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September , 2010
Wednesday

लोडसेडिंग:: पिरशु प्रधान

Posted by Himalini On September - 14 - 2009
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म आई दरवाजे पर और काँलबेल बजाने लगी । मैंने लगातार बजते हुए काँलबेलको सुना पर दरवाजा खोलने का मन नहीं हुआ । काँलबेल लगातार बजती रही और मैं उसका आनंद लेता रहा । कान्छा दूध लेने गया है शायद नहीं तो वही दरवाजा खोलता । पर तुम काँलबेल बजाती रही । मैंने सोचा – कैसी गंवार लडÞकी है – इतने सबेरे क्यों यहां आई है – अभी तो सिर्फआज बजे हैं । नौकरी के लिए मेरी चापलूसी करने की जल्दी है उसे । बेमन से उठा मैं । नीचे उतरकर दरवाजा खोला । तुम वहां खडÞी थी । मैं देखता ही रह गया । तुम इतनी सुन्दर होगी मैंने सोचा नहीं था । दोस्त तो कह रहा था लडÞकी सुन्दर है सुन्दर, पर इतनी सुन्दर मेरी कल्पना से परे । तुम मेरी नजर को भांप गई । मैंने कहा – “चलो अन्दर ।” फिर हम अन्दर चले आए ।
बैठक में सिर्फमैं और तुम थे । मैं तुम्हारा सुबह का सूरज जैसा चेहरा देखने लगा । तुम मेरे बैठक को देखने लगीं । पर उस कमरे में ध्यान देकर देखनेवाली तो वैसी खास कुछ नहीं थी । टेबल पर रखे हुए फूल बासी पडÞ गए थे । सिंगापुर से लाई गई घडÞी भी वक्त बताना भूल चुकी थी । सोफे पुराने पडÞ गए थे । एक आकर्ष लडÞकी की नंगी तस्वीर पर तुम्हारी नजर म गई । तुम बहुत देर तक उस तस्वीर को देखती रही । मुझसे नजरें चुराकर भी तुम उसी तस्वीर को देखती रहीं । शायद तस्वीरवाली से खुद को तौल रही हो – है न -
यह किस कलाकार की तस्वीर है जो मेरी विदेशी दोस्त र्-गर्ल-प|mैंड) ने दी है । मैं तुम्हारी नजर उस तस्वीर से हटाना चाह रहा था ।
“यह तस्वीर मुझे बहुत अच्छी लगी । पर बैठक में क्यों… – बहुत लोग आते जाते हैं ।” तुमने पूछा । मुझे मालूम था तुम यह सवाल करोगी । और इसका जवाब मैंने तुरंत दिया – “नंगा होना मानव की प्रकृति है, सुन्दरता है । प्रकृति ने उसे नंगा ही पैदा किया है । क्यों हम कृतिमता की चादर ओढÞें -”
तुमने मेरी बातें ध्यान से सुनी । इसलिए मैं छोटामोटा भाषण देने को तैयार हो गया – आदमी प्रकृति से जन्मा है और वह प्रकृति में ही खुश होता है । हमने ही सुन्दर प्रकृति का बलात्कार किया औरु उसे कुरुप कर दिया है । हमें प्रकृति के शाश्वतता और सुन्दरता को संरक्षण देना है ।
इसी वक्त कान्छा दूध लेकर आ पहुंचा । मैंने उसे दो प्याली चाय बनाकर लाने के लिए कह दिया । और वह दौडÞते हुए किचन में चला गया । वह गैस जलाने लगा और हमें गैस की अजीब सी गंध सताने लगी । कहीं गैस सिलिन्डर से लीक तो नहीं हो रहा । मैं उठा और किचन की तरफ चला गया और कान्छा को चाय में चिनी कम रखने के लिए कह आया ।
चाय टेबल पर आ गई थी । चाय की भाप के साथ ही हमने बात करने की कोशिश की पर बातचीत का मुद्दा तय नहीं हो पा रहा था । मैं याद करने की कोशिश करने लगा ।
मुझे मालूम था तुम नौकरी की बात करोगी । क्योंकि कल रात ही मेरे एक दोस्त ने तुम्हें कहीं एडजस्ट करने की बात कही थी । और ‘बाकी बातें अपने जिम्मे’ की बात कही थी । कल रात शायद स्काँच कुछ ज्यादा ही लग गया । मैं हवा में कहीं उडÞ रहा था । उडÞान तो अच्छी थी, बादलों से लुकाछिपी खेलना अच्छा लग रहा था । वहीं पडÞे रहना बोरियतवाला काम था और मजा भी न आता । मैंने तुम्हारी नौकरी को बादलों के बीच की उडÞान से तुलना की । यानि कि तुम्हें नौकरी दिलवा देने या देने की बात जितनी आनन्द और उत्साहवर्द्धक थी, उसके नतीजे की स्थिति जमीं में पछाडÞ खाने जैसी थी । इस मामले में मेरा खास अनुभव था । उम्र के दौर में चालीस पार कर जाने पर लातें खाने की प्रक्रिया तीव्रतर हो जाती है ।
“तुम क्यों आई हो -” मैंने अब शुरु किया क्योंकि हम चाय पी चुके थे ।
“कहीं एडजस्ट होने के लिए ।” तुमने सरलता से अपनी बात रख दी ।
“एडजस्ट… नौकरी ढूंढ रही हो -” तुमने हां में शर हिलाया और मुझे अच्छा लगा ।
“तुम्हारी शिक्षा कितनी है और अनुभव कितने वर्षों का है -” मैंने एक ही बार में पूछ डाला । फिर तो तुम गंभीर बन गयी । थोडÞी देर बाद खयाल आया यह सवाल तो मुझे करना ही नहीं चाहिए था । पर तुम्हारी नौकरी के लिए कहीं एप्रोच करने के लिए यह जरुरी भी था । जवाब में तुमने टाइप किया हुआ बायोडाटा मेरे सामने रख दिया । जो इस तरह का था ः
नाम ः प्रीति
जन्मस्थान ः उदयपुर
शिक्षा ः दशवीं प्ास
अनुभव ः टेलिफोन व गार्मेंट संबंधी
पता ः नया बानेश्वर
यह बायोडाटा साधारण सा था । मुझे मालूम पडÞ गया तुम प्रीति हो । पर उस बायोडाटा में तुम्हारी जाति नहीं लिखी थी । यह जानकारी भ्ी नहीं थी कि तुम विवाहित हो या अविवाहित । अनुभव भी कुछ स्पष्ट नहीं था । जन्म की तारिख न होने से तुम्हारी उम्र का पता भी नहीं चला । मैंने इन बातों को जानने की कोशिश नहीं की । मैंने पूछा – “कितनी पगार की आशा करती हो -”
“कम से कम दो हजार भी न हों तो काठमांडू में कैसे जीया जा सकता है -” तुमने कहा और मैंने सर हिलाकर र्समर्थन जताया ।
“बायोडाटा में फोटो तो नहीं है -” मैंने दूसरा सवाल दागा ।
“मैं खुद सर के सामने उपस्थित हूं तो फिर फोटो की क्या जरुरत -” तुम्हारा जवाब सटीक था ।
तुमने पहली बार मुझे ‘सर’ पुकार कर मान्यता प्रदान की यह अच्छी बात थी । पर मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी क्योंकि में तुम्हें दोस्त के रुप में देखना चाहता था । तुमने पहली मुलाकात में ही बाँस और मुलाजिम का संबंध गढÞना चाहा जो मुझे सहज नहीं लगा ।
“नौकरी देनेवाले तो दूसरे लोग हैं और वे तुम्हारा फोटो देखना चाहेंगे … फिर मां बाप और जाति के बारे में भी कुछ नहीं लिखा ।”
“औरत की कोई जात होती है सर -” तुम गंभीर रुप से मुस्कुर्राई । मैंने सोचा – आजकल की लडÞकियां मेकअप के अलावा बातें बनाना भी खूब जानती हैं ।
“इसका मतलब तुम शादीसुदा नहीं हो -” मैंने पूछा ।
