खिसकती जमीन::पिताम्बर दाहाल
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नेपाली कांग्रेस महासमिति की बैठक काठमाण्डू में सम्पन्न हई । आयोजक केन्द्रीय समिति ने तीन दिन की कार्यतालिका निर्धारण किया था । लेकिन बैठक चार दिन तक चला । नेपाल के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस सबसे पुरानी पार्टी है। इसने कई बार नेपाल में सरकार का नेतृत्व किया । वर्तमान सत्ता समीकरण में भी कांग्रेस ही प्रमुख घटक है । कांग्रेस महासमिति की बैठक सिर्फउसके लिए ही नही बल्कि नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में भी बडा महत्व रखता है । कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला महासमिति बैठक के पक्ष में नहीं थे । उन्होंने बैठक न बुलाने का निर्देश भी दिया था । उनके मना करने के बावजूद भी बैठक का आयोजन किया गया ।
इससे साफ जाहिर होता है या तो सभापति कोइराला पार्टी में साफ कमजोर पड गये हैं या उन्हें मनाने में दूसरे नम्बर के नेतागण कामयाब हो गए । अनेक आशंकाओं के बीच बैठक प्रारंभ हर्इ । अन्ततोगत्वा सभापति कोइराला ने ही बैठक का उद्घाटन करके इसको वैधानिकता प्रदान कर दिया । देशभर से ज्ञद्द सय छट में से करीबन ज्ञज्ञ सय सदस्यों ने इस बैठक में हिस्सा लिया । इसबार सदस्यों की संख्या कांग्रेस के टद्ध वर्षके इतिहास में सबसे बडा है । विधान के मुताबिक प्रत्येक साल महासमिति बैठक होना है । लेकिन कांग्रेस विधान से नही बल्कि नेताओं से चलने वाली पार्टीने के कारण उनकी इच्छा अनुसार बैठक बुलाया जाता था । पार्टीकीकरण को वैधानिकता देने के लिए दो साल पहले महासमिति की बैठक काठमाण्डू में हर्इ थी । उस बैठक में नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला और प्रजातांत्रिक कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउवा ने दोनों पार्टी के एकीकरण के दस्तावेजों में हस्ताक्षर करके पार्टी एकीकृत किया था । ऐलान किया गया था कि दोनो पार्टी एक हो गए । लेकिन आजतक कांग्रेस में आपसी विश्वास, एकता और आत्मीयता का विकास नही हो पाया है । यान्त्रिक रुप से पार्टीकीकृत हो तो गयी । लेकिन गुटगत भावना आजतक बरकरार है । इसी बजह से संगठन के भीतर अनुशासनहीनता पनप रही है । कांग्रेस महासमिति सदस्यों ने इस बारे में चिन्ता जतायी और आगे की यात्रा सहज बनाने के लिए अपना-अपना सुझाव भी दिया ।
संविधानसभा निर्वाचन में कांग्रेस पूरी तरह पराजित हो गयी । ज्ञ सय ज्ञद्ध निर्वाचन क्षेत्र में मजबूत पकड रखने वाली पार्टीवल घठ स्थान में ही सिमट कर रह गई । इस करारी हार की वजह क्या है – इस बारे में पार्टी उच्च नेतागण क्यों मौन है – क्यों किसी ने पराजय की नैतिक जिम्मेवारी नही ली – निर्वाचन परिणाम को लेकर हर पार्टी समीक्षा की जाती है । लेकिन कांग्रेस के नेतागण चुप्पी साधे बैठे रहे । इस सर्न्दर्भ में सहभागी सदस्यों ने कांग्रेस नेतृत्व को जमकर आलोचना की । राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों की उद्दण्डता एवं हरकत सामाजिक सहिष्णुता को चुनौती दे रहे है । दण्डहीनता उपस्थित होने से अराजकता पनप रही है । अधिकार प्राप्ति के बहाने लोगों को आतंकित किया जा रहे है । शान्ति और सुरक्षा लोगों से दूर भागते जा रह हं । ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस को क्या करना चाहिए – राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ दलीय सहमति में इन समस्याओं को निपटाने का सुझाव बैठक में प्रस्तुत किया गया ।
