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September , 2010
Thursday

शिक्षा::गोपाल ‘अश्क’

Posted by Himalini On January - 8 - 2010
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gapal copy की राजनीति तो समझ में आती है, किन्तु शिक्षा में राजनीति समझ में नहीं आती । शिक्षा और राजनीति दोनों एक सामाजिक क्रियाकलाप है । दोनों का उद्देश्य समाज को अग्र दिशा की ओर उन्मुख करना है । अपने नागरिकों को शिक्षित करना राज्य का प्रमुख धर्म है, दायित्व है । अपने इस दायित्व से राज्य विमुख नहीं हो सकता । क्योंकि उसे मालूम है कि बगैर शिक्षित नागरिक के समाज या राज्य विकसित नहीं हो सकता । राज्य को सही ढंग से संचालित करने के लिए विभिन्न राजनैतिक शक्तियों का निर्माण किया जाता है । राजनैतिक पार्टियों की शक्ल-सूरत में । शिक्षा के विकास के लिए भी राज्य द्वारा शैक्षिक नीति, नियमों आदि का निर्माण और कार्यान्वयन किया जाता है । इसी को शिक्षा की राजनीति कहते हैं । यहाँ तक तो ठीक है, परन्तु जब योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाये जाते हैं और बगुलों को हंस का प्रमाणपत्र दिया जाने लगता है, तब शिक्षा में राजनीति होने लगती है । अपने दलगत स्वार्थसिद्धि हेतु शिक्षा का प्रयोग किया जाने लगता है तब अच्छे-बुरे की पहचान नहीं रह जाती । हकीकत यह है कि शिक्षा एक सफल व्यक्तित्व का नहीं असल व्यक्तित्व का निर्माण करती है । शिक्षा के शब्दकोश में सफलता-असफलता की बात नहीं होती, ज्योति की बात होती हैं, ज्ञान की बात होती है ।

आज नेपाल में शिक्षा बहस के चौराहे पर खडी है । चारां तरफ शिक्षा पर चर्चा होती रहती हैं, बातें होती रहती हैं । कई बार सुना, नेपाल की शिक्षा राजनैतिक हस्तक्षेपों का शिकार है । एक तरह से बर्बाद हो चला है शिक्षा जगत् । विद्यार्थी-शिक्षक, शिक्षक-शिक्षक या अभिभावक-शिक्षक के बीच अन्तर्विरोध है । सम्बन्धों में मिठास नहीं है । अब तो प्रधानाध्यापक अपने शिक्षकों से डरते हैं- जाने कब क्या हो जाए – अर्थात् अनुशासन-हीनता चरमोत्कर्षपर है ।

‘शिक्षा में राजनीति’ निश्चित रुप में एक मुकम्मल विषय है शोध प्रबन्ध का । किन्तु मैने इसे पृष्ठभूमि के रूप में ही व्यक्त करने की कोशिश की है । आप चाहें तो भले ही इसे किसी बडे कैनवास पर उतार लें । यथार्थ के धरातल पर खडे होकर कुछ कह पाना एक जटिल कार्य है । हकीकत यह है कि दक्षिण एशिया में सत्ता परिवर्तन होते ही शैक्षिक नीति-नियमों में परिवर्तन हो जाता है । यही तो है शिक्षा में राजनीति । नेपाल में शिक्षा अपनी प्रारम्भिक अवस्थाओं से ही राजनैतिक सोच का शिकार होती आई है । नेपाल में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत वि.सं. १९१० में हर्ुइ । अपनी सन्तान को अंग्रेजी शिक्षा दिलाने के मकसद सें दरबार में ही स्कुल का संचालन करवाया गया था । आम नेपाली जनता कोसो दूर थी शिक्षा की ज्योति से । इसके बाद चन्द्र शमशेर ने वि.सं. १९७५ भाद्र २७ को इन्टरमिडिएट कालेज के रूप में त्रिचन्द्र कालेज की स्थापना की । उद्घाटन समारोह में दिये गये भाषण से उनकी शिक्षा के प्रति की सोच उजागर होती है- मैं अपने पैंरों पर खुद ही कुल्हाडी मार रहा हूँ । इतना ही नहीं पद्म शमशेर को शिक्षा के प्रति अधिक उदारता के कारण ही उन्हें स्वंय पदच्युत पडा । राणाकाल में शिक्षा का औपचारिक प्रारम्भ हुआ । किन्तु, आम नेपाली जनता की पहुँच नहीं थी । उसके बाद वि.सं. २००७ में नेपाल में प्रजातन्त्र की स्थापना हर्इ । वि.सं. २००७ से २०४७ के काल में शैक्षिक, नीति-नियम, कार्य-योजना में कई बार परिवर्तन हुआ । राजा महेन्द्र ने तो पंचायती शासन का गुणगान करने वाली शैक्षिक नीतियों का निर्माण किया । उनकी सोच के मुताबिक नेपाल में एक ही शासन विचार चला- एउटै राजा एउटै देश, एउटै भाषा एउटै भेष । -अर्थात् एक ही राजा एक ही देश, एक ही भाषा एक ही भेष) इस से पंचायतकालीन शिक्षा में राजनैतिक हस्तक्षेप अक्षरशः प्रमाणित हो जाता हैं ।