“आपको मैं बेटी जैसी नहीं लगती क्या -” यह मेरे लिए मुश्किल सवाल था । मेरे दिमाग में तूफान उठने लगा । क्या मैं इतना बूढा हो गया हूं – मुझे वक्त ने इतनी दूर एकांत में ला पटका है – अर्थात् मेरे वक्त के स्वर मिटने लगे । मुझे लगा मैं वहां से उठकर चला जाऊं । चक्कर सा आने लगा और लगा उलटी हो जाएगी । मेरे चेहरे पर अचानक आए परिवर्तन से वाकिफ हो तुमने सवाल किया – “आज सर की तबीयत ठीक नहीं है क्या -”
“कल ज्यादा शराब पी गया था । सबेर से ही हैंग ओवर है, सर दर्द से फटा जा रहा है ।” मैंने स्थिति को सहज बनाया । पर भीतर से मैं जल रहा था और भन्ना रहा था । मेरे सारे रास्ते बंद होते देख मैंै घबरा गया । सोचने लगा – भाग्य ने मुझ को प्रदूशित नदी के किनारे ला फेंका है । कान्छा को और दो कप चाय का आर्ँडर देकर मैं खुद को आश्वस्त करने की कोशिश करने लगा ।
तुम वातावरण में सहजता ढूंढ रही थी । कहा – “मैं सर को दुःख दे रही हूं, क्या करुं, मैं बहुत अभागिन हूं सर ।”
“तुम्हारी बीती हर्ुइ कहानी मुझे नहीं सुननी प्रीति । क्या फायदा सुनकर भी । सभी डेवलपिंग कन्ट्री के लोगों की कहानी एक सी होती है । वक्त, जगह और नाम में अंतर होता है बस ।” मैं जरा दार्शनिक हो गया था । नौ बजने वाले थे और मुझे फैक्टरी के लिए देर हो रही थी । वहां आजकल बहुत काम बढÞ गया था । जर्मनी व अमरिका के खरीदकर्ताओं ने न केवल आर्ँडर बढÞाया था बल्कि वे खुद फैक्टरी देखने के लिए आने वाले थे ।
“सर का परिवार कहां है -” तुमने दूसरा सवाल किया ।
“पत्नी अमरिका चली गई, बेटों के साथ रहने । मैं अकेला बूढा यहा हूं । एक नौकर के सहारे मुझे छोडÞ गए हैं ।” कहते हुए मैंने हंसने की कोशिश की पर मुझे मालूम था उस हंसी में कडÞवाहट घुला हुआ था ।
बैठक में रखे हुए मेरे पुराने फोटो पर तुम्हारी नजर अटक गई । आज से तीस साल पुरानी वह तस्वीर एक सुन्दर व आकर्ष युवक की थी तब । मैं अब जल्दी में था । तुम्हें शायद अपनी नौकरी पक्की करनी थी । परन्तु मेरे यहां तो नौकरी थी नहीं ।
मैं क्या चाहता हुं तुम्हें मालूम करना चाहिए था मैंने पूछा – आज कौन सा दिन है – मैं आजकल बहुत व्यस्त हूं ।
“रविवार” तुमने झट् कह दिया ।
“शुक्रबार को आ जाओ… गुड प|mाइडे… शाम को क्यों – मैं उसी दिन तुम्हारी नौकरी पक्की कर दूंगा ।” मैने स्पष्ट शब्दों में कहा और तुम चली गई ।
रविवार से शुक्रवार तक के छह दिन मेरे लिए कष्टकर गुजरे । एक युवती के बारे में इतना सीरियस शायद मैं पहली बार हुआ था । छह दिन तक भावुक बनता रहा और अच्छी सी शुक्रवार का इन्तजार करता रहा । दिन कैसे बीते मैं याद नहीं कर सका । पर इस दौरान में सिर्फतुम्हें याद करता रहा । प्रीति को याद करता रहा और खुद से सवाल करता रहा – इस उमर में भी कोई प्रेम में पागल हो सकता है क्या – क्या बूढे पेडÞ में भी फूल खिलाया जा सकता है -
