8
September , 2010
Wednesday
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नेपाली राजनीतिज्ञ भले ही संविधान निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण में विफल हो रहे हों, लेकिन एक काम उन्होंने बखूबी किया है और वह है नए-नए राजनीतिक शब्दावलियों का आविष्कार । परंपरावादी राजनीति शास्त्री अरस्तू, प्लेटो से लेकर आधुनिक राजनीति शास्त्री आण्ड तथा पोल ने भी इतने नए राजनीतिक शब्दावलियों का आवष्किार नहीं किया जितना नेपाली राजनीतिज्ञों ने । इसी सर्ंदर्भ में नेपाली राजनीति राष्ट्रीय सहमति से अपना सफर प्रारंभ कर सहभागी प्रजातंत्र, बेबी किंग, नागरिक सर्वोच्चता होते हुए उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्र तक पहुँच गई लेकिन विगत की तरह यह इस बार भी ढाक के तीन पात ही साबित हु । जो कुछ हुआ वह किसी फार्मूला हिन्दी सिनेमा की कहानी से कम नहीं था । हुआ यों कि पहले वयोवृद्ध नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला अपने इलाज के सर्ंदर्भ में और फिर माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल अघोषित उद्देश्य से सिंगापुर जाते हैं । घटना के नायक यही दोनों हैं । गिरिजा बाबु की सुपुत्री तथा विदेश मंत्री सुजाता कोइराला तथा पुष्प कमल दहाल के सहयोगी महरा इस घटना के सह नायक हैं । इस घटना क्रम में अतिथि कलाकार के रुप में पारस और एस.डी मुनि का भी आगमन होता है । समाचार आया कि देश के प्रमुख दो दलों के शर्ष् नेताओं के बीच राजनीतिक गतिरोध समाप्त करने के लिए मध्यम मार्ग अपनाने की सहमति बन गई है । नेपाली कांग्रेस के सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला तथा एकीकृत नेकपा माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड के बीच सिंगापुर के ग्लेनिगल्स अस्पताल तथा मेडिकल सेंटर में यह सहमति हर्इ, यह समाचार प्रकाशित हुआ था । भेंटवार्ता में सहभागी उपप्रधानमन्त्री सुजाता कोइराला के अनुसार तीन महिनो से अवरुद्ध व्यवस्थापिका संसद को सुचारु रुप से संचालित करने के लिए ही दोनों नेताओं के बीच सहमति बनी है । प्रचण्ड सिंगापुर से लौटने के बाद बहुत ही विश्वस्त और प्रफुल्लित नजर आ रहे थे और उनका मानना था कि मंसिर छ गते तक मध्यम मार्ग अपनाने के परिणामस्वरुप सभी गतिरोध समाप्त हो जाएंगे । यह भी कहा गया कि संविधान निर्माण तथा शान्ति प्रक्रिया को र्सार्थक निष्कर्षतह पहुंचाने के लिए ही यह सहमति बनी है । दोनों ही नेताओं द्वारा सहमति तथा सहकार्य पर जो दिया गया है । इसी सर्ंदर्भ में यह भी कहा गया कि दोनों ही नेताओं के बीच शान्ति प्रक्रिया तथा संविधान लेखन प्रक्रिया को आगे बढाने के लिए गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व में उच्चस्तरीय राजनीतिक संयंत्र बनाने का निर्ण्र्लिया गया है । एकीकृत नेकपा माओवादी के अध्यक्ष प्रचण्ड सत्ता समीकरण के लिए नव-गठबन्धन निर्माण की आशा लेकर सिंगापुर से लौटे थे । त्रिभुवन अन्तराष्ट्रीय विमानस्थल पर प्रचण्ड ने कांग्रेस सभापति गिरिजा प्रसाद कोइराला के स्वदेश आने के बाद मध्यमार्ग निकाल कर राजनीतिक गतिरोध दूर करने की बात कही थी । ‘इस बीच में जो अप्राकृतिक खेल खेला गया उसका जल्द ही अंत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है’ । यह प्रचण्ड का कहना था । उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान गठबन्धन को तोडÞकर नव गठबन्धन का निर्माण किया जायगा । यह कब और कैसे होगा, यह गिरिजा प्रसाद के आने के बाद तय होगा । प्रचण्ड का मानना था कि माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में गठित गठबन्धन अप्राकृतिक, अस्वभाविक तथा कृत्रिम है । प्रचण्ड की अभिव्यक्ति से यह साफ झलक रहा था कि गिरिजा प्रसाद कोइराला के आने के बाद वर्तमान सरकार बर्खास्त हो जाएगी और एक नव-नेतृत्व में नयी सरकार का गठन होगा, जिसका स्वरुप राष्ट्रीय होगा और इस सरकार में माओवादी दल भी शामिल होंगे । इतने दिनों से त्रस्त नेपाली जनता के मन में भी एक आशा जागृत हर्इ कि शायद अब निराशा के दिन समाप्त हो जाएंगे और देश का शासन सुचारु रुप से संचालित होने लगेगा । मिडिया में इस बात भी अटकलें लगाई जाने लगी कि किसके नेतृत्व में सरकार का गठन होगा । कुछ लोगों का मानना था कि नई सरकार पुनः माओवादी नेतृत्व में गठित होगी, जबकि प्रधानमन्त्री पद के लिए कुछ लोग सुजाता कोइराला की ओर इशारा कर रहे थे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । गिरिजा प्रसाद कोइराला के स्वदेश आते ही पासा पलट गया । उन्होंने आते हीं यह घोषणा कर दी कि वर्तमान सरकार को परिवर्तित करने का कोई प्रश्न ही नहीं पैदा होता है, बल्कि उसे और भी मजबूती प्रदान की जाएगी । विगत में अपनी तीव्रता, मौलिकता तथा उपलब्धियों के दृष्टिकोण से चिन्ता तथा आकर्षा का केन्द्र नेपाल की शान्ति-प्रक्रिया ओझल में पड गई है । संविधान, शान्ति-प्रक्रिया तथा सामाजिक-आर्थिक रुपान्तरण आदि विषय पीछे छूट गया है तथा इस समय सरकार निर्माण मुख्य विषय बना हुआ है । अपने ही द्वारा निर्मित संविधान भी अनदेखी कर तथा सरकार परिवर्तन के वैद्य रास्ते को ठुकरा कर सडÞक आन्दोलन के द्वारा सरकार गिराने की मुहिम तेज है । परिणामस्वरुप एक बार फिर शुरू है बंद और हडताल का दौर । जनता त्रस्त और लाचार होकर मूक दर्शक बनी हर्इ है । संसद अवरोध के परिणामस्वरुप बजट पारित होने में विलंब के कारण देश को कितनी त्रासदी भोगनी पडÞी यह सबके सामने है । कारागार में बंदियो को खाना नहीं मिल रहा था, अस्पताल में रोगियों को खाद्यान्न नहीं मिल रहा था । लेकिन इन सब बातों की चिन्ता किसी को नहीं थी । चिन्ता थी तो बस इतनी, कैसे सत्ता को प्राप्त किया जाए । सत्ता प्राप्ति के लिए कोई भारत जा रहा है तो कोई सिंगापुर । संविधान निर्माण के लिए अब मात्र ९ महीने ही बाकी हैं । संघीयता, राज्य के शासकीय स्वरुप तथा प्राकृतिक स्रोत के बंटवारे सम्बन्धी जटिल विषयों के निर्धारण के तरफ किसी का ध्यान नहीं है । शान्ति प्रक्रिया भी शिथिलता के साथ ही अनिश्चित भविष्य के मन से शिविर के अन्दर बंद लडाकुओं में अकुलाहट होना स्वाभाविक है । नेपाली सेना मे बढÞ रही हीनता बोध, गायब तथा विस्थापित परिवारों की समस्या, द्वन्द्व-पीडितों की व्यथा आदि समस्याओं का समाधान खोजा जाना बाकी है । राज नेताओं