क्या ओली सरकार अपने पाँच वर्ष बिना किसी रुकावट के पूरी कर पाएगी ? : श्वेता दीप्ति

हमेशा संघीयता का विरोध किया, जो यह कहता आया है कि संविधान का संशोधन देश हित में नहीं है, उसी को मधेशवादी दलों का समर्थन देना कितना उचित है?


दो विरोधी धार ने जनता के समक्ष एक होने का दावा किया है, इस धार की दिशा कब तक एक ही होगी यह यक्ष प्रश्न है । जनता के सामने वामगठबन्धन ने जो प्रतिबद्धता व्यक्त की थी उससे मुँह मोड़ना इनके लिए कठिन है । पर उन सभी दावों को सच करना तो उससे भी ज्यादा कठिन है ।

जनप्रिय ओली क्या देशप्रिय बन पाएँगे ?

श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक मार्च | अंततः प्रतीक्षा की घडियाँ समाप्त हुईं और नेपाल को अपना ४१वाँ प्रधानमंत्री मिल ही गया । केपी ओली का नौ महीने का पूर्व कार्यकाल कई मायनों में लोकप्रिय रहा तो विवादास्पद भी रहा । वैसे इस कार्यकाल की तारीफ करने वाले कम नहीं हैं और ये वो हैं जिनके लिए देश का एक हिस्सा तो मायने रखता है पर वहाँ रहने वाले लोग मायने नहीं रखते हैं । पर अगर उस वक्त के प्रधानमंत्री ओली की छवि देखी जाय तो वह सिर्फ एक समुदाय विशेष के नेता के रूप में ही सामने आई । देश का एक महत्तवपूर्ण हिस्सा, उनमें सम्पूर्ण देश के अभिभावक को नहीं देख पाया और इसकी सबसे बडी वजह थी उनकी कटुक्तियाँ जिसने मधेश के दर्द को मजाक समझा था और मधेशी को अस्तित्वविहीन । जिसका परिणाम चुनाव में नजर आया । पूरे देश में उन्होंने जो मानसिक स्तर पर विभेद की लकीर खींची थी उसे चुनावी परिणाम ने स्पष्ट कर दिया था । मधेश ने अपनी दोयम स्थिति में भी अपने विरोध को दर्शा दिया । जहाँ पूरा देश एमाले के राष्ट्रवाद के लहर में बह रहा था वहीं दो नम्बर प्रदेश ने इस लहर में अपनी विरोध की नैया बहा ही दिया ।

देश का लोकतंत्र का अभ्यास और नई नई संघीयता की पैदाइश अभी बाल्यावस्था में है जिसे पालना, बड़ा करना और साकार करना सबसे बड़ी चुनौती है[/su_quote]

जनप्रिय ओली क्या देशप्रिय ओली बन पाएँगे ?
कईयों का मानना हैं कि ओली ने अपने पूर्व कार्यकाल में काफी जनप्रिय काम किया था इसलिए उन्हें बहुमत मिला । पर यह सिर्फ मन बहलाने की बात है । उनके उस कार्य की तारीफ की जा रही है जो उस वक्त सर्वथा गलत था । देश के हिस्से की जनता मारी जा रही थी, गोलियों और गालियों से उन्हें छलनी किया जा रहा था और सरकार तमाशा देख रही थी । मधेश आन्दोलन का अंतिम हथियार था नाकाबन्दी, जिसे भारतीय नाकाबन्दी कह कर राष्ट्रवाद की आग सुलगाई गई और जिसका अच्छा परिणाम भी वो प्राप्त कर चुके हैं । नाकाबन्दी के समय तेल तस्करी को बढ़ावा देने वाली सरकार की, समुदाय विशेष आज भी जी खोल कर तारीफ करती है क्योंकि उनके घरों के चुल्हे जलते रहे थे, भले ही मधेश के कई घरों के चिराग बुझ गए । पर न तो समुदाय विशेष और न ही सरकार पर कोई असर हुआ । हाँ सरकार के हाथ एक तुरुप का पत्ता जरुर आ गया जिसको वो भँजाते रहे । उन्होंने सिर्फ और सिर्फ वोट पाने की राजनीति की क्योंकि उनकी निगाह आगामी चुनाव पर थी और चुनावी दौर के नब्ज को पकड़ने के लिए उन्होंने एक पक्ष को मानसिक तौर से इस बात के लिए तैयार किया कि वही राष्ट्र के सबसे बडे हितैषी हैं और देश का भला सिर्फ और सिर्फ एमाले कर सकती है । इसलिए वो इसी गर्माहट के बीच चुनाव चाहते थे क्योंकि लोहा गर्म था और वो उसे ठंडा नहीं होने देना चाहते थे । अंततः इसका जादू भी चला और आज वो सत्ता पर काबिज भी हैं । खैर सत्ता में किसी ना किसी को तो आना ही था । पर जनता की सबसे बड़ी चाहत यह होती है कि वो एक सुखी, सम्पन्न और स्थिर देश का नागरिक हों ।

