विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत संगम::मनीषा मिश्र
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सिर्फआसन प्रणायाम करनेवाले योगी नहीं, वे सिर्फकथावाचक नहीं, वे सिर्फआचार्य नहीं, वे एक उपदेशक नहीं बल्कि वे तो पृथ्वी पर प्रत्येक धर्म के मूल पुरुष के प्रेम प्राप्त सबके सामने एक साक्षात उदाहरण है । यदि किसी हिन्दू को अपने शास्त्रों पर शंका हो तो वह उनसे मिल सकता है क्योंकि शास्त्रों के रचयिता महषिर् वेदव्या;m महषिर् भारद्वाज, महषिर् दर्ुवाशा के साथ उन्होनें बैठक की है ।
यदि किसी मुसलमान को कुरान समझना है तो वह उनसे मिल सकता है क्योंकि बाबाजी पैगम्बर साहब का सान्निध्य पा चुके है । यदि किसर्ीर् इर्साई कोर् इसा मसीह पर संदेह है तो बाबाजर्ीर् इसामसीह से मिल कर आए हैं और उनके सुविचारों से अवगत कराएंगे । यदि किसी सिक्ख को नानकजी का स्वरुप पूछना है तो वह बाबाजी से मिल सकता है, क्योकि बाबजी नानक देवजी का पे्रम पा चुके है ।
पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं, मत नहीं, संप्रदाय नहीं जिसके मूल स्रोत महापुरुष का बाबाजी को दर्शन, साक्षात्कार नहीं । वे प्रत्येक धर्म का, सत्य का, परम शक्ति का, तपस्या का, जीवित प्रमाण बनकर समाज मे घूम रहे हं ।
जन्म – उनका जन्म भारत के विहार राज्य के रोहतास जिल्ला सासाराम के राजघराने में हुआ था ।
अध्ययन – उनका अध्ययन दार्जिलिङ सेन्टपाल मंे हुआ था और अन्तिम शिक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से आर्ग्यानिक केमेस्ट्री मे एम.एस.सी. ।
वो एक प्रसिद्ध जेट फाइटर प्लेन चालक, वीर एवं देशभक्त है । इसी कारण उनका नाम पाइलट बाबा पडा । उनका नाम गिनिज बुक मे ीयधभकत ँष्निजत ज्ष्भच के नामसे रर्ेकर्ड किया गया है ।
वे विश्व के एकमात्र अति उच्चकोटि के क्रियायोगी है, जो निर्विकल्प समाधि लगाते है । वे बहुत बार हिम समाधि, थल समाधि और जल समाधि लगा चुके हैं ।
बाबाजी को नेपाल से बहुत पे्रम है, क्योंकि नेपाल उनकी गुरुभूमि है । नेपाल के नारायणी नदी के किनारे मकवानपुर, भैंसेके त्रिखण्डी कुटी मे परम् पूजनीय हरिबाबाजी और गुरु गोरखनाथ द्वारा वे दीक्षा प्राप्त किये । उन्होनें महाअवतार बाबा से क्रिया योग की दीक्षा प्राप्त की है ।
नेपाल के राजसी परिवार की बहू सर्ूयापति के मर जाने के बाद प्रतारित होकर पुरुष जाति से तिरस्कृत होकर मरना चाहती थी । तभी एक कपालिक आघोर निमाईनाथ के सम्मोहन में सर्ूया घिरती चली गई, वह पर्ूण्ा योगिनी बन गयी ।
लेकिन वह अघोरियों के बन्धन मे बंधकर छटपटा रही थी । बाबाजी ने उसे सभी अतृप्त आत्माओं अघोरों और तान्त्रिकों से उसे मुक्त कराया ।
हरिबाबा बचपन से ही बाबाजी को हरेक दर्ुघटनाओं से बचाते आ रहे थे । एक बार जब जे नेफा की घाटियों के उपर फ्लाइट से उड रहे थे तो अचानक विमान में गडवडी महसूस हर्ुइ । ए.टी.सी. से सम्बन्ध टूट गया । सब प्रयास बेकार जा रहे थे । वे पैराशूट से कूदकर मौत को चकमा दे सकते थे लेकिन वो राष्ट्रकी सम्पत्ति की सुरक्षा कर रहे थे अपने जीवन को दांव पर लगाकर । जिन्दगी और मौत के बीच पलक झपकने से भी कम समय रह गया था । तभी विमान में झटका लगा और वो तेजी से उपर उठने लगा और सभी सर्म्पर्क सूत्र कार्य करने लगे । अब विमान को कपिल नहीं हरि बाबा बडे आराम से चला रहे थे । आज फिर उन्होनें कपिल को मौत के हाथों से छिन लिया । विमान जमीन र्स्पर्श कर जैसे ही दौडा हरिबाबा गायब हो गए । कपिल सोचने लगे – हरिबाबा की क्षमताओं की सीमा क्या है – और वे मुझसे क्या पाना चाहते है जो ऐसी सुरक्षा देते हैं -
