ल्रि्रहान रिपोर्ट पर राजनीतिक बावेला::अवधेश कुमार
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बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जारी ल्रि्रहान आयोग रिपोर्ट ने भारत की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है । राष्टीय स्वयंसेवक संघ परिवार एवं भाजपा विरोधी इसमें दोषी माने गए नेताओं और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं । दूसरी ओर भाजपा ने इस रिपोर्ट को एक सिरे से ही नकार दिया है । भारतीय संसद के दोनों सदनों में इस पर बहस हो चुकी है और गृह मंत्री पीं चिदम्बरम बहसों के जवाब में सरकार का पक्ष भी रख चुके हैं । यह बात तो बिल्कुल साफ है कि केन्द्र सरकार ल्रि्रहान आयोग की रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखने के लिए अभी तैयार नहीं थी । एक समाचार पत्र ने ल्रि्राहन अयोग की रिपोर्ट लीक होने का दावा नहीं किया होता और उसे आधार बनाकर संसद में सम्पर्ण् विपक्ष ने एक स्वर से उसे पेश करने की मांग न की होती तो सरकार इसे पेश करने में कुछ समय और लगाती । ३० जून को न्यायमर्र्ति ल्रि्रहान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रिपोर्ट पेश की और कायदे से इसे संसद में रखने के लिए सरकार के पास छः महीने का समय था । संसद मे गृहमन्त्री पी. चिदम्बरम ने कहा भी था कि सरकार कार्रवाई रिपोर्ट के साथ इसी सत्र में ल्रि्रहान रिपोर्ट पेश करेगी । संसद के सत्र के बीच यदि पूरी रिपोर्ट या उसके कुछ अंश बाहर आ गए तो यह यकीनन संसदीय विशेषाधिकार पर आघात है । जो अंश प्रकाशित हुए वे मूल रिपोर्ट में भी हैं । जाहिर है, कहीं न कहीं से रिपोर्ट के कुछ अंश अवश्य बाहर आए । गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि आयोग के रिपोर्ट की एक ही काँपी गृहमंत्रालय के पास है । उन्होंने यह बयान संसद में दिया, इसलिए इस पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है । अगर ऐसा है तो फिर वहां से लीक होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए । न्यायमर्र्ति ल्रि्रहान ने भी कहा कि उनका नैतिक पतन इतना नहीं हुआ कि वे रिपोर्ट लीक कर दें ।
लेकिन आरंभ में भले रिपोर्ट का लीक होना मुद्दा था, अब यह गौण हो गया है । आगे क्या होगा कहना कठिन है, पर यह बात साफ है कि कहीं न कहीं इस रिपोर्ट को लीक कराने के पीछे राजनीतिक रणनीति रही है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टर्जस प्रकार अपने खोए हुए जनाधार को पाने
के लिए छटपटा रही है उसमें यह आशंका स्वभाविक तौर पर बलवती होती है कि मुसलमानों का र्समर्थन पाने के लिए उसने ऐसा किया हो । जाहिर है, अयोध्या एवं ल्रि्रहान रिपोर्ट पर राजनीतिक कवायद हमें आगे भी देखने को मिलेंगे । किंतु प्रश्न है कि क्या वाकई इस समय ल्रि्रहान रिपोर्ट के सामने आने से बाबरी विध्वंस मामले में काई गुणात्मक अंतर आएगा – क्या १७ वर्षबाद आए ऐसे रिपोर्ट का किसी भी दृष्टिकोण से कोई औचित्य भी हैं – बाबारी विध्वंस से संबंधित ऐसे कौन से तथ्य देश के सामने पहले से उपलब्ध नहीं है जो ल्रि्रहान रिपोर्ट के कारण उजागर हुआ है – ल्रि्रहान रिपोर्ट में जिन ६८ नेताओं का नामोल्लेख किया गया है वे सारे पहले से ज्ञात हैं । वास्तव में थोडे शब्दों में कहा जाए तो न्यायमरूरत मनमोहन सिंह ल्रि्राहन की बाबरी विध्वंस संबंधी जांच रिपोर्ट आज के लिए अप्रासंगिक बेमानी तो है ही बाबरी विध्वंस के मूल कारणों की गहर्राई से छानबीन करने की जगह केवल अपने विचार को स्थापित करन वाले अत्यंत ही सतही तर्को और कई बार बेतुके और हास्यास्पद निष्कषार्ंर्ेेे भरे हुए हैं । १७ वर्ष ३९९ बैठकें, १०० गवाहों के बयान, ४८ बार विस्तार से ल्रि्रहान आयोग ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं लाया है जिनसे मामले पर नई रोशनी पडे ।
