9
September , 2010
Thursday
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nain mishra
प्रधानमंत्री नेपाल की भारत यात्रा को दो दृष्टिकोणों के तहत आंका जा रहा है । अपनी भारत यात्रा की समाप्ति के बाद त्रिभुवन विमान स्थल पर पत्रकारों से बातचीत में प्रधानमंत्री नेपाल ने अपनी यात्रा को पर्ूण्ा सफल बताया, जबकि प्रचण्ड प्रधानमंत्री की इस यात्रा को पर्ूण्ातः विफल मान रहे हैं । वास्तविकता यह है कि इस यात्रा को हम अर्ध सफल मान सकते हैं । व्यापार संधि पर दोनों देशों के द्वारा किए गए प्रारंभिक हस्ताक्षर, भारत द्वारा नेपाल को दिए गए दो हजार करोडÞ रुपए की आर्थिक सहायता को इस भ्रमण का सकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है जबकि प्रधानमंत्री का भारत में गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं होना, इनकी भ्रमण टोली में परराष्ट्र मंत्री सुजाता कोइराला का शामिल नहीं होना, इस भ्रमण का नकारात्मक पक्ष है ।madhav
इस यात्रा के दौरान भारत ने नेपाली भूमि में तीसरे देशों की बढÞती हर्ुइ अवांछित गतिविधियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उस पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए नेपाल से अनुरोध किया । प्रतिउत्तर में प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने अपनी भूमि का दुरुपयोग किसी भी देश के विरुद्ध नहीं होने देने का आश्वासन दिलाया । द्विपक्षीय वार्ता में भारतीय पक्ष ने नेपाली भूमि द्वारा भारत में आतंकवादी घुसपैठ बढÞने, तर्राई के मदरसाओं में भारत विरोधी अवांछित गतिविधियाँ होने तथा नेपाल के रास्ते नकली भारतीय रुपयों की तस्करी होने की बात पर चिन्ता व्यक्त की । भारत का मानना है कि इन गतिविधियों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है । प्रत्युत्तर में प्रधानमंत्री नेपाल का कहना था कि नेपाल में इस प्रकार की आईएसआई की गतिविधियों के विषय में हमें कोई जानकारी नहीं है लेकिन उन्होंने आश्वस्त किया कि नेपाली भूमि का दुरुपयोग किसी भी आतंकवादी गतिविधि के लिए नहीं करने दिया जाएगा । इस बार की बातचीत मुख्यतः नेपाल में पाकिस्तानी और चीनी गतिविधि, सेना समायोजन, माओवादी, मधेश आदि विषयों पर केन्द्रित था ।
नेपाल में चीन की रुचि बढÞने के सर्ंदर्भ में भारतीय पत्रकारों द्वारा पुछे गए प्रश्नों के जबाव में प्रधानमंत्री नेपाल का कहना था कि मुझे नहीं लगता कि चीन नेपाली राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है । चीन और भारत दोनों ही नेपाल के मित्रराष्ट्र हैं तथा नेपाल दोनों ही से आर्थिक सहायता का आकांक्षी है । प्रधानमंत्री नेपाल का कहना था कि नई दिल्ली की यह मान्यता है कि पिछली माओवादी सरकार ने भारत के विरुद्ध चीनी कार्ड का इस्तेमाल किया लेकिन वर्तमान सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है । हम भारत की सुरक्षा व्यवस्था के प्रति सचेत हैं । तथा भारत भी हमारी संवेदनशील्ता को समझेगा, ऐसा मुझे विश्वास है ।
प्रधानमंत्री नेपाल ने भारत के समक्ष मधेश में क्रियाशील सशस्त्र समूहों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए भी भारत से सहयोग की अपेक्षा की । उनका कहना था कि राजनीतिक आवरण में आपराधिक कार्य करने वालों पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक है । सीमा अपराध नियंत्रण तथा सुरक्षा निकायों के सुदृढÞीकरण के लिए भी प्रधानमंत्री नेपाल ने भारत से सहयोग मांगा है । इस पर भारत द्वारा पुलिस के भौतिक पर्ूवाधार तथा अन्य आवश्यकताओं की पर्ूर्ति का आश्वासन दिया गया । नेपाल में संक्रमणकालीन अवस्था से उभरने के लिए राजनीतिक स्थिरता तथा उच्च नेतृत्व बीच की आम सहमति पर भी भारतीय पक्ष द्वारा बल दिया गया । तीन दिनों के लम्बे विचार विमर्श के पश्चात् ज्ञढढट के नेपाल-भारत व्यापार संधि के संशोधित स्वरुप पर दोनों देशों द्वारा प्रारंभिक हस्ताक्षर सम्पन्न हो पाया ।
भारत में नेपाली प्रधानमंत्री के स्वागत में जो एक उदासीनता देखने को मिली, उसका एक प्रमुख कारण नेपाल में कुछ दलों द्वारा भारत विरोधी वक्तव्य है जो समय-समय पर आते रहता है और इन वक्तव्यों में भारत को विस्तारवादी और साम्राज्यवादी तक की संज्ञा दी गई । हालाँकि नेपाल में भारत विरोधी भावना अपने विशेष स्वार्थ पर्ूर्ति के लिए किसी विशेष गुट द्वारा ही उठाया जाता रहा है । नेपाल में पाकिस्तान या बांग्लादेश की तरह राष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी भावना कभी भी नहीं पनपी है । दूसरा महत्वपर्ूण्ा मुद्दा है नेपाली राजनीति में भारतीय हस्तक्षेप की । यह मुद्दा भी कभी किसी राष्ट्रीय मसले को लेकर नहीं उठा है, बल्कि जब किसी विशेष दल के पक्ष में भारत सहायता प्रदान नहीं करता है तो वह दल विशेष भारत विरोधी बयान देना शुरु करता है । उदाहरण के लिए जब प्रचण्ड सरकार पर संकट उत्पन्न हुआ था, उस समय उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि उन्होंने भारतीय राजदूत से आग्रह किया था कि वे सुलह सफाई के लिए किसी भारतीय राजनीतिज्ञ को यहाँ बुला दें । भारत में चुनाव की व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं है, ऐसा भारतीय पक्ष का कहना था । इसके बाद से ही भारत को इंगित करके कहा जाने लगा कि हमारी सरकार गिराने या फिर माधव नेपाल की सरकार बनाने में प्रभु का हाथ है ।
इतिहास, भूगोल, धर्म और संस्कृति की दृष्टियों से इतने घनिष्ठ होते हुए भी नेपाल और भारत के संबंध बकौल डाँ. एस.के. झा के बेचैन साझीदारों -अनइजी पार्टनरस) की तरह रहे हैं । इस संबंध में न तो निर्बाध रुप से सौहार्द सहयोग की सरिता बही है और न दोनों पडÞोसियों के बीच तनाव इस सीमा तक पहुँचा है कि कूटनीतिक संबंध विच्छेद की नौबत आई हो । हाँ, इस संबंधों में उतार-चढÞाव अवश्य आये हैं, जो कई प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक, कूटनीतिक कारणों से आए हैं । इन कारणों का फिर दोनों देशों की आन्तरिक राजनीति, राजनीतिक गतिविधि, क्षेत्रीय स्तर पर राष्ट्रों के समीकरण, अन्तर्रर्ाा्रीय राजनीति के नित्य बदलते समीकरण-घटनाओं से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध रहा है ।

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