बच के रहना भोले बाबा ::वीणा सिन्हा
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इधर-उधर भाग रहे हैं इस भीडÞ में प्रहरी भी अपनी शक्ति पर््रदर्शन करने में जुटे हुए हैं लेकिन पीटाने वाले को बचाने के लिए नहीं बल्कि पीटने वाले को साथ देने में । आर्श्चर्य यहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाये तो स्थिति कैसी होगी – यह दृश्य किसी पर््रदर्शन, जुलूस का नहीं है यह दृश्य विश्व विख्यात हिन्दू धर्मावलम्बियों के आस्था का केन्द्र काठमांडू के पशुपतिनाथ का मंदिर है । पशुपतिनाथ मंदिर न केवल नेपाल के हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बल्कि विश्वभर के हिन्दूओं के विश्वास तथा आस्था का केन्द्र है । यहाँ प्रति वर्षहजारों हिन्दू धर्मावलम्बी विश्व के विभिन्न देशों से भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करने हेतु आते हैं और अपनी मनोवांछित इच्छाओं की प्राप्ति करते हैं । इस विख्यात मंदिर को आजकल राजनीतिक षडयंत्र का अखाडÞा बना दिया गया है । नेपाल में गणतंत्र क्या आया, लोकतंत्र के नाम पर देश में अराजकता-अव्यवस्था का साम्राज्य छा गया । आज देश के आर्थिक-राजनीतिक, सामाजिक हो या धार्मिक, सांस्कृतिक क्षेत्र ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहाँ देश के तथाकथित राष्ट्रभक्त एवं शुभचिंतक मानने वालो विविध राजनीतिक दल देश का सबसे बडÞा अखाडÞा बनाकर अपना हित साधने हेतु मल्लयुद्ध न कर रहे हों ।
पशुपतिनाथ मंदिर में विवाद की यह कोई पहली घटना नहीं है । आज से ढ महीना पहले भी माओवादियों की सरकार ने सदियों से चली आ रही परम्परा के आधार पर नियुक्त दक्षिण भारतीय पुजारियों को हटाने का अभियान चलाया था । प्रारम्भ में सन्यासी और ब्राहृमण पुजारियों द्वारा पशुपतिनाथ जी की पूजा अर्चना की जाती थी लेकिन मल्लकाल में आदि शंकराचार्य ने दक्षिण ब्राहृमण को मूल भट्ट के रुप में नियुक्ति की परम्परा आरम्भ की । उन्हें पूजार्-अर्चना करने का लालपर्ूजा भी दिया गया । कारण बताया गया कि उत्तरी भारत के विभिन्न समयों में हिन्दूओं पर अन्य धर्मों का प्रभाव पडÞा फलतः उनमें शुद्धता नहीं रही, जबकि दक्षिण भारत के ब्राहृमणों में धार्मिक अभ्यास के लिए अटूट रुप से शुद्ध ब्राहृमण बरकरार रहा इन्हीं तथ्यों के आधार पर इस परम्परा को निरन्तरता दी जाती रही है ।
विगत पुस महीना में माओवादी सरकार ने इस परम्परा का अन्त करते हुए अपने पार्टर्ीीे करीबी व्यक्ति माने जाने वाले डाँ. विष्णु प्रसाद दहाल और शाल्रि्राम ढकाल को नया पुजारी नियुक्त कर दिया । सरकार के इस निर्ण्र्ााके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा भी दायर हुआ और सर्वोच्च ने सरकार के निर्ण्र्ाापर रोक लगा दी । माओवादी सरकार ने सर्वोच्च के आदेश का अवहेलना कर नवनियुक्त नेपाली पुजारियों को घोर विरोध के बावजूद पुलिसिया संरक्षण में मन्दिर प्रवेश करवाया तथा जबरदस्ती पूजा अर्चना करवानी शुरु की । माओवादी सरकार के इस जोर-जबरदस्ती की राजनीति वह भी धर्म तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप तथा अपने आस्था के केन्द्र पशुपतिनाथ जी को भी विवाद का विषय बनाने पर आम जनता में तीव्र आक्रोश व्याप्त हो गया ।
जनता के मनोभाव को भाँपते हुए देश के प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस ने धर्म के आग में अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का उपयुक्त अवसर के रुप में लिया । अब क्या था मन्दिर परिषद में राजनीतिक खेल खेला जाने लगा । एक पक्ष मन्दिर में तालाबन्दी करता है तो दूसरा पक्ष ताला खोलवाने हेतु धरना, जुलूस, पर््रदर्शन का सहारा लेता है । राजनीतिक दलों के इस आधिपत्य लडर्Þाई में बेचारे भोले पशुपतिनाथ की याद किसी को नही । लगातार आठ दिनों तक पशुपतिनाथ जी को भूखा-प्यासा रखा गया क्योंकि उनके दरवाजे पर ताला लगाकर उनकी पूजार्-अर्चना रोक दी गयी थी । अंततः दबाबों एवं चौतर्फी आलोचना के पश्चात् तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल को पीछे हटना पडÞा और नेपाली पुजारियों को वापस बुलाकर पुराने मूलभट्ट महाबालेश्वर की पुनः बहाली की गयी । इसके पश्चात् सम्पर्ूण्ा शिवभक्तों ने इन सियासदों की लडर्Þाई से राहत की साँस भी । अभी न्यायालय में मुकदमा लम्बित ही है इन पुजारियों के नियुक्ति को लेकर ।
