अक्षय कुमार की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म पैड मैन एक सकारात्मक सोच

अक्षय कुमार की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म पैड मैन एक सकारात्मक सोच को प्रस्तुत करती है। माहवारी एक ऐसा विषय है जिस पर समाज चुप्पी बांधे है, ऐसे में इस विषय पर फ़िल्म लाना किसी क्रांति से कम नही है, क्योंकि यहां आज तक इस विषय पर चर्चा करना ही वर्जित था। अरुणाचलम के संघर्ष को इस फ़िल्म में अक्षय ने दिखाया है।


आज भी इस विषय को हेय दृष्टि से देखा जाता है और समाज मे कई तरह की भ्रांतियां फैली है। माहवारी कोई पाप नही है जो इसे हव्वे की तरह समझा जाता है। महिलाओ को माहवारी के दिनों अपवित्र माना जाता है उस पर न जाने कितने प्रतिबंध लगा दिए जाते है, कई जगह तो उसे घर मे भी नही रहने दिया और कहीं उसे एक कोने में बिठा दिया जाता है, सभ्य घरो में भी ऐसा होता है ये मात्र ग्रामीण अंचलों की बात नही है। उस महिला की क्या मनोदशा होती है ये कोई समझता नही, महिलाएं भी इसे नियति मान मौन धारण कर लेती है। माहवारी को महिला की कमज़ोरी माना जाता है, महिलाएं खुद इस मुद्दे पर खुल कर अपनी सोच नही प्रकट कर पाती। इससे संबंधित जानकारी भी उन्हें उपलब्ध नही हो पाती है क्योंकि वो इस विषय पर बात करने से बचती है।

महिलाओं के स्वास्थ्य का मुद्दा एक गंभीर मुद्दा है, हर वर्ष हज़ारो लाखो महिलाएं संक्रमण की वजह से गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती है और लोक लाज की वजह से चुप्पी साध लेती है। ऐसे में ये फिल्म एक मार्गदर्शक की भूमिका अदा करेगी, सरकार को चाहिए इस फ़िल्म को टैक्स फ्री करे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देखे और माहवारी से संबंधित उनकी भ्रांतियां दूर हो, खास तौर से ग्रामीण वर्ग में। भारत मे बॉलीवुड जगत प्रेरणा का सबसे बेहतर माध्यम माना जाता है क्योंकि लोग फिल्मो से दिल से जुड़ाव महसूस करते है। ऐसे में ये फ़िल्म लोगो की सोच बदले और उन्हें जागरूक करेगी। उम्मीद है सरकार इस फ़िल्म को टैक्स फ्री करने पर विचार करेगी।
डॉ शिल्पा जैन

वारंगल

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

avatar
  Subscribe  
Notify of
%d bloggers like this: