अर्डर अर्डर नो हिन्दी::योगेन्द्र प्रसाद साह
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2066-04-09 साल में सर्वोच्च अदालत ने एक धमाकेदार फैसला सुना दिया – जिसके चलते सुलझती शांति और नया संविधान निर्माण प्रक्रिया की तेजी में नये सिरे से दर्ुर्दिन के काले बादलों का अन्देशा पैदा होने लगा है । लोकहित में सत्य भडÞकाऊ खबरों को कायदे से ही संचार मीडिया छापता है । प्रधान न्यायाधीश मीन बहादुर रायमाझी के इजलास ने, उपराष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी भाषा में शपथ लेने को, राजा महेन्द्र शैली में अवैध घोषित करते हुए पुनः खस नेपाली भाषा में शपथ लेने का आदेश जारी कर दिया है ।
अन्तरिम संविधान काम चलाऊ है । नया संविधान बनने का सिलसिला तीव्र गति में जनप्रतिनिधियों द्वारा जारी है । इसीलिए अन्तरिम संविधान की व्याख्या करके राजनीतिक मुद्दों जिसे सुलझाने के लिये कसरत चल रहा हैं – उस पर पानी फेरना इन्साफ का तकाजा नहीं माना जा सकता है । न्यायालय का मूल उद्देश्य इन्साफ देना होता है । राजनीति करना या दुराचारी शासकों की सन्तुष्टि का आधार बनाना नहीं होता है । पाकिस्तानी पर्ूव न्यायाधीश इफि्तयार खान चौधरी ने राष्ट्रपति मर्ुशर्रफ के तानाशाही संविधान के खिलाफ फैसला सुनाकर वहाँ लोकतंत्र की स्थापना करवा दी है । न्यायाधीश अगर परिवारवादी, जातिवादी, अवसरवादी और पजेरोवादी बन जाय तब उस देश की दर्ुगति निश्चित है । थाईलैण्ड के राजा भूमिबोल सैनिक कू द्वारा भ्रष्ट प्रधानमंत्री थाक्सीन सिनेवात्रा को पदच्युत करके पुनः चुनाव द्वारा लोकतंत्र की स्थापना करवा चुके हैं । इसके विपरीत राजा महेन्द्र ने स्वार्थवश इन्साफ की परम्परा को तिलांजली देते हुए तस्करी को व्यापार घोषित किया । जनतंत्र को बन्दी बनाया, भूमिसुधार को मधेशियों को उजाडÞने का हथकंडा बनाया । न्याय प्रणाली को दरबार का दास समझा – उसका नतीजा यह निकला कि राजा महेन्द्र के परिवार से नशीली औषधी के कारोबारी निकले, कोई अफीम सेवन करने लगा, कोई राह चलते नागरिक की हत्या करने लगा और अन्त में राजा वीरेन्द्र के वंशनाश के साथ राजतंत्र समाप्त हो गया ।
भारत के रंगा-बिल्ला केस में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था । किन्तु इन्साफकर्ता को अच्छी तरह मालूम था कि हत्यारे वे दोनों ही थे । अतः सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा दे दी । सही इन्साफ उसे कहते हैं जो दोषी आत्मा से स्वीकार कर ले । इसके लिए न्यायाधीशों की आत्मा में निष्पक्ष, चरित्रवान और इन्साफ तक पहुँचने की ललक होनी चाहिए । दर्ुर्नियत वाला इन्साफ देश, समाज और आदर्श को बर्बाद करके मृत्युलोक को नरक में तब्दील कर देता है । अमेरिकी अदालत ने गलत फैसला देकर बुश को राष्ट्रपति बनवा दिया और चुनाव में जीत हासिल करने वाले अलगोर हार गए थे । इसी फैसले के नतीजे में इराक जंग आई, अमेरिकनों की मौत आई और अन्त में भारी मन्दी की मार लगी । साठ की दशक में कुछ अमेरिकन लडÞकियाँ स्लिमलेस ब्लाउज लगाकर सडÞकों पर घूमने लगी । शरीफ औरतों ने इसका पुरजोर विरोध किया । मामला अदालत में गया । