Wed. Sep 19th, 2018

सिम्रोनगढ़ से प्राप्त नवीन खण्डित शिलालेख का रहस्य : डि.के. सिंह

हिमालिनी,अंक जून २०१८ | दिनांक १५मई, २०१८ ई. के दिन सिम्रोनगढ नगरपालिका मे हम लोग सिम्रोनगढ ईन्टरनेसनल कॉन्फ्रेन्स के बारे मे मेयर जी लगायत कन्फरेन्स समिति के साथ चर्चा परिचर्चा कर रहे थे तो उसी समय पता चला कि सिम्रोनगढ कोल्ड स्टोर से ५०० मीटर पश्चिम् साइड मे ८÷१० साल पहले ही पोखर की खुदाई के समय एक शिवलिंग दिखाई दिया था, उन लोगो ने उसे ट्रेक्टर से निकालने की कोशिश की पर वह निकला नही । तो गॉव के लोगो ने ऐसे ही उसे छोड़ दिया जिसके वाद वहाँ पर लोगों ने वहाँ पूजा पाठ करना चालू कर दिया था । यह देख उस जगह के मालिक  ने बोला कि या तो उस शिवलिंग को यहाँ से उठाकर ले जाओ नहीं तो मिट्टी से ढक दो । फिर उसके वाद वही काम हुआ मिट्टी से ढकने वाली । फिर इस घटना को सुनने के बाद हम लोगो को भी उत्सुकता हुई कि आखिर देखा जाए उस शिवलिंग को कि कैसा है ? तब जाकर नगरपालिका के जे.सि.बी को ले जाकर  खुदाइ शुरू हुई उसके वाद वहां तिरहुत लिपि मे लिखी हुई शिलालेख का टुकड़ा मिला जिस टुकड़े को मैने अपने सोशल मीडिया फेसबुक आइडी  म्.प्. क्ष्लनज वाले पेज पर पोस्ट के माध्यम से लोगों से इसे पढने के लिए आग्रह किया । तत्पश्चात् भवनाथ झा,जो कि शोध एवं प्रकाशन प्रभारी महावीर मन्दिर, पटना , बिहार से हैं । उन्होंने इस अभिलेख का हिन्दी अनुवाद करने में सहायता की । यह अभिलेख तीन ओर से खण्डित है, केवल नीचे का भाग सुरक्षित है । इस खण्डित शिलालेख की लंबाई २९.५ से.मि. एवं चौड़ाई १५ से.मि..है और शिला लेख के टुकड़े में  केवल ११पंक्तियाँ ही मौजूद हैं ।
लिपि एवं लेखन शैली देखने से पता चल रहा था  कि  १९९२ ई. में सिमरौनगढ से मिले एक खण्डित शिलालेख का यह दूसरा टुकडा है । ध्यातव्य है कि मार्च १९९२ ई. में १२.३ से.मी. चौडा एवं १६सें.मी. लम्बा एक टुकड़ा स्थानीय विद्यालय के शिक्षक के सौजन्य से मैसिमो विडाले नामक इटालियन पुरातत्त्वविद् को मिला था जो उन दिनों नेपाली एवं इटली के पुरातत्त्ववेत्ताओं के संयुक्त अभियान के तहत सिमरौनगढ पर शोध कर रहे थे । इस शिलालेख के इंक स्टम्पेज के आधार पर रिकार्डो गार्विनी ने इसका अध्ययन किया था।
यह आलेख नेपाल पुरातत्त्व विभाग की पत्रिका ब्लअष्भलत ल्भउब,ि के १९९३ ई. में अक्टूबर (नवम्बर अंक में ब् ँचबनmभलतबचथ क्ष्लकअचष्उतष्यल ँचयm क्ष्mचबयलनबचज, त्जभ ब्लअष्भलत ःबष्तजष्बि ऋबउष्तब िशीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था । इसमें ७ पंक्तियाँ खण्डित रूप में मिली थी जो चारो ओर से अपूर्ण थी । चूँकि पहली पंक्ति के आरम्भ मे किसी देवी की स्तुति की गयी है, जिसमें बायीं ओर अक्षर घिसे हुए हैं, फिर भी छन्द की दृष्टि से पूर्ण है । अतः हम अनुमान लगा सकते हैं कि ७ पंक्तियों का यह टुकड़ा बायीं ओर ऊपर का अंश है, जिसमें बायीं ओर से एक या दो अक्षर ही खण्डित हैं । चूँकि इस टुकडेÞ की छायाप्रति मेरे पास उपलब्ध नहीं है, मैंने इस अंश को पढ़ने के लिए उक्त शोध पत्रिका में प्रकाशित छायाप्रति का ही उपयोग किया है तथापि कुछ स्थानों पर पाठभेद के बावजूद रिकार्डो गार्विनी द्वारा दिया गया पाठ समुचित प्रतीत होता है ।
वर्तमान उपलब्ध शिलालेख के अंश में ११ पंक्तियाँ है । नीचे का भाग सुरक्षित है, किन्तु ऊपर से खण्डित है अतः हम कह नहीं सकते कि इसके ऊपर भी पंक्तियाँ थीं अथवा नहीं । इस अभिलेख का पाठ इस प्रकार है–
देवनागरी लिप्यन्तरण
१….ग्रामशो….
२………(मा)याः पयः । । सी…..
३…..माध्वीकामृतमत्तकोकिलकुल…
४.साहंकारबीजादयं कल्पान्तावधिवारिधिप्रि
५.सहस्रसत्कामः कामधेनुं त्रिभुवनतिलकः काञ्चनीं क…
६……कैेलासमावासं यः कपालिनः । । वाराणसीतिलकमम्बरशेखरा…..
७…..धेत्ते ध्वजपृश्श्रिेयम् । । काश्यामयं कृतमतिर्वितरत्यजस्रमश्रान्तदान…..
८…मथिेतांगवदिन्दुकुन्दमन्दारगौरीृवदेने यशःश्रीः । । मुरं मुरारिस्त्रिपुरं पुरारिः….
९…स्तलृप्रोप्तरुषाद् नयेन । । यस्याहवप्रचुरतूर्य्यविकीर्य्यमाणकीर्तिच्छटाःप्रतिभटाः….
१०…दास्त्रीप्राप्तैरेते खलु यत् स्फुलिङ्गाः । । शीतांशुर्म्मुखमध्यवागपि सुधा बाह्वश्वकल्पद्रुम…….
११…दातरि दक्षिणे नयनिधौ विद्याविवेकाश्रये प्राक् प्रत्यक् सुरताणविक्रमहरेस्त….
अभिलेख में एक भी श्लोक पूर्ण नहीं है । अतः इसका अनुवाद स्पष्ट नहीं हो पा रहा है । तथापि प्रत्येक पंक्ति से प्राप्त सूचना इस प्रकार है–
१. इसका अनुवाद होगा– गाँव गाँव (में) । राजा के यश का वर्णन हो सकता है कि उनका यश गाँव गाँव तक फैला हुआ है ।
२. यहाँ दूध अथवा जल की बात है । उमायाः पयः हो सकता है । हिमालय से निःसृत नदियों के जल की उपमा देवी पार्वती के स्तन से निःसृत दूध से दी गयी हो ।
३. महुआ के रस के कारण मत्त कोयलों का वर्णन है ।
४. अहंकार रूपी बीज से उत्पन्न यह, जो कल्प के अन्तकाल में उत्पन्न होने वाले समुद्र से प्रेम करे…. ।
५. हजारों अच्छे कार्य करने की इच्छा रखनेवाले, तीनों लोकों के तिलक स्वरूप (राजा) ने कामधेनु को स्वर्णाभूषणों से लाद दिया ।
६. जिन्होंने कपाली शिव के आवास कैलास को (पृथ्वी पर उतार दिया) । यह राजा के यश का वर्णनÞ हो सकता है, जिसकी शुभ्रता से पूरी पृथ्वी ही कैलास के समान शुभ्र हो गयी हो । (यहाँ अनुष्टुप् छन्द का एक श्लोक है । )