देश में समस्याओं एवं विवादों की क्या कमी है । यहाँ आये दिन ऐसे-ऐसे विषयों को लेकर “फसाद” राजनीतिक दलों द्वारा खडÞा किया जा रहा है जो कि नेपाली जनता के आस्था एवं विश्वास को चोट पहुँचाता है । जनता के प्रत्यक्ष सरोकारवाली विषयों पर इन राजनीतिक दलों का ध्यान शायद ही जाता हो – महँगाई आसमान छू रही है, खाद्यान्नों को अभाव से जनता त्रस्त है, बीमारी, गन्दगी तथा अपराधों के महाजाल में देश जकडÞा जा रहा है लेकिन इन्हें दूर करने हेतु देश में तालाबन्दी नही की जाती है क्या सबसे निरीह पशुपतिनाथ जी ही नजर आते हैं कि बार-बार उनके द्वार पर ताला बन्दी की जाती है । इस बार पुनः विवाद का कारण मुख्य पुजारी के रिक्त पद पर भारत के कर्नाटक राज्य के बुलाये गये दो पुजारियों की नियुक्ति को लेकर है । मन्दिर के उत्तरी द्वार के रमाकान्त भट्ट और बासुकीनाथ के केपी रामचन्द्र ने पुस महीने में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था । परम्परा अनुसार एक महीना पर्ूव मूलभट्ट महाबलेश्वर रावल के संयोजकत्व एवं सिफारिश पर गिरिश भट्ट और राघवेन्द्र भट्ट का चयन किया गया । गिरिश ने मन्दिर के उत्तर द्वार और राघवेन्द्र ने बासुकीनाथ मन्दिर के पूजा की जिम्मेदारी सम्भाली । जब इसकी जानकारी पशुपतिनाथ में भारतीय पुजारी नियुक्ति के विरुद्ध गठित संर्घष्ा समिति को लगी तो उसने पशुपति क्षेत्र के विकास कोष के प्रशासनिक और आर्थिक विभाग में अनिश्चितकालीन तालाबन्दी कर दी है । यह संर्घष्ा समिति माओवादी निकट है । इन लोगों ने माँग रखी है कि नेपाली पुजारियों को क्षमता के आधार पर प्रतिस्पर्धा को माध्यम से पुजारी नियुक्ति की जाये, भारत के पुजारी आयात रोकी जाये तथा भट्ट, भण्डारियों के लिए वेतन की व्यवस्था की जाये ताकि पशुपति विकास कोष में आर्थिक अपारदर्शिता का अन्त हो सके । जबतक मांगें मानी नही जायेगी तब तक तालाबन्दी बनी रहेगी – संर्घष्ा समिति ने घोषणा की है । पिछले कई दिनों से पशुपति क्षेत्र में पर््रदर्शनों, धरनाओं का दौर चल रहा है । इस संबंध में संसदीय व्यवस्था संघीय मामला संविधानसभा तथा संस्कृतिमंत्री डाँ. मीनेन्द्र रिजाल का आरोप है कि माओवादी धर्म के आड में राजनीतिक खेल खेल रहे हैं । उनका कहना था कि सरकार ने मौजुदा नियम के अनुसार ही दो भारतीय भट्टों को पशुपतिनाथ के पुजारी के रुप में नियुक्ति की है । इन नव नियुक्त पुजारियों का गुप्तवास प्रशिक्षण के दौरान चल रहा था इस बीच शुक्रवार को ज्ञण्ण् व्यक्तियों का समूह वहाँ पहुँच कर इन पुजारियों को घसीटते हुए बाहर निकाल कर उनके साथ मारपीट करने लगे । मंदिर को अहाते में उपस्थित भक्तजनों ने उन अताताईयों से पुजारियों की रक्षा की । इस घटना को भारत सरकार ने बडÞी गंभीरता से ली है । भारत के विदेश मंत्री ने इस संबंध में नेपाल स्थित भारतीय राजदूत से पूरी जानकारी ली । उनके निर्देशन पर भारतीय राजदूत तथा नेपाल के संस्कृति मंत्री डाँ. मीनेन्द्र रिजाल मंदिर पहुँचकर घायल पुजारियों से भेंट कर घटना की जानकारी ली । संस्कृति मंत्री ने अपनी सरकार की ओर से इस घटना के प्रति क्षमा भी पुजारियों से मांगी । इस घटना के प्रति प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए भविष्य में पुनः ऐसी घटना घटने नही दी जायेगी कि प्रतिबद्धता व्यक्त की है । माओवादियों के संलग्नता के बार-बार आरोप लगने पर माओवादी प्रवक्ता कृष्णा बहादुर मोहरा ने अपनी पार्टर्ीीे कार्यकर्ताओं को इसमें संलग्नता से इन्कार किया है ।
स्पष्ट है ऐसी घटनायें देश को ही नही वैदेशिक नीति को भी प्रभावित करती है । भारत के साथ नेपाल का सदियों से रोटी-बेटी का संबंध रहा है । भारतीय नेताओं ने इस ओर इंगित भी किया है कि भारत के बनारस के विश्वनाथ मंदिर, केदारनाथ-बद्रीनाथ सहित अनेकों मठ-मंदिरों में नेपाली पुजारी नियुक्त हैं उसके बावजूद ऐसी घृणित घटनायें घट रही है जो कि दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर सकती है ।