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा श्रृंगार प्रसाधनों के विज्ञापन के लिए नंगीर्-अर्धनंगी लडÞकियों की जरुरत थी । बस हो गया फैसला स्लिमलेस के पक्ष में । आज स्थिति यह है कि हर तीन सेकेण्ड में एक बलात्कार की घटना घटती है । द्दछ हजार किशोर, किशोरियों से बलात्कार करके कनाडा में मार कर बर्फमें दफना दिया गया । दुश्चरित्र मां-बाप का जीन बच्चों में जाकर स्कूलों में किशोर बच्चे नरसंहार कर रहे हैं ।
भारत के दो न्यायाधीशों अरिजीत पसायत और मुकंदकम शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था – धाराओं में चिपकने से इन्साफ करने में बाधा हो रही हो तब धाराओं से चिपके रहना इन्साफ को धोखा देना है । समलिंगियों को अधिकार सृजित करने के लिए न संविधान में जगह खोजी गई न कानूनी धाराओं में । न्यायाधिशों ने तत्सम्बन्धी कानून बनाने का निर्देश दे दिया है । किसी के अधिकार को हनन से बचाने के लिए संविधान आडÞे नहीं आना चाहिए । उपराष्ट्रपति के हिन्दी शपथ प्रकरण में सर्वोच्च अदालत ने अगर संविधान संशोधन करके ज्ञट वें स्थान वाला मातृभाषा हिन्दी को प्रतिस्थापित करने का निर्देश दे दिया होता तब एक झटके में भर्ूइंफूटा वर्ग -शासकों) में दहशत फैल जाती और नया लोकतांत्रिक संविधान शीघ्र ही सही आकार ग्रहण कर लेता । यही मौका था जातिवादी, परिवारवादी और पजेरोवादी कुसंस्कार छुडÞवाने का । न्यायालय चाहे जितनी हिन्दी की उपेक्षा कर ले अंग्रेजी और हिन्दी विश्व भाषा बनी रहेगी । कार्यकारिणी की तर्ज पर नेपाली खस भाषा में उपराष्ट्रपति को सात दिनों के भीतर शपथ ग्रहण का अल्टीमेटम जैसा अदालत ने फैसला सुनाया है । वह सामाजिक सद्भाव में दरार पैदा कर सकता है । इस बात को सभी जानते है कि प्रथम फैसले से उत्पन्न द्वन्द्व की स्थिति टालने के लिए प्रधानमंत्री माधव नेपाल काफी सक्रिय थे । किन्तु न्यायाधीशों को उनका पहल रास नही आया । वे लोग जबरदस्ती पर उतर आए । इस दर्ुर्नियत वाले फैसले से लोकतंत्र का बहुत नुकसान हुआ है । प्रथम फैसले के बाद ही अपनी तीखी प्रतिक्रिया में उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने इसे दर्ुर्नियतपर्ूण्ा, दुराशययुक्त और पर्ूवाग्रही कहा है । इसी भाषा को तमलोपा, सद्भावना ओर दोनो फोरम पार्टियों ने दुहराया है । यह स्थिति की गंभीरता को उजागर करता है । उपराष्ट्रपति परमानन्द झा अगर नेपाली भाषा में शपथ लेंगे तब ही यह समस्या खत्म होने वाली नहीं है । शपथ बहिष्कार के बाद सजा के भागीदार अगर वे बनाए जायेंगे तब मधेशी व्रि्रोह खुलकर सामने आ जायेगा ।
