया गया । विजय के दिनों में ‘यदि आकाश गिरा तो हम उसे भालों की नोक पर रोक लेंगे’ कहने वाले नेपोलियन का सेन्ट हेलेना की निर्जन कैद में दिमाग ठिकाने पर आया तो वह विचार उसके दिमाग में अधिक विशाल रुप में पैदा हुआ – कभी न कभी घटनाचक्र के बल पर यह मेल -राष्ट्रसंघ का) होगा, पहला धक्का लग चुका है और मुझे लगता है कि मेरी प्रणाली का अन्त होने के बाद यूरोप में सन्तुलन कायम करने का कोई रास्ता है तो वह राष्ट्रों के संघ द्वारा है ।’ नेपोलियन के युद्धों के बाद नेपोलियन की परिकल्पना को रुस के जार एलेक्जेण्डर प्रथम ने अलग ढंग से प्रस्तुत किया । अलेक्जेण्डर प्रथम ने बाद मेर्ंर् इसाइ शक्तियों के बीच पवित्र मैत्री संगठन की योजना प्रस्तुत की थी ।
राष्ट्रसंघ की आधारभूत परिकल्पना करीब दो शताब्दी लम्बी यात्रा तय करने जा रही है । बीते दो सौ सालों में संयुक्त राष्ट्रसंघ की आवश्यकता और इसके पवित्र एवं न्यायपर्ूण्ा उद्देश्यों की सफलता के लिए सम्पर्ूण्ा मानवता जितनी आशा एवं शुभेच्छा रखती है, उसकी सोच पर संयुक्त राष्ट्रसंघ आज तक खरा नहीं उतर पाया है । इस संस्था का इतिहास कितना विवादास्पद रहा है इसका अनुमान फिलिप स्नाउडन -जो बाद में इंग्लैण्ड का मंत्री भी बना) की टिप्पणी से लिया जा सकता है । अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के दिमाग की उपज जिसे विल्सन ने ‘वार्सर्ाान्धि’ द्वारा दुनिया के पेश किया, के बारे में स्नाउडन लिखते हैं -
ँयह सन्धि -वार्सर्न्धि) लुटेरों, साम्राज्यवादियों एवं फौजी पेशा लोगों को राजी कर देगी लेकिन जो इस इन्तजार में थे कि युद्ध का अन्त होने पर अमन चैन कायम होगा, उनकी आशाओं का इस सन्धि ने गला घोंट दिया है । यह अमन की सन्धि न होकर दूसरे युद्ध की घोषणा है । यह लोकतंत्र और युद्ध के शहीदों के साथ विश्वासघात है, इस सन्धि ने मित्र राष्ट्रों की असली नियत को उघाडÞ कर रख दिया है ।’
अन्ततः ज्ञज्ञ नवम्बर ज्ञढज्ञड के दिन ‘विल्सोनियन थ्यौरी’ के आधार पर प्रथम महायुद्ध का अन्त हो गया । लेकिन ‘चौदह शतोर्ं’ वाली उक्त सन्धि को शक्तिशाली राष्ट्रों ने ताक पर रख दिया । और फिलिप स्नाउडन के अनुसार दूसरे महायुद्ध की तैयारियाँ होने लगी । संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘विल्सोनियन थ्यौरी’ न तो दूसरे महायुद्ध को रोक पाई न आज तक यह शक्तिशाली राष्ट्रों की स्वार्थ की रोटी बनने से मुक्त हो पाई है । संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रथम महासचिव ली के मुताबिक – ँसंयुक्त राष्ट्रसंघ महान शक्ति के विवादों को सुलझाने में अर्समर्थ है ।’