कांग्रेस का पकड तर्राई-मधेश में मजबूत था । यहाँ के लोगों ने कांग्रेस का हमेशा साथ दिया । लोग उसकी महिमा गाते थे । कांग्रेस का जनाधार तर्राई-मधेश था । लेकिन इसबार लोगों ने कांग्रेस को पीठ दिखा दिया । जिन लोगों का परिचय और पहचान ही कांग्रेस था वे क्यों कांग्रेस से दूर होना चाहते हैं – उनका दर्द क्या है – इस बारे में गंभीर और भावपर्ण् विचार विमर्श महासमिति बैठक में हुआ । मधेश आन्दोलन में कांग्रेस नेताओं की अदूरदर्शी नीतियों के कारण यहाँ के लोग कांग्रेस से नाराज हो गए हैं । उन लोगों की भावना का सम्मान करते हुए जनसंख्या के आधार पर राज्य के निर्ण्यक तह में समावेशीकरण की नीति अपनाने का महत्वपर्ण् सुझाव महासमिति बैठक ने दिया । राज्य पुनःसंरचना के प्रस्ताव भी बैठक में केन्द्रित रहा । मधेशवादी पार्टीियों ने समस्त मधेश एक प्रदेश का नारा दिया है । मेची से महाकाली तक का इतना बडÞा भू-भाग कैसे एक प्रदेश बन सकता
है – प्रदेश रचना का मतलब विभाजन नहीं है । केन्द्रीकृत राज्य के असीमित अधिकारों को प्रदेशों में स्थापित करना है । इसमें पहचान का आग्रह भी दबाब के रुप में बढÞता जा रहा है । इसलिए कांग्रेस ने ज्ञठ प्रदेश की रचना का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था । प्रदेशों का निर्माण राजनीतिक सहमति से होना चाहिए । अधिकांश महासमिति सदस्यों का सुझाव था – ‘आर्थिक सम्भाव्यता, भौगोलिक अनुकूलता, प्राकृतिक स्रोत और साधन का उपभोग पर विशेष सावधानी अपना कर प्रदेशों का निर्माण होना चाहिए । हमारी परम्परा, संस्कृति, अपनी-अपनी मातृभाषा को संवैधानिक मान्यता प्रदान करके उनकी आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहिए । मुद्रा प्रणाली, परराष्ट्र संबन्ध, रक्षा, अंतर्रर्रीय सम्झौते, कुटनीतिक नियुक्ति, राष्ट्रीय राजमार्ग, रेल विभाग केन्द्र सरकार के अधिनस्थ होना चाहिए । इसके अलावा सम्पर्ूण्ा अधिकार प्रदेशों में होना चाहिए ।’
नेपाली कांग्रेस देश की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक पार्टी है । इसके संस्थापक नेताओं ने भारत और नेपाल दोनों देशों में अधिकार प्राप्ति के लिए संर्घष्ा किया । कांग्रेस लोकतांत्रिक पार्टीर्ीीोकर भी उसके आन्तरिक जीवन में लोकतांत्रीकरण की पद्धति का निषेध था । कांग्रेस सभापतीय पद्धति से संचालित होती आ रही थी । अर्थात् र्सवाधिकार सम्पन्न सभापति होते थे । द्दण्द्धड से पहले कांग्रेस महाधिवेशन में सिर्फसभापति चुने जाते थे । धीरे-धीरे छण् प्रतिशत केन्द्रीय सदस्यों को चुनाव से आने की अनुमति मिली । फिर भी पदाधिकारी समेत छण् प्रतिशत सदस्यों का मनोनयन सभापति अपनी मर्जी से करते थे । कांग्रेस नेतागण जनता के प्रति उत्तरदायी न