इस रिपोर्ट में १०२९ पृष्ठ और १६ अध्याय है ।
इसके बाद गवाहों की सूची और नक्शा है । रिपोर्ट पढने से साफ हो जाता है कि बाबरी विध्वंस से संबंधित उन्होंने अपना जो विचार निर्धारीत किया उसे ही आरंभ से अंत तक साबित किया है । परिचय -इंट्रोडक्शन) और निष्कर्ष-कन्क्लूजन) वाले अध्याय को पढÞ लीजिए । परिचय के आरंभ पैरा १.१ में वे कहते हैं कि कुछ के लिए सत्ता सर्वोपरि है और सत्ता पाने की प्रक्रिया में देश, समाज, व्यक्ति कुछ भी मायने नहीं रखता है । वस्तुपूरकता, बौद्धिकर् इमानदारी एवं तार्किकता आदि सब इसमें खो जाते हैं । अपना राजनीतिक लक्ष्य पाने के लिए संविधान, कानून, लिखित-अलिखित मोरल इथिक्स.. आदि की निंदाजनक अनदेखी -क्नटेम्ट्यूअसली इग्नोर्ड) की जाती है । पैरा १.२ में वे लिखते हैं कि संघ, भाजपा, विहिप, शिवसेना के नेता विध्वंस के समय सक्रिय या निष्त्रिmय सहयोग कर रहे थे । यह सारी प्रक्रिया राजनीतिक सत्ता पाने और इस प्रकार अपना इच्छित राजनीतिक परिणाम हासिल करने की ओर लक्षित था । १.३ में उन्होंने लिखा है कि भारत एवं हिन्दू धर्म के इतिहास में यह सबसे घृणित धार्मिक असहिष्णुता का वाकया था । पृष्ठ संख्या ९४१ म् प्स्यूटो मोडरेट आफ द परिवार नाम के शर्ीष्ाक में वाजपेयी, आडवाणी, जोशी सभी की तीखी आलोचना की है । उनके चरित्र को नकली उदारवादी साबित करने के लिए ल्रि्रहान ने पूरी ऊर्जा लगाई है । संतुलन बिठाने के लिए ९४५ पृष्ठ पर मुस्लिम आर्ँगनाइजेशन नामक शर्ष्क से कुछ मुसलमान नेताओं को सांप्रदायिक कहते हुए उनके रवैये की भी आलोचना की है । वे कहते हैं कि मुसलमान नेताओं की विफलता अपने आप में ६ दिसंबर की घटना के लिए उत्तरदायी नहीं है । लेकिन उनका ठीक से काम न करने का जो आरोप है उससे संघ परिवार
का काम आसान हो गया । आयोग अपने लोगों के पक्ष को प्रभावी रूप से न उठाने के लिए और एक प्रभावी लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका अदा करने में विफलता के लिए केवल टेरटियरी लेवेल पर ही मुस्लिम संगठनों एवं नेताओं को दोषी मानता है ।
पूरी रिपोर्ट में ल्रि्रहान इस बात को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि अयोध्या आंदोलन जनता का आंदोलन कभी था ही नहीं, जन भावना उससे कभी जुडÞी ही नहीं, बस, भाजपा एवं विहिप के निहित स्वार्थी नेताओं द्वारा भावनाएं भडकाने के कारण अति सीमित संख्या में आम आदमी बहकावे में आ गए । पृष्ठ संख्या ९३१ के पैरा १५८.२ में ल्रि्रहान लिखते हैं, ‘अतिशयोक्तियों के अलावा अयोध्या अभियान को -कैम्पेन शब्द प्रयोग किया गया है, मूवमेंट नहीं ।) आम आदमी यहां तक की औसत हिन्दू की इच्छा या स्वैच्छिक र्समर्थन हासिल नहीं था । हालांकि यह अभियान उन सबको चुप कराने एवं यह सुनिश्चित करने में सफल हो गया कि यदि उन्होंने अभियान के नेताओं के निंदात्मक भाषणों का विरोध किया या स्थिति का तार्किक मूल्यांकन किया तो उन्हें नास्तिक या हिन्दू विरोधी या गैर देशभक्त करार दे दिया जाएगा ।’ आगे पैरा १५८.३ में वे लिखते हैं, ‘इस प्रकार हालांकि इस रिपोर्ट में मूवमेंट शब्द का बार-बार प्रयोग है, किंतु अयोध्या में मंदिर की मांग शब्द के सच्चे अर्थ में कभी जनआंदोलन -पब्लिक मूवमेंट) नहीं हो पाया । परंपरागत रूप से मूवमेंट या आंदोलन शब्द का प्रयोग किसी विशेष परिणाम के लिए लोगों की सामूहिक चाहत को निर्दिष्ट करता है, अयोध्या अभियान कभी उस स्तर के समानुपात को भी छू नहीं पाया । …..’
