असली खतरा चीन से ::रुचि सिंह
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डियन डिफेंस रिव्यू के संपादकीय में व्यक्त की गई भारत पर चीनी हमले की आशंका से किसी प्रकार की घबराहट या किर्ंकर्तव्यविमूढÞ होने की आवश्यकता नहीं है । दरअसल यह लेखक का अपना नजरिया है । चीन की दो मुँही नीति से कौन नही वाकिफ है – जब ज्ञढटद्द में हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे गूंज रहे थे । तब चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका और अचानक हमला कर दिया । फुकेट में आसियान के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा ने सीमा मुद्दे पर मतभेद के बावजूद भारत और चीन ने बेशक बहुआयामी संबंधों को प्रगाढÞ बताया । अपने चीनी समकक्षी से विदेशमंत्री एस.एम. कृष्णा को उम्मीदें क्यों ना हो – लेकिन चीन का अडिÞयल रवैया तवांग पर अपना हक मानता है । भारत और चीन के बीच ज्ञ,द्दण्,ण्ण्ण् वर्ग किलोमीटर जमीन विवादित है । अरुणांचल समेत इस भू-भाग मेंे डद्ध,ण्ण्ण् वर्ग किलोमीटर पर्ूर्वी क्षेत्र में पडÞता है। 
चीन के हाथों मिली पराजय का डंक इतना विषैला है कि भारत अभी तक भुला नही पाया है । विदेश मंत्रालय के सूत्रों की माने तो चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा तय न होने से अक्सर ही सैनिकों के बीच कहा सुनी हो जाती है । गौरतलब है कि चीन ने अरुणांचल से सटे अपने जियांग प्रांत में सडÞकों का जाल बिछा लिया है और वहां सैन्य हलचल तेज कर दी है । यह किसी से नही छुपा है कि चीन तवांग क्षेत्र को अपनी ही टेरीटरी मानता है । चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की बढÞती गतिविधियों के बाद भारतीय सेना की दो डिविजन तैनात करने की तैयारी हो रही है । चीन ने तिब्बत समेत पूरे सीमाई इलाके में लंबे समय से तकरीबन ज्ञछ डिवीजन सेना -पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) तैनात कर रखी है । तिब्बत में तकरीबन तीन लाख चीनी सैनिक मौजूद है । तिब्बत को अपना स्वायत्त क्षेत्र घोषित करने के बाद चीन ने वहां सैनिक सुविधाओं का महाजाल बिछा रखा है । विगत सन्दर्भों को देखें तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की द्दण्ण्ठ की चीन यात्रा ने साझेदारी के उन पलों को आगे बढÞाया जो ज्ञढडड में दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गंाधी के चीन यात्रा के दौरान चीन-भारत रिश्ते सामान्य हुये थे । चीनी प्रधानमंत्री ने राजीव गांधी से कहा था कि चीन और भारत के विकास के बिना अगली सदी सेंचुरी आँफ एशिया नही कही जा सकेगी । विदेश मंत्रियों की बातचीत के जरिए सीमा विवाद हल करने के लिए साझा कार्य समूह भी गठित हुए लेकिन सीमा विवाद हल करने के मुद्दे पर हमेशा चीन का रवैया या तो टालमटोल का रहा है या दबाब डालने का रहा है । फिलवक्त देखा जाए तो भारत-चीन के बीच सामरिक संबंध बेहद पेचीदगियों और विरोधाभासों से परिपर्ूण्ा है । सोनिया गांधी की चीन यात्रा को खत्म हुए द्दद्ध घंटे भी नहीं बीते थे कि चीन की तरफ से खबर आयी थी कि मैंकमोहन लाइन को चीन स्वीकार नही करेगा और भारत प्रसिद्ध बौद्धस्थल तवांग को उसके हवाले कर दे । भारत और चीन के बीच पिछले द्दढ सालों में विभिन्न स्तरों पर दो दर्जन से अधिक बैठकें हर्ुइ है । इन सभी बैठकों में चीन तवांग को अपना हिस्सा बताता रहा है । वैसे भी कई ज्वलंत मसलों को हल करने में चीन की भूमिका को अहम भी माना जाता है । लिहाजा चीन ने भारत को समझा भी दिया कि वह सामरिक भागीदारी की रणनीति को इस गरज से भी आगे बढÞाने की इच्छा रखता है जिससे भारत अमेरिका के नजदीक न जा पाए ।
