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क्या सार्क को पुनर्जीवित करने में ओली सक्षम हो पाएँगे ? : डॉ. गीता कोछड़ जायसवाल

हिमालिनी, अंक जुलाई २०१८ | भारत और पाकिस्तान को एक साथ एक ही मंच पर लाने में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ SCO) की सफलता के बाद, दक्षिण एशियाई क्षेत्र के कई छोटे देश दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क SAARC) की बैठकों को पुनर्जीवित करने के लिए चीन को बहला कर सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं । विशेष रूप से, नेपाली प्रधानमंत्री खड्ग शर्मा ओली, जो चीन के खÞास समर्थक के रूप में जाने जाते हैं, संभावना है कि वह भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन का उपयोग कर सकते हैं । हालांकि, चीन सार्क के लिए एससीओ जितना ही उत्सुक होगा या नहीं, यह खुले बहस का अलग मुद्दा है, क्योंकि चीन इस समय दुनिया की प्रमुख शक्तियों के संबंधों की रूपरेखा की स्थापना में अधिक रुचि रखता है ।
अधिक महत्व का मुद्दा यह है कि प्रधानमंत्री ओली दक्षिण एशियाई क्षेत्र में राजनेता की भूमिका निभा पाते हैं या नहीं ? प्रधानमंत्री ओली सार्क की चेयर पर पाकिस्तान को स्थानांतरित करने में सक्षम हो पाते हैं या नहीं, यह नेपाल की राजनीति में एक गंभीर रुचि का मुद्दा है ? ओली क्षेत्र की सभी छोटी शक्तियों को एकजुट कर सभी द्विपक्षीय मुद्दों के लिए बहुपक्षीय मंचों में समाधान ढूंढने के लिए प्रोत्साहित कर पाते हैं या नहीं और साथ ही साथ दोनों शक्तिशाली पड़ोसी ( भारत और चीन ) के साथ समान संतुलन बना पाते हैं या नहीं ? मुद्दा यह भी है कि, क्या ओली इस तरीकÞे से अपना भू–सामरिक कार्ड खेलेंगे की क्षेत्रीय सहयोग संगठनों कÞा भू–आर्थिक लाभ पूरे क्षेत्र को होगा और उनका स्वयं का घरेलू विकास का मुद्दा आगे बढ़ पाएगा या नहीं ? जवाब ओली के विकास के एजेंडे और विदेश नीति के लक्ष्यों का आकलन करने में निहित है ।
भारत के उरी सेना शिविर में हुए आतंकवादी हमले के कारण बहिष्कार की घोषणा के बाद, सन् 2016 में सार्क का 19 वाँ शिखर सम्मेलन जो इस्लामाबाद में आयोजित किया जाना था, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, मालदीव, भूटान और श्रीलंका के भाग न लेने के कारण रद्द कर दिया गया था । पाकिस्तान अपने क्षेत्र में आतंकवादियों को प्रायोजित करने और भारत में हमला करने के समर्थन के चलते, भारत की आपत्तियों की वजह से कई क्षेत्र में पिछड़ रहा है और कठिनाइयों को झेल रहा है । । जबकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रित करने का एक असामान्य और अभूतपूर्व कदम उठाया था, जो कि इस बात की तरफÞ इशारा करता है कि मोदी अपनी ‘पड़ोसी पहले’ नीति के चलते सभी पड़ोसी देशों के साथ सौहार्दपूर्ण और मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने की कल्पना करते हैं ।
वर्ष 2018 में आंतरिक रूप से कई देशों में तेजी से राजनीतिक परिवर्तन के साथ साथ क्षेत्रीय मैट्रिक्स में कई बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं । सत्ता में नेपाली प्रधानमंत्री ओली का उत्थान भी अभूतपूर्व शक्ति गठबंधन और नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं को राष्ट्रवाद से जोड़ने का परिणाम है । यह सत्ता हासिल करने का एक जरिया मात्र है परन्तु अब नेपाल के लिए यह आवश्यक है कि वह भारत के साथ प्यार और नफÞरत के रिश्तों को संभालने के लिए वैकल्पिक तंत्र और संगठनों का सहारा ले । नेपाल