संघीयता पर लगता सवालिया निशान::अरुण ठकुरी
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बाँर्तमान अन्तर्रर्रीय दृष्टिकोण के अनुसार संघीयता एक शंकास्पद विषय माना जाने लगा है । बहुत गहरे अर्थों में संघीयता से अलगाववाद की बू आती है’- श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपाक्षे का उक्त बयान तमिल स्वायत्तता के विषय में उठाए गए सवाल का जवाब था । राष्ट्रपति राजपाक्षे ने कहा था कि उसे संघीयता के पक्षमें किसी प्रकारका जनादेश प्राप्त नहीं है ।
श्रीलंका के विपरीत नेपाल के मामले में वर्तमान संविधान सभा में राष्ट्रीय जनमोर्चा को छोडकर बाँकी तेइस राजनीतिक दल संघीयता को चुनावी प्रतिबद्धता बनाकर संविधान सभा में निर्वाचित हुए हैं । नेपाली जनता संघीयता चाहती है । यह बात संविधान सभा निर्वाचन के परिणाम से स्पष्ट है, लेकिन नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य में संघीयता का विषय इतना विवादास्पद बन गया है कि इस विषय के कारण शान्ति-प्रक्रिया के साथ-साथ संविधान निर्माण भी अनिश्चित होता जा रहा है ।
संघीयता एक विषय है जो राष्ट्रों को जोडÞने वाले मामले से जुडा हुआ है । इस बात का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है कि संघीयता के अभाव में कोई देश निर्धन एवं कमजोर है, अथवा संघीयता होने के कारण ही कोई देश समृद्ध और सुदृढ हुआ है । जहाँ तक नेपाल का मामला है, नेपाल-एकीकरण के बाद केन्द्रीय सत्ता पर जातीय, क्षेत्रीय एवं भौगोलिक भेदभाव का आरोप लगता आया है । गणतंत्र स्थापना के साथ संघीयता का मुद्दा सम्पर्ण् नेपाल में मुखरित हुआ । लेकिन, संघीयता को सही अर्थों में संस्थागत करके श्रोत के उचित परिचालन, समानता एवं समान अवसर प्रदान कर राष्ट्रीय विकास में सहभागी कराने की बजाय यह विषय राजनीतिक एवं सत्ता प्राप्ति के स्वार्थ्र् जुडने के कारण इतना प्रदूषित हो गया है कि संघीयता का विषय विखंडन के भाव से जोडकर देखा जाने लगा है ।
करीब ६०० रियासतों को मिलाकर सुदृढ भारत का निर्माण करने वाले प्रथम भारतीय गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल यदि आज जीवित होते तो तेलंगाना विवाद के कारण भारत में मच रही संघीयता की हडकम्प को देखकर निश्चय ही असन्तुष्ट होते । स्वतंत्रता के सिपाही एवं भारत निर्माण के अभियन्ता स्व. पटेल का योगदान सिर्फ११ दिन अनसन बैठ कर राजनीति करने वाले टी. चन्द्र शेखर राव के नाटक के सामने भुला दिया गया – नेपाल एकीकरण करने वाले श्री ५ पृथ्वी नारायण शाह ने क्या इसीलिए नेपाल का एकीकरण किया था कि नेपाल राजनीतिक बन्दरबाँट की वस्तु बने -
असमानता, अ-समावेशी करण, शक्ति एवं स्रोत के केन्द्रीय करण के विपक्ष में आवाज उठना जितना स्वाभाविक था उससे बहुत अधिक अस्वाभाविक तरीके से संघीयता का मामला उठाया गया । शक्ति और स्रोत पर कुण्डली जमाए रखने का दो सौ पचास साल पुराना जो चरित्र नेपाली राजनीति मंे अभी भी व्याप्त है, क्या संघीय-संरचना में प्रवेश करते ही वह चरित्र स्वतः तिरोहित हो जाएगा – स्वयं को परिवर्तन के संवाहक के रूप में प्रस्तुत करने बाले जिन राजनीतिक दलों की प्रवृत्ति पर्ण् विकेन्द्रीकरण के पक्ष में नहीं दिखाई देती है ऐसे राजनीतिक नेतृत्व से संघीय संरचना कैसे सफल होगी यह बात स्पष्ट होनी जरुरी है ।
