दिशाहीन होती नेपाली राजनीति::पिताम्बर दाहाल
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देश की राजनीति दिशाहीन होती जा रही है । संविधान निर्माण प्रक्रिया दिशाहीन राजनीति की वजह से अबरुद्ध हो गयी है । हमारे नेतागण शान्ति प्रक्रिया को निर्ण्यक बिन्दु पर पहुचानें का भाषण देते हैं, लेकिन उन्हीं नेताओं के जिद के कारण पूरा राष्ट्र अशांत होते जा रहा है जब देश की राजनीति गतिशील नहीं हो तो राष्ट्र कमजोर होता है । आज हमारा देश इतिहास में सब से कमजोर अवस्था से गुजर रहा है । हमारी राष्ट्रियता कमजोर हो रही है । हमारी सभ्य संस्कृति निर्रथक होती जा रही है । हमारा अपनापन खोता जा रहा हैं । हमारी अपनी पहचान लुप्त की संभावना दिखाई दे रही है ।
हमारें यहाँ संवैधानिक व्यवस्था अपनाने का अनोखा सिस्टम स्थापित हो रहा है । बाहुबल के माध्यम से अपनी चाहत को प्राप्त करने की दिशा में लोग लग गए हैं । सडक दर्घटना में अगर किसी की मौत हो जाती है तो आगजनी तोडफोड और चक्का जाम करना तो सामान्य बात हो गयी है । दर्घटना में मरे व्यक्ति को शहीद घोषणा करवाने की माँग भी होने लगी है । हमारी सभ्यताएँ, हमारी जीवनशैलियाँ और हमारी दैनिकी किस ओर जा रही है – दूसरे देशो के लोगो की नजर में हम कैसे दिखने लगे है – दुनियाँ के सामने हमारा क्रियाकलाप एक अनोखा कार्टर्बनता जा रहा है । हमारी राजनीति किस ओर जा रही है – हमारे नेता किसी अखबार में छपे कार्टर्जैसे होने लगे हैं । बोलते हैं कुछ करते हैं और कुछ । इसी वजह से राजनीति गतिहीन होती जा रही है । राजनीतिक मर्यादा और नैतिकता स्खलन होते जा रहा है । अराजकता पनप रही है, और दण्डहनिता र्सवव्यापी हो गयी है । नेताओं ने संबैधानिक व्यवस्था को और कमजोर किया हो ।
हम सब कहते है कि समझदारी से सहकार्य करें । हमारे नेतागण भी यही कहते हैं । लेकिन सहमति का सदैव अभाव रहा है । अपनी-अपनी जिद में अडेÞ रहने से कैसे समाधान हो पाएगा – संविधान निर्माण राष्ट्र का प्रमुख एजेण्डा है । संघीय लोकतांत्रिक गणतन्त्र हमारी पद्धति और संकल्प है । राजनीतिक p नेतागण राष्ट्र निर्माण के इस अभियान में समाहित क्यों नही होते हैं – ऐतिहासिक जन-आन्दोलन से हमें जो उपलब्धियाँ प्राप्त हर्इ है उसे सुनिश्चित करने के लिए भी राजनीतिक बृत्त में सहमत होना आवश्यक है । हम मानते है कि राजनीतिक दलों का अपना-अपना सिद्धान्त होता है । पृथक पृथक नीतियाँ होती हैं, लेकिन एजेण्डा तो सबका एक ही है- “संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र, प्रदेशों का निर्माण नयाँ संविधान सुनिश्चित करना” अगर हम अपनी-अपनी जिद पर अडे रहे तो क्या संविधान निमार्ण्र् पाएगा – क्या अकेले कोई एक p देश की रचना कर पाएगी – इन तमाम प्रश्नों का उत्तर है- “नहीं । इसीलिए कहीं न कहीं हमें समझौता करना ही है । नहीं तो आप सब इतिहास में सबसे बडा निकम्मा और बर्इमान साबित होगें ।
