शौक साहेब नेपालगंज की शान::खगेन्द्र गिरि
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जुली तूफान कातिल रहजन, किस-किस की तुम बात करोगे एक है जान और लाखों दुश्मन, किस-किस की तुम बात करोगे मन को मायाजाल ने मारा तन को रोटी दाल ने मारा सौ जख्मों से चूर है जीवन, किस-किस की तुम बात करोगे ।
इस श्रुतिमधुर व कर्ण्र्रय गजल के दो शेर नेपालगंज के नामी उर्दू शायर अब्दुल लतीफ शौक द्वारा रचित हैं । उन का नाम नेपालगंज के गजल महफिल ही नहीं वरन उर्दू गजल साहित्य में उच्च सम्मान के साथ लिया जाता है ।
अब्दुल लतीफ शौक नेपालगंज के गजल परम्प्रा के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । विगत चार दशक से भी लम्बे समय से वे इस परम्परा को आगे बढा रहे हैं । वे मनोरंजन अथवा प्यार मुहब्बत के लिए गजल कहते हंै। वे आदमी के जज्बाती बातों को शब्दों मे उतारते हं । वे एक पर्ण्तः साहित्यिक गजलकार हं और उनका मकसद सामाजिक चेतना, मानवतावाद व सामाजिक सद्भाव ही है । ऊपर लिखे गए दो अर्थपर्ण् व तर्कपर्ण् शेरों से उन की काव्यिक क्षमता की स्पष्ट झलक भी मिलती है ।
नेपालगंज के गजल साहित्य का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है । भारत के उर्दू गजल साहित्य की बात करने पर लखनऊ की गजल परम्परा का अपना एक अलग ही रुतबा और एक अलग ही शान दिखलाई देता है । नेपालगंज के तकरीबन सभी गजल गायको-शायरो के गजल का अन्दाज व शैली भी लखनऊ की गजल परम्परा से ही रुबरु है । इसीलिए नेपालगंज के उर्दू गजलकारां द्वारा रचित गजलों मं एक विशिष्ट रचना शैली, एक अलग अन्दाजेबयाँ व शब्दो को पकडने का एक अलग ही नजरिया मिलता है । नेपालगंज के पुराने ऊर्दू गजल साहित्य के पन्ने पलटने पर कई अच्छे और नामी-गिरामी गजल शायर के नाम वा योगदान देखने को मिलते हैं । इन में अब्दुल हमिद हामी, मौलवी गुलाम वारीश गौर, अब्दुस्सलाम असलम, मङ्गलु सहर, अनवर अली अनवर, नसिरुद्दिन नासिर, अमिर मोहम्मद र्राई, मुन्सी असगर अली सहर, फारुक अहमद आरिफ, गुलाम अली मोमिन, नन्हे कुरैसी कैफ, गुलाम जिलानी राही, मास्टर सैदा भारती, श्यामलाल श्याम, मुरलीलाल मुरली, और मौलबी अमिरुल्लाह असअदी आदि का नाम आता है । नेपालगंज के उर्दू गजल साहित्य के इतिहास का और व्यापक तौर पर खोज एवं अनुसन्धान करने पर और भी ज्यादा अच्छे शायरों के बारे मे भी जानकारियं हमारे सामने आ सकती हैं ।
अभी इन दिनों ऊर्दू भाषा में गजल लिख कर साहित्य की सेवा में लगे हुए ऊर्दूर् शायरो में अब्दुल लतीफ शौक, रसूल मोहम्मद आरजु, मोहम्मद अमिन खयाली, मोहम्मद युनुस अदिब, प्रकाश राजापुरी, मोहम्मद उमर आदिल फारुखी, मोहम्मद उमर असर, मौलाना नुर आलम, मोहम्मद हासीम अंजुम, शौकत अली शौकत व मोहम्मद मुस्तफा अहसन आदि का नाम आता है ।
