व्यंग्य::मुकुन्द आचार्य
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दुनियाँ अनोखी है । यहाँ रहने वाले अनोखें-अनोखें शौक भी पाला करते हैं । कितने सज्जन मूँछ को मर्दानगी का प्रतीक मानते हैं और फलस्वरुप उजले केश पर श्यामवर्ण्र् मेंहदी का रंग चढा लेते हैं । मगर मूँछ को श्वेत धवल छोड देते हैं अपनी बुजर्र्गी प्रदर्शित करने के लिए ।
कोई-कोई तो पाँच दस मीटर लम्बी मूँछ के मालिक बनकर गिनिज बुक में अपनी वीरता को दर्ज कराते हैं । कोई हनुमान जी के वंशज उसी मूँछ से गाडी तक खींचलेते हैं । अजीब-अजीब तमाशा और करतब मूँछ से करने वाले लोग धन्य हैं । उन्हें नमन करने को जी चाहता है । आजकल पचहत्तर प्रतिशत विज्ञापन में महिला के बाल और गाल कैसे सुन्दर बनाये जा सकते हैं- यही सब दर्शकों को परोसा जाता हैं । तो इस होडबाजी में मर्द क्यों पीछे रहे – उसे भी पूरा-पूरा हक है, अपनी मूँछं को बढावें, घटावें, अनेक आकर्ष रंगों में सजाएँ जो चाहे, करें । मियाँ जी दाढी-रखें चाहे उतार फेकें ।
ऐसे ही मुच्छड लोगों की एक मंडली जिसे हमलोग शिष्ट मंडल भी कह सकते हैं, नेपाल के जम्बो मंत्रीमंडल की तरह एक जम्बो जेट में सवार होकर विधाता ब्रड्ड जी से मिलने पहुँचीं । ब्रड्डजी का
मूड खराब था । उनकी सृष्टि को कोई अच्छा नहीं कह रहा था । सब कहते- ब्रड्ड जी अब सठिया गए है । इनसे अब अच्छी सृष्टि नहीं हो सकती । ब्रड्ड जी को अब स्वैच्छिक अवकाश लेकर घर बैठ जाना चाहिए और नई पीढी को सृजनात्मक दायित्व देना चाहिए । बूढे साँढ की तरह बेकार बीच चौक में खडे हैं, और ट्राफिक जाम !
खैर मुच्छडÞ मंडली वहाँ पहुँची । लम्बी दाढी वाले ब्रड्ड जी बडी-बडी मूछों को देखकर घबरा गए । डरते-डरते बोले-कहिए कैसे आना हुआ – आज का मानव तो पिता को नहीं मानता, फिर इस बूढे परपितामह से कौन सा काम आ पडा – मृत्युलोक में आप लोग जैसे निसंकोच भ्रष्टाचार करते हैं उसी तरह यहाँ पर बेझिझक होकर अपना दुखडा रो सकते हैं । हम अभी ‘कमर्सियल ब्रेक’ में हैं, आपकी बात सुन सकते हैं ।
बाबा ब्रड्ड जी की बात सुनकर मुच्छड मंडली के जोश में जो उफान था उसमें कुछ ठंडी छिटे पडÞ गई । फिर भी शिष्टमण्डल के नेता ने बनावटी विनम्रता के साथ कहा- हे आदि रचनाकार ! हम सभी के लकड-दादा ! आप देख ही रहे हैं, हम सभी मूँछवाले हैं । लेकिन अब हमे पूँछ वाले बनना चाहते हैं । ब्रड्डजी मूच्छड मंडली पर बमक पडे- छि छि छि ! मर्द होकर ऐसी बातें ! धिक्कार है इस कलियुगी मर्द को ! एक मुच्छड सजल नयन होकर फूट पडा- बाबा ! घर में बीबी तक मर्द नहीं मानती ! लानत है इस मूँछ पर !
गिनिज बुक में स्थान पानेवाला दूसरा मुच्छड बोला- ‘प्रभो ! मूँछवालों को गन्दा कहते हैं आजकल के क्लीन शेव्ड लोग ।
दूसरे सज्जन ने सुनाया मूँछ के बदले पूँछ मिलती तो हम सभी आज सफल होतें । बाँस के सामने कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते तो जल्दी जल्दी प्रमोशन मिलता । बीबी भी तो पूँछ हिलानेवाले कुत्ते को अपने घरवाले ज्यादा से प्यार करती है । मेरे हिस्से का दूध भी कुत्ते को पिला देती हैं ! मक्कार औरत !
दूसरे दुखी मुच्छड ने मुँह बनते हुए कहा, हमारा टाँमी दिनभर में पचासों बार बीबी को चाट लेता है, मगर मुझे बीबी साहिबा पास में फटकने नहीं देतीं । आखिर मेरे सब्र की भी तो कोई सीमा है ! मुझे कहती हैं आपकी मूँछे पुराने टूथब्रश की तरह नरम अंगों को कुरेदती हैं ! लानत है ऐसी मर्दानगी पर ! ऐसी मूँछ से तो पूँछ लाख गुना बेहतर ! किसी से कोई काम पटाना हो तो मूँछ दिखाने से नहीं पूँछ हिलाने से काम बन जाता है । पहले हर आफिस में मूँछ वाले तेरा जबाव नहीं !! कहा जाता था अब तो यही बात पूँछ वाले को कहा करते हैं । ‘पूछ वाला तेरा जबाव नही ।’ भगवान राम-कृष्ण भी तो मूँछ नहीं रखते थे ।
पीछे वाला मुच्छड भी टपक पडा, मूँछ के बदले पूँछ होती तो मजा ही मजा होता । किसी भी बडे आदमी से हाथ मिलाइए और साथ ही साथ पूँछ हिलाइए । मजाल है वह साला बडा आदमी आपका काम न करे – औरतों को पटाने में भी कितनी आसानी होती । लाखों का हार देने कें बदले बीबी के सामने दो मिनट पूँछ हीं हिला देते ! इस महँगाई में पूँछ हिलाकर किसी को पटाना बहुत ही सस्ता और नायाब तरीका माना जायगा ! पितामह श्री !
मंडली के नेता ने जोडा, अभी नेपाल में जो राजनैतिक तरलता है उसे जमाकर ठोस बनाने में पूँछ से बहुत मदद मिलती । लोग विपक्षी से हाथ तो मिलाते हैं, मगर पूँछ नहीं हिला पाते । होती तो हिलाते ! इघर पूँछ हिली उधर ‘पाँलिटीकल डेडलक’ खुली ! हे लकडÞ दादा श्री । अब मानव को मूँछ से मुक्ति दीजिए और एक लम्बी सी पूँछ प्रदान कीजिए ! ब्रड्डजी बेमन से हीं सही ‘तथास्तु’ कहकर अर्न्तध्यान हो गए ।

