कोपेनहेगेन::कुमार सच्चिदानन्द
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तपती धरती बदला मौसम और चिन्तित सारा विश्व । वातावरण के बदलते इस स्वरुप में अगर अपने सम्राट द्वारा अभिशापित यक्ष अपनी नवविवाहिता से दूर गंध मादन पर्वत पर निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा होता तो उसे अपनी प्रियतमा तक संदेश प्रेषित करने के लिए आषाढ के प्रथम दिवस के काले-काले मेघ न मिलते । हाँ, उसके हाथ में सौर ऊर्जा से चालित सेलफोन या मोबाइल की परिकल्पना तो हम कर ही सकते हैं । लेकिन काले कजरारे मेघ से मोबाइल तक की इस महायात्रा में हमने भू-संशाधनों का इतना अधिक दोहन किया है कि धरती तो गर्म होने ही लगी है सदियों से हिमाच्छादित शैल-शिखर भी नग्न होने लगे हैं, बर्फा महासागर पिघलने लगा है और सागर का जलस्तर बढÞने लगा है जिससे विभिन्न देशों को तटवर्ती शहरों पर तो खतरा मँडरा ही रहा है, अनेक ऐसे देश जिसके भौगोलिक व्यक्तित्व का निर्धारण सागर की लहरे करती है, के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मँडराने लगे हैं । यही कारण है कि मालदीव जैसे देश ने अपने अस्तित्व के खतरे की ओर दुनिया को आकषिर्त करने के लिए सागर तल के भीतर कैबिनेट की बैठक की और नेपाल जैसे पर्वतीय देश नें हिमालय की पर्वत श्रृंखला पर । इसी समस्या का समाधान तलाशने और हमारी सुन्दर धरती को तपन और विनाश से बचाने के लिए डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन मे ७ से १८ दिसम्बर तक १९२ देशों का महाकुंभ आयोजित किया गया ।
बाढ और सूखे की समस्या मात्र हमारी नियति बन गई है । एक ही देश के हिस्से में बाढÞ तांडव नृत्य करती है और दूसरे हिस्से में सुखाड की विभीषिका होती है । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संबाहन -इसरो) नें ३ दिसम्बर २००९ को चेतावनी के लहजे में कहा कि गंगोत्री का ग्लेशियर ३० वर्षों में १.५ किलोमीटर घट गया है । हिन्दू मान्यताओं में बेहद पवित्र माने जानेवाले इस ग्लेशियर की रक्षा की जिम्मेवारी निश्चित तौर पर भारत सरकार की है लेकिन प्रकारान्तर से उसे वैश्विक स्तर पर पर्यावरण में सन्तुलन स्थापित कर के ही इस लक्ष्य को पाया जा सकता है । गत २ वर्षों में चीन में भी सूखे और बाढ की समस्या बडे पैमाने पर देखने को मिली है । इसलिए ग्लोवल वार्मिङ्ग चीन में भी बडा मुद्दा है । धरती और उसके जलवायु के चिन्ता आज सारें विश्व में देखी जा रही है । इससे पर्व सन् १९९२ में ब्राजील में हुए रियो पृथ्वी सम्मेलन
में पर्यावरण की रक्षा के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे युनाइटेड नेशन्स पम वर्क कन्वेन्शन अँन क्लाइमेट चेंज कहते हैं । कोपेनहेगेन में इसमें शामिल पक्षों का १५ वाँ सम्मेलन सम्पन्न हुआ है । इस बीच १९९७ में जापान में क्योटो और २००७ में इण्डोनेशिया कें बाली में हुए जलवायु सम्मेलन में अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ग्लोवल वार्मिङ को नियन्त्रित करने के प्रभावी उपायों को लागू करने पर जोड दिया गया । यह सम्मेलन उसी अभियान को आगे बढाने का विश्व स्तरीय प्रयास है । डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में ७ से १३ दिसम्बर तक चली क्लाइमेट चेन्ज कान्प|mेन्स में जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए एक अर्न्तराष्ट्रीय राजनीतिक समझौता होना