वह शुक्रवार का दिन था । मैने आँफिस से छुट्टी ले रखी थी । उस दिन सूरज चाय के साथ न होकर रेडलेवल हृविस्की के साथ उगा था । अपने सफेद बालों में कालिख पोतकर काला बना लिया था मैंने । चेहरे पर क्रिम लगाकर दिनभर प|mाइड चिकन के साथ छछछ सिगरेट पीता रहा । स्टार टीवी के उत्तेजक दृश्यों को देखकर खुद को कामुकता की लहरों पर उद्वेलित करता रहा । अखबार हाथ में था पर उसमें क्या छपा था मुझे मालूम नहीं था । मैंने खुद को तीस साल पहलेवाले अपने रुप में ले जाने की कोशिश की । वो भी एक समय था जब सिर्फप्रेम के गीत गाते थे, प्रेम की कविताएं लिखते और पढÞते थे । वो क्या वक्त था – चौराहे पर घंटों बैठते । मैंने फिल्म फेयिर देखकर रख दिया । मुस्तांग का घोडÞा बनने के लिए मुस्तांग की दो गोलियां निगल ली । समय खाली ही बीत रहा था । सिर्फशून्य था और खाली दिमाग में हृविस्की का प्रभावपर्ूण्ा आक्रमण था ।
फिर तो वही बात हो गई । शुक्रवार शाम को तुम आई और उसी तरह काँलबेल बजाने लगी । मैं खुद दरवाजा खोलने के लिए जा पहुंचा ।
“क्या घर में कोई और नहीं है जो सर खुद दरवाजा खोलने आ पहुंचे -” तुमने पूछा ।
“आज तुम्हारी सेवा कर रहा हूं ।” मैंने मुस्कुराते हुए तुम्हें छेडÞा । हम फिर बैठक में आ गए ।
टेबल पर हृविस्की और बियर की बोतलें थी -
“क्या लोगी -” मैंने पूछा ।
“कुछ नहीं ।” तुम्हारा जवाब था ।
“मैं तो हृविस्की लूंगा । एक ग्लास बियर नहीं लोगी -”
“मैंने कभी पी नहीं है ।”
“तब आज पी लो न … ।”
मैंने एक ग्लास में बियर उंडेलकर तुम्हारे हाथ मैं थमा दिया । तुमने बियर चाय की तरह धीरे धीरे न पीकर मठ्ठे की तरह एक ही बार में पूरा ग्लास गटक दिया । मैं हैरान हो गया और एक ग्लास और तुम्हारे हाथ में दे दिया ।
“तुम किस तरह की नौकरी करोगी -” मैंने गंभीर होकर पूछा ।
“जैसी मिलेगी… खाने पीने और रहने के लिए पैसे हो बस… ” तुम्हारे चेहरे पर रंग चढÞने लगा ।
तुम और लाल दिखने लगी । तुमसे बातें करने के लिए मेरे पास विषय नहीं था । थोडÞी देर सोचता रहा । हां तुम जब पहली बार आई थी तो तुमने मेरे फोटो के बारे में पूछा था और बहुत देर तक देखती रही थी । मैंने पूछा – “मेरा फोटो कैसा लगा -”
“बहुत अच्छा । बहुत सुन्दर है पर क्या वह फोटो आपका ही है -”
“क्या मेरा फोटो जैसा नहीं लगता -”
“नहीं, बिल्कुल नहीं । उस चेहरे में जो यौवन का तेज है, जिस सौर्न्दर्य का मान्यता है वह आपमें कहाँ – आप जल्दी बूढे हो गए लगते हैं … ।” तुमने कमेंट किया ।
“हां वैसा ही है । मैं अपनी इच्छा से बूढÞा तो नहीं हुआ, न ही अब होना चाहता हूं । पर प्रकृति से कोई लडÞ सका है क्या -”
शाम होने को आई थी । उस दिन लोडसेडिङ का दिन था । कैंडल के शुभ्र उजाले में तुम्हारा चेहरा देखकर भूपि शेरचन की कविता “मैनबत्ती को शिखा” अचानक याद आ गई ।
“चिली चिकन खाओ न… मैंने खुद बनाया है ।”
“अच्छा है, बहुत स्वादिष्ट है ।”