फिलवक्त इस समय भारत और चीन के आर्थिक संबंध काफी सशक्त है । दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार ठ अरब डाँलर को छूने वाला है । जिसमें चीन को ज्यादा लाभ है । इंडियन डिफेंस रिव्यू में यह भी कहा गया है कि चीन की आर्थिक, सामाजिक दर्ुदशा के चलते रोजगार के मुद्दे पर विफल चीन इन समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए भारत पर हमला कर सकता है । इसके अलावा यह भी कहा गया है कि लगातार उठते अलगाववादी आंदोलन भी चीन की चिन्ता के लिए सिर्रदर्द बन गये हैं । वास्तविकता यह है कि तिब्बत और सिकियांग को छोडÞकर चीन में कोई बडÞा अलगाववादी आन्दोलन आसानी से सफल हो नहीं सकती है क्योंकि वहां की ढघ प्रतिशत आबादी चीनी मूल की हान जाति है ।
हालांकि चीन की वक्रदृष्टि पडÞोसी देशों पर शुरु से है । यह किसी से छुपा भी नही है । नेपाल की सीमा से सटे अपने क्षेत्र में चीनी सैनिकों की हलचल इस ओर इशारा करती है कि नेपाल बेशक चीन के अपना मित्र माने लेकिन चीन ने कभी भी दिल से नेपाल को अपना मित्र माना ही नही । गौरतलब है कि चीन के हांगकांग में जहाँ नेपालियों के लिए रोजगार के अवसर है लेकिन नेपालियों के प्रवेश के लिए प्रतिबन्ध चीनी मानसिकता की दोगली नीति को उजागर करता है । चीन की नीति हमेशा से ही स्वार्थी प्रवृत्ति को दर्शाती है । चीन का पर्ूव सोवियत संघ से सीमा विवाद रहा तो वही चीन ने वियतनाम पर चढर्Þाई की तो दक्षिण कोरिया और ताइवान से चीन का विवाद ही रहा है । जापान से भी कई मसलों पर टकराव बना रहा है । चीन ने हमेशा ही भारत की उदारता का फायदा उठाने की कोशिश की है । भारत ने सुरक्षा परिषद में चीन के दावे का बिना शर्त र्समर्थन दिया । तिब्बत में भी चीन के दावे को र्समर्थन देकर राष्ट्रीय और अंतर्रर्ाा्रीय स्तर पर आलोचना बर्दास्त की है । ज्ञढटठ में चीन ने सिक्किम पर हमला बोला । भारत के मध्य और पर्ूर्वी इलाके के अलावा पश्चिमी इलाकों में भी चीन द्वारा लगातार सीमा उल्लंघन किया जाता रहा है । साल द्दण्ण्ड में ऐसे द्दठण् मामले सामने आए जबकि इस साल ऐसी घटनाओं की संख्या टण् से भी ज्यादा हो चुकी है । अरुणांचल प्रदेश के साथ चीन की ज्ञ,ण्घण् किलोमीटर लंबी खुली सीमा है । इसी बात का फायदा उठाते हुए चीन बार-बार ऐसी हरकतों को दोहराता है । और तो और चीन ने हमेशा भारत को घेरने की कोशिश ही की है । द्दण्ण्ड में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की बैठक में भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील में बाधा पहुँचाई । जब-जब सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्यता की कोशिशें हर्ुइ चीन-पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए अवरोध खडÞा करता रहा है । सीमा मुद्दे पर मतभेद के चलते चीन ने हाल में अरुणांचल प्रदेश में एक परियोजना के चलते ए.डी.बी. की मदद को रोकने का प्रयास किया था ।
बरहाल चीन का नेतृत्व उतना मर्ूख नही है कि वह भारत जैसे एक नाभिकीय क्षमता सम्पन्न देश पर हमला कर देगा । भारत दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक एवं सामरिक शक्ति के रुप में शुमार किया जाता है । भारत कोई छोटा-मोटा लुंज-पुंज देश नहीं है कि कोई भी उस पर हमला कर देगा । रक्षा मंत्रालय ने भी यह साफ कर दिया है कि वह चीन की गतिविधियों को लेकर पूरी तरह से र्सतर्क है । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में चीन सीमा पर बढÞते खतरे के मद्देनजर रक्षाबलों की तैयारियों का जायजा तक लिया है । ज्ञढटद्द से द्दण्ण्ढ तक आमूल परिवर्तन हो चुके है और द्दण्ज्ञद्द तक भारत के लिए किसी प्रतिकूल की संभावना तो है ही नही । खैर जो भी हो भारत खामख्वाह किसी भी देश के साथ नाहक विवाद करने के मूड में नही है । पडÞोसी देशों के साथ तो कतई भी नही ।