शक्तिशाली देशों से घिरा राष्ट्र है जो कि भारत के साथ सांस्कृतिक रूप से बँधा हुआ है और परस्पर निर्भर समुदायों का देश है, उसके लिए एक तरफÞ तो भारत से रचनात्मक तरीकÞे से संबंध बनाना अनिवार्य है और दूसरी तरफ, ओली की शक्ति स्थिरता इस बात पर निर्धारित है कि वह ’भारत से संतुलन और दूरी बनाए बिना, चीन के साथ घनिष्ठ संबंध’ बनाने में खÞुद को सक्षम साबित करें । इस प्रयास में, ओली सभी दक्षिण एशियाई देशों को संयुक्त कर और उनके समर्थन के एक व्यापक बल से विशाल हाथी (भारत) को बाँधने के इच्छुक हैं ।
दिलचस्प बात यह है की ओली के प्रधानमंत्री मोदी के साथ संबंधों को सुधारने के लिए अप्रैल2018 में भारत की यात्रा से पहले, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद अब्बासी नेपाल यात्रा के लिए पहुँचे, जोकि ओली के सत्ता में आने के बाद दुनिया के पहले विदेशी नेता का दौरा था । दुनिया भर में इस यात्रा को जल्द से जल्द सार्क शिखर सम्मेलन कराने के लिए ओली के समर्थन को हासिल करने का मकÞसद बताया गया । दुर्भाग्य से, ओली आधिकारिक तौर पर भारत में इस विचार को नहीं ला पाए और भारत – पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करने में भी असमर्थ रहे । ओली की भारत यात्रा की विफलता इस बात में है कि वह प्रधानमंत्री मोदी से असामान्य भव्य स्वागत को छोड़कर किसी भी पर्याप्त परिणाम को प्राप्त करने में असफल रहे, जिसे नेपाल में सकारात्मक रूप में नहीं देखा गया ।
इन सबके चलते, एससीओ शिखर सम्मेलन नेपाली प्रधानमंत्री के लिए एक उम्मीद की किरण है । वर्ष2016 के बाद से नेपाल एससीओ में एक संवादक क भूमिका में है जो चीन को सार्क की पूर्ण सदस्यता, और संगठन में एक पर्यवेक्षक की भूमिका की पेशकश के लिए उत्सुक है । किसी भी छोटे देश का सामरिक उद्देश्य ये होता है कि वह बड़ी शक्तियों से तालमेल बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय मंचों का प्रयोग करें, जिससे कई शक्ति केंद्र द्विपक्षीय दुश्मनी बनाए बिना किसी भी मुद्दे पर किसी भी शक्तिशाली देश पर सामूहिक दबाव बना सकते हैं । मगर सार्क एक असमर्थक क्षेत्रीय रणनीतिक मंच बनी हुई है, जबकि भारत उपक्षेत्रीय क्षेत्र में बहुत ही प्रभावशाली देश है और द्विपक्षीय विवादों की कई एकाधिक परतें हैं । सार्क की क्षेत्रीय और उपक्षेत्रीय खेल में एक गैर अभिनेता शेष की त्रासदी इसलिए भी है क्योंकि भारत दक्षिण एशिया के कई सहयोगियों के साथ द्विपक्षीय या बहुपक्षीय सहकारी संलग्न में सक्षम है ।
भारत पाकिस्तान द्विपक्षीय विवाद भी सार्क में मौलिक परस्पर विरोधी खयालों और वक्तव्यों के कारण है । विशेष रूप से सीमा विवाद, आतंकवादी वित्तपोषण और प्रशिक्षण, कट्टरवाद, और कश्मीर जैसे कई मुख्य प्रश्नों के संबंध में विवाद का कारण है । इसके अलावा, सभी सार्क सदस्य देशों के बीच राष्ट्रीय हितों के मुख्य मुद्दों की समझ में विचलन कोई भी ठोस ‘सर्वसम्मति निर्णय’ लेने में असमर्थ हैं, जो कि सार्क के संविधान का एक मूल आधार है । हालांकि सार्क के प्रत्येक देश जा ेकि संस्कृति और सभ्यता से जुड़े हैं उन सबके लिए ‘विकास’ एक समान मुद्दा है । सार्क की धीमी प्रगति के कारण पाकिस्तान और नेपाल सहित कई देश चाहते हैं की चीन को प्रतिभार बनाने के लिए और एक वैकल्पिक सत्ता केंद्र के रूप में शामिल किया जाए ।