मैं एक प्रकार से शून्य हो चला था । मैं अमरिका में बिताए गए हसीन लम्हें याद कर रहा था । मैंने तुम्हें पास बुलाया साथ बैठने के लिए । तुम डर गई । तुम्हारी भयभीत आंखें हिरण की जैसी लगी – जो शिकारी के भय से छिपती है जंगल में । मैं उत्तेजित होने की कोशिश करने लगा । एक जवान औरत के आगे खुद को उत्तेजित करने की विसंगति ने मुझे निराश कर दिया । पर मैं तैयार तो हो गया । मैंने तुम्हारे नरम हाथ अपने हाथ में लिए और सहलाने लगा ।
“क्या आपको शोभा देता है – ऐसी हरकत करते हुए इस उमर में -” दो शब्द मेरे भीतर पहुंचे और कहीं गुम हो गए ।
“मैं तुम्हारी हस्तरेखाएं देखूं । तुम्हारा भाग्य कैसा है – कैसा पति मिलेगा – कैसी नौकरी मिलेगी – बच्चे कितने होंगे -” तुम्हारे नरम और कमसिन हाथ लेकर उन्हें सहलाता रहा । खेलता रहा उनसे । ज्योतिष विद्या को कभी न जाननेवाला, आदमी की हस्तरेखाएं देखकर भविष्यवाणी करना कम हास्यास्पद नहीं था । किन्तु में मजबूर था । तुम सहज नहीं हो रही थी, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम था और तुम्हारा चेहरा लजाना, तुम्हारा न खुल पाना मुझे खुशी और आनंद दे रहा था ।
मैंने तुम्हें बाहों में लिया और चुमने की कोशिश करने लगा । तुम्हारे होठों से अपने होंठ सटाए आनंदानुभूति करने लगा । तुम्हारे कोमल अंगों को सहलाए । अपने आवेग को शांत करने की कोशिश करने लगा । तुम खुद को मुझ से मुक्त करने की कोशिश में लगी थी । मैंने तो तुम्हे न छोडÞने की कसम ही ले रखा था । मैं अपने तीस साल पुरानी जवानी को पुनर्जीवित करने की धुन में था । मैं विगत में जाकर जंग बहादुर बनना चाह रहा था और तुम्हें भोगना चाह रहा था ।
लगता था वक्त थम गया है । लोडसेडिंग का वक्त अभी खत्म नहीं हुआ था । मैंने अपने अन्दर बहुत गर्मी महसूस की । वह गर्मी बिजली की तार की तरह ही मेरे बदन के नीचले हिस्से में बह गई । ठीक उसी वक्त एक ठंडी लहर दौडÞ गई बदन में । मैंने बरफ होने का यथार्थ स्वीकार कर लिया । लगा एक लहर बहुत ऊँचा उठकर फिर बैठ गया है । लोडसेडिंग खत्म होने पर हम वहां नहीं थे ।
उसके बाद दूसरे दिन के स्थानीय अखबार में मैंने तुम्हें रेप किया – ऐसी सनसनी खेज खबर छपी थी ।
अनुवाद ः कुमुद अधिकारी

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1 Response

  1. Devi nangrani Says:

    Kumud Adhikari dwara anuwaadit kahani ke ansh padne par stree marm se aur nazdeek se wakif hone ki sambhavana badi hai.

    “औरत की कोई जात होती है सर -” तुम गंभीर रुप से मुस्कुर्राई । मैंने सोचा – आजकल की लडÞकियां मेकअप के अलावा बातें बनाना भी खूब जानती हैं ।
    “इसका मतलब तुम शादीसुदा नहीं हो -” मैंने पूछा ।
    “आपको मैं बेटी जैसी नहीं लगती क्या -” यह मेरे लिए मुश्किल सवाल था । मेरे दिमाग में तूफान उठने लगा । क्या मैं इतना बूढा हो गया हूं – मुझे वक्त ने इतनी दूर एकांत में ला पटका है
    Bahut hi achi lagi prastuti aur uski samagri
    Devi Nangrani

    Posted on October 20th, 2009 at 1:49 pm

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