8
September , 2010
Wednesday
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नेपाल भारत समेत दुनिया के ५० से अधिक देशो में योग का परचम लहराने वाले विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी अब दुनिया में नहीं रहे । ८७ वषर्ीय स्वामी जी भारतीय राज्य झारखण्ड के देवघर स्थित रखिया पीठ आश्रम मे गत ५ दिसंबर की मध्य रात्रि ध्यानस्थ हुए और महाप्रयाण पर चले गये । देवघर समेत पूरे विश्व मे उनके चाहने वालो ने जहाँ भी यह खबर सुनी उन्हे सहज विश्वास ही नही हुआ । महा-प्रयाण के दिन ही शाम ६ बने उन्होंने रखिया पीठ मे महा-समाधि ली थी । उस समय हजारों की संख्या मंे भक्तगण मौजूद थे इससे पर्ूव दो दिसंबर को उत्सव के मौके पर भक्तों को स्वामी जी के दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ था उस दिन स्वामी जी प्रसन्न चित मुद्रा मे दिखे थे ।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती का जन्म भारतीय राज्य उत्तरप्रदेश -अब उत्तराखंड) के अल्मोड मे सन् १९२३ में हुआ था । सन् १९४३ मे ऋषिकेश मे उन्हे स्वामी शिवानन्द का दर्शन हुआ और उसी समय उन्होने दशनामी सन्यास पद्धति अपना ली । सन् १९५५ में स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने पर्रि्राजक रुप मे भ्रमण करने के लिए गुरु आश्रम को छोड दिया । स्वामी जी ने सन् १९६३ मे अर्न्तराष्ट्रीय योग मित्र मण्डल एवं सन् १९६४ मे बिहार योग विद्यालय की स्थापना की । अगले २० वर्षो तक वे योग के अग्रणी प्रवक्ता के रुप मे विश्व भ्रमण करते रहे । ८० से अधिक ग्रन्थों के प्रणेता स्वामी जी थे । ग्राम्य-विकास की भावना से सन् १९८७ मे दातव्य संस्था -शिवानन्द मठ)

एवं योग शोध संस्थान की स्थापना की । १९८८ मे स्वामी जी ने अपने मिशन से अवकाश ले लिया तत्पश्चात क्षेत्र सन्यास अपना कर उन्होने र्सार्वभौम दृष्टि से परमहंस सन्यासी का जीवन अपना लिया ।

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती योग क्षेत्र मे अग्रणी थे उनके तरीके में नवीनता और निरालापन था । अजपाजप अंतमौन, पवनमुक्तासन, क्रियायोग एवं प्राणविया जैसे अभ्यासो को उन्होने विधिपर्ूवक व सरलतम तरीके से बताया है । इस बहुमूल्य और अबतक के अगम्य विज्ञान को स्वामी जी ने जनसाधारण के लिए सुगम बनाने का काम बखूबी किया । स्वामी जी ने तन्त्र की न्यास पद्धति पर शोध कर योग न्रि्रा का अविष्कार किया । अपनी गहरी अर्ंतदृष्टि से उन्होने ध्यान के इस अभ्यास की प्रभावशीलता को देख कर उसे इस तरह प्रस्तुत किया कि अभी तक केवल उपासना की एक पर्वपेक्षित क्रिया के रुप मे प्रयुक्त होने वाला यह अभ्यास सभी के लिए व्यावहारिक योग का एक अभ्यास बन गया । योग न्रि्रा प्राचीन पद्धतियांे मंे स्वामी जी की अर्ंतभेदी दृष्टि और गहरी समझ का एक उदाहरण मात्र है ।

स्वामी जी का दुष्टिकोण प्रेरणाप्रद एंव उद्धारक होने के साथ-साथ गहरा और मर्मस्पर्शी था । फिर भी उनकी भाषा और व्याख्या सदा सरल रही है । स्वामी जी द्धारा रचित ८०० से अघिक पुस्तको को दुनिया भर के विश्वविद्यालयों एवं विद्यालयांने पाठ पुस्तक के रुप मे स्वीकार किया है । स्वामी जी द्धारा लिखित पुस्तकों का इटालियन, जर्मन, स्पेनिश, रशियन, चीनी, पन्च, ग्रीक, इरानी, युगोस्लावियन समेत विश्व की प्रमुख भाषाआंे में अनुवाद किया जा चुका है । लोगांे ने स्वामी जी के विचारांे को अपनाया तथा सभी आस्थाआं एवं राष्ट्रां के आध्यात्मिक जिज्ञासु उनकी ओर उमङÞ पडे । स्वामी जी ने हजारांे लोगांे को मन्त्र और सन्यास-दीक्षा दी तथा उनमे दिव्य जीवन के बीज डाले । उन्होने योग के प्रकाश को फैलाने मे दर्र्जेय उत्साह और शक्ति का पर्रदर्शन किया । स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने बीस वर्षों के अल्पकाल मंे ही अपने गुरु के मिशन को पूरा कर दिया ।

स्वामी जी की प्रेरणादायी उक्तिः
योग विद्या भारत वर्षकी सबसे प्राचीन संस्कृति और जीवन-पद्धति है । इसी विद्या के बल पर
भारतवासी प्राचीनकाल में सुखी, स्वस्थ तथा समृद्ध जीवन व्यतित करते थे । जब से भारत मे योग विद्या का ह्रास हुआ तभी से देशवासी गरीब, दुःखी और अस्वस्थ हं। पूजा पाठ, धर्मर्-कर्म से शान्ति मिलती है और योग्भ्यास से धन-धान्य, समृद्धि और स्वास्थ्य । स्वामी जी ने दुनिया भर के लोगों को सुख, शान्ति, समृद्धि एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए योगाभ्यास को अपने जीवन मं शामिल करने का मूलमन्त्र दिया है ।

धन्य है भारतवर्षकी भूमि जहाँ पैदा हुए विश्व योग गुरु स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने दुनिया भर में योग का परचम लहरा दिया साथ ही दुनिया भर के देशों को यह राह दिखायी कि बैगर योग के मानव जीवन परूण् नही है । महाप्रयाण को प्रस्थान कर चुके स्वामी जी की महान् आत्मा को हम सभी नेपालवासी शत्-शत् नमन करते है ।

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