चीन के नेता माओत्सेतुङ की राजनीति से प्रभावित होकर नेपाल में चीनी माँडल की व्यूह रचना करने वाले माओवादी आज अपने राजनीतिक हितांे के आधारपर संघीयता का मामला उठा रहे है । वास्तविक मामला नेपाल अधिराज्य के संविधान-२०४७ के अस्तित्व में आते ही शुरू होने लगा था । कतिपय अ-प्रजातान्त्रिक मान्यताएं उक्त संविधान के प्रति असन्तुष्ट थी । कालान्तर में यह असन्तुष्टि माओवादी व्रि्रोह के रूप में अभिव्यक्त हर्इ । यह अलग बात है कि माओवादी व्रि्रोह के उत्तर्रार्द्ध में माओवादियों को राज्यसत्ता के मूलधार मं लाने के प्रयास हुए, जिन में दिल्ली में तत्कालीन आठ राजनीतिक दलों को बीच बारह सूत्रीय समझौते के तहत नेपाली राजनीति ने नयाँ मोड लिया । नेपाल सरकार और माओवादी व्रि्रोहियों के बीच वृहत् शान्ति समझौता एवं संविधान सभा निर्वाचन को अत्यन्त सकारात्मक घटना के रुप में महसूस किया गया । बारह सूत्रीय समझौता एवं तत्पश्चात किए गए राजनीतिक अनुबन्धांे में लोकतान्त्रिक पद्धति को आधार माना गया था । लेकिन, जिन मुद्दांे से माओवादियों के पृथक होने की कल्पना की गयी थी वह कल्पना यथार्थ के उलट एक स्वप्निल कल्पना मात्र थी । जिस बात की पुष्टि माओवादी क्रियाकलाप के द्वारा स्पष्ट होती जा रही है ।
गणतंत्र, जन-गणतंत्र, संघीयता एवं आत्म-निर्ण्र्का अधिकार जैसे शब्दों का उच्चारण एवं उक्त चीजों का अभ्यास ‘पाण्डोरा बाँक्स’ खुलने जैसा बन गया । एक ही मिट्टी के बने नेपाल के माओवादी यहि गणतान्त्रिक व्यवस्था प्राप्ति से सन्तुष्ट होते तो गणतंत्र स्थापना के लगभग ६ दशक के अभ्यास एवं सफल कार्यान्वयन के बावजूद भारतीय लोकतंत्र के लिए माओवादी व्रि्रोह चुनौती के रूप में सामने नहीं आता । नेपाल को अर्द्ध-र्सार्वभौम एवं अर्द्ध-औपनिवेशिक राज्य मानने वाले नेपाली माओवादियों की बात और भारत में द्वन्दरत
माओवादियों द्वारा भारत के लिए भी अर्द्ध-र्सार्वभौम एवं अर्द्ध-औपनिवेशिक राज्य के रुप में अभिव्यक्त करने के तार क्यों जुडÞ रहे हैं – कम्पोसा एवं रेड-कँारीडोर के प्रतिपादक ने.क.पा. माओवादियों द्वारा राज्य सत्ता के मूलधार में आने के बावजूद उक्त मान्यता को भारतीय माओवादी उठा रहे हैं – क्या दक्षिण एशिया में जातीय संर्घष्ा एवं इन्हीं अथार्ंर विखण्डन का प्रवेश मार्ग ही नहीं कतिपय अर्थों मंे उक्त षडयन्त्र का सफलतम अभ्यास नेपाली भूमि के अन्दर तो नहीं रचा जा रहा है -
यदि श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपाक्षे की संघीयता सम्बन्धी मान्यता को सही ठहराया जाता है तो गणतंत्र, जातीय-भाषिक संघीयता-आत्मनिर्ण्र्के अधिकार जैसे मुद्दों की निरन्तरता एवं क्रमिकता दक्षिण एशिया के लिए कठिन चुनौती बनना निश्चित है । प्रश्न संघीयता के खराब या अच्छी व्यवस्था होने का नही है, बल्कि इस मान्यता के अन्दर छिपे षडयन्त्र को ठीक से पहचान करने से सम्बन्धित है । नेपाल के राजनीतिक परिदृष्य में माओवादियों की मान्यता के मुताबिक जातीय-भाषिक माँडल की संघीयता पर सहमति बनने के आसार नही दिखते । जिस बात को एकीकृत ने.क.पा. माओवादी भी अच्छी तरह जानते है । संविधान सभा में सबसे बडा दल एकीकृत ने.क.पा. माओवादी की स्थिति निर्ण्यक है । क्योंकि माओवादी र्समर्थन के बिना किसी भी प्रकार के संवैधानिक प्रावधान तय नहीं किए जा सकते । लेकिन अंकगणितीय रूप में अल्पमत मंरहे माओवादी भी संविधान सभा में अपनी मान्यता को अकेले स्थापित नहीं कर सकते हैं । नेपाली राजनीति की उक्त अवस्था को आत्मसात करके सहमति के द्वारा संवैधानिक निकास देने के उलट एकीकृत ने.