पर्यटन एवं पुण्य का संगम ः वैष्णो देवी ::अनुष्का
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मारत के जम्मू-काश्मीर राज्य के जम्मू के निकट त्रिकूट पर्वत पर स्थित वैष्णो देवी मंदिर में प्रति वर्षठछ से डण् लाख लोग दर्शन हेतु पहुँचते हैं । इस धार्मिक केन्द्र की स्थापना कब हर्ुइ तथा यह कितने समय से देश-विदेश के लोगों के लिए आकर्षा का केन्द्र बना हुआ है यह पर्ूण्ातः स्पष्ट नहीं है । लेकिन अब यह स्थल पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ पर्यटन का भी मुख्य केन्द्र बन गया है ।
जम्मु से छद्द किलोमीटर दूर टण्ण्ण् फुट की ऊँचाई पर वैष्णो देवी के मन्दिर का वातावरण ही कुछ ऐसा है कि वहां जाकर एक आध्यात्मिक पवित्रता का अनुभव होता है । इस भागदौडÞ और तनाव भरे मशीनी जिन्दगी में भी इस स्थान में आकर अदभूत शांति मिलती है । माता के भक्तों की संख्या में प्रति दिन वृद्धि के कारण माता वैष्णो देवी द्वारा अपने भक्तों की जाने वाली असीम कृपा है । माता वैष्णों देवी के लाखों भक्त इस बात के प्रमाण है कि माता के दरबार में हाजिर होकर श्रद्धाभक्ति निष्ठा और विश्वास से जो भी मांगा उन्हें माता के प्रसाद के रुप में अवश्य मिला ।
काठमांडू से दिल्ली होते हुए वहाँ पहुँचा जा सकता है । जम्मु से बस एवं टैक्सी के माध्यम से कटरा डेढ-दो घंटे में पहुँचा जाता है । कटरा बस स्टैण्ड पर टूरिस्ट सेन्टर से यात्री पर्ची प्राप्त की जाती है जहाँ प्रत्येक यात्री को अपना नाम पंजीकरण करवाना पडÞता है । उसके पश्चात् माता के दरबार की ज्ञद्ध किलोमीटर की लम्बी यात्रा शुरु होती है । वैसे घोडÞा तथा डोली की भी व्यवस्था है । जिन लोगों को पैदल चढÞने में कठिनाई होती है वे इन सवारी साधनों का उपयोग करते हैं । आजकल भारतीय सेना की ओर से हाथीमत्था तक हेलिकाँप्टर सुविधा तथा टैम्पो की भी व्यवस्था की गयी है । कटरा से लगभग तीन किलोमीटर की यात्रा के पश्ाचत् वाणगंगा के दर्शन होते है । यहाँ पहाडÞों के बीच स्वच्छ नदी की धारा बहती रहती है । वाणगंगा से माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा तक पहुँचने के लिए दो रास्ते है एक सीढिÞयों वाला और दूसरी सीधी चढर्Þाई वाला ।
वाणगंगा के पश्चात् ‘चरण पादुका’ का स्थान आता है । इस स्थान पर माता अपने गन्तव्य स्थान जाते समय कुछ समय के लिए रुकी थी । जिस वजह से इस स्थान पर माता के चरण चिन्ह बने हुए हैं । इसी वजह से इस स्थान को चरण पादुका कहा जाता है । वाणगंगा से यह स्थान डेढÞ किलोमीटर दूर स्थित है ।र्
अर्द्धकुमारी ः चरण पादुका से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है आदि कुमारी का गर्भ गृह । वैष्णोदेवी का आदि कुमारी में मंदिर है यहाँ अनेक धर्मशालायें हैं जहाँ यात्री गण ठहरते है विश्राम हेतु । यही गर्भ गुफा में माता नौमास तक ठहरी हर्ुइ थी ।
हाथी मत्था ः गर्भ गुफा के पश्चात् हाथी मत्था नामक स्थान है जहाँ से दो किलोमीटर चलने पर साझी छत नामक स्थान है यहीं से भैरवदेव जाने के भी रास्ते हैं । एक रास्ता हाथी मत्था से नये रास्ते जो दिल्ली वाली छबीला की ओर से सीधे माता के गुफा की ओर जाता है ।
माता का गुफा ः त्रिकुट पर्वत पर माता वैष्णो देवी का दरबार एक अविस्मरणीय तथा अद्भूत दरबार है जहाँ तक पहुँचने हेतु इन उपरोक्त रास्तों को तय करने के पश्चात् मन्दिर परिसर में पहुँचा जाता है । वहाँ कटरा से प्राप्त पर्ची दिखाकर टोकन प्राप्त किया जाता है । पवित्र गुफा में प्रवेश के लिए कतार में खडÞे होने हेतु सभी यात्रियों को यह टोकन लेना अनिवार्य है । इन टोकन में अंकित यात्री संख्या के अनुसार ही यात्रियों को दर्शन की अनुमति मिलती है । गुफा का द्वार संकरा है । आगे बढÞने पर चरण गंगा की धारा के बायें भाग में एक प्राकृतिक शिलाखण्ड है । जिस पर सबसे पहले पाण्डवों के प्रतीक पाँच पिण्डियों और सप्तषिर्यों के प्रतीक सात पिण्डियां है और एक प्राकृतिक खम्बा है जिसे प्रल्हाद का तप स्तम्भ कहते हैं । आगे शेर का पन्जा और मुख बना हुआ है । यही गुफा का द्वार है । गुफा के छत पर शेषनाग की प्राकृतिक मर्ूर्ति और छोटे-छोटे सांपों की आकृतियाँ बनी हर्ुइ है । इसी गुफा में विश्व विख्यात माता वैष्णोंदेवी तीन पिण्डियों के रुप में विराजमान है ।
प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु अपने ज्ञान दृष्टि से अनुभव किये की महिषासुर का अन्त एक नारी शक्ति के द्वारा होगा । अतः जब महिषासुर के आतंक और अन्याय से त्रस्त इन्द्र और देवता ब्रहृमा-शिव के नेतृत्व में भगवान विष्णु से इस संकट से छुटकारा के लिए गुहार की तो भगवान ने जिस नारी की उत्पत्ति की वही वैष्णों कहलायी । बहृमा के अंश से महासरस्वती, विष्णु के अंश से महालक्ष्मी और शिव के अंश से महाकाली रुपी देवियों की उत्पत्ति इन्ही तीनो पिण्डियों के रुप में हर्ुइ । यही सम्मिलित रुप से वैष्णवी कहलायी । गुफा के अन्दर की शोभा अविस्मरणीय है । यह क्षण अनुभव का है जिन्हें दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है वही जान पाता है । गुफा के अन्दर माता के दर्शन के पश्चात् प्रसाद लेकर भक्तालुओं को भैरवनाथ दर्शन करने जाना होता है जो कि वहाँ से डेढÞ किलोमीटर की सीधी चढर्Þाई है । प्रचलित कथा अनुसार माता के हाथों भैरवनाथ नामक दुष्ट का सिर काट दिया गया जो इस स्थान पर गिरा वही उसकी मन्दिर है । भैरवनाथ के गिडÞगिडÞाने पर माता ने उसे आश्वासन दिया कि जो भी भक्त मेरा दर्शन करने आयेगें वे जब तक तुम्हारा दर्शन नही करेंगे मेरा आशर्ीवाद उन्हें फलदायी नही होगा । यही कारण है कि माता वैष्णों के दर्शन करने के पश्चात् भक्तगण भैरवनाथ का दर्शन हेतु पहुँचते हैं तभी माता वैष्णों देवी के दर्शन यात्रा पर्ूण्ा होती है ।