था । उस बैठक का एजेण्डा यह था कि विकसित और औद्योगिक राष्ट्र सन् २०२० तक ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्र्सजन में भारी कटौती लाने की घोषणा करें तथा विकासशील और गरीब देशों को इन खतरों से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद देने का ऐलान करें । इस बैठक में कई मुख्य लक्ष्य थे जिस में प्रमुख है कि सन् २०१२ के बाद से एक ग्लोवल क्लाइमेट एग्रिमेन्ट बनाना क्योंकि तबतक क्योटो प्रोटोकाँल खत्म हो जाएगा । इस सम्मेलन में क्लामेट पेमवर्क पर शामिल होने वाले १९२ देशों द्वारा मुहर लगाना था । इस राजनैतिक समझौते को २०१० में एक अर्न्तराष्ट्रीय संधि का रूप दिया जाना था जिसमें इसके प्रावधानों को मानना सभी राष्ट्रों के लिए कानूनी बाध्यता होगी । इस समझौते से पृथ्वी को ग्रीन हाउस गैसों के खतरे से बचाने की जो मुहिम १९९७ के क्योटो प्रोटोकाँल से शुरु हर्इ थी उसे ठोस कार्यात्मक कदमों के साथ आगे बढाये जाने की संभावना थी ।
लेकिन इस सम्मेलन के प्रारम्भ से ही विभिन्न खेमों में आबद्ध देशों के स्वार्थ इस रुप में टकराने लगे कि इस महासम्मेलन के परिणामों पर प्रारम्भ में हीं प्रश्न चिन्ह लगने लगा था । इस सम्मेलन में, शामिल देश तीन खेमों में बँटे हुए थे । एक ओर विभिन्न द्वीपीय देश थे जो समुंद्र तल से महज दो मीटर तक की उँचाई पर अपने अस्तित्व और जीवन का परचम लहरा रहे थे और समुंद्र के बढÞते जलस्तर से वे अपने अस्तित्व पर संकट के बादल मडÞराते हुए देख रहे थे । स्वभावतः वे इस सम्मेलन में पर्यावरण के सम्बन्ध में किसी कठोर संधि की आशा कर रहे थे जो विश्व के सभी देशों के लिए कल्याणकारी हो । दूसरी ओर वे विकसित देश थे जिन्होंने एक ओर अपने विकास यात्रा में तो पर्याप्त मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उर्त्र्सजन किया था और वर्तमान समय में भी अपने नागरिकों के ऐशो आराम की जीवन शैली के कारण कार्बन उर्त्र्सजन में महत्वपर्ण् भूमिका निभा रहे थे । ये देश विकासशील देशों को इस मुद्दो पर घेर कर पर्यावरण को अपने द्वारा पहुँचायी जा रही हानि की भरपाई करना चाहते थे । इन दोनों खेमों के देश आपस में संगठन की मुद्रा में थे । तीसरी ओर वे विकासशील देश थे जो कार्बन उर्त्र्सजन के मुद्दे पर किसी बाध्यकारी संधि के विरोध में थे और इसका अधिकतम दायित्व लेने के लिए विकसित देशों पर दबाव बनाने की मनःस्थिति मे थे और उस मुद्दे में भविष्य में होनेवाले खर्च के मद्देनजर इन देशों से दर्घकालीन स्तर पर आर्थिक सहायता की अपेक्षा कर रहे थे ।
युरोपीय संघ द्वारा विकासशील देशों पर उर्त्र्सजन में कटौती की अधिक जिम्मेदारी डालने वाला और क्योटो संधि से अधिक व्यापक प्रस्ताव पेश किया गया । लेकिन तीव्र विकास वाले विकासशील देश विशेषतः चीन, भारत, ब्राजील तथा सउदी अरब जैसे तेल उत्पादक देशों ने इस आधार पर इस का विरोध किया कि क्योटो प्रोटोकाँल से कोई भटकाव नहीं होना चाहिए जो अमेरिका को छोडÞकर अन्य औद्योगिक देशों पर कानूनी बाध्यकारी प्रतिबन्ध थोपती है । उन देशों को संदेह था की नये प्रोटोकाँल की यूरोपीय संघ का र्समर्थन क्योटो प्रोटोकाँल को कमजोर करने की साजिश भी हो सकती है । लेकिन छोटे द्वीपीय देशों के गठबन्धन का कहना था कि कोपेनहेगेन सम्मेलन में एक दस्तावेज तैयार किये जाने कि जरुरत है जो क्योटो प्रोटोकाँल से अधिक मजबूत हो । स्वीडेन जैसे देशों का यह कथन था कि यदि हम ऐसे सम्ाझौतंे पर पहुँचते हैं जिसमें केवल क्योटो प्रोटोकाँल ही कानून बाध्यकारी होगा तो वे अपने उस मकसद को हासिल नहीं कर पायेंगे जिसकी उन्हें जरुरत है । गौरतलब है कि सम्मेलन का महत्वपर्ूण्ा मकसद क्योटो प्रोटोकाँल को सन् २०१३ से शुरु हो रहे दूसरे प्रतिबद्धता चरण में ले जाना था ।