इस इच्छाधारी सोच मैं समस्या यह है कि चीन क्षेत्रीय सहकारी भागीदारी को बढ़ावा देने में अधिक उत्सुक है, ना कि किसी विदेशी संबंधों में कटुता को दूर करने में काम करना चाहता है । वास्तव में, चीन एससीओ के द्वारा जातीय या राष्ट्रीयता हिंसा सहित किसी भी प्रकार के आतंकवादी समर्थन के खिलाफ मजबूत पक्ष को प्रदर्शित करता है । इसलिए, भले ही चीन सार्क का स्थायी सदस्य बन जाए, वह भारत के साथ आतंकवाद के खिलाफÞ एकीकृत लड़ाई में समर्थन पाने के लिए एक लाभप्रद स्थिति बन जाएगा, हालांकि सार्क के संविधान में इन मुख्य मुद्दों से निपटने के लिए कोई प्रावधान नहीं है ।
वर्ष 2018 जून 1 को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान ने स्पष्ट किया कि चीन सार्थक संवाद और सहयोग में रुचि रखता है । उन्होंने अपने वक्तव्य में साफÞ साफÞ कहा कि भारत और पाकिस्तान सख्ती से एससीओ के चार्टर का पालन करें और विकास का प्रोत्साहन करने के लिए अपने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारें’। यह वांछनीय बनाया गया कि भारत और पाकिस्तान आपसी गलतफहमी या विवादों को एससीओ चर्चा के दायरे से बाहर रखे । इसलिए चीन की द्विपक्षीय कलह के मुद्दों को सुलझाने के लिए सार्क मंच पर एक सक्रिय मध्यस्थता नहीं होगी, बल्कि उसकी रुचि आर्थिक विकास, सहयोग, सामाजिक विकास आदि में होगी ।
नेपाल में अति राष्ट्रवादी वक्तव्य के घरेलू दबाव के कारण यह अनिवार्य है कि ओली सभी पास और दूर के देशों से सहकारी भागीदारी के साथ साथ विकास के मुद्दों पर भी अधिक ध्यान दें, विशेष रूप से चीन से जो की निवेश और लंबी अवधि के ऋण प्रदाता के रूप में उभर रहा है । चीन का सार्क में शामिल होना और बेल्ट और रोड इनिशिएटिव (Belt and road Initiative BRI) को आगे बढ़ाना अधिक आकर्षक लगता है क्योंकि इससे कनेक्टिविटी परियोजनाओं में वृद्धि होगी और नेपाल, जो कि आधुनिक बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है, के आर्थिक विकास में सहयोग होगा । परन्तु, ओली सरकार की भूआर्थिक हित चीन की भूसामरिक उद्देश्यों के साथ तब तक अभिसरण नहीं है, जब तक कि नेपाल चीन का एक संधि नहीं बन जाता और भारत के साथ त्रिपक्षीय सहयोग में सम्मेलन नहीं कर पाता । इसलिए, भले ही ओली की विदेश नीति दृष्टि किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफÞ है और स्थानीय आर्थिक विकास पर जोर देती है, लेकिन भारत और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के साथ बातचीत और मिलकर चलना नेपाल के लिए मुख्य चुनौती है।
फिलहाल राष्ट्रीय हितों के मुख्य मुद्दे सुलझ नहीं पा रहे और द्विपक्षीय विवाद क्षेत्र में बढ़ रहे हैं, सार्क एससीओ के विपरीत आर्थिक एकीकरण पर आम सहमति का निर्माण करने के लिए सही मंच प्रदान नहीं करता है । चीन के लिए, छोटे क्षेत्रीय कलाकारों को पूरी तरह से समर्थन देना, सामान्यता के नियमों और शर्तों पर आधारित नहीं हैं बल्कि उनकी बाजार की क्षमता शक्तियों पर आधारित हैं । वस्तु व्यापार, पर्यटन, सेवा उद्योगों का मुक्त प्रवाह और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के ऋण समझौतों के आधार पर सार्क का पुनः प्रवर्तन निहित है और ओली को लागत के बंटवारे के आधार पर इस को बढ़ावा देने की जरूरत है, ना कि अपने देश के विकास के लिए असीमित संसाधनों की मांग कर चीन को सक्रिय भागीदार बनने की जÞरूरत है । प्रस्तुतिः सीपु तिवारी

Geeta Kochad Jayaswal
डा. गीता कोछड़ जयसवाल

(डा.गीता कोछड़ जायसवाल चीन में संघाई फुतान विश्वविद्यालय में अस्थाई प्रोफेसर हैं, और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर है ।)

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