इन्ही घटनाओं के बाद उनमे बैराग्य आ गया और वे सबकुछ छोड कर वर्षों हरिबाबा को खोजते रहे पर हरिबाबा कहीं मिलही नहीं रहे थे । वे हरिबाबा हर संकट में संकट मोचन बनकर स्वयं ही प्रकट हो जाते थे । वे अबतक झलक को दिखाने को भी तैयार नहीं थे ।
बाबाजी काठमाण्डू मे पुनः हरिबाबा की खोज में लग गये । शिवरात्री के मेला के समय पशुपतिनाथ मंदिर का दर्शन करने के बाद हरिबाबा को निकलते देखा, दौडकर उनतक पहुँचना चाहा तो वे भीड मे खो गये । बाबाजी सोच रहे थे कि महलों से निकाल कर सडÞक पर धक्के खाने के लिए छोड दिया अब मेरी तरफ ध्यान न देकर मुझे तडÞपा रहे हैं ।
तभी एक साधु गा रहा था -जो मै ऐसा जानता,
पे्रम करे दुख होय ।
नगर ढिढोंडा पीटता,
पे्रम करे नय ।
बाबाजी को अपने हृदय की हालत का चित्रण इस भजन में मिल गया । फिर एक ट्रक पर थोडÞी दूर चलने के बाद नारायणी नदी के किनारे उतर कर पैदल चलने लगे । नारायणी नदी पार करके बीहड जंगल मे प्रवेश कर गये । पूरी तरह से थक कर जब एक पत्थर पर बैठ गये तब हरिबाबा हाथ में कुल्हाडी लिए और कन्धों पर लकडी का एक गठ्ठर लिये हुए आये । हरिबाबा का र्स्पर्श होते ही कपिल के शरीर की थकान मिट गई । जहाँ से उन्होनें हाथ पकडा था वहाँ से बिजली तरंग की तरह वस्तु तरंगित होकर दौडने लगी । हरिबाबा उन्हे खींचते हुए गोरखनाथबाबा के पास लेकर आये । गोरखनाथबाबा बोले – आओ पथिक । तुम्हारे लिए हम एक युग से प्रतीक्षा कर रहे थे । वे दोनों महात्मा उन्हे त्रिखंडी के महादेव मन्दिर मे ले गये । वहाँ उन के लिए पहले से आसन तैयार था ।
गोरखनाथबाबा गुफा के एक किनारे बैठकर अपने शरीर छोडकर कपिल के शरीर में प्रवेश कर गये । कपिल सूक्ष्म शरीर से सब देखरहे थे । पर वे शक्ति शून्य बन गये थे । अब वे मात्र एक दर्शक थे, हरिबाबा और गोरखनाथबाबाजी की चमत्कारपर्ूण्ा कार्यशैली का ।
अब गोरखनाथबाबाजी ने हजारों मील दूर आकाश मार्ग से पलभर में ही तय कर ली । पहुंच गये कपिल के गांव उनकी माँ से खीचडÞी की भिक्षा मांगने ।
सब वहाँ बिलखकर पूछ रहे थे – “तूने ये क्या किया -”
योगी कर्ेर् इ नहीं थे । पर कपिल के सब अपने थे । देह धारण करने वाला अडिग भिक्षा के लिये अलख जगा रहा था । मां ममता नियन्त्रितकर भीतर जाती है और आंचल मे भरकर चावल-दाल लेकर आती है । योगी के उपर थोडा अक्षत फेंककर आशर्ीवाद देती है । “युग-युग जीओ मेरे लाल” फिर योगी की परिक्रमा कर के उस के खप्पड में खिचडÞी डाल देती है ।
माँ ने कहा – योगी मै तुझे पहचान गयी हूँ, तुम वह नहीं हो जिसे मैने पैदा किया है । योगी जाओ उसे कह देना ममता सदैव पे्ररणा देती है, जीव शरीर देता है, साधक साधना देता है वह बन्धन में नहीं रखता है ।
धन्य है वह माता, उनकी जयजयकार है । जो संयमित रह कर जीवन बिताती है और योग्य संतान को जन्म देकर महान त्याग करने में हिचकिताती नहीं, विश्व उन का ऋणी है हिमालय उनका एहसानमंद है ।
बाबाजी कहते हैं पर्ूव जन्म अन्धविश्वास नहीं है, तथ्य है । आत्मा और पर्ुनर्जन्म के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता । आधुनिक वैज्ञानिक भी समस्त दृश्य और अदृश्य जगत मानते हैं । सूक्ष्म तरंगों से बना प्रमाणित कर रहे हंै । इन तरंगों में तीन मुख्य तत्व हैं – जीवाणु, ऊर्जा और विचार । आत्मा इन तीनों का बिशिष्ट स्वरुप है ।