होकर अपने सभापति को खुश रखने में लगे रहते थे । अर्थात् कांग्रेस ‘हाई कमान’ तक पहुँचने का मार्ग सभापति की इच्छा से निर्धारित होता था । लोकतांत्रिक पार्टीर्ीीे भीतर अलोकतांत्रिक पद्धति पनपता था । सभापति के र्इदगिर्द रहने वाले सब ‘पार्लियामेन्ट’ टिकट से लेकर अन्य राजनीतिक नियुक्तियाँ हथियाने में कामयाब होने लगे । जनता के बीच लोकप्रिय रहनेवालेे नेताएं कार्यकर्ता पीछे रह गए । इससे देश भर के कांग्रेस जनसभापतीय पद्धति से नाराज थे । उसे बदलने का इरादा रखे हुए थे ।
सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला ने अपने उद्घाटन भाषण में मौजुदा विधान को न बदलने का आग्रह करते हुए महासमिति सदस्यों से कहा, ‘कांग्रेस का परिचय और पहचान सभापतीय पद्धति है, इसको बदलने से कांग्रेस का इतिहास मिट जाएगा । कांग्रेस की पहचान गुम जाएगी’ । सभापति महोदय के इस कथन से सहभागी सदस्य हैरान हो गए । उनके बीच एक प्रकारका सन्नाटा छा गया । विधान परिवर्तन का विषय और गम्भीर हो गया । इसलिए बैठक की दो तिहाई अवधि विधान संशोधन बहस में ही बीत गयी ।
सबको बराबरी का अधिकार देना, समावेशी भागीदारी के आदर्शों को कांग्रेस विधान में सुनिश्चित करना और वर्तमान की चुनौतियों का सामना करने के लिए पार्टी सम्पर्ण् पदों में चुनाव होना जरुरी हो गया था । पार्टी नयी सोच तथा नयी ऊर्जा को स्थापित करना और जरुरी हो गया था । लोकप्रिय व्यक्तित्व का चयन निर्वाचन के माध्यम से ही हो पाता है । लोकतंत्र की आत्मा तो निर्वाचन है । इस प्रणाली से कोई भी पार्टी कोमजोर नही होती । इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । कांग्रेस का आन्तरिक जीवन नीरस बनता जा रहा था । महासमिति सदस्यों का मानना है कि संशोधित विधान ने कार्यकर्ताओं में नया ऊर्जा भर दिया है । पार्टी पर्ण् रुप से कार्यकर्ता की हाथों में सौंप दिया गया है । इस प्रकार से घ दिन तक बहस चलता रहा । अन्त में बहुमतीय प्रणाली पास हो गयी । नये संशोधित विधान के मुताबिक कांग्रेस के हर तह में पदाधिकारी सहित ठछ प्रतिशत सदस्यों का चुनाव होगा । बाकी द्दछ प्रतिशत मनोनयन के लिए सभापति हाउस में प्रस्ताव करेंगे और कार्यसमिति उनके प्रस्ताव पर अमल करके अनुमोदन करेगी । मुझे लगता है कि अब कांग्रेस एक गतिशील पार्टी जाएगी । युवा पुस्ताओं को कांग्रेस में समाहित होने का अवसर आसानी से प्राप्त होगा । पार्टीलोकतांत्रिक छवि जनता को आकषिर्त करने में कामयाब होगी, और अब पार्टीता से नही नीति से चलेगी ।
कांग्रेस पार्टी कमान युवा हाथों में सौंपने की आवाज तेज होती दिखाई दी । सहभागियों का मानना है कि पार्टी सुधार करना-कराना बडे नेताओं का काम है । युवाओं को आगे लाए बगैर पार्टीकायाकल्प नहीं हो सकता । अब सिर्फकाठमाण्डू में बैठकर सत्ता नहीं मिल सकती । संगठन मजबूत करने के लिए नेताओं को हर गाँव के कोने कोने तक पहुँचना होगा । जो शिक्षित और ऊर्जावान युवाओं से ही संभव है । उन्हें नेतृत्व की कमान सौंपने का मतलब यह नही है कि हम बडे-बुजुर्गों का अपमान कर दें । कांग्रेस को उनकी भी जरुरत है, मार्गदर्शक के रुप में ।