७. ध्वज (राष्ट्रध्वज) की रक्षा करनेवाले राजा, मन्त्री अथवा सैनिक लक्ष्मी को धारण करते हैं । इन्होंने काशी में मन में संकल्प लेकर प्रचुर एवं बिना रुके हुए दान का वितरण किया । (यह राजा के लिए है ।
८. मथितांग अर्थात् जिनके अंग का मन्थन किया गया हो अर्थाते राजा मिथि, जिनके नाम पर मिथिला है उसी राजा के समान चन्द्रमा, कुन्द फूल एवं मन्दार फूल के समान गौर कान्ति वाली यशरूपी लक्ष्मी है । मुर राक्षस को मुरारि श्रीकृष्ण ने मारा तथा त्रिपुरासुर को भगवान् शंकर ने मारा…… ।
९. (यहाँ छन्दोयोजना की दृष्टि से एक अक्षर प्र छूटा हुआ प्रतीत हो रहा है । अतः ला अक्षर को लप्रा पढा गया है । ) किसी स्तर से प्राप्त क्रोध एवं नीति के द्वारा अर्थात् दण्ड एवं नीति के द्वारा शासन किया गया । जिनके युद्ध में बहुत सारे तूर्य (एक प्रकार का वाद्य यन्त्र( तुरही) से बिखरती हुई कीर्ति की छटा एवं प्रत्येक सैनिक..(चारों दिशाओं को घेर लेते हैं । )
१०. (इस प्रकार..) जिस प्रकार भोग देनेवाली स्त्री से प्राप्त इन (पुत्रों के) द्वारा ये अग्निकण के समान तेजस्वी हुए । मुख के वाणी तो अमृत के समान थी अतः वे चन्द्रमा की तरह थे । बाहु एवं अश्व से वे कल्पतरु के समान थे ।
११. इस दान करनेवाले में, नीति के खजाने में, दाक्षिण्य अर्थात् कोमल गुण से भरे हुए व्यक्ति में, तथा विद्या एवं विवेक के आश्रयभूत इस व्यक्ति में तथा पूर्व एवं पश्चिंम दिशाओं के सुलतान के पराक्रम का हरण करने वाले इस व्यक्ति में…..
इन ११ पंक्तियों में किसी राजा अथवा अन्य व्यक्ति का नाम नहीं है । किन्तु पूर्वप्राप्त शिलालेख अंश में दूसरी पंक्ति में नरपतिः तथा चौथी पंक्ति में राम तथा ७वीं पंक्ति में कर्ममादित्य का नाम आया है । यदि हम इस अंश के साथ अन्वय करते हैं तो अनुमान लगा सकते हैं कि यह शिलालेख रामसिंह देव के काल का है, जिसमे कर्ममादित्य के नाम का उल्लेख अभूत् कर्ममादित्यः के रूप में आया है । यह भी असम्भव नहीं कि कर्ममादित्य के जन्म की बात लिखकर आगे के किसी श्लोक में उनके ज्येष्ठ पुत्र देवादित्य का नामोल्लेख किया गया हो तथा अंतिम पंक्तियाँ मन्त्री देवादित्य से सम्बद्ध हो ।
जबतक इस शिलालेख के अन्य टुकड़े उपलब्ध नहीं होते तबतक इससे अधिक कुछ कहना अनुमानमात्र होगा ।
अनुमान को आधार पर इस सम्पूर्ण शिलालेख का निम्नलिखित रूप होना चाहिए, जिनमें से हमें दो टुकड़े मिले हैं, शेष टुकड़ों के लिए प्रयत्न आवश्यक है ।
मधेस विषयक शोधकर्ता और सामाजिक राजनीतिक अभियन्ता,
सिम्रोनगढ अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन २०१८ संचालक, बारा, मधेस

DK singh
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