सत्ता के बदलते समीकरण::प्रो.डाँ. नवीन मिश्रा
Print This News
विधान सभा के निर्वाचन में करारी हार के बाद नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले अभी भी आन्तरिक कलह से उबर नहीं पाई है । कांग्रेस में सभापति गिरिजा प्रसाद कोईराला द्वारा वंशानुगत प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास तथा उसके विरुद्ध निर्मित ध्रुवीकरण के बीच संर्घष्ा जारी है । इसी प्रकार एमाले के भीतर भी कार्यनीति के प्रश्न पर निरन्तर संर्घष्ा जारी है । माओवादी के अभ्युदय के पश्चात् इन दोनों दलों के आगे अस्तित्व के लिए संर्घष्ा तथा सामयिक रुपान्तरण की अनिवार्य अवस्था उपस्थित हो गई है । ये दिनों-दिन असान्दर्भिक तथा कमजोर हो रहे हैं । ये दोनों दल अगर समय की आवश्यकता तथा परिवर्तन को आत्मसात नहीं कर पाते हैं तो इनका विस्थापन अवश्यमभावी है । सत्ता से पदच्युत होने के बाद माओवादी संसद से लेकर सडÞक तक आन्दोलन कर अपनी शक्ति प्रदर्शित करने में लगे हैं । ऐसी स्थिति में किसी भी राजनीतिक दल का उद्देश्य मात्र सत्ता पर काबिज होना है तो स्वाभाविक है कि उनके लिए संविधान निर्माण कार्य सेकेण्ड्री कार्य हो गया है ।
सिद्धान्ततः सभी प्रमुख राजनीतिज्ञ राष्ट्रीय सहमति की वकालत करते नहीं थकते हैं लेकिन व्यवहार में उनका आचरण ठीक इसके विपरीत है । अपने प्रतिद्वन्द्वी दलों के साथ सहमति की बात तो छोडिए प्रधानमन्त्री या उपप्रधानमंत्री पद प्राप्त करने के लोभ में नेता अपनी पाटी से भी व्रि्रोह करने से परहेज नहीं करते हैं । सत्ता प्राप्ति के लिए वही नेता जो कभी भारत तथा ज्ञढछण् की संधि के आलोचक थे, आज भारत सरकार का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए आतुर हैं । नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला सहमति तथा सहकार्य के महत्व की व्याख्या करते नहीं थकते हैं । एकीकृत नेपाल कम्युनिष्ट पाटी माओवादी के अध्यक्ष तथा पर्ूव प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल भी चीन भ्रमण के पश्चात् सहमति की बात करने लगे हैं । वर्तमान प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल भी अपनी कर्ुर्सर्ीीचाने के उद्देश्य से सहमति तथा सहकार्य की वकालत कर रहे हैं । नेपाल कम्युनिष्ट पार्टर्ीीकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी के पिछले महाधिवेशन में अध्यक्ष पद प्राप्त करने में विफल केपी शर्मा ओली भी सहमति के पक्ष में अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं । एमाले अध्यक्ष झलनाथ खनाल सहमति की खोज में दिल्ली पहुँच गए । कांग्रेस संसदीय दल के नेता रामचन्द्र पौडेल सहमति को लोकतन्त्र का आधार मानते हैं । लेकिन मुख से सहमति का जितना भी गुणगान किया गया हो, व्यवहार में इसका रति भर भी प्रयोग नहीं हो रहा । असहमति लोकतन्त्र की विशेषता है लेकिन लोकतन्त्र में निरपेक्ष सहमति के लिए कोई स्थान नहीं होता । लोकतन्त्र में असहमति को व्यवस्थित करने के लिए उपकरण का होना अनिवार्य होता है । आवश्यकता अनुसार सहमति बनने और बिगडÞने का सिलसिला निरन्तर जारी रहता है । ज्ञद्द सूत्रीय समझौता से लेकर आज तक की नेपाली राजनीति विभिन्न उतार चढÞावों की राजनीति है, जिसने देश में अस्थिरता को जन्म दिया है । इसके परिणाम स्वरुप वृहत् शान्ति समझौता तथा अन्तरिम संविधान के औचित्यता पर गम्भीर प्रश्न उपस्थित हो गया है । सत्ता के संसदीय खेल में संविधानसभा विलुप्त सी हो गयी है । राजनीतिक दल गणतंत्र तथा गणतांत्रिक पद्धति की आधारभूत मान्यता से भी विमुख हो गए दिखते है ।