अन्तरिम संविधान का पालन क्या सिर्फमधेशी और जनजातियों को ही करना चाहिए – अब तक संविधान का आठ बार उल्लंघन हो चुका है । इन उल्लघंनों के लिए सर्वोच्च मौन क्यों है – नमूना जरा देखें । पहलीबार जेठ द्दण्टद्ध साल में संविधान सभा का चुनाव सम्पन्न करना था – नहीं हुआ । फिर अगहन द्दण्टद्ध साल में तय तिथि पर चुनाव न होकर चैत्र द्दड गते द्दण्टद्ध साल में दूसरा संविधान संशोधन द्वारा संविधान सभा का चुनाव हुआ था । दुसरा समावेशीकरण का मजाक उडÞाते हुए द्दट मनोनित सभासदों का तीन बडÞे दलों की राय से सात दलों और माओावदी ने भागबंडा कर लिया । वंचित समुदायों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो गया ।
तीसरा सभी तरह की नियुक्तियों में अंतरिम संविधान के खिलाफ निर्ण्र्ााहोता रहा है । और चौथा उपराष्ट्रपति परमानन्द झा, विजय गच्छदार, उपेन्द्र यादव, महंथ ठाकुर, राजेन्द्र महतो और हृदयेश त्रिपाठी सहित सभी मधेशी सभासदों ने हिन्दी में शपथ लिया है । पाँचवा पर्ूव प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने संविधान द्वारा निर्धारित शपथ पत्र अनुसार शपथ न लेकर जनता के नाम पर शपथ लिया था । और छठा प्रधानमंत्री माधव नेपाल ने प्रधानमंत्री के रुप मेर्ंर् इश्वर और अन्य नाम पर चुपी साधते हुए शपथ लिया था । सातवां पर्ूव प्रधानमंत्री बिना संवैधानिक हैसियत के प्रधान सेनापति रुक्मांगत कटवाल को अपने नौकर की तरह बर्खास्त कर दिया था और राष्ट्रपति ने गैर संवैधानिक तरीके से प्रधान सेनापति की पर्ुनबहाली कर दी ।
क्या अन्तरिम संविधान के धाराओं के पालन की जिम्मेवारी सिर्फमधेशवादी दलों की ही है – गिरिजा प्रसाद कोईराला ने अपने उपर लगे भ्रष्टाचार मुद्दे में सर्वोच्च अदालत के आदेश के अनुसार उपस्थित होकर बयान देने से इन्कार कर दिया था । इस पर उन पर अदालत की अवमानना का मुद्दा चल गया । किन्तु ज्यों ही गिरिजा प्रसाद प्रधानमत्री की कर्ुर्सर्ीीर बैठे सारे मुद्दे कब गायब हो गये – जनता को आज तक पता नही है । द्दण्छद्द साल भाद्र ज्ञद्द गते तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश विश्वनाथ उपाध्याय ने संविधान का अपव्याख्या करके एमाले के प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी की सरकार को गिरवा दी थी । सात वर्षों के अपने काठमांडू प्रवास के बाद लौटे समाजसेवी विद्वान जाँन फादर ने मनमोहन जी की सरकार गिरने के बाद कहा था – अगर उनकी सरकार टिक गई होती तब नेपाल प्रगति की राह पकडÞ लेता । यानि जानबूझकर संवैधानिक ट्रैक से बाहर जाकर भी खस ब्राहृमणवादी सोच, इस देश से नियोजित रुप में गरीबी नहीं हटने दे रही है । आदिवासियों के हक हित सम्बन्धी मुद्दों में सर्वोच्च अदालत ने राजनीतिक तौर पर सुलझाने का फैसला दिया था । क्या हिन्दी राजनैतिक मुद्दा नहीं है – क्या खस ब्राहृमण भगोडÞे भारतीय नहीं है – तब उनकी भाषा नेपाली कैसे हो गई – असल में र्राई, गुरुंग, कच्छारी, राउटे, शर्ेपा, लिम्बु भाषा इत्यादि ही नेपाली भाषा है । हिन्दी तर्राई की शुद्ध नेपाली भाषा है । क्या लोकगीत रचयिता कवि विद्यापति नेपाली थे – जिनके नाम पर ज्ञ करोडÞ रुपये की राशि बजट में दिया गया है – मैथिली, भोजपुरी और अवधी भी भारत में नहीं बोली जाती है -