संयुक्त राष्ट्रसंघ की वर्तमान संरचना सन् ज्ञढघढ अगस्त में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल एवं अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट की न्यू फाउण्डलैण्ड दीप के नजदीक अटलाण्टिक महासागर में जलपोत में हर्ुइ मुलाकात में तय हर्ुइ परिणाम स्वरुप ‘अटलाण्टिक अधिकार पत्र’ निकला जिसमें आठ सिद्धांत थे । कुछ समय बाद अर्थात् ज्ञढद्धद्द में द्दट राष्ट्रों ने वाशिंगटन में संयुक्त राष्ट्रसंघ की उद्घोषण पर दस्तखत किए । आज संयुक्त राष्ट्रसंघ के झण्डे के नीचे ज्ञढद्द राष्ट्र हैं लेकिन ज्ञज्ञ राष्ट्र अभी भी संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य नही है जिनमें स्वीटजरलैंड भी है ।
संयुक्त राष्ट्रसंघ का इतिहास जितना विवादास्पद रहा है, आधारभूत रुप में उसका आधुनिक कालखंड भी उस विवाद से मुक्त नही हो सका है । महान शक्तियों के स्वार्थ के आगे दीन-हीन भाव प्रस्तुत करने वाला संयुक्त राष्ट्रसंघ आज सुरक्षा परिषद एवं सेना की व्यवस्था के साथ सम्पन्न दिखता है लेकिन तीव्र असहमति के बावजूद इराक पर आक्रमण करने के अमेरिकी निर्ण्र्ााऔर अमेरिका निर्ण्र्का साथ देने वाली शक्तिशाली सेना के आगे संयुक्त राष्ट्रसंघ निरीह दिखा । अमेरिकी द्वारा अफगानिस्तान में छेडÞे गए आतंकवाद विरुद्ध की लडर्ई में हो रहे मानव अधिकार विरुद्ध की घटनाओं के प्रति संयुक्त राष्ट्रसंघ उदासीन बैठा है । वास्तव में स्थिति सन् ज्ञढघछ के समय की जैसी ही है जब पचास से अधिक राष्ट्रों की असहमति के बावजूद इटली ने अवीसीनिया पर आक्रमण कर दिया । एक तरफ रोम-वर्लिन-टोकियो एलायन्स और दूसरी तरफ इंग्लैण्ड-प|mान्स-रुस सहमति पर मित्रराष्ट्र की मान्यता का जन्म हो गया तो दूसरे युद्ध का आधार साफ-साफ नजर आने लगा यह ऐसा समय खण्ड था जब संयुक्त राष्ट्रसंघ को दीवालिया समझा जाने लगा ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभव और ‘एटलाण्टिक घोषणा पत्र’ ने संयुक्त राष्ट्रसंघ को अभूतपर्ूव रुप में सुदृढÞ तो कर दिया लेकिन कुछ ही वर्षों में महान शक्तियों के बीच बढÞती असहमति एवं शक्ति के ध्रुवीकरण की अवस्था में अपने हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से असंलग्न आन्दोलन का गठन हो गया । अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच उत्पन्न शीतयुद्ध से खुद को दूर रखने का असंलग्न आन्दोलन का प्रयास संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुँह पर तमाचा था । लेकिन सोवियत विघटन के बाद एक ध्रुवीय संरचना में असंलग्न आन्दोलन कमजोर हुआ तो संयुक्त राष्ट्रसंघ भी अपने उद्देश्यों से इतर विश्व में उत्पन्न हो रहे आन्तरिक द्वन्द्व, व्रि्रोह जैसे किसी देश के नितान्त आन्तरिक मामलों में टाँग अडÞाकर अपने अस्तित्व को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है । लेकिन इस मामले में संयुक्त राष्ट्रसंघ के पास किसी भी प्रकार की नीति एवं कार्ययोजना का नितान्त अभाव है । फलस्वरुप द्वन्द्व और व्रि्रोह के आन्तरिक मामलों में संयुक्त राष्ट्रसंघ का शान्ति प्रयास पर्ूण्ातः असफल रहा है ।