करीब डेढ़ वर्ष के बाद ओली सत्ता में वापस आए हैं और इस बार वो जनता की उम्मीद बन कर आए हैं । नेपाल की जनता वामगठबन्धन में देश के लिए स्थिर सरकार और विकास के सपने को साकार देखना चाहती है । एमाले और माओवादी केन्द्र के एकीकरण ने उनकी उम्मीदों को और भी मजबूत किया है । पर क्या सचमुच यह राह इतनी आसान होगी ? क्या यह सरकार अपने पाँच वर्ष बिना किसी रुकावट के पूरी कर पाएगी ?
खैर राजनीति अटकलों पर टिकी होती है इसलिए निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता । परन्तु स्थिरता नेपाली जनता की चाहत है । और वर्तमान सरकार से नेपाली जनता विकास के सपने को पूरा होते देखना चाहती है । वैसे तो प्रधानमंत्री सपनों को बाँटने का काम बखूबी करते आए हैं । वैसे सपना देखना सही भी है क्योंकि जब हम सपना देखते हैं तभी उसे कार्यान्वयन करने की कोशिश भी करते हैं । परन्तु कल्पना और फैंटेसी में अन्तर होता है । कल्पना की जमीन कहीं ना कहीं यथार्थ के धरातल पर टिकी होती है, परन्तु फैंटेसी पूरी तरह से यथार्थ से परे होती है । उसमें चमक– दमक तो होती है पर उसका वास्तविक जीवन से दूर–दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता । कहने का तात्पर्य यह कि जमीनी हकीकत से परे सपनों को दिखाना राजनेताओं या देश के प्रतिनिधियों को मजाक का विषय बना देता है । प्रधानमंत्री ने ऐसे ही कई सपनों के बीज को नेपाली जनता के मानस में बोने का काम किया है । पर एक सच्चाई यह भी है कि जनता इतनी बेवकूफ भी नहीं है कि, देश की भौगोलिक दशा को समझ नहीं पाए । उन्हें भी सपनों की सच्चाई समझ आती है । इसलिए भले ही तत्काल हवा से बिजली ना बने, घर–घर गैस की लाइनें ना बिछें, समन्दर में जहाज ना चले कोई फर्क नहीं पड़ता । परन्तु जो मुमकिन है और जो उनके मूलभूत अधिकार हैं उन्हें पाने का अधिकार जनता को अवश्य है । यह तभी सम्भव हो सकता है जब नेता ईमानदारी से देश की समस्या को समझे और उस दिशा में सही कदम परिचालन करे । जनता विकास चाहती है, पर देश को इस के लिए पीढियों तक गिरवी रखने के शर्त पर नहीं । किसी एक को दिखाने की नीति से दूसरे के हर सही गलत फैसले को मान लेना सही राजनीति या कूटनीति नहीं है । इसमें दूरदर्शिता की आवश्यकता पहले भी थी और आज भी है ।