तो इस प्रकार उनकी रिपोर्ट में इस बात पर
निरंतरता है कि अयोध्या आंदोलन नामक कोई आंदेलान नहीं था, इसे संघ परिवार के नेताओं ने केवल सत्ता पाने के लिए हथियार बनाया और वे इसे आंदोलन साबित करने के लिए कर्ुतर्क देते रहे । इसे ही उन्होंने बाबरी विध्वंस को साजिश साबित करने का भी आधार बना दिया है । उन्होंने कहा है कि किसी दृष्टिकोण से साबित नहीं होता कि उपस्थित कारसेवकों द्वारा स्वतःस्फर्ूत तरीके से ध्वंस को अंजाम दिया गया । भाजपा सहित संघ परिवार के सभी प्रमुख नेताओं को किसी न किसी तरह इसके लिए दोषी करार दिया गया है । संघ परिवार और उससे जुडÞे दूसरे संगठनों की भूमिका पर भी आयोग ने प्रकाश डाला है । इस रिपोर्ट के अनुसार भाजपा, संघ, विहिप के सभी प्रमुख नेताओं ने काफी बुद्धिमता से बाबरी ढांचा ध्वंस करने की योजना को तय समय पर क्रियान्वित किया एवं वहां आनन-फानन में एक अस्थायी मंदिर भी बना दिया गया । लेकिन पूरी रिपोर्ट में वे साजिश को साबित करने के लिए कोइ तथ्य नहीं देते । जहाँ तक अटलबिहारी वाजपेयी का प्रश्न है तो इन्हंे सीधे बाबरी विध्वंश से न जाडÞकर भडÞकाऊ भाषण देने का दोषी पाया गया है । आयोग ने वाजपेयी को गवाही के लिए बुलाना तक मुनासिब नहीं समझा । यही बात शंकरसिंह बाघेला के साथ भी है । इन दोनों से पूछताछ किए और उनको अपनी बात रखने का मौका दिए बिना आयोग कैसे उनको दोषी मानने के निष्कर्षपर पहंुच गया – कई दूसरे नेताओं और अधिकारियों के बारे में भी ऐसा ही है । देखा जाए तो उस समय केन्द्र एवं राज्य सरकार में जो भी संबंधित विभागों से जुडेÞ मंत्री या अधिकारी थे उन सबको किसी न किसी तरह बाबरी ध्वसं का दोषी माना है । वास्तव में इन करणों से यह अत्यंत ही साधारण दर्जे की रिपोर्ट बन गई है ।
कोई अयोध्या के विवादित स्थल पर श्रीरामजन्म
भूमि मंदिर निर्माण को लेकर चले आंदोलन का र्समर्थक हो या विरोधी, कोई भर्र् इमानदार पर्यवेक्षक इस निष्कर्षको स्वीकार नहीं कर सकता कि उस आंदोलन से जनता का जुडÞाव था ही नहीं या वह आंदोलन ही नहीं था । सच यह है कि आजादी के बाद भारत में दो ही बडे आंदोलन हुए जिनका देशव्यापी असर था, १. आपातकाल विरोधी आंदोलन एवं २, अयोध्या आंदोेलन । अगर यह आंदोलन इतना ही जनविहिन था तो फिर केन्द्र से लेकर राज्यों में कांग्रेस की सरकारें उसके सामने क्यों झूकती रहीं – शिलान्यास की अनुमति तो भाजपा की सरकार ने नहीं दी । ल्रि्रहान एवं उनके सुर में ताल मिलाने वाले नेता यह क्यों भूल जाते हैं कि अयोध्या आंदोलन से उत्पन्न ज्वार ने ही भाजपा को संसद के दो स्थानों से १९८९ में ८९ एवं १९९१ में ११९ तक पहुंचा दिया । स्वयं राजीव गांधी ने १९८९ का चुनाव अभियान अयोध्या से आंरभ किया एवं रामराज्य निर्माण की बात की । यह अयोध्या आंदोलन के जनता पर असर का ही परिणाम था । तो इस प्रकार जो रिपोर्ट अपना सैद्धांधिक आधार ही गलत कायम कर रहा हो उसकी अन्य व्यावस्थाओं को कैसे स्वीकार किया जा सकता है -
