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September , 2010
Wednesday

उठता विवाद::वीणा सिन्हा

Posted by Himalini On January - 9 - 2010
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binaमंसिर ७ गते को एक कार्यक्रम में सहभागी होने मलंगवा गई थी, लेकिन वापस लौटते समय कोई सवारी साधन नहीं मिल रहा था । पुछताछ करने पर पता चला की सभी सवारी साधन बारा जा रहे थे । बडी मुश्किल से एक बस में नवलपुर तक के लिए सीट मिल सकी । जब बस के अन्दर घुसी तो वहाँ नजारा ही कुछ और था । यात्रियों के साथ-साथ बस विविध पशु-पक्षियों से भरा हुआ था यहाँ तक की बस के डिकी में भी बकरियाँ ही बकरियाँ थी । एक सहयात्री से पूछने पर पता चला कि ये लोग गढी माई मेला में भाग लेने जा रह हैं और अपने साथ लेकर जा रहें पशु-पक्षियों को माता को बलि चढÞायेगें । यह दृश्य केवल नेपाल के एक जिले की नहीं, बलकि मंसिर ७-८ गते को तर्राई के सभी क्षेत्रों में खचाखच लोगों से भरे सवारी साधन में सवार होकर बेतहाशा बारा की ओर चले जा रहें हैं यहाँ तक की विदेशों भारत, बंगलादेश से भी बडी संख्या में भक्तजन गढीमाई के इस पंच वषर्य मेला में सहभागी हुए और अपनी मनौती पूरा होने के उपलक्ष्य में विविध जीव-जन्तुओं को बलि चढायें । एक अनुमान के अनुसार, इस प्रकार मेला में आने वाले भक्तजनों की संख्या ४५ लाख थी और लगभग ५ लाख पशु-पक्षियों को माता को बलि दी गयी ।

प्रत्येक पाँच वर्षों पर बारा जिले के प्रसिद्ध गढी माई मंदिर में एक महीना तक मेला का आयोजना किया जाता है । इस एक महीना तक चलने बाले मेला में दो-तीन दिन माता को बलि चढाने का दिन निर्धारित होता है जो कि इस बार मंसिर ९-१० गते को था । पाँच वर्षके भीतर माता के नाम पर अपनी इच्छा पर्ण् होने पर लोग माता को बलि चढाने की मनौती मानते हैं और मनौती पर्ूण्ा होने पर पाँच वर्षपश्चात लगने वाले मेला में जाकर बलि के लिए माने हुए पशु-पक्षियों को बलि चढÞा कर अपनी मनौती का पूर्ण्हुति करते हैं ।

गढी माई मंदिर के मूल पुजारी मंगल चौधरी के घर में तांत्रिक विधि-विधान से रात्रि काल में पूजा किया जाता है जिसके पश्चात गढÞी माई मंदिर के निकट स्थित बड्डस्थान में एकाएक दिया जल उठती है, उसके पश्चात बलि देने का कार्यक्रम शुरु होता है ।
परम्परा के अनुसार, सबसे पहले गढी माई को पंचबलि चर्ढाई जाती है । उस में भी र्सवप्रथम एक श्वेत चूहा -जंगली), उसको बाद क्रमशः कबूतर, सुअर, बकारा तथा भैंसा की बलि देने की परम्परा है । पंचबलि दिये जाने के बाद हाथों में तेज हथियार जैसे खड्ग, तलवार लिये लोग बलि के लिए लाये गये जनावरों के भीड में घुसकर अंधाधुन्ध उनकी बलि चढाने लगते हैं फलतः जानवरों में डर के मारे भगदड मच जाती हैं । यह दृश्य भी युद्ध भूमि के दृश्य से कम प्रतीत नहीं होता है । इस बार २५० व्यक्तियों को मेला समिति ने बलि के लिये लाये गये पशु-पक्षियों को काटने हेतु नियुक्त किया था ।

बलि चढाने के लिए २ किलो मीटर क्षेत्र में बधशाला का निर्माण किया गया था । बलि चढाये गये जानवरों के सिर को मंदिर के नजदीक स्थित बनाये गये गढे में डालने की व्यवस्था की गयी थी । बलि चढÞाये जाने के कारण वहाँ के आस-पास का क्षेत्र रक्त की नदी में तब्दील हो गयी थी ।
मेला में देश-विदेशों से आये लोगों द्वारा बलि चढाने के लिए तांता लगा हुआ था । भारत के बिहार राज्य के एक व्यक्ति ने तो १५० भैसा का बलि माता को चढाया । इस बार पिछली बार की तुलना में ज्यादा बलि चढाया गया ।