लैटिन अमेरिका एवं अप|mीका में शान्ति प्रयासों की असफलता के बावजूद नेपाल में मूलधार के राजनीतिक दलों एवं माओवादी व्रि्रोही के बीच राजनीतिक सहमति के बावजूद संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा अनमिन के नाम पर मध्यस्थकर्ता की भूमिका के साथ नेपाल के आन्तरिम मामले में टांग अडÞाना गलत था इसका प्रमाण अनमिन के क्रियाकलाप के कारण उत्पन्न हो रहे विवादों से लिया जा सकता है । माओवादी लडाकू के साढÞे तीन हजार हथियारों की संख्या के आंकडÞों पर विश्वास कर उतनी ही संख्या में नेपाली सेना के हथियारों को कन्टेनर में बन्द करके उसका खर्चीला अनुगमन करने का अनमिन का निर्ण्र्हास्यास्पद है । यह वास्तव में अनमिन की क्षमता ही नही उसकी नियत के ऊपर प्रश्नचिन्ह है कि अनमिन शान्ति प्रक्रिया को सकारात्मक निष्कर्षमें पहुँचाना चाहता है अथवा नेपाल के माओवादी द्वन्द्व के साथ-साथ अन्य मुद्दों जैसे जातीय, जनजाति, भाषिक को उठाकर उलझे वातावरण में अपनी वृत्ति एवं सुविधा की रक्षा करना चाहता है – सबसे अहम प्रश्न यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के आवासीय प्रतिनिधि एवं आधारभूत सुविधा से सम्पन्न कार्यालय की उपस्थिति के बावजूद किन विशेष कारणों से अममिन को नेपाल भेजा गया -
स्थापना के शुरुआती दिनों से ही अनमिन की भूमिका विवादास्पद रही है । पर्ूव अनमिन प्रमुख इयान मार्टिन ने अपने व्यक्तिगत विचारों और आस्था को नेपाल के आन्तरिक मामले में घुसाने का प्रयास किया । अनमिन अपनेे प्राप्त मेन्डेट से बाहर जाकर इयान मार्टिन मधेशी, सीमान्तकृत, दलित एवं जाति-जनजाति के मामलों मे संलग्न दिखा । यह बड आर्श्चर्य की बात है कि इयान मार्टिन के नेतृत्व वाला अनमिन एच.आई.भी. एड्स जैसे विषय को नेपाल की शान्ति प्रक्रिया के साथ कैसे जोडÞ सकता है – लेकिन अनमिन एच.आई.भी. एड्स जैसे विषय पर कार्यरत दिखा । मार्टिन की उत्तराधिकारी करीन लेनग्रेन के कार्यकाल में तो संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा नेपाल की सरकार कैसी होनी चाहिए कौन-कौन दल सरकार में होने चाहिए जैसे निर्देश दिए जाने लगे है । हालांकि नेपाल सरकार के विरोध के बाद घुमावरे शब्दों में महासचिव मुन द्वारा क्षमा-याचना की गई ।
यह तो स्पष्ट है कि नेपाल के मामलों में संयुक्त राष्ट्रसंघ अनमिन की नजरों से देखता है और उसके पास अनमिन की रिपोर्ट पढÞने और उसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नही है । क्योंकि आन्तरिक द्वन्द्व के मामलों में न तो संयुक्त राष्ट्रसंघ की कोई स्पष्ट नीति है न कोई सुदृढÞ कार्ययोजना और अनुभव ही । वास्तव में न तो यह संयुक्त राष्ट्रसंघ का वास्तविक कार्य क्षेत्र ही है । लेकिन इसका अर्थ क्या यह है कि अपनी वृत्ति और सुविधा के पक्ष में कोई सनकी व्यक्ति अनमिन