शांति सेना में खटने वाले जवानों के वेतन और सुविधा का हिसाब सर्वोच्च अदालत मांगते रह गया – किन्तु मिला नहीं । तब सर्वोच्च अदालत की अवमानना नहीं हर्ुइ थी – विदेशों से डाँलर में प्राप्त अनुदान, कर्ज और सहयोग राशियों को जाँचने का अधिकार महा लेखापाल को नहीं दिया गया है । पहाडÞी उच्चवर्ग इस राशि को हडÞप लेता है और कर्ज चढÞता है मधेशियों, जनजातियों और दलितों पर । इस पर सर्वोच्च अदालत मौन क्यों है – संसार जानता है कि नेपाल भ्रष्ट देशों में ख्याति प्राप्त देश है । ट्रान्सपरेंसी इन्टरनेशनल ने अपनी सूची में इस देश को ज्ञद्धद्द वें स्थान पर रखा है । किन्तु एक भी प्रधानमंत्री, मंत्री, सिंह दरबार के सचिव, वरिष्ठ कर्मचारी नेता दंडित नहीं हो सका है । सर्वोच्च अदालत ही बताए कि इस देश में भ्रष्टाचारी कौन है – ठद्दण् पक्की पुल द्दण् वर्षों मी जर्ीण्ा अवस्था में पहुँच चुके हैं – इनका जिम्मेवार कौन है – जब कि पुरानी प्रविधि से बना बैरगनियाँ-ढेंग -भारत) बीच का रेल पुल ज्ञण्ण् वर्षों से आज भी कायम है । इस पर सरपट रेलगाडÞी दौड रही है । अभी कुछ दिनों पहले ही केन्द्रीय बार एशोसिएसन ने न्यायाधिशों पर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया था । इस पर बार के केन्द्रीय अध्यक्ष पर मानहानी का मुद्दा भी सर्वोच्च अदालत में दायर हुआ था । जब वकील अडÞ गये तब एक समझौता के तहत मामले को रफादफा न्यायाधीशों ने कर दिया था । कई राजनीतिक मुद्दें अदालत में काफी दिनों से विचाराधीन है – जैसे प्रधान सेनापति बर्खास्तगी प्रकरण । किन्तु जल्दीबाजी में हिन्दी प्रकरण ही क्यों सूझा -
हिन्दी भाषा वाला फैसला देशहित में नही है । इस फैसला से देश में अशान्ति फैलने का खतरा उपस्थित हो गया है । जरुरत है संविधान संशोधन करके हिन्दी को राष्ट्रभाषा में स्वीकार कर लेने की । नेपाली भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में ज्ञद्द वें स्थान पर है । भारतीय नेपाली जनजातियों में र्राई, गुरुंग, लिम्बु, लेप्चा, शर्ेपा इत्यादि मातृभाषाएं बोली जाती है । किन्तु विदेशी भाषा नेपाली को इन लोगों ने सर्म्पर्क भाषा के लिए चुन लिया है । नेपाल से हमेशा ही खस नेपाली भाषा के विद्वान भारत के दार्जिलिंग में जाकर बहुत पहले से सहयोग करते रहे हैं । इसी सिलसिले में ज्ञढद्दर्द्धर् इ. में दार्जिलिंग जाकर धरणीधर कोइराला ने एक कविता पढÞी थी – तर आफ्नो भाषा न पाई अक्क बक्क पर्छन् । चार दिन में जान्ने कुरा वर्षदिन मा सिक्छन् । -आभाष कांतिपुर द्दछ अगस्त ण्ढ) क्या यही सिद्धान्त हिन्दी पर लागू नहीं होता है – हिन्दी भाषी -तर्राई में बसने वाले) विद्वान कभी नेपाली भाषा का पुरस्कार प्राप्त करने में सफल रहे
है – नेपाली उच्च वर्ग से एक लेखक की उक्ति देखिए – खास गरी दार्जिलिंग, सिक्किम, भूटान अझ भनौं सम्पर्ूण्ा उत्तर पर्ूर्वी भारतमा रहेका विभिन्न जात र थरका नेपालीले किन नेपाली भाषा नै अपनाएका होलान् – -आभास कांतिपुर द्दछ अगस्त ण्ढ) ।