हम जानते है कि संविधान सभा में एकीकृत माओवादी सबसे बडी p । हम यह भी जानते हैं वह इतना बडा भी नहीं हैं कि अकेले वह संविधान निमार्ण्र्र सके । ये भी सच है कि माओवादी सहमत न होने से संविधान निमार्ण्र्र्य असंभव है । जनता ने संविधान सभा का प्रारूप इस प्रकार से गठन कर दिया है कि संविधान निर्माण के महान कार्य में सम्पर्णा राजनीतिक शक्तियों को समझौता करना ही होगा । इस में हठ और जिद की कोई गुन्जाइश नहीं है । माओवादी नेताओं को समझना चाहिए कि उन्हे सत्ता से बेदखल किसी ने नहीं किया है । माओवादी नेतृत्व की सरकार को स्वयं उन्ही नें गिराया था । गठबन्धन सरकार होते हुए भी अकेले अनेक निर्ण्र्लेने का जो रास्ता प्रचण्ड ने अपनाया उसी के फलस्वरूप । लेकिन अब वे नागरिक सर्वोच्चता का सवाल उठाकर आन्दोलन कर रहे हैं । आखिर नागरिक सर्वोच्चता का अर्थ क्या है – क्या माओवादी का र्सवसत्ताबाद को स्वीकार करना नागरिक सर्वोच्चता है -
हम संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र को स्वीकार कर चुके हैं । संघीय राज्य का सीमांकन राजनीतिक सहमति से होना है । प्रदेशों के नाम में भी हम सब को सहमति जताना है । लेकिन आर्श्चर्य की बात है कि माओवादी अकेले संघीय राज्य का सीमांकन सडÞक से करता रहा है । शासक माओवादियों के इस रबैये से लोकतंत्र जनता के जीवन तक नही पहुँच पाएगा । संविधान निर्माण कार्य और कठिन होगा । क्या सडक, चौक चौराहे पर भीड इक करके घोषणा करने से प्रदेशों का निर्माण होता है – माओवादी इतर पार्टियों ने भी अपने अपने अलग अलग प्रकार से प्रदेश का निमार्ण्र्रने लगे तो क्या होगा – क्या इस प्रक्रिया से संविधान बन पाएगा – माओवादियों ने जिस प्रक्रिया को अपनाया है वह अनुत्तरदायी प्रक्रिया है ।
हमें एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए । निषेध की राजनीति अब नेपाल मंे कामयाब नहीं होगी । नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, एकीकृत नेकपा माओवादी, मधेशी जनअधिकार फोरम और संविधान सभा मंे उपस्थित पार्टियों की शर्ीष्ा नेतागण सम्मिलित एक राजनीतिक संयन्त्र के भीतर राष्ट्रिय एजेण्डा पर बहस करके नयाँ निर्ण्र्ाालिया जाना चाहिए । प्रदेशों का निर्माण सडÞक से नहीं बल्कि उच्च राजनीतिक संयन्त्र के भीतर किया जाना चाहिए नेताओं से जनता की यही अपेक्षा है ।
अन्तरिम संविधान के मुताबिक २०६७ जेष्ठ महीना १४ गते तक नयाँ संविधान जारी होना ही है । अगर समय सीमा के भीतर संविधान नहीं बन पाया तो क्या होगा – क्या वर्तमान संविधान सभा बरकरार रह पाएगी – विघटन संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाएगा – वैधानिकता प्राप्ति के लिए जनमत संग्रह का रास्ता अपना पडÞेगा । देश को लम्बे समय तक संक्रमण काल से गुजरना होगा । अगर समय पर जनता को हम ने संविधान नहीं दिया तो संविधानसभा, व्यवस्थापिका संसद और सरकार एक ही बार विघटित हो जाएगी । ऐसी अवस्था में प्रधानमंत्री के कार्यकारी अधिकार स्वतः राष्ट्रपति महोदय में निहित हो जाएंगे । लोकतंत्र के स्थायित्व के सवाल पर ऐसा होना दर्ुभाग्यपर्ूण्ा है । संविधान बनाने के लिए संविधानसभा का निर्वाचन हुआ है । जिस प्रयोजन के लिए जनता ने जिन्हें अपना अभिमत दिया है उन्हें अपने कर्तव्यों को निभाना ही पडेगा । इसलिए छोटे-मोटे मतभेदों को त्याग करके समय की पावन्दी को महसूस करते हुए संविधान निर्माण मंे संलग्न होने का विकल्प नहीं है ।

