संविधान की अवमानना::अरुण ठकुरी
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नेपाली भाषा में पुनः शपथ ग्रहण करने संबंधी नेपाल सरकार -मंत्रिपरिषद) के आग्रह को अस्वीकार करते हुए नेपाल के प्रथम निर्वाचित उपराष्ट्रपति परमानन्द झा ने पुनः नेपाली में शपथ लेने से इंकार कर दिया है । उपराष्ट्रपति सम्बद्ध सूत्रों के अनुसार वे न तो नेपाली भाषा में शपथ लेंगे और न ही वे उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देंगे ।
विकसित हो रही परिस्थिति एवं प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के बयानों से लग रहा है कि नेपाली में शपथ न लेने की अवस्था में उपराष्ट्रपति झा को उनके पदीय दायित्व के साथ-साथ उपराष्ट्रपति रुप में प्राप्त होने वाली सुविधाओं से वंचित कर दिया गया है । यद्यपि अन्तरिम संविधान वर्तमान विवाद के बारे में मौन है तथा संविधान द्दण्टघ के अनुसार राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति को पदमुक्त करने का एक मात्र उपाय संसद से महाभियोग प्रस्ताव स्वीकृत होना ही है । अन्तरिम संविधान के अनुसार निर्वाचित उपराष्ट्रपति को पद से मुक्त किए बिना किस आधार पर उनके कर्तव्य, अधिकार एवं राज्य से प्राप्त होने वाली सुविधाओं से वंचित करना यह एक जटिल संवैधानिक प्रश्न के रुप में सामने आया है ।
दशकों से नेपाल के तर्राई क्षेत्र में हिन्दी भाषा को मान्यता देने की आवाज उठती रही है । प्रथम जन निर्वाचित प्रधानमंत्री विश्वेश्वर प्रसाद कोईराला ने अपने कार्यकाल में हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता दिलवाने का जबरजस्त प्रयास किया था । नेपाली जनता के रुप में नेपाल के पहले प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोईराला ने भी नेपाल में हिन्दी भाषा की आवश्यकता के बारे में सकारात्मक विचार व्यक्त किए थे । वास्तव में हिन्दी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप मंे मान्यता दिलवाने के पक्ष में हुए प्रयास के बावजूद भाषा की आवश्यकता के नाम पर की जाने वाली सत्ता राजनीति ने हिन्दी भाषा की आवश्यकता की आवाज को कमजोर कर दिया है ।
र् दर्जनों जटिल संवैधानिक विवादों में फंसी वर्तमान नेपाली राजनीति में उपराष्ट्रपति के शपथ प्रकरण के कारण समस्या में वृद्धि करने का काम किया है । सर्वोच्च अदालत के पर्ूव न्यायाधीश रहे उपराष्ट्रपति ने अपनी पदीय गरिमा का खयाल न करते हुए खुद को उपराष्ट्रपति होने के साथ-साथ मधेशी के रुप में प्रस्तुत किया है जो बात उनके बयानों से साफ-साफ महसूस की जा सकती है । निश्चय ही दूसरे जनआन्दोलन और मधेश आन्दोलन के बाद सम्पर्ूण्ा तर्राई मधेश में हिन्दी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता देने की आवाज बुलंदी को छूने लगी । नेपाल के संविधान सभा चुनाव मे विजयी प्रतिनिधियों द्वारा हिन्दी और मातृभाषा में शपथ लेने की घटनाएँ देखी सुनी गयी । शायद मधेशी जनता की भावनाओं को आत्मसात करके उपराष्ट्रपति झा ने राष्ट्रपति द्वारा पढÞे गए नेपाली भाषा के शपथ को हिन्दी भाषा में अनुवाद करके शपथ ग्रहण किया । यदि मधेशी जनता की भावना के चश्मे से उपराष्ट्रपति के शपथ प्रकरण को देखा जाए तो निश्चय ही यह सही था, लेकिन किसी भी राष्ट्र का संविधान सबसे बडÞा कानून है और उस राष्ट्र की जनता द्वारा संविधान एवं प्रचलित कानून मानना यदि राज्य की कानूनी व्यवस्था का आधार माना जाता है तो उपराष्ट्रपति द्वारा मधेशी जनता की भावना के नाम पर नेपाल के संविधान का घोर उल्लंघन किया है ।
उपराष्ट्रपति के असंवैधानिक कदम के पक्ष में मधेशवादी राजनीतिक दल भाषिक अधिकार के नाम पर आन्दोलन की तैयारी कर रहे है । जबकि हिन्दी भाषा को वैकल्पिक राष्ट्रभाषा की मान्यता देने की आवाज, संसद संविधान सभा में हिन्दी में भाषण करने के अलावा लगभग द्दण्ण् की संख्या में वर्तमान संविधान सभा व्यवस्थापिका में अपनी जीविका निर्वाह कर रहे मधेशी प्रतिनिधियों द्वारा आजतक हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा के रुप में मान्यता दिलवाने के संवैधानिक अभ्यास अर्थात् निर्धारित प्रक्रिया के लिए कोई भी प्रस्ताव संसद में प्रस्तुत नहीं किया है ।
र् वर्तमान सत्ता गठबंधन में शामिल बाईस राजनीतिक दलों जिसमें मधेशी जनअधिकार फोरम के अलावा बाकी सभी मधेशवादी दल शामिल है और सबसे बडÞी बात वर्तमान सरकार में शामिल मजफो -लोकतांत्रिक), तमलोपा, सदभावना पार्टर्ीीे उपस्थिति के बावजूद मन्त्री परिषद से उपराष्ट्रपति को नेपाली में पुनः शपथ लेने का आग्रह संबंधी निर्ण्र्ााबिना अवरोध कैसे र्सवसम्मत पारित हो गया – जिन-जिन दलों के नेता मंत्रीपरिषद के उक्त निर्ण्र्ाामें शामिल थे वे दल आज मधेशी जनता के सामने हिन्दी भाषा का मान्यता दिलवाने का भाषण कर रहे हैं । ऐसे दोहरे चरित्र के नेता कैसे मधेशी जनता के अधिकारों की रक्षा कर पाएंगे यह वर्तमान राजनीतिक कालखंड का सबसे बडÞा यक्ष प्रश्न है । मधेशी जनता इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना नहीं चाहेगी -