र् वर्तमान माओवादी आन्दोलन जिस रुक्मांगत कटवाल प्रकरण पर आधारित है, वो तो कब का अवकाश प्राप्त कर चुके हैं । अब किस प्रकार उनकी पर्ुनबहाली और फिर उन्हें पदमुक्त किया जाएगा या फिर किस प्रकार राष्ट्रपति के कदम -माओवादी के अनुसार जो असंवैधानिक कदम) को संवैधानिक बनाया जाएगा, यह बात भी समझ में नही आती है । माओवादी आन्दोलन का उद्देश्य नागरिक सर्वोच्चता कायम करना है या फिर कुछ और यह समझ पाना मुश्किल है । विगत में अगर किसी से भी कोई गलती हर्ुइ है, तो उसे भविष्य में फिर नहीं दुहराए जाने की र्सतर्कता अनिवार्य है लेकिन इसके लिए आन्दोलन के नाम पर जनता को त्रसित करना कहाँ तक न्यायोचित है, यह एक विचारणीय प्रश्न है । निर्वाचन के पश्चात् माओवादी देश के सबसे बडÞे दल के रुप में उभर कर सामने आए हैं । अतः आवश्यक है कि वे तत्परता के साथ नए संविधान निर्माण प्रक्रिया में आगे बढÞें और संविधान में नागरिक सर्वोच्चता को स्थापित करने का प्रयास करें, जिसके लिए वे र्समर्थ भी हैं और सक्षम भी । इस प्रकार के आन्दोलनों से जनता त्रस्त हो चुकी है और सम्बन्धित दलों की छवि इससे जनता में सुधरने की बजाए और बिगडेगी । चाहे यह आन्दोलन माओवादियों का हो या फिर किसी और का । देश में बंद, हडÞताल के बदले आवश्यकता है शांति, सुरक्षा की जिससे कि आम नागरिक का जीवन यापन सामान्य हो सके ।
देश की राजनीति में माओवादी पार्टर्ीीे योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता है । एक दशक के लंबे सशस्त्र संर्घष्ा के पश्चात् संविधान सभा चुनाव के परिणाम स्वरुप देश में सबसे बडÞे दल के रुप में स्थापित होना बहुत बडÞी बात है । लेकिन क्यों आज उन्हें ही विरोध का झण्डा ढोना पडÞ रहा है, यह विचारणीय प्रश्न है । कल तक जो देश की सभी समस्याओं का समाधान संविधान सभा और नए संविधान में खोज रहे थे आज संविधान सभा की बैठक अवरुद्ध करके नए संविधान निर्माण की राह में सबसे बडÞा रोडÞा बन कर खडÞे हैं । एक बार लोकतांत्रिक पद्धति में प्रवेश के पश्चात् उन्हें इस पद्धति को संस्थागत करते हुए जनता के पक्ष में पद्धति के अन्दर ही सभी समस्याओं का हल ढुँढना होगा और यही उनके तथा जनता के पक्ष में होगा । वास्तव में माओवादियों में यह बोध होना आवश्यक है कि वे भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रमुख अंग हैं और उन्हें जनमत की शक्ति तथा उसमें अन्तरनिहित सामर्थ्य को पद्धतिगत रुप में स्थापित तथा प्रयोग करना होगा । माओवादियों को यह समझना होगा कि सबसे बडÞे दल होने के नाते उनकी जिम्मेवारी भी सबसे अधिक है । उन्हें किसी भी समस्या का सविवेक समाधान खोजना होगा, यही उनके, जनता के और देश के हित में होगा, अन्यथा देश में किसी दर्ुघटना की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता ।
सत्ताधारी नेकपा एमाले भी समस्या विहीन नहीं दिखाई देता है । पार्टर्ीीध्यक्ष झलनाथ खनाल खुद प्रधानमंत्री पद का सपना संजोए सत्ता के नए समीकरण की खोज में लगे हुए हैं, जबकि मधेशी जनअधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव वर्तमान सरकार में शामिल होने का संकेत दे रहे हैं । उल्लेखनीय है कि अभी दोनों ही नेता भारत भ्रमण से लौटे हैं । खनाल के भारत भ्रमण तथा भ्रमण काल में हर्ुइ विभिन्न भारतीय राजनीतिक हस्तियों से उनकी मुलाकात को नेपाली राजनीति में नए ध्रुवीकरण के संकेत के रुप में देखा जा रहा है । जबकि दूसरी धारणा यह है कि वर्तमान सरकार के प्रति खनाल के विरोधी तेवर को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें बुलाकर इसकी तीव्रता को कम करने का प्रयास किया है । माना जाता है कि खनाल ने भारत सरकार को इस बात से अवगत कराया कि उनके प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में राष्ट्रीय सरकार गठन हो सकेगा, जिसमें माओवादी पार्टर्ीीे भी शामिल होने की संभावना होगी । लेकिन भारत सरकार खनाल के विचार से सहमत नहीं दिखाई देती है और वर्तमान सरकार को ही मजबूत बनाने के पक्ष में है । कहा जाता है कि भारत सरकार ने उपेन्द्र यादव को भी वर्तमान सरकार का ही र्समर्थन करने का सुझाव दिया है ।
अध्यक्ष खनाल कार्तिक ज्ञढ गते के दिन भारतीय विदेश मंत्री एस एम कृष्णा तथा गृहमंत्री पी. चिदम्बरम, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे महासचिव ए.बी. बर्धन, मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टर्ीीे महासचिव प्रकाश करात आदि नेताओं से मिले थे । इसके एक दिन पर्ूव उनकी मुलाकात अर्थमंत्री प्रणव मुखर्जी, विदेश सचिव निरुपमा राव तथा विपक्षी नेता लालकृष्ण आडवाणी आदि नेताओं से हर्ुइ थी । मूलतः सभी नेताओं ने खनाल को सहमति तथा समझदारी अपनाने की सलाह देकर शांति प्रक्रिया को स्थापित करने का सुझाव दिया, ऐसा माना जा रहा है ।