बलि चढाये गये जानवरों का मांस को देश के विभिन्न भागों में खाने के प्रयोजन के लिए भेजा जाता है । इसके लिए ठेका-व्यवस्था की जाती हैं । इस बार दलितों के विरोध के कारण राजधानी काठमांडू में भैंसा का मांस नहीं जा सका ।
गढÞी माई में विविध पशु-पक्षियों को धर्म के नाम पर बलि देने का कार्य संसार की सबसे बडी ‘र्सार्वजनिक बध’ की घटना है ।

वैसे केवल गढÞीमाई मंदिर में ही बलि नहीं दी जाती है बल्कि नेपाल के विभिन्न मठ मंदिरों में वर्षभर बलि दी जाती है । दक्षिण काली मंदिर में भी सालों भर मनौती के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि चढर्Þाई जाती है । दर्ुगा-काली आदि देवियों को ही नहीं विभिन्न भैरवों को भी रक्त चढÞाने की परम्परा देश के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है ।

नेपाल में पशु-पक्षियों की बलि केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं दी जाती हैं । मुस्लिम समुदाय में तो उनके धर्म ग्रन्थों के अनुसार, सच्चे मुसलमान के पाँच आवश्यक गुण में एक कर्ुबानी -बलि) को आवश्यक भी माना गया हैं । देश के अनेक आदिवासी जनजातियों तथा बुद्ध धर्मावलम्बियों में भी बलि प्रथा प्रचलित है । वैसे बुद्ध धर्म में अहिंसा पर जोर दिया गया है लेकिन तिब्बत के बुद्धिज्म तथा ब्रजयोगिनी बुद्ध देवियों को बलि चढÞाने की परम्परा है ।

हिन्दू धर्म में बलि प्रथा की शुरुआत कब-कैसे हर्ुइ स्पष्ट तौर पर कहा नहीं जा सकता । लेकिन वेद के पर््रवर्तक आर्य जाति एशिया विशेषकर कैस्पियन सागर के पर्ूव की ओर बढÞते हुए सिन्धु नदी तक पहुँच कर भारतीय उप महाद्वीप में आकर फैल गये । इस प्रकार ये जहाँ जहाँ फैले वहाँ वहाँ की धार्मिक मान्यता परम्प्ारा एवं प्रचलन को भी अपनाते गये । वेद में ‘जीव ही जीव का भोजन है’ की बात कही गयी हैं । हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ पुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी अश्वमेघ यज्ञ में ‘घोडा बलि’, ‘नागमेघ’ में र्सप बलि जैसे यज्ञों की चर्चा है । उसी प्रकार समय-समय पर राजा-महाराजाओं एवं ऋषि मुनियों द्वारा भी अपने अनुष्ठानों में बलि देने की परम्प्ारा का उल्लेख है । इतना ही नहीं हिन्दू धर्म ग्रन्थों में तो नरबलि का भी उल्लेख है । वरुणदेव द्वारा नरबलि चढÞाने का उल्लेख रामायण में सीता जी द्वारा वनवास जाने के समय सकुशल लौटने पर गंगा माँ को बलि की मनौती मानी गई थी । काठमांडू के नरदेवी मंदिर नरबलि के ऐतिहासिक प्रमाण हैं ।
भारत के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर एवं छिन्नमस्तिका मंदिर में भी र्सार्वजनिक रूप में वलि देने की परम्परा है वैसे भारत में र्सार्वजनिक बलि मंदिरों में देने पर कानूनी रोक लगा दी गयी है । जहाँ नेपाल में दर्ुगापूजा के अवसर पर हजारों जीव जन्तुओं को बलि दी जाती है वहीं भारत में दर्ुगार्जी की बडी-बडी प्रतिमाएँ बनाकर पूजा करने की परम्परा है । वैसे देवी काली जी के नाम पर भारत मंे भी बलि देने की प्रथा है लेकिन पश्चिम बंगाल के कलकत्ता के प्रसिद्ध दक्षिण काली मंदिर में बलि नही दी जाती हं ।

हिन्दू धर्म के शैव सम्प्रदाय जब तांत्रिक मंत्र में दीक्षित होता है तब शिव के भैरव रूप एवं काली रूप में पूजा करने पर पशु-पंक्षियों को बलि देने की परम्परा है । शाक्त सम्प्रदाय बल्रि्रथा पर जोर देता है, उनके धार्मिक विश्वास के अनुसार, जबतक देवी को रक्त नहीं चढÞाया जाता है तबतक उनकी पूजा पर्ूण्ा नहीं होती । वैसे कहा जाता है की शाक्त साम्प्रदाय में बलि को महत्व ज्यादा होने का प्रमुख कारण पूजा तंत्र पर आधारित है । तन्त्र में पंचमकार अनिवार्य है जिस के अर्न्तर्गत मांस एवं मछली चढÞाना ।

