जनकपुर विकास में साहित्य की क्या भूमिका रही है ?

कथा, कविता तथा यात्रा संस्मरण सहित आधा दर्जन साहित्यक पुस्तक प्रकाशन कर चुके साहित्यकार शेषनारायण झा जी के साथ किया गया तीन प्रश्न ः
प्रकाशक की खोज में साहित्य
जनकपुर विकास में साहित्य की क्या भूमिका रही है ?
कोई भी साहित्य सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक तथा जनचेतना के लिए समर्पित होता हैं । यहाँ की सम्पदा, साँस्कृतिक तथा धार्मिक आस्था पर जिस प्रकार से कलम चलनी चाहिए थी कही न कही अभाव हो रहा है । कहते है जहाँ का साहित्य जिन्दा होता है वहाँ स्वतः विकास होता है ।

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शेषनारायण झा

यहाँ पर साहित्यकार की भी कमी नही हैं । लिखा भी होगा, किन्तु जिस प्रकार से पब्लिकेशन होना चाहिए उसका अभाव महसूस हो रहा है । यहाँ के विकास के लिए साहित्य को जिन्दा रखना आवश्यक है ।
साहित्य से सँस्कृति का संरक्षण कैसे किया जा सकता है ?
तुलसीकृत रामायण में जनकपुर का वर्णन किया गया है । वह भी धार्मिक साहित्य ग्रन्थ ही है । आज तुलसीकृत रामायण से विश्व में जनकपुर की पहचान बनी है । उसी प्रकार अगर यहाँ की ंसंस्कृति के विषय में कलम चलाया जाए तो उसका संरक्षण अवश्य किया जा सकता है ।
साहित्य का विकास कैसे सम्भव होगा ?
लेखक का कार्य है किसी भी वस्तु, जगह, देश, समाज को अवलोकन कर साहित्य सृजना करना । लेकिन जब तक यह प्रकाशन में नही आएगा तब तक उसका कोई मूल्य नही होगा । लेकिन प्रकाशक का अभाव यहाँ पर देखा गया है । हिन्दु धर्मावलम्बीे देश में जनकपुर अपना स्थान बनाने में सफल होने बावजूद भी जिस प्रकार से साहित्य सृजना होनी चाहिए थी प्रकाशक के अभाव में कमी दिख रही है । इसके लिए राज्य और समाज दोनाें के लिए सोचना जरुरी है ।

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