क.पा. माओवादी नेपाल के अन्दर जातीय आधार पर गणराज्य की घोषणा कर रहे हैं । हालांकि माओवादी नेतृत्व द्वारा उक्त घोषणा को प्रचारात्मक घोषणा के रूप में लिए जाने की बात कही गयी है । लेकिन, प्रश्न यह है कि संविधान सभा के सबसे बडे और निर्ण्यक दल की हैसियत प्राप्त एकीकृत नेकपा माओवादियों का गणराज्य घोषणा कार्यक्रम स्वयं को समानान्तर राज्य के रूप में प्रस्तुत करने की मान्यता से नहीं जुडÞा है – माओवादियों की मान्यता एवं उनके क्रियाकलाप शान्ति-प्रक्रिया, संवैधानिक एवं राजनैतिक निकास के पक्ष में नहीं हं । जिसका परिणाम भावी दिनों में दिखाई पडने के संकेत आने लगे है । दक्षिण एशिया की छोटी सी इकाई के रूप में स्थित नेपाल में हो रहे राजनीतिक षडयन्त्र के अभ्यास दक्षिण एशिया के मानचित्र के लिए अनुभव एवं अवलम्बन बनने के आसार के प्रति समय में सचेत होना जरूरी है ।
एक बात तो तय है कि बारह सूत्रीय सहमति एवं उसके बाद नेपाल में हुए राजनीतिक परिवर्तन में कही-न-कही त्रुटि रही है । हालांकि उक्त त्रुटि के बावजूद कतिपय सकारात्मक घटनाक्रमों से इन्कार नही किया जा सकता । लेकिन सभी सकारात्मक शुभेक्षाओं के बावजूद नेपाल की राजनीति में जिस तरह के दर्भाग्यपर्ण् भविष्य के संकेत दिख रहे हैं और पर्दे के पीछे से जो षडयन्त्र की छाया दिखाई देने लगी है उस दर्भाग्य एवं षडयन्त्र को पराजित करने के लिए बारह सूत्रीय सहमति एवं तत्पश्चात के राजनीतिक विकासक्रम का ठीक से पुनरावलोकन करना जरूरी हो गया है । ‘बफर विद इन द बफर’ वाली संघीयता किसके पक्ष में है – अप्रिल-क्रान्ति के बाद मधेश में एकजूट हर्इ लोकतान्त्रिक शक्ति को विभाजित करके माओवादी प्रभाव बढाने के पीछे क्यांे साम्यवादी सहयोग मिल रहा है – दक्षिण एशिया में जारी द्वन्द्व को समाधान करने के लिए अमेरिका द्वारा चीन को निर्देश देने का क्या अर्थ है – जातीय विखंडन के सूत्र किससे जुडे हैं – आत्मनिर्ण्र्के अधिकार का नेपाल के बाद कहाँ अभ्यास होना है – अपने ही दर्शन को नेपाल में स्थापित करने वाले माओवादियों के मुद्दां के कारण जो विखण्डन के हालात उत्पन्न हो रहे है उसी के लिए नेपाल में चीनी सेना उतारने की धम्की का क्या अभ्रि्राय है – उपरोक्त सारे सवाल का सवाल यदि एक ही टोकरी में रख कर देखा जाय तो स्थिति अत्यन्त गंभीर एवं चुनौतीपर्ूण्ा नजर आती है । क्या इस षडÞयन्त्र को परास्त करने के लिए विगत की त्रुटियों की स्वीकारोक्ति एवं पुनर्-समीक्षा के द्वारा सुदृढ संयन्त्र का निर्माण करके सहज निकास की ओर बढने का माद्दा दक्षिण एशियायी समुदाय के पास है -
शिविर में रह रहे माओवादी लडाकुओं को नेपाली सेना में समायोजन करने के मामले में भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर की जो धारणा आई है वह धारणा नेपाल में अतिवादी व्यवस्था के पक्षधरों के मंुह पर तमाचा है । भारतीय सेना की सही और दूरगामी मान्यता के साथ-साथ नेपाल एवं दक्षिण एशिया में लाल साम्राज्य फैलाने की साजिश को रोकने के लिए जिस प्रकार की भारतीय र्समर्थन एवं सकारात्मक राजनीतिक सहयोग एवं पहल की आवश्यकता को महसूस किया जा रहा है, उस में विलम्ब करने का परिणाम लोकतन्त्र के प्रतिबद्धता के विपरीत है ।