मजे की बात देखिए कि ल्रि्रहान स्वयं सच तक नहीं पहुंच पाने में अपनी विवशता भी दर्शाते हैं । पृष्ठ संख्या ६-७ के पैरा ३.५ में ल्रि्रहान कहते हैं कि उनका आयोग डिटेक्टिव एजेंसी नहीं है, इसलिए उसे जो खंडित, बिखरी हर्इ सूचनाएं या गलत सूचनाएं -पग्मेंटेड इन्प‘र्मेशन) दिया गया उसके साथ अपना काम करने लिए विवश था । वे लिखते हैं कि उनकी जांच का जो दायरा था उसमें वे राज्य सरकार, केन्द्र सरकार एवं नीजी व्यक्तियों के सहयोग पर निर्भर थे । उन्होंने राज्य एवं केन्द्र की एजेंसियों पर महत्वपर्ण् तथ्य
छिपाने का भी आरोप लगाया है । अध्याय आफ्टरवार्ड्स में ल्रि्रहान रोना रोते हैं कि क्यों देर हो गई । हमारे पास कर्मचारी स्थायी नहीं थे । कम कर्मचारी रहें । कोई कर्मचारी जब तक कमीशन का काम समझता तब तक उसका स्थानांतरण हो जाता । हमें बाहर से स्टेनोग्राफर लाना पडा । कोई आयोग छानबीन एजेंसी नहीं होता । सबकी सीमाएं होतीं हैं, लेकिन ल्रि्रहान अपने निष्कर्षों को ऐसे लिखते हैं मानो असुविधा, असहयोग और छानबीन एजेंसी न होने के बावजूद उन्होंने सच क पता लगा ही लिया । १९८३ से १९८७ तक कांग्रेस या संयुक्त मोर्चा की सरकार थी । ल्रि्रहान लिखते हैं कि लगातार विज्ञापन देने के बावजूद कोई भी साक्ष्य या किसी प्रकार की सूचना लेकर हमारे पास नहीं आया । जाहिर है, यदि आयोग को असहयोगात्मक रवैये का सामना करना पडा तो इसके लिए केवल भाजपा दोषी नहीं थी, स्वयं इस रिपोर्ट से ही यह साबित होता है कि सभी पार्टियों का रवैया असहयोगात्मक था ।
अब आइए अनुशंसाओं पर । पृष्ठ संख्या ९६३ से ९८१ यानी १८ पृष्ठों पर अनुशंसाएं हैं । इसमें दंगो को रोकने से लेकर, अपराध, न्याय प्रणाली में सुधार, पुलिस सुधार, सिविल सेवा सुधार जाने क्या-क्या नहीं है । वास्तव में यहंा ल्रि्रहान आजादी के बाद भारत में व्यवस्था के स्तर पर सबसे बडे परिवर्तनवादी बन जाते हैं । सच कहा जाए तो यह भानुमति का पिटारा है । ऐसा लगता है जैसे १७ सालोंकी कसर पूरी करने के लिए उन्होंने अनुशंसाओं को १८ पृष्ठों तक फैला दिया है । इसमें तो भारत की चुनाव प्रणाली से लेकर, राजनीति, न्याय प्रणाली, धार्मिक संस्थाओं की प्रकृति आदि सभी को बदल देने का सुझाव उन्होंने दे दिया है । वैसे भारत सरकार ने कहा है कि उसने रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है । किंतु १३ पृष्ठों की कार्रवाई रिपोर्ट में रिपोर्ट के आधार पर नए सिरे से मुकद्दमंके बारे में कुछ नहीं कहा है । किसी नेता या अधिकारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का संकेत इसमें नहीं है । केवल यह कहा गया है कि बाबरी ध्वंस से संबंधित न्यायालयों