गजल::डाँ. कृष्णावतार त्रिपाठी राही’
On November - 30 - 2009
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इस कदर आदमी आज रोने लगा
दाग सारे बिना पानी धोने लगा ।
रात सोये तो सोये न परवाह है
आदमी तब तो दिन में भी सोने लगा ।
मौत को कंधा देना जरुरी है पर
आदमी जिन्दगी को भी ढोने लगा ।
घर हो, मंदिर या मस्जिद गुरुद्वारा हो
गंदगी हर जगह जाके बोने लगा ।
जो दिया बन के जलते रहे रात भर
उनके भी राह में कांटे बोने लगा ।
‘राही’ जिनके लिए रोज मरता रहा
उनका व्यवहार दुश्मन सा होने लगा ।
::-डाँ. कृष्णावतार त्रिपाठी ँराही’
कुंवरगंज, ज्ञानपुर, उत्तरप्रदेश


avinash Says:
Hello Dr. saheb what a nice Gajal……. we r waiting for yr next gajal…….
keep it up…thanks
Posted on November 30th, 2009 at 5:21 am
best resveratrol Says:
Cool artice on your blog. This was really nice read if someone ask me. hope everyone can read it and learn something new.
Posted on January 25th, 2010 at 6:30 am