प्रसूति विज्ञान का एक ही महत्वपर्ूण्ा सूत्र है – सेन्टोजनी रिपीट्स फैलोजनी अर्थात माँ के गर्भाशय में मानव शिशु के पर्ूण्ाता से पहले विन्दु -र्स्पर्म) के रुप मे स्थापित जीव सम्पर्ूण्ा चौरासी लाख योनियों का रुपाकार बदलते-बदलते मनुष्य आकृति प्राप्त करता है । विन्दु रुप बीज एक तरह का अमीबा जैसा जीव होता है, जो अपने ही प्लाज्मा मे से एक से दूसरा ष ९अभिि० पैदा करके दो बनजाता है । सृष्टिमे दोषों वाले जीवको “डायटम” कहते है । दो से चार, चार से आठ, आठ से सोलह, इस क्रममे कोशिका का विस्तार सृष्टि के अनेक जीवों की सक्ल लेता हुआ विकसित होता है । कभी मछली कभी मेंढक जैसा बनता है तो कभी बकरी और बैल जैसा । प्रकृति के यह रहस्यमय लीला प्रभु के अतिरिक्त भला कौन समझ पायेगा – पर इस सत्य से पर्दा पूरी तरह उठने लगा है और विज्ञान भी अध्यात्म की राह पकडÞने के लिए बेताव है ।
अष्टांग योग भी कुछ ऐसा ही विज्ञान है जिस मे जड तथा चेतन दोनों ही प्रकार के परमाणुओं का इस तरह विकास होता है कि प्रकृति के पांचो तत्व पुथ्वी, जल, पवन, अग्नि तथा आकाश भी पर्ूण्ाता मिले, ताकि पांच प्रकार के प्राणो -प्राण-अपान, समान, उदान तथा ब्यान भी अपनी पर्ूण्ाता प्राप्त करे । यह पर्ूण्ाता ही अणु विभु लघु विराट बनाकर “यत्ब्रहृमाण्ड तत्पिण्डे” पिंड -शरीर) मे ही विराट ब्रहृमाण्ड का बोध करा देती है । बिन्दु से ब्रहृमाण्ड तक की इस यात्रा का नाम ही अष्टांग योग है ।
अध्यात्म विज्ञान, आत्मा के अनुसंधान के लिए कहता है । इस पांचभौतिक शरीर के पांचो तत्वों की लघुता और प्रभुता की खोज कर लेने पर्रर् इ भी मानव आत्मविज्ञानी बनकर ब्रहृमाण्ड की खोज कर सकता है । तब आज के विज्ञान को इतना भटकना नहीं पडÞेगा ।
हमारी सुषुम्ना -स्पाइनल कार्ड) के अन्दर क्या है – विज्ञान को वहाँ पहुँचने का प्रयास करना चाहिये । जहाँ विज्ञान समाप्त होता है वहाँ से योग प्रारम्भ हो जाता है । विज्ञान बाहर की ओर कार्यरत है तो योग अन्दर की ओर । दोनों की प्रक्रिया एक तरह की है । मेरुदण्ड, स्पाइनल कार्ड के दोनो ओर घनात्मक और ऋणात्मक विद्युत प्रवाह अनवरत चलता रहता है जिसे ‘पिंगला’ और ‘इडÞा’ नारी कहते है । सांइन्स उसे प्रोटोन और इलेक्ट्रोन कहते हंै । स्पाइनल कार्डए के अन्दर सुषुम्ना का प्रवाह है, जिसे न्युट्रोन कहा जाता है । सुषुम्ना के अन्दर ब्रहृम रंघ्र है, जिस पर संघात होने से अनुभूतियों का अलौकिक संसार दृष्टिगोचर होने लगता है, जिसमंे मनुष्य स्वयं की पराकाष्ठा और आत्मीय पराभाव जानकर ब्रहृमाण्ड के मायावी लोक-लोकान्तरों का अवलोकन इच्छानुसार कर सकता है ।
इतना ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्म जाननें वाले हमारे बाबाजी बहुत ही सरल हृदय है, वो सभी को अपना शिष्य बनाते है । उन की दीक्षा की प्रक्रिया बहुत ही अनोखी है । वो दीक्षा के दौरान एक रुद्राक्ष देते है जिसमंे वो संकल्प करके रखते है कि जब तक यह रुद्राक्ष गले में रहेगा तब तक उस शिष्य की आकस्मिक दर्ुघटना से मृत्यु नहीं होगी ।
वैसे तो विश्व के ज्ञटण् देशों में लगभग द्द करोडÞ तक उनके शिष्य है । मैने भारत और नेपाल के सभी उच्च पदस्थ नेता और कर्मचारी को उनके सामने समर्पित होकर शिष्य बनते हुए देखा है ।
ऐसे संत सद्गुरु पाइलट बाबाजी -कपिल अद्वैत) के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है ।

