Tue. Sep 25th, 2018

ओली–यादव गठजोड़

हिमालिनी, अंक जून, २०१८ | संसदीय चुनाव के बाद जब तत्कालीन नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपीशर्मा ओली प्रधानमन्त्री निर्वाचित हो गए, सभी ने अनुमान किया था कि अब देश में स्थिर सरकार बनने जा रही है । शुरुआती मन्त्रिपरिषद् विस्तार संबंधी कार्यों को देखकर यह भी अनुमान किया जा रहा था कि अब देश में सिर्फ आवश्यकता के अनुसार ही सीमित संख्या में मन्त्री रहेंगे,  देश को आर्थिक रूप में कमजोर बनाने के लिए अनावश्यक मन्त्रियों की भीड़ सिंहदरबार में नहीं लगेगी । लेकिन अनुमान धीरे–धीरे गलत साबित होता जा रहा है । सरकार में दो तिहाई बहुमत दिखाने के लिए पिछली बार प्रधानमन्त्री ओली ने संघीय समाजवादी फोरम नेपाल को सरकार में शामिल कर दो उपप्रधानमन्त्री भी बनाए हैं, जो राजनीतिक स्थिरता के अपेक्षा और जनभावना के विपरित है ।
शुरुआती दिनों में प्रधानमन्त्री कह रहे थे कि सरकार में किसी को भी राज्यमन्त्री और उपप्रधानमन्त्री नहीं बनाया जाएगा, लेकिन उन्होंने अपने ही वादा को तोड़ दिया और स्वास्थ्य मन्त्री में नियुक्त फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव और रक्षा मन्त्री रहे ईश्वर पोखरेल को उपप्रधानमन्त्री बना दिया । अब प्रश्न उठता है कि अपने ही वादा के विपरित प्रधानमन्त्री ओली  क्यों ऐसी हरकत कर रहे हैं ? सरकार तो पूर्ण बहुमत में ही थी,सत्ता में बने रहने के लिए अन्य किसी भी पार्टी के साथ प्रधानमन्त्री ओली को अनावश्यक सम्झौता करने की जरुरत भी नहीं थी । स्पष्ट है, प्रधानमन्त्री ओली दो तिहाई बहुमत की घमण्ड में थे, जिसके लिए उन्हें फोरम नेपाल और राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) में से किसी भी एक को सरकार में शामिल करना ही था । सरकार में दो तिहाई बहुमत दिखाने के लिए ही उन्होंने फोरम नेपाल और राजपा दोनों दलों के साथ बार्गेनिङ किया । अन्त में सत्ता की दौड़ में फोरम नेपाल ने बाजी मार दी । इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकता है । जैसे  कि संविधान संशोधन संबंधी मुद्दा और ओली की रणनीति ।
हा, आज बाहर से ओली के पास दो तिहाई बहुमत तो दिखाई देता है, जिसे देखकर बहुत लोगों को लगता भी होगा कि सरकार शक्तिशाली है । लेकिन आन्तरिक वस्तुतस्थिति को मूल्यांकन किया जाए तो सरकार शक्तिशाली नहीं, और कमजोर बन गयी है, ऐसा सन्देश भी बाहर जा रहा है । क्योंकि ओली अपनी अडिगता  से विचलित होते जा रहे हैं, जो प्रधानमन्त्री ओली की चाहत ‘स्थिर सरकार’ के विपरित है । आज तो सरकार में दो उपप्रधानमन्त्री हैं, कल किसी भी व्यक्ति को महत्वाकांक्षा सम्बोधन करने के लिए  उपप्रधानमन्त्री बनाया जा सकता है क्योंकि जितने भी उपप्रधानमन्त्री बनायें जाएँ, उसके लिए संविधान बाधक नहीं है, इसका बीजारोपण ओली जी कर चुके हैं ।
यहां संविधान संशोधन संबंधी प्रसंग को भी उल्लेख करना सान्दर्भिक है । चुनाव से पहले ही ओली संविधान संशोधन के पक्ष में नहीं थे । इसी अडान के साथ चुनाव में जाने के कारण ही तत्कालीन नेकपा एमाले ने चुनाव में बहुमत हासिल किया । इसीलिए आज भी वह अपनी पुरानी मान्यता से बाहर नहीं आना चाहते हैं । लेकिन प्रधानमन्त्री ओली कह रहे हैं कि संविधान संशोधन किया जाएगा । यह उनकी बाध्यता भी है । विशेषतः मधेशवादी शक्ति के दबाव और भारत के साथ किए गए वचन के कारण प्रधानमन्त्री ओली संविधान संशोधन के पक्ष में दिखाई देने के लिए बाध्य हैं । ऐसी अवस्था में उन को लगा होगा कि कि अगर मधेशवादी शक्ति (फोरम नेपाल और राजपा) में से किसी एक को सरकार में शामिल किया जाए तो संविधान संशोधन संबंधी मुद्दा को कुछ समय के लिए ही सही, दरकिनार किया जा सकता है । इधर फोरम नेपाल और राजपा को भी पाँच साल तक सरकार से बाहर रहकर जीना मुश्किल ही महसुस हो रहा था । इसीलिए फोरम नेपाल और राजपा दोनों पार्टी चाहते थे कि ‘फेश सेभिङ’ के लिए कुछ सहमति हो जाए, उसके बाद सरकार में शामिल होना ही पड़ेगा । ऐसी ही अवस्था में ओली फोरम नेपाल को सरकार में शामिल करने में सफल हो गए हैं ।
अब दिखावे के लिए संविधान में कुछ संशोधन भी हो सकता है । अथवा बिना संशोधन भी कम से कम एक–दो साल तक सत्ता को आगे बढ़ाया जा सकता है । शायद इसी रणनीति के साथ अपने ही वादा के विपरित उन्होंने उपप्रधानमन्त्री सहित पिछली बार मन्त्रिपरिषद् बिस्तार किया है, जो समस्या का समाधान नहीं है ।
केन्द्र में नयां समीकरण निर्माण होते ही उसका सबसे अधिक प्रभाव प्रदेश नं. २ में पड़ा है । जहां फोरम नेपाल के ही नेता लालबाबु राउत मुख्यमन्त्री हैं । अन्य प्रदेश में तो स्थिर सरकार कायम रह सकती है, लेकिन यहां लालबाबु राउत को कभी भी पद से हटाया जा सकता है, इसकी सम्भावना अधिक हो गई है । अर्थात् फोरम नेपाल केन्द्र सरकार में शामिल होने के बाद प्रदेश नं. २ में निर्मित सरकार संकट में पड़ गयी है । राजनीतिक नैतिकता को खयाल किया जाता है तो अब यहां राजपा नेपाल सरकार से बाहर हो सकती है । फोरम नेपाल को सरकार में शामिल होने के कारण कम से कम प्रदेश नं. २ में अस्थिरता का बीजारोपण हो गया है । अगर प्रदेश नं. २ अस्थिर बन जाएगा तो वह प्रधानमन्त्री ओली के लिए भी शुभ संकेत नहीं है ।

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