मंे चल रहे मुदकमों की गति तेज की जाएगी । प्रश्न है कि इसके लिए ल्रि्रहान रिपोर्ट की कोई आवश्यकता थी क्या – कार्रवाई रिपोर्ट में ल्रि्रहान आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर जो अन्य बातें कहीं गई हैं वे भी ऐसी ही है । मसलन, राष्ट्रीय एकता परिषद को वैधानिक अधिकार देना, आपराधिक न्याय आयोग की स्थापना, दंगों के क्षेत्र को कब्जे में लेने का केन्द्र सरकार को अधिकार देने के लिए कानून बनाना सरकारी अधिकारीयों के लिए धार्मिक संस्थाओं मे पद लेने का निषेध
आदि । सांप्रदायिक दंगा होने पर संबंधित क्षेत्र को केन्द्र सरकार द्वारा नियंत्रण में लेने संबंधी विधेयक भी सामने आ चुका है । कार्रवाई रिपोर्ट में राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के समाधान के लिए राजनीतिज्ञों के बजाय विशेषज्ञों की समिति बनाने की बात कही गई है । कह सकते हंै कि श्ाायद ल्रि्रहान रिपोर्ट नहीं आता तो सरकार इन दिशाओं में शायद ही विचार करती । वैसे कार्रवाई रिपोर्ट मं शामिल होने का अर्थ उनका अमल में आना नहीं है । कार्रवाई रिपोर्ट का स्वरूप भी अनुशंसात्मक ही होता है । इनमें कुछ बातें तो राज्यों के अधिकार क्षेत्र की हैं, केन्द्र किसी राज्य के दंगाग्रस्त क्षेत्र को अपने अधिकार म,ें ले इस पर राज्यों की सहमति आसानी से नहीं हो सकती ।
अब आए मुकदमों के पहलू पर । सीबीआई को रिपोर्ट सौंपने का कानूनी महत्व न के बराबर है । जहां तक इसके आपराधिक मुकदमे का पहलू है तोे महत्व केवल सीबीआई के आरोप पत्र का ही है, ल्रि्रहान रिपोर्ट का कोई कानूनी महत्व तभी हो सकता है जब इसके आधार पर मुकदमा दर्ज हो । मुकदमा दर्ज होने के बाद भी पुलिस को छानबीन करनी होगी और न्यायालय में उसका
आरोप पत्र ही मान्य होगा । यह ध्यान रखना जरूरी है कि बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई छानबीन कर काफी कुछ पहले से हीं सामने ला चुकी है ६ दिसम्बर १९९२ के बाबरी विध्वंश के बाद स्थानीय थाना मंे मुकदमा नं. १९७/९२ कारसेवकों के विरूद्ध एवं १९८/९२ नेताओं के खिलाफ दायर हुआ । २७ फरवरी १९९३ को सी.आइ.डी. ने ललितपुर के विशेष न्यायालय मं आरोप पत्र दायर कर दिया । ८ जुलाई को रायबरेली में विशेष न्यायालय बना । एवं २५ अगस्त १९८३ को सी.बी.आई. को मामला सौंप दिया गया । ८ सितम्बर १९८३ को लखनऊ में विशेष न्यायालय बना जहाँ सी.बी.आई. ने ४९ लोगों
के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया । सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर १९८/९२ के आरोपियों को भी लखनऊ न्यायालय में मुकदमा चलाने की बात कहीं । इसे बाद में उच्च न्यायालय ने अवैध करार दिया । इस समय इनके खिलाफ रायबरेली में मुकदमा चल रहा है । अन्य ४७ मामले लखनऊ के विशेष न्यायालय में चल ही रहा है ।