के ऊपर से इनका विश्वास उठता जा रहा है । इतना ही नहीं देश में फैल रहा जातीय, क्षेत्रीय तथा साम्प्रदायिकता का जहर हमें किस मोड पर लाकर खडा करेगा, यह सोच कर भी डर लगता है । संक्रमणकाल की अवस्था ज्यादा ही संवेदनशील, जटिल तथा उत्तरदायित्वपर्ण् होती है । इस बात को समझना आवश्यक है । वरना जब तक हम संभलेंगे, बहुत देर हो चुकी होगी । जल्द से जल्द इन समस्याओं का समाधान अति आवश्यक है । यह सत्ताधारी दलो तथा विरोधी दलो, दोनों ही की जिम्मेदारी है । समझौता के परिणामस्वरुप आन्दोलन की उपलब्धिअयों को संस्थागत करने के लिए आन्दोलनकारी शक्तियों के साथ लंबी अवधि तक सहकार्य, विश्वास तथा समझदारी अनिवार्य है । उपलब्धियों को संस्थागत नहीं होने की स्थिति में संभव है कि देश १२ वर्षपीछे जैसे द्वन्द्व में एक बार फिर उलझ कर रह जाए । इसी लिए हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए । दूसरे नव शब्दजालों में जनता को बहुत दिनों तक भरमाया नहीं जा सकता है । इसका ज्वलन्त उदाहरण है भारत का पिछला लोकसभा चुनाव, जहाँ जनता ने न तो जाति और न धर्म के नाम पर अपने मतों का प्रयोग किया, बल्कि विकास के नाम पर वोट दिया । यहाँ के नेताओं को भी यह समझना चाहिए कि वह दिन दूर नहीं जब जनता इन्हें दर-किनार कर देगी । इसी प्रकार दक्षिण अप्रिका के समकालीन इतिहास में सफल द्वन्द्व व्यवस्थापन का उत्कृष्ट उदाहरण है । मृत्यु के दृष्टिकोण में, समाज के विभाजन की दृष्टि में, उत्पीडन की पीडा भी सघनता की दृष्टि में तथा तत्कालीन अन्तरष्ट्रीय परिवेश की दृष्टि में उनकी समस्याएँ बहुत ही जटिल थी, लेकिन उन्होंने इसे व्यवस्थित किया । तुलनात्मक दृष्टिकोण से हमारी समस्याएँ उतनी जटिल नहीं है, फिर हम क्यों नहीं इसे व्यवस्थित कर सकते हैं । सत्ता से पदच्युत होने के बाद आज जो माओवादी दल राष्ट्रीय सरकार की वकालत कर रहे हं, अगर चुनाव के बाद उन्ही के नेतृत्व में अगर राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया होता, तो शायद देश की स्थिति ऐसी नहीं होती । लगता है कि देश का चिंतन गंभीरता से दूर होता जा रहा है । नेतृत्व चाहे किसी भी दल का हो उसके अंदर कोई ज्वाला नजर नहीं आती । ऐसा लगता है कि इस देश में कहीं कुछ हो नहीं रहा है । जो हो रहा है वह र्सार्थक कम, निर्रथक अधिक है । जीवन जीने और देश को सही राह दिखलाने की आकांक्षा में हम कहीं घिसटते चले जा रहे है । आज की राजनीति सियासत की राजनीति है । कुर्सी राजनीति है । सिद्धान्तों से अधिक व्यवहारों की राजनीति है । वर्तमान राजनीति में कुर्सी जितने दावेदार आज दिखाई दे रहे हैं उतने शायद पहले कभी नहीं दिखे । हर दल और हर व्यक्ति का उद्देश्य एक ही है- सत्ता की प्राप्ति । k भी चाहिए जो यह कह रहे हैं कि मैं कुर्सी पीछे नहीं हूँ और कुर्सी भी चाहिए जो सत्ता का सुख एक बार भोग चुके हैं । राजनीति कुर्सी सिमटती जा रही है । उस कुर्सीलिए निश्चय हीं कुछ जोड-तोड करना पडता है, दाव-पेंच दिखलाना होता है, दिल्ली से सिंगापुर की यात्रा करनी होती है तथा जनता को भ्रमजाल में फंसाना भी पडता है ।

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