चुनौतियों से घिरी ओली सरकार

ओली का यह दूसरा कार्यकाल कैसा रहेगा यह सवाल और जिज्ञासा बुद्धिजीवियों में ही नहीं आम जनता के दिलो–दिमाग में भी है । जिस राष्ट्रवाद की दुहाई देकर आज सरकार गठित हुई है, क्या आगे भी वो मधेश को दरकिनार कर आगे बढ़ेगी ? क्या मधेश आगे भी अवहेलित ही रहेगा ? देश से बाहर दो पड़ोसियों के बीच वर्तमान सरकार की नीति क्या होगी ? आम जनता की आशाओं और उम्मीदों को वर्तमान सरकार कैसे सम्बोधित कर पाएगी ? पूर्व सरकार द्वारा गठित जम्बो मंत्री मण्डल का विरोध करने वाली पार्टी के लिए, एकीकृत पार्टी के व्यवस्थापन का कार्य क्या इतना सहज होगा कि सभी को संतुष्ट किया जा सके ? पूर्व देउवा सरकार द्वारा किए गए निर्णय को किस तरह देखना चाहेगी वर्तमान सरकार ? यानि सिर्फ सवाल और चुनौतियाँ ही सरकार के सामने है । ऐसे में देश के विकास और समृद्धि की यात्रा कठिन ही नहीं जोखिमपूर्ण है । सवालों से घिरा ओली सरकार के कार्यकाल की राह सहज तो कदापि नहीं मानी जा सकती । दो विरोधी धार ने जनता के समक्ष एक होने का दावा किया है, इस धार की दिशा कब तक एक ही होगी यह यक्ष प्रश्न है । जनता के सामने वामगठबन्धन ने जो प्रतिबद्धता व्यक्त की थी उससे मुँह मोड़ना इनके लिए कठिन है । पर उन सभी दावों को सच करना तो उससे भी ज्यादा कठिन है । कहते हैं आलोचना करना आसान है, पर प्रतिबद्धता पर कायम रह कर काम करना अत्यन्त कठिन है । नेपाली जनता प्रजातंत्र की स्थापना के बाद पहली बार ओली सरकार से कुछ ज्यादा ही आशान्वित है । पर आज सरकार के पास बहुमत है, ऐसे में एक सहज वातावरण की उम्मीद तो की ही जा सकती है ।

मधेश को लेकर क्या सरकार सकारात्मक होगी ?

वर्तमान में सरकार अपने स्थायित्व को निश्चित करने की पहल शुरु कर चुकी है । संघीय समाजवादी फोरम और राजपा नेपाल का सरकार में सहभागी होना निश्चित हो चुका है । यह नीति सरकार की सफलता मानी जा सकती है परन्तु मधेशवादी दल के इस निश्चय से मधेश की अधिकांश जनता खुद को हारा हुआ महसूस कर रही है । उन्हें यह लग रहा है कि जिस पार्टी या नेतृत्व ने मधेश मुद्दों को कभी गम्भीरता से नहीं लिया, जिसने हमेशा संघीयता का विरोध किया, जो यह कहता आया है कि संविधान का संशोधन देश हित में नहीं है, उसी को मधेशवादी दलों का समर्थन देना कितना उचित है ? यह सवाल उठना आवश्यक भी है, क्योंकि विगत में प्रधानमंत्री का जो रवैया मधेश को लेकर रहा है वह आसानी से भुलाया नहीं जा सकता । बावजूद इसके यह उम्मीद की जा सकती है कि शायद देश को स्थिर सरकार देने के लिए और विकास की दिशा में बढ़ने के लिए सरकार मधेश की ओर भी अपनी दृष्टि देना चाहेगी । क्योंकि देश का अगर एक भी हिस्सा असंतुष्ट रहा तो उसका असर भविष्य में सही नहीं पड़ सकता है यह जाहिर सी बात है । असंतोष का बीज ही विखण्डन का कारण बनता है । विश्व इतिहास में सुडान, मेक्सिको, बंगलादेश, भुटान आदि कई उदाहरण हैं । इसलिए देश की सार्वभौमिकता और राष्ट्रीयता को बचाने के लिए सरकार को एक संतुलित नीति बनाने की आवश्यकता होगी ।

कैसी होनी चाहिए सरकार की कूटनीति ?

