8
September , 2010
Wednesday
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भारत में नये राज्य की माँग समय-समय पर उठती रही है । अलग राज्य निर्माण को लेकर हुए आंदोलनों ने कई वार भारत सरकार को झुकने पर मजबूर भी किया है । इन्ही आंदोलनों का परिणाम है कि भारत में छतीसगढ, उत्तराखण्ड और झारखण्ड जैसे प्रदेश अपने-अपने मूल्य राज्यों से अलग होकर बने है ।

अभी हाल के दिनां में टी.आर. एस. प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव ने अलग तेलंगाना प्रदेश की माँग को लेकार आन्ध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद में आमरण अनशन शुरू किया था । ग्यारह दिनों के अनशन से केन्द्र की कांग्रेस सरकार और उसके प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इतने घबरा गये कि सरकार ने आनन-फानन में अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा कर दी । तेलंगाना राज्य निर्माण की मांग कोई नयी नहीं है । के. चन्द्रशेखर राव के पार्टर्लंगाना राष्ट्र समिति का गठन अलग तेलंगाना राज्य निर्माण की माँग को केन्द्र बिन्दु बना कर ही किया गया था । अपने स्थापना काल से हीं टी. आर. एस. अलग राज्य की माँग करता आ रहा है । वर्ष२००४ के लोकसभा चुनाव के बाद टी. आर. एस. को ऐसा लगा था कि उसने केन्द्र की काँग्रेस यू पीए सरकार को अगर र्समर्थन किया तो अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण अवश्य हो जाएगा । फलतः टी.आर.एस. ने सरकार को अपना र्समथन भी दिया । इतना ही नही टी.आर.एस. प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव उक्त सरकार में मन्त्री भी बने । लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल पूरे होने में जब कुछ ही दिन शेष थे तो चन्द्रशेखर राव को लगा कि सरकार तो अब उनके साथ धोखा कर रही है अतः उन्होने मंत्रीपरिषद से इस्तीफा देकर सरकार से र्समथन वापस ले लिया । सरकार से बाहर आने के बाद अलग राज्य की माँग को उन्होंने जोर-शेार से उठाया । एक प्रकार से आंदोलनों का दौर चल पडा और टी.आर.एस. प्रमुख के अनशन से घबरायी केन्द्र सरकार ने तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा कर डाली ।
केन्द्र द्वारा अलग तेलंगाना राज्य की घोषणा के साथ हीं पूरे आन्ध्रप्रदेश में राजनीतिक खेमाबन्दी का दौर शुरु हो गया । आन्ध्र की राजनीति इस मुद्दे पर दो भाग में बँट गई है । एक तरफ टी.आर.एस. अपनी माँग पूरी होने पर जश्न मना रहा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस का एक तबका समेत चन्द्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टर् फिल्म अभिनेता चिरंजीवी के नेतृत्व वाली प्रजा राज्यम् पार्टर् संयुक्त आन्ध्र प्रदेश को लेकर वृहत जनआन्दोलन छेड दिया है । तेलंगाना के पक्ष और विपक्ष में शुरू हुआ यह आन्दोलन आन्ध्रप्रदेश तक ही सीमित नहीं है । अब यू पी की मुख्यमंत्री मायावती देश के सबसे बडे राज्य यू पी को तीन भागों में बाँटने की माँग कर रही है तो दार्जलिंग में गोरखालैण्ड की पुरानी माँग अब नये सिरे से उठने लगी है । महाराष्ट्र में विदर्भ और बिहार में अलग मिथिलाचंल राज्य की माँग भी अब जोर-शोर से की जा रही है । पूरे देश में अलग राज्य की माँग को लेकर एक आँधी सी चल पडी है जो रूकने के लिए फिलहाल तैयार नही है । इधर आन्ध्रप्रदेश में अलग तेलंगाना और अखण्ड आन्ध्रप्रदेश को लेकर तटीय एवं राँयल सीमा क्षेत्र में चल रहे जोरदार आन्दोलनों और राज्य मन्त्रिमण्डल के मन्त्रियों, विधायकों के त्यागपत्र एवं अपने हीं पार्टर्नेताओं द्वारा जारी व्रि्रोह से घबरा कर केन्द्र सरकार ने अब पैतरा बदलना शरू कर दिया है । सरकार का यह ताजा बयान कि तेलंगाना पर फैसला सभी पक्षों को विश्वास में लेकर किया जायेगा, ने पुनः अन्ध्रा की राजनीति में नया आग लगा दिया है ।

यहाँ सबसे तथ्यपरक बात यह है कि क्या के. चन्द्रशेखर राव के ग्यारह दिनों के आमरण-अनशन से घबरा कर केन्द्र सरकार को अलग तेलंगाना राज्य के निर्माण की घोषणा करनी चाहिए थी या फिर टी.आर.एस. समेत देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों और आन्ध्रप्रदेश में कार्यरत क्षेत्रीय दलों के साथ मिल बैठ कर तेलंगाना मुद्दे का हल निकाला जाना चाहिए था । राजनीतिक पंडितो का ऐसा मानना है कि केन्द्र सरकार ने जल्दबाजी में निर्ण्र्लिया है । सरकार को बेहतर राजनीतिक माहौल में होशियारी पर्वक इस समस्या का सामाधान करना चाहिए था जो नहीं हो सका । भारत सरकार अगर सूझ-बुझ से काम ली होती तो आज आन्ध्रप्रदेश के अलावें अन्य राज्यों में अलग राज्य की माँग का जो सिलसिला शुरू हो गया है वह शुरू नहीं होता ।

देश की आजादी के बाद भारतीय संघ को मजबूत करने तथा भारत को एक सूत्र में बाँधने के लिए स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृहमन्त्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने ६०० देशी रियासतों का विलय भारतीय परिसंघ में कराया था । सरदार पटेल ने अपने जीवन में कभी यह नहीं सोचा होगा कि जिस भारत को वे इतनी मजबूती प्रदान कर रहे हैं उसे हमारे हीं देश के नेता अपनी-अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाने के लिए अलग-अलग राज्यों में विभाजित कर देगें । खैर अभी भी समय है भारत सरकार गंभीरता पर्ूवक विचार करे । अलग राज्य का निर्माण विकास का मुख्य पैमाना नहीं हो सकता । उदाहरण के लिए हम बिहार से अलग हुए झारखण्ड को हीं देखें । अलग झारखण्ड निर्माण के बाद वहाँ शुरु राजनीतिक अस्थिरता और नक्सली गतिविधियाँ रुकने का नाम हीं नही ले रही है । अभी झारखण्ड में विकास का मुद्दा गौण हो गया है । अतः भारत सरकार और देश में कार्यरत सभी छोटे-बडÞे राजनीतिक दलों को अपने-अपने स्वार्थ-सत्ता से ऊपर उठकर देश की एकता-अखण्डता एवं विकास के लिए काम करना चाहिए । इसी में देश, सरकार एवं राजनीतिक दलों की भलाई है ।

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