इसी तज पर मैथिली, अवधि और भोजपुरी भाषी जमात सर्म्पर्क भाषा के रुप में हिन्दी बोलता है तब अपराध कैसे हो गया – आर्श्चर्य तो यह है कि यही लेखक हिन्दी सर्म्पर्क भाषा के खिलाफ जहर उगलने से नहीं चूकते । राष्ट्रीय पोशाक और नेपाली भाषा में शपथ लेकर भी राष्ट्र के साथ राष्ट्रघात करने वालों की सूची कम नहीं है । यह देश की जनता से छिपी बात नहीं है । दबाब में राष्ट्र के हित के लिये शपथ खाने वाले का आचरण कैसा होगा – असल में हिन्दी भाषा का प्रश्न उलझाना मधेशियों के शोषण करने का हथकण्डा मात्र है । भाषा सम्बन्धी प्रश्न सर्वोच्च अदालत द्वारा संविधान सभा में सौंपा जाना चाहिए था । इस देश में रंगे हाथों पकडÞे गए नशीली औषधि के तस्करों की रिहाई हो जाती है । नाम में र्फक पडÞ जाने से जघन्य अपराधी छोडÞ दिए जाते हैं । काग के साथ पकडÞे गए और जेल सजा काट रहे अपराधियों को आम माफी मिलती है । मधेश में भूमि विवाद बढÞाने के लिए न्यायिक सहारा दिया जाता है । किस संविधान के तहत सिर्फपहाडÞी समुदाय को सुकुम्बासी मानकर तर्राई के जंगलों को उजाडÞा जा रहा है – क्या सर्वोच्च अदालत को इसका इन्साफ नहीं करना चाहिए – सुनसरी में टछ हजार निवेदनों में से ठ हजार पहाडÞी सुकुम्बासियों को लालपर्ुजा मिल चुका है । हाथियों को आवाजाही में रुकावटे आ रही है । अब सरकार ने बाली क्षतिपर्ूर्ति के रुप में ज्ञ लाख रुपये बांटने का एलान कर दिया है । यह पुरस्कार पहाडÞी सुकुम्बासियों को जंगल विनाश के लिए दिया जाने वाला है । क्या उन ठ हजार लालपर्ुजा धारियों में कच्छारी, हरिजन, थारु और मधेशी भीखमंगों से एक भी नाम सम्मिलित है -
पाँच न्यायाधीशों द्वारा अल्टीमेटम वाला हिन्दी भाषा में शपथ ग्रहण वाला फैसला मानने से उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने इन्कार कर दिया है । उनका कहना है कि – शपथ ग्रहण की भाषा मेरी होगी । सर्वोच्च अदालत को उपराष्ट्रपति पद से हटाने का संवैधानिक अधिकार नही है । तमलोपा, दोनों फोरम, सद्भावना पार्टर्ीीे साथ ही माओवादी संगठन ने हिन्दी शपथ ग्रहण को जायज माना है । न्याय समिति के माओवादी सभापति प्रभु साह की अगुवाई में द्दड सभासदों ने एक विज्ञप्ति द्वारा उपराष्ट्रपति परमानन्द के कदम का र्समर्थन किया है । भारत से जोडÞकर मधेशियों को दबाने की की कोशिशें हुयी तब दुष्परिणाम चीन, भारत और नेपाल तीनों देशों को भोगने होंगे । देखें प्रधानमंत्री माधव नेपाल परिस्थिति को गंभीरता से समझते हैं कि नहीं ।


jay Says:
nice
Posted on September 14th, 2009 at 12:51 pm
Pankaj Jha Says:
हिन्दी को किसी ऐसी मदद का मुहताज मत बनाइये. सीधी सी बात है जिस देश में रहे उस देश की भाषा और संस्कृति का सम्मान पहले होना चाहिए.हम भारतीय को ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था कि परमानन्द झा जी ने बिना मतलब हिंदी को वहाँ विवाद का केंद्र बना दिया.अतः ऐसे किसी भी आन्दोलन की कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए जो नागरिकों को एक दुसरे के बरक्स खडा कर दे. लड़ने के लिए वैसे ही बहानों का ढेर लगा हुआ है दुनिया में.वैसे आपके प्रयास के लिए निश्चय ही साधुवाद आपको.
Posted on October 19th, 2009 at 8:18 am