इस सम्मेलन की समाप्ति एक दिन पर्व तक विश्वभर से आए वार्त्तरार विभिन्न समूहों में बँटकर समझौते का र्सवमान्य हल तलाशनें का प्रयास करते रहे लेकिन परिणाम शिफर रहा । मुद्दा था विकसित देशों को कार्बन उर्त्र्सजन में कितने प्रतिशत की कटौती का लक्ष्य दिया जाय । विकसित देश सन् २०२० इस्वी तक अपने कार्बन उर्त्र्सजन की दर में २० प्रतिशत तक कटौती करने के प्रति सहमत थे लेकिन विकासशील देश उस से सन्तुष्ट नहीं थे और उनकी अपेक्षा ४० प्रतिशत कटौती की थी । विकसित देशों का यह भी दृष्टिकोण था कि भारत और चीन जैसे तीव्र विकास दर वाले देशों को भी इस कटौती की सीमा में लाया जाना चाहिए । क्योंकि चीन वर्तमान समय में र्सवाधिक कार्बन उर्त्र्सजन करने वाला देश है । लेकिन ये दोनों देश उस सीमा में आना नही चहते थे क्योंकि इन्हे लम्बी विकास यात्रा तय करनी थी । इसके अतिरिक्त विकासशील देशों की यह भी अपेक्षा थी कि पर्यावरण की रक्षा एवं इससे उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए विकासशील देशों द्वारा खर्च की जानेवाली धनराशि सहायता स्वरुप दर्ीघकालीन स्तर पर उपलब्ध कर्राई जाय । इसके लिए विकसित देश सन् २०१० से अगले ३ वर्षों तक १० अरब डाँलर देने को सहमत तो थे किन्तु दर्घकालीन स्तर पर उनकी कोई ठोस योजना नहीं थी । इसपर संयुक्त राष्ट्र महासचिव वान की मून ने कहा कि विकासशील देशों को यह अपेक्षा छोडÞ देनी चाहिए कि विकसित राष्ट्र दर्घकालीन स्तर पर तत्काल कोई सहयोग की प्रतिबद्धता व्यक्त कर पाएँगे ।
पृथ्वी को हरा रखने ताकि सुन्दर श्वेत हिमालय की रक्षा हो सके का सपना लेकर कोपेनहेगेन सम्मेलन में नेपाल का प्रतिनिधित्व कर रहे नेपाल के प्रधानमन्त्री माधव कुमार नेपाल ने एक महत्वाकांक्षी और कानूनी रुप से सब के लिए बाध्यकारी होने वाले क्योटो प्रोटोकाँल सम्बन्धी समझौते को प्रस्तावित किया उन्होंने पृथ्वी के भविष्य के प्रति विश्व के ध्यानाकर्षा के साथ-साथ अल्प विकसित तथा जलवायु के कारण र्सवाधिक जोखिम में पडÞने वाले देशों पर विशेष ध्यान देने का प्रस्ताव भी विश्व के समक्ष रखा । प्रधानमन्त्री ने जोखिमग्रस्त अल्पविकसित देशों को विकसित देशों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर क्षमता अभिवृद्धि के लिए प्रविधि हस्तान्तरण और विकास में सहायता की बात कही । जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की ओर विश्व का ध्यान आकृष्ट कराने के लिए नेपाल द्वारा माउण्ट एवरेस्ट के आधार शिविर कालापत्थर -५५४२ मीटर उँचाई) पर मन्त्रिपरिषद की बैठक करने और जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी १० सूत्रीय ‘सागरमाथा घोषणा-पत्र’ जारी किये जाने की बात का भी उल्लेख किया । विश्व के बढते औसत तापमान का उल्लेख करते हुऐ श्री नेपाल ने कहा कि यह वृद्धि दर नेपाल में अधिक है और यह आगामी दिनों में इस क्षेत्र के सम्पर्ण् जल विज्ञान को प्रभावित करेगा ।