अब बात आती है आज की । आज की शैक्षिक नीति तो स्वयं रोगग्रस्त है । राज्य अनुत्तरदायी हो गया है । ऊपर से नीचे तक की व्यवस्था अस्तव्यस्त है । आज पूरा शिक्षाक्षेत्र राजनैतिक हस्तक्षेपों से आक्रान्त है । नीजी स्रोत, दरबन्दी और राहत कोटा के साथ-साथ अन्य कई शर्ष्क में शैक्षिक जनशक्ति की बहाली होती है । हरेक शर्ष्क का एक निर्धारित मूल्य अंकित है । शिक्षा जगत् के व्यक्तियों से यह बात छुपी हर्इ नहीं है । निर्धारित रकम भेंट कीजिये, शिक्षक बनियें यह है आज की शैक्षिक नीति । एक तरफ भ्रष्टाचारियों का तांडव ह,ै तो दूसरी तरफ राजनैतिक विसंगतियों का नंगा नाच । आये दिन किसी न किसी बहाने विद्यालय बन्द होते रहते हैं । बच्चे पढ नहीं पातेर्,र् इमानदार शिक्षक पढा नहीं पाते । बर्ेइमानों की तो बात ही क्या करें – एक आँकडां के अनुसार तर्राई के कतिपय विद्यालयों में ८० दिन भी पढर्ई नहीं होती । शिक्षाविद् केदारभक्त माथेमा के अनुसार- “वर्षमें कम से कम १८० दिन विद्यालय खुलने चाहिये, किन्तु हमारे यहाँ कई ऐसे विद्यालय हैं जो ८० दिन भी नहीं खुलते ।” -शिक्षक सं. वसन्त थापा, फागुन २०६४) आखिर ऐसा क्यों होता है – इस प्रश्न का जबाव रोगंटे खडा कर देता है । सही बात तो यह है कि हमारे शिक्षकों की मानसिकता ही बिगड गई है । वे विद्यालय में शिक्षक से अधिक किसी राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत होते हैं । अपनी राजनैतिक आस्था के कारण वे लोकप्रिय-अलोकप्रिय होते हैं, और बात यहाँ तक आ जाती है कि विद्यालयों में पर्ढाई कम छुट्टयिाँ अधिक होती नजर आती है । लगता है संसार में एकदम कम पढर्Þाई होने वाला देश नेपाल ही हैं । भोजपुरी लोकोक्ति ‘परुवा बैल के हेव के आसरा’ चरितार्थ है शैक्षिक जगत में । शिक्षक तैयार रहते हैं कि कोई बहाना मिल जाय, विद्यालय बन्द कर देने का ।

नेपाल की शिक्षा विसंगतियों की मारी है । सरोकार वाला भले ही लाभान्वित न हो, लेकिन बाहरी तत्व लाभान्वित होता है । नेपाल की शिक्षा में अनावश्यक ढंग से बाहरी लोगों का हस्तक्षेप है । पढे-लिखे लोगों पर मूर्खों का शासन चलता है । आज कक्षा ९ से १२ तक को माध्यमिक मानने की बात चली है । ± २ तक की शिक्षा देने का मतलब स्नातकोत्तर तक की उपाधि हासिल की हर्इ जनशक्ति की आवश्यकता । विद्यालय को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिये विद्यालय व्यवस्थापन समिति का गठन किया जाता है । जिसमे अभिभावक, सम्वधित विद्यालय का प्रधानाध्यापक तथा जिला शिक्षा कार्यालय का प्रतिनिधि स्रोत व्यक्ति की महत्वपर्ूण्ा भूमिका होती है ।

जब विद्यालय व्यवस्थापन समिति के पदाधिकारियों का चुनाव होता है तो किसी संसदीय चुनाव से कम नही होता । वही वोट की राजनीति, वही साम-दाम, दण्ड-भेद की नीति । समझ में नहीं आता विद्यालय में शिक्षा की हालत सुधारने के लिये किया जाने वाले समिति के चुनाव में ऐसा क्या है जिसको पाने के लिये लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं – शायद सहयोग में मिलने वाली अन्तर्रर्रीय राशि की बन्दरबाट के लिये या फिर अपनी राजनैतिक मान्यताओं को अन्जाम देने के लिये । नेपाल में जनवादी शिक्षा के लिये ने.क.पा. माओवादी -एकीकृत) ने जनवादी स्कूल का संचालन करके विद्यार्थियों को राजनीतिक शिक्षा देना प्रारम्भ किया । सैन्य शिक्षा का प्रस्ताव रखा । नागरिकों के हाथ में बन्दूक देकर नागरिक सर्वोच्तता की दुहाई दी । वाह रे नेपाली राजनीतिक और वाह रे शिक्षा, हम जानते है कि शिक्षा का एक अपना दर्शन होता है । न वह सामन्तवादी होती है न वह व्यक्तिवादी होती है औ न वह जनवादी होती है । हमें समय रहते शिक्षा को राजनैतिक प्रभावों से मुक्त कराना होगा । वरना वह दिन दूर नहीं जब नेपाली शिक्षा त्रासदी का शिकार होगी । अंधयुग का उदय होगा और हम अपनी पीढियों के आरोपों से व्यथित होंगे । पर्ूव शिक्षामंत्री रेणु यादव की इस अभिव्यक्ति पर ध्यान दें कि शिक्षक नेताओं ने युनियन को पेशागत हक-हित के बदले राजनीति करने के माध्यम के रूप में प्रयोग किया है । -कान्तिपुर बुधबार २९ माघ २०६५) अतः शिक्षालयों को ‘ज्ञान का मंदिर’ ही बनाये रखें, राजनीति का क्रीडास्थल नहीं ।

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