नेपाल के मंदिरों में बलि प्रथा प्रचलित होने के कारण पूजाविधि तंत्र शक्ति पर आधारित होना है । यही कारण हैं कि देश के अनेक मंदिरों में मांस, मछली, अण्डा तथा शराब वगैरह देवी-देवताओं को चढÞाया जाता है ।

परापर्ूवकाल में ही तांत्रिक पूजा विधान की परम्परा के अर्न्तर्गत बलि प्रथा चली आ रही है और इस सदियों पुरानी परम्परा का अचानक रोक पाना असम्भव है । यही कारण है कि इस बार के गढÞीमाई मेला में बलि पर रोक लगाने के राष्ट्रीय-अन्तर्रर्ाा्रीय सभी प्रयास बिफल हो गये लेकिन इसे पर्ूण्ा असफल भी नहीं माना जा सकता । इन प्रयासों ने जनता के भीतर एक सन्देश तो अवश्य ही छोडÞा है कि क्या अपनी इच्छापर्ूर्ति के लिए किसी और जीवों की हत्या करना कहाँ तक उचित है – सपना को आधार बनाकर देवी-देवताओं के नाम पर निरीह असहाय जानवरों को काटना प्रकृति के नियम ‘जीयो और जीनें दो’ को कहाँ चरितार्थ करता है – यह कैसे विश्वास करने योग्य बात हैं कि सृष्टिकर्ता भगवान अपनी सृष्टि के नाश से खुश होता होगा – सृष्टिकर्ता ने मानव का विकास मांसाहारी के रूप में नहीं बल्कि शाकाहारी के रूप में किया है । व्यक्ति के दाँत एवं उसकी पाचनक्रिया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ।

पंचवषर्ीय गढÞी माई मेला में र्सार्वजनिक बलि को रोकने के लिए डेढÞ-दो महीना पर्ूव से ही विभिन्न पशुकर्मी, विभिन्न संघ-संस्थायें, संत-महात्माओं जिसमें तपस्वी रामबहादुर बम्जन, नेपाल कृष्ण प्रणामी विश्व हिन्दू महासंघ, भारत के पशु अधिकारकर्मी मेनुका गाँधी प|mांसीसी अभिनेत्री ब्रिजिट बार्र्डोट तथा अन्य प्रबुद्ध समाज के लोगों ने सरकार तथा जनता से अपील की, लेकिन इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला । यद्यपि वाद-विवाद की स्थिति का सृजना अवश्य हुआ ।
यह सही है कि सदियांे से चली आ रही यह परम्परा या प्रथा एकाएक बन्द नहीं हो सकती । वैसे भी नेपाल की जनता का एक बहुत बडÞा वर्ग निरक्षर है उन में जनचेतना, जागृति की कमी है । वैसी स्थिति में युगांे-युगांे से चली आ रही धार्मिक परम्पराओं रीति-रिवाजों को एकाएक परिवर्तित करना या उनपर प्रतिबंध लगाना किसी भी सरकार या संघ-संस्थाओं के लिए अत्यन्त ही कठिन कार्य है । वैसे जो प्रयास इस दिशा में शुरू हुआ है वह स्वागत योग्य हंै और सही दिशा में सही लक्ष्य को लेकर किया गया कोई भी प्रयास कभी भी विफल नहीं होता । यह प्रयास निरन्तर जारी रहा तो एक दिन यह प्रयास इस दिशा में ‘मील का पत्थर’ साबित होगा ।

बलि-प्रथा पर रोक लगाने के सम्बंध में सबसे पहले सरकारी तौर पर एवं संघ-संस्थाओं के माध्यम से भी मठ-मंदिर के पुजारियों को शिक्षित करना होगा जिनकी बातों का सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण भोले-भाले जनता में होती है । इसके साथ ही, राजनीतिज्ञों, सामाजिककर्त्तर्ााें को भी अपने नीजी स्वार्थ से ऊपर उठकर अपने सन्देशों, भाषणों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से बलि प्रथा के कारण उत्पन्न समस्याओं, दुष्परिणामों के प्रति जनता में जागृत्ति तथा चेतना फैलाना होगा । तभी असहाय, निरीह, अबोध पशु-पंक्षियोें के वध का सिलसिला रुक सकेगा ।

मांस खाने के नाम पर पशुओं को काटना एक अलग बात है लेकिन धर्म के नाम पर इस प्रकार का कृत्य कहाँ तक जायज हैं – मनौती माननी ही हैं तो फल-फूल-मिर्ठाई आदि सामग्रियाँ मानें, चढÞायें और प्रसाद ग्रहण करें । जिनका निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है उनका नाश करने का किसी को भी अधिकार नहीं हैं ।

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