प्रमुख बनकर संयुक्त राष्ट्रसंघ को रिपोर्ट भेजता है तो उसकी सनकपर्ण् आस्था वाली रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्रसंघ की नीति बनेगी – पर्ूव अनमिन प्रमुख मार्टिन समाजवादी मान्यता में विश्वास रखता था और उसका विद्यार्थी जीवन ‘आइरिश रिपब्लिकन आर्मी’ के साथ सम्बद्ध था यही कारण था कि मार्टिन के कार्यकाल में नेपाल के कम्युनिष्टों को आवश्यकता से अधिक शंका का लाभ दिया गया । यद्यपि इसके पीछे यूरोप के सुदृढÞ हो रहे समाजवादी पक्ष का प्रत्यक्ष योगदान है । और वर्तमान कालखंड का संयुक्त राष्ट्रसंघ आजतक मित्रशक्ति एवर्ंर् इसाइ शक्ति के बीच पवित्र गठबन्धन के एलेक्जेण्डर प्रथम की मान्यता से मुक्त नही हो पाया है ।
यूरोप का संयुक्त राष्ट्रसंघ में वर्चस्व एवं यूरोप की समाजवादी तुष्टि के कारण नेपाल ही नहीं विश्व में समाजवाद हावी हो रहा है । चूँकि समाजवाद साम्यवाद का प्रवेश मार्ग है इसलिए संयुक्त राष्ट्र में चीन एवं यूरोप के बीच मुद्दों में सहमति दिखती है । यूरोप का यह व्यवहार उसकी अपनी आवश्यकता है क्योंकि दुनिया को तकनीकी बेचने वाला यूरोप आगामी द्दछ वर्षों में एशिया से पीछे पडÞने वाला है । तब के लिए यूरोप को सहयोगी की चिन्ता है जो उसे चीन के नजदीक ला रही है । यूरोपियन यूनियन एवं विश्व बैंक के आर्थिक सहयोग पर चलने वाली संस्था ‘इन्टरनेशनल क्राइसिस ग्रुप’ की नेपाल रिपोर्ट में माओवादियों को करो या मरो कहकर उकसाने का काम और नेपाली सेना के उच्च अधिकारी के पारिवारिक मामलों को रिपोर्ट बनाकर राज्यपक्ष को नीचा दिखाने का काम कहीं न कहीं मित्रराष्ट्र के स्वार्थ की रक्षा कर रहा है ।
रुस के जार एलेक्जेण्डर प्रथम कर्ीर् इसाइ शक्ति के बीच पवित्र गठबन्धन की अवधारणा एवं फिलिप स्नाउडन की टिप्पणी के रास्ते पर चल रहा संयुक्त राष्ट्रसंघ विश्व के सबसे बडÞे साम्यवादी चीन के साथ जो पेंगें बढÞा रहा है उसका कारण सवा अरब चीन की जनसंख्या है जिन्हें आसानी से क्रिश्चियन बनाया जा सकता है जबकि यह सम्भावना एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले विश्व के सबसे बडÞे लोकतांत्रिक राष्ट्र में बिल्कुल नहीं है । शायद यही कारण है कि नेपाल कोर् इसाइयत का प्रवेश मार्ग बनाया गया है । संयुक्त राष्ट्रसंघ का सेकुलरिज्म यूरोपियन क्रिश्चियन द्वारा फैलाए जा रहे ‘क्रिश्चियन सेकुलरिज्म’ का ही षडयन्त्र है । नेपाल का हो या कहीं का हो आन्तरिक द्वन्द्व तो सिर्फबहाना है । वास्तव में संयुक्त राष्ट्रसंघ नेपोलियन बोनापार्ट एवं एलेक्जेण्डर प्रथम की परिकल्पना का ही पालन करता है । निर्धन-कमजोर राष्ट्र तो संयुक्त राष्ट्रसंघ के दर्शक मात्र है । क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद् का गठन न्यायोचित है – भाषा एवं वीटो पावर का प्रावधान किस लोकतान्त्रिक मान्यता पर आधारित है -