जलवायु परिवर्तन पर किसी मसौदे को अन्तिम रुप दिये जाने की जद्दो-जहद के बीच भारतीय प्रधानमन्त्री डाँ. मनमोहन सिंह ने शिखर सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारतवर्षसन् २०२० तक कार्बन उर्त्र्सजन में वर्ष२००५ की तुलना में करीब २० प्रतिशत की कटौती करने के अपने स्वेच्छिक घोषणा को हर हाल में पूरा करने के लिए वचनबद्ध है । उन्होंने कहा कि क्योटो प्रोटोकाँल के सभी पक्षों को प्रदूषणकारी तत्वों के उर्त्र्सजन में कटौती के अपने संकल्प पर अमल करना चाहिए । उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना सबसे कठिन है । डाँ. सिंह ने आगे कहा कि अगर र्समर्थनकारी वैश्विक जलवायु सन्धि हो जाए तो हम कहीं ज्यादा काम कर सकते है । भारतीय प्रधानमन्त्री के इस स्वेच्छिक कार्वन उर्त्र्सजन सम्बन्धी प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने सराहना की । ओबामा ने कहा कि भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अपका ने पहली बार बेहद महत्वपर्ण् कटौती प्रयासों को घोषित किया है और मैं इसका श्रेय उन्हे देने चाहुँगा ।
विश्वभर से आए वार्ताकारों द्वारा सहमति की बिन्दु तलाशने में विफलता, अमेरिका, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर अल्प विकसित और विकासशील देशों की असहमति पर लोगों की उम्मीदें अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा से थी लेकिन उन्होंने जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध में प्रभावित एवं निर्ण्यक कदम उठाने की बात पर अपनी ओर से कोई ठोस वचनबद्धता जाहिर नहीं की । उन्होंने स्वीकार किया कि कानूनी तौर पर बाध्यकारी संधि अनिवार्य है किन्तु इसे अन्तिम रुप देना बहुत कठिन है ।
जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगेन, परिणामों कि दृष्टि से बिल्कुल विफल रहा । इसके बावजुद भारत सहित तीन अन्य उभरती ताकतों और अमेरिका के बीच उर्त्र्सजन कटौती पर गैरबाध्यकारी सम्झौता हुआ लेकिन अधिकांश विकासशील देशों ने समझौते को आत्मघाती करार देते हुए खारिज कर दिया । वैसे कोपेनहेगेन में जो कुछ भी हुआ वह अप्रत्याशित नहीं था । क्योंकि कोपेनहेगेन वार्ता के अध्यक्ष डेनमार्क और दूसरे कई देशों ने पहले ही कह दिया था कि यहाँ कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता नहीं होगा । विकसित देश किसी भी कानूनी बाध्यता के खिलाफ थे । भारत और चीन जैसे देश इसलिए खिलाफ थे क्योंकि विकसित देश इसका बोझ उनके सिर पर डालने की मनःस्थिति में थे । इस सम्मेलन के दौरान विकसित और विकासशील देशों के रवैये ने सिद्ध कर दिया कि कोई भी अन्तर्रर्ााट्रय समझौता या संगठन तभी सफल हो सकता है जब वह कम से कम बाध्यकारी और ज्यादा से ज्यादा लचिला हो ।
यह सच है कि कोपेनहेगन सम्मेलन असफल रहा । विकसित देशों की आरामतलबी की जिन्दगी और विकासशील देशों की विकास की सम्भावनाओं के स्वार्थ पर यह सम्मेलन असफल रहा लेकिन धरती का तापक्रम जिस रफ्तार से बढ रहा है तो इसे नियन्त्रित करने का कोई ठोस प्रयास विश्व के देशों द्वारा नहीं होगा तो उसका खामियाजा मनुष्य जाति को भुगतना हीं पडेगा । निश्चय हीं विश्व स्तर पर कानूनन् बाध्यकारी समझौता नहीं हो पाया है लेकिन हमें इस दिशा में अपना प्रयास बन्द नहीं करना चाहिए । साथ ही अपने स्तर पर पर्यावरण रक्षा की चेतना के प्रसार का प्रयास करना चाहिए अन्यथा धरती का कोप किसी भी
क्षण हमारे भविष्य को निगल सकता है ।