अनुकूल कूटनीति और विदेश नीति ही देश का सर्वांगिन विकास कर सकता है । भारत से भले ही सौ शिकायतें हों पर चीन की विस्तारवादी नीति और विश्व साम्राज्य स्थापित करने की मंशा को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है । भारतीय नीति अगर देश हित में नहीं है, तो विरोध आवश्यक है । पर एक दो तरफा दृष्टिकोण जो यहाँ परिपाटी के रूप में दिखता आ रहा है कि जहाँ नेपाल भारत की सीमा के स्तम्भ नजर आते हैं वहीं हमारे देश में चीन का नेपाल के पहाड पर दबदबा नजर नहीं आता है, जहाँ अपनी ही सीमा में नेपाली नागरिक का प्रवेश वर्जित है उसका विरोध नजर नहीं आता है । कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि तटस्थ, पूर्वाग्रह और दूराग्रह से परे अनुकूल नीति ही नेपाल के हित में हो सकती है । देश की वस्तुस्थिति को अनदेखा कर भारत के साथ के रिश्ते को कमजोर नहीं किया जा सकता । देश के विकास में अगर चीन सहायक है, तो उसका साथ देश के लिए आवश्यक है । पर सरकार को यह नहीं भूलना होगा कि नेपाल और भारत की खुली सीमा जिस रिश्ते को जिन्दा रखती आई है, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी नेपाल की भी उतनी ही है जितनी भारत की है । इसलिए नेपाल की कूटनीति का निर्माण वैसा ही हो कि रिश्तों की गर्माहट बनी रहे ।
एक और चुनौती इस देश की है, भ्रष्टाचार और बँटवारे की राजनीति का अंत । पर यह भी जाहिर सी बात है कि भले ही प्रधानमंत्री आज यह कह दें कि, मैं न तो खुद भ्रष्टाचार करुँगा और न ही दूसरे को करने दूँगा, पर सच्चाई तो यह है कि यहाँ नसों में बहने वाले खून की तरह भ्रष्टाचार रग–रग में बसा हुआ है । इसलिए इसके उन्मूलन की कल्पना तो दिवा–स्वप्न ही है । यही हाल राजनीतिक बँटवारे की नीति का है । देश का कोई भी निकाय इससे अछूता नहीं है, ऐसे में इसकी समाप्ति की कल्पना भी कोरी कल्पना है । क्योंकि, खुद वर्तमान सरकार का भविष्य भी इसी बँटवारे की राजनीति पर टिका हुआ है ।
जहाँ तक भौतिक विकास की बातें हैं, मसलन, बूढ़ी गण्डकी जलविद्युत आयोजना, पोखरा काठमान्डौ रेलमार्ग, उपत्यका में मेट्रो रेल का विकास और विस्तार ये सभी आवश्यकताएँ सरकार की मूल सूची में शामिल होना चाहिए, पर यह भी तय है कि, इस एक कार्यकाल में इसके पूरी होने की सम्भावना न्यून ही है । पर जनता इस ओर सरकार के बढ़ते कदम को जरूर देखना चाहती है । एक गौरतलब बात यह है कि जब भी किसी योजना के शुरुआत की बात आती है, तो जनता इस बात से भी वाकिफ है कि यहीं से भ्रष्टाचार की शुरुआत होती है । कमीशनखोरी और नेताओं के स्वार्थ सबसे अधिक फलने फूलने लगते हैं । क्या सरकार इस पर नियंत्रण कर पाएगी ?
ये तो चुनौतियों की एक छोटी झलक है । देश का लोकतंत्र का अभ्यास और नई नई संघीयता की पैदाइश अभी बाल्यावस्था में है जिसे पालना, बड़ा करना और साकार करना सबसे बड़ी चुनौती है ।

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