दूसरी ओर जब से प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने वार्ता के लिए फोरम को औपचारिक पत्र भेजा है, तभी से फोरम की सरकार में सहभागिता की संभावना बढÞ गई है । कहा जाता है कि अपने को उपप्रधानमंत्री बनाए जाने की शर्त पर उपेन्द्र यादव सरकार में शामिल हो सकते हैं । लेकिन दूसरी तरफ पार्टर्ीीेता जयप्रकाश गुप्ता भी उपप्रधानमंत्री बनने की कतार में खडÞे हैं । कार्तिक ज्ञठ गते जिस समय उपेन्द्र यादव दिल्ली पहुँचे थे, उसी समय प्रधानमंत्री नेपाल ने फोरम को औपचारिक पत्र भेजा था जिसमें उनसे सरकार में शामिल होने का आग्रह किया गया था । फोरम अध्यक्ष यादव ने सहमति कायम होने की स्थिति में सरकार में शामिल होने के संकेत दिये हैं । भारत की भी इच्छा है कि फोरम सरकार में शामिल हो और माओवादी दल से उसकी दूरी बढÞे, ऐसी आशंका जताई जा रही है । सरकार में सहभागिता के प्रश्न पर फोरम नेतृत्व तथा प्रधानमंत्री के बीच अनेकों बार वार्ता हो चुकी है । दिल्ली प्रस्थान के पर्ूव भी फोरम अध्यक्ष यादव और प्रधानमंत्री नेपाल के बीच बातचीत हर्ुइ थी । जिसमें उन्होंने -अध्यक्ष यादव ने) अपने लिए वरिष्ठ उपप्रधानमंत्री पद की पेशकश की थी । लेकिन प्रधानमंत्री नेपाल की दुविधा यह है कि ऐसी स्थिति में वर्तमान उपप्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदार का क्या किया जाए – इन बातों का निष्कर्षजो भी निकले, इतना तो तय है कि सरकार के प्रति फोरम का रुख नरम दिखाई देता है ।
राजनीतिक दलों के बदलते समीकरण के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मुन द्वारा कार्तिक ज्ञघ गते के दिन प्रस्तुत नेपाल सम्बन्धी प्रतिवेदन में राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन की बात कह कर एक नए विवाद को जन्म दे दिया है । उनके इस वक्तव्य को जहाँ एक ओर माओवादी और उनके पक्षधर देश की अनिवार्य आवश्यकता बताते हैं वहीं उनके विरोधी राष्ट्रसंघ महासचिव पर एकपक्षीय बयान देने का आरोप लगा रहे हैं । नेपाल के प्रति मुन का यह पहला बयान नहीं है । इससे पहले भी वे आषाढÞ द्दज्ञ गते के दिन सुरक्षा परिषद में जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किये थे, उसमें समयावधि के भीतर संविधान निर्माण नहीं होने की शंका जताई थी । माओवादी नेतृत्व की सरकार के समय भी राष्ट्रसंघीय नेपाल मिशन अनमिन ने राष्ट्रीय सरकार गठन की आवश्यकता पर बल दिया था । माओवादी तथा मधेशी जनअधिकार फोरम को सरकार में सम्मिलित कराने के लिए चल रहे प्रयास के समय मुन का सुझाव आने से वर्तमान सरकार में सहभागी दलों के बीच शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है । यही कारण है कि उनकी दृष्टि में यह संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा नेपाल के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप है । कार्तिक ज्ञढ गते के दिन सरकार में सहभागी द्दद्द दलों द्वारा इस पर आपत्ति जताई गई है । इन घटनाओं के परिणाम स्वरुप जनमानस में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ वर्तमान सरकार के विकल्प की खोज में है – माओवादियों द्वारा अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार गठन करने की मांग को लेकर चलाए जा रहे जनआन्दोलन के समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव द्वारा दिए गए इस बयान से उन पर माओवादियों का पक्षधर होने का आरोप लगाया जा रहा है । लेकिन अनमिन के वरिष्ठ संचार अधिकारी कसमस विश्वकर्मा का मानना है कि मुन का बयान नेपाल के राष्ट्रीय हित में है और इसे आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता । महासचिव मुन की प्रतिक्रिया के विषय में माओवादी नेताओं का दृष्टिकोण अलग है । कार्तिक ज्ञढ गते के दिन इलाम में माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ने मुन की अभिव्यक्ति को सही ठहराते हुए कहा कि देश में राष्ट्रीय सरकार के अलावा दूसरा और कोई विकल्प नहीं है । इस तरह सरकार गठन के लिए जोडÞतोडÞ जारी है । अब देखना है कि उँट किस करवट बैठता है ।