इन नामें मे से अपने आप को एक अलग ढंग से परिचित कराने मे सक्षम रहे सिद्धहस्त शायर अब्दुल लतीफ शौक का जन्म विक्रम सम्बत् १९९५ साल में नेपालगंज नगरपालिका के वार्ड नं. १५ भट्टटिोल में हुआ था । उनके पिता का नाम कुरवान जसगर व माता का नाम आमना जसगर है । शौक साहेब का वास्तविक नाम लतीफ जसगर है परन्तु साहित्य की दुनिया मं लोग उन्हें अब्दुल लतीफ शौक के नाम से जानते हैं । नेपालगंज स्थित मदरसा फैजन्नबी में उर्दू भाषा की प्राथमिक तक का अध्ययन करके अपने पैतृक व्यवसाय में लगे लतीफ जसगर ने अपने जमाने के नामी शायर फारुख अहमद आरिफ की प्रेरणा व प्रोत्साहन से गजल लिखना प्रारम्भ किया था । उन्हांेने पहली बार २०२७ साल में गजल-मुशायरा में अपनी गजल को प्रस्तुत किया था तब से उन्होने कभी भी पीछे मुड कर नही देखा । उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने के बावजूद उन्हें साहित्य का बखूबी ज्ञान है । स्वअध्ययन से उन्होने साहित्य, जीवन-जगत व दर्शन का गहरा अध्ययन किया है । इसिलिए उनके रचनाओं में उच्च स्तर की तार्किकता व कवितात्मकता का मीठा स्वाद मिलता है । बडं बडं विद्वान भी उनकी क्षमता वा काबिलियत को मानते हैं । लम्बं समय तक वे नेपालगंज के ऊर्दूर् शायरो की संस्था नेपाल बज्म-ए-अदब से जुड कर क्रियाशील रहे । बाद में लम्बे समय तक गुलजार-ए-अदब से भी जुडे रहे । फिलहाल वे मध्यपश्चिमांचल गजल प्रतिष्ठान के अध्यक्ष व भेरी साहित्य समाज के उपाध्यक्ष के तौर पर साहित्य की सेवा मं दिलोंजान से लगे हुए हैं ।
नेपाल में उन को अभी तक केवल युनेस्को बाँके ने सम्मानित किया है और पडोसी देश भारत के गोण्डा शहर में कुछ वर्षपर्व सम्पन्न हर्इ जश्न-ए-वासिफ कार्यक्रम में भी सम्मानित किया गया था । परन्तु उन का जितना मूल्यांकन होना चाहिए था नेपाल मं, सरकारी स्तर पर व नागरिक स्तर पर भी उतना मूल्यांकन नही हो पाया हैं ।
उन्होने अब तक करीब तीन सौ से ज्यादा गजलां की रचना करके गजल साहित्य के भण्डार को जीवन्त बनाया हैं । कुछ सालों से तो वे नेपाली भाषा में भी गजल लिखते हैं । उनकी नेपाली भाषा में लिखी गई कुछ गजल इस प्रकार हैं-
कण कणमा म खोजिरहेछु दाई मेरो नेपाल कता छ -
गाउँ शहरमा हेरिरहेछु दाई मेरो नेपाल कता छ -
मानवता में प्यार व ममता की भाव बढाने के उद्देश्य से लिखे उनके कुछ शेरो को देखे-
काश नजदीक तुम आओ तो कोई बात बनं
फासले दिल के मिटाओ तो कोई बात बनं
अश्क भी दिल का लहू हैं, इसे पानी न कहां
इसको दामन पे सजाओ तो कोई बात बनें-
शौक साहेब इसी पुस महिने में अपने जीवन के ७० साल पूरे करके ७१ वें साल में प्रवेश कर गये हैं । उन्हें शतायु मिलं और उनसे अच्छे-अच्छे गजलों की रचना हो यह समस्त गजल प्